Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 741–750

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 741–750

पृष्ठ 741

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तृतीय अध्याय प्रथमत्राह्मण प्रथम काण्ड शोणित का भूतभाग अवश्य ही आग्नेय है । परन्तु शोणित के गर्भ में रहने वाला प्रारा सौम्य है । इसी सौम्यप्राण को " बघा " कहा जाता है । पुरुष के सौम्य शुक्र के गर्भ में रहने वाले ग्राग्नेय वृत्राप्राण का जब स्त्री के आग्नेय शोणित के गर्भमें रहने वाले सौम्य योषाप्राण के साथ मिथुनसम्बन्ध होता है, तभी प्रजोत्पत्ति होती है । इसीसे यह भी स्पष्ट होजाता है कि, पुरुष का दूषित शुक्र सन्तान का प्रतिबन्धक है, एब स्त्री का दूषित शोणित सन्तानका प्रतिबन्धक है । दोनों की ( शुक्र शोणित की ) शुद्धि मे ही तद्गत वृषा योश प्राण शुद्ध रहेंगे, एवं इन विशुद्ध रजो त्रीयों के मिथुन से ही प्रजातन्तु सुरक्षित रहेगा । सौम्य शुक्र में रहने वाला श्राग्नेव प्राण ही " पुम्भ्रा " है । एवं आग्नेय शांणित में रहने वाला सौम्य प्राण ही " स्त्रीभ्रूण ” है । पुम्भ्रण का पोषक शुक्र है । फलतः शुक्र जितना अधिक प्रवृद्ध होगा, पुम्भ्रूण उतना हीं अधिक बलिष्ट होगा । स्त्रीभ्रूण का पोषक शोणित है । फलतः शोणित जितना प्रवृद्ध होगा, स्त्रीभ्रूण उतना हीं अधिक बलिष्ठ होगा । पुम्भ्र गग पुरुष है, श्राग्नेय है । इसकी समृद्धि एकमात्र शुक्रसमृद्धि पर ही अवलम्बित है । शुक्र सौम्य होने से स्त्री हैं । इस सौम्या स्त्री की समृद्धि अभ्युत्थान, अभ्युदय ही पुरुष की समृद्धि, अभ्युत्थान, अभ्युदय का अन्यतम कारगा है । उधरस् त्रीभ्रूण स्त्री है, सौम्य है । इसकी समृद्धि एकमात्र शोणित की समृद्धि पर ही अवलम्बित है । शोणित श्राग्नेय होने से पुरुष है । न्त्री की समृद्धि, अभ्युत्थान, अभ्युदय पुरुष की समृद्धि, अभ्युत्थान, अभ्युदय पर ही अवलम्बित है । यही दाम्पत्यभाव का मौलिक रहस्य है । यही अर्द्धनारीश्वर का समृद्ध वैभव है, और यही वैभय विश्वशान्ति की मूल प्रतिष्ठा है । जिस समय पुम्भ्रूण स्त्री गों का मिथुनभाव होता है, उस समय दोनों में संघर्ष चलता है । जो प्रबल होता है, वह दूसरे का निगरो कर उसे अपने रूप में परिणत कर लेता है । मान लीजिए, पुम्भ्र निर्बल है, एवं स्त्रीभ्र सबल । स्त्री [ जो कि सौम्य होने से स्त्रीसृष्टि का प्रवतक है ] पुम्भ्रण को आत्म-सात् कर लेता है । फलतः ऐसे स्त्रीभ्र एप्रधान मिधुनभाय से कन्यासन्तति होती है । यदि पुम्भ्रूण सत्रल है, तो टीक इसके विपरीत उक्त प्रक्रिया से पुत्र सन्तति होती है । शुक्रप्रवृद्धि में पुम्भ्रूण की वृद्धि है, एवं शोणितप्रवृद्धि में स्त्रीभ्रूण की वृद्धि है । शुक्रममृद्धि पुम्भ्रूण की समद्धि का कारण बनेगी, इच्छा सफल होगी । यदि दोनों सम हैं तो दोनों के ही चिह्न शेष रहते हैं । वही नपुंसकमृष्टि है । यदि दोनों में से एक का भी भ्रण मूच्छित है, तो दाम्पत्यभाव व्यर्थ ही सिद्ध होता है— १ - आधिक्ये रेतसः पुंसः कन्यास्यादार्त्तवाधिके । नपुंसकं तयोः साम्ये, यथेच्छा पारमेश्वरी ॥ ( भावप्रकाश ) । २ - पुनान् पुंसोऽधिके शुके, स्त्रीभवत्यधिके स्त्रियाः । समेऽपुमान्, पुत्रियौ वा क्षीणेऽल्पे च विपर्य्यः । ( मनुः ३ । ४६ ) । उक्त स्त्रीस्वरूप से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि, स्त्रीसंस्था के शरीर, आत्मा, ये दोनों विभाग क्रमशः सौम्ब, एवं आग्नेय हैं । आागेजाकर पुनः प्रत्येक के सौम्य, आग्नेय ये दो विभाग हुए । इस दृष्टि से स्त्री का उपक्रम भी सोमतत्त्व रहा, उपसंहार भी सोम ही रहा । शरीर, शारीरप्राण - शोणित, शोणित-१००५

