Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 711–720

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 711–720

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तृतीय अध्याय ३ – पत्नीकृत ज्यावेक्षण ४ - आज्य स्थापन प्रथमब्राह्मण प्रथमकाण्ड ५ - श्राज्य एवं प्रोक्षणी का पत्रित्रों से उत्पवन ६ -- अध्यय् कृत आज्यावेक्षण इति - पद्धतिप्रकरणम् उपपत्तिप्रकरणम्-१ - द्रव्यसंस्कारोपपत्तिः ( भाग्य ) - स्व- जुहू - उपभृन - ध्रुवा पुरोडाशपात्री - ड्डापत्री आदि यज्ञियपात्र प्राणदेवताओं के आहुति-साधक बनते हुए इनके [ देवताओं के ] भोजन करने के पात्र हैं । लोकव्यवहार में जिन पात्रों में मनुष्य भोजन करते हैं, भोजन परिवेषण [ परोसने ] से पहिले पात्रों को पानी से धोकर स्वच्छ कर लिया जाता है, अनन्तर इन पात्रों में भोजन परोसा जाता है । भोजनपरिवेषण से पहिले पात्रशुद्धि सर्वथा अपेक्षित है, नही कहना है । इसी शुद्धिभाव के लिए प्रकृतयज्ञ में देवताओं के भोजनसाधन - पात्रों का संस्कार करना आवश्यक हो जाता है । देवता सौर मण्डल की वस्तु है । इधर साधारण पानी पार्थिय है । इस लौकिक पे पानी से देवपात्रों का सम्मार्ज्जन करना ठीक नहीं । जिस कार लौकिक मनुष्य, और प्राणदेवताओं के स्वरूप में भेद है, जैसे इनके भोजनपात्रों के स्वरूप में विभिन्नता है, तथैव सम्मार्जनीय - पानी में भी भेद होना आवश्यक है । इसी पृथककरण के लिए पानी के स्थान में यहाँ ' कुशा ' का ग्रहण किया जाता है । सौररश्मिमण्डल में प्रविष्टारमेष्ठ्य ' श्रम्भः ' नाम का पवित्र पानी ही ' वेन ' कहलाता है । इसी ज्योतिर्मय ' वेनपानी ' से कुशा का निर्माण होता है, जैसा कि पूर्व के दर्भोत्पत्तिप्रकरण में विस्तार से बतलाया जाचुका है । दर्भ साक्षान दिव्य पानी है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर श्रुति ने - " आपो वै कुशा " यह कहा है । साथ ही जहाँ मनुष्योपयोगी पात्रों का सम्मार्ज्जन तूष्णीं किया जाता है, वहाँ प्रकृत यज्ञिय पात्रों का सम्मार्जन " अनि-शितोऽसि " इत्यादि मन्त्र से किया जाता है । इसप्रकार कुशारूप दिव्यपानी, एवं दिव्यमन्त्र-बल, इन दोनों से सम्मान होने से दिव्यकर्म का मनुष्यकर्म से सर्वथा पृथककरण होजाता है । ॥१-२ ॥ * मरुभूमि में, विशेषतः राजपूताने में पानी की कमी के कारण मृत्तिका रक्षा - [ राखड़ ] आदि से ही पात्र पवित्र मान लिए जाते हैं । इस पद्धति की इतनी प्रधानता होगई है, कि यदि मज्जन [ माँजने ] के अनन्तर पात्र घोलिए जाते हैं, तो वे सर्वथा अपवित्र मान लिए जाते हैं । उक्त श्रुति के आधार पर हम कई सकते हैं कि, यदि पानी पर्याप्त मात्रा में मिले, तो मज्जन के अनन्तर पात्रों को अवश्य सी घोडालना चाहिए | बिना पानी से धोए पात्रशुद्धि नहीं होती । यदि पानी ही न मिले, तो प्रचलित पद्धति का अनुसरणा करना चाहिए, जैसा कि पूर्व टिप्पणी में भी स्पष्ट किया जाचुका है । ६७५

