Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 701–710

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 701–710

पृष्ठ 701

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तृतीय अध्याय मूलानुवादप्रकरण-प्रथमब्राह्मण प्रथमकाण्ड वेदिसम्पादनकर्म्मा समाप्त होचुका है । हवनीयद्रव्य ( प्राहुतिद्रव्य ) सम्पन्न हो गया है । यज्ञ में जो पात्र अपेक्षित हैं, ' आग्नीध ' नाम के ऋत्विकने उन सब को अव के प्रपानुसार ( आज्ञानुसार ) यथास्थान रख दिया है । इसने काव्य समाप्त होजाने के अनन्तर क्या होता है?, ' संस्कार ब्राह्मण ' का श्रङ्गभूत प्रकृत ब्राह्मण इसी जिज्ञासा का समाधान कर कर रहा है | इस ब्राह्मण की ११ कण्डिका पर्य्यन्त एक कर्म्मसन्तान है । इस एकादशक डिकात्मक ब्राह्मणभाग में स्र ुव - स्रु क्रू- प्राशित्रहरण आदि के प्रतपनपूर्वक कुशाग्र से सम्माज्ज अनन्तर आग्नीध नाम के ऋत्विक् को ( यथास्थान रखने के लिए ) पुनरावर्त्तित करने का ( लौटाने ) का विधान है । यही क्रमशः सोपपत्तिक अनुवाद में स्पष्ट किया जाता है । ( प्रणीतापात्र के पश्चिम में उत्तराय ' स्फ्य ' रखने के अनन्तर ) यह ( अध्वर्यु ) स्रुचों का ' सम्मार्जन ' करता है | सो जिस ( प्रयोजन ) के लिए कि, स्रु कुसम्मान करता है, ( उस की उपपत्ति बतलाते हैं ) । जैसा देवताओं का चरण ( आचरण - व्यवहार ) है, उसी ( आचरण ) के अनुसार मनुष्यों का ( आचरण ) है । इसलिए जब मनुष्यों का परिवेषण ( परोसने का भोज्य--द्रव्य ) सम्पन्न होजाता है || १ || अनन्तर ( ही ) ( सेवकवर्ग ) पात्रों को ( भोज्यपात्रों को ) पानी से धोकर स्वच्छ-कर लेते हैं । स्वच्छ कर के उन पात्रों से ' परिवेषण ' करते हैं । ( जो स्थिति मनुष्यों में भोजन - प्रक्रिया में देखी जाती है, दूसरे शब्दों में- मनुष्यों के भोजनयज्ञ के सम्बन्ध में जो कार्य्य होते हैं ), ठीक ऐसा ही यह ( यजमानकृत ) देवताओं का यज्ञ है । ( अन्न के स्थान पर ) ' परिपक्व हवि ' है, ( भोजनस्थान की प्रतिकृति में ) ' वेदि ' सम्पन्न होचुकी है । ( एवं ) ये इन देवताओं के ( भोज्य ) पात्र हैं, जो कि ' कू ' हैं ॥ २ ॥

सो जो कि ( अध्वर्यु इन स्रुक् पात्रों का ) सम्मार्ज्जन करता है, वह इन पात्रों का निर्णेजन ( प्रक्षालन ) ही करता है । " हम निर्णिक्त ( धुले हुए साफ सुथंग् ) पात्रों से ही [ परिवेषणादि कार्य्य ] करूँ " यही [ सम्मार्ज्जन का ] मुख्य प्रयोजन है । [ देवता, एवं मनुष्यों के पात्र निर्णेजन में अन्तर केवल यही है कि ] देवताओं के लिए दो [ प्रकारों से ] निर्णेजन करते हैं, एवं मनुष्यों के लिए केवल एक ही प्रकार से [ निर्णेजन होता है ] । पानियों से [ एवं ] ब्रह्म [ मन्त्र ] से देवताओं के लिए [ निर्णेजन करते हैं ] [ निर्णेजन कर्म्म में उपयुक्त ] कुशा ' आप ': [ पानी की प्रतिकृति ] हैं, एवं यजुम्मन्त्र ' ब्रह्म ' है । मनुष्यों के लिए केवल पानियों से ही निर्णेजन होता है । इस [ प्रणाली ] भेद से मानुष, एवं दैवकर्म्म का पार्थक्य होजाता है । [ दोनों कर्म्म पृथक् होजाते हैं ] ॥ ६ ॥

[ गार्हपत्य के पश्चिमभाग में बैठकर अध्वर्यु सर्वप्रथम अपने दक्षिण हस्त में संस्कार के लिए ] स्रुव लेता है । उसे ( स्रुव को ) " प्रत्युषं रक्षा प्रत्युष्टा अरातय निष्प्रप्ता रक्षां निप्ता श्ररातयः " यह मन्त्र बोलता हुआ [ गार्हपत्याग्नि में ] तपाता है ॥ ४ ॥

६६५.