पृष्ठ 742

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तृतीय अध्याय प्रथम ब्राह्मण शतपथब्राह्मण गतप्राण, क्रमशः सौम्य आग्नेय- आग्नेय - सौम्य रहे । इधर सोम, उधर सोम, मध्य में दोनों अग्नि । सोम ही स्त्री, दोनों ओर स्त्री बतलाए, स्त्री संस्था में सोमतस्व की प्रधानता सिद्ध हुई, अथवा अग्नि की है । इसी दृष्टि से हम स्त्री को अवश्य ही सोमप्रधाना मानते हुए " स्त्री " ही कहेंगे, और पुरुष [ अ ि ] को इस तन्त्र में प्रतिष्टित मानते हुए परतन्त्र ही कहेंगे । २- स्त्रीसंस्था--{ ( १ ) - १ - शरीरम् — सोमः ( स्त्री ) - २ य एवादिः ( २ ) - २ - श्राग्नेयप्राणः - श्रग्निः ( पुरुषः ) ( ३ ) -१ शोणितम् अग्निः ( पुरुष ) -- सोमप्रधाना स्त्री- " स्त्री " ( ४ ) - २ - सौम्यप्राणः - सोमः ( स्त्री ) - स एवान्तः पुरुष का अपना तन्त्र अग्नि है, एवं स्त्री का अपना तन्त्र सोम है । इस अपने अपने तन्त्र में प्रतिष्टित पुरुष और स्त्री अपने अपने प्रातिश्विक स्वरूप से " स्वतन्त्र " हैं । इस दृष्टि से न पुरुष परतन्त्र है, न स्त्री परतन्त्र है । यदि परतन्त्र हैं भी, तो दोनों हीं । मध्यभाग ग्रात्मा कहलाता है, और यही मध्य-भाग जीवन की प्रतिष्ठा माना गया है । श्राग्नेय पुरुष का मध्यभाग सोमद्वयी है, सोमतत्त्व स्त्री है, यही आग्नेय पुरुष की प्रतिष्ठा है । अग्निपुरुष की अपेक्षा यह सोमतन्त्र इसका अपना तन्त्र न होकर परतन्त्र है । पुरुष का अग्नितन्त्र इस परलक्षण सोमतन्त्र के आधार पर ही प्रतिष्ठित है । अतः उपक्रमोपसंहारस्थानीय अग्नितन्त्र की अपेक्षा से जहाँ पुरुष को ' स्वतन्त्र ' ( स्वः - अग्निस्तन्त्रः स्वरूपो बस्य ) कहा जायगा, वहाँ मध्य स्थानीय सोमतन्त्र की अपेक्षा से इसी पुरुष की " परतन्त्र " ( परः सोमस्तन्त्रः प्रतिष्ठा यस्य ) ही कहा जायगा । -सौम्या स्त्री का मध्यभाग अग्निद्वयी है, अग्नितत्व पुरुष है, यहीं सौम्या स्त्री की प्रतिष्ठा है । सौम्या स्त्री की अपेक्षा यह अति इसका अपना तन्त्र न होकर ' परतन्त्र ' है स्त्री का सोमतन्त्र इस ' पर ' लक्षण अग्नितन्त्र के आधार पर ही प्रतिष्ठित है अनन उपक्रमोपसंहारथानीय सोमतन्त्र की अपेक्षा से जहाँ स्त्री को “ स्वतन्त्र ” ( स्त्रः– सोमस्तन्त्रः स्त्ररूपो यस्य ) कहा जायगा, वहाँ मध्य- स्थानीय श्रग्नितन्त्र की अपेक्षा से इसी स्त्री को " बरतन्त्र " ( पर: - अग्निन्त्रः प्रतिष्ठा यस्य भी कहा जायगा यहाँतक तो जो स्थान पुरुष का होगा, वही स्त्री का रहेगा । यदि पुरुष अपनी संस्था में स्वतन्त्र है, तो स्त्री भी अपनी संस्था में स्व-तन्त्र है । यदि स्त्री को मध्यदृष्टि से परतन्त्र कहा जायगा, तो मध्यदृष्टि से पुरुष भी परतन्त्र ही माना जायगा । अपने अपने धरातल पर प्रतिष्ठित रहते हुए दोनों वर्ग सनातन विश्व के सनातन मित्र " ही माने जायँगे । दो मित्रों में कौन छोटा, कौन बड़ा । समानशीलव्यसन ही मैत्री का उच्च आदर्श माना गया है । और इसी आदर्श को भारतीय महर्षियोन सर्वश्रेष्ठ आदर्श माना है— ' सहधर्म्म चरताम " रूप से । १००६