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तृतीय अध्याय प्रथम ब्राह्मण शतपथब्राह्मण सम्माज्जैन से पहिले पात्रों को तपाया जाता है । अन्तरिक्ष में बहने वाले वारुण वायु में आसुर प्रारण व्याप्त रहता है । यह वारुण असुर ऐन्द्रयश का विरोधी है जहां दिव्यपाण का सञ्चार होता है, नहीं स पैर के सम्बन्ध से वह इस दिव्य दिव्य में युक्त पात्रादि वस्तुओं में आक्रमण करने लगता है । इधर अग्नि, और मन्त्रवल, दोनों हीं सुरप्राण के विघातक हैं । पात्रों में वायु के द्वारा आगत प्राण-रूप, अतएव चम्मच से अदृश्य इन अमुरी का यशोपक्रम में ही नाश करने के लिए मन्त्रयल - युक्त प्रतपनक किया जाता है । अग्निपरिताप से अवश्य ही अट दोष एवं सूक्ष्म कीटाणु नष्ट होजाते हैं, यह प्रत्यक्ष सिद्ध है ॥४-५ ॥ आरम्भ में बतलाया जाचुका है कि, यह सम्मान अधिक है । यज्ञ में ऐसा कोई भी कर्म नहीं, जो निरर्थक हो, एवं जिस का प्राकृतिक स्थिति के साथ सम्बन्ध न हो । यह से वैसा अलोकिक नवीन देवात्मा उत्पन्न किया जाता है, जैसा कि पूर्वप्रकरणों में अनेक चार कहा जाचुका है । इस दिव्यात्मा का स्वरूप - निर्माण जिन जिन तत्वों से होता है, यशकर्त्ताओं को उन उन तत्वों की प्रत्येक कम्मे में माचना करनी पड़ती है । प्रकृत सम्मार्ज्जन कर्म भी उस भावना से रिक्त नहीं है । एक बार सम्मार्ज्जन स्रुव के मूल से ऊपर तक होता है, दुबारा पृष्ठभाग में ऊपर से नीचे की ओर होता है । इसी उधोग का अलि से निर्देश करते हुए- “ इति - अप्रैरन्तरतः ’ " " इति - अरन्तरतः " यह अभिनव किया गया है । ' आगमन ' प्राणव्यापार है, एवं ' गमन ' उदान ( जपान ) व्यापार है । शतपथ में ' उदान ' शब्द से सर्वत्र ' अमान ' ही अभिप्रेत है । प्राण आगतिधर्म्मा है । सम्मान में प्रागति गतिभावों का समावेश करता हुआ अध्वर्यु ' भावना के द्वारा खूब में जाणोन ( श्रणाशन ) का ही आधान करता है । इसी सूत्र से देवयजन होने वाला है, आहुति से दिव्यात्मा का जन्म होने वाला है । ऐसी परिस्थिति में सुव सम्बन्धी प्राणीदान आहुति में प्रविष्ट होता हुआ दिव्याख्या के प्रायोदानोत्पत्ति का ही कारणा मन जाता है । इसी रहस्य को लक्ष्य में एक्चर " प्राणोदान | वेवैतदधाति " यह कहा गया है । ध्यान रहे स्थित प्राणदान से ही दिव्यात्मा के शरीर के रोमों का निर्माण होने कला है । रोमावली में प्राणोदानवत् ( एक इधर झुका हुआ, एक उधर झुका हुआ, यह ) परिस्थिति रहती है । दूसरे शब्दों में- रोम का स्वरूप ठीक प्रागोदानव्यापार की प्रतिकृति ( नकल ) है । प्राकृतिक यज्ञ से उत्पन्न रोम प्राणोशनयुक्त हैं । इधर मदत आहुति द्रव्य ही दिव्यात्मा के रोमयुक्त शरीर का उपादान बनने वाला है । अत: " पुरुषो वै यज्ञः " इस सिद्धान्त के अनुसार यहाँ सम्मार्जनक की विशेषप्रक्रिया में प्राणो-दान का समावेश करना परम आवश्यक है इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर " तस्मादितीवेमानि लोमानि इतीवेमानि " यह कहा गया है । विसप्रकार प्राणदानरूपा ( प्राणापानमयी ) सौररश्मियाँ देवप्राण के लिए उपादेय एवं शान्त रहती हुई तमोमय श्रमुराण के विनाश का कारण बनी रहती हैं, तथैव प्राणोदानयुक्त खुब वहाँ यशकतां यजमान * यदि किसी पात्र में रजस्वला स्त्री प्रमादवश भोजन कर लेती है, तो वह पात्र शुद्ध होजाता है । इसीप्रकार पङ्क - मल - मूत्रादि निकृष्ट पदार्थों के सम्बन्ध से भी असुरभाव से युक्त बनते हुए पात्र अपवित्र होना ते है । ऐसे अपवित्र पानी को आज भी राजपूताने के लोग अग्नि में तपा कर तदनन्तर हीं उई व्यवहार में लाते । हैं । इनके इस व्यवहार का मूल उक्त औत ' प्रतपनक ' ही है । ६७६

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तृतीय अध्याय प्रथमब्राह्मण प्रथमकाण्ड के लिए अनिशित ( शान्त - उपकारक - यज्ञस्वरूपसाधक ) है, वहाँ यजमान के शत्रुओं के लिए वही विनाश का कारण है । स्रुव की इसी स्वाभाविकी शक्ति का निरूपण करते हुए - “ अनि शितोऽसि सपत्नक्षित् " यह कहा गया है । राजा - वाज- हवि -ग्रह - भेद से आहुतिद्रव्यरूप सोम की चार जातियाँ होतीं हैं । प्रकृत यज्ञ ( इष्टि ) मेंद्र है, वह वाजात्मक ( अन्न सोमात्मक ) है । अन्नरसरूप यही ' बाज ' यशसाधक बनता हुग्रा यज्ञ-रूप है । यज्ञरूप इस बाज की यज्ञता खुब पर ही अवलिम्बत है । अत: हम इस स्रुव को अवश्य ही ' बाज ( यज्ञस्वरूपसमर्पक ) कह्सकते हैं । यह ' बाजरूप स्रुव ' ' वाजरूप ( अन्नरूप ) यज्ञ ' का दो प्रकार से समिन्धन ( प्रज्ज्वलन ) करता है । अग्नि में आहुत करना पहिला समिन्धन है, एवं स्वगत प्राणोदान को भूतमय वाज ( पुरोडाश ) में समाविष्ट करना दूसरा समिन्धन है । स्रुव के इसी स्वरूपधर्म्म को लक्ष्य में रख कर " वाजिनं त्वा वाजेध्यायै संमाज्मि " यह कहा गया है । प्राशित्रहरणपात्री, एवं इडापात्री का प्राण-देवताओं से विशेष सम्बन्ध नहीं है । अतः इनका सम्माज्जैन तूष्णीं ( मन्त्रक ) ही होता है || ६,७ || पहिले अस्रुव - चादि पात्रों को तपाता है, एवं पुनः सम्मान करता है । सम्मार्जनानन्तर आग्नीध्र पुनः एक बार गार्हपत्याग्नि में पात्रों को तपाता है । श्राग्नीप्रकृत प्रतपन में वैज्ञानिक उपपत्ति कुछ भी नहीं है । केवल लौकिक व्यवहार की समतादृष्टि से ही यह पुनः प्रतपनक किया जाता है । हम देखते हैं कि, लोक में कांस्य - वित्तलादि ( काँसी - पीतल आदि ) के पात्रों का पहिले अवमर्शन ( खूब रगड़ कर धोया जाता ) किया जाता है । इस क्रिया से जत्र पात्र सर्वथा स्वच्छ होजाते हैं, तो सर्वान्त में बिना अत्रमर्शन के ( बिना घर्षण के ) केवल पानी में डुबोकर पात्र पृथक् पृथक् रखदिए जाते हैं - ' यथामर्श निर्णिज्य --अन- -वर्शमुत्तमं परिक्षालयेत् ' । ठीक वही स्थिति यहाँ है । दर्भ से सम्मान करना - अवमर्श ( घर्षण ) पूर्वक पात्रों का निर्णेजन करना है । एवं पुनः अग्नि में तपाना अनवशपूर्वक पानी से प्रक्षालन करने के स्थान में है || ८ || स्र ब - जुहू - उपभृत - ध्रुवा आदि पात्रों में से पहिले खुव का सम्मार्जन होता है, अनन्तर खु चों का सम्मार्ज्जन किया जाता है । ' स्रुव ' शब्द पुंस्त्वभावापन्न होता हुआ ' वृषा ' है, एवं ' स्रु कू ' शब्द स्त्रीत्त्व से युक्त होता हुआ ' योषा ' है | पुरुष के शुक्र में रहने वाला, रेतः सेक का अधिष्ठाता ' पुम्भ्र ग ' ' वृपा ' कहलाता है, एवं स्त्री के शोणित में रहने वाला रेतोग्राहक ' स्त्रीभ्रूण ' ' योषा ' नाम से प्रसिद्ध है । वृपा आग्नेय है, एवं योषा सौम्य है । दोनों में वृषा का ही प्राथम्य है । वैधयज्ञ में हीं देखिए । वृषारूप अग्नि स्वस्थान में पहिले से प्रतिष्ठित रहता है । अनन्तर इसमें योषारूप सोम ( श्राहुतिद्रव्य ) की आहुति होती है । अग्निरूप वृषा प्रथमज है । भूतज्योतिर्मय विश्व में स्वायम्भुव - ब्रह्माग्नि के रूप में सर्वप्रथम ' अग्नि ' का ही विकास होता है, “ सर्वस्याश्रममृज्यत ' इस निर्वचन से ही इसे ' अग्रि ' कहा जाता है । यह अग्रि ही देवताओं की परोक्षभाषा में ' अग्नि ' नाम से प्रसिद्ध है - ( देखिए शत ० ब्रा ० ६।१।१।११ ) । . अपिच अग्नि अन्नाद है, भोक्ता है । सोभ अन्न है, भोग्य है । दोनों में ' भोक्ता ' प्रधान है, ' भोग्य ' गौण है | साथ ही यह भी सिद्ध विषय है कि, एक भोक्ता के लिए अनेक भोग्य पदार्थ रहते हैं । इसी 50

