Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 721–730
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 721–730
पृष्ठ 721
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय अध्याय प्रथमब्राह्मगा प्रथमकाण्ड निर्वचन है । आत्मा शब्दप्रवर्तक है, दूसरे शब्दों में आत्मा से शब्द निकलता है, अतएव “ स्वनति " ( शब्दं करोति शब्दमुत्पादयति वा ) से अवश्य ही आत्मा को " स्व " कहा जासकता है । इसी निर्वाचन मे यह भी सिद्ध होगया कि जिसका आत्मा शब्दोत्पत्ति में असमर्थ है, वह आत्मा " स्व " मर्यादा से, किंवा " स्व - धर्म्म " से वचित होता हुआ " स्व: " न होकर " परः " ही बन जाता है । ' आत्मा ' शब्द उत्पन्न करता है, किंवा आत्मा से शब्द निकलता है, इसका क्या तात्पर्य? | क्या कोई श्रात्मा ऐसा भी है, जो शब्द उत्पन्न करने में असमर्थ रहता हो? हम तो देखते हैं कि " आत्मा बुद्धगा समेत्यर्थान् मनो यु विवक्षया मनः कायाग्निमाहत्य स प्रेरयति मारुतम् " इत्यादि पाणिनीय - शिक्षा- सिद्धान्त के अनुसार शब्दोच्चारण की विवक्षा करने वाला श्रात्मा बुद्धि से युक्त होकर श्रभिल-बित अर्थकामना का मन के साथ योग करता है । आत्मकामना से काममय बना हुआ मन सर्वाङ्गशरीर में व्याप्त वैश्वानर अग्नि ( कायाग्नि ) में होम उत्पन्न करता है । इस इच्छा के अचात से दुग्ध बने हुए अग्निका क्षोभ प्राणवायु पर आघात करता है । धक्का खाकर वायु उरः कण्ठ - शिर: तीनों में किसी स्थान से टकरा कर कण्ठ ताल्वादि स्थानों में आकर वरूप धारण कर लेता है । इसप्रकार श्रात्मकामना ही बुद्धि के द्वारा मनोद्वार से शरीराग्निज्ञोभव्यापारमूलक प्राणवायु को सञ्चारभाव में परिणत कर वर्णरूप में परिणत करती है । " वायुः खान शब्दस्तत् " यह प्रातिशाख्य - सिद्धान्त भी उक्त सिद्धान्त का ही समर्थन कर रहा है । जब कि शब्दोत्पन्ति किंवा उत्पत्ति का यह स्वाभाविक नियम है, दूसरे शब्दों में कोई भी शब्द जब बिना आत्मकामना के विनिर्गत नहीं हो सकता, तो मानना पड़ेगा कि “ स्वनति - स्वन्यते " के अनुसार सभी प्राणियों का आत्मा " स्व " है । फिर इस सम्बन्ध में यह कहना है कि " जिसका आत्म शब्दोपनि में असमर्थ है, वह ' रूप ' न कहला कर ' पर ' ही कहलाएगा " क्या महत्त्व रखता है । " न हाशब्द-मित्रास्ति " - " सर्ग शब्देन भासते ' इत्यादि श्रौतस्मार्त्त सिद्धान्तों के अनुसार जब सत्र का प्रत्यय ( ज्ञान ) शब्दात्मक ही है, शब्दप्रेरणा हीं जब सय का प्रातिथिक धर्म है, तो इस नित्य शब्दविनिर्गमका अनुयायी आत्मा कभी ' पर ' बन जाय, यह सम्भव ही नहीं । यदि केबल “ स्व -- पर ” -- भावों का ही विचार किया जाता है, तो अवश्य ही इस सम्बन्ध में उक्त विप्रतिपत्ति का समावेश सम्भव होजाता है । परन्तु जत्र " तन्त्र " शब्द को साथ लेकर विचार किया जायगा, तो स्वतः एव विप्रतिपत्ति का निराकरण होजायगा । केवल " स्वः " ( श्रात्मा ) को तो तत्रतक ' स्वः ( आत्मा ) ' कहा भी नहीं जासकता, जबतक कि वह किसी तन्त्र का अनुगामी नहीं बन जाता । तन्त्र को अपना आयतन बना कर ही आत्मा शब्दोत्पत्ति में समर्थ होकर " स्व " कहलाता है । यदि वह तन्त्र आत्मानुगामी है, तो उस समय उस अपने तन्त्र का अध्यक्ष बनता हुआ आत्मा " स्वतन्त्र " कहलाएगा । यदि वह तन्त्र आत्मस्वरूप को विकृत करने वाला है, तो उस दशा में वह तन्त्र ' परतन्त्र ' कहलाएगा, एवं तदनुनत श्रात्मा भी ' परतन्त्र ' ही माना जायगा । स्वतन्त्र - परतन्त्र, दोनों हीं शब्द आत्मवाचक नहीं हैं, अपितु ये शब्द तो तन्त्रों के द्योतक है । आत्मा को तो न स्वतन्त्र कहा जासकता, न परतन्त्र ' सर्भरूप ' के लिए कभी निश्चितरूप की अशा
पृष्ठ 722
