Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 751–760

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 751–760

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यतीतायय दक्षिणादिक्-१. दक्षिणामारोह - ग्रीष्म ऋतु: " - श ० ५ | ४ | १ | २४ | २ -- " दक्षिणैव सर्वम् " - गो ० पृ ० ५१५ । ३ -- " अग्निना दक्षिणाम् ” ऐ ० १७ । ४- दक्षिणादिक - इन्द्रो देवता " -तै ० १० ३।११।५।१ । ५- ' दक्षिणा दिशि रुद्रा देवाः " - ऐ ० १४ । प्रथमकाण्ड प्रथम ब्राह्मण उत्तरादिक-१ - उत्तरा ह नैं सोमो राजा " ऐ ० शक | २ -- ‘ “ एषा नै वरुणस्य दिक् ’ - तै ० ३८ | २० | ४ | ३ -- " यदुत्तरतो वासि, सोमो राजाभृतो वासि " – जै ० उ ० ३ | २१ | २ | ४-- ' ' एषा उ नै शान्ता दिक् ” —-तै ० २ | १ | ३ | ५ | ५ -- एषा हि दिक् स्विष्टकृतः ” - श ० २।३।१।२३ । उक्त कुछ एक वचनों की अवधानपूर्वक देखने से विज्ञ पाठक अनुभव करेंगे कि, स्त्री और पुरुष, के स्वरूप निर्माण में एक बहुत बड़ा अनन्तर है । और वही अन्तर दोनों के प्राकृतिक स्वरूपों को एकधारा में प्रवाहित नहीं होने देता । अग्निप्रधान पुरुष जहाँ अपने स्वाभाविक विकास के कारण संकोच भाव से दूर रहता है, वहाँ सोमप्रधाना स्त्री का संकोच स्वाभाविक धर्म न जाता है । संकोच को मूल में रखने वाले लज्जा, शील आदि सद्गुण हीं स्त्री के स्वरूप - रक्षक बनते हैं । अपने इह्रीं स्वाभाविक गुणों के बल से स्त्री पुरुष की सामयिक उद्दण्डता का शमन किया करती है । समीकरणमूला शान्ति का मूल है - दो विरोधी शक्तियों का एकत्र समन्वय । यदि पुरुष की भाँति स्त्री भी आग्नेयी बन जायगी, तो विस्फोटन हो जायगा । यदि पुरुष सौम्य, एवं स्त्री आग्नेयी बन जायगी, तो संस्था उच्छिन्न होजायगी । अग्नि - सोम ( उग्रता - शान्ति ) का समन्वय ही दाम्पत्यजीवन की शान्ति, तुष्टि, पुष्टि का अन्यतम कारण है । स्त्री तभी अपने सौम्यरूप में प्रतिष्ठित रह सकती है, जबकि उसकी रक्षा का भार पुरुष के कन्धों पर रहता है । ' पर'-( पुरुषतन्त्र ) तन्त्र को अपना रक्षक बना कर ही स्त्री अपने स्वरूपभूत सौम्यतन्त्र को सुरक्षित रख सकती है । जिस स्वतन्त्रता, परतन्त्रता के सम्बन्ध में इतना विस्तार किया गया, उसके सम्बन्ध में अभी यह विदित न होसका कि, तत्त्वतः स्त्री का स्वातन्त्र्य क्या है, और उसकी परतन्त्रता क्या है? | उस परतन्त्रता का क्या स्वरूप है, जो स्त्री का स्वरूप दूषित कर देती है?, शास्त्रकार किन अंशों में स्त्री को परतन्त्र देखना चाहते हैं? । " स्त्री को सर्वथा अशिक्षित रक्खा जाय, पुरुष अपने किसी धार्मिक, सामाजिक, राजनै-तिक कार्य में स्त्री का परामर्श न ले । स्त्री को घर से बाहर न निकलने दे । स्त्री सदा अपने