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तृतीय अध्याय प्रथमब्राह्मण शतपथब्राह्मण भोक्ता अग्नि से पुरुष का आत्मा सम्पन्न होता है, एवं भोग्य सोम से स्त्री की स्वरूप- निप्पत्ति होती है । अग्निप्रधान पुरुष सर है, एवं सोमप्रधाना स्त्री पश्चादनुयायिनी है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि, जत्र किमी उत्सवादि में १० - २० स्त्रियाँ सम्मिलित होकर जाती हैं, उनके साथ में यदि कोई बालक { ५–७ वर्ष का लड़का ) होता है, तो वह स्त्रियों के झुण्ड के आगे आगे चलता है । यदि वह क्रीड़ाश पीछे भी रहजाता है, तो स्त्रियाँ चलात् उसे अपने आगे कर लेती हैं । कारण नही प्राकृतिक नियम है । प्रकृति चाहती है कि, अग्निमय पुरुष अग्रगामी रहे, एवं सौम्य स्त्रियाँ इनके अनुगत ही बनीं रहें । यही परिस्थिति यहाँ समझिए । सुत्र एक पुरुष है, अनेक स्रक् स्त्रियाँ हैं । उक्त प्राकृतिक नियम के अनुसार कृपा बोबा के नित्यसिद्ध पूर्वापर्य को लक्ष्य में रख कर वृषास्थानीय स्रुव का सम्मार्जन पहिले, एवं योपास्थानीय स्टुक का सम्मार्जन पीछे ही करना प्राकृतिक नित्ययज्ञ की समृद्धि का कारण बनता है । इसी वृपा -- योषात्मक यज्ञरहम्य को लक्ष्य में रख कर - " स वै सुत्रमेवाग्रे सम्मार्ष्टि अथेतराः स्रुचः: " इत्यादि कहा गया है ॥ ६ ॥

गार्हपत्य के पश्चिम भाग में बैठ कर अध्वर्यु उक्त पात्रसम्मार्ज्जन कर्म्म करता है । सम्मार्ज्जन करते समय अध्वर्यु को इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कि, कहीं सम्मार्ज्जन - साधकभूत कुश --तृण गार्हपत्याग्नि में न गिर जायँ । कारण इसका यह ही है कि, यह दर्शतृण पात्रीनिजन ( पात्रों के स्वच्छ करने का पानी ] है । उधर गापयाग्नि में पार्थिव प्राणाग्निदेवता विराजमान हैं । उक्त तृणादि का इस देवमूर्ति अग्नि में गिर जाना जैसा होगा, जैसे भोजनार्थ ग्रागत किसी अतिथि का भोजनपात्रों के शुद्ध करने के उपयोग में आए हुए मलिन अशुद्ध पानी से सिञ्चन करना | अतः बड़ी सावधानी से प्राङमुख रह कर अग्नि से कुछ हट --कर ही सम्भार्ज्जुनकर्म करना चाहिए ॥ १० ॥

