Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 691–700

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 691–700

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द्वितीयश्रध्याय शतपथब्राहाण पचमत्राह्मण दायविभागाख्यान के आधिभौतिक चरित्र में यह विस्तार से बतलाया जाचुका है कि, इसी भूपिण्ड पर किसी समय मनुष्यविध देवता, एवं असुरों की सत्ता थी । इनमें अमुरदल तो आज तक विद्यमान है, परन्तु देवसत्ता सर्वात्मना अभिभूत होचुकी है । उस पुरायुग में देवता एवं असुरों में आए दिन युद्ध होता रहता था । देवताओं का प्रधान बल यश था । यज्ञचल से ही देवता समय समय पर असुरों को परास्त करते रहते थे । इस यज्ञ का प्रधान साधन सोमवजी ही थी । यही सोमवल्ली देवताओं का प्रधान ' देवयजन ' था । असुर निरन्तर इस देवयजन को नष्ट करने का प्रयास करते रहते थे । इस आए दिन की चिन्ता से छुटकारा पाने के लिए देवताओंने अपने इस देववजन की रक्षा के लिए - अत्रिमहर्षि के पुत्र चन्द्रमा को नियत किया । चन्द्रमा ब्राह्मण थे, एवं भारतवर्ष के निवासी थे | भौमत्राने चन्द्रमा को अपना मानस पुत्र बनाया । स्वयं रथ में स्थापित कर चन्द्रमा को पृथिवी की प्रदक्षिणा कराई गई । अन्त में राज्याभिषेक कर इहें उत्तरदिशा का तो दिक्पाल बनाया एवं औषधियों का लोकपाल बनाया । इसी लोकपाल, एवं दिक्पाल चन्द्रमा की रक्षा में तीन लक्ष प्रावेय मौनेय गन्धवों के साथ सोमवल्ली सौंपी गई । जहाँ जहाँ सोमबली का उद्गम होता था, वहाँ वहाँ चन्द्रमा ने अपनी देखरेख में गन्धर्दों को रक्षा के लिए नियत किया । श्रागे जाकर गुरुपत्नी के अपरता से बुद्धि चन्द्रमा ने देवताओं की देवयजनरूप सोमवली की रक्षा में उठा-1. सीनता दिखलाई । असुरो को अच्छा अवसर मिल गया । फलतः असुरों के द्वारा सोमवल्ली का आमूल चूड़ ध्वंस कर दिया गया | तभी से देवबल नास्तिभाव में परिणत होगया । प्रकृत ब्राह्मणश्रुति आधिदैविक - चरित्र के साथ साथ उक्त ऐतिहासिक घटना का भी स्मरण करा रही हैं । इति प्रतिमार्जनकम्मोंपपत्तिः १८.१ ९ ब्राह्मणो वेदिनिर्माणसम्बन्धी प्रायः सभी विषयों की वैज्ञानिक उपपत्ति बतला दी गई । अत्र ' अनवमर्श ' प्रकरण शेष रह जाता है । पूर्व के अनुवाद प्रकरण में यह बतला दिया गया है कि, अवतक बेटि पर कुशास्तरण नहीं कर लिया जाय तबतक भूलकर भी वेदि का स्पर्श नहीं करना चाहिए | तात्पर्य यही है कि, मन्त्र के द्वारा बननादि व्यापार से वेदिप्रदेश र हिंसक विद्युत् से युक्त होजाता है । उधर वर्हि में सौर - न - प्राणमयी विद्यत रहती है । विद्युविज्ञानवेत्ताओं को यह मलीभाँति विदित है कि मशीनरी का संचालन करने वाले विद्युद्यन्त्र के साथ एक ताँबे का तार स्वतन्त्ररूप से मीटर ( विद्युच्छक्तिप्रदाता यन्त्र ) पर्यन्त ऋद्ध किया जाता है । यदि सञ्चालक की असावधानी से, अथवा अधिक चापन ( दबाव ) से परिमाण से अधिक विद्युच्छक्ति का समावेश होजाता है, तो वह ताम्रतन्तु ( तार ) उसका निगरण ( पान ) कर जाता है । तत्काल फ्यूज उड़ जाता है । सञ्चालक वर्ग निरापद सुरक्षित रह जाता है | यदि यह तार न हो, तो वह उद्रिक्त विद्युत् इतस्ततः व्याप्त होकर संघात का कारण बन जाती है । बस ठीक यही परि-स्थिति यहाँ समझिए । वेदिस्थान से निकलने वाली विद्युत् संहार करने वाली है । इसका दमन करने के लिए ही वैटि पर कुशास्तरण किया जाता है । बर्दि में विद्युत है, जैसाकि पूर्व के वार्ड उत्पत्ति प्रकरण में विस्तार से बतलाया