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तृतीय अध्याय प्रथमब्राह्मण शतपथब्राह्मण मुको गुण्ठन ( चूँघट ) से ढँका रक्खे । पति, श्वसुर देवर आदि की आज्ञाओं का पालन करने में कभी पीछे न हटे । यदि स्त्री इन अनुशासनों में कभी भूल कर दे, तो पुरुष बरा पूर्वक उसे मारे, पाटे, जैसा चाहे, दण्ड दे " याद स्त्रीपारतन्त्र्य का यही अर्थ है, अथवा शास्त्रीय पारतन्त्र्य का यही अर्थ समझा जा रहा है, तो हमें कहना पड़ेगा कि ऐसी परतन्त्रता का शास्त्र में तो कहीं गन्ध भी नहीं है । साथ ही— “ स्त्री अपने कौटुम्बिक - धर्म्म की, सन्तानपालन की, गृह्यकम्र्मों की सर्वथा उपेक्षा कर स्कूल कालेजों में पुरुषसमाज के साथ पश्चिमी शिक्षा की अनुगामिनी बनी रहे । सामाजिक, राजनैतिक कार्यो में संलग्न रहे । पुरुष ( पति ) के अनुशासन का कोई मूल्य न समझे । देशा-चार - कुलाचार - धर्माचार की सर्वथा उपेक्षा करती रहे, वेश - भूषा आदि में सथा पश्चिमी देशों का अनुगमन करे । लज्जा - शीलादि का एकान्ततः परित्याग कर निर्लज्ज बनकर पुरुष समाज में अट्टाट्टहास करती रहे | किसी के नियन्त्रण की अणुमात्र भी अपेक्षा न करे । " यदि स्वतन्त्रता का यही अर्थ समझा जारहा है तो, हमें कहना पड़ेगा कि, ऐसी स्वतन्त्रता का भी गन्ध शास्त्र में तो नहीं है । उक्त परतन्त्रा, एवं स्वतन्त्रता दोनों की व्यवहार शैली में यद्यपि भेद है, परन्तु परिणामदृष्टि से दोनों समान हैं । उक्त परतन्त्रता में जहाँ पुरुषों के द्वारा स्त्री ' पशुभाव ' में परिणत हो रही है, वहाँ उक्त स्वतन्त्रता में स्त्री स्वयं अपनी इच्छा से ‘ पशु ' बन रही है । पशुभाव की दृष्टि से दोनों समान हैं । अपनी इच्छा से जो काम किया जाता है, माननीय मन उस पर किसी अन्य का नियन्त्रण सहन नहीं कर सकता । परन्तु जो काम दसरों की इच्छा से विवश होकर किया जाता है, उस में परेच्छा का ही नियन्त्रण सम्भव है । यही परिस्थिति यहाँ सम-झिए । परतन्त्रतामूलक पशुभाव में स्त्री पर पुरुषेच्छा का नियन्त्रण है । यही अनैच्छिक पशुभाव है । अतएव इसका अवरोध होसकता है । परन्तु स्वतन्त्रतामूलक पशुभाव में स्त्री का अपना हीं इच्छा स्वातन्त्र्य है । यह पशुभाव ऐच्छिक है । अतएव इस का सुधार सम्भव नहीं, तो कठिनतम अवश्य है । संस्कृति पर चढ़ े हुए दूषित आवरण को हटाकर संस्कृति को बचा लेना सहज है । परन्तु जिसने आवरण के साथ साथ अपनी मूलसंस्कृति खोकर उसके स्थान में परसंस्कृति प्रतिष्ठित करली, वहाँ आप किस का सुधार करेंगे? | पतित का उद्धार सम्भव है । किन्तु पड़ कर जो चकनाचूर होगया, वहाँ किस का सुधार,, कैसा सुधार, और कहाँ का सुधार? | अपने को सुधारा जासकता है, परन्तु जो अपना न रहकर सबप्रकार से पराया बन गया, उसका सुवार असम्भव है । जबतक हम " हम " बने रहते हैं, तभीतक हमारा सुधार सम्भव है । जत्र हम ' हम ' ही न रहेंगे, तो सुधार किस का होगा? । इह्रीं कुछ एक तुलनाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि, प्रकृत परतन्त्रता, स्वतन्त्रताओं में परतन्त्रता चिकित्स्य है, परन्तु स्वतन्त्रता ( वस्तुतः महापरतन्त्रता ) तो अचिकि स्य [ लाइलाज ] ही है । यही अवस्था उन कुप्रथाओं की समझिए, जिन्हें जातिभोज, ओसरभोज, वालविवाह, कन्या-विक्रय, वरविक्रय, अन्त्यजों के साथ होनेवाला दुर्व्यवहार आदि नामों से व्यवहृत किया जारहा है | इस में कोई सन्देह नहीं कि, ये सभी रूढिवाद विशुद्ध रूढिवाद हैं । यह भी निर्विवाद है कि, इन सब से हम,

