Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 81–90
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 81–90
पृष्ठ 81
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण २ खण्ड मन्यवे ॰ ' इत्यादि रूपेण भगवान् शङ्कर के सम्मुख होने वाले रुद्रपाठों में लोकप्रसिद्ध है, सनातनधर्मावलम्बी-जगत् क्यों व्यर्थ में हीं अर्वाचीन वेदभक्तों से इस दिशा में वाक्कलह कर रहा है १ । इस कुतूहल के उपशमन के लिए जब हमने उस युग के प्रचण्ड - शास्त्रार्थियों की ' नमस्ते मीमांसा ' देखी, तो सहसा मन ग्लानि से ही भर गया उसके काल्पनिक - तक को देख कर । क्या इसी का नाम सनातनधर्म्मनिष्ठा है?, प्रश्न दृढ़ मूल बन गया वैसे मीमांसा - निबन्धों को देख कर । आगे चल कर वेदपुरुषानुग्रह से शतपथ ब्राह्मण का क्रमबद्ध स्वाध्याय - युग उपस्थित हुआ, और उसी के परिणाम स्वरूप शतपथ के नवमकाण्डीय - नमुक— सन्दर्भ के स्वाध्याय से ' नमस्ते ' शब्दानुबन्धिनी उस विप्रतिपत्ति का यथार्थं समाधान उपलब्ध हुआ, जिसका ' अनवर्शकर्म्मप्रसङ्गतः ' हमने प्रक्रान्त क्रमप्राप्त १४ वें कर्म्म में दिगदर्शन करा दिया है, तत् - श्रौत सन्दर्भ-पारिभाषिक अर्थ - समन्वय के साथ | समन्वय का पारिभाषिक तथ्य अवश्य ही अर्वाचीन वेदभक्तों को भी उनके नमस्ते व्यवहार के प्रति उहें जागरूक करेगा, और तदनुवर्त्मा गतानुगतिक अन्य वर्ग भी इस दिशा में अवश्यमेव तथ्य का ही अनुगमन करेंगे, इसी मङ्गलकामना के साथ प्रकृत में केवल वह श्रौतसन्दर्भ ही हम उद्धत कर रहे हैं संस्मरण के रूप में, जिसका पारिभाषिक - समन्वय तत्प्रकरण में ही द्रष्टव्य इसी निवेदन के साथ यह संस्मरणत्रयी - विश्रामपथानुगामिनी बन रही है, जिसका वेदिपरिग्रहात्मक - १४ वें कर्म्म से ही सम्बन्ध है— “ चतुद्द ' शैताने. यजूंषि भवन्ति 1 । त्रयोदश मासाः सम्वत्सरः प्रजापतिश्चतुद्दशः । प्रजापतिरग्निः । यावानग्निर्यावत्यस्य मात्रा, तावतैवैनमेतदन्न ेन प्रीणाति - नमो नमः-इति । यज्ञो वै नमः । यज्ञेनैवैनमेतन्नमस्कारेण नमस्यति । तस्मादु ह नायज्ञियं ब्रूयात्-' नमस्ते ' - इति । यथ हैनं ब्रूयात् यज्ञस्ते इति, तादृक् नत् " । - शतपथब्राह्मण ६ का ० १।१।१६ कंट ( १४ ) -५ ८१
पृष्ठ 82
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
A: ( १५ ) - द्रव्य संस्कारकर्म्म- प्रसङ्गतः स्त्री - स्वातन्त्र्यादि - कतिपय-" तथ्यपूर्ण - प्रसंगों का पारिभाषिक - संस्मरण " ६ क ) --पत्नी -- सन्नहनात्मक - कम्मानुगत संस्मरण – यज्ञकर्म्म उस प्रकृतिसिद्ध ग्राधिदैविक सौर- पार्थिव ( द्यावापृथिव्य ) सम्वत्सरयज्ञ की प्रतिकृति है, जिसका स्वरूप ज्योतिष्चक्रात्मक ( खगोनात्मक ) पूर्ण - सौर मण्डल माना गया है । सम्पूर्ण सम्वत्सर - मण्डल - सूर्य्या-चन्द्रमसौं ' रूपेण दृश्य - अदृश्य रूपेण - दो श्रण्डकटाहों में विभक्त माने गए हैं, जो क्रमशः - सौर - श्रद्ध-काश, चान्द्र - श्रद्ध - आकाश - कहलाए हैं । श्रहः कालानुगत - दृश्य - श्रग्नि प्रधान - सौर - श्रद्ध - अण्डकटाइ के द्वारा ' पुरुपसृष्टि ' हुई है, एवं रात्रिकालानुगत - अदृश्य सोमप्रधान - चान्द्र - श्रद्ध - श्रण्डकटाह के द्वारा-' स्त्रीसृष्टि ' हुई है । यों एक ही श्राधिदैविक - सम्वत्सर - यज्ञेश्वर विभागात्मक- अपने दोनों श्राकाशों से क्रमश: पुरुष और स्त्री के स्वरूप- प्रवर्त्तक बने हुए हैं । यों दोनों अपने अपने रूपों से श्रद्ध ' - अर्द्ध - ही यज्ञ हैं । पूर्णवज्ञ ेश्वर के साथ पुरुष तभी श्रन्तर्थ्याम - सम्बन्ध स्थापित कर सकता है, नत्र कि वह अपने श्रद्ध'-रिक्त - चान्द्र श्राकाश को परिपूर्ण करले । वह श्राकाश पूर्ण बनता है ' पत्नी ' के द्वारा ही, जैसाकि ' सोऽयमाकाशः पत्न्यापूर्य्यते ' से स्पष्ट है । ' पत्युर्नो यज्ञसंयोगे ' रूपेण भगवान् पाणिनि भी ' पत्नी ' शब्द के द्वारा दाम्प– त्यमूलक - इसी यज्ञसभ्वन्ध का समर्थन कर रहे हैं । संसिद्ध है कि, चिना पत्नी के पतिदेव कदापि यशक में अधिकृत नहीं होसकते । यों अनिवार्य्यरूपेण यज्ञकर्म में यजमान के साथ यजमानपत्नी का भी समन्वय प्रमाणित होजाता है । यज्ञकर्म में समाविष्ट यजमानपत्नी के अधोवस्त्र पर कटिप्रदेश में मूँज का ' योक्त्र ' नामक रञ बन्धनसूत्र बाँधना अनिवार्य्यं माना है यज्ञकर्म्मरहस्यवेत्ताश्रोंनें । यही योक्त्रचन्धनक कहलाया है, और तन्निबन्धन पारिभाषिक कर्म्म ही - पत्नीसन्नहनकर्म्म ' है, जिसका स्पष्ट अर्थ है – ' पत्नी का सूत्रबन्धन से पारतन्त्र्य ', जिस इस तथ्य के आधार पर ही स्मृतिशास्त्र का - ' न स्त्री स्वातन्त्र्यमईति ' यह वैज्ञानिक सिद्धान्त व्यवस्थित हुआ है । विकृतिभावनिबन्धन प्रत्यन्त्रदृष्ट- केवल- पार्थिव शरीरों के आधार पर ही मानवस्वरूप का पर्य्यवसान मान बैठने की भयावहा भ्रान्ति करने वाले श्रान के भूतसाम्यवादियों की दृष्टि में ' समानाधिकाररूप ' वह महान् व्यामोहन जागरूक होपड़ा है भूतसाम्यानुगामी प्रतीच्य जगत् के संसर्गजनित दोष के कारण, जिस महान् व्यामोहन से व्यामुग्ध तदनुगामी मानव स्त्री के साथ परतन्त्र शब्द का स्वाप्निक सम्बन्ध मी मानने के लिए ८२
पृष्ठ 83
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण २ खण्ड सन्नद्ध नहीं है | अतएव यज्ञकर्मानुबन्धी- परतन्त्रताप्रवर्त्तक- ' पत्नी सन्नहनकर्म्म ' आज के युग के लिए एक मानवीय विधान ही बन सकता है, किवा मान लिया जासकता है । इसी प्रसङ्ग से तत्कर्मानुबन्धेन स्त्री-स्वातन्त्र्य, पारतन्त्र्य से सम्बन्ध रखने वाली उस समस्या का निराकरण प्रयास हुआ है, जिसके द्वारा ही आज के समानाधिकार पक्षपातियों का मन्तोष कराया जासकता है । मानव के मनःशरीर का मानवी के साथ आकस्मिक - सान्निध्य ही मानव को ' सहकामचारी ', र मानवी को ' सहकामचारिणो ' बना देता है, जिस इत्थंभूतमर्थ्यादित स्वैराचार को ही मान की भाषा में स्त्रीस्वातन्त्र्य, और पुरुष - स्वातन्त्र्य - अभिधा प्राप्त हो रही है, जिस का मानव - मानवी के वास्तविक ' तन्त्र ’ रूप - ' स्व ' रूप श्रात्मबुद्धिक्षेत्र के दाम्पत्य का यत्किञ्चित् भी तो सम्बन्ध नहीं है । मनः शरीर - माध्यमेन मानव के साथ होने वाला मानवी का श्रात्मबुद्धिनिबन्धन - श्रद्धादिमुलक - सहज दाम्पत्यभाव ही वास्तविक - सम्बन्ध है, जिस सम्बन्ध से अनुप्राणिता पत्नी ही - ' सहधर्मचारिणी ' कहलाई हैं, जिस का -'सह धर्म्म चरताम् ' से संस्मरण किया गया है । धर्म्माचरणानुगत प्रकृतिसिद्ध इस सहज दाम्पत्य में स्त्री और पुरुष दोनों हीं अमुक मर्यादा सूत्रों से आबद्ध रहते हैं, जिस मर्यादा सूत्र - बन्धन से ही दोनों के - स्व ' ' - ' स्व ' तन्त्र स्वस्वरूपतः सुरक्षित रहते हैं । यही परतन्त्रतात्मक -मर्य्यादासूत्र का निष्कर्षार्थ है, जिसके तथ्य से अपरिचित, प्रत्यक्ष-प्रभावमूला भावुकता से उत्तेजित मानव आज एकमात्र मनःशरीरभावों पर ही मानव, और मानत्री का स्वरूप- पर्य्यवसान - मानता हुआ उस उच्छृङ्खल - श्रमर्थ्यादित - पशुसमतुलित - स्वैराचार को ही ' स्त्रीस्वातन्त्र्य'-और ' पुरुषस्वातन्त्र्य ' की संज्ञा दे बैठा है, जिस अर्थकाममूला इत्थंभूता काल्पनिकी ' स्वतन्त्रता ' से ही मानव - मानवी - का सहज सिद्ध निःश्रेयसानुगत अभ्युदय सर्वथा ही पलायित होगया है । शेष क्या रह गया है?, प्रश्न के दुःखपूर्ण इतिवृत्त का संस्मरण भी ' कथापि खलु पापानामलम श्रेयसे यनः ' वाक् का स्मरण कर रहा है । पुरुष, और स्त्री के प्रकृतिसिद्ध ' स्वानुगत ' ' स्वतन्त्र ' तन्त्र के स्वरूप - समन्वय के बिना स्वतन्त्र-परतन्त्र - शब्दों का पारिभाषिक समन्वयार्थ - क्योंकि - सम्भव नहीं है । अतएव तत्प्रकरण में सर्वप्रथम वैदिक-पारिभाषिक - निगमों के आधार पर इन दोनों के स्वरूप का ही स्पष्टीकरण हुआ है । तदाधार पर ही स्त्री-स्वातन्त्र्य - पारतन्त्र्य के सृष्टिविद्या - सम्मत - श्रौत तथ्यों का ' अग्नि - सोम - विद्या ' के माध्यम से समन्वय प्रयास करते हुए ही धर्मप्रधाना स्त्री के बाह्य ऋतस्वरूप के संरक्षक - मर्य्यादासूत्रानुगत - पारतन्त्र्य का स्पष्टीकरण हुआ है, जो पारतन्त्र्य वस्तुगत्या स्त्री के बाह्य ऋतधर्म्म का स्वरूपरक्षक बनता हुआ स्त्रीस्वातन्त्र्य का ही संरक्षक है । और प्रस्तुत - पत्नी सन्नहन कम्र्मानुगत योक्त्रबन्धन से सम्बन्ध रखने वाले प्रासङ्गिक तथ्य का यही संक्षिप्ततम-संस्मरण है । ( ख ) - ' नीरक्षीर विवेकन्याया ' नुगत - संस्मरण – संस्कृतसाहित्य में ' नीरक्षीर विवेक न्याय ' नामक एक न्याय सुप्रसिद्ध है, जिस का उपयोग सदसदि-वेकशालिनी - प्रज्ञा के अतिशय के सम्बन्ध में हीं देखा, सुना जाता है । इस लोकप्रसिद्ध न्याय की श्राधारभूमि वैदिक - वह ' आज्यदर्शन ' कम्मं ही माना गया है, जिस का पत्नीसन्नहनक से ही सम्बन्ध । यज्ञ में ८३
पृष्ठ 84
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
किञ्चिदिव आवेदन समाविष्टा यजमानपत्नी " श्राज्यदर्शन " करती है, जिस के सृष्टि निबन्धन - वैज्ञानिक - पारिभाषिक - तथ्य के आधार पर ही - ' नीरक्षीरन्याय ' अभिव्यक्त हुआ है । तत्प्रकरण में इस न्याय के वैज्ञानिक रहस्य का ही स्पष्टीकरण प्रयास हुआ है । संस्मरणात्मक - तत् - न्याय का निष्कर्ष यही है किं, यद्यपि मानत्र, और मानवी, दोनों के ही पाञ्चभौतिक-शरीरसंस्थानों की स्वरूपाभिव्यक्ति का मौलिक- श्रारम्भणद्रव्य ( उपादानद्रव्य ) पारमेष्ठय -- ' नीर ' ( सलिल-रूप - श्रुतभावपन्न — श्रपूतत्त्व ) ही है, जैसाकि - ' आपः पुरुषत्रचसो भवन्ति - ' सर्वमापोमयं जगत् ' इत्यादि भति - स्मृति- वचनों से प्रमाणित है । तथापि यह श्राश्चर्य है कि, मानव का उपादानभूत नीर नहीं क्षीर के श्राधान से वञ्चित रहता है, वहीं एकमात्र मानवी के उपादानभूत - नीरभूत श्रापोद्रव्य में ह्रीं प्रकृति की ओर से सहजरूपेणैव उस ' तीर ' का श्राधान हो बाता है, जिस का उत्तररूप- श्राज्यद्रव्य ' ( घृत ) माना गया है । नीर में हित चीर ही मानवी को मातृषद जननी - पद- श्रारूट करता है, जो कि सृष्टिकर्म्म का श्रन्यमत महत्त्वपूर्ण श्रम माना गया है । इसी क्षीराधान के श्रतिशय से माता का स्थान पिता की अपेक्षा कहीं श्रेष्ठतम मान लिया गया है । क्षीरमय दुग्य - सोमतत्त्व है, और इसी पारमेष्ट्य - सोमतत्त्व का नाम है वह वीध्र - महद्ब्रहा, जिस के आधार पर ही चिदात्मा अंशरूपेण गर्भीभूत बना करता है । यों चिदात्मा की गमात्मिका अभिव्यक्ति का श्राधार भी सोममय- महद्ब्रह्मा भिन्न क्षीरतत्त्व ही प्रमाणित होरहा है । सोमात्मक - क्षीर का वह पारमेय्य समुद्र ही क्षीरशायी पामेष्ठ्य विष्णु की श्रावासभूमि माना गया है पुराणशास्त्र में । ' तदप्सु पयो हितम् ' रूप तत्प्रकरण का श्रुतिवचन ही मातृभावानुगत अप्रूप नीर में पयोरूप क्षीर के श्राधान का समर्थक बनता हुआ - ' नीरक्षीर विवेकन्याय ' का परम्परया समर्थक प्रमाणित होरहा है, और यही इन अत्यन्त-रहस्यपूर्ण तत्त्वात्मक न्याय के वैज्ञानिक स्पष्टीकरण का संक्षिप्ततम संस्मरण है | ( १५ ) —६ GY
पृष्ठ 85