तैत्तिरीय -- सम्प्रदाय का मत है कि - ' यज्ञ में उपयुक्त होने वाली वेदराशि [ कुशमुष्टि ] यज्ञरूप है | कुश को ' वेद ' नाम से व्यवहृत करने का कारण यही है कि, पूर्वकथनानुसार यह दर्भ सौर वेनपानी से उत्पन्नहुए हैं । इधर महोक्थ- महाव्रत एवं पुरुष की समष्टिरूप यज्ञप्रवर्त्त के सूत्यं " मैषा त्रय्येव विद्या तपति ” [ शत ० १० | ५ | २ | २ ] के अनुसार गायत्रीमात्रिक वेदमय है । वेदमय सौर पानी से [ वेदावच्छिन्न सौर प्राण से ] दर्भ उत्पन्न हुए हैं, अतः इहें अवश्य ही ' बेद ' नाम से व्यवहृत किया जासकता है । इधर सम्माज्जैनकर्म में उपयुक्त होने वाले दर्भतृण वेद- कुशमुष्टिरूप यज्ञ के अवयव होने से यज्ञरूप ही हैं । उत्कर में वह वस्तु फेंकी जाती है, जिसका यज्ञ से कोई सम्बन्ध नहीं रहता । ऐमी अवस्था में यज्ञरूप किंवा बज़ांशरूप इन दर्भतृणों को उत्कर में डालना इस यज्ञियद्रव्य को बज़मीमा से बाहिर डालना होगा, और ऐसा करना यज्ञमर्य्यादा से विरुद्ध होगा । अतः [ यज्ञांशरूप दर्भतृयों को ] यज्ञसीमा में रखने के लिए इन्हें ग्राहवनीय अग्नि में ही डालदेना चाहिए । गार्हपत्याग्नि में इनका प्रक्षेप नहीं किया गया, इसलिए तो " यथा यस्माऽअशनमाहरिष्यन्त्स्यान, तं पात्रनिर्णेजनेनाभियुक्षेत् " यह पूर्वोक्त दोष नहीं रहा. एवं आह-वनी में इसका प्रातन [ प्रक्षेप ] होगया, इसलिए यह यज्ञाङ्गभूत यज्ञिय द्रव्य यज्ञसीमा से बहिर्भूत नहीं हुआ । ६७८

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तृतीय अध्याय प्रथमत्राह्मगा प्रथमकाण्ड सूत्रकारने " आहवनीये प्रासनमे के " इत्यादि रूप से इसी पक्ष का उल्लेख किया है । जैसे पृथिवी -स्थानीय गार्हपत्याग्नि में पार्थिव प्राणाग्निदेवता प्रतिष्ठि रहते हैं, तथैव स्थानीय आहवनीयाग्नि में सौर-प्राणाग्निदेवता प्रतिष्टित रहते हैं । एवं ये ही प्रधान अतिथि हैं । गार्हपत्य देवता घरके हैं, एवं सौर देवता प्राशिक ( पाहुने ) हैं । इह्रीं के यजन से तो दिव्यात्मा का स्वरूप सम्पन्न करना है । अतः जो दोष गार्हपत्य में प्रक्षेप का था, उस से भी कहीं अधिक दोष आहवनीय में प्रासन का है । आहवनीयस्थ ग्रागत प्रतिश्विरूप सौर देवता हविद्रव्य की प्रतीक्षा में बैठे हैं । आप सम्मार्ज्जन - साधनभूत दर्भतृणों की आहुति देते हुए उहें पात्र का प्रक्षालित जल पिला रहे हैं । क्या ऐसा करना उचित होगा?, कभी नहीं । रही यज्ञांशभूत दर्भ - तृणों की यज्ञसीमा से बाहिर निकलने की बात । सो इस के लिए स्वतन्त्र समाधान करने की कोई आवश्यकता नहीं है । जोन्वस्तु देवताओं के उपयोग में आती है, वही यज्ञिय मानी जाती है । नहीं, तो प्राप्त हविद्रव्य के ' तुम ' को क्यों उत्कर में डाला जाता है? । हविःसम्पादन के लिए शकट से धान लिया जाता है । उलूखल में मुसलके द्वारा उनके तुत्रों को पृथक किया जाता है । तुत्रों को उत्कर में हीं डाला जाता है । क्योंकि इन का आहुति से सम्बन्ध नहीं है, अतएव इहें ' यज्ञिय ' नहीं माना जासकता । यही परिस्थिति इन दर्भतृणों की है । पात्र स्वच्छ करने के पश्चात् इन का यज्ञ में कोई उपयोग नहीं रहजाता । अतः इहें यज्ञिय पदार्थ नहीं माना जासकता । ऐसी अवस्था में इहें यज्ञसीमा से बाहिर उत्कर में ही फेंक देना चाहिये ॥ ११ ॥

इति - द्रव्यसंस्कारोपपत्ति; २ – पत्नीसन्नहनोपपत्तिः-पत्नीसन्न कर्म का तात्पर्य है - पत्नी का यज्ञ के साथ योग करना । यजमानपत्नी पत्नी है, “ पत्युर्नो यज्ञसंयोगे ” इस पाणिनीय - सिद्धान्त के अनुसार यज्ञ के सम्बन्ध से ही पत्नी शब्द निष्पन्न हुआ है । यह ' पत्नी ' शब्द ही इस तथ्य का सूचक है कि, इस का यज्ञ में अवश्य ही सम्बन्ध कराया जाय । बिना पत्नी के यजमान का यज्ञ सर्वथा अपूर्ण ( अधूरा ) रहता है । कारण स्पष्ट है । प्राकृतिक नित्य श्राधिदैविक - यज्ञ का निरीक्षण कीजिए | यज्ञ के द्वारा सृष्टिरूप- प्रजा को उत्पन्न करने की इच्छा रखने वाले प्रजापति को अपना शरीर पति - पत्नि रूप से दो भागों में विभक्त करना पड़ता है । इन दोनों के मिथुनमाव से ही विराटप्रजा की उत्पत्ति होती है, जैसा कि निम्न लिखित स्मार्त्त वचन से स्पष्ट है—

द्विधा कृत्वात्मनो देहमर्द्धेन पुरुषोऽभवत् ।

श्रद्धेन नारी, तस्यां स विराजमसृजत् प्रभुः ॥

- मनुः १ ० ३२ स्वयम्भू प्रजापति वेदमूर्त्ति हैं । वेदतत्त्व ऋक्साम - यजुः भेद से तीन भागों में विभक्त है । इन तीनों में यजुः वास्तव में यज्जू ( यत्- जू ) है । यद्भाग वाक् है, यही अग्नि है । इसी को यज्ञिय - परिभाषा -नुसार " सार्वयाजुप अग्नि " कहा जाता है । विज्ञानदृष्ट्या यही वागग्नि " सत्याग्नि " नाम से प्रसिद्ध है । जूभाग प्राण है, यही वायु है । यह वाक् प्राण-- [ अग्नि वायु ] - मूर्ति यज्जू, किंवा यजुर्वेदमूर्ति स्वयम्भू ६७६