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द्वितीयमध्याय प्रथमकाण्ड पञ्चमब्राह्मण ' का पान बरबाती है । अत: दर्भास्तरणानन्तर भेदि के है वह टर्मविध ' वेदिवियतु शरीर में किसी प्रत्यक्ष स्पर्श से कोई हानि नहीं होती । यद्यपि भौतिक विद्युत की भाँति स्पर्शकाल में यहाँ से ही सम्बन्ध है । आबात का अनुभव नहीं होता । क्योंकि इस प्राणात्मिका यजविद्युत का, प्राण एवं सम्पूर्ण यज्ञक नष्ट प्राणविद्या के विद्वानों का कहना है कि, स्पर्शकर्ता का प्राण मूर्च्छित होजाता, है फलतः इसी विश्वास के आधार होजाता है । प्रत्यक्षानुभव न सही, यदि हमें यज्ञ के परोक्ष फल पर विश्वास है का ही आश्रय लेना ही पर यदि हम यज्ञकर्म में प्रवृत्त होते हैं, तो हमें बाध्य होकर ऋषियोक्त पद्धतिक्रम होगा । पड़ेगा | प्राणपरीक्षक ऋषियों के आदेश पर चलना हीं हमारा मुख्य कर्तव्य का " ऐसा करने से क्या होगया, क्या हो जायगा, ऐसा ही क्यों न विद्यमान करलें " इसप्रकार ये । समय बुद्धिवाद पुराने युग में भी प्रचलित था । परन्तु उस समय यशविया के रहन्यवेत्ता से निराकरण होता रहता था । समय पर फैलने वाली तथाविधा भ्रान्तियों का उन रहस्यवेत्ताओं की ओर नितान्त अभाव है । फलतः श्रज्ञ परन्तु आज का युग बड़ा विचित्र है । दुर्भाग्य से देश में रहस्यवेत्ताओं का जारहा है 1 रहस्यवा जनी के द्वारा यशपद्धतियों की उपेक्षा कर मनमाने पथ का आश्रय चिरन्तन लिया सिद्धान्तों की अवहेलना कर अपने याज बालक्रीड़ा - मात्र का साधन बन रही है । ऋषियों के आज क्यों इस हीनदशा को प्राप्त पनिक जगत् को ही प्रधानता दी जा रही है । यशविद्या का आचार्य भारतवर्ष करने का गर्म रखने वाला सनातन-होरहा है? इस प्रश्न का यही समाधान है । आपद्धतियों का अनुसरण पीछे हट गया है । नहीं, तो धर्मी - जगत् केवल आडम्बरभक्त है । यज्ञ की मौलिकता से वह भी सर्वात्मना ' कर्मकाण्डी ' महोदय आज जैसे वे ही वेदमन्त्र, बही सामग्री, फिर यजमान का अभ्युदय क्यों नहीं? । अशुद्ध ) कण्ठ करलेने मात्र से दुद्द शाग्रस्त हैं, वैसे दूसरे नहीं | कुछ परिगणित मन्त्र ( सो भी नितान्त के लिए पर्याप्त ' कर्म ' की उपाधि मिल जाती है I योग्यता अपेक्षित है, वह आज जो यह एक वैज्ञानिक कम्मे है जिसके सचालन ' शिक्षित, किंवा अशिक्षित वेदपाठियों का कीड़ा ही बन रहा है । हीनदशा में मिलते , वहाँ यज्ञकर्ता फल इसका यह होरहा है कि, यज्ञ न करने वाले जहाँ सुम्बी देखे जाते हैं है, तो फिर सतत चम्मानुष्ठान हैं । यदि धम्मं का ' यनोऽभ्युनिः यमसिद्धिः स धर्म ' यही लक्षण की ओर अमर होते जारहे हैं? । के गीत गाते हुए भी सनातनधर्मी क्यों दिन प्रतिदिन अवनति के गर्त क्या आपने कभी इस प्रश्न का समाधान सोचा? । यह तो हुई अपने घर की बात । अत्र चलिए आर्य्यसामाजिक - जगत् की नहीं ओर होजाती । यह समाज । दैनिक बेट यज्ञों का परम भक्त है । साथ ही इसे यज्ञविद्या में भी पूर्ण विश्वास है । सीमा यहीं समाप्त फल की दृष्टि से इनका ( वनों ) के द्वारा यह अपने विश्वास को कार्य्यरूप में भी परिणत कर रहा ताम्रकुडी है । परन्तु में कल्पित पद्धतियों के भी सम्पूर्ण कलाप निरर्थक ही है अवैध पद्धतिविरुद्ध ) परिसमाप्ति कल्पित है । " महाशय कहाँ गए थे? । द्वारा मृत केसर कपूर आदि डाल देना हीं इनकी बज्ञविद्या की नहीं करते । अपितु इन अकाण्ड-अजी समाज मन्दिर में सम्मिलितहवन करने गया था " । हम आक्षेप में पड़कर अपने आप अपने सर्वनाश ताण्डवों को देखकर हमारा अन्तरात्मा क्षुब्ध है । हम इसी अभिनिवेश के स्थान में शास्त्रार्थ के लिए आह्वान का चीज वपन कर रहे हैं । यदि कुछ कहा जाता है, तो सद्विचार , पुलिस आफिसर, अथवा तो ओर कोई किया जाता है [ ] मध्यस्थ बनाए जाते हैं - वहीं के कोई मजिस्ट्रेट ६५.४

