Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 731–740
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 731–740
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तृतीयश्रध्याय प्रथमत्रा प्रथमकाण्ड नहीं करते, वचतक रोते ही रहते हैं । इसी आधार पर ब्रह्मन्थों में ' रुद्र ' शब्द का " सोऽरोदीन, तद्रु-इम्य रुद्रस्वम " ( वह रोया, यही रुद्र का रुद्रत्व है, अर्थात रोने से ही उसका नाम रुद्र हुआ है ) -( देखिए शत ० ६ १।२११ ) यह निर्वाचन हुआ है । रुद्र रोगा क्यों है, इसका बड़ा ही सुन्दर उत्तर देते हुए तिने कहा है कि, रुद्र अग्निमूर्ति था । अग्नि स्वभाव से ही अन्नाद ( अन्न खाने वाला ) होता है जबतक इसे अन्न मिलता रहता है, तो इसका स्वरूप सुरक्षित रहता है परन्तु अन्नावरोच पर स्वरूपनाश की आशङ्का से वह रोने लगता है । माता के गर्भ में मास पर्यन्त प्रतिष्ठित रहने वाला चिल्याग्निपिण्डरूर शिशु नहीं रोता । क्योंकि उस अवस्था में उसे मातृनाल के द्वारा अन्नरस मिलता रहता है । परन्तु नियत अवधि के अनन्तर एक्यामरुन, के धक्के से गर्भाशय से बाहिर निकल कर भूमष्ठ होते ही चालक रोने लगता है । सम्पूर्ण इन्द्रियदेवता काँप उठते हैं । वे अपनी चेष्टा रूप कृति से माता आदि को अन्नादुति के लिए बाध्य करते हैं शिशुमुख में गुड़ मधु आदि के रस का सिञ्चन होता है । तत्काल रुद्रदेवता शान्त होजाते हैं । ( देखिए शत ० ६ | १ | १-१० ) । यही अवस्था आधिदैविक रुद्र की सम भए 1 आविक रुद्र स्वयं तो रोए ही, परन्तु इन अ श्र से उन्होंनें एक ऐसी भयानक वस्तु उत्पन्न करदी, जिसके कुचक्र में पड़ जाने से बड़े बड़े धीर पुरुष भी रो पड़ते हैं, रोते रहते हैं, मारे मारे फिरते हैं, शान्ति नहीं मिलती । वह वस्तु है - " रजत ” – ( चाँदी - रुपय्या-सा ) । यदिक - विज्ञान - सिद्धान्तानुसार रुद्राग्नि की द्रुत व्यवस्था से ही चाँदी उत्पन्न हुई है । चाँदी रुद्र-देवता के साक्षात् अश्रु हैं । इसीलिए बर्हि में रजत दक्षिणा देने का निषेध हुआ है । रुद्राश्रु रूप रजत-लक्षण इन धातुखण्डोंनें किसे नहीं रुलाया?, यह स्पष्ट है । हाँ, तो यह सिद्ध होगया कि, रुद्रदेवता साक्षात् अग्नि हैं । एवं इनके इस रोदन को दूर करने का एकमात्र उपाय है- इह्न सोमाहुति प्रदान करना | इस सौम्या शान्तवमा सोमाहुति से रुद्र का घोरभाव विलीन होजाता है, तत्स्थाने व शिवातनू का उदय होजाता है । सोमसहकार से रुद्र अपनी रुद्रता छोड़ते हुए शिवस्वरूप में परिणत होजाते हैं । * मान लीजिए, रुद्र को सोमाहुति न मिले. तो क्या परिणाम होगा? परिणाम होगा यही कि, रोते रोते रुद्राग्नि अपना स्वरूप तो लो बैटेंगे, और बन जायेंगे विशुद्ध सोम अग्नि की उत्कान्नि चरम सीमा पर पहुँच कर सोमरूप में हीं परिणत होजाती है अग्नि का प्रधान स्थान केन्द्र है । केन्द्र से चारों ओर अग्नि विशकलित होता रहता है । जबतक सोमाहुति होती रहती है, तबतक तो यह विशकलनधर्म्म अग्नि के मूल-रूप पर कोई आपात नहीं कर पाता । परन्तु आहुति [ अँट होजाने से विशवलन की चरमावस्था में पहुँ-तेही प्रतिष्ठा उखड़ जायगी । फैलते फैलते फैलाम की चरम सीमा पर पहुँचते ही अग्नि का अग्निस्व नष्ट हो जायगा, सत्यभाव विलीन होजायगा और रह जायगा ऋतरूप सोमभाव | पानी सोम की ही तो अवस्थान्तर है । श्रीर अग्नि हीं तो विकास की चरमसीमा पर पहुँच कर सोम बनता है— " अग्नेरापः " | यदि कोई मनुष्य रोता रहेगा, तो रोते रोते उसका सम्पूर्ण शारीराग्नि पानी बनकर वह जायगा । इधर वत्र अग्नि निःशेष होनायगा, तो शरीर भी टॅदा होजायगा । इसी दृष्टि से यह कहा जाता है कि, अनि अन्न-* शतपथ - प्रथमखण्ड में इस रुद्र विभूति का विशद विवेचन किया जाचुका है । ६.६.५.