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तृतीयध्याय प्रथम त्राह्मणा दाम्पत्यभाव परिलेख: -अग्निः ( पुरुष ) १ वाक २ ऑफ " सोमः ( स्त्री ) १ वसन्त: प्रीष्मः वर्षाः.... अग्नि: ( पुरुष:) सोमः ( स्त्री ) २ शरत्-- हेमन्तः-- शिशिरः • अग्निः ( पुरुषः ) १ शोणितम् २ शुक्रम सोमः ( स्त्री ) II शतपथब्राह्मण स्वायम्भवयज्ञः १ सम्प्रसन्नयज्ञः २ अध्यात्मयज्ञः ३ प्रजापति ऋक्सामरूप छन्दों से नित्य छन्दित [ वेष्टित ] रहता है । यजु ही स्वयम्भू प्रजापति का शरीर है । इस यजुर्म्मय शरीर का यदुरूप वाक् -- [ ग्रग्नि ] -- भाग जूरूप प्राण [ वायु ] के व्यापार से आँशिकरूप से द्रुत होजाता है । अग्नि पर जब वायु का प्रसर [ दबाव ] होता है, तो तत्काल अग्नि पानी के रूप में परि-ति होजाता है, जैसा कि " अग्नेरापः " इत्यादि श्रुत्यन्तर से स्पष्ट है । ग्रीष्मऋतु के अनन्तर वर्षा का आग मन भी इमी सिद्धान्त पर अवलम्बित है । प्रजापति का वाक् -- भाग ही श्रं शरूप से पानी [ पारमेष्ठ्य सोम ] बना है, इसी अभिप्राय से - " मोऽपोऽसृजत बाच एव लोकान् । वागेव साऽसृज्यत " [ शत ० ब्रा ० ६ | १११२६ ] यह कहा गया है । वाङमय शरीर के अग्नि - सोम ये दो विभाग ही पति - पत्नी हैं । श्रग्नि पुरुष है, सोम स्त्री है, जैसा कि पूर्वप्रकरण में बतलाया जाचुका है । इन दोनों के मिथुनभाव से ही सूर्य्य-रूप विराट् पुरुष का जन्म हुआ है । सौरसम्वत्सर में भी यही दाम्यत्यभाव है । सम्वत्सर की वसन्तादि ६ ऋतुओं में तीन ऋतुएँ [ वसन्त - ग्रीष्म - वर्षा ] श्राग्नेय हैं, एवं तीन ऋतुएँ [ शरत् - हेमन्त - शिशिर ] सौम्य हैं । दोनों के समन्वय से सम्बत्सरयज्ञ का स्वरूप निम्पन्न हुआ है, एवं इसी सम्वत्सरयज्ञ से पार्थिव प्रजा की उत्पत्ति हुई है । पार्थिव - प्रजा में भी यही मिथुनभाव है । शुक्र सौम्य है, शोणित श्रग्ने है । शोणिताग्नि में शुक्रसोम की आहुति होने से हीं प्रजोत्पत्ति होती है । इसप्रकार स्वायम्भुवयज्ञ सम्वत्सरयज्ञ - प्राध्यात्मि-कयज्ञ तीनों में उक्त दाम्पत्यभाव विद्यामान है, जैसा कि परिलेख से स्पष्ट है । प्रकारान्तर से अग्नीषोमात्मक प्राकृतिक यज्ञ का विचार कीजिए । मम्बत्सरमण्डल में सूर्य, और चन्द्रमा, ये दो ही ग्रहोपग्रह प्रधान हैं । सूर्य आग्नेय है, चन्द्रमा सौम्य है । विष्वद्वृत्त के केन्द्र में सूर्य्यं प्रति-है । यही विषुवमण्डल हमारे खगोल का स्वरूप- सम्पादक है । इसी खगोलीय विश्ववृत्त से हमारा स्वरूप-निर्माण होता है । सम्वत्सर को महासुपर्ण माना गया है । उत्तरायण - दक्षिणायण इस महामुप के दो पक्ष हैं, एवं मध्यस्थ विष्वद्वृत्त आत्मा है । पूर्व की ओर मुख करके खड़े होजाइए । पूर्वभाग में दृश्य खगोलीय [ सूर्ययुक्त ] विष्वत् है, एवं पश्चिमभाग में ग्रदृश्य खगोलीय [ चन्द्रयुक्त ] विष्वत् है । पूर्व - खगोल सूर्यपुरुष से युक्त बनता हुआ ' पुरुष ' है, एवं पश्चिम - खगोल चन्द्रस्त्री से युक्त होता हुआ ' स्त्री '