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द्वितीय अध्याय शतपथब्राहाण पचमत्राह्मण धनिक | यदि आप बुरा न माने, तो यह कह लेने दीजिए कि, आज आर्य्यसमाज सत्यसिद्धान्तों से बहुत दूर चला गया है । बात बहुत छोटी है, परन्तु है बड़ी मार्मिक | साथ ही हम यह भी समझते हैं कि, जहाँ ऋषिप्रणीत पद्धतियों का आदर नहीं, वहाँ हमारे इस कथन का कोई मूल्य भी न होगा । फिर भी कह देना हम अपना आवश्यक कर्त्तव्य समझते हैं । आय्यं जगत् में ' नमस्ते ' बोलने की प्रथा है । साथ ही सनातनधर्मी - जगत् में व्यवहृत होने वाले ‘ जयरामजी की ' ‘ जयगोपालजी की ' ' जैजैश्रीगोकुलेश ' ' प्रणाम ' ' नमस्कार ' ' जयमाताजी की ' इत्यादि वाक्यों की श्रवज्ञा की जाती है । आज हम समस्त आर्यजगत् को यह चेतावनी दे रहे हैं कि, परस्पर ' नमस्ते - महाशय! नमस्ते महाशय! " का उद्घोष करता हुआ वह प्रत्यवाय का ही भागी बन रहा है । ' नमस्ते ' शब्द वैदिक है, वैदिक ऋषियों के द्वारा प्रयुक्त है, ' नमस्ते रुद्र मन्यत्रे ' इत्यादि रूप से देवस्तुति-सम्वन्ध में ( संहिताभाग में भी ) ' नमस्ते ' पद पद पर प्रयुक्त है । यह सब कुछ ठीक ठीक होने पर भी लौकिक -- व्यवहारकाल में परस्पर ' नमस्ते ' ' नमस्ते ' बोलना स्वयं वेद के ब्राह्मणभाग के द्वारा ही सर्व निषिद्ध है । स्वाहा, स्वधा, बौपट्, श्रौषट् स्वगा, आदि शब्द अन्न के वाचक हैं | परन्तु विषयभेद से सत्र का व्यवहार व्यवस्थित है | देवताओं को अन्नाहुति ' स्वाहा ' शब्द से पितरों को ' स्वधा ' शब्द से, इन्द्र को ' प ' शब्द से देने का विधान है । इस शब्दभेव्यवहार में व्यतिक्रम नहीं किया जासकता । लोक में भी रसोई जीमिए, भोजन कीजिए, रोटी खालो, रोटी खाले, ये सच वाक्य समानार्थक हैं । परन्तु सभी के लिए उक्त सभी वाक्य प्रयुक्त नहीं होते । अपितु तत्तद्वाक्य तत्तद्व्यक्तिविशेष के लिए ही नियत हैं । ठीक वही स्थिति ' नमस्ते ' शब्द की है । यज्ञ करने वाला यजमान दीक्षित होता है । सब से पहिले उसे दीक्षणीयेष्टि करनी पड़ती है । यहीं से इसके लिए - " स वै सत्यमेत्र वदेत् " यह नियम अनुगत होता है । जनतक यजमान यज्ञकर्म्म में दीक्षित रहता है, तबतक वह शूद्रादि से भी भाषण नहीं कर सकता । ब्रह्मचर्य्य-व्रत - सत्यभाषण - अधः शयन- पयोभोजन आदि विशेष नियमों के पालन से ही इस के अन्तरात्मा में यज्ञ-जन्ति अतिशय का अन्तर्याम - सम्बन्ध होता है । दीक्षित के इह्रीं कतिपय नियमों का दिग्दर्शन कराती हुई ब्राह्मणश्रुति कहती है— " तन्न सर्व इवाभिप्रपद्य ेत - ब्राह्मणो वैव राजन्यो वा । ते हि यज्ञियाः । स न सर्वेणेव संवदेत । देवान्वाऽएष उपावर्त्तते यो दीक्षते । स देवतानामेको भवति । न चै देवा; सर्वेणेव संवदन्ते । ब्राह्मणेन चैव " राजन्येन वा वैश्येन वा । ते हि यज्ञियाः । तस्माद्यद्य ेनं शूद्र ेण संवादो विन्देत् एतेषां ( ऋत्विजां ) एकं ब्रूयात्- ' इममिति विचच्त्र, इममिति विचदवेति । एष उ तत्र दीक्षितस्योपचारः " । -- शत ० ३ का ० १११।६-१० के ० इति । ६.५५