पृष्ठ 743

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तृतीय अध्याय प्रथमब्राह्मण प्रथमकाण्ड बिना इस समानधर्माचरण के इस दोनों यात्रियों की यात्रा नीरस होजाती है, विनोदशून्य रहजाती हैं, यातायाम बन जाती है | यह भी निश्चित है कि, इस ' स्त्र - तन्त्र ' की दृष्टि से ' स्त्री - पुरुष के सम्बन्ध में कौन स्वतन्त्र है, कौन परतन्त्र? इस प्रश्न का भी कोई महत्त्व नहीं है । क्योंकि इस दृष्टि से दोनों को अपनी अपनी आग्नेयी, सौम्या- संस्था में रहते हुए अग्नि - सोमानुचन्धी धर्मों के अनुगमन करने का पूर्ण स्वा-तन्त्र्य प्राप्त है | वर्त्तमान युग का समानविकार यदि इस दृष्टि से स्त्रीसमानाधिकार का, किंवा स्त्रीस्वा तन्त्र्य का पक्षपाती है, तो ऋषि उसका आदर करते हैं । कौन वैज्ञानिक यह न चाहेगा कि, पुरुष अपनी अग्निसंस्था के अनुकूल स्वतन्त्र रहे, एवं स्त्री अपनी सोमसंस्था के अनुकूल स्वतन्त्र रहे । हाँ श्राग्नेय पुरुष का सौम्या स्त्रीसंस्था की ओर झुकना, एवं सौम्या स्त्री का आग्नेयी पुरुषसंस्था की ओर झुकना अवश्य ही प्रत्येक वैज्ञानिक की दृष्टि में लाभ के स्थान में हानि का ही कारण सिद्ध होगा । यदि स्त्रीसमानाधिकार के पक्ष पातियों के समानाधिकार का पुरुष अपनी अग्निसंस्था के आधार पर जो कुछ कर सकता है, करने का अधिकार रखता है, एक मौम्या स्त्री भी वह सब कुछ कर सकती है, करने का अधिकार रख सकती है । एवमेव स्त्री अपनी सोमसंस्था के आधार पर जो कुछ कर सकती है, करने का अधि-कार रखती है, एक आग्नेय पुरुष भी वह सब कुछ कर सकता है, करने का अधिकार रखता है " यह तात्पर्य है, तो कहना पड़ेगा कि अभी वे प्रकृति के गुप्त रहस्यों से, स्त्री - पुरुष के वास्तविक स्वरूप - ज्ञान से, उनकी प्राकृतिक योग्यता से सर्वथा अपरिचित ही हैं । दोनों के जिन नियत अधिकारों को, एवं अधिकारमूला विषमताओं को प्रकृति ने अपने हाथ में रक्खा है, वे अधिकार तो त्रिकाल में भी इन समानाधिकार पक्षपातियों से नहीं बदले जासकते । वृषापुरुष ही रेतः सेक का अधिकार रखता है, वृषा पुरुष ही श्मश्रु का जन्मसिद्ध अधिकार रखता है, वृषापुरुष के शरीर का जैमा संघटन है, जैसी रचना है, जो ऐन्द्रियक विभाग है, वही इस अधिकार, संघटन, रचना, विभाग का अन्यतम अधिकारी है । एवमेव योषा स्त्री का रेतो ग्रह्णाधिकार, श्मश्रु का जन्मतः अभाव, शरीर वा संगठन, गर्भाधान, आदि जो वैयक्तिक अधिकार हैं, पुरुषजाति स्वप्न में भी इनकी कल्पना भी तो नहीं करसकती । दूसरी अधिकारमूला विषमता वह है, जिसका आविष्कार महर्षियोनें प्रकृतिमूलक इन दोनों के विश्रम-स्वरूपों के आधार पर किया है स्वतन्त्रप्रज्ञ मानवसमाज इन आविष्कृत विषमताओं की व्यवस्था में अवश्य ही हस्तक्षेप कर सकता है । परन्तु यह निश्चित है कि, इस हस्तक्षेप से दोनों का उपकार न होकर अपकार ही होता है । समता, किवा समानाधिकार जीवनसत्तोषयिक आहारनिद्रादि कुछ एक परिगणित व्यवस्थाओं में हीं मान्य है । इस दृष्टि से स्त्री पुरुष तो क्या, संसार के प्राणिमात्र समान अधिकार रखते हैं । परन्तु जिस मौलिक प्राकृतिक ने इन समानाधिकारियों को " अयं मनुष्यः - इयं स्त्री - अयं बालः - अयं पशुः " इत्यादिरूपा विषमताओं में, विशेषभावों में परिणत कर रक्खा है, उन विशेपधम्मों का एकमात्र अधिकार तत्तद्विशेष प्राणियों में हीं प्रतिष्ठित माना जायगा । और विशेषम्वरूप संरक्षक इन विशेषधम्मों को समानाधिकार मय्यादा से युक्त करना उन समानाधिकारियों का उन्मतप्रलाप ही माना जायगा । साथ ही इस दृष्टि से प्रचलित वर्त्तमानयुग का स्त्रीस्वातन्त्र्यवाद भी प्रलाप के अतिरिक्त और किसी पुरस्कार का पात्र नहीं समझा जायगा । १००७