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 717 का मूल पृष्ठ
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तृतीय अध्याप प्रथमत्राह्मण प्रथमकाण्ड है । दोनों की समष्टिरूप विश्ववत्तीय पूर्ण खगोल ' सम्बत्स ' रूप ' यज्ञप्रजापति ' है । इस में पुरुष का निर्माण सूर्यप्रधान दृश्य खगोल से होता है, एवं स्त्री का निर्माण चन्द्रधान श्य खगोल से होता है । पुरुष की रीड की हड्डी विध्यत है परन्तु आधे विषुव ब ही रस इस में आता है । अतएव चारों और वृत्तरूप से रीड का निर्माण नहीं होता । आधा अदृश्य भाग स्त्री का निर्माण करता है । दूसरे शब्दों में आधा आकाश पुरुष के अधिकार में आता है, एवं आधा आकाश स्त्री के अधिकार में आता है । एक ही सम्बत्सरा-काश - पुरुष और स्त्री में विभक्त है, अतएव स्त्री को ' अर्द्धाङ्गिनी ' माना गया है । पुरुष के शून्य अर्द्धाकाश की पूर्ति स्त्री से ही होती है । जबतक यज्ञ में स्त्री का समन्वय नहीं होता, तवतक यज्ञ का स्वरूप अपूर्ण ही रहता है । ' देवो भूत्वा देवं भावयेन ' यह निश्चित सिद्धान्त है । सम्वत्सर - यज्ञदेव की प्राप्ति के लिए यज्ञकर्त्ता यजमान को पहिले यज्ञरूप बनना पड़ेगा । यज्ञरूप बनने के लिए पहिले इसे पत्नी का यश में योग करना पड़ेगा । पत्नीसंयोग से जब यह पूर्ण होतायगा तमी यह उस पूर्णेश्वर यज्ञविष्णु के साथ सम्बन्ध करने का अधिकारी बन सकेगा । यदि बिना पत्नी के ही यजमान यज्ञकम में प्रवृत्त होजायगा, तो एक वर्ष के भीतर - भीतर इसकी मृत्यु होजायगी । यदि एक दर्पण आधे भाग में गरम, एवं आधे में ठण्डा होजाता है, तो इस विषमता से तत्काल दर्पण के खण्ड खण्ड होजाते हैं । यही अवस्था अपत्नीक यजमान की होती है । ऐसी अवस्था में यश में पत्नी का संयोग करना परम आवश्यक हो जाता है । सूर्योपलचित लोक पिता है, चन्द्रोपलक्षित पृथिवीलांक माता है, दोनों की समष्टि ही द्यावापृथिव्य यज्ञ है । पृथिवी पश्चिमा [ भाग ] है, थु पूर्वाद्ध ' [ भाग ] है 1 युरूप सूर्य से उत्पन्न होने वाला पुरुष यश का पूर्वाद्ध है, एवं पृथिव्युपलक्षित-- चन्द्रप्रधाना स्त्री यज्ञ का जबनार्थ ( पश्चिम का आधा भाग ] है । बिना इसके यज्ञ आाधा रहता है | इसी रहस्य को लक्ष्य में रख कर - " अथ अर्दो वा एष आत्मनः - यत्पत्नी " [ तै ० वा ० ३।३ -३१४ | " अयशो या एपः योऽपत्नीकः " [ तै ० ब्रा ० २२६ ] – “ सोऽयमाकाशः पत्न्या पूर्यते " इत्यादि कहा गया है । पत्नी का यज्ञ में क्यों योग किया जाता है? इस प्रश्न का यही संक्षिप्त समाधान है । पुरुष यज्ञाधिकारी है । यज्ञ बिना पत्नी के होता नहीं । यज्ञ की इस अवश्यकर्त्तव्यता को लक्ष्य मे रख कर ही पुरुष के लिए खुविवाह का विधान शास्त्रसिद्ध मान लिया गया है । पत्नी यज्ञ का पश्चिमार्द्ध है । इधर यजमान का यज्ञ पश्चिम से पूर्व की ओर ही वितत होता हुआ त्रिणाचिकेतस्वर्ग में प्रतिष्ठित होता है । यदि पत्नी न होगी, तो पश्चिम भाग ही न रहेगा । पश्चिम भावन रहेगा, तो प्रतिष्ठा से विरहित यज्ञ किस के आधार पर पूर्व की ओर वितत होगा? अतः यज्ञवितान के लिए, एवं यज्ञ की पूर्णतालक्षणा समृद्धि के लिए यज्ञ में पत्नी का संयोग करना नितान्त आवश्यक दोजाता है । इसी गुहानिहित रहस्य को लक्ष्य में रखकर " जबनादों बाइएप " इत्यादि कहा गया है ॥ १२ ॥

साधारण रूप से पत्नी का योग नहीं किया जाता, अपितु उसे योक्त्र से बाँधा जाता है । योक्त्र एक प्रकार का ऐसा दृढ बन्धन है, जिस में बद्ध होने के पश्चात् पलायित होजाना असम्भवसा होजाता है । जानना * यदि त्रैवर्णिक प्रजा यशक से परामु है, तो कदापि इसे दूसरा विवाह नहीं करना चाहिए । ६८१