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीः ( १६ ) - याज्यगृहण कर्म्म - प्रसङ्गतः-' त्रिविध - यज्ञविज्ञान का स्वरूप संस्मरण ' ७ क्रमप्राप्त - ' अज्यिग्रहण ' नामक १६ वें कर्म्म में तत्कर्मेतिकर्तव्यता के समन्वय के अतिरिक्त उस ' त्रिविध - यज्ञविज्ञान ' के पारिभाषिक स्वरूप का ही स्पष्टीकरण - प्रयास हुआ है, जिस के बिना ' विधि ' भाग नाम से प्रसिद्ध ' ब्राह्मण ' में प्रतिनादित याज्ञिक - कर्मकाण्ड नवशिक्षित मानव की दृष्टि में सर्वथा ही किञ्चित्कर प्रमाणित होगए हैं । आज का युग अहर्निश जिस ' सायस ' का उद्घोष कर रहा है, उस का अर्थ यदि ' विज्ञान ' मान लिया जाता है, तो इस भारतीय - पारिभाषिक - ' विज्ञान ' शब्द के माध्यम से सहसा उस आज की ' भौतिक विज्ञान - निबन्धना ' भ्रान्ति की अभिव्यक्ति सम्भव बन जाती है, जिस का अधिदेवतानुगता ईश्वरीय संस्था से, एवं अध्यात्मसंस्था से कोई भी सम्बन्ध नहीं है । भारतीय - विज्ञान- शब्द भारतीय शब्द है, जिस के गर्भ में ही तच्छदार्थ का पारिभाषिक - समन्वय निरूढ है, एवं यही भारतीय-संस्कृत - वैदिक - शब्दों की वह रहस्यपूर्णा वैज्ञानिकता है, जिस का साम्य इतर भाषानुचन्धी यदृच्छात्मक-लौकिक- शब्दों से कदापि सम्भव नहीं है । प्रत्येक शब्द का वैज्ञानिक - चिरन्तन - पारिभाषिक - इतिवृत्त तत्-शब्द के निर्वचनात्मक समन्वय से ही अनुप्राणित है । उदाहरण के लिए ' हृदयम् ' शब्द को ही लीजिए, जिस का स्वरूप - निर्माण - ' ह - द - यम् ' रूप तीन अक्षरों से हुआ है, जिन का क्रमशः ' आगति - गति-स्थिति ' नामक तीन धर्मों से क्रमिक सम्बन्ध है । यां धर्म्मत्रयावच्छिन्न यक्षरात्मक ' हृदयम् ' शब्द केन्द्रा-नुगत ' उस शक्तित्रयी की ओर ही हमारा ध्यान आकर्षित कर रहा है, जिस केन्द्रात्मका श्रागति गति - स्थिति-लक्षणा शक्तित्रयी के सह 8 मन्वयात्मक केन्द्रबल पर ही वस्तुपिएड, एवं वस्तुमण्डल की स्वरूप- स्थिति सुरक्षित रहा करती है । ठीक यही स्थिति - ' विज्ञान ' शब्द के साथ समन्वित माननी पड़ेगी, और इस दृष्टि से कदापि भूत-विज्ञाननिबन्धन आज के प्रत्यक्षदृष्ट केवल ' सायंस ' पर ही इस पारिभाषिक- विज्ञान शब्द का विश्राम नहीं माना जा सकेगा । भारतीय - ' विज्ञान ' शब्द के तथाभूत ' पारिभाषिक ' तथ्य का शतपथ - प्रथमखण्ड की * जिसप्रकार पारिभाषिक संस्कृति - सभ्यता - आदि भारतीय मौलिक शब्द अन्धानुकरन्यायेन " कल्चर " -. " सिविलाइजेशन " आदि प्रतीच्य - शब्दों के श्राज पर्थ्याय मान लिए गए हैं, एवमेव ' विज्ञान ' शब्द जैसे पारिभाषिक शब्द को भी आज ' सायंस ' शब्द का पर्य्याय माना जारहा है, जो कि पर्य्यायता सर्वथा श्रापातरमणीया ही माना बायगी । ट्यू
पृष्ठ 86
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
किञ्चिदिव श्रावेदन प्रस्तावना में विस्तार से स्पष्टीकरण किया जाचुका है । प्रकृत में तत्परिभाषा से उपनिबद्ध - ' त्रिविधं -ज्ञानं-विज्ञानम् ' रूप ' विज्ञान ' शब्द से अनुप्राणित - ' वि ' उपसर्ग के ' विविधम् ' का ' त्रिःसन्या वै देवाः ' इस अनुगमवचन के अनुसार- ' त्रिविधम् ' अर्थ मानते हुए प्रस्तुत ' श्रभ्यग्रहण ब्राह्मण ' में देवत - श्रात्मिक-मौतिक - नामक त्रिविध - विज्ञान भावों का ही स्वरूप- समन्वय हुआ है, जिसके समन्वयात्मक - पारिभाषिक— तत्त्वार्थबोध के अनन्तर यज्ञकर्म्मनिबन्धना उन सभी आपातरमणीया भ्रान्तियों का आत्यन्तिकरूपेणैव निराकरण होजाता है, बिस निराकरण के बिना श्राज हमारी मानसी श्रद्धा ब्राह्मणग्रन्थों में प्रतिपादित अभ्युदयसंसाधक -यज्ञकम्मों की ओर से सर्वथैव तटस्था बनती चली जारही है । ' विज्ञान ' शब्द के उक्त समन्वयार्थ का कदापि यह तात्पर्य्यं नहीं है कि, भारत के वैज्ञानिक महर्षि भौतिक विज्ञानात्मक - पदार्थविज्ञान के, एवं तन्निबन्धन भौतिक- आविष्कारों के शत्रु थे, किंवा श्राविष्कारों को निरर्थक मानते थे । यदि ऐसा होता, तो कदापि सुप्रसिद्ध भौतिक विज्ञानाविष्कारक - ऋभु विस्वा बाज, आदि वैज्ञानिकों के द्वारा आविष्कृत विभिन्न भौतिक - आविष्कारों का स्वयं ऋक्संहिता में यशोवर्णन उपलब्ध ही नहीं होता । एतदतिरिक्त- ' दिवि च भुवि चाप्याहृत गतिः ' रूप विमानविशेष, श्राकाश में सञ्चरण करते हुए ही एकत्र स्थितिभाव में परिणत होजाने वाले अद्भुत विमान, हर्य्यश्व- सौभ - श्रादि