पृष्ठ 744

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तृतीय अध्याय प्रथमब्राह्मण शतपथब्राह्मगा में " कौन स्व संस्थानुगत स्वातन्त्र्य, पारतन्त्र्य के सम्बन्ध जैसाकि अनुपद में ही बतलाया गया है, स्व - । इस प्रश्न का आरम्भ तब होता है, जब कि ही नहीं उठाया जासकता स्वतन्त्र, स्वतन्त्र, कौन परतन्त्र है " १, यह प्रश्न करने के लिए प्रस्तुत होते है । स्त्री - पुरुष परतन्त्र रहें, अथवा हम स्त्री - पुरुष के दाम्पत्यभाव का विचार दाम्पत्यभाव से सम्बन्ध नहीं रखता । मित्र रहें, अथवा ओर कुछ, यह तटस्थ सम्बन्ध न स्त्रीसृष्टि का उदय सम्भव है, न पुरुषसृष्टि साथ ही यह भी निर्विवाद है कि, बिना दाम्पत्यमात्र है, के तो हमे मानना पढ़ेगा कि, स्त्री - पुरुष की स्वत-का । जबकि दाम्पत्यभाव ही स्त्रीपुरुससृष्टि का मूलकारण , अतएव ) मान्य निर्णय कहा जायगा, जो कि दाम्पत्यभाव का न्त्रता परतन्त्रता का वही निर्णय ( विज्ञानसिद्ध कि, दाम्पत्यभावकाल में स्त्री - पुरुष, दोनों में जो जिस तन्त्र अनुगामी रहेगा । दूसरे शब्दों में यों कह लीजिए उन प्रजात्मक स्त्री - पुरुषों का भी वही तन्त्र माना जायगा, फिर का अनुगामी होगा, दाम्पत्यभाव के फलस्वरूप वह तन्त्र स्व हो, अथवा पर । कर्ता का कि कर्म प्रक्रिया में स्वतन्त्र * रहेगा । उस कर्म का स्वतन्त्र कर्त्ता वही माना जायगा बात है, । जो प्रजोत्पत्ति एक फल है । इस फल का साधक कर्म्म पति-कर्म्म सफल हो, अथवा निष्फल, यह दूसरी । दाम्पत्यकर्म्म ही प्रजोत्पत्ति का मूलकारण है । यद्यपि यह ठीक है कि, पत्नी का दाम्पत्यभाव ( मिथुनभाव ) है है । इसीलिए " दम्पती " शब्द से पति - पत्नी दोनों का ग्रहण इस कर्म्म में दोनों का ही सहयोग अपेक्षित पति ही माना जायगा । दाम्पत्यकर्म की प्राथमिक प्रेरणा पुरुष होता भी है । तथापि इस कर्म का स्वतन्त्र कर्त्ता, न स्त्रीपुरूपमनु " यह सार्वजनीन प्रत्यय है । की ओर से ही होती है × । “ पुरुष एव स्त्रियमनुधावति । कामजनित कम्पनात्मक क्षोभ ही रेत को रेतोवर्षण से ही शुक्रगत आग्नेय प्राण वृषा वृषा कहलाया को ' वृषाकपि है ': भी कहा गया है । इस प्रथमप्र रणा स्वस्थान से च्युत करता है, अतएव इस दाम्पत्यकर्म वर्ष का स्वतन्त्र कर्त्ता कहेंगे । वृषा स्वतन्त्र है, तो के कारण हम वृषाप्रधान पुरुष को ही इस दाम्पत्य से उत्पन्न पुरुषसन्तान वृथाप्रधान बनती हुई स्वतन्त्र योगा का पारतन्त्र्य स्वतः सिद्ध है । फलतः इस जायगी । एक दृष्टि । मानी जायगी, एवं कन्यासन्तान परतन्त्र कही अपने आक्रमण में प्रधान रहेगा, वही प्रधान माना दूसरी दृष्टि से विचार कीजिए । दो प्रतिद्वन्द्वियों उसी में जो का माना जायगा । पुरुष आग्नेय है, एवं स्त्री सौम्या जायगा, उसे ही ' भ्वतन्त्र ' कहा जायगा, एवं विजय स्थान् ( दीक्षितः ) । * " स्वतन्त्रः कर्त्ता " ' ( पा ० सू ० ) " क्रियायां स्वातन्त्र्येण विवक्षितोऽर्थः कर्त्ता [ अनुधावति ], तस्यां X [ १ ] ' पश्चाद्वै परीत्य वृषा ( पुरुषः ) योषामधिद्रवति रेतः सिञ्चति ” [ शत ० २।४।४।२३ । ] । [ शत ०३।२।१।२० ] | [ २ ] " तस्मादु स्त्री पुसोपमन्त्रिता निपलाशमिचैव दिवैवाग्रे वदति ऽसूयति ' ' ” [ शत ०३।२।१ । १६ । ] | [ ३ ] “ तस्मादु स्त्री पु'सोपमन्त्रिता - आर का " [ गो ० ब्रा ० उ ०६॥२ ॥ ] ।