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीयध्याय प्रथमत्राह्मण शतपथब्राह्मण नहीं लगाई जा सकती । दोनों शब्द तन्त्रों के ही वाचक हैं । श्रात्मतन्त्र " स्वतन्त्र " कहलाएगा, एवं आत्मविरोधी तन्त्र परतन्त्र " कहलाएगा ' स्वतन्त्र ' में रहने वाला श्रात्मा ही अपना " स्वः " माग सुरक्षित रख सकेगा । एवं ' परतन्त्र ' में रहने वाला आत्मा " स्व " को खो बैठेगा इसप्रकार स्वतन्त्र, परतन्त्र, शब्द तन्त्रों के ही वाचक बन जाते हैं । आगे जाकर ' द्वादन्याय ' से इन दोनों को आत्मा का भी वाचक मान लिया गया है । आमा चाहे ' स्वतन्त्र में प्रतिष्ठित रहे, अथवा ' पर ' तन्त्र में उभयथा वह शब्दोत्पत्ति का प्रवत्तक माना जायगा और शब्दोपति के सम्बध से दोनों हीं अवस्थाओं में उसे " स्वनति " के अनुसार " ख " कहा सकेगा | अन्तर दोनों अवस्थाओं में केवल यही होगा कि, ' स्व ' तम्त्र में प्रतिष्ठित आत्मा की कामना मन का सञ्चालन करेंगी, एवं ' पर ' - तन्त्र में पतिष्ठित आत्मकामना पर मानस - कामना का अधिकार रहेगा । मन की कामना को अपने रँग में रञ्जित कर शब्दप्रवर्त्तक बनता हुआ यही स्वः ' स्वः ' कहा जायगा, एवं अनी कामना की मन के रंग में रखकर शब्दप्रवर्तक जनता हुआ यही स्वः " परः " कहलाएगा । इसप्रकार तन्त्रभेट से शब्दायमान उस एक ही " स्वः " की " स्व: " ' पर: " ये दो अवस्वाएँ होजायेंगी । स्त्र ( अग्ने ) तन्त्र का अध्यक्ष वही ' स्वः ( आत्मा ) " स्वः " ( स्वयम्र्मानुगत ) कहलाएगा एवं पर दूसरे तन्त्र का अनुगामी वड़ी ‘ स्त्रः ( आत्मा ) " परः " ( परधर्मानुगत ) कहलायेगा । बस केवल इसी भेद को लक्ष्य में रखकर " शब्दोत्पत्ति में समर्थ आत्मा ' स्व ' एवं असमर्थ आत्मा ' पर ' कहलाएगा " यह कहा गया है | शब्दोत्पत्ति दोनों अवस्थाओं में होगी । परन्तु ' पर ', तन्त्रावस्था में उत्पन्न आत्मशब्द ' परम ' मं रँगे रहने के कारण ' आत्मशब्द ' नहीं कहलाएगा । अब यह विचार कीजिए कि, वह " स्वतन्त्र- परन्त्र " कीन है, जिनके कारण क्रमिक सम्बन्ध से वह स्वः ( आत्म ) एवं परः " मा ( आत्म - अनात्म मात्र ) में परिणत होजाता है? । कोश | नुसार पूर्व में " स्त्रः " को आत्मा का वाचक बतलाया गया है । ज्ञात आत्मा ही " स्व " है । इस ज्ञात आत्मा का परभाव होगा वह विषय, जो कि आत्मभावना से शून्य होगा । ज्ञाता, ज्ञेय दोनों में ज्ञाता यदि श्रात्मा का ' स्व - भाव ' है, तो जय " पर भाव माना जायगा । चैतन्य ज्ञात ग्रात्मा का ज्ञेय विषय सवश्रा नड़ ही होता है । जड़त्वेन हीं उसे ' अनात्म्य ' कहा जासकता है । इस दृष्टि से इस अनात्मभाव को हम " पर-भाव " कहने काराकारने ' पर ' शब्द के जो दूर, अनात्मा, उत्तम, ये तीन अर्थ माने हैं, उनमें से प्रकृत अनात्मभावही अभिप्रेत है - ( अमर ० ३ | ३ | ३ | १६१ । ) । इसी भाव को आगे कर ' पर ' शब्द शत्रु का भी वाचक माना गया है, एवं ' स्व ' शब्द बन्धु का वाचक माना गया है । निष्कर्ष यही हुआकि आत्मा " स्व " है, ' अनात्मा ' " पर " है । आत्मा का उपकारक भाव ' स्वः ' है, एवं ग्रात्मा का विरोधी भाव ' पर ' है । आत्मा, और आत्मा का श्रेयो भाव दोनों को " स्त्रः " कहा जायगा । एवं अनात्मा, तथा आत्मा का प्रेयोभाव, दोनों को ' परः ' कहा जायगा । अच ' तन्त्र ' शब्द के अर्थ पर दृष्टि डालिए । अपेक्षा - भेद से ' तन्त्र ' शब्द सिद्धान्त, परिच्छेद ( सीमा ), सूत्रवायु, कुटुम्बकृत्य, उत्तमोषधि, शास्त्रपर्व, वेदशाखा, इतिकर्त्तव्यता, प्रधान, आदि अनेक अर्थों का सूचक है । प्रकृत में तन्त्र शब्द से " प्रधान " ही अभिप्रेत है । प्रकृति को ही प्रधान कहा जाता है । प्रकृतिभाव के अन्तरङ्ग, बहिरङ्ग, भेद से दो वित्त है । इनमें पाचभौतिक विश्व वाहिरङ्गप्रकृति है, एवं ६८६
पृष्ठ 723
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बृतीय अध्याय - " स्व: " - है आत्मा-" स : " है, - " स्वः " — है, पुरुषः-. श्रव्ययः-स्वयम्भूः परमेष्ठी- " स्व: " है, प्रथम ब्राह्मण प्रथमकाण्ड * श्रनात्मा – “ परः " — है, प्रधानम् - " तन्त्रम् ” – है । विकृतिः " परः " है, प्रकृतिः " त्रम् " है । -क्षरः ——— “ परः ' ' ---- " परः " है, अक्षरः — “ तन्त्रम् " — है । 