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तृतीयअध्याय प्रथमत्राह्मण शतपथब्राह्मणा हुति के अवरोध मे स्वयं चन्न | सोम ] बन जाता है । दूसरी दृष्टि से देखिए कोई मनुष्य भूखा है । यदि अन्नागमन बन्द होजायगा, तो जो शारीराग्नि अबतक अन्नाद था, वही अन्न न जायगा । प्राणाग्नि उत्क्रान्त होनायगा । शिव ' शवान्न ' बन जायगा, और यह अन्न उस श्मशानाग्नि ( व्यादाग्नि ] की तृप्ति का कारगा बनेगा । तत्वतः अग्नि की अन्तिम अवस्था [ सोम न मिलने पर ] सोम ही होजाती है, यह निश्चित है । बलपन मोन को गर्भ में रोता हुआ शून्य को अग्नि बलवान् बनता है, भोला बनता है, यही चलन सोम के अवरोध से स्वयं बलवन बनता हुआ दूसरे बलवानों का अन्न बन जाता है । भोक्ता भोग्य बन जाता है, शासक शासित बन जाता है । उपर्युक्त रुद्राग्नि - विवेचन का निष्कर्ष यही निकला कि, अग्नि की बलवत्ता सोमसम्बन्ध पर ही निर्भर है । सोम चलतन्य है, क्लपन है । इसे लेकर ही अग्निमूर्ति रुद्र साम्ब सदाशिव बने हुए हैं । क्योंकि पुरुष में अग्नितत्व का प्राधान्य है, अतएव पुरुषमात्र को हम " शिव " कह सकते हैं । उधर स्त्री में शक्तिचन सोममन्त्र प्रधान है, अतएव स्त्रीमात्र को हम " शक्ति " कह सकते हैं I शिव - शक्ति के इन व्या-पक अवतारों को लक्ष्य में रखकर ही हमने रुद्र- शिव भात्रों की अत्र प्रासङ्गिक माना है । दृष्टि को छोड़कर पहिले अन्तरष्टि से ही शिवशक्ति का समन्वय कीजिए । पुरुष शिव क्यों है?, इसका उत्तर है - " मोम " । पुरुष श्राग्नेय अवश्य है, परन्तु इसकी प्रतिष्ठा ' सोम ही है । मुक्तान्न की सत्तम अवस्थारूप " शुक्र " [ रेत - वी धातु ] साक्षात् सोम है I और सर्वसिद्धान्तानुसार यह सौम्यशुक्र ही पुरुष का अन्तरात्मा है । पुरुष का भौतिक दृश्य शरीर श्राग्नेय है, एवं अन्तर्जगद्रूप शुक्र सौम्य है । शुक्रक्षय ही पुरुषनाश का कारण है, एवं शुकरा ही स्थिति का कारण है । इसी आधार पर श्रुति का " ब्रह्मचर्ये तपसा देना मृत्युमपाघ्नत ' यह सिद्धान्त प्रतिष्ठित है । इस बलघन सौम्य शुक्र से ही पुरुष बलवान् त्रना रहता है । हाँ, एक रहस्य और । शुक्र सोम है, सोभ बलघन बनता हुआ पूर्वपरिभाषानुसार स्वयं बलप्रयोग में असमर्थ है । अतएव इस वलपन की अवल 1 किंवा निर्बल कहा जाता है । पुरुषजाति का यह दुर्भाग्य है कि, यही सोम ( शुक्र ) पूर्वकथनानुसार पुरुष का अन्तरात्मा है । यही कारण है कि, पुरुष का बाह्यजगत् ( आग्नेय-शरीर ) जहाँ आक्रमण का अनुयायी रहता है, वहाँ इसका अन्तर्जगत् उतना हीं शिथिल रहता है । शरीर बलवान ( आग्नेय ), आत्मा निर्बल ( सौम्य " यही तात्पय्यं है । शुक्र स्वयं निर्जल, इसी का रूपान्तर मन, इसी से संकल्प का उदय । फलतः पुरुष यदि विशेष साधनों के द्वारा शक्ति की उपासना नहीं करता है, तो अधिकांश में इसके संक्रमिया ही होते हैं । जब रम्यभेद ही होने लगा, तो एक रहस्य शेष क्यों छोड़ा जाय । सम्भव है, पुरुष पुरुष के सामुख्य में अपने संकल्प में सफल होमके । परन्तु सौम्पमा पुरुष को इस आग्नेयी शक्ति ( स्त्री ) के साम्मुख्य में तो और भी अधिक दुर्दशा का ही अनुभव करना पड़ता है । स्त्री संग्या है, संकल्प भी शुक्रानुकधी मन से सम्बन्ध त्यता हुआ साम्प है । " नीम और गिलोय चढ़ी " चरितार्थ हो जाता है । बात है मईया स्पष्ट सर्वानुभूत, फिर विशेष विस्फोटन क्यों किया जाय? । ६६६
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तृतीया प्रथमत्र । ह्मण प्रथमकाण्ड उक्त कथन से यह सिद्ध हुआ कि पुरुष का पाचनीतिक शरीरपिण्ड तो आग्नेय है, एवं शरीरपिएड की प्रतिष्ठारूप शुक्र सौम्य है । अग्नि क्योंकि वृषा होने से पुरुष हैं, एवं सोम योषा होने से स्त्री है, इसी आधार पर हम कह सकते हैं कि, स्त्री ही पुरुष की प्रतिष्ठा है । साथ ही यह भी कह लीजिए कि, जिहें हम पुरुष कहते हैं, वे आग्नेय शरीर की अपेक्षा पुरुष होते हुए भी वस्तुतः अन्तःप्रतिष्ठारूप शुक्रमोम की दृष्टि से, आभ्यन्तर दृष्टि से स्त्रियाँ हीं हैं । * " स्त्रियः सतीस्ताँ उ मे पुंस आहुः " ( ऋकसं १ | १६४ । १५ । ) यह श्रुति इसी दृष्टि का स्पष्टीकरण कर रही है । श्रुति का तात्पर्य यही है कि, संसार में जितने भी पुरुष हैं, वे अग्निप्रधान बाह्यशरीर की अपेक्षा से भले ही पुरुष कहलाते हों । परन्तु शुकप्रधाना श्रात्मदृष्टि से तो उन्हें स्त्री ही कहना चाहिए | आत्मा शरीर दोनों