अन्यान्य आविष्कार भी इसके प्रत्यक्षतम दृढतम - प्रमाण हैं कि, भारतीय ऋषिप्रज्ञा केवल प्रधिदेवत, तथा अध्यात्म के सुसूक्ष्म-क्षेत्रों पर ही विश्रान्त नहीं थी । अपितु इसका आधिभौतिक - अभ्युदय पर भी समानाधिकार था । ज्ञानकाण्ड-प्रधान - अध्यात्मपरीक्षाप्रधान स्वयं उपनिषाच्छास्त्र ने भी अध्यात्मविद्या के साथ साथ ही अभिभूत की भी महती उपयोगिता स्वीकार की है, और अधिभूत को ही मानव के अभ्युदयानुगत- निःओ यसका अन्यतम माध्यम उद्घोषित किया है, जैसाकि निम्नलिखित बचन से स्पष्टतमरूपेण प्रमाणित है —
इह चेदवेदीत् अथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीत् महती विनष्टिः ।
भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥
- केनोपनिषदि यह सब कुछ मानते हुए भी हम भारतीय ' विज्ञानकाण्ड ' को निराधाररूपेण केवल इस भूतजगत् पर ही परिसमाप्त इसलिए नहीं कर देते कि, केवल ' भूत ' ही मानव के लिए सर्वस्व नहीं है । यही नहीं, दैवता-नुगत - अध्यात्म की मूल प्रतिष्ठा से वश्चित- विशुद्ध भूतवाद तो मानव को तात्कालिक रूपेण तुष्ट - पुष्ट - करता हुआ भी अन्ततोगत्त्वा इसके सर्वनाश का कारण ही बन जाया करता है । केवल भूतानुगता - लोक - वितैषणा-सक्तिनिबन्धना इत्थंभूता परिणामवृत्ति के कारण ही ऋषिप्रज्ञा ने इस भूतविज्ञान को अधिदेवतानुगत - अध्यात्म-विज्ञान से नियन्त्रित कर देना अनिवार्य्यं समझा है, और दैवत, तथा आत्म - विज्ञानद्वयी से नियन्त्रित, मर्य्यादित – सच्छन्दस्क उस भूतविज्ञान का ही पारिभाषिक नाम है - ' यज्ञविज्ञान ', जिसे ऋषिने- ' श्रेष्ठतमाय * इस विषय का स्वतन्त्र - विवेचन - " भारतीय दृष्टिकोण से विज्ञान शब्द का समन्वय " नामक एक स्वतन्त्र लघु पुस्तिका के रूप में भी संस्थान के द्वारा प्रकाशित होचुका है । ÷ विशद - वैज्ञानिक - समन्वय के लिए देखिए - ' केनोपनिषद्वज्ञानभाष्य ' । ८६
पृष्ठ 87
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण २ खण्ड कर्म्मणे ' ( यजुः सं ० ) मन्त्रभाग का अर्थ करते हुए - ' यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म्म ' ( शतपथब्राह्मण ) रूपेण ' श्रेष्ठतमकर्म ' संज्ञा से समन्वित किया है । प्रज्ज्वलित - भूताग्नि में श्राज्य ( घृत ) - तिल - यव- तण्डुल - पुरोडाश- पशुवपा - श्रादि - श्रादि द्रव्द - विशेष की आहुति -प्रदान से अनुप्राणित लोकप्रसिद्ध ' यज्ञकम्मं ' पर ही ' यज्ञ ' का वैज्ञानिक - पारिभाषिक - स्वरूप उपरत नहीं है, जैसाकि केवल भूतदृष्टि - परायण अमुक प्रतीच्य वेदव्याख्याताओंोंनें, तथा तदन्धानुकरणकर्त्ता अर्वाचीन नवशिक्षित भारतीयोंनें मान रक्खा है । अपितु यज्ञविज्ञानानुगत ' यज्ञकर्म्म ' तो इस पञ्चमहाभौतिक-विश्व का प्रकृतिसिद्ध वह अटल - विधान है, जिस प्राकृतिक यज्ञरूप श्राधिदैविक ईश्वरीय यज्ञ से ही अध्यात्म-यज्ञ की अभिव्यक्ति हुई है, एवं उसी के आधार पर ठीक उसी के नियमोपनियमों के अनुरूप - भारतीय-द्विजातिवर्ग के द्वारा अनुष्ठीयमान श्राधिमौतिकयज्ञ का स्वरूप - वितान हुआ है, जैसाकि चौदहवें संस्मरण-प्रसङ्ग में भी स्पष्ट किया जाचुका है । " मौलिक तत्व की पारिभाषिकी - संज्ञा है – ' ब्रह्म ', एवं यौगिकतत्त्व की पारिभाषिकी संज्ञा है – ' यज्ञ ' । ' तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ' ( गीता ) इत्यादि भगवद्वचन के द्वारा अत्यन्त रहस्यपूर्ण इह्रीं ब्रह्म, और यज्ञ भावों की ओर सङ्कत हुआ है । अनेक मौलिक तत्त्वों के अन्तर्य्यामात्मक - ( रासायनिक - ) सम्मिश्रण से अभिव्यक्त अपूर्वभाव ही ' यज्ञ ' का संक्षिप्ततम स्वरूप - परिचय है । सम्पूर्ण विश्व, विश्व के र अचर यच्चयावत् पदार्थ जिस प्रकृतिसिद्धा बलग्रन्थिनिबन्धना प्रक्रिया के आधार पर अभिव्यक्त हुए हैं, उस प्रक्रियाविशेष का नाम ही ' यज्ञ ' है, जिसके