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द्वितीयश्रध्याय प्रथम ब्राह्मण शतपथब्राह्मण बज्ञका वितान करते हुए देवतागण असुर, एवं राक्षसों के आक्रमण से भयत्रस्त होपड़े । सो इस ( पात्रप्रतपनरूप ) व्यापार से यज्ञ के आरम्भ से ही नाष्ट्रा ( नाशक ) - राक्षसों को ( मन्त्र, एवं तपन से 1 ) इस यज्ञ मण्डल से ( ऋत्विक् गण ) मार भगाते हैं ॥ २५ ॥

वह अध्य- " अनिशितोऽसि सपलक्षित् - वाजिनं त्वा वाजेध्यायै सम्माज्मि " ( यजुः ( ११२६ ) यह मन्त्र बोलता हुआ सूत्र के चिलमध्य में कुशाग्र से मूल से आरम्भ कर मुखपर्यन्त ( स्रुब का ) सम्मान करता है । बिना विलम्ब किए एक साथ ही यह सूत्र यजमान के सपत्नों का नाश करदे, " अनिशितोऽसि सपत्नत्तित् " यह मन्त्रभाग, एवं ' इति ' शब्द से प्रकट किया हुआ सम्मान - व्यापार इसी भावको प्रकट करता है । " श्राप यज्ञिय हैं, यज्ञ के लिए आप का सम्माज्जं करता हूँ ” ' बाजिनंः ' इत्यादि मन्त्रभाग से यही कहा है । इसी उपयुक्त ( तपनमन्त्र, एवं सम्मान ) मन्त्रद्वयी से सब स्रुचों का ( जुहू - उपमृन - ध्रुवा आदि का ) सम्मान करता है । केवल प्राशित्रहरण का सम्मान तूष्णीं ( बिना मन्त्रप्रयोग के ) करता है ॥ ६ ॥

यह पहले बिल से मूल पर्य्यन्त सम्मार्ज्जन करता है, अनन्तर मूल से पृष्ठ-पर्यन्त सम्मान करता है । ऊपर से नीचे आना, यह प्रारण व्यापार है । नीचे से ऊपर जाना उदान का काम है । उक्त प्रकार से सम्मार्ज्जन करता हुआ अध्वर्यु खुब में प्राणोदान का ही धान करता है । इसी [ प्राणोदान के व्यतिक्रम व्यापार ] से रोमात्रलियाँ ऊपर से नीचे, एवं नीचे से ऊपर हैं । अर्थात् रोमावलियों का स्वरूप प्राणोदान की गति के ही अनुसार है || ७ || वह आनी अध्वर्यु के सम्मार्जन- व्यापार के अव्यवहितोत्तरकाल में ही यथाक्रम बादि पुनः गार्हपत्याग्नि में तपा तथा कर अध्वर्यु को सोंपता जाता है । जिसप्रकार लोक में ( मनुष्यों के दैनिक कम्मों में ) माँज माँज कर, एवं पानी से धो धोकर * अन्त में बिना माँजे हुए पात्र सम्पन्न होते हैं, एवमेव यह पुनः प्रतपन उस परिक्षालन के स्थान में हीं समझना चाहिए । इसलिए पुनः तथा तपा कर आग्नीध स्रुचादि अध्वर्यु को सौंपता हैं ॥ ८ ॥

वह अव पहिले खुब का सम्मार्ज्ज करता है । ( सम्मान के ) अनन्तर इतर ( गादि ) का सम्मान करता है । ( इस क्रम की उपपत्ति यह है कि ) स्रुक्योषा ( स्त्री ) रूप हैं, खुब वृपा ( पुरुष ) रूप है । ( इसलिए सम्मार्ज्जन में उक्त क्रम रक्खा जाता है ) । यद्यपि बहुत सी स्त्रियाँ साथ जातीं हैं, ( साथ जाने वालीं ) उन स्त्रियों में जो एक बालक भी * इस श्रुति से यह सिद्ध हो रहा है कि, भारतवर्ष में पात्रशुद्धि जल से ही होती थी । पहिले मृत्ति-कादि से पात्रों को माँजा जाता था, पीछे पानी से धोया जाता था । आज भी मरुभूमि को छोड़कर अन्यत्र यही पद्धमि मान्य है । मरुभूमि में पानी की कमी होने से ही माँज कर काम चला लिया जाता है । इसके साथ यहाँ यह विद्या भी चल पड़ी है कि, माँज ने के अनन्तर पानी से धोने से पात्र अपवित्र होजाते हैं । कहना न होगा कि, इस में कुछ भी सार नहीं है । ६६६

पृष्ठ 703

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तृतीययाय प्रथम ब्राह्मण प्रथमकाण्ड पुरुष होता है, तो वह सबके आगे आगे चलता है, शेष सत्र स्त्रियाँ उसके पीछे ही चलतीं हैं । इसलिए स्रुब का पहिले सम्माज्जैन करता है, एवं इतर ७ चों का पीछे सम्मार्जन करता है || ६ || ( उक्त बस चादि का ) उसी प्रकार सम्मार्ज न करे, जिससे ( प्रतपनकाल में ) गाईपत्याग्नि में तृण एवं पानी न गिरें । जिसप्रकार जिस व्यक्ति के लिए भोजनार्थ अन्न लागा जाता है, उसी व्यक्ति के ऊपर पात्रप्रक्षालित जल डाला जाय, वैसा यह कर्म होगा । अतः जिस -प्रकार अग्नि में पानी तृणादि न गिरें, उसीप्रकार प्राङ्मुख होकर ( बड़ी सावधानी से ) उठकर समार्जन कर्म्म करना चाहिए ॥ १० ॥

कितने हीं याज्ञिक सम्मान में उपयुक्त उदक तृणादि को अग्नि में हीं डालते हैं । ( एवं ऐसा करने का का ए वे गाज्ञिक वह बतलाते हैं कि ) यह वेदाय ( कुशाग्र ) वेद के ( यज्ञ के अबजन ) बन गए हैं । ( अपि इन के वेदात्मक यज्ञरूप होने से ही ) ऋत्विजोंने इनसे पात्रों का सम्मान किया है ( ऐसी ) अवस्था में ये वेदाय भी यज्ञ के ही कुछ भाग हैं । यह यज्ञप्रत्वंशरूप वेदाप्रभाव यज्ञ ( सीमा ) से बाहिर न रहे, ( अतः इसे अग्नि में हीं डाल देना चाहिए ) । ( बाज़बल्क्य कहते हैं कि ) ऐसा कभी नहीं करना चाहिए । ( यह कर्म ऐसा होगा कि ) जैसे जिस व्यक्ति के लिए भोजन दिया जाय, उसी को पात्रों का प्रज्ञालित जल पिलाया जाय । इसलिए इसे ( अग्नि में न डाल कर ) उत्करादि में ( मतान्तर से आहवनीय में ) हों फेंक देना चाहिए ॥११ ॥