3 चन्द्रमा - पृथिबी- “ परः ” −है, सूर्यः — “ तन्त्रम् ” – है । ६८७ विश्वसनलिका प्रकृति अन्तरङ्गप्रकृति है । यही विश्व का आदिकारण मानी गई है । इसी की " प्रवान " है I कहा जायगा । विश्वक्षेत्र का अधिष्ठाता प्रकृतिरूप यही प्रधानतत्त्व पुरुष के सहयोग से ' क्षेत्रज ' बना हुआ विज्ञानभाषा में यही " विज्ञानात्मा " नाम से एवं दर्शनभाषा में यही " बुद्धि " नाम से प्रसिद्ध है ८ है जैसा कि गीतामायादि में ष्ट है । प्रधाना प्रकृति ही व्यक्तरूप से वितत होकर विश्वविस्तार का कारण बनती है । दूसरे शब्दों में यही विश्व का वितान करती है, अतएव " तन्यते अनेन सर्वम् ' इस निर्वचन के अनुसार प्रकृतिरूप इस प्रधान को अवश्य ही तन्त्र " कहा जासकता है । " श्व पर तन्त्र " इन तीनों शब्दों का अर्थ क्रमशः आत्मा - अनात्मा प्रधान - रूप से गदार्थ हुआ है । यह अनात्मभात्र नहीं बहिरङ्गपकृति है, जिसे कि हम ' विश्व ' कह सकेंगे । आत्मरुष " स्व " पुरुष है, आदिकरणरूप प्रदान प्रकृति ' है एवं कारू विश्व अनात्म्य परभाव बनता हुआ ' विकृति ' है । पहले आधिदैविक विश्व में ही तीनों के दर्शन कीजिए । स्वयम्भू परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्र पृथिव्यात्मक विश्व में स्वयम्भू परमेष्ठी की समष्टि अमृतप्रधान गुरुप संस्था है, चन्द्रमा पृथिवी, दोनों की समष्टिरूप मृत्युप्रधान विकृतिसंस्था है । मध्यस्थ, अतएव अमृत-मृत्युमय सूर्य प्रकृतिसंस्था है पुरुषसंस्था में अव्ययात्मा का विकास है, विकृतिसंस्था में भौतिक क्षर का साम्राज्य है, एवं प्रकृतिसंस्था में अक्षर की प्रधानता है । अव्यय " स्त्र " है, तर " पर ' है, एवं अक्षर " तन्त्र " है । अव्ययपुरुष का ( ' स्व ' का ) तन्त्र यही अक्षर है । यदि यही ' तन्त्र ( अक्षर ) क्षररूष परभाव का अनु-गामी बन जाता है, तो यह ' स्वतन्त्र ' ( अव्ययतन्त्र ) परतन्त्र ' ( क्षरतन्त्र ) बन जाता है । अव्ययात्मा का अक्षरतन्त्र के द्वारा क्षर में समाविष्ट रहना “ स्वतन्त्रता " है, एवं अव्ययात्मा का अक्षरतन्त्र को क्षर का अनुगामी बनाते हुए उसमें आसक होजाना " परतन्त्रता " है । उक्त आत्मविवस - दिगदर्शन से यह भी सिद्ध होगया कि तु स्थानीय ' प्रवान ' ( अक्षर ) स्वतन्त्र ' ' है । क्योंकि इस अक्षरका ' तन्त्र ' ( विस्तारभूमि ) अन्वय ही है श्वः ( आत्मा ) है तन्त्र जिसका " ऐसा केवल ' अक्षर ' ही होसकता है । यदि यह अक्षर ' स्व ' को अपना ' तन्त्र ' न बना कर ' पर ' लक्षण ' क्षर ' को अपना तन्त्र बना लेता है, तो " पर ( क्षर ) है तन्त्र जिसका " इस निर्वचन से वही ' परतन्त्र ' बन जाता है । स्थिति अंशतः दुर्योध्या है स्वतन्त्र - परतन्त्र शब्द आत्मा के वाचक हैं.! अथवा अनात्मा के वाचक हैं?, अथवा प्रधान के सूचक हैं?, यह तथ्य वास्तव में दुर्बोध्य है - श्रस्मदादि सामान्य - जनों के लिए । अतएव इसका विशेषरूप से स्पष्टीकरण अपेक्षित होजाता है ।
पृष्ठ 724
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीयध्याय प्रथमब्राह्मणा शतपथब्राह्मण उक्त तालिका से यह तो स्पष्ट है कि, किसी भी रूप से यदि ' स्व ' का ' तन्त्र ' से, किंवा ' तन्त्र ' का ' स्वः ' से सम्बन्ध है, सब तो " स्वतन्त्र " शब्द का आविर्भाव है और यदि ' स्व ' का ' तन्त्र ' के द्वारा ' पर ' से, किंवा ' पर ' का ' तन्त्र ' के द्वारा ' स्त्र ' से सम्बन्ध है, तो " परतन्त्र " शब्द का आविर्भाव है । इसी के साथ यह भी स्पष्ट हो जाता है कि, यदि ' स्व ' का साक्षात् रूप से ' तन्त्र ' के साथ सम्बन्ध है, तो इस दशा में ' स्वतन्त्र ' शब्द भी ' आत्मा ' का ही वाचक माना जायगा । एवं यदि इसी ' स्वः ' का साक्षात् रूप से ' तन्त्र ' से सम्बन्ध न होकर ' पर ' के द्वारा ' तन्त्र ' से सम्बन्ध है, तो इस दशा में ' परतन्त्र ' शब्द भी आत्मा का ही वाचक माना जायगा । ऐसी दशा में " स्वतन्त्रः - परतन्त्रः " का अर्थ होगा - " आत्मा स्त्र-तन्त्रः " - " आत्मा परतन्त्रः " । यदि ' तन्त्र ' का साक्षाद्रूप से ' स्वः ' से सम्बन्ध है, तो इस दशा में ' स्वतन्त्र ' शब्द भी ' तन्त्र ' का ही वाचक माना जायगा । यदि इसी तन्त्र का साक्षाद्रूप से ' स्व ' के साथ मम्बन्ध न होकर ' पर ' के द्वारा ' स्त्र: ' से सम्बन्ध है, तो इस दशा में ' परतन्त्र ' शब्द भी ' तन्त्र ' का ही वाचक माना जायगा । एवं उस दशा में- " स्वतन्त्रः- परतन्त्रः " का अर्थ होगा- " तन्त्रः स्वतन्त्रः " तन्त्रः परतन्त्रः " | यदि ' पर ' का ' तन्त्र ' के द्वारा ' स्व ' के साथ अनुकुल [ अनुयोगी ] सम्बन्ध है, तो इस दशा में ' स्वतन्त्र ' शब्द भी ' पर ' का ही वाचक माना जायगा । यदि ' पर ' का ' तन्त्र