वैज्ञानिकोंने दृष्टिकोणभेद से अनेक लक्षण किए हैं * । प्रत्यक्षदृष्ट - प्राध्यात्मिक - प्राणिशरीरों में अमुक प्रकार के श्रवयवसंस्थान क्यों - श्रौर कैसे बन जाते हैं?, अमुक चीजों के वपन से वृक्षात्मक स्वरूप की अभिव्यक्ति कैसे होजाती है?, तरलद्रव्याहुति से घनभावा-पन्ना प्रजा कैसे उत्पन्न होती है?, इत्यादि सृष्टिविषयक - यच्चयावत् प्रश्नों का प्रकृतिसिद्ध - जिस रहस्यपूर्ण विज्ञान से सम्बन्ध है, उसी सृष्टिविज्ञान का नाम है- ' यज्ञविज्ञान ', जिसे अपनी काल्पनिको अध्यात्मभावना में श्रासक्त होने वाले भारतवर्ष ने अमुक शताब्दियों से काल्पनिक ही जगन्मिथ्यात्व के व्यामोहन से व्यामुग्ध होते हुए सर्वथैव विस्मृत कर अपना सर्वनाश ही करा लिया है । और श्राज अपने लोकप्रदर्शनात्मक - लोकानुरञ्जक-मात्र प्रदर्शन विशेषों को ही अमुक नामथिक प्रदर्शनों की भांति - ' यज्ञ ' कहते हुए ही भारतवर्ष अपनी रहस्यपूर्णां यज्ञविद्या का मानो स्वयं ही उपहास कर रहा है । यज्ञविद्या कैसी रहस्यपूर्णा है? प्रश्न के समाधान के सम्बन्ध में उदाहरणमात्र के लिए सुप्रसिद्ध यज्ञविज्ञानवेता महर्षि स्वैदायन के उस पावन प्रसङ्ग की ओर ही हम अपने वेदप्रेमी - पाठकों का ध्यान आकर्षित कर देना चाहते हैं, जिनके प्रसङ्ग में तयुग के सुप्रसिद्ध महर्षि गोतम के सम्मुख महर्षि स्वैदायन के द्वारा आध्यात्मिक यज्ञ से सम्बन्ध रखने वाले कुछ एक वैसे प्रश्न उपस्थित होपड़े हैं, सम्भवतः आज के प्रबृद्धतम भी भूतविज्ञान के लिए भी वे प्रश्न ' असमाधेय ' ही बने रह सकते हैं । * - ( १ ) श्रग्नौ सोमाहुतिर्यज्ञः ( २ ) - वाचश्चित्तस्योत्तरोत्तरिक्रमो यज्ञः ( ३ ) - अनोक् प्राणानामन्योऽन्यपरिग्रहो यज्ञः इत्यादि ८७
पृष्ठ 88
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
किञ्चिदिव श्राबेदन उदाहरणोपस्थिति इसलिए श्रावश्यक समझी गई है कि, आज हमारे स्वतन्त्र - भारत के स्कूल-कॉलेजो में भी प्रतीच्य - शिक्षापद्धति के अन्धानुकरणानुग्रह से भूगोल - इतिहास - श्रादि के जो भी पाठ्यग्रन्थ नियत हैं, उनमें वेद - यज्ञ- श्राय - अनार्य्य - श्रादि शब्दों के माध्यम से उहीं धारणाओं का यशोगान होरहा हे -- तच्चरणरजोऽनुवर्त्ती भारतीय अर्वाचीन विद्वानों के द्वारा, जिनका कि विशुद्ध राजनैतिक स्वार्थ - साधन के लिए ही उन चाणाक्ष चतुर प्रतीच्य - विद्वानों के द्वारा शिक्षायन्त्र में बलपूर्वक समावेश हुआ था । " आर्य्य लोग वेद को पवित्र ग्रन्थ मानते हैं, अग्नि वायु - मेघ -आदि प्रकृति के पदार्थों से प्रभावित होकर इनकी स्तुति करते हैं, श्राग में अमुक पदार्थ डाल कर इन देवताओं को प्रसन्न करते हैं । इह्रीं प्राकृत पदार्थों की स्तुति पूजन के द्वारा आगे जाकर बहुत पीछे उपनिषत्काल में आयों को एकेश्वरवाद का बोध हुआ । " इत्यादि रूपेण सर्वथैव भ्रान्तिपूर्ण वैसे कुसंस्कार भारतीय-भावुक - प्रज्ञा में जन्मत: ही उस सीमा पय्यन्त दृढमूल कर दिए जाते हैं, जिसके दुष्परिणाम स्वरूप वह सदा-सदा के लिए स्वसंस्कृति - साहित्य सभ्यता - श्रादि को शून्यवत् मानता हुया उस ओर से न केवल तटस्थ ही बनकर विश्राम ग्रहण कर लेता, श्रपितु प्रतीच्य जगत् की तत्कालाकर्षण मूला चाकचिक्ययुक्ता- प्रदर्शन पद्धति से निरतिशयरूपेण प्रभावित होता हुआ अपने पुरातन सनातन, - श्रतएव शाश्वतीभ्यः - समाभ्यः - नवीन - नवीन-तम भी ज्ञानविज्ञानात्मक - गौरव के प्रति प्रतिक्रियावादी ही बन जाता है । इसी प्रतिक्रियावाद का यह भीषण परिणाम है कि, आज के सर्वतन्त्र - स्वतन्त्र भारत की प्रभुसत्ता समर्था भी प्रजा अपनी तथोक्ता प्राच्या - ज्ञान-विज्ञाननिधि की पुनरभिव्यक्ति के प्रयास के स्थान में - ' पुराना सब सड़ा गला है - हमें सब कुछ नवीन ही निर्माण करना है ' इसप्रकार के अनर्गल - मत्त प्रलापों की ही