- क् - सम्मार्जनानन्तर पत्नी - ( यजमानपत्नी ) - संनहन ( बन्धन, यज्ञ में योग ) करते हैं । यह यज्ञ का पश्चिम भाग है, जो कि यजमानपत्नी है । मेरा यज्ञ पूर्व की ओर वितत होता हुआ आगे चले, ( इभी अभिप्राय से पत्नीसंनहनकम्मे करने हैं ) । ( इस संनहन कर्म से ) पत्नी को ( बन्न में ) युक्त ही करते हैं । " यज्ञ में युक्त होकर यह पत्नी यज्ञसमाप्ति - पय्यन्त ( श में ) प्रतिष्ठित है " ( इसीलिए यह बन्धनकर्म किया जाता है ) ॥ १२ ॥

( इस पत्नी का ) योक्त्र ( मुञ्जमयी रज्जू ) से संनहन करते हैं । योक्त्र से ही ठीक ठीक योग बन्न ) करते हैं । पत्नी का नाभि से नीचे का भाग अमेध्य ( असंगमनीय, दिव्यसंस्कार-ग्रहण के अयोग्य ) है | ( एवं अभी कुछ काल में हीं ) यह पत्नी श्रागे जाकर घृतदर्शन करने वाली है । योक्त्रबन्धन से इस पत्नी के उस अमेध्यभाग को ही आवृत करते हैं । ( ऐसा करने से ) शेष मेध्य उत्तर भाग से ही प्राज्यदर्शन करती है । अतएव पत्नीसंनहनक करते हैं || १३ || वह ऋत्त्विक् वस्त्रों के ऊपर ही ( योक्त्र से ) संनहन करता है । वस्त्र श्रपधिरूप हैं । यह योक्त्ररूप रज्जु वरुणदेवतामयी है । वस्त्र के ऊपर योक्त्र से संनहन करता हुआ अ पत्नी को वारुण - बन्धन से ही अन्तर्हित ( बचाता ) करता है । ऐसा करने से यह वरुणदेव-६६७

पृष्ठ 704

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तृतीय अध्याय प्रथमब्राह्मण शतपथब्राह्मगा मयी रज्जु पत्नी को पीड़ा नहीं पहुँचाती । इसी प्रयोजन के लिए वस्त्रों से ऊपर योक्त्र का संन-हन करते हैं || १४ || ब्राह्मण ( विज्ञान ) बतला दिया गया, अत्र पद्धति बतलाते हैं । वह अध्वर्यु " अदित्यै रास्नासि " यह मन्त्र बालता हुआ संनह्नकर्म करता ( योक्त्र बाँधता ) है । यह पृथिवी ही अदिति है । वह ( अदितिरूपा पृथिवी ) देवताओं की पत्नी है सो इस ( सननकर्म्म ) से यज-मानपत्नीरूपा इस अदिति ( देवपत्नभूतादिति पृथिवी ) को ही रास्नायुक्त बनाते हैं । ( ध्यान रहै ) रज्जु का बन्धन नहीं करते हैं । यह रास्ना मेखलारूप है । संनहन के द्वारा इसे ( अदिति को ) मेखला से ही युक्त करते हैं ॥ १५ ॥

ऋत्विक् को चाहिए कि, वह योक्त्र के गाँठ न लगावें । क्योंकि ग्रन्थि ( गाँठ ) वरूणदेव-नामयी ऐसद ग्रन्थि लगाड़ी जायगी, तो वरुणदेवता इस पत्नी को अपने पाश से बाँध लेंगे । ( ऐसा न हो ) इसलिए ग्रनिबन्धन नहीं करते हैं ॥ १६ ॥

( ग्रन्थि नहीं लगाई जायगी, तो योक्त्र रुकेगा कैसे?, इस विप्रतिपत्ति को दूर करने का उपाय बतलाती हुई श्रुति कहती है कि वह अध्वर्यु योक्त्र के मूलायों को परस्पर मिलाकर दोनों मूलों को परम्पर वटकर ऊपर की ओर यों हीं लम्बित कर देता है । इस कर्म्मकाल में ' विष्णोर्वेप्योऽसि ' यह मन्त्र बोलता है । वह यजमानपत्नी गार्हपत्य के पश्चिम भाग में पूर्व की ओर मुख करके देवताओं के यज्ञ की ओर झुक कर न बैठे । यह पृथिवी अदिति है | यह देव-ताओं की पत्नी है । यह पश्चिम दिशा में देवताओं के यज्ञ को लक्ष्य बनाकर प्रतिष्ठित होरही है । ऐसी अवस्था में पश्चिमा दिकू में प्राङ्मुखा बैठती हुई यजमानपत्नी पृथिवी की गति के साथ युक्त होजायगी । परिणाम इसका यह होगा कि, वहां बैठने से शीघ्र ही ( एक वर्ष के भीतर ] यज-मानपत्नी मर जायगी । ऐसा न करने से पश्चिम की ओर प्राङ्मुखा होकर न बैठने से ] यज-मानपनी पूर्ण आयु प्राप्त करने में समर्थ होजाती है । सो इस पत्नी को पश्चिम में प्राङ्मुखा बनाकर न बैठाते हुए इसे पृथिवी की गति से बचाते हुए इसकी आयु ही सुरक्षित करते हैं । ऐसा करने से यजमानपत्नी पूरी आयु धारण करने में समर्थ होजाती है । इसलिए पत्नी को गाई-पत्य के दक्षिणभाग में [ नैऋतकोण में ] हीं बैठना चाहिए || १५ || अनन्तर वह पत्नी श्राज्यदर्शन करती है । अर्थात् घृत में अपना मुख देखती है । यह पत्नी योगा है, आज्य रेत है । ज्यदर्शन से रेत का ग्रहण करती हुई पत्नीरूपिणी योपा मिथुन-लक्षण प्रजनन - [ प्रजोत्पत्ति भाव को ही सम्पन्न करत है । इसी प्रजननभाव की प्राप्ति के लिए यह पत्नी आज्यदर्शन करती है ॥ १८ ॥