- " तद्यत् कम्पयमानो रेतो वर्षात, तस्माद् वृषाकपिः १००८

पृष्ठ 745

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तृतीय अध्याय प्रथमत्राह्मण प्रथमकाण्ड है | अन्नान्नाभाव के कारण दोनों हीं प्रतिद्वन्द्वी हैं । इन प्रतिद्वन्द्रियों के पूर्वपरिभाषानुसार यद्यपि चार युग्म मानने चाहिए, परन्तु पुरुषशरीर का आधारभूत आय प्राण पुरुषशरीर में, एवं स्त्री का आधारभूत आग्नेय प्राण स्त्रीशरीर में हीं अन्तभूत मान लिया जाता है, अतः चार के स्थान में तीन हीं युग्म रह जाते हैं, जैसा कि परिलेख से स्पष्ट हो जाता है-पुरुष - विचर्च स्त्री - विव १ - आग्नेयशरीरम् ( अग्निः पुरुषः ) १ – सौम्यं शरीरम् ( सोम: -स्त्री ) - १ - द्वन्द्व २ - आग्नेयप्राण: ( अग्निः - पुरुषः ) - २ - द्वन्द्व १ - - आग्नेयं शोणितम् ( अग्नि: -पुरुषः ) - ३ · दन्ड २ – सौम्यप्राणः ( सोमः स्त्री ) ४ – दन्द्व , २ - आप्यप्राणः ( सोमः स्त्री ) १ – सौम्यं शुक्रम् ( सोमः - स्त्री ) – आग्नेयप्राण: ( अग्निः पुरुषः ) १ - आग्नेयं पुरुषशरीरम् ( पुरुषः ) २. सौम्यं स्त्रीशरीरम् ( स्त्री ) प्रतिद्वन्द्विनौ ( प्रथमद्वन्द्वः ) । १ - श्राप्यमाण: ( पुरुषशरीर प्रतिष्ठा ) - स्त्री २ २ - आग्नेयप्राणः ( स्त्रीशरीरप्रतिष्ठा ) पुरुषः -प्रतिद्वन्द्विनौ ( द्वितीयद्वन्द्वः ) । ३—१ - सौम्यं शुकं ( पुरुषप्रतिष्ठा ) -स्त्री ४-२-- आग्नेयं शोणितं ( स्त्रीप्रतिष्ठा ) - परूपः ( प्रतिद्वन्द्विनौ ( तृतीयद्वन्द्वः ) | १ - आग्नेयप्राणः ( वृषा ) - पुरुषः ) ( २- सौम्य प्राणः ( योपा ) - स्त्री प्रतिद्वन्द्विनौ ( चतुर्थद्वन्द्वः ) । 4 १००६