के द्वारा स्व के साथ प्रतिकूल [ प्रतियोगी ] सम्बन्ध है, तो इस दशा में परतन्त्र शब्द भी पर का ही वाचक माना जायगा । तात्पर्य यह निकला कि, तन्त्रानुगामी वही आत्मा ' स्वतन्त्र ' है, एवं परानुगामी वही आत्मा ' परतन्त्र ' है । स्वानुगामी वही ' तन्त्र ' ' स्वतन्त्र ' है, एवं परानुगामी वही ' तन्त्र ' ' परतन्त्र ' है । स्वानु-गामी [ अनुकूलभाव से ] वही तन्त्र स्वतन्त्र है, एवं स्वानुगामी [ प्रतिकूल भाव से ] वही तन्त्र ' परतन्त्र ' है । आत्मा भी ' स्वतन्त्र ' ' परतन्त्र ' कहला सकता है, एवं तन्त्र को भी ' स्वतन्त्र ' -- ' परतन्त्र ' कहा जासकता है, एवं ' पर ' भी ‘ स्ातन्त्र-- ' परतन्त्र ' शब्दों से व्यवहृत होसकता है । इसप्रकार ' स्व ' लक्षण ' पुरुष ', तन्त्र - लच्या ' प्रकृति ' एवं ' पर ' लक्षगा विकृति, तीनों संस्थाओं के साथ सम्बन्धमेद से स्वतन्त्र- परतन्त्र, दोनों का ही समन्वय किया जासकता है । तीनों विवतों में से पहिले आत्मस्वातन्त्र्य- पारतन्त्र्य का ही विचार प्रस्तुत है । यदि यह ' स्त्र: ( आत्मा ) ' ' स्व - तन्त्र ' का ( अपने तन्त्ररूप अक्षर, किंवा ' प्रकृति ' का ) अनुगामी बनता हुआ ' तन्त्र ' के द्वारा ( ' प्रकृति ' के द्वारा ) ' पर ' भाव में ( क्षर, किंवा ' विकृतिभात्र ' में ) अनासक्तरूप से प्रविष्ट है, तो इस दशा में ( तन्त्रानुगत बन कर परभाव से युक्त रहने की दशा में ) इस तन्त्रानुगामी ' स्व ' को " तन्त्रा नुगतः यः- स्व: - ( आत्मा ) " ( तन्त्र का अनुयायी जो स्व: - आत्मा ) " इस निर्वाचन के अनुसार “ स्वतन्त्रः " कहा जायगा । " तन्त्रानुगतः स्वः स्वतन्त्रः " ही इस आत्मवाचक ' स्वतन्त्र ' शब्द का निर्व चन होगा । मान लीजिए- ' स्व: ' ( आत्मा ) तन्त्रानुगामी ( अक्षरानुगामी ) नहीं है । उसने ' पर ' ( तर ) के साथ योग तो ' तन्त्र ' के ( अक्षर के ) द्वारा ही किया है । परन्तु ' पर ' की आसक्ति के कारण उसका ' तन्त्र ' ( अक्षर ) ' पर '
पृष्ठ 725
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय वाय प्रथमत्राह्मण प्रथमकाण्ड की प्रतिच्छाया के युक्त होकर अपना ' तन्त्र ' भाव ( अक्षरधर्म्म ) लोबैठा है । तन्त्ररूप अक्षर पररूप क्षर के नश्वरधम्मों से युक्त होता हुआ अपनी प्रातिश्विक अक्षरसम्मति से यक्षित हो गया है । क्षररूप पर के नश्व धम्मों के सम्बन्ध से पहिले तो अचाररूप तन्त्र इस आत्मा का तन्त्र था परन्तु आत्मा की विषयासक्ति से आज ग्रक्षर इसका तन्त्र नहीं रहा, अपितु अक्षरतन्त्र का श्रासन ' क्षरपर ' ने छीन लिया । और यों आज ' पर ' ही इसका ' तन्त्र ' बन गया । ' पर ' की आसक्ति [ क्षरात्मिका भूतासक्ति ] ने यहीं विश्राम नहीं किया । अपितु जैसे परासक्तिने अक्षरतन्त्र को ' पर ' बना डाला, वैसे ही तद्वद्ध उस ' स्व ' को भी पररूप में [ क्षररूप में ] परिणत कर दिया । परिणाम यह हुआ कि, जो ' पर ' अपने ' क्षरभाव ' से जिस ' स्त्र ' का तन्त्र नहीं बन सकता था, वह तो उस स्व का का तन्त्र बन गया, और स्वयं ' स्व ' - अपने ' स्व ' - भाव से आवृत होकर ' पर ' बन गया । परने अक्षर से तन्त्रासन छीन कर अपने व्यापको तो तन्त्र बना लिया, और अपना नश्वर परभाव आत्मा को देखकर [ उसे स्व से वञ्चित कर ] उसे ' पर ' बना डाला ' स्व ' को पर ' बनाया एक काम, एवं तन्त्र को ' पर ' बनाते हुए तन्त्रता स्वयं छीन ली, दूसरा काम । ' स्व'चन गमा ' पर ' एवं ' पर ' बन गया ' तन्त्र ' । तन्त्र ' पर ' बनता हुआ इस तन्त्राकाराकारित दर में विलीन होगया, अथवा पर बने हुए आत्मा में विलीन होगया । इसप्रकार तन्त्रानुगत रहता हुआ ( अक्षरानुगत रहता हुआ ) जो स्वः ' किसी दिन " स्वतन्त्र " था, आज वही इस वैकारिक काल्पनिक तन्त्र की कृपा से ' पर ' बन कर बनावटी तन्त्र का अनुगामी बन कर " परतन्त्र " शब्दभाक् बन गया । तत्रानुगतः- ( तन्त्रप्रतिरूपक्षरानुगतः ) यः परः- ( परधर्मानुगतः स्वः- आत्मा ” ) । क्षररूप तन्त्र का अनुयायी, अतएव पररूप में परिणत पर आत्मा ) इस निर्वचन के अनुसार इसे " परतन्त्र " कहा गया पूर्ववत् " तन्त्रानुगतः परः परतन्त्रः " इस आत्मवाचक ' परतन्त्र ' शब्द का निर्वचन होगा । स्वतन्त्र - परतन्त्र - शब्दों के " स्त्र ( स्वरूप में प्रतिष्ठित आत्मा " ), एवं पर ' - ( पर रूप परिणत में परतन्त्र आत्मा ) " नामक अवयवों को यदि आत्मवाचक माना जायगा, तो स्वतन्त्र- परतन्त्र शब्दों के क्रमशः उक्त-' तन्त्रानुगतः - स्वः -- तन्त्रानुगतः - - पर: ' ) हीं निर्वचन होंगे । यहाँ आत्मा ही स्व- दशा में रहता हुआ । अपना ' बन्धु ' कहलाएगा एवं आत्मा ही पराक्रान्त होकर अपना ' रिपु ' कहलाएगा, जैसा कि " आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः " इत्यादि गीता सिद्धान्त से स्पष्ट है । सचमुत अनुकूल तन्त्रानुगत वही आत्मा हमारा मित्र बना रहता है, एवं प्रतिकूल तन्त्रानुगत वही श्रात्मा हमारे लिए पर ( शत्रु ) बन जाता है । एक दूसरी दृष्टि से भी आत्मवाचक इन दोनों शब्दों का निर्वाचन किया जासकता है । आत्मा की विकसित करने वाला भाव आत्मबन्धु कहलाएगा एवं प्रावृत करने वाला भाव आत्मरिपु कहलाएगा । आत्मबन्धु को हम ' स्व ' का ' स्व ' ( आत्मा का स्वजन किंवा मित्र ) कहेंगे, एवं आत्मरिपु को ' स्त्र ' का ' घर ' ( आत्मा का परजन, किंवा रिपु ) कहेंगे ' पर क्षर ' को अपने गर्भ में रखने वाला ' तन्त्राक्षर ' श्रात्मोदय का कारण बनता हुआ आत्मा का ' स्त्र ' कहलाएगा । एवं तन्त्राक्षर को अपने गर्भ में रखने वाला ' पर क्षर ' श्रात्मपतन का कारण बनता हुआ आत्मा का " पर " कहलाएगा । इसी दृष्टि से ' अन्तर-६८६
पृष्ठ 726
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीयव्या प्रथमत्राह्मण शतपथब्राहाण तन्त्र ' आत्मा का ' स्वतन्त्र ' ( अपना हितैपी तन्त्र ) कहलाएगा, एवं ' क्षरतन्त्र ' परतन्त्र ( विरोधी तन्त्र ) कहलाएगा । स्वतन्त्रानुगत ( अक्षरानुगत ) आत्मा-- " स्वतन्त्रो यस्यात्मनः-- स श्रात्मा स्वतन्त्रः " -निर्वचन के अनुसार ' स्वतन्त्र ' कहलाएगा एवं परतन्त्रानुगत ( क्षरानुगत ) आत्मा - परः तन्त्रो यस्यात्मनः स- आत्मा " इस निर्वाचन के अनुसार परतन्त्र ' कहलाएगा । ( १ ) -१- तन्त्रानुगतः -- ( अक्षरानुगतः स्वः ( आत्मा ) " स्वतन्त्र: -ग्रात्मा - स्यः २- तन्त्रानुगतः-- ( गनुगतः ) --स्व: ( आमा ) - परतन्त्र: - श्रात्मा - परः १ -- स्व: ( अक्षर ) तन्त्रो यस्य मः ( आत्मा ) - स्वतन्त्रः- अक्षरः -- स्वः १ -- पर: ( नरः ) तन्त्रो यस्य सः ( आत्मा ) -- परतन्त्रः -- दर - परः आत्मपुरुषवाचक स्वतन्त्र - परतन्त्र शब्दों का विचार उपरत हुआ । अत्र तन्त्रवाचक ( अक्षर-वाचक ) शब्दोंके निर्वचन का विचार कीजिए । वही ' अपना ' ( स्व ) कहलाएगा, जिस से स्वरूप - रक्षा होगी । और उसे ही तो ' पराया ' ( ' पर ' ) कहा जाएगा, जो कि स्परूपहानि करता होगा मध्यस्थ तन्त्ररूप अक्षर स्वस्वरूप से अविनाशी है । उधर इम के उस ओर अविनाशी अव्यय है । इस ओर नाशवान् क्षर है । यदि अक्षर दोनों की समविभूति से युक्त है, तत्र तो कोई आपत्ति ही नहीं है । हाँ, यदि अक्षर क्षर-भाव में आसक्त हो जाता है, तो यह अपने तन्त्रमा अक्षरभाव ) को छोड़कर परभाव में ( तरभाव में ) परिणत होजाता है । ठीक इस के विपरीत यदि यह अव्ययभाव का अनुगामी बन जाता है, तो इस का तन्त्र मुरक्षित रह जाता है । अव्यययोग में अक्षर का ' स्वभाव ' मुरक्षित रहता है, एवं क्षरासक्ति में इस का ' स्त्र भाव ' ' पर -- भात्र ' में परित हो जाना है । ' अतरतन्त्र ' के उस ओर अव्ययतन्त्र है, एवं इस ओर ' तरतन्त्र ' है । स्वयं अक्षर अनुगामी बनता हुआ स्वरूपच से युक्त बनकर " स्त्र " है, एवं चरतन्त्रनुगामी बनता हुआ ' परधर्म ' से युक्त बनकर " पर " है । आत्मवत् अचर भी इस दृष्टि से स्थ परः " दो रूप धारण कर सकता है न्यानुगत ( अव्ययानुगत ) ' स्व ' ( अक्षर ) ' स्वतन्त्र ' है । एवं तन्त्रानुगत ( क्षरानुगत ) ' पर ' ( क्षररूप - ग्रक्षर ) परतन्त्र ' है । " तन्त्रानुगतः ( क्षरानुगतः ) - तन्त्रः ( अत्तर: ) स्वःस्वतन्त्रः " - " तन्त्रानुगतः ( तरानुगतः ) तन्त्रः ( सात्मकोऽत्तर ) - पर - पर - तन्त्रः ही निर्वचन होंगे । पूर्ववत ये निर्वाचन तत्रूप अक्षर को ही " स्वः -- पर " मानकर प्रतिष्ठित हैं । अक्षर का बन्धु ग्रव्यय ही इस का ' स्वः ' कहलाएगा, एवं तर ही इस का ' पर ' कहलाएगा । इस दृष्टि से अव्ययतन्त्र स्त्र - तन्त्र ' माना जायगा, एवं चरतन्त्र ' पर तन्त्र ' कहा जायगा | और इस दृष्टि की अपेक्षा मे दोनों शब्दों के निर्वाचन होगे - पय: ( अव्ययः ) तन्त्रा यस्य सः अक्षर - स्वतन्त्रः परः [ तर ] तन्त्रो यस्य सः अक्षः परतन्त्रः " यह ६६०