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तृतीय अध्याय प्रथम ब्राहागा प्रथमकाण्ड हमारा समाज, हमारा राष्ट्र जी -शीर्ण ही हुआ है । अवश्य ही सुधारप्रेमी सुधारकों का, एवं तत्पथप्रदर्शक सुधारक नेताओं का यह आवश्यकतम कर्त्तव्य होना चाहिए कि, वे इन सब के विरुद्ध आवाज उठ वें । कौन बुद्धिमान इन भीषण प्रथाओं का अनुमोदन करेगा? । अवश्य ही हमारा स्त्रीसमाज सुशिक्षित होना ही चाहिए | उन के साथ होने वाले बर्नर व्यवहारों का नियन्त्रण करना ही चाहिए । बालविवाहादि का समाज सङ्घ-टन के द्वारा अवरोध होना ही चाहिए । और हम समझते हैं, इसी पवित्र उद्देश्य को लेकर कुछ समय से समाज के कुछ एक प्रजाशील व्यक्तियों ने इस सम्बन्ध में आन्दोलन उठाया भी है । इन के इस आन्दोलन का हृदय से अभिनन्दन करते हुए इस सम्बन्ध में उन के सम्मुख बड़े ही प्रणतभाव से गीताचार्य्यं भगवान् बासुदेव कृष्णण की दो सूक्तियाँ उद्धत कर देना भी हम अपना आवश्यक कर्तव्य मान रहे हैं—

१ - न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्म्ममङ्गिनाम् ।

जोपयेत् सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरेत् ॥

२– तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते काका - व्यवस्थितौ ।

ज्ञाच्या शास्त्रविधानोक्त ' कर्म्म कर्त ुमिहार्हसि ॥

७ वर्त्तमानयुग का भारतीय समाज अधिकांश में अशिक्षित है, यह तो सुधारवादी को भी मान्य है । साथ ही उसे यह भी मानना हीं पड़ेगा कि, उसे सुधार इसी प्रशिक्षित समाज का करना है । अत्र यदि हमारे ये सुधारकबन्धु समाज में बुद्धिभेद उत्पन्न कर देते हैं, तो वे सुधार के स्थान में ' बिगाड़ ' के ही कारण बन जाते हैं । रहना इसी समाज में, व्यवहार इसी समाज में सुधार इसी समाज का । फततः सुधारक महानुभावों का यह आवश्यक कर्त्तव्य होजाता है कि, जिस सुधार को लेकर हम आगे बढ़े हैं, देश - काल- पात्र की परिस्थिति के अनुकूल ही वह सुधार पनप सकेगा, अन्यथा नहीं । यदि सुधार लोकसंग्रह का प्रात्यन्तिक विरोधी है, बुद्धिभेद का अधिष्ठान है, तो हमें अपने सुधार को त्रिपकुम्भं पयोमुखम् हीं बनाना पड़ेगा । शताब्दियों का कुसंस्कार एक हेला से हटाने का प्रयास करना बुद्धिमानी नहीं, अपितु महामूर्खता ही सिद्ध होगी । एक आवेदन | बालविवाह बुरा, परन्तु इसके पहले आपको यह अन्वेषण कर लेना पड़ेगा कि, बाल युवा की परिभाषा क्या है? | शीत- ग्रीष्म - प्रधान देशों के लिए इस सम्बन्ध में कौन सी परिभाषा विज्ञानसम्मता है? | यदि आप स्वयं दिव्यदृष्टि रखते हैं, तबतो कुछ कहना ही नहीं हैं । यदि आप की दृष्टि विशुद्ध लौकिक है, तो उस दशा में इन सब विवादों का निर्णय एकमात्र ' शब्द - प्रमाण ' के आधार पर ही करना पड़ेगा - " तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं तें " । दूसरा आवेदन | यदि आपका सुधारवाद इन दोनों आवेदनों की उपेक्षा करके आगे बढ़ रहा है, तो हमें कहना पड़ेगा कि, न यह सुधार हमारा है, न हमारे समाज का है, न राष्ट्र का । अपितु जेसे धर्म्म की ओट में धार्मिक नेता स्वार्थसाधन कर रहे हैं, वैसे ही सुधारकनेता सुधार की ओट में हमारी मूलसंस्कृति को कुच-लने का ही भगीरथ प्रयत्न कर रहे हैं । तुलना कीजिए दोषों, और सुधारों की । १ - स्त्री का प्रशिक्षित रहना सर्वथा अनुचित, किन्तु कालेजों में पश्चिमी - सहशिक्षा इस शिक्षा से भी कहीं भयङ्कर ।