पृष्ठ 746

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तृतीय अध्याय प्रथम ब्राह्मण शतपथब्राह्मण १ – १ – आप्यप्राणगर्भित माग्नेयं शरीरम् ( मोमाग्निमयं पुरुशरीरम् पुरुषः प्रतिद्वन्द्विनौ २ - आग्नेयप्राणगर्भितं सौम्यं शरीरम् ( अग्नीषोममयं स्त्रीशरीरम् स्त्री ( ( १ द्वन्द्वः ) १ –सौम्यं शुक्र म् स्त्री २ – २ – अग्निं शोणितम् - पुरुषः प्रतिद्वन्द्विन ( द्वितीययुग्मः ) । १. आग्नेयो वृपा- पुरुषः ) । ३ – २ -- सौम्या योपा -- स्त्री प्रतिद्वन्द्विनौ तृतीययुग्मः आगे बढ़ता है?, आगे बढ़ने पूर्वतालिका में प्रदर्शित तीनों प्रतिद्वन्द्रियों में से होता कौनसा है?, द्वन्द्व एवं सर्वप्रथम अन्त में किस के आक्रमण की प्रधानता वाले उस द्वन्द्व में किस की ओर से पहिले आक्रमण मूलाधार दम्पती के स्थूलशरीर हैं । गुरुवशरीर रहती है?, पहिले यही देखिए । दाम्पत्यभावोपक्रम का कर रहा है, इसका तात्पर्य हुग्रा पुरुषमा स्त्री-आग्नेय है, स्त्रीशरीर सोम्य है । अग्नि सोम पर आक्रमण की ही प्रधानता है । इस प्रथमाक्रम के अनन्तर भाव पर आक्रमण कर रहा है । इस आक्रमण में गुरुभाव । सौम्यशुक्र आग्नेय - शोखित पर आक्रमण कर रहा है । पुरुष के शुक्र का स्त्री के शांति में सेक होता है है । इस आक्रमण में स्त्रीभाव की प्रधानता है । शुक्रशोणि-अर्थात् स्त्रीतत्त्व पुरुषतत्त्व पर श्रीक्रमा कर रहा में रहने वाले आग्नेयप्राणमूर्ति ' वृपा ' का आग्नेय शोणित में तरूप इस दूसरे द्वन्द्वभाव के अनन्तर सौम्य शुक्र है । पुरुषभाव का स्त्रीभाव पर आक्रमण होता रहने वाली सौम्यप्राणमयी ' योगा ' पर आक्रमण होता पुरुषभाव की प्रधानता है, एवं यही यन्तिमाक्रमण है । यही तीसरा, किंवा अन्तिम क्रमश है । से इसमें समन्वित करता है । त्रियुग्मात्मक दाम्पत्यकर्म्म को प्रजोत्पत्ति- फलरूप की प्रधानता, केवल मध्य में तीनों में से आदि में पुरुषाक्रमण की प्रधानता, अन्त में पुरुषाक्रमण इसीलिए हम पुरुष को स्वतन्त्र, कर्त्ता, ( दोनों ओर के पुरुषभावों से परतन्त्र बने हुए ), स्त्री कर्त्तानुगामिनी का आक्रमण, । अतएव गांग कहते हैं । अतएव प्रधान कहते हैं, एवं स्त्री को परतन्त्र मे स्वतन्त्र है । परन्तु स्त्री का यह जैसाकि पूर्व में कहा गया है, पुरुषवत् स्त्री भी पर अपनी ' तन्त्र सोमसंस्था को अपना रक्षक बना लेगी । श्रार्त्रमहर्षि स्त्री स्वातन्त्र्य तभी सुरक्षित रह सकेगा, जबकि वह किसी चाहते ' वे केवल यही हैं कि, उनकी स्वतन्त्रसंस्था सोमप्रधान की स्वतन्त्रता का अपहरण नहीं करते । पेतु उहें अपने इस अप्रतिष्ठित स्वातन्त्र्य का उपयोग होने से ऋत बनती हुई अन्त है, प्रतिष्ठाशून्य है । चाहिए अतः । ' न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ' वाक्य इसी भाव किसी प्रतिष्ठित सत्य को आधार बना कर ही करना है ' यह कभी नहीं कहा है । कहते भी कैसे, जबकि को व्यक्त कर रहा है । धम्मचान्याने ' स्त्री परतन्त्र है । उक्त आदेशवचन का तात्पर्य केवल पुरुषों की भाँति स्वतन्त्रता स्त्रियों का भी जन्मसिद्ध अधिकार १०१०