पृष्ठ 727
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीयमध्याव प्रथमत्राह्मण प्रथम काण्ड ( २ ) १ - तन्त्रानुगतः अव्ययानुगतः ] तन्त्रः [ अक्षरः ] -- स्वतन्त्रः — श्रक्षरः -- स्वः २ - तन्त्रानुगतः [ क्षरानुगतः ] तन्त्रः [ श्रक्षरः ] -परतन्त्रः - अक्षरः - परः १ – स्वः [ अव्ययः ] तन्त्रो यस्य स: २१: [ दरः तन्त्रो यस्य सः [ अक्षर; ] - स्वतन्त्रः -- अव्ययः -- स्वः [ अक्षरः ] - परतन्त्रः - क्षरः – परः तीसरा परभाव है । इस का भी समन्वय कर लीजिए । योगकौशल के अभाव से जहाँ ' स्व ' ' पर ' देखा गया है, वहाँ ' पर ' को ' स्व ' बनता भी देखा गया है । वही नश्वर संसार किसी के लिए ( आसक्ति के द्वारा । ) बन्धन का कारण बना हुआ है, तो वे ही नश्वर भौतिक पार्थ किसी उपासक के लिए उपासना के साधन अनते हुए मुकि के कारण बन रहे हैं । यदि ' पर ' का ' क्षर ' का ) अक्षर के द्वारा अव्ययतन्त्र के साथ योग है, तो वही ' पर ' अक्षर ( ' स्व ' ) बनता हुआ ' स्वतन्त्र ' है । यदि इस का वैकारिकभावों की ओर अभि-निवेश है, तो अपने ' पर ' नाम को चरितार्थ करता हुआ यही ' परतन्त्र ' भी बना हुआ है । इस दृष्टि से इन शब्दों का जो निर्वचन होगा, उस में ' स्व: ' - ' परः ' क्षर के वाचक रहेंगे । श्रव्ययतन्त्रानुगत ' पर ' ( क्षर ) " स्वतन्त्र " कहलाएगा, एवं वैकारिक प्रचारक दर ' पर ' ( परतन्त्र ) कहलाएगा, यही तात्पर्य है । पूर्वोक्क दूसरी दृष्टि का भी यहाँ समन्वय कर लेना चाहिए, जैसा कि निम्न लिखित निर्वचनों से स्पष्ट है । ( ३ ) - १ – तन्त्रानुगतः अध्ययानुगतः ] पर [ वरः ] स्वतन्त्रः -- तरः - स्वः २ - तन्त्रानुगतः [ विकारानुगतः परः [ तरः परतन्त्रः --- क्षरः - परः -१ -- स्वः [ अभ्ययः ] तन्त्रो यस्य स: २ -- परः [ विकारः ] तन्त्रो यस्य स: [ क्षरः ] –स्वतन्त्रः -- अव्ययः - स्त्रः [ क्षर: ] – परतन्त्र; -- विकारः - परः उक्त विवेचन से यह सिद्ध हो जाता है कि, स्वतन्त्र - परतन्त्र, दोनों शब्द अनुगमभाव से ही सम्बन्ध रखते हैं । किसी नियत वस्तुतत्त्व के लिए ये शब्द नियत नहीं हैं । अपितु परिस्थिति के तारतम्य से सभी स्वतन्त्र हैं, एवं सभी परतन्त्र हैं । स्वतन्त्र ' आत्मा ' भी परतन्त्र बन सकता है, एवं परतन्त्र ' पर ' भी स्वतन्त्र बन सकता है । पुरुष हा प्रकृति हो, अथवा विकृति हो, स्वस्वरूप से न इहूँ स्वतन्त्र कहा जासकता, एवं न परतन्त्र माना जासकता । पुरुष प्रकृति के सहयोग से यदि स्वतन्त्र है, तो विकृति के सहयोग से वही परतन्त्र भी बन सकता है । प्रकृति पुरुष की अनुगामिनी बनती हुई यदि स्वतन्त्र है, तो विकृतिपय का अनु सरण करती हुई वही परतन्त्र भी बन सकती है । एवमेव विकृति प्रकृति, किंवा पुरुषकी अनुगामिनी बनती हुई यदि स्वतन्त्र होसकती है, तो विकारप्रपञ्च में आसक्त होकर यही परतन्त्र भी बन सकती है । इसी मौलिक परिभाषा के आधार पर हमें आध्यात्मिक जगत् की स्वतन्त्रता- परतन्त्रता का अन्वेषण करना पड़ेगा, एवं तदाधार को मूल मानकर ही " स्त्रीस्वातन्त्र्य " की मीमांसा का समन्वय करना पड़ेगा । ६६१
पृष्ठ 728
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीयध्याय १ स्वयम्भूः श्रव्यक्तः १ २- परमेष्टी महान् बुद्धि: २१- सूर्यः १- चन्द्रमाः मनः ३ शरीरम् २- पृथिवी अधिदैवतम अध्यात्मम् प्रथमत्राहाण शतपथब्राह्मण - श्रात्मा ( पुरुषः - श्रव्ययः - स्वः -प्राणाः प्रकृतिः - अ - न्त्रः ) - प्रजापतिः - पशवः ( विकृतिः - क्षरः – परः ) ६६२ आधिदैविक विश्व में स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्र- पृथिवी रूप से पुरुष ( आत्मा ) -प्रकृति ( प्राण ) - विकृति ( पशु ) समयात्मक प्रजापति- विवत ' का दिग्दर्शन कराया गया । अत्र आध्यात्मिक विश्व की इन तीनों संस्थाओं का विचार कीजिए धानचम्मों के सूक्ष्मभावों की ओर जाने की आवश्यकता नहीं है केवल उन चार स्थूल भाव का ही