में श्रात्मा प्रधान माना जाता है । एवं जिस संस्था में जो प्रधान होता है, " तद्वादन्याय " से वह संस्था उसी के नाम से व्यवहृत होती है । जब कि प्रधानभूता आत्मदृष्ट्या पुरुषसस्था सोया है, तो इसे पुरुष न कह कर ' स्त्री ' ही कहा जायगा परन्तु आश्चर्य है कि ब्रश मनुष्य इन स्त्रियों को पुरुष कह रहे हैं । " पुरुष वास्तव में स्त्री है, स्त्री होते हु ' इहें पुरुष कहा जाता है " इस रहस्य को आँख वाला ही जान सकता है, अन्या नहीं पश्यद्वान्नविचेतदन्धः " । लीजिए, अत्र आज से आप भी अपने आप को ' स्त्री ' समझना आरम्भ कर दीजिए, और स्त्रियों को ' पुरुष ', जैसा कि अनुपद में हीं स्पष्ट होने वाला है । सचमुच श्रुति का उक्त सिद्धान्त पुरुषजाति को क्षुब्ध कर रहा होगा । अवश्य ही इस दोमशान्ति के लिए किसी अन्य उपाय का आश्रय लेना पड़ेगा । निराश होने की कोई बात नहीं है । एक पुरुष के नाते इस सम्बन्ध में आप से अधिक हमें निम्ता है । दो उपाय ऐसे हैं, जिन से पुरुषसंस्था का अग्नितत्त्व प्रधान माना जा सकता है, एव सोमतत्त्व गौरा माना जासकता है । पुरुषों का शरीर आग्नेय है, यह माना । परन्तु इस की प्रतिष्ठा है - यानी " अद्भ्यः पृथिवी इस तैत्तिरीय - सिद्धान्त के अनुसार पृथिवी स्थानीय शरीरपिएड का उपादान अस्य ही है । " ऋते भूमिरियं श्रिता " वचन भी यही सिद्ध कर रहा है । इसी दृष्टि से हम कह सकते हैं कि, आग्नेय शरीर की प्रतिष्ठा अप-तत्ररूप सोम है । इस दृष्टि का तात्पर्य यही है कि, शरीरचिएड में प्रारण - भूत, ये दो विभाग है । दृश्य भाग तो भूत है, एवं भूतप्रतिष्ठारूप अदृश्य तत्त्व प्राण है । इस आग्नेय भूतभोग की प्रतिष्ठा आप- ( साम्य ) प्राण ही है । जिस दिन शरीर से यह प्रतिष्ठा लक्षण अध्याय निष्कान्त होजाता है, शरीर नष्ट होजाता है । प्राणात्मक इसी श्राप्य सोम को ' पवित्र ' " ब्रह्मणस्पति " " अम्भः " आदि नामों से व्यवहृत किया गया है । दर्भ, गङ्गा, सुवर्ण, मृगचर्म्म, आदि की पवित्रता इसी अम्भः ' ' पर अवलम्बित है । अम्भः से ही गाङ्गव [ गङ्गाजल ] में शुचिभावनिवर्तिका पावनशक्ति व्यक्त हुई है । इसी अम्मा के अनुग्रह से दर्भ ( कुशा ) के संसर्ग से आत्मभावना. रश्मिभावना, शुक्रभावना, भेद से इस मन्त्र के तीन अर्थ होते हैं । इन तीनों की विशद व्याख्या ईशभाष्य में देखनी चाहिए । ( ई ० उ ० वि ०, द्वि ० ० ७८ से १०८ पर्यन्त ) | ६६७
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नूनीपध्याय प्रथमत्राहारण शतपथब्राह्मण प्राणजनित दोषभाव पदार्थों में संक्रान्त नहीं दोपाता । इसी अम्मा के समावेश से सुवर्णस्पृष्ट जलजस्वला स्त्री के स्पर्शदीप को हटाने में समर्थ होता है । जबतक यह अम्भ: पानी भूतशरीर की प्रतिष्ठा बना रहता है, तत्रतक शरीर में दूषित कीटाणुओं का समावेश नहीं होने पाता । जिस दिन यह निकल जाता है, शरीर सड़ने लगता है । तततनु में हीं इस ग्रम्भः की मत्ता रहती है । तनतनु ( अग्नितः पशून्य शवशरीर, मुर्दों ) में यह नहीं रहता । पवित्र ग्रम्भोरूप ब्रह्मण-म्पति के इसी स्वरूपधर्म को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है-* पवित्र ते विततं ब्रह्मणस्पते! प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः । तप्ततनूनं तदामो समश्नुते शृतास इद्वहन्तस्तत् समाशत ॥ -कसं ० २०२१ हाँ, तो वास्प कहने का यहीं हुआ कि, ग्राग्नेय भौतिक शरीरपिस्ट की प्रतिष्ठा " पवित्र " नामक यदी श्रायप्राण है । जीवनदशा में भी असदाचरण, मिथ्याभाषण, अगम्यागमन, अभक्ष्याभक्ष्य, अम्पू ~ श्यास्पृश्य आदि धर्म्मविरोधी कम्मों से इस पवित्र श्रयप्राण पर श्राघात होता है । उसी पतनदशा को लक्ष्य में रखकर लोकभाषा में - " अरे! इस का तो पानी उतर गया " यह किवदन्ती प्रचलित है । सिद्ध है कि, पानी भी भूतशरीर की प्रतिष्ठा है । दूसरा है - " सौम्यशुक्र " शुक्र में भी भूत - प्राण, ये दो विभाग हैं । शुक्र का भूतभाग तो अवश्य ही सीम्य है, परन्तु इतका प्रतिष्ठारूप प्राण आग्नेय है । यह एक सामान्य अनुगम है कि, बाह्य घरातल यदि आग्नेय है, तो अन्तर्भाव सोम्य है । यदि चाह्य धरातल सौम्य है, तो अन्तर्भाग आग्नेय है । उदाहरण के लिए एक रात ' रोगी को हो लीजिए उपर का सायं केवल यही है कि भीतर की गर्मी का शरीर में फैल X राजस्थान में यह विज्ञानविधि श्राततक प्रचलित है । यदि कोई बालक रजश्वला स्त्री से स्पर्श कर लेता है, तो सुवर्ण से जल का स्पर्श करा कर उस जल के छींटे दिये जाते हैं । प्रान्तीय भाषा में इहें हीं-" सोनामानी का छाँटा ' ( सुवर्ण हस्ट जल के छींटे ) कहा जाता है । * मनातनधर्मियों के, विशेषतः रामानुज सम्प्रदायभक्तों के हृदयों को कष्ट पहुँचाने का हमारा यत-किञ्चित् भी अभिप्राय नहीं है । परन्तु कहना पड़ता है कि, सम्प्रदाय वेश में पड़कर हमने वेदमन्त्रों के साथ घोर अत्याचार ही किया है । उक्त मन्त्र से तप्त शंख - चक्र लगाने की अवैज्ञानिक, अवैदिक पद्धति प्रचलित है । 