पृष्ठ 747

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तृतीयध्याय प्रथमब्राह्मण प्रथमकाण्ड इतना हीं है कि- स्त्री स्वतन्त्र रहने योग्य नहीं है ' । अर्थात् स्त्री को अपनी स्वतन्त्रताका उपयोग स्वयं न कर किसी अन्य के आश्रय में हीं इसका उपयोग करना चाहिए । यदि किसी गृहस्थ में स्त्री अपने स्वातन्त्र्य का उपयोग करने लगेगी, तो वह संस्था उच्छिन्न होजायेगी । बक्षवेशधारी धर्मराज के - ' कौनमा घर नष्ट हो जाता है? ' यह प्रश्न करने पर वम्र्मावतार युविष्टिर ने भी ' स्त्री पुचच्च तद्धि गेहूं बिन-टम ' * ( महाभारत ) ‘ जहाँ स्त्री पुरुष बन जाती है, वह घर नष्ट है ' यह उत्तर देते हुए उक्त सिद्धान्त का ही समर्थन किया है । सम्पूर्ण सम्वत्सर- मण्डल की दृष्टि से जत्र तत्प्रतिरूप दम्पती का विचार किया जाता है, तब भी पुरुष की स्वतन्त्रता, एवं स्त्री की परतन्त्रता ही सिद्ध होती है । सम्वत्सरीय खगोल के सौर दृश्य खगोल से [ खगोल से ] पुरुषमृष्टि का एवं चान्द्र अदृश्य खगोल से L | आधे स्वगोल से ] स्त्रीसृष्टि का विकास हुआ है, और इस दृष्टि से दोनों अपनी अपनी संस्था की अपेक्षा से स्वतन्त्र भी माने जासकते हैं । परन्तु दोनों की समष्टिरूप सम्बत्सर स्वयं अग्निमूर्ति है । यद्यपि अग्निमूर्ति सम्वत्सर के गर्भ में अग्नरूष पुरुष एवं सोमरूपिणी स्त्री दोनों तत्त्व प्रतिष्ठित हैं । अतएव सम्वत्सर को अग्नि के साथ साथ सोममय भी कहा जासकता है, जैसा कि - " सम्वत्सरो वै सोमो राजा " [ ०७/१० ] - 1. सम्बत्सरो वै सोमः पितृमान " [ तै ० ब्रा ० श ६८२ ) इत्यादि श्रुतियों से स्पष्ट है । तथापि सम्वत्सर का मौलिक रूप अग्नि ही माना जायगा । इस मौलिक अग्नि को अग्नि न कह कर " यजुः पुरुष " ही कहा गया है । [ देखिए शत ० १० ५२ १ ] । यही " तस्य वा एतस्याग्नेर्वागेोपनिपत् " के अनुसार " वाक् " नाम से प्रसिद्ध है । आरम्भ में अग्निमूर्ति वाक् प्रजापति एकाकी ही थे । ये ही आगे जाकर सृ कामना से ग्रूप पुरुष एवं सोमरूप स्त्री, इन दो रूपों में परिणत हुए हैं- “ अर्द्धन पुरुषोऽभवत, अर्द्धन नारी " [ मनुः ] | स्वयं श्रुति ने भी -- “ सोऽपोऽ-सृजत वाच एत्र लोकात, चागेव साऽसृज्यत " [ शत ० ६ | १ | १२ | ७ | ] कहते हुए बागग्नि को ही आप्य--सोम का उत्पादक माना है इह्रीं सच प्रमाणों के आधार पर हम वाङ्मय, किंवा वाक्प्रचान सम्वत्सरप्रजापति को ' अग्निप्रधान ' ही कह सकते हैं । यही आत्मा है । इसी की सर्वत्र व्याप्त है । सम्वत्सर की अग्निप्रधानता निम्न लिखित वचनों से स्पष्ट प्रमाणित होजाती है-* अनायका विनश्यन्ति, नश्यन्ति बहुनायकाः । स्त्रीनायका विनश्यन्ति, नश्यन्ति बालनायकाः ॥ - प्रसिद्धा सूक्ति: " जिस संस्थाओं में कोई सञ्चालक नहीं होता, अथवा अनेक सञ्चालक होजाते हैं, अथवा स्त्री सञ्चालिका बन जाती है, अथवा बच्चे सञ्चालक बन जाते हैं, वे संस्थाएँ कालान्तर में नष्ट ही होजाती हैं " । महाभारतीय वचन के उक्त तथ्य के आधार पर ही राजस्थानी भाषा ( जयपुर की भाषा ) में यह किंवदन्ती प्रसिद्ध है कि " जीं घर में लुगायाँ पागड़ो बँधा लेछ, ॐ घर को अहिन ही आजाय छ " अर्थात् - जिल गृहसंस्था में लोक- सामाजिकी व्यवस्थाओं में स्त्री का अनुशासन प्रमुख बन जाता है, वह गृहस्थसंस्था लोक-सामाजिकी मर्यादाओं की दृष्टि से भी, एवं गृहस्थव्यवस्था की दृष्टि से भी कालान्तर में विनष्ट ही होजाती है ” ( स्त्रीपुत्रच्च तद्धि गेहं विनष्टम् ) । १०११

पृष्ठ 748

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 748 का मूल पृष्ठ
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द्वितीयचच्याय प्रथम ब्राह्मण शतपथब्राहाण १ – “ सर्व वै सम्वत्सरः " ( शतः १२६ | १ | १६ | ) । २ - " सम्वत्सर एवाग्निः " ( शत ० १० | ४ | ५ | २ | ) | | ) | ३ – “ सम्वत्सरो वै पिता वैश्वानरः प्रजापतिः " ( शतः १।५।१।१६ ) | ४– “ वाक्सम्वत्सरः ” ( ताण्ड्य ० १०।१२।२७ | । ५ - - अग्निः सम्बत्सरः " ( ताण्डय ० १७ / १३।१७ । ) पुरुष हैं, एवं गौणभाग ही सौम्या स्त्री सम्वत्सर वागग्निमूर्त्ति है, इस का अपना प्रधान भाग ही आग्नेय अन्नाद है, एवं सोम अन्न है, इस दृष्टि से भी है । इस दृष्टि से भी पुरुष ही स्वतन्त्र माना जायगा । अग्नि है, सोम ऋत बनता हुआ अमृत है । इस पुरुष का प्राधान्य, एवं स्वातन्त्र्य सिद्ध होता है । अग्नि सत्य, उत्तरपाश्वस्थ सोम निरृत है । इस पुरुष-भीपुरुष ही प्रधान है । दक्षिणपार्श्वस्थ अग्नि बलवान ही है सिद्ध होरहा है । दृष्टि से भी पुरुष का वीर्यशालित्व, एवं स्त्री का अवीर्य्यव में परतन्त्रता, स्वतन्त्रता - भावी इह्रीं सत्र प्रकृतिसिद्ध कारणों के आधार पर स्त्री - पुरुष के सम्बन्ध गया?, स्त्री को सामाजिक, का समावेश हुआ है । स्त्री को दायविभाग की अधिकारिणी क्यों नहीं माना नहीं मिला?, उन की बाल - युवा - वृद्धा-राजनैतिक एवं धार्मिक व्यवहारों में पुरुष की भाँति पूर्ण स्वातन्त्र्य क्यों का एकमात्र समाधान अग्नि, वस्थाओं में क्यों पिता-- पति पुत्रों की अर्गला लगाई गई?, इन सत्र , अतएव प्रश्नों परिवर्तनशील मानने वाले सुधा-सोम, की उक्त मौलिक व्याख्या ही है । स्मृतिशास्त्र को सामयिक केवल स्मृतिकारों की ही कल्पना है । अपरिवर्त्त -रकबन्धु समझते होंगे कि, स्त्रियों के सम्बन्ध में ऐसे विधान उन्हें यह विश्वास दिलाते हैं कि, ये सम्पूर्ण नीय वेदशास्त्र का इन से कोई सम्बन्ध नहीं है । परन्तु हम ही हैं । विस्तारभय से प्रकृत में वे सत्र विधान श्रुतिसम्मत, अतएव सर्वथा वैज्ञानिक, अतएव च कुछ प्रामाणिक एक निदर्शन ही सन्तोष के लिए पर्याप्त मान श्रौत प्रमाण उद्धत नहीं बि.ए. जासकते । उदाहरणरूप से लिए नायँगे । ८ " १०१२