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तृतीय अध्याय प्रथम ब्राह्मण शतपथब्राह्मण २ - पर्दे की प्रथा सर्वथा अशास्त्रीय, किन्तु लज्जा शील- शून्य अट्टाट्टहास इस से भी कहीं भयङ्कर । ३ - बालविवाह बुरा, किन्तु युवतिपरिणय इस से भी कहीं भयङ्कर । ४ - जातिभोजन, सरभोजन ( नुकता ) सर्वथा अहितकर, किन्तु प्रीतिभोज, गॉर्डन पार्टी, टीपार्टी आदि सर्वनाश के ही कारण । ५ - अन्त्यजों के साथ दुर्व्यवहार अमानुषता, किन्तु उनके सम्बन्ध में स्पृश्यास्पृश्य, खाद्याखाद्य का विवेक न रखना दोनों के ही प्रक्रतिसिद्ध वर्णात्मक स्वरूप के सर्वनाश का कारण । ६ - पतियों का सदाचरण सर्वथा ही निन्द्य, अतएव दण्ड्य, किन्तु " तलाक " प्रथा का अनुमोदन संस्कृति के मूलनाश का ही अन्यतम कारण । ७. रूढिवाद सर्वथा ही त्याज्य, किन्तु रूढिवाद के संशोधन के आवेश में मूलसंस्कृति का परित्याग सर्वनाश का ही कारण । ८- सभी सुधार अपेक्षित, किन्तु पश्चिमदेशों की जड़भूतानुगता, अतएव श्रात्मसाध्य-चिता भौतिक जीवनपद्धति की गतानुगतिकता ( नकल करना ) सथा अनपेक्षित । ६- संक्षेपतः सुधार करना प्रत्येक सुधारक का उत्तम कर्म, किन्तु लोकसंग्रह की उपेक्षा करते हुए अपनी स्वार्थलिप्सा के आकर्षण से बुद्धिभेद उत्पन्न करनाज धन्य कम्मे । १०- निष्कर्षतः शब्दप्रमाणैकसार सुधार उपादेय, किन्तु मानस कल्पनैकसार सुधार सर्वथा ही है । " स्त्रियों को पूर्णरूपेण शिक्षित होना हीं चाहिए । यह ध्रुव सत्य है कि नवमापय्यन्त मातृगर्भस्थित बालकके भावी जीवन का अभ्युत्थान - पतन मातृस्वरूप के अभ्युत्थान पतन पर ही अवलम्बित है । पुरुषसमाज की प्रतिष्ठा एकमात्र मातृशक्ति ही है । इस की स्वतन्त्रता, इस का आनन्द, इस की बुद्धि का विकास ही पुरुषसमाज की स्वतन्त्रता, आनन्दादि की मूल प्रतिष्ठा है । " जिस घर में मातृजाति का अपमान होता है, वह घर श्मशान है । कुल का सर्वनाश है । भूति का उच्छेद है, सम्पूर्ण कर्मकलाप निष्कल है " ये हैं उन दकियानूसी? पुरा-गुणपन्थी? भारतीय धर्म्माचायों के सहज उद्गार, जिन्हें बिना देखे सुने ही हमारे सुधारकबन्धु उन पर कलङ्क १०१८

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तृतीय अध्याय प्रथमत्राह्मण प्रथम काण्ड लगाने की भूल किया करते हैं । जिन राजर्षिप्रवर मनु को वे स्त्री पारतन्त्र्य का समर्थक बतलाते हैं, उह्नीं मनु के द्वारा मातृशक्ति के प्रति कैसे आदरभाव अभिव्यक्त हुए है? इस के लिए निम्नलिखित श्लोकों पर ही दृष्टि डालिए!