ब्राह्मण बतला दिया गया, अत्र पद्धति बतलाते हैं । वह पत्नी " त्याचक्षुषा पश्यामि अग्नजिह्वासि, सजूर्देवेभ्यः, धाम्ने धाने मं भव, वजुषं यजुषे " यह मन्त्र बोलती हुई आज्य देखती है | " मैं निद, प्र पीड़ारहित पवित्र चक्षु से ग्राज्य देखती हूँ " मन्त्र से पत्नी का यही कहना ६६८

पृष्ठ 705

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तृतीय अध्याय प्रथमत्राह्मण प्रथमकाण्ड है । ' अग्नेजि हासि ' यह मन्त्रशेष बोलती है । जिस समय आय की अग्नि में आहुति डालने हैं. उस समय अग्नि की [ ज्वालारूप जिह्वासी निकलती है । इसी अभिप्राय से ' अनजिह्वासि ' यह कहा गया है । ' सजूदेवेयः ' इत्यादि मन्त्रभाग का तात्पर्य बतलाते हुए कहते हैं - देवताओं के लिए यह प्रजननरूप । आज्यदर्शन शुभ हो । ' सजू: ' इत्यादि से यही कहा गया है । " धाम्ने घास्ने ' इत्यादि से " हे आज्य! आप मेरे सम्पूर्ण दशकामं के लिए तत्पर न यही कहा हैं || १६ || आज्यदर्शनानन्तर अध्वर्यु आज्य को लेकर पूर्व की और ( आहवनीय की ओर ) चलता है । आगे चलकर आत्रीयाग्नि पर ( तपाने के लिए ) उसे रख देता है, जिस के कि हवियों को आहवनीयाग्नि में पापक करते हैं । मेरा सम्पूर्ण यज्ञ ( यज्ञिय हचिद्रव्य ) आहवनीय में हीं परिपक्क हो, इसीलिए हविर्दव्यरूप श्राज्य को भी आहवनीयाग्नि में ह्रीं परिपक्क करते हैं । ( यहाँ एक पूर्वपक्ष होता है । वह यह है कि, जिस समय अन्य हर्विद्रव्यों का आहवनीय में परिपाक किया जाना है, क्यों नहीं उसी समय आज्य का भी परिपाक कर लिया जाता? । इस पूर्वपक्ष का समाधान कने के अभिप्राय से श्रुति कहती है कि ( पत्नी को यज्ञकर्म में युक्त होने का अवसर ( अत्रकाश ) हम आगे देलगे, इस विचार से यदि अध्वर्यु उसी समय पत्नीसंनहनकर्म से बहुत पहले ही, ' जब कि अन्य विद्रव्यों का परिपाक किया जाता है ] आज्य- परिपाक भी करलेता है तो " पत्नी की यज्ञ में प्रविए होने का अवसर दूंगा " यह विचार कर बीच में हीं [ पत्नी के यज्ञ में प्रविष्ट होने से पहले ही ] अधिश्रयणार्थ आज्य हरण करना ठीक नहीं होता । यदि पत्नी को यज्ञ में प्रविष्ट होने का अवसर देने से पहिले ही उक्त विचार से अध्य ' आज्य हरण कर लेगा, तो वह एक प्रकार से पत्नी को यज्ञसीमा से बहिर्भूत ही कर देगा । ऐसा न हो, इसलिए पत्नी के ज्यदर्शनरूप यज्ञसंयोग के अनन्तर ही आध्याधिश्रयण कर्म करते हैं ] ऐसा करने से वह पत्नी को यज्ञसीमा से बाहिर नहीं निकालता । [ इसी सार्द्ध भाव का स्पष्टीकरण करती हुई सर्वान्त में श्रुति कहती है । इसलिए [ पत्नी यज्ञसीमा में अन्तः प्रविष्ट होजाय, इसलिए ] पत्नीसंनहनकर्म के साथ ही आज्य को पहले गार्हपत्याग्नि में तपा कर पत्नी को आज्यदर्शन के द्वारा यज्ञ में प्रविष् कर अनन्तर अधिश्रयणार्थ आज्य को पूर्व की ओर आहवनीय की ओर ] ले जाते हैं । जिस यजमान के पत्नी नहीं होती, उस यजमान के यज्ञ में उसी समय [ जब कि अन्य हविर्द्रव्यों का आहवनीय में अधिश्रयण किया जाता है श्राज्य का भी आहतोय में अधिश्रण कर लेते हैं । अधिश्रयणानन्तर वहा से आज्य उठा कर उसे वेदि की सीमा में रख देते हैं ॥ २० ॥