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द्वितीयाध्याय प्रथमकाण्ड पचमत्राह्मण यज्ञसंस्था एक देवसंस्था है, प्रकृतिसंस्था है । इसमें लौकिक व्यवहारों का समावेश करना सर्वथा निषिद्ध है । यज्ञमण्डल में ऋत्विजों, और यजमानों में जो परस्पर अभिनन्दन व्यवहार है, वही ' नमस्ते ' शब्द से होता है । इसप्रकार ' नमस्ते ' शब्द यज्ञसंस्था के लिए ही नियत है । क्योंकि ' नमः ' यज्ञ का वाचक है । ' नमस्ते ' का अर्थ है, ' हम आपके यज्ञ ( यज्ञसाधक ) हैं । ' ऐसी अवस्था में यज्ञातिरिक्त सामान्य लौकिक व्यवहारों में ' नमस्ते ' बोलना मिथ्यादोष का ही भागी बनना है । सामान्य व्यवहार यज्ञ नहीं है | यज्ञ के अभाव में ' नमस्ते ' ( यज्ञस्ते ) ' बोलना मिथ्याव्यवहार है । अतः बज़मण्डल के अतिरिक्त कभी परस्पर के व्यवहार में ‘ ननो ' व्यवहार नहीं करना चाहिये । यही आदेश देती हुए श्रुति कहती है--" चतुद्दशैतानि यजूंषि भवन्ति । त्रयोदश मासाः संवत्सरः, प्रजापतिश्चतुर्दशः । प्रजापतिरग्निः । बाधाननिर्वावित्यस्य मात्रा - तावतैवैनमेतदन्न ेन प्रीणाति, नमो नम इति । यज्ञो नै नमः । यज्ञेनैवैनमेतन्नमस्कारेख नमस्यति । तस्मादुह नायज्ञियं ब्रूयात् - नमस्ते -इति । यथा हैनं याज्ञस्ते इति तादृक् तत् " । - श ० प्रा ० ६ - कां ० | १ | १ | १६ कं ० इति । F आज क्या हो रहा है । स्त्री शूद बाल युवा वृद्ध सभी अहर्निश ' नमस्ते ' बोलने में हीं अपना गौरव समझ रहे हैं । क्या आर्य्यजगत् का यह व्यवहार वैदिक है? । निवेदनीय केवल वही है कि, प्राणप्रधान वैदिक-विज्ञान के विलुप्तप्राय होजाने से, साथ ही भौतिक विज्ञानप्रधान पाश्चात्य विज्ञान के सहवास दूषण से हम आर्ष- आदेशों की उपेक्षा कर कल्पित यज्ञ के द्वारा, शास्त्रविरुद्ध सम्बोधनों के द्वारा अपना अनिष्ट ही कर रहे हैं । देवता को न बुलाना अच्छा है । किन्तु बुलाकर यथोक्त क्रम से उसका सत्कार न करना बुरा है । यही कारण है कि, यज्ञादि धर्मानुष्ठान न करने वाली जनता भौतिक सम्पत्ति की अपेक्षा आज के युग में समृद्ध प्रतीतमात्र हो रही है । परन्तु ठीक इसके विपरीत यज्ञादि धर्मानुष्ठानों का आडम्बर करने वाली नाममात्र की भारतीय धार्मिक - जनता सत्रप्रकार से त्रस्त हो रही हैं । फलतः उसके मुखसे इन उद्गारों का निकलना स्वाभा-बिक ही बन जाता है कि - " जो मज्ञादि नहीं करते, वे सुखी हैं । एवं करने वाले हम दुःखी हैं, ऐसी अवस्था में हम यज्ञादि क्यों करें? । ” प्रबल वेग से बढ़ती हुई इसी श्रद्धा को लक्ष्य में रखते हुए आज उसी आङ्गिरस बृहस्पति के दिव्यात्मा का वह आदेश अभिव्यक्त करने के लिए हम अपनी श्रद्धालु धार्मिक जनता के सम्मुख उपस्थित हुए हैं कि, वह भूल कर भी यज्ञ कम्र्मानुष्ठान पर श्रद्धा न करें । हम उसे विश्वास दिलाते हैं कि, यदि उसने आर्षपद्धतियों का यथावत् अनुमरण करते हुए यज्ञानुष्ठान किया, तो उसका यह अनुष्ठान अवश्य अवश्य अभ्युदय का ही कारण बनेगा, एवं इस वैध ( यथाविधि सम्पादित ) अनुष्ठान के बलपर वह समस्त राष्ट्रों में अपने लिए उच्चत्तम स्थान प्राप्त करने में समर्थ होगी, और अवश्य समर्थ होगी । प्रकृत बृहस्पति का आख्या-नाँश हमारे इसी कवन को पुष्ट कर रहा है । इसी लक्ष्य का स्पष्टीकरण कर रहा है || २०, २१, २२, २३, २४, २५, २६ ॥ ६५६