अनुगामिनी बनी हुई है, जिससे बड़ा सांस्कृतिक अध: पतन इसका और क्या होगा? । हाँ, तो उस ' पुराने सड़े - गले? ' यज्ञविज्ञानानुबन्धी- एक यज्ञिय - उदाहरण की ओर ही आज के ' तरोताजा - वादियों ' की युगधर्म्म -- निबन्धना उस महती १ प्रज्ञा का ध्यान हम श्राकर्षित करना चाहेंगे, जिन नवीनतावादियों की स्वतन्त्रा विशाला श्रच्छन्दस्का दृष्टि में भारत के प्रज्ञाकोश में केवल रूढ़िवाद के प्रति -रिक्त तात्त्विक १ विज्ञान १ से अनुप्राणित कुछ भी तो दायाद शेष नहीं है श्राज के सर्वसमृद्ध! भूतविज्ञान के समतुलन में । सुप्रसिद्ध पश्चिमोत्तरदेश- पञ्चनद ( पंजाब ) में एकवार उस युग के सुप्रसिद्ध यज्ञकर्म्मनिष्ठ श्ररुणपुत्र, अतएव ' श्रारुणि ' इस उपनाम से लोक में प्रसिद्ध भगवान् उदालकि ( जो कि अपनी प्रचण्डा दुद्दर्षा विद्वत्ता के कारण स्वतन्त्र - परिषत् का सञ्चालन करने के कारण ' ब्रह्मा ' उपाधि से समलङ कृत थे ) यज्ञ के ' ब्रह्मा ' पद के लिए संकल्पित होकर पधारे । वहाँ उस प्रान्त में महर्षि स्वैदायन नामक अध्यात्मयज्ञरहस्यवेत्ता विद्वान् से उनकी प्राथमिक भेंट हुई, और स्वैदायन प्रश्न करने लग पड़े तत्काल ही इस रूप से कि- ' श्रीमान्! उसे विदेश में ' ब्रह्मा ' रूप से वृत होकर आने का साहस करना चाहिए, जो निम्नलिखित प्रश्नों का वैज्ञानिक समाधान करने की क्षमता रखता हो कि— ( १ ) - बतलाइए! दर्शपूर्णमास में आठ पुरस्तात् श्राज्यभाग, पाँच मध्यतः, षट् - प्राजापत्य भाग, उपरिष्टात्-आठ आज्यभाग, इस क्रमसंख्या - विपर्य्यं का क्या ताविक रहस्य है? | CG
पृष्ठ 89
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण २ खण्ड ( २ ) - उत्पन्न शिशु के दाँत क्यों नहीं उत्पन्न होते १, उत्पन्न होने के अनन्तर अमुक अवधि में दांत क्यों उत्पन्न होजाते हैं?, पुनः बालावस्था में क्यों टूट जाते हैं?, पुन: क्यों उत्पन्न होजाते हैं?, और वाक्य में टूट कर पुनः क्यों नहीं उत्पन्न होते! । ( ३ ) – उत्पन्न शिशु के बाल भूरें, पुन: काले, और पुन: सफेद क्यों होनाते हैं?, । ( ४ ) —उत्पन्न बालक में रेतोद्रव्य क्यों उत्पन्न नहीं होता १, पुन: कैसे उत्पन्न होजाता है?, और वार्द्धक्य में यह उत्पादन क्यों अबरुद्ध होजाता है? । ( ५ ) - क्या आप ज्योतिर्म्मयी उस गायत्री का स्वरूप जानते हैं, जो यज्ञकर्त्ता यजमान की स्वर्गगति का कारण बन जाती है! । तथोक्ता प्रश्नपरम्परा का उत्तर देने में अपने आपको असमर्थ अनुभूत करने वाले ऋजुप्रज्ञ महाभाग श्रारुणि तत्काल समिध लेकर शिष्यबुद्धि से प्रणतिपुरस्सर महर्षि स्वैदायन के सम्मुख उपस्थित होजाते हैं, और ' ब्रह्मा ' पद के लिए उपलब्धा अमुक सुवर्णराशि को प्रदान करते हुए यही आवेदन करने लग पड़ते हैं कि-" अनूचानः स्वैदायनासि! निष्कं प्रददौ " | बाव सुवर्णविदे ददतीति ' । तस्मै - शथपथब्राह्मण ११।४।१ । महर्षि स्वैदायन प्रकृतिसिद्ध नित्य - यज्ञ के तत्त्वानुगत - सम्मिश्रणों के तारतम्य से अनुप्राणित यज्ञ-रहस्य के आधार पर ही उक्त प्रश्नों का जो पारिभाषिक स्वरूप - अभिव्यक्त करते हैं, वह भी आज हमारी भावुक - प्रज्ञा के लिए एक समस्या ही प्रमाणित होरहा है इसलिए कि, दुर्भाग्यवश आज हम उन याज्ञिकी पारिभाषाओं के ज्ञानविज्ञानात्मक - अर्थबोध से सर्वथा ही विदूर चले गए हैं । यही कारण है कि, महार्षे-स्वैटायन के तत्समाधानवचनों से भी हम अमुक - वास्तविक तथ्य पर नहीं पहुँच पाते । और परिभाषाज्ञान से वञ्चित होजाने के कारण वेदशास्त्र के इत्थंभूत उत्तरात्मक सन्दर्भ भी हमारे लिए समस्या ही बने रह जाते हैं । क्योंकि - - कम्मों के - मनुष्यकृत इनवैध- यज्ञात्मक भौतिक पदार्थों के आधारभूत अधि-दैवत के प्राणात्मक सूक्ष्म - तत्त्वों से अनेक शताब्दियों से श्रस्मदादि सामान्य जनों की कौन कहे, विद्वत्प्रज्ञा मी ञ्चित ही होती रही है, जिस प्रवञ्चना का एक अन्य प्रासङ्गिक उदाहरण से स्पष्टीकरण किया ना-सकता है । मनुष्यकृत - वैव - यज्ञ में अग्नि में अमुक देवता के लिए दी जाने वाली ज्याहुति ( घृताहुति ) के सम्बन्ध में तत्र समवेत याज्ञिकों में प्रसङ्गवश वैज्ञानिकी चर्चा उपक्रान्त होपड़ती है, और एक याज्ञिक से श्रमुक अन्य याज्ञिक प्रश्न कर बैठता है कि, ' श्राहुति तो दी जाती है अनस्थिमत् - तरलद्रव्य की, और उत्पन्न होता है - श्रस्थिमान्