कितने हीं आचार्यों का मत है कि, इस अधिश्रित आज्य को अन्तर्वेदि में नहीं रखना चाहिए | ( कारण इसका यह बतलाया जाता है कि ) इसी अधिश्रित ( परिपक्क ) आाज्य से देव-पत्नियों का यजन करते हैं ( वेदिस्थान पर सम्पूर्ण देवता आए हुए हैं ) । ऐसी अवस्था में उस प्रदेश में देवपत्नीयागसाधक श्राज्य को देवमण्डलीयुक्त वेदिस्थान में रखता हुआ अध्वर्यु देव-पत्नियों को जनसमूह में हीं उपस्थित करता है । ( यजमानपत्नी भी देवपत्नियों से युक्त रहती है । ६६६

पृष्ठ 706

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तृतीयश्रध्याय प्रथमब्राह्मण शतपथब्राह्मण ऐसी अवस्था में देवपत्नियों के साथ साथ यजमानपत्नी का भी देवसभामण्डपरूप वेदिस्थान में प्रवेश अनिवार्य होगा । ऐसा होने से ) यजमानपत्नी परः पुंसा ( अन्य पुरुषों के समूह में उपस्थित ) होजाती है । [ एक कुलीन स्त्री के लिए परपुरूषों के सम्सुल उपस्थित होना लज्जास्पद है । ऐसा नहीं होना चाहिए । अतः वेदिस्थान पर देवपत्नी - यागसाधनभूत आज्य नहीं रखना चाहिए ] । प्राचीनों के इस मत का खण्डन करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि, प्राज्य -- अधिश्रयण, उस का वेदिस्थान में स्थापन, आदि पत्नी सम्बन्धी सम्पूर्ण कर्म शास्त्र में इसी प्रकार विहित हैं । वह का वैसे ही हो, इसी में यज्ञसिद्धि है । " ऐसा होन से पत्नी पुरुवसमूह में आ जायगी, एवं यह अनुचित होगा " इस निरर्थक युक्ति का शास्त्रादेश के सम्मुख कोई महत्त्व नहीं है । कौन बुद्धिमान इस विषय को अच्छा एवं युक्तिसंगत कहेगा । वेदि, और आज्य दोनों हीं यज्ञसाधन होने से यज्ञरूप हैं । हम यज्ञ से यज्ञ का स्वरूप सपन्न करें, यही आदरणीय, एवं

यथादि [ शास्त्रसिद्ध ] पक्ष है । अतः वेदिस्थान में हीं आज्य रखना चाहिए ॥ २१ ॥

प्रोक्षणीपात्र में कुशा रक्खीं हुई हैं । वहाँ से हैं । प्रोक्षण का एकमात्र तात्पर्य है, वस्तु को मेध्य प्राज्य को मेध्य [ देवसङ्गमनीय ही करते हैं ॥ २२ ॥

कुशा ले र उनसे आज्य का प्रोक्षण करते सङ्गमनीय ] करना । इस प्रोक्षणकर्म्म से उत्पवनकरम की इतिकर्त्तव्यता बतलाती हुई श्रुति कहती है- वह अब ' सवितु स्त्वा प्रसव उत्पुनाच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः " यह मन्त्र बोलता हुआ श्राज्य का प्रोक्षण करता है ॥ २३ ॥

आज्यप्रोक्षरणानन्तर- " सवितुः प्रसवऽउत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रण पुष्यस्य रश्मिभिः ” यह मन्त्र बोलता हुआ अध्य ' [ प्रोक्षणकर्म से ] घृत से संश्लिषु बनी हुई पवित्रों से [ दर्भ से ] प्रोक्षणीपानी का प्रोक्षण करता है । इस प्रोक्षरण का तात्पर्य वही है, जो कि पूर्व के प्रातणकर्म में सोपपत्तिक बनलात्रा जाचुका है ॥ २४ ॥

मोजो कि अध्यलिप्त पवित्र से प्रोक्षणी का प्रोक्षण करता है, इस कर्म्म से पानी में पय [ दुग्ध ] का कार्य्यभूत, अतः पयोरूप आज्य ही प्रतित करता है । [ प्रकृति में यह पय पानी में हीं प्रतिष्ठित है । जैसे कि जब पानी बरसता है, तो ओपधियाँ उत्पन्न होती हैं ओ पधियाँ खा कर, पानी पीकर अनन्तर यह रस [ पय- आज्य ] उत्पन्न होता है । इस रस की पूर्णता के लिए ही प्रकृत प्रोक्षणकर्म करते हैं ॥ २५ ॥

I प्रोक्षणी - प्रोक्षणानन्तर अध्वर्यु ज्यदर्शन करता है कितने हीं आचार्य यजमान को ही घृतदर्शन करवाते हैं । ' अर्थात इनके मत से याज्यदर्शन यजमान का ही कर्म है ] इस पक्ष का निराकारण करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि, यजमान स्वयं हीं अध्वर्यु बनते हुए श्रध्ययवक्रम्म क्यों नहीं कर लेते? | यजमान ही ' होता ' बन कर क्यों नहीं अनुवाक्यादिरूप होकर कर लेते? | ६७०

पृष्ठ 707

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तृतीय अध्याय प्रथमत्राहाय प्रथम काण्ड फिर ऋत्विजों की आवश्यकता ही क्या है? | [ यदि अन्य आध्वर्थ्य, हौत्र, प्रौद्गात्रादि यज्ञस्त्र-रूप- समपक कम्मऋत्विक कर लेते हैं, तो फिर ] प्राचोनों को इस ग्राज्यदशनकम्म लोग में हीं अपने यह धारणा कैसे बन गई कि यह कर्म तो यजमान को ही करना चाहिए मिलता ? । ऋत्विक है । ऐसी अवस्था अपने कम्म में जो भी फल प्राप्त करते हैं, वह यजमान को ही तो श्रध्वग्यु में अध्वर्यु कर्तृक आज्यदर्शन का फल यजमान को कैसे नहीं मिलेगा? । अतः को हो आज्यदर्शन करना चाहिए ॥ २६ ॥