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द्वितीयाध्याय शतपथब्राह्मण इति-- वेदिसम्पादनम् प्रथमकाण्डान्तर्गत- द्वितीयाध्याय का पञ्चम, एवं द्वितीय प्रपाठ का तृतीय ब्राह्मण उपरत पचमत्राह्मण शतपथब्राह्मण का द्वितीय अध्याय समाप्त II ( इति - वेदिब्राह्मणाध्यायां द्वितीयः ) ६५७

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अथ शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्ये - तृतीयोऽध्यायः ( संस्कारब्राह्मणाध्यायः ) 3

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श्रीः अथ शतपथब्राह्मणे तृतीयोऽध्यायः ( संस्कार ब्राह्मणाध्यायस्तृतीयः ) ३ अथ प्रथमकाण्ड तृतीयाध्याये प्रथमं ब्राह्मणम् द्वितीयप्रपाठके च चतुर्थं ब्राह्मणम् १५ – द्रव्यसंस्काराः ( मूल ) सबै स्रुचः सम्मार्ष्टि । तद्यत् स्रुचः सम्मार्ष्टि - यथा वै देवानां चरणं, तद्वा अनु मनुष्याणाम् । तस्माद् यदा मनुष्याणां परिवेषणमुपक्लृप्तं भवति ॥ १ ॥