१ - पितृभिर्भ्रातभिश्रताः पतिभिर्देवरैस्तथा ।

पूज्या भूपयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः ॥

२ - यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।. यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ॥

३ - शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत् कुलम् ।

न शोचन्ति तु ता वर्द्धते तद्धि सर्वदा ॥

४ - जामयो यानि गेहानि शपन्त्य प्रतिपूजिताः ।

तानि कृत्याहतानीव दिनश्यति समन्ततः ॥

५- तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छादनाशनैः ।

भूतिका मैन रैर्नित्यं सत्कारेषूत्सवेषु च ॥

६ - सन्तुष्टों भायया भर्ता, भर्त्रा भार्या तथैव च । III यस्मिन्नव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वें ध्रुवम् ॥ 9- स्त्रियां तु रोचमानायां सर्व तद्रोचते कुलम् । ७-तस्यां त्वचमानायां सर्वमेत्र न रोचते । - मनुः - ३।५५-५६-५७ ५८-५६-६०-६२ । ८- प्रजनार्थ महाभागाः पूजार्हा गृहदीप्तयः । स्त्रियः श्रियश्च गेहेषु न विशेषोऽस्ति कश्चन ॥ ( मनुः ६।२६ । ) । ε- अपत्य ं धर्मकार्याणि शुश्रूषा रतिरुत्तम । । दाराधीनस्तथा स्वर्गः पितृ यामात्मनश्च ह ॥ ( ६ । २८ । ) । जिसे हमारे सुधारक महाभागांनें स्त्री की परतन्त्रता मान रखा है, वह पारतन्त्र्य तो वास्तव में उनका स्वातन्त्र्य ही है । किसी व्यक्ति पर कटुशासन करते हुए उसे ऐसे नियन्त्रण में रखना, जिस से कि उसका स्वाभा-विक विकास अवरुद्ध होजाय, वही नियन्त्रण ' परतन्त्रता ' कहलाएगा । ठीक इस के विपरीत जो नियन्त्रण मधुर-शासन से युक्त है, जिस नियन्त्रण से नियन्त्रित व्यक्ति के स्वरूप की रक्षा होती है, उसका आत्मविकास होता है, वह परतन्त्रता तो वास्तव में उस व्यक्ति की स्वतन्त्रता ही होगी, और स्त्रियों के सम्बन्ध में मन्वादि धर्माचार्यो की ओर से स्वतन्त्रतारूपा ऐसी परतन्त्रता का ही विधान हुआ है, जिसे कि हम परतन्त्रता न कह कर ' रक्षा ' ही कहेंगे | सौम्य बालक के प्रति पिता का जो नियन्त्रण है, सौम्या स्त्री के प्रति पिता पति - पुत्र का वही रक्षा-१०१६