दो वह अध्वर्यु आज्यदर्शन करता है । चक्षुरिन्द्रिय सत्यरूप उनमें इसीलिए से एक है कहता कि है , जब कि— मनुष्य परस्पर झगड़ा करते हुए हमारे सम्मुख आते हैं, और कानों से सुना है, तो दोनों मैंने ऐसा आँखों से देखा है । दूसरा कहना है कि, मैनें ऐसा अपने, हम उसी के कथन पर में से जो व्यक्ति “ मैनें ऐसा अपनी आँखों से देखा है " यह कहता है दर्शन करता हुआ श्रद्धा करते है । ( अतः चक्षु अवश्य ही सत्य है ) । इस सत्यचतु से आज्य सत्यतत्त्व से ही आज्य को समृद्ध करता है ॥ २७ ॥

( आज्यावेक्षण की अपत्ति बतलाड़ी गई, अत्र पद्धति बतलाते हैं ) - वह डालता अध्वर्यु- है । " तेजोऽसि शुक्रमस्यसृतमसि " यह मन्त्र बोलता हुआ आज्य पर अपनी सत्यस्वरूप दृष्टि है । यह [ आज्य के यथार्थ स्वरूप का निरूपण करता हुआ प्रकृत मन्त्र अवश्य ही सत्य से आय तेजःस्वरूप है, यह आज्य शुकस्वरूप हैं, यह आज्य अमृस्वरूप है । इमी यह अध्वर्यु आज्य को समृद्ध करता है ॥ २८ ॥

इति - अनुवादप्रकरणम् प्रथमकाण्डानुगत तृतीय अध्याय का प्रथम ब्राह्मण एवं द्वितीय प्रपाठक का चतुर्थ ब्राह्मण उपरत सूत्रप्रदर्शित पद्धतिप्रकरण— --स्रुव - स्र ुक् ( जुहू - उपभृत् वा ), प्राशित्रहरण, पुरोडाशपात्री, इडापात्री का प्रतपन, एवं संमार्जन कर वेदि पर रखने के लिए आग्नीध को समर्पण - * --' वेदि ' निर्माणानन्तर इध्म बर्हि श्राज्य आदि का यथास्थान सन्निवेश कर दिया जाता है । तदनन्तरं प्राहुन्-" त्र वं प्रतव्य पूर्ववद्वे वाप्रेरन्तरतः प्राक् संमार्ष्टि " अनिशत " इति विपर्ययस्य वहिर्मूलैः ६७१