अथ पात्राणि निर्णेनिजति । तैर्निर्णिज्य परिवेविषति । एवं वा एप देवानां यज्ञो भत्रति - यच्छ्रतानि हवींषि, क्लृप्ता वेदिः तेषामेतान्येव पात्राणि -यत्तु चः ॥ २ ॥

स यत्सम्माष्टि - निर्णेनेत्येवैना एतत् निर्णिक्ताभिः प्रचराणीति । तद् द्वयेनैन देवेभ्यो निर्णेनिजनि, एकेन मनुष्येभ्यः । श्रद्भिश्च ब्रह्मणा च देवेभ्यः । श्रापो हि कुशाः,

ब्रह्म यजुः । एकेनैत्र मनुष्येभ्यः - अद्भिरेव । एवम्वेतन्नाना भवति ॥ ३ ॥

थस्रुवमादते । तं तपति - " प्रत्युष्टः रक्षः प्रत्युष्टा अरातयो निष्टप्तः रक्षो निष्टप्ता अरातयः - [ १ ० २६ मं ० ] इति वा ॥ ४ ॥

देवा ह वै यज्ञं तन्वानाः । तेऽसुरक्षसेभ्य श्रासङ्गाद् विभयाञ्चक्रः, तद्यज्ञमुखादेवै-तनाष्ट्रा रक्षांश्यतो ऽपहन्ति ॥ ५ ॥

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तृतीय अध्याय प्रथमब्राह्मण शतपथब्राह्मण सवा इत्यग्रैौरन्तरतः सम्माष्टि- " अनिशितोऽसि सपत्नक्षित् - [ १ अ ० २६ मं ० ] इति । यथानुपरतो यजमानस्य सपत्नान् क्षिणुयाद्, एवमेतदाह । " बाजिन-न्त्वा वाजेध्यायै सम्मामि " - [ अ ० १ मं ० २६ ] इति । यज्ञियन्त्वा यज्ञाय सम्मा-ज्मीत्येवैतदाह । एतेनैव सर्वाः स्रुचः सम्मार्ष्टि । वाजिनीन्त्वेति स्रुचम् | तूष्णीं प्राशित्र-हरणम् ॥ ६ ॥

स वा इत्यग्रैरन्तरतः सम्मार्ष्टि इति मूलैर्बाह्यतः । इतीव वा अयं प्राणः,

दानः । प्राणोदानावेवैतद्दधाति । तस्मादितीवेमानि लोमानि इतीवेमानि ॥ ७ ॥

इतीवो-स वैं सम्मृज्य - सम्मृज्य, प्रतप्य - प्रतप्य प्रयच्छति । यथावमर्श निणिज्यानव-मर्शमुत्तमं परिक्षालयेत् - एवं तत् । तस्मात् प्रतथ्य - प्रतप्य प्रयच्छति ॥ ८ ॥

सवै स्रुवमेवाग्रे सम्माष्टिं, अथेतराः स्रुचः । योपा वै स्रुग्, घृपा स्रुवः -तस्मात् यद्यपि बह्वय इव स्त्रियः सार्द्धं यन्ति य एव तास्वपि कुमारक इव पुमान् भवति स एव तत्र प्रथम एति, अनूच्य इतरीः । तस्मात् स्रवमेवाग्रे सम्मार्ष्टि, अतराः

स्र चः । ॥ ६ ॥

स वै तथैव सम्मृज्याद् - यथाग्निं नाभिच्युतेत् । यथा यस्मा अशनमा हरिष्यन्त्स्यात्, तं पात्रनिर्णेजनेनाभियुक्षैत्- एवं तत् । तस्मादु तथैव सम्मृज्याद् - बथाग्निं नाभिन्युक्षेत् । ग्राङियैवोत्क्रम्य ॥। १० ॥ तद्धके स्रुक्सम्मार्जनान्यग्नावभ्यादधति । वेदश्याहाभूवन् त्र च: । एभिः सममा-जिंषुः । इदं नैं किश्चिद् यज्ञस्य । नेदिदं बहिर्द्धा यज्ञाद् भवदिति । तदु तथा न कुर्यात् । यथा यस्मा अशनमाहरेत् तं पात्रनिर्णेजनं पाययेद् एवं तत् । तस्मादु परास्ये-देवैतानि ॥ ११ ॥