1 अर्थ यह किया जाता है कि, जनतक शरीर को तप्त शंख चक्र से दाग नहीं दिया जाता, तबतक शरीर तप्त रहता है । एवं ऐसा तप्ततनु कभी उत्तम गति नहीं प्राप्त कर सकता । क्या ही अच्छा हो, यदि कोई सज्जन इस सम्बन्ध में श्रीतप्रमाण के आधार पर, साथ ही तदनुगता समन्वयात्मिका विज्ञानदृष्टि से यह प्रमाणित करने का अनुग्रह करें कि शरीर के ' डाग ' देने से आत्मा उत्तमगति प्राप्त कर लेता है । डॉ. " अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ", यह दूसरी त है । एवं ' यदेव विद्यया श्रद्धया उपनिषदा करोति, तदेव वीर्य्यवत्तरं भवत ' यह दूसरा तय है । ६६८
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तृतीयध्याय प्रथमब्राह्मण प्रथम कागड नाती है, एवं शरीर का आध्य भाग हृत्स्थान में प्रतिष्ठित होजाता है । इसी से हृत्कम्प [ हृदय का धूजना ] होने लगता है, सर्दी लगने लगती है । यही ज्वर की पूर्वावस्था है । बाहिर गरम हो, भीतर हँढा हो, इसी का नाम ज्वर है । मूलाग्नि का प्रात्यन्तिक उच्छेद नहीं होता । केवल अभिभव है । इसी अभिभव से अग्नि मन्द हो जाता है । तत्सन्निहित जाठराग्नि [ अन्नपरिपाक करने वाला ] भी मन्द होजाता है । ऐसी दशा में [ ज्वर-[ दशा में ] यदि ग्रन्नाहुति दी जायगी, तो मन्द अग्नि उसका परिपाक न कर सकेगा । फलतः वह अतप्त अन्न अग्निमात्रा को ओर भी अधिक निर्बल कर देगा । ज्वर का वेग अधिक बढ़ जायगा । ठीक इसके विपरीत यदि ज्वरावस्था में अन्नाहुति का सर्वथा अवरोध कर दिया जायगा, तो हृद्य मूलाग्नि की स्वाभाविक उत्तेजना से जठराग्नि क्रमशः प्रवृद्ध होजायगा । कालान्तर में वह प्रवृद्ध अग्नि उस वरुणरूप शीतसोम को भी बाहिर क देगा | ज्वर शान्त होजायगा । इसी आधार पर आयुर्वेदने उपवास [ लँघन ] को ही ज्यर की सर्वश्रेष्ठा चिकित्सा मानी है । विना भूख अधिक वाजाने से जाठराग्नि उसका परिपाक नहीं कर सकता । फलतः सोम का वेग बढ़ जाता है, ज्वर होजाता है । इसप्रकार अजीर्ण हीं ज्वर का उत्तेजक बनता है । ज्वर शान्त होने का चिह्न है-“ स्वेद ” । पसीना निकला कि, ज्वर शान्त हुआ । जो पानी हृदय में चला गया था, आज वह शरीर पर गया, शरीर की गम्मीं हृदय में चली गई । शरीरताप मिट गया । इस निदर्शन से सिद्ध है कि, बाहिर यदि गर्मी है, तो भीतर सर्दी । बाहिर यदि सर्दी है, तो भीतर गर्मी । प्रकृतिमण्डल में जब शीत रहता है, तो हमारा शरीर अग्निमय बना रहता है । सर्दी के दिनों में मुख से चाप निकला करते हैं । वहीं जब गर्मी रहती है, तो यहाँ सर्दी का साम्राज्य रहता है । गर्मी के दिनों में शरीर पसीनों से तर रहता है । देखिए न । जो ऊपर से बड़ा सौम्य [ ठँढे स्वभाव का ] दिखलाई पड़ता है, उसका अन्तर्जगत् अत्यन्त ही कठोर आग्नेय ] रहता है । एवं जो प्रत्यक्ष में क्रोधी है, वह भीतर से खोखला रहता है । रुद्रभगवान् बाहिर से महाभयानक हैं, परन्तु भीतर से सर्वथा भोलेचाचा । थोड़े से अनुनय विनय पर वरप्रदान कर देना इनका सहज स्वभाव है । उधर विष्णु भगवान् बाहिर से महाशान्त, सौम्य । परन्तु भीतर से महाकठोर | किसी का क्या सामर्थ्य कि, घोर परीक्षा के बिना इनसे कोई वरदान लेसके । विश्वास किजिए! जो मनुष्य बातों में बड़ा मीठा है, देखने में भोला भाला है, वह भयानक है । एवं जो प्रत्यक्ष में स्पष्टवादी है, देखने में क्रूर है, जिस के शब्द कटु लगते हैं, उसका अन्तर्जगत् निर्मल है । यही खरे खोटेकी अव्यर्थ ' निकपा ' ( कसौटी ) है | इस प्राकृतिक कसौटी के आधार पर ही हमें मानना पड़ेगा कि, यदि शुक्र का बाह्य भूतभाग सौम्य है, तो इसका प्राणभाग अवश्य ही ग्राग्नेय होगा । शुक्र का निर्माण हुआ है धिरूप अन्न से । शारीराग्नि में आहुत अन्न हीं रमासृमांसादि की क्रमधारा से शुक्ररूप में परिणत हुआ है । ओषधियाँ सौम्या हैं | परन्तु इनके गर्भ में अग्नि है । " ओपं [ उप दाहे, दाहस्तापः, तापोग्निः, तं धत्ते " ही ' प्रोपधि ' शब्द का निर्व-चन है । उसी ओषधि का रूपान्तर शुक्र भी अवश्य ही ऐसा होना चाहिए । भूतसौम्यशुक्र की प्रतिष्ठा यही गर्भीभूत आग्नेय प्राण है । शुक्रस्थित इसी श्राग्नेय प्राण को " वृपा " कहा जाता है । यही वृषा शुक्रवर्षण से [ [ रेतःसेक से ] प्रजोत्पत्ति में समर्थ होता है । जिस पुरुष के शुक्र में पाप्राण मूच्छित रहता है, वह प्रजो-त्पत्ति में असमर्थ है । शुक्र प्रजोत्पत्ति का कारण नहीं है, अपितु वृष है । वृपाशून्य पुरुष पढ है, निर्वार्य है । इसी आग्नेय वृषा के सम्बन्ध से पुरुष अपने को अवश्य ही ' स्त्री ' न कह कर ' पुरुष ' कह सकता है । Εξε
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तृतीयश्रध्याय प्रथम ब्राह्मण शतपथब्राह्मण पुरुष में शरीर, वीर शुक्र, दो विभाग हुए । दोनों क्रमश: आग्नेय, एवं सौम्य है । आगे जाकर पुनः प्रक में आग्नेय - सौम्य ये दो दो विभाग हुए । इस दृष्टि से पुरुष का उपक्रम भी अग्निकल्प रहा एवं उपमं हार भी अग्नि ही रहा शरीर शारीरप्राण, शुक्र, शुकरातजाण, चारों क्रमश: आग्नेय, सौम्ब, साम्य, आग्नेय रहे । इधर अग्नि, उधर अग्नि, मध्य में दोनों सोम । अग्नि पुरुष दोनों थोर पुरुष । बतलाइए, पुरुषसंस्था में अग्नितत्त्व की प्रधानता सिद्ध हुई, अथवा सोमतत्त्व की? | इस दृष्टि से हम पुरुष को अवश्य ही अग्निप्रधान मानते हुए ' पुरुष ' ही कहेंगे, और स्त्री [ सोम ] को इस के तन्त्र में प्रतिष्ठित मानते हुए ' परतन्त्र ' ही कहेंगे । १- पुरुषसस्था-( १ ) - १- शरीरम् — अग्नि ( पुरुष ) एवादिः ( २ ) - आयप्राण: - - सोमः ( स्त्री ) - अग्निप्रधानः पुरुषः- ' पुरुषः ' S ( ३ ) - १ - शुक्रम् - - सोमः ( स्त्री ) ( ( ४ ) -२ श्राग्नेयप्रायः अग्निः पुरुषः एवान्तः शुक्रदृष्टि से स्त्रीसंज्ञा का भाजन बनने वाला पुरुष उक्त प्रथम उपाय से ' पुरुष ' बन जाता है । दूसरा उपाय है - सम्वत्सरमण्डल । सम्वत्सर मण्डल से ही तो पुरुष का निर्माण हुआ है । इसलिए तो ' पुरुष ' को ' यज्ञ ' कहा जाता है, जिस यज्ञरहस्य का कि पाठक अगले ब्राह्मण में विशद निरूपण देखेंगे | दृश्य अद्ध खगालात्मक जिस अर्द्ध सम्वत्सर से पुरुष का शरीर बनता है, उस अर्द्ध सम्यत्सर के उत्तर भाग में सोम का, एवं दक्षिण भाग में अग्नि का साम्राज्य बतलाया है । सम्वत्सर का मध्यवृत्त " त्रिष्वत् " है । इस आधे विश्वत् से तो मेरुदण्ड रीट की हड्डी ] का निर्माण हुआ है । विश्वत् से उत्तर के सौम्य सम्वत्सर से शरीर के उत्तर पाश्र्व [ याएँ भाग, का, एवं दक्षिण के आग्नेय सम्वत्सर से दक्षिण पार्श्व [ दहिने भाग ] का निर्माण हुआ है । वर्त्तमान युग का [ कल्पित ] अहिंसावादी शितिवर्ग वृगा अवश्य करेगा परन्तु विज्ञान पथानुगामी की दृष्टि में ऐसी घृणा का कोई महत्त्व नहीं है । एक मनुष्यशन [ मुर्दे ] को अपने सामने रख लीजिए, श्रीर शिवान्तस्थान से प्रारम्भ कर मूलग्रन्थि पन्त ठीक बीच में से उस के दो खण्ड कर डालिए दोनों दक्षि -ग्गोत्तर खण्डों के पर्वों का विराकलन कीजिए, एवं उन विशकलित पर्वों को पृथक् पृथक् रखते जाइए । विश-कलन प्रक्रिया के अनन्तर दोनों के आकार, एवं भार की परस्पर तुलना कीजिए । आापको विदित होगा कि, दक्षिणखण्ड के सभी पर्न प्रायः उत्तरउण्ड के पत्रों से आकार में भी बड़े होंगे एवं भार में भी अधिक होंगे ।
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तृतीय अध्याय प्रथमत्राह्मण प्रथमकाण्ड उत्तर ग्वण्ड के उतर फुफ्फुस, प्लीहा [ तिल्ली ] वृक्क, क्लोम, हस्त, पाद, यादि पर्वो की अपेक्षा दक्षिण खण्ड के दक्षिण कुक्कुस, यकृत् [ जिगर ], वृक्क, क्लोम, हस्त पाद आदि पर्वों के आप आकार, तथा, भार दोनों में प्रवृद्ध देखेंगे । ये प्रवृद्ध क्यों हैं?, इन शरीरावयवों का ऐसा स्वरूप क्यों हुआ? इन सब प्रश्नो का सोपपत्तिक समाधान बड़े विस्तार से आगे के " यज्ञो वै पुरुषः " इत्यादि ब्राह्मण में किया जायगा । प्रकृत में केवल यही जान लेना पर्याप्त होगा कि, शरीर का दक्षिणभाग उत्तरभाग की अपेक्षा आकार - भार से उभयथा समृद्ध रहता है । कारण इसका यही है कि, दक्षिणभाग आग्नेय होने से बलवान् बनता हुआ प्रधान है, एवं वामभाग सौम्य होने से निर्बल बनता हुआ गौण है । स्थूलपर्वों के अतिरिक्त सूक्ष्म - शक्तिदृष्टि से विचार करने पर भी उत्तर की अपेक्षा दक्षिण भाग को ही आप अधिक शक्तिशाली पाएँगे । जो कर्म्मनिपुणता दक्षिण हाथ से सम्भव है, वह वाम से नहीं । उपनिषत् का इन्द्ररूष “ चाक्षुषपुरुष " भी दक्षिणचतु में हीं रहता है । अतएव इसे “ दक्षिणाक्षिपुरुष ” भी कहा जाता है - " योऽयं दक्षिणेऽक्षन पुरुषः " ( वृ ० आ ० ५.।