पृष्ठ 708

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तृतीयश्रध्याय प्रथमत्राह्मण शतपथ | ह्मण क्राय ” ( का ० श्र ० सू ० २ ६ ३६ ) इस श्री सिद्धान्त के अनुसार गाईपत्यकुण्ड के पश्चिम भाग में बैठकर अध्वर्यु ' पहिले गार्हपत्याग्नि में " प्रत्युषु रक्षः प्रत्युष्टा अरातयः । निष्ठुप्त रक्षो निप्ता अरातयः " ( यज्ञकर्म का अवरोध करने वाले राक्षस तथा दिए गए हैं, यज्ञसम्पत्ति का आगमन रोकने वाले राति तपा दिए गए हैं, एवं विशेषरूप से तथा दिए गए हैं ) यह मन्त्र बोलता हुआ शूर्प, एर्व अग्नीहोत्रहवणी की भाँति स्रुचको तपाता है । स्रुव के तपाने के अनन्तर उसी स्थान में बैठा बैठा ही अध्वर्यु ' थोड़ा सा पूर्व की ओर भुकता हुआ अपने बाएँ हाथ में तो प्रतप्त स्रुव ले लेता है, एवं दक्षिण हाथ में कुशाग्र लेकर-" अनिशितोऽसि सपत्नक्षित, वाजिनं त्वा वाजेध्यायै समाज्मि " ( हे सव! तुम ( शत्रु के लिए महा-निशित तीक्ष्ण होते हुए भी हमारे यजमान के लिए सवथा अनिशित ( शान्त ) हो । सपत्नों ( शत्रुओंों ) का नाश करने वाले हो, यज्ञमूर्तिरूप तुम्हारा ( स्रुव का ) यज्ञस्वरूपसिद्धि के लिए ही मैं ( अध्य ) सम्यक प्रकार से शोधन करता हूँ ) यह मन्त्र बोलता हुआ दक्षिणहस्त- गृहीत उन कुशाओं से के मूल से आरम्भ कर मुल पर्य्यन्त स्रव का सम्मार्जन करता है । मूल से मुख पर्यन्त कुशा से स्रव स्रव को स्वच्छ करदेना हीं ' सम्मार्ज्जन कर्म ' है । इसप्रकार एकबार तो वेदायों से सम्मा र्जन होता है । अनन्तर अव पुनः कुछ पूर्व की ओर भुकता हुआ वही उक्त । अनिशितोऽसीत्यादि ) मन्त्र बोलता हुआ स्रुव के पृष्ठभाग में मुखभाग से आरम्भ कर मूलभाग पर्यन्त कुशामूल से सुब का मम्मार्जन करता है । अध्वर्यु का पूर्व की ओर उत्क्रमा केवल उभयविव सम्मार्जनकर्म में ही होता है, प्रत-पन कर्म्म में उत्क्रमण नहीं होता । कारण – “ तस्मादु तथैत्र संमृज्याद्यथाऽग्नि नाभिव्युतेन प्राङियैयो-तक्रम्य " इत्यादि रूप से श्रति ने सम्मार्जनकर्म के साथ ही उत्क्रमण का सम्बन्ध माना है । स्रुवप्रतपन, और सम्मार्जन के अनन्तर जुहू - उपभृत - ध्रुवा इन स्रुचों का " अनिशिते " ति स्रुचः ” ( का ॰ श्री ० मृ ० २।६।४१ ) इत्यादि सूत्रानुसार ' प्रत्युष्ट ' रक्षः " इत्यादि से पहिले गार्हपत्य में प्रतपन, अनन्तर " अनि-शितोऽसि ० " इत्यादि पूर्वोक्क मन्त्र से सम्मार्जन करता है । स्र वस्त्रचों के सम्मार्ज्जनानन्तर- ' प्रतप्य प्रतप्य प्रयच्छति " ( का ० श्री ० सू ० २२६/४० के अनु-सार “ प्रत्युषु रक्षः " इत्यादि उक्त मन्त्र बोल कर खुवादि को पुनः गाईपत्याग्नि में तपा तपा कर ( वैदि पर रखने के लिए ) पुनः प्रतप्त सुवादि को आाग्नीध्र के हाथ में सबिता जाता है । स्रत्र - स्रच् ( जुहू-उपभृत - ध्रुवा ) इन चार के अतिरिक्त प्राशित्रहरण, श्रृतावृदान, पुरोडाशपात्री, इडापात्री, इनका प्रत-बन, एव सम्मार्ज्जुन ( चिना मन्त्र बोले तूष्णीं ही ) किया जाता है, जैसा कि - " तूष्णीं प्राशित्रहरणं, शृता-बदान ं , पात्रीं च ' ( का ० श्र ० सू ० २ | ६ | ४० ) इत्यादि सूत्र से स्पष्ट है । इसप्रकार ' पहिले प्रतपन, पुनः कुशाग्र - कुशामूल - भेद से नीचे से ऊपर पर्यन्त, एवं ऊपर से नीचे पर्यन्त सम्मार्ज्जन, पुनः प्रतपन, सर्वान्त में आग्नीध्र को ममर्पण -- ( वेदस्थान में रखने के लिए ), इस कम्र्मकपाल की समष्टि का नाम हीं “ पात्र-सम्माज्जन ' कर्म है । जिन बेदाय, एवं वेदमूलों से रक्त समार्जनकर्म किया जाता है, उहं-- " सम्मार्ज्जनान्यपास्यति ” ( का ० औ ० सू ० २/६/४३ ) के अनुसार उत्कर में फेंक देते हैं । यद्यपि " आहवनीये प्रासनमेके ” ( का ० श्र ० सू ० २/६/४४ ) के अनुसार बिही याचायों के मतानुसार सम्मार्जन - साधानभूत वेद को अह-यनीयाग्नि में प्रक्षिप्त करना उपलब्ध होता है । परन्तु तिने जो विप्रतिपत्ति गार्हपत्याग्नि में दर्भ डालने के III

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तृतीय अध्याय प्रथम ब्राह्मण प्रथमकाण्ड सम्बन्ध में बतलाई है, वही दोष ग्राहवनीयाग्नि में डालने से प्राप्त होता है । अतएव श्रुतिने " तदु तथा न कुर्य्यात् " इत्यादि रूप से स्पष्ट शब्दों में अग्नि में डालने का निषेध ही किया है । ऐसी अवस्था में प्रत्येक दशा में इन दर्भतृणों को उत्कर में हीं डालना चाहिए । इति द्रव्यमम्मार्ज्जनम् ( चा ० की १ कं ० से ११ कं ० पर्यन्त ) * त्रिवृत् मुञ्जम योक्त्र से यजमानपत्नी का सन्नहन-द्रव्यसम्मार्ज्जनानन्तर– “ पत्नीं सन्नह्यति प्रत्यगृत्तिगत उपविष्टां गार्हपत्यस्य मुञ्जयोक्त्रेण त्रिवृता परित्यधिवासो- “ दित्यै रास्ने " ति " । का ० श्र ० सू ० २७ | १ ) इस सूत्र - सिद्धान्तानुसार गार्हपत्या-ग्निकुण्ड के दक्षिणभागरूप नैऋतकोण में पूर्वाभिमुख बन कर बैठी हुई यजमानपत्नी को श्रध्व ' त्रिगु-णित मुञ्ज ( मूँज न'म से लोकभाषा में प्रसिद्ध ) से बने हुए योक्त्र ( रज्जु ) से ( पत्नी के वस्त्रों के ऊपर ) नाभि से नींच के कटि भाग में " अदित्यै रास्नासि " ( हे योक्त्ररूप रज्जु! तुम अदिति पृथिवी-रूपा यजमान पत्नी के लिए रास्ना -- मेखला --रूप हो ) यह मन्त्र बोलता हुआ बाँधता है । बोक्न्धनकाल में -- " दक्षिणपाशमुत्तरे प्रतिमुच्योर्ध्व मुद्गृति “ विष्णोर्वेभ्य " इति " ( का ० श्री ० सू ० २।४।२ ) के अनुसार योक्त्र के दक्षिप्रपाश को उत्तरात्र पाश में ऊपर में पिरोकर, नीचे बैंच कर पाश को द्विगुणित बेष्टित कर, उत्तरपाश में प्रोत होकर ऊपर की ओर निकले हुए दक्षिण पाशाग्रभाग को " विष्णोध्योऽसि ' ( हे दक्षिणपाशाय! आप यज्ञ का वेष्टन करने वाले हो ) यह मन्त्र बोलता हुआ गोक्त्र के मध्य में खचित कर देता है । ' न ग्रन्थि करोति " ( का ० श्री ० सू ० २ | ७ | ३ | ) के प्रादेशानुसार योक्त्र में गांठ नहीं लगाई जाती । इति - पत्नीमन्नहनकर्म ( ब्रा ० की १२ कं ० से १७ कं ० पर्यन्त ) मृत ठंढा करने के पश्चात् अध्वर्यु के द्वारा भेजी गई । यजमानपत्नी का समन्त्रक आज्य - दर्शन पत्नीसन्नहनकर्म्म के अनन्तर — " ऊर्जे त्वे " त्याज्यमुद्वास्य पत्नीमवेक्षय " त्यदब्धेनेति " ( का ० श्री ० सू ० २ | ७ | ४ ) इसके अनुसार अध्वर्यु – " ऊर्जे त्वा " हे श्राज्य! बलगढ़ रस की प्राप्ति के लिए तुझौं उद्यासित करता हूँ ) यह मन्त्र बोलता हुआ पहिले से ही गार्हपत्याग्नि पर बात्र में रक्खे हुए द्रुत घृत को अग्नि से उतार कर टेंढा करता है । अनन्तर “ पल्याज्यमवेक्षस्य " ( हे पत्नी! आज्य के दर्शन करो, अर्थात् इसमें अपना मुख देखो ) यह मैच करता हुआ पत्नी से " अदब्धेन त्याचक्षुचापश्यामि । ६७३