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तृतीय अध्याय प्रथम ब्राह्मण शतपथब्रा या चाहते हैं आप इस बन्धन का रहस्य? तो सुनिए! स्त्री सोमप्रधाना होती है यह पूर्व में लाया जाचुका है । सोम ऋततत्त्व है । अतएव यह सत्यभाग से शून्य है । श्रतएव च ऋतप्रधाना स्त्री का निग्रह सतत अपेक्षित है । स्त्री के इसी स्वरूपधर्म को लक्ष्य में रखकर भारतीय समाजशास्त्रियोंनें स्त्रीस्वातन्त्र्य का पूर्ण विरोध किया है । सी की पाल युवा वृद्ध, इन तीनों अवस्थाओं में पिता पति पुत्र की अर्गला लगाई गई है । रूप भीम में श्रात्मप्रतिष्ठा का आभाव है । यह भोग्य वस्तु है अतः सर्वदा संरक्षणीय है । इसे निरन्तर पर प्रतिष्ठा अपेक्षित है । प्रतिष्ठासूत्र में रहते रहते भी अपने ऋतस्वभाव के कारण स्त्री उन्न बन जाती है या प्रतिष्ठान न रहे, तो यह स्वतन्त्रा शक्ति विस्फोटन का ही कारण बन जाया करती है । ऋऋतप्रधाना अत अनुतरूपा स्त्री के इस अप्रतिष्ठा भाग की रक्षा के लिए 9 दूसरे शब्दों में स्वतन्त्रवृत्ति को परतन्त्र बना कर उसे सीमित करने के लिए ही पत्नीसन्नहनकर्म किया जाता है । इस कम् के साधनभूत योक्त्रवन्वन से सौम्य यजमानपत्नी की सौम्यवृत्ति शान्त होजाती है, एवं ऋत के स्थाना में इसमें सत्यभाव का समावेश होजाता है, अप्रतिष्ठा प्रतिष्ठा के रूप में परिणत होजाती है, अनृतयज्ञ-यभाव सत्ययज्ञरूप में परिणत होजाता है । यजमान का प्रकाश परिपूर्ण होजाता है, पूर्ण यज्ञ की पूर्णसमृद्धि प्राप्त होजाती है । सब्र का यही मौलिक रहस्य है । हम यह अनुभव कर रहे हैं कि, स्त्रीजाति के सम्बन्ध में विहित उक्त श्रौत - सिद्धान्त वर्त्तमान भावुक युग के लिए सर्वथा उद्वेगकर दी प्रमाणित होरहा होगा । सामान्यदृष्टि से विचार करने पर तो थोड़ी देर के लिए एक वेदभक्त का हृदय भी श्रुति की इस संकुचित्तवृत्ति से क्षुब्ध होपड़ेगा । जब कि ईश्वरीयसृष्टि में सामान्य-प्राणियों को भी स्वतन्त्र विचरण करने का ( जन्ममिद्ध ) अधिकार प्राप्त है, तो सृष्टि के सर्वसभ्य, दुद्धि--युक्त मानवसमाज के इस स्त्रीवर्ग के सम्बन्ध में ईश्वराज्ञापत्ररूप इन वेदों में किस आधार पर यह श्रमा--नुषिक सिद्धान्त लिपिबद्ध हुआ?, सचमुच यह एक जटिल समस्या है । समस्या जटिल, साथ ही सभ्यता, संस्कृति पर कलङ्क लगाने वाली, सब कुछ ठीक है । परन्तु ' शब्दप्रमाणका वयम् ' न्याय से प्रकृत- सिद्धान्त के सम्मुख विवश होकर हमें नतमस्तक होना हीं पड़ेगा । अब हमें इस सम्बन्ध में देखना केवल यही है कि उक्त वेदभक्ति हमारी कल्पना तक ही सीमित है, अथवा इस में कुछ तथ्यांश भी है, जिस के कि वल पर वेदविरोधियों का, साथ ही उन वेदभक्तों का भी, जो कि ऐसे सिद्धान्तों को देखकर नृव्ध होजाते हैं, अन्तःकरण उक्त सिद्धान्त की ओर आकर्षित किया जासके । | आइए! इस स्वतन्त्रता - पत्र भी मीलिकता का विचार करें और सदद्वारा किसी निश्चित निर्माय पर पहुंचने का प्रयास करें विचारशून्या सामान्यदृष्टि कभी कभी हमें धोका दे डालती है और इस धोके में पढ़कर मानवीय ऋत मन कभी कभी सत्य को असत्य समझने की भूल कर बैठता है । कोई आश्चर्य नहीं, हम भी कुछ ऐसी ही भूल कर रहे हों । --( १ ) – इस में तो कोई भी सन्देह नहीं है कि, सनातनधर्म्म से प्रेम रखने वाला वर्त्तमान युग का मनातनधर्मीजगन प्रत्यक्ष, किंवा अप्रत्यक्षरूप से धर्म के व्याज से विशुद्ध रूढिवाद * अनृतं श्री शुद्ध वा तानि न त ( श्रुतिः ) । ६८२

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तृतीय अध्याय प्रथम ब्राह्मण प्रथमकाण्ड काही समर्थक बन रहा है । बाह्याडम्बरभक्त हम सनातनवम्मियोंनें धम्मदिशों को रूढिवाद रँग में रञ्जित कर उन्हें अधर्म का ही रूप देडाला है, यह स्वीकार कर लेने में किसी भी सनातनधर्मी को यत् किञ्चित् भी आपत्ति नहीं करनी चाहिए । ( २ ) - इस में भी कोई सन्देह नहीं कि, सनातन धर्म के प्रचलित रूढिवादों से घोर शत्रुता रखने वाला वर्त्तमानयुग का समाजसुधारक --जगत प्रत्यक्ष, किंवा अप्रत्यक्षरूप से ' सुधार के व्याज से विशुद्ध अथ का ही समर्थक बन रहा है । पश्चिमाडम्बरभक्त हम सुधारकों ने सुधारमार्गको पश्चिमी सभ्यता के रंग में रञ्जित कर उसे अधर्म का ही रूप दे दिया है, यह स्वीकार कर लेने में भी किसी भी सुधारक को आपत्ति नहीं करनी चाहिए । ( ३ ) - यह भी निःसदिग्ध विषय है कि, सनातनधर्म के उपदेशकों, प्रचारकों, रक्षक मन्त महन्तों, आचार्यों, मठाधीशांने धम्मदेशों के मौलिक रहस्य का प्रतिपादन करने वाले विज्ञानसिद्ध बेदशास्त्र की उपेक्षा करते हुए, अतएव धर्मरक्षा के लिए सर्वथा व्यर्थ प्रमाणित सम्प्रदानभक्ति को साघनरूप अग्रणी बनाते हुए वर्त्तमानयुग की सुधारक - जनता का परितोष करने में अपने आपको सर्वथा निरर्थक ही प्रमाणित कर लिया है । ( ४ ) - अब हमें यह भी मान ही लेना चाहिए कि, सुधारक - समाज के उपदेशकों, मार्गप्रदर्शकों, नेताओं ने सुधार ' मूल प्रारूप मौलिकधर्म्म, मौलिक संस्कृति, मौलिकसाहित्य की उपेक्षा करते हुए, अब समाजव्यवस्था - सचालन के लिए सर्वथा व्यर्थ प्रमाणित कल्पनाभक्ति को ही साधनरूप से आगे करते हुए वर्त्तमान युग की धार्मिक जनता का परितोष करने में अपने आपकों सर्वथा निरर्थक ही सिद्ध कर लिया है । उक्त प्रत्यक्ष दृष्टि ही हमें यह मान लेना के लिए भी बाध्य कर रही है कि, बर्तमान में भारतवर्ष के जनसमाज को १ -- धर्म्मप्रेमी सनातनधर्मी, २ -- सुधार प्रेमी सुधारक, ३-- धर्मोपदेश धार्मिक नेता, ४--मार्गप्रदर्शकसमाजनेता, इन चार श्रेणियों में विभक्त मान लिया जाय । यद्यपि एक पाचवाँ राष्ट्रीयसमाज और है । परन्तु प्रचलित प्रगति के अनुसार उसे हम चतुर्थ समाजवर्ग में ही अन्तत मान सकते हैं । आगे जाकर तो इन चार वर्गों का भी धार्मिकवर्ग, सुधारकवर्ग इन दो वर्गों में हीं अन्तर्भाव होजाता है । उक्त दोनों हीं वर्ग उद्द ेश्य की दृष्टि से समानपथ के ही अनुयायी बने हुए हैं । ' हम, हमारा देश, हमारी सभ्यता, हमारी संस्कृति सुरक्षित रहे ' दोनों ही वर्गों को यह उद्देश्य तो सर्वात्मना मान्य है । परन्तु श्राश्चर्य है कि, समानोद्देश्यता के रहने पर भी दोनों में परस्पर और विरोध देखा जाता है । धार्मिक जगत् सुधारक- जगत् को सर्बनाश का प्रवत्त के बतला रहा है, तो सुधारकवर्ग धार्मिक वर्ग को उन्नति का अन्यतम प्रतिबन्धक समझ रहा है | आदर्शभक्त, किन्तु कम्मशून्य धार्मिक जगत् का धर्म्मप्रसार क्रम क्रमशः शिथिल होता जारहा है, एवं कर्म्मपरायण, किन्तु आदर्शशून्य, सामाजिक जगत् की उच्छृङ्खलता क्रमशः वृद्धिंगत प्रतीत हो रही है । इसप्रकार देश की ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति, यों दो स्वतन्त्र दलों में विभक्त होकर तीसरी अर्थशक्ति के मूलीच्छेदक का कारण बनती हुई सर्वनाश की ही प्रयोजिका प्रमाणित हो रही है, यह जानकर किस भारतीय को क्लेश न होगा । ६८३