५।४- ) । अपनी दैनिक शरीर चेष्टाओं के अनुभव से भी दक्षिणभाग की प्रधानता वा प्रत्यक्ष कीजिए । गमन-व्यापार में सत्र से पहिले दहिना पैर ही आगे बढ़ता है । आगे की गति में भी दहिने पैर की ही अप्रगामिता रहती है, चलकर अनुभव कर लीजिए । सीधे बैठकर, अथवा खड़े होकर आप यह अनुभव करेंगे कि, शिरोभाग प्रायः वाम पार्श्व की ओर ही बनत ( झुका ) रहता है । दहिनी ओर मस्तक झुकाने में आप क्लेश का अनुभव करेंगे । क्योंकि दक्षिण भाग भारी है, अतः उस ओर प्रवणता रखने में कष्ट होता है । बल - प्रयोग के जितने भी का हैं, सत्र में दक्षिण हाथ ही प्रधान रहता है । इह्रीं सब कारणों को देखते हुए मानना पड़ेगा कि, पुरुष का दक्षिणभागस्थ अग्निभाग ही शरीरसंस्था में बलवान् एवं प्रधान है । उत्तरभाग सौम्य है, सोमप्रधान है । साथ ही यह दक्षिणभाग की अपेक्षा निर्बल, एवं गौण है । दक्षिणभाग जहाँ प्रत्यक्षरूप से विकसित रहता है, वहाँ वामभाग दक्षिण भाग में अन्वित रहता है । जब आप वक्षस्थल से सटाते हुए दोनों बाहू मिलाकर उन पर दृष्टि डालेंगे, तो आपको विदिन होगा कि दहिना बाहु वाम बाहु का आलम्बन बना हुआ है । साथ ही दहिने बाहु का हस्तरूप अग्रभाग बाहिर निकल कर प्रत्यक्ष वन रहा है, एवं वामत्राहु का हस्तरूप प्रभाग दहिने बाहु के मूल में ( कक्षप्रदेश में ) छुप रहा है । सीधे खड़े होने पर दाहिने पैर के आधार पर बायाँ पैर अधिक समय पर्य्यन्त अधर रह सकता है, बाएँ के आधार पर दक्षिण नही । कृष्णभावभङ्गी में दहिने पैर को ही आप श्राश्रयरूप से प्रतिष्ठित देग्वेंगे | वामनेत्र में हीं चाक्षुषपुरुष की पत्नी प्रतिष्ठित रहती है, जोकि " इन्द्रपत्नी " नाम से प्रसिद्ध है - " य उ एव वामनीः, स उ एव भामिनी " के अनुसार इस वामा इन्द्र -- पत्नी को ही भामिनी भी कहा जाता है । इहीं सब कारणों को देखते हुए कहना पड़ेगा कि, वामभागस्थ समभाग इस शरीर संस्था में गौण है । इसी सम्बन्ध में एक गत ओर । श्रग्नि विकासधर्म्मा, एवं सोम संकोच धर्मां बतलाया गया है । पुरुष का दक्षिणभाग अग्निप्रधान होने से ही बिकासवृत्ति का अनुयायी है, एवं वामभाग सोमप्रधानता से ही संकोच वृत्ति का अनुगामी देखा गया है । सीधे पैरों आगे बढ़ने में पहिले पूर्वकथनानुसार दक्षिण पैर ग्रागे चलेगा | यदि आप उलटे पैरों लोटेंगे, तो इसी संकोचभाव के कारण पहिले बायाँ पैर पीछे हटेगा । बैंकने का काम दहिने हाथ से, एवं किसी वस्तु को लेकर चलते समय वह वस्तु रहेगी वाम हाथ में ।
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तृतीय अध्याय प्रथमब्राह्मण शतपथब्राह्मण सोम की दिक उत्तर है, उत्तर ही ऊर्ध्व प्रदेश है । अग्नि की दिक् दक्षिण है, एवं दक्षिण ही अधः प्रदेश माना गया है । साथ ही ऊर्ध्वप्रदेश में रहने वाला सोम अधः प्रदेशस्थ अग्नि को आलम्बन बनाता हुआ ही प्रतिष्ठित रहता है । जब आप प्राकृत बनकर ( जालथी पालथी मारकर ) बैटेंगे, तो इस स्थिति का स्पष्टी-करण हो जायगा । इस मुद्रा में दहिना पैर नीचे ( श्रालम्बन रूप से ) रहेगा । वाम पैर दहिने के आधार पर प्रतिष्ठित रहेगा । साथ ही दक्षिण पैर का अग्रभाग प्रत्यक्ष रहेगा, एवं वाम पैर का अग्रभाग दक्षिण पैर में गर्मीभूत रहेगा । जबकि पुरुष शरीर के दोनों भागों में अग्नि की प्रधानता है, और अग्नितत्व ही नत्र पुरुष है, तो स्त्री - पुरुष, दोनों भावों के रहते हुए भी हम पुरुष को स्त्री न कह कर पुरुष ही कहेंगे । इसप्रकार शुक्राधार-भूत उपक्रम - स्थानीय श्राग्नेय प्राण की, भूताग्निरूप उपसंहारस्थानीय शरीर की प्रधानता से, दक्षिण पार्श्वस्थ अग्नि की प्रधानता से 9 इन दोनों उपायों से पुरुष का पुरुषस्व सुरक्षित रह जाता है । रुद्राग्नि से सम्बन्ध रखने वाले वृषातत्त्व का, एवं तत्प्रधान पुरुषवर्ग का विवेचन समाप्त हुआ । अत्र उम्र शक्तिघन सोमतत्त्व का अन्तर्दृष्टि से विचार कीजिए, जो कि गोपातत्त्व का, एवं तत्प्रधान स्त्रीवर्ग का आलम्बन बना हुआ है, जो कि शक्तिजन, जतश्व ' अशक्ति ' शब्दवाच्य सोमतत्व पुरुष को शिव बना देता है । पूर्व में यह कहा गया है कि, यदि