विचार पर्याप्त होगा, जि कि प्रायः सर्वसाधारण जानते हैं आत्मा, बुद्धि, मन, शरीर, चारों जाने पहिचाने हुए पदार्थ हैं । आत्मा को थोड़ी देर के लिए स्वयम्भु के अंशरूप अव्यक्त, एवं परमेष्ठी के अंशरूप महान् से उपलक्षित ' पुरुष ' समझ लीजिए । सूर्य्याशरूप बुद्धि को प्रकृति, चन्द्रांशरूप मन, एवं पृथिव्यांशरूप शरीर, दोनों की समष्टि को विकृति कह लीजिए । पुरुष अव्यय हुआ, प्रकृति अक्षर हुई, एवं विकृति तर हुई । अक्षरात्मिका बुद्धि के उस ओर ग्रव्यात्मक अमृतात्मा है, इस ओर क्षरात्मक मर्त्य मन, एवं शरीर है । निम्नलिखित परिलेख से दोनों संस्थाओं का समतुलन स्पष्ट होजाता है । आधिदैत्रिक यज्ञ से ही आध्यात्मिक यज्ञ का ग्राविर्भाव हुआ है । आधिदैविक यज्ञ में यजमान कौन?, यजमानपत्नी कान है, पहिले यही देखिए आत्मा, सूर्यरूपप्रकृति चन्द्रपृथिवीरूपा विकृति इन तीनों में आत्मा तो यज्ञोंद, किवा बज्ञधरातल है, जैसा कि " तदालम्बनं श्रेस्ठम " " अधियज्ञोऽहमेवात्र ” इत्यादि औत - स्मात ' वचनों से स्पष्ट है । सुर्ख इस यज्ञ का बजमान है, पृथिवीयुक्त चन्द्रमा यजमान की पत्नी है । दोनों का मिथुनभाव ही यश है, और यही यह प्रजोत्पत्ति का कारण है सूर्य अग्निमय है, एवं चन्द्रमा सोममय है । सार अग्नि का प्रभाग ऋत अग्नि है, एव चान्द्र सोम का भाग सोम है तसम का अपना स्थान उत्तरादिक है एवं ऋताग्नि का अन स्थान दक्षिणादिक है । उत्तरस्थ ऋतसोम निरन्तर दक्षिण की ओर एवं दक्षिणस्थ ताग्नि निरन्तर उत्तर
पृष्ठ 729
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीयमाय प्रथम ब्राह्मण प्रथमकाण्ड की ओर जाया करता है । ऋताग्नि में ऋतसोम की ग्राहुति होने से ही बसन्ताटि पड्तुएँ उत्पन्न होती हैं । ऋतुसमष्टि से ही सम्वत्सरयज्ञ का स्वरूप निष्पन्न होता है । एवं यही अग्नीषोमात्मक, ऋतुमूर्ति सम्वत्सरयज्ञ पार्थिव प्रजोत्पत्ति का कारण बनता है । यद्यपि पार्थिव - प्रजा में सम्वत्सरमूर्ति यज्ञप्रजापति के अग्नि - सोम, नामक दोनों भावों का समन्वय है । परन्तु वृपामृष्टि ( पुरुष सृष्टि ) में सूर्योपलक्षित सम्वत्सरयज्ञ का अग्नितत्व प्रधान रहता है, एवं योषासृष्टि ( स्त्रीसृष्टि ) में चन्द्रोपलक्षित सम्वत्सरयज्ञ का सोमतत्त्व प्रधान रहता है । पुरुषसृष्टि कृषा है, एवं स्त्रीसृष्टि योषा है । पुरुष निर्माण में अग्नि एवं स्त्रीनिर्माण में सोम प्रधान है । अग्नि - सोम के इन तारतम्यों का पूर्व -प्रकरणों में यत्र तत्र विश्लेषण किया जाचुका है । अतः यहाँ पुनरुक्ति अनपेक्षित है । यहाँ केवल यही जान लेना अलं होगा कि, अग्नि अन्नाद है, भोक्ता है । एवं सोम अन्न है, भोग्य है । कैसा भोग्य?, पशुरूप भोग्य नहीं, अपितु मित्ररूप भोग्य | यदि अग्नि सोम का भोक्ता है, तो सोम अग्नि की आत्मप्रतिष्ठा है । सोमसम्बन्ध के बिना न अग्नि जीवित रह सकता, न अग्नि को आधार बनाए बिना सोम अपने स्वरूप को सत्यभाव में परिणत कर सकता । दोनों के इसी सख्यभात्र को लक्ष्य में रखकर एक स्थान पर श्रुति ने कहा है-अग्निर्जागर तमृचः कामयन्ते, अग्रिर्जागार तमु सामानि यन्ति । अग्निर्जागर तमयं सोम आह तवाहमस्मि सख्ये न्योकाः ॥ - ऋक्सं ० ५।४४ / १५ ) । अग्नि बलवान् अवश्य है । परन्तु इस की बलवत्ता सोम के सहयोग पर ही निर्भर है । हृदयभाव से चल का विकास होता है । दूसरे शब्दों में बल की विकासभूमि हृदय ही है । हृदयस्थ उक्थन्रल सत्य है, इस सत्य उक्थ से निकलने वाली सत्यरश्मियाँ हीं बल है । एक ही सत्य की सत्य, बल, ये दो अवस्था हैं । सत्य के आधार पर प्रयोग बल का ही होता है । सत्य स्वयं काम नहीं करता, ग्रालम्बनमात्र बना रहता है । सत्यरश्मिरूप चल ही बहिर्जगत् की ओर विकसित होता है । इसी आधार पर - " बलं सत्यादोजीयः-" बलं नाव विज्ञानाद् भूयः " इत्यादि निगम प्रतिष्ठित हैं । अग्नि बलवान् है । क्योंकि पुरुष में सत्य अग्नितत्त्व की प्रधानता है, अतएव इसे हम ' बलवान ' कहेंगे । उधर सोम अचल, किंवा निर्बल है । कारण स्पष्ट है । सोम ऋततत्त्व है, हृदयशून्य है । हृदयशून्य होने से ही तो इसे ' ऋत ' कहा जाता है । जब हृदय नहीं, तो सत्यभाव नहीं । सत्य नहीं, तो तद्विकासरूप बल नहीं | क्योंकि