पृष्ठ 90
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
किञ्चिदि आवेदन प्राणी । ऐसा क्यों, और कैसे सम्भव हुआ? । उत्तर मिलता है, यज्ञविज्ञान - रहस्यवेत्ता याज्ञिक के द्वारा यही कि- ' श्राज्यद्रव्य यद्यपि तरलत्वेन अवश्य ही अनस्थिमद्रव्य ( बिना हड्डी वाला - घनताशून्य ) है । तथापि क्योंकि इस श्राज्य में-- ' हिरण्यशकलं निधाय जुहोति ' अर्थात् घनभावापन्न - अस्थिमद्रव्यरूप सुवर्णखण्ड रख कर तत्सहित आज्य की आहुति दी जाती है, अतएव श्राज्य जैसे तरलपदार्थ से भी उत्पन्ना प्रजा में अस्थि-रूपा घनता की भी स्वरूप निष्पत्ति होजाती है " । क्या समझे उक्त उत्तर से हमारी पारिभाषिक - बोधशून्या भावुकप्रज्ञा? | याज्ञिकों का प्रश्नोत्तरसन्दर्भ अधिभूतदृष्ट्या भी समन्वित है, एवं अधिदैवतदृष्ट्या भी । यज्ञिय द्रव्याहुति से अपूर्व दैवात्मप्रजा की अभिव्यक्ति होती है, यह एक रहस्य पूर्ण याज्ञिक विषय है, जिसका प्रस्तुत शतपथभाष्य में पाठक यत्र तत्र संक्षेप, और विस्तार से स्वरूप - विश्लेषण देखेंगे । दृष्टि श्राज्य पर है, लक्ष्यीभूत है— तरलधर्मा - पोमय वह रेतो-द्रव्य ( शुक्रद्रव्य ), जो रजोभाग के साथ रासायनिक- सम्मिश्रणावस्था में श्रोता हुआ प्रजोत्पत्तिका कारण बनता है । शुक्र- पार्थिव - तरलद्रव्य अवश्य है, किन्तु इसमें घनतासम्पादक - सौर- सावित्राग्निरूप वह तेज भी समाविष्ट रहता है जिसके समावेश से ही तरल भी शुक्र स्वगर्भाभूत सौर - हिरण्यतेज से घनता ( स्थि ) का प्रवर्त्तक बन जाता है । मनुष्यकृत वैधयज्ञ में तरल शुक्रद्रव्य का प्रतिनिधि तरलभावापन्न आज्यद्रव्य है, तो तत्रस्थ हिरण्यशकल ( सुवर्णखण्ड ) घन भावापन्न द्रव्य का प्रतिनिधि है । यों प्रश्नोत्तर - प्रसङ्ग का सर्वथा समन्वय होजाता है । यदि हम श्राज्य का केवल भौतिक श्राज्य पर ही, तथा हिरण्यशकल का केवल भौतिक - सुवर्ण-खण्ड पर ही विश्राम मानते रहें, तो शतजन्मों में भी इस समस्या का निराकरण सम्भव न हो । क्या इत्थंभूता मान्यता का मानवीया कल्पना से सम्बन्ध है?, नहीं, कदापि नहीं । स्वयं वेदशास्त्राने हीं प्रकीर्णकरूपेण ‘ रेतो वै आज्यम् ’ - ‘ हिरण्मयेन सविता रथेनादेवः ' इत्यादि अनुगम - निगम - वचनों के द्वारा पारिभाषिक उन तथ्यों का स्पष्टीकरण कर दिया है, जिसके बोध से हम आज वञ्चित इसलिए होगए हैं कि, हमारा वेदशास्त्रानुगत अध्ययनपथ वैदिक शब्दों के माध्यम से अध्ययनपथ न रह कर साम्प्रदायिक- पथ ही बन गया है । पहिले हम अमुक सम्प्रदायविशेष के आवेश में प्रविष्ट होकर तदनुरूप अपनी मान्यताएँ स्थिर कर लेते हैं । तदनन्तर इस मान्यता के रन से रजित चक्षु से ही हम वेदशास्त्रावलोकन में प्रवृत्त होने का मानो निःसीम अनुग्रह ही करते हैं, सो भी चञ्चुप्रवेशन्यायेनैव । क्रमबद्ध - पारम्परिक एकतानतारूप - प्रतिमान वर्जित- स्वाध्याय का गुहा निहितवृत्या श्रात्यन्तिक अभाव एवं साम्प्रदायिक - श्रावेशपूर्णा मान्यता में पूर्ण अभिनिवेश, और तन्नि-बन्धन बुद्धिवाद, श्रादि आदि कारण ही हमें विद्यमान भी पारिभाषिक तत्व - सन्दर्भ से आज पराः परावत ही बनाए हुए हैं, जैसाकि - ' उतः त्वः पश्यन्न ददर्श वाचम् ' इत्यादि मन्त्रमाध्यम से आवेदन के सन्दर्भ में भी निवेदन किया जाचुका है, इत्यलमतिपन वितेन- याज्ञिक - उदाहरण - निदर्शनेन । ६०