अथ पत्नीं सह्यति । जघनार्दो वा एप यज्ञस्य - यत्पत्नी । प्राङ मे यज्ञस्ताय -मानो यादिति । युनक्त येनामेतत् - युक्ता में यज्ञमन्त्रासाता इति ॥ १२ ॥

योक्त्रेण सन्नह्यति । बोक्त्रेण हि योग्यं युञ्जन्ति । अस्ति वै पत्त्या मेध्यं यदवा-चीनं नाभेः । अथैतदाज्यमवेक्षिष्यमाणा भवति । तदेवास्या एतद्योक्त्रेणान्तर्दधाति, थ

मेध्येनैवोत्तरार्द्ध नाज्यमवेक्षते । तस्मात् पत्नीं सन्नद्यति ॥ १३ ॥

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तृतीय अध्याय प्रथमत्र । द्वाण प्रथमकाण्ड स वा श्रभिवासः सन्नह्यति । श्रोषधयो वै वामः, बरुण्या रज्जुः । तदोषधीरे चैतदन्त-दधाति । तथो हैनामेषा वरुण्या रज्जुर्न हिनस्ति । तस्मादभित्रासः सन्नह्यति ॥ १४ ॥

स सन्नति - अदित्यै रास्नासि ( १ ० ३० मं ० ) इति । इयं वै पृथिवी -अदितिः, सेयं देवानां पत्नी । एषा वा एतस्य पनी भवति । तदस्या एतद्रास्नामेव करोति, न रज्जुम् । हिरो वै रास्ना, तामेवास्या एतत्करोति ॥ १५ ॥

स ' वै न ग्रन्थि कुर्यात् । वरुण्यो वै ग्रन्थिः । वरुणो ह पत्नीं गृह्णीयात् यद् ग्रन्थि कुर्यात् । तस्मान्न ग्रन्थि करोति ॥ १६ ॥

ऊद्धर्वमेवोदुगूहति विष्णोष्योऽसि [ १ ० ३० मं ० ] इति । सा वैन पश्चात् प्राची देवानां यज्ञमन्यासीत । इयं वै पृथिवी - अदितिः, सेयं देवानां पत्नी । सा पश्चात् ग्नाची देवानां यज्ञमन्यास्ते, तद्ध े मामभ्यारोहेत् । सा पत्नी क्षिप्रोऽमुळे लोकमि-यात् । तथो ह पत्नी ज्योग जीवति । तदस्या एवैतन्निह्नुते । तथो हैनामियं न हिनस्ति । तस्मादु दक्षिणतन्त्रासीत ॥ १७ ॥

अथाज्यमवेन्क्षते । योषा वै पत्नी, रेत आज्यम् । मिथुनमेवैतत् प्रजननं क्रियते ।

तस्मादाज्यमवेक्षते ॥ १८ ॥

सावेक्षते - अदब्धेन त्वा चक्षुषावपश्यामि ( १ ० ३० नं ० ) इति । अना-र्चेन त्वा चक्षुपात्रपश्यामीत्येवैतदाह । अग्नेजिंहासि [ १ अ ०३० मं ० ) इति । यदा वा एतद जुह्वति, थाग्नेर्जिह्वा इवोत्तिष्ठन्ति । तस्मादाह - अग्नेर्जिह्वासि - इति । सुहृदें-वेभ्यः [ १ अ ० ३० मं ० ) इति । साधु देवेभ्य इत्येवैतदाह । धाम्ने धाम्ने मे भव

यजुषे यजुषे [ १ अ ० ३० मं ० ] इति । सर्वस्मै मे यज्ञाधीत्येवैतदाह ॥ १६ ॥

अथाज्यमादाय प्राङ दाद्रवति । तदाहवनीयेऽधिश्रयति, यस्याहवनीये हवींषि श्रप-यन्ति - सर्वो मे यज्ञ आहवनीये भृतोऽसदिति । अथ यदमुत्राऽधिश्रयति, पत्नी ह्यवकाश-यिष्यन् भवति । न हि तदवकल्पते - यत्सामि प्रत्यग् हरेत् - पत्नीमवकाशयिष्यामीति । अथ यत्पत्नीं नावकाशयेत् — अन्तरियाद्ध यज्ञात्पत्नीम् । तथो ह यज्ञात्पत्नीं नान्तरेति । तस्मादु सार्द्धमेव विलाप्य प्रागुदाहरति - अवकाश्य पत्नीम् । यस्यो पत्नी न भवति, अग्र