रुद्राग्नि में सोम की आहुति न हुई, तो वे कालान्तर में सोमरूप स्त्रीभाव में परिणत होजायेंगे । अग्नि विकास की चरमसीमा पर पहुँच कर सोम बन जायगा । ठीक यही परिस्थिति सोम के सम्बन्ध में समझिए । सोम की स्वरूपरक्षा तभीतक है, जबतक कि उस का अग्नि के साथ सम्बन्ध है | जैसे अग्नि का प्रधान स्थान केन्द्र है, एवमेव सोम का व्याप्तिस्थान प्रधि ( परिधि ) भाग ही माना गया है । परिधि में रहने वाला संकोचधर्म्मा सोम क्रम क्रमशः केन्द्र की ओर आता रहता है । जबतक इसका अग्नि के साथ सम्बन्ध होता रहता है, तो इसका संकोच समतुलित रहता है परन्तु अग्निविरह से यह संकोच की चरम सीमा पर पहुँच कर विस्फोटन का कारण बनता हुआ अग्निरूप में हीं परिणत होजाता है । जैसे विकास का अन्तिम परिणाम संकोच है, अग्नि का अन्तिम परिणाम संधा है, एममेय संकोच का अन्तिम परिणाम विकास है, तो सोम का अन्तिम परिणाम अग्नि है । आग्नेयी - ऋतु ( श्रीमऋतु गम्मी ) विकास की चरम सीमा पर पहुँच कर जैसे सौम्य ऋतु वर्षा और शीतत्त ' ) रूप में परियात होजाती है, एवमेव शीत संकोच की चरमसीमा पर पहुँच कर श्रीध्मर्श का कारण बन जाती है । वलवान् अग्नि का आश्रय लेता हुआ । बजघन जो सोम अपनी स्वरूपरक्षा में समर्थ रहता है, वही इस की उपेक्षा से स्वयं ग्रग्नि बनकर रुद्र बन जाता है, रोने लगता है । भोग्य भोक्ता बन गया, अब भोग्य नहीं । श्रतएव अत्र रोदन आवश्यक । इसी से यह भी सिद्ध होजाता है कि, शिवतत्त्व का विकास अग्नि II एयं सोम के समय पर ही निर्भर है । सोम की उपेक्षा कर अग्नि भी रोता रहेगा एवं अग्नि की उपेक्षा कर सोम भी रोता रहेगा । अग्नीषोमात्मक यज्ञ के उच्छिन्न होते ही रुद्र का अवतार होजायगा, संसार में प्रलय का दृश्य उपस्थित हो जायगा, जिसका कि पूर्वरूप आज हमारे सम्मुख है १००२
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तृतीय अध्याय प्रथमत्राह्मण प्रथमका गड बलवन, अतएव अत्र सोम का स्त्री से सम्बन्ध है । यद्धग्विगोलीय चान्द्रसोम ही स्त्री के स्वरूप सम्पादन का कारण बनता है, अतएव स्त्री को ' सौम्या ' कहा जाता है । इसी सोमभाव की प्रधानता से इसे ' अबला ' कहा जाता है । कहने को अबला अवज्ञा है, किन्तु वास्तव में अबला ' शक्तिपुत्र ' है । कारण स्पष्ट है । स्त्री का शरीर सौम्य है, परन्तु आत्मा श्राग्नेय है । जैसे पुरुष की प्रतिष्ठा शुक्र है, वैसे ही स्त्री की प्रतिष्ठा " शोणित " माना गया है । रक्तवर्ण आग्नेय - मङ्गलग्रह -- प्राण युक्त शोगात साक्षात् श्रग्नि है, एवं यही स्त्री का अन्तर्जगत् है । यही इस का आत्मा ( जीवनीयरस ) है । दूसरे शब्दों में यों समझिए कि, स्त्री का भौतिक दृश्य -- शरीर सौम्य है, एवं अन्तर्जगद्रूप शोणित आग्नेय है । शोणितक्षय ही स्त्री के स्वरूपनाश का कारण है, एवं शोणितरक्षा ही स्थिति का कारण है । इस बलवान शांतिग्नि से ही अचला सौम्या भी स्त्री बलवती ही रहती है । उसी पूर्वरहस्य का समन्वय । शोणित श्रग्नि है, अग्नि बलवान् बनता हुआ पूर्वपरिभावानुसार बल-प्रयोग में समय रहता है । अतएव इसे बलवान्, किंवा सवल ही कहा जायगा । यह भी पुरुषजाति का ही दुर्भाग्य मानना पड़ेगा कि, यही चलवान् श्रग्नि ( शोणित ) पूर्वकथनानुसार स्त्री का अन्तरात्मा बना हुआ है । यही कारण है कि, स्त्री का बाह्यजगत् ( सौम्यशरीर ) जहाँ आक्रमण में असमर्थ है, वहाँ उस का अन्तर्जगत् उतना हीं अधिक उम्र रहता है । शरीर निर्बल ( सौम्य ), श्रात्मा सबल ( आग्नेय ), यही ताल है । शोणित स्वयं चलवान, इसी ( अग्नितत्त्व ) का रूपान्तर मन, दमी में स्थिरभाव का उदय, तदनुगामी मन का संकल्प भी स्थिर, फलतः स्त्री का संकल्प अधिकांश में सफल ही होजाता है । इसी आधार पर इस मातृवंश के लिए - " बुद्धिस्तामां चतुर्गुण । " यह कहा गया है । कौन अभ्युदयेसु बुद्धिरूपिणी इस मातृशक्ति की वन्दना न करेगा -या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थित ॥ नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ( समशती ) सम्भव है, स्त्री स्त्री के साम्मुख्य में सजातीयानुबन्ध के कारण स्त्री का उग्ररूप शान्त रहे! परन्तु दुर्भाग्य का मारा यदि कोई पुरुष स्त्री की प्रतिस्पर्द्धा में खड़ा होजायगा अपने विवेक से, यदि वह इस के मोम्यशरीर के गर्भ में रहने वाले उम्र अग्नितत्व पर आघात कर बैठेगा, तो नारी का स्वरूप इस के सर्व-नाश का ही कारण बन जायगा । कुशल तभीतक है, जबतक कि मातृशक्ति का अन्तर्जगत् जाग्रत नहीं होजाता । सौम्यात्मा - पुरुष अभिनिवेशवश इस अग्नि को जाग्रत कर निश्चयरूप से इस में बहुत ही होजाता है । यह ऐतिहासिक सत्य है कि, जब जब मनुष्य ने मुर्खतावश नारी के अन्तस्तल पर आक्रमण करने की कुचेष्टा की है, तत्र तच ही उसे सर्वनाश का रसस्वादन करना पड़ा है । और तो और, जगच्चक्र का सञ्चालन करने वाले, त्रैलोक्यविजयी अग्नि, वायु, इन्द्र, देवताओं तक को इसी हैमवती उमा के सम्मुख पराम्त होना पड़ा है । द्रौपदी के अपमान का प्रायश्चित्त भारतवर्ष आजतक नहीं कर सका है । और अतिशय खेद, महा कष्ट, महा लजा, महा अविवेक का विषय है कि, भारतीय पुरुषवर्ग आज पुनः उसी भूल का अनुगमन कर रहे हैं । कोई आश्चर्य नहीं. इसी भूलसुधार के लिए सुधार में मियों की ओर से अवैज्ञानिक, अप्राकृतिक, १००३
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तृतीयश्रध्याय प्रथम ब्राह्मण शतपथब्राह्मण श्रतएव रोगवर्द्धक ' स्त्रीस्वातन्त्र्यवाद ' का जन्म हुआ हो, और जिस के परिशोध के लिए ही हमें इस प्रकृतिसिद्ध तथ्य- समन्वय का आश्रय लेना पड़ा हो । उक्त ' स्त्रीभाव ' विवेचन से स्पष्ट हुआ कि स्त्री का पाचभौतिक शरीरपिएड तो सौम्य है, एवं शरीर-पिण्ड की प्रतिष्ठा रूप शोणित आग्नेय है । सोम योषा होने से स्त्री है, एवं अग्नि ऋषा होने से पुरुष है । क्योंकि सोमरूप स्त्री शरीर की प्रतिष्ठा ग्रग्निरूप शोणित है, अतएव हम कह सकते हैं कि, पुरुष ( अग्नि- शोणित ) ही स्त्री की प्रतिष्ठा है । इसी आधार पर यह भी कह लीजिए कि, जिह्रे ' हम ' स्त्री ' कहते हैं, वे सौम्य शरीर की दृष्टि से भले ही मन्त्रयाँ " हों, परन्तु ग्रन्तः प्रतिष्ठारूप शोणिताग्नि की अपेक्षा से, आत्मदृष्टि से तो उहें ' पुरुष ' ही कहा जायगा । एक पक्षपात की बात | पुरुष आत्मदृष्टया स्त्री है । परन्तु जनसाधारण इन स्त्रियों को पुरुष ही कहते हैं । इसप्रकार " स्त्रियः सतीस्ताँ उ मे पुंस आहु. " इत्यादि रूप से श्रु तिने पुरुषों को स्पष्ट शब्दों में श्री ' कहकर पुरुषजाति का तो अपमान कर डाला न्यायाप्त बात तो यह थी कि जैसे बेदम ने पुरुषजाति का " अरे! २६ पुरुष कौन कहता है, ये तो स्त्रियाँ है ' इसप्रकार अपमान कर डाला, वैसे ही " पुरुषाः सन्तस्ते उ मे स्त्रिय आहुः " ( इन पुरुषो को स्त्री कहा जाता है ) स्त्री के सम्बन्ध में भी यह कहते । परन्तु नहीं कहा । कहते भी क्यों, जब कि वे पुरुष के निर्बल आत्मा एवं श्री के सबल आत्मा से परिचित थे । पुरुष अपमान सहन कर सकता है, किन्तु स्त्री नहीं । जब कि प्रधानभृता श्रात्मदृष्टि से स्त्रीसंग्या आग्नेयी है, तो इसे ' स्त्री ' न कहकर ' पुरुष ' ही कहा जायगा । हाँ, तो आज से श्रीमात्र अपने यारको पुरुष समझना प्रारम्भ कर दे । अपना बाना कि से बुरा लगता है । यदि पुरुषजाति स्त्री की उपाधि के तुच्छ होसकती है, और इसी क्षोभ की शान्ति के लिए यदि वह ( पूर्वप्रदर्शित दो उपाय निकाल लेती हैं, तो स्त्रीजाति भी पुरुषोपाधि से क्यों शान्त होने लगी है । अवश्य ही उनकी स्वरूप - रक्षा के लिए भी कोई न कोई उपाय निकालना ही पड़ेगा । स्त्रियों का शरीर सौम्य, एवं आत्मरूप शोणित श्राग्नेय, यह तो ठीक है । और इसी दृष्टि से स्त्रियाँ पुरुष पहला भी सकती है । परन्तु निरूपिता पुरुपसंस्था की परिभाषा के अनुसार स्त्री के सीम्यशरीर, एवं आग्नेय शोणित, दोनों के भूत - प्रास भेद से दो दो विभाग है । सीम्य दृश्वशरीर भूतभाग है, इसका आधार प्राण आग्नेय है । प्रत्यक्षप्रमाण यही है कि, पुरुषशरीर अग्नि की कृपा से वर्कश होता हुआ भी हीनची रहता है । जरासी मोड़ तोड़ से अस्थिग्रन्थियाँ ( जोड़ ) खुल जाती हैं । कारण यही है कि, इसका शरीर यद्यपि आग्नेय होने से सबल है, परन्तु इसका मूलप्राण ग्राम्य ( सौम्य ) है । सोम निर्बल है । अतएव यह प्रबल श्राघात से पुरुषशरीर को नहीं बचा सकता । इधर स्त्री का शरीर सोमानुग्रह से कोमल होता हुआ भी वीर्य्ययुक्त है । असाधारण व्याघातों को छोड़कर स्त्रीशरीर साधारण व्याघातों की उपेक्षा ही कर देता है । कारण, इसका शरीर यद्यवि सोम्य होने से निर्बल है, किन्तु इसका मूलाया आग्नेय है । अग्नि बलवान है । यह आयात मे स्त्रीशरीर को बचा लेता है । इस शरीर प्रतिष्टा की दृष्टि से स्त्री अपने ग्राम्यन्तररूप मे ' आग्नेयी ' बनती हुई पुरुष ही कह-लाएगी ।