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तृतीयध्याय प्रथम त्राह्मण शतपथब्राहाण अग्नेर्जिह्वासि, सुहूर्देवेभ्यो, धाम्ने घाम्ने मे भव, यजुषे यजुषे " ( हे ग्राज्य! मैं निदुष्ट नेत्रों से तुह्मारा दर्शन कर रही हूँ । है ग्राज्य! तुम अग्नि की जिह्वा हो, अतएव [ जिह्नारूर होने से ही ] तुम देवताओं के अच्छे बुलाने वाले हो । ऐसे आप प्रत्येक कामं कर्म के लिए, मन्त्र मन्त्र के लिए सन्नद्ध बनेँ ] यह मन्त्र बुलवाता हुआ पत्नी से ग्राज्यदर्शन करवाता है । यदि पत्नी किसी आवश्यक प्रतिबन्ध के कारण यज्ञ में उपस्थित न हो, तो ऐसी अवस्था में अध्वर्यु को ही आज्यदर्शन कर लेना चाहिए, यह सूत्रकार का मत है । ब्राह्मणश्रति के अनुसार तो पत्नी के अभाव में ग्राज्य बिना देखे ही यथास्थान रख दिया जाता है । श्राज्या-वेगानन्तर — ' वेद्यां करे. त्यपरं प्रोक्षणीभ्यः ' का ० ० सू ० २२७/५ ] के अनुसार अव प्रोक्ष-गपात्र से पश्चिम भाग में बेटि पर आज्य रख देता है । यदि इस यजमान के यज्ञ में ग्राहवनीयाग्नि में हीं विद्रव्यों का परिपाक होता है, तो इस ग्राहवनीयाधिश्रयण- पक्ष में- “ आहवनीये वा कृत्वा तच्छू।पिणः ” [ का ० श्र ० सू ० २७६ ] के अनुसार पत्न्यवेक्षणानन्तर पहिले ग्राज्य को आहवनीय पर रक्खा जाता है, पुनः उद्वासित कर पूर्वकथनानुसार प्रोक्षणीपात्र के पश्चिम में बंदि पर रक्खा जाता है । इति याज्याक्षणकर्म ( ब्रा ० की १८ कं ० से २१ कं ० पर्यन्त ) श्राज्य और प्रोक्षणी का उत्पवन एवं अध्वयुकृत ज्यदर्शन आज्य रखने के अनन्तर वह अध्वर्यु " - " सवितुस्त्वे " त्याज्यमुत्पुनाति प्रोक्षणीश्च पूर्ववत [ का ० श्रौ ० सू ० २ | ७ | ७ ] इसके अनुसार प्रोक्षणी पानी में रक्खे हुए पवित्र [ दर्भ ] से " सवितुर्व = " " इत्यादि पूर्वोत्त मन्त्र बोलता हुआ पहिले अन्य का मोक्षा करता है, अनन्तर ग्राज्य - सम्बन्ध से ग्राज्य -युक्त III हुए ह्रीं पवित्रों से वही मन्त्र बोलता हुआ । प्रोक्षणीरानी का प्रोक्षण करता है । इसप्रकार ग्राज्य, एवं प्रोक्षणी – उत्पवनानन्तर - ' आज्यमवेक्षते " तेजोसी " ति यजमानो वा " बा ० श्री ० सू ० २७८ के अनुसार वह अध्वर्यु ', अथवा यजमान [ दोनों में से कोई भी । " तेजोऽसि शुक्रमस्यमृतमसि ' [ हे श्राज्य! आप तेजोमय हैं, शुक्ररूप हैं, अमृतभावापत्र हैं ] यह मन्त्र बोलता हुआ ग्राज्यदर्शन करता है । सूत्रकार ने पक्षान्तर का आदर करते हुए " यजमानो बा " भी कह दिया है । वस्तुतः शतपथब्राह्मण के मता-नुसार यह आज्यावेक्षकर्म अध्वर्यु को ही करना चाहिए । इति श्राज्यावेज़म ( ब्रा ० की २२ कं ० से २८ कं ० पर्यन्त ) ब्राह्मणोक्त कम्र्म्मसंग्रह -१- द्रव्यसंस्कार २ पत्नीसन्नहन