एव तस्याहवनीयेऽधिश्रयति । तत्त आदते, तदन्तर्वेद्यासा ३ यति ॥ २० ॥

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तृतीय अध्याय प्रथमत्राह्मण शतपथब्राह्मण तदाहुः- नान्तर्वेद्या सादयेत तो मैं देवानां पत्नीः संयाजयन्ति, अवसभा अ * देवानां पत्नीः करोति परः पुंसा - उ - हास्य पत्नी भवतीति । तदु होवाच याज्ञवल्क्यः -यथादिष्ट ं पत्न्या ऋतु । कस्तदाद्रियेत - यत्परःपुरंसा वा पत्नी स्यात् । यथा वा यज्ञो

वेदिः, यज्ञ आज्यम्, यज्ञाबज्ञ निर्मिमा इति । तस्मादन्तर्वेद्य वासादयेत् ॥ २१ ॥

प्रोक्षणी पवित्रे भवतः । ते तत आदत्त, ताभ्यामाज्यमुत्पुनाति । एको वा उत्पत्र-नस्य बन्धुः- मेध्यमेतत्करोति ॥ २२ ॥

उत्पुनाति -सवितुम्वा प्रसब उत्पुनाम्यच्छिद्वेगा पवित्रेण सूर्यस्य रश्मि-भि: ( १ ० ३ १ मं ० ) इति । सोऽसावेत्र बन्धुः ॥ २३ ॥

अथाज्यलिप्ताभ्यां पवित्राभ्यां प्रोक्षणीरुत्पुनाति - सवितुर्बः प्रसव उत्पुनाम्यच्छि द्रेण पवित्रण सूर्यस्य रश्मिभिः ( १ ० ३१ मं ० ) इति । सोऽसावेव बन्धुः ॥ २४ ॥

तदाज्पलिप्ताभ्यां पवित्राभ्यां प्रोक्षणीरुत्पुनाति तदप्सु पयो दधाति । तदिदम-यो हितम् । इदं हि यदा वर्षति, प्रभोषधयो जायन्ते, ओषधीर्जग्ध्वापः पीत्वा तत एव रसः सम्भवति । तस्मादु रसस्यो चैव सर्वत्वाय ॥ २५ ॥

श्रथाज्यमवेक्षते । तद्ध के यजमानमवख्यापयन्ति । तदु होवाच याज्ञवल्क्यः— कथं नु न स्वयमध्वर्यवो भवन्ति, कथं स्वयं नान्वाहुः, यत्र भूयस्य इवाशिषः क्रियन्ते । कथ ं वेपम श्रद्धा भवतीति । यां कां च यज्ञो ऋत्विज आशिषमाशासते - यजमान-स्यैव सा । तस्मादध्वयु रेवावेक्षेत ॥ २६ ॥

सोऽवेक्षते । सत्यं वै चतुः । सत्यं हि नै चतस्तस्मात् - यदिदानीं द्वौ विवदमानावेयाताम् -'अहमदर्शम् ' - ' हम श्रपम् ' इति य एव ब्रूयात् ' अहमदर्शम् ' इति-तम्मा एव श्रध्याम | तत्सत्येनैनैतत्समर्द्धयति ॥ २७ ॥

सोऽवेक्षते तेजोऽपि शुक्रमस्यमृतमसि [ १ ० ३१ मं ० ] इति । स एष सत्य एव मन्त्रः । – तेजो ह्येतत् शुक्र ं ह्य ेतद्, अमृतं ह्येतत् तत्सत्येनगैतत्स-मर्द्धयति ॥ २८ ॥

इति प्रमकाण्डे तृतीयाध्याये प्रथमं ब्राह्मणम् द्वितीयप्रपाठके च चतुर्थं ब्राह्मणम् ६६.४