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 749 का मूल पृष्ठ
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तृतीय अध्याय रुपसृष्टि: - आग्नेयी पुरुषः-१ - " पुरुषो ऽग्निः " - श ० १०१४ | १ | ६ | - तां ० ३ | ४ | ३ | तिवैतत् कत्तम् ” - ० ११२२५१४ | शतवीर्य्यः ” ४ - " पुरुषः - तै ० प्रा ० ३८/१५ | ५- " द्विप्रतिष्ठः पुरुषः ” —गोः पू ० ४।२४ । वृषा-१ - “ इन्द्रो वै वृषा " - शत ० १ | ४ | १ | २३ | २– “ वृषा हिङ्कारः ” गो ० पू ० ३।२३ | ३ - " वृषा रेतः सिञ्चति ” ८ - शत ० २ | ४ | ४ | १३ । ४ – दक्षिणतो वै वृषा योषामुपशेते ” -शत ० ६ | ३ | १।३० । ५ - " समग्निरिध्यते वृषा " - श ० १ | ४ | ११२६ । प्रथमारा ड प्रथम ब्राह्मण स्त्रीसृष्टिः- सौम्या सम्वत्सरः स्त्री-१ -- “ उत्तरत आयतना स्त्री " - श ० | ८ ४ | ४ | ११ | -- शत ० १४।१।१।३१ | स्त्रीषु " --श ० १२/७/२/११ ४ -- " वीर्या वै स्त्री " - श ० २ | ५ | २२३६ । ५ - " पतयो व स्त्रियै प्रतिष्ठा " -श ० ६।२।१४ । योग-१-- " योषा सिनीवाली " - ० ६ | ५ | १ | १० । २ " पुरन्धिर्योपा " - तै ० ३१३२ । ३ - " योषा रेतो धत्त " — श ० ७ | १ | १ | ४४ । ४- " योपा ने पत्नी " -- ० १ ३ | १ | १० । ५- ' न योषा कञ्चन हिनस्ति " - श ० ६ | ३ | १ | ३६ | १०१३ २ - " एतावान् पुरुषः, यदात्मा - प्रजा - जाया " २ -- " अनृतं स्त्री ” ३- ' यद्वै पुरुषवान् कर्म्म चिकीर्षति, शक्नो - ३- ' कर्म्म वा इन्द्रियं वीयं तदेतदुत्सन्न --

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 750 का मूल पृष्ठ
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तृतीयअध्याय यग्नि: -१ - यो वै रुद्रः सोऽग्निः " - श ० ५ | २ | ४ | १३ | २- " वी वा अग्निः ” - RIGIRIRI ३- “ पुरुषो वा अग्निः ” ४ " वपाग्निः " - शत ० २११/११४ ॥ ५- " अग्निर्वैरेतोधा " -तै ०१७ / २३ । प्रथमब्राह्मण सोमः-१- " श्री सोमः " - श ० ४ १ ३ ६ । २ -- “ पशवो हि सोमः " शतपथब्राह्मग - शत ० १२/७/२/२ । ३ - भद्रा तत् सोमः " - ऐ: ५।२५ । ४ - " योषा वा आपः " - सोमः श ० २ | १ | १ | ४ | ५ - " तिरो अहन्या हि सोमाः " — कौ ० १८५ | अन्नादः-१-- अन्नादोऽग्निः ” - शत ० २११०४०६ । अन्नम् -१- अन्न पशवः " नोड ४१६ | २-- " अन्नमु श्रीः ” - 3181818 + - श ० ८ | ६ | २ | १ | २- अग्निनैं देवानामन्नादः " ३ -- ‘ अग्निरन्नादोऽन्नपतिः ” - ते २५ | ७ | ३ | ४- अग्निमन्नादं वेद श्रन्नादो देव भवति " -शः राग राश ४ ५ - " अन्नादा तदग्निः " ऐ ० ५०५१ ३. " श्रिया स्त्रियं ( समदधात् ) — गो ० पू ० ११३४ | ४ न सोमः - शत ० ३६१ | - कौ ० १३।७ । ५- परममन्नाद्य यत् सोमः " 2074