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तृतीय अध्या प्रथमत्र झा शतपथब्राह्मण हुआ क्या?, एवं हो क्या रहा है? । धाम्मित्र - प्रजा ने परिवर्तनशील देश - काल - पात्र - द्रव्यादि से सम्बन्ध रखने वाले तत्सामयिक ( अतएव तत्समय के लिए ही उपादेय ) याचार - व्यवहारों का ग्रन्थि-बन्धन करते हुए उसे भी सामयिक बना डाला । अतीत सभ्यता, किंवा आचार - व्यवहार देशकालादि के परिवर्तन से स्मृति में विलीन होते रहे, आगे भागे नवीन विकास जन्म लेते गए उपर शाश्वतध पर बलात्कार से उन सामयिक आचारादि का लेप चढ़ता रहा । परिणाम इसका यह हुआ कि - धर्मतत्त्व सर्वथा अन्तर्हित होगया, एवं प्रधानता रह गई केवल रूढिवाद की । शाश्वतधर्म्म ' अनित्य मतवाद मात्र ' बनता हुआ परमार्थसाधन के स्थान में विशुद्ध स्वार्थ का ही पोषक बना रह गया । भला मानवीय मनकबतक धर्म के इस ताण्डवनृत्य को सहन करता रहता? | परिणाम वही हुआ, जो होना चाहिए था | कुछ एक नेताओं ने जनता को सावधान किया कि, जिसे तुमनें ' धम्म ' समझ रखा है. यह व्याजधर्म है, धर्म की ओट में रूढिवाद पनप रहा है । इसी धर्म के धोके ने तुहारी स्वतंत्रता का अपहरण किया है । परिणाम जो कुछ हुआ, देश के सामने है । धम्र्मसुधार आरम्भ हुआ प्रबल वेग से । परन्तु धम्मं स्पभूत मौलिक साहित्य के विरह से इस सुधार ने बाह्य आवरण के साथ साथ गर्मीभूत मौलिकतत्त्व पर भी प्रहार करना आरम्भ कर दिया । और मानना पड़ेगा कि, सुधारकवर्ग की यह एक महा भूल हुई । गले सड़े मांस के कर्तन ( प्रशन ) के साथ साथ विशुद्ध, संरक्षक अङ्ग को भी काट लिया गया । इसप्रकार इह्नोंनें शेषभूता मौलिकता को भी नामशेष में ही परिणत कर दिया ॥ प्रकरण अप्रासङ्गिक होता हुआ भी प्रासङ्गिक है । प्रश्न है - " स्त्रीस्वातन्त्र्य ” का । स्वतन्त्रता का अनन्यप्रेमी सुधारक - समाज उन आदेशों को सहन करने के लिए सन्नद्ध नहीं है, जो कि आदेश स्त्रीस्वातन्त्र्य पर प्रत्यक्षरूप से आक्रमण कर रहे हैं । यही कारण है कि, उन की दृष्टि में न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति " यह आदेश पुरुषसमाज की स्वार्थवृत्ति का ही योतक न रहा है । ऋत सत्य का विवेचन करते हुए क्यपि पूर्व में हमनें इस द्योतकता की निरर्थकता सिद्ध करने का प्रयास किया है । तथापि केवल इसी साधन से हम पूर्णरूप से उनका परितोष नहीं कर सकते । अवश्य ही इस साधन की सिद्धि के लिए हमें थोड़ा और प्रयास करना पड़ेगा । जहाँतक हम समझते हैं- " स्वतन्त्र " शब्द का अक्षरार्थ है - " स्त्र - तन्त्र " ( अपना तन्त्र ) । यह " स्व " क्या है?, और इस ' स्व ' का ' तन्त्र ' क्या है?, यह भी एक विचारणीय प्रश्न है । पहिले कोशकार की दृष्टि से ही दोनों शब्दों के अर्थों का विचार कीजिए " स्वो ज्ञातावात्मनि " ( अमर ३।३।२११ ) के अनुसार बन्धुजन, श्रीर आत्मा, इन दोनों को " स्व " कहा जाता है । ज्ञाता आत्मा हीं ज्ञातिबन्धु * है । अतः फलितांश में ' आत्मा ' ही ' स्व ' शब्द का वाच्यार्थ बन जाता है । शब्दार्थक ' स्वन ' धातु से ( ' स्वन ' शब्दे - भ्वा ० प ० से, ) " " शब्द निष्पन्न हुआ है । " स्वनति - इति, स्वन्यते बा " ही " स्व " शब्द का • " यावद्वित्तावदात्मा " इस सिद्धान्त के अनुसार विसपर्यन्तमता का प्रसार माना गया है । बन्धुवर्ग किंवा ज्ञातिवर्ग अन्तर्थित में अतभूत हैं । अतएव इहें भी " ख " कहना अत्यर्थं जन जाता है । ६५८