स्त्री में इस ऋत सोमतत्त्व की ही प्रधानता है, अतएब इसे " अबला " कहा जायगा । पुरुष बलवान, एवं स्त्री अत्रला । पुरुष सत्यभावपित एवं स्त्री अनृतभावोपेता ( अर्थान् ऋतसोमभावोपेता ) | पुरुष आग्नेय, एवं स्त्री सौम्या । पुरुष भोक्ता, एवं स्त्री भोग्य । पुरुष प्रतिष्ठा, एवं स्त्री तदाधारेण प्रतिष्ठिता । पुरुष आलम्बन, एवं स्त्री श्रालम्बिता । पुरुष स्वच्छन्दस्क, एवं स्त्री परच्छन्दानुवर्त्तिनी ( पुरुषछन्दानुवर्त्तिनी ) । अग्रिरूप अग्नि से युक्त पुरुष अग्रेसर, एवं सोम-युक्ता स्त्री तनपचाद्गामिनी । यह तो हुई ऐसी दृष्टियाँ, जिन से पुरुष की प्रधानता सिद्ध हो रही है, एवं स्त्री की गौणता । ६६३
पृष्ठ 730
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वितीयाय प्रथमत्राह्मण शतपथब्राह्मण अत्र उस दृष्टि से विचार कीजिए, जिस से स्वस्वरूप से ' अबला ' होते हुए भी स्त्रीवर्गने उपास्यदेवता की महती प्रतिष्ठा प्राप्त करली है । अग्नि बलवान है, इस में तो कोई भी सन्देह नहीं सोम अमल है, यह भी निर्विवाद है । अग्नि सत्य है, सोम ऋत है, यह भी मान लिया गया परन्तु सूक्ष्मदृष्टि से विचार करने पर हमें विदित होगा कि, जिस सोम को हम " अचल ' कहते हैं, वह अन्त: - वाह्य चलघन ही है । एवं जिस अग्नि को हम बलवान् कहते हैं, वह निर्बल ही है । अन्तर्वलवत्ता ही वास्तविक बलवत्ता है, और यही सौम्या स्त्री का स्वरूप है । दिवंशवता हो अग्निंचल है, जो कि तत्त्वतः ' अवल ' ही है । ऐसी स्थिति में निर्बल को ( पुरुष को बलवान कहना, बलवान् की स्त्री की अबला कहना, एक बसा ही आश्चर्य है, जैसे कि सामान्य मनुष्यों का स्त्री को पुरुष कहना एवं पुरुष को स्त्री कहना बल की परिभाषा है - सकोन, एवं निर्बल की परिभाषा है - विकास । एक स्थान पर प्रति-तिन रहकर इधर उधर विसस्त दोपड़ना हीं तो विकास है, 9 और इस अस्थिरभाव को दी तो ' निवल ' कहा जाता है । एक स्थान पर प्रतिष्ठित रहना ही संकोच है । यही संकोच बल की साज्ञान प्रतिमा है । देखिए न! निर्बल मनुष्य हाथ ' फैला ' देता है, उधर बलवान् मनुष्य सदा ' बद्धमुनि ' ही बना रहता है । दीली धोती, ढीली कमर, हाथ खुले हुए, ये सब धर्म निर्बलता के ही द्योतक हैं । वीर बलवान् योद्धाओं की कमर कसी रहती है । मुट्ठी बाँध कर वे प्रहार के लिए ही सन्नद्ध रहते हैं । शरीरपर्व यदि संकुचित हैं, दृढावयव हैं, तो शरीर सबल है । एवं श्लथ शरीर निर्बल है । संयत - वाणी सत्रला है, एवं स्खलित वाणी निर्बला है । इह्री कुछ एक निदर्शों से यह माना जासकता है कि, संकोच बल की परिभाग है, एवं विकास निर्बल की परिभाषा है । न विकास है, तो सोम संसोचधर्म्मा है । और इसी दृष्टि से हम कह सकते हैं कि, अग्नि निर्बल है, एवं सोम बलघन है । अब बतलाइए! अग्नि प्रधान पुरुष एवं सोमप्रधाना स्त्री, दोनों में किसका स्थान ऊँचा रहा? । यदि ऐसा है, तो स्त्री को ' अबला ' क्यों कहा गया?, प्रश्न का उत्तर ' असत ' शब्द है | प्राण ‘ सत् ’ है, परन्तु " सामान्य सामान्याभात्रः " इस परिभाषा के अनुसार प्राण में क्योंकि ' प्राण ' नहीं रहता, अतएव सधन भी प्राण को ' असत् ' कह दिया जाता है - ( देखिए शत ० ६ | १ | १ | १ | ) | मोमवलपन है । यल स्वयं बलवान कैसे हो सकता है? जिसमें यल रहता है, वही तो बलवान् होता है । इसीलिए बलघन सोम को ' अबला ' कहा गया है । चलघनात्मक इस अवल सोम को लेकर ही विकास अग्नि बलवान् बनने में समर्थ हुआ है । जिस दिन बलाभिमानी अग्नि से बलात्मक सोम का आत्यन्तिक निष्काशन होजाता है साथ ही सोमागमन अवरुद्ध हो जाता है, उसी दगा अग्नि अपने शिवभाव को छोड़ता हुआ विशुद्ध रूद्ररूप में परिणत होकर उत्क्रान्त ही होजाता है । पाठक प्रश्न करेंगे कि, प्रश्न था स्त्रीस्वातन्त्र्य का, और यह शिव रुद्र - भाव बीच में हीं कहाँ से समा-विष्ट होपड़ा? उत्तर में उनके सम्मुख शिव - शक्ति का तात्विक स्वरूप ही रखना पड़ेगा " अग्निर्वा रुद्रः " शतः [ ५३ | १० | ] के अनुसार अग्नितत्त्व को ही ' रुद्र ' माना गया है । साथ ही यह भी विज्ञानं सिद्ध विषय है कि, विश्वसंहार के एकमात्र अधिष्ठाता रुद्रदेवता ही हैं । ये रुद्र जबतक शक्ति के साथ समागम ६६४