पृष्ठ 756

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तृतीय अध्याय प्रथमब्राह्मरण शतपथब्राह्मण त्मक नियन्त्रण है । बहिर के शत्रुओं से हमें बचाने के लिए यदि रक्षक सैनिक विशेष स्थज्ञों के लिए, हमाग नियन्त्रण रखता है, तो इसे हम अपनी रक्षा ही कहेंगे, न कि परतन्त्रता । यही रक्षा हमारे स्वरूप - स्वातन्त्र्य की प्रतिष्ठा बनेगी । तात्पर्य्य - स्त्री की रक्षा का भार पिता - पति आदि जिन व्यक्तियों पर डाला गया है, वे शासन-बुद्धि से रक्षा नहीं करते, अपितु ' सेवक ' बनकर ही रक्षोत्तरदायित्त्व निभाते हैं । पद पद पर पूजाभात्र, पूर्ण सत्कार, पुनः मधुर नियन्त्रण । एक चमत्कार और देखिए । मनु स्त्री के प्राकृतिक स्वरूप से परिचित थे । वे जानते थे कि, सौम्य अन्तर्जगत् रग्वने वाले पुरुष को तो फिर भी दुशासन में रकवा जासकता है । परन्तु वह सौम्या स्त्री, जिसका अन्तर्जगत् श्राग्नेय बनता हुआ उम्र है, उस पर कुदुशासन की कथा तो दूर रही, मधुरशासन भी वैसा नहीं चल सकता, जिस में बलानकार की भावना का समावेश सम्भव बन सके । बलप्रयोग से इहें कभी नियन्त्रण में नहीं रक्खा । जासकता । पूजनभावयुक्त रक्षाभाव, सम्पत्ति संग्रह नियुक्ति, द्रव्य शरीर शुद्धि, धर्मकाय्र्या-भिगमन, आदि आदि दिव्य भात्रों को मध्यस्थ बनाकर ही इस मातृशक्ति के अन्तर्जगत् को सुरक्षित रक्खा जासकता है । देखिए! इस सम्बन्ध में राजर्षि मनु क्या कह रहे हैं-१ - न कश्चिद्यां पितः शक्तः प्रसह्य परिरक्षितुम् । एनेरुपायोगैस्तु शक्यास्ताः परिरक्षितुम् ॥

२ – अर्थस्य संग्रहे चैनां, व्यये चैव नियोजयेत् ।

शौचे, धर्मेऽन्नपक्त्यांच, परिणाह्यस्य वेक्षणे ॥

३ – अरक्षिता गृहे रुद्धाः पुरुषैराप्तकारिभिः । आत्मानमात्मना यास्तु रक्षेयुस्ताः सुरक्षितः । - मनुः ६।१०,११,१२ । अर्थात- ' कदापि बलप्रयोग से स्त्री के स्वरूप की रक्षा सम्भव नहीं है । अपितु धनसंग्रह, गृहस्थव्यय, शौचाचार, कुलाचार, धर्माचार, पर्वोत्सत्रमङ्गलपरायणता, भोजनव्यवस्था, ग्रहस्थपरिग्रह-संरक्षण, आदि आदि कर्त्तव्यनिष्ठाओं के माध्यम से ही नारी की स्वरूप- रक्षा सम्भव है । पुरुष को ग्रह स्मरण रखना चाहिए कि, " नारी घर की चारदीवारी में बलपूर्वक नियन्त्रत कर देने से कदापि सुरक्षित नहीं रह सकती । अपितु इसकी रक्षा तो इस की स्वयं की कतव्यानुगता - आत्मनिय-त्रवृत्ति से ही सम्भव है " ।

पृष्ठ 757

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हृतीय अध्याय प्रथमब्राह्मण प्रथमकाण्ड समस्त भारतीय शास्त्र पर दृष्टि डाल जाइए । कहीं भी आपको स्त्री के सम्बन्ध में ' परतन्त्र ' शब्द नहीं मिलेगा ( १ ) “ न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति " ( २ ) " स्वतन्त्रा स्त्रियः कार्याः ” इत्यादि रूप से केवल यही यादेश मिलेगा कि, " उनको स्वतन्त्रता का उपयोग स्वतन्त्र नहीं रहना चाहिए " । अपनी इस स्वतन्त्रता को तभी सुरक्षित रख सकतीं हैं, जब कि किसी रक्षक को वे अपनी प्रतिष्ठा बना लेतीं हैं । और अवश्य ही यह ' रक्षात्मक - भाव ' स्त्री के सहजसिद्ध सौम्य स्वभाव के कारण सर्वमान्य हीं माना जायगा । साथ ही जहाँ जहाँ स्त्रीपारन्त्र्य का उल्लेख हुआ है, वहाँ वहाँ पुरुष को ' रक्षक ' ही घोषित किया गया है, न कि ‘ शासक ' । उदाहरण के लिए " पिता रक्षति कौमारे, भर्त्ता रक्षति यौवने, रक्षन्ति स्थाविरे पुत्राः - ' स्त्रियो रच्या बिशेषतः " - ' जायां रक्षन् हि रक्षति " - " र देयुस्ताः " - यतन्ते रक्षितु भार्याम् " इत्यादि कुछ एक वचन हीं पर्याप्त होंगे । " पुरुष होने के नाते मनु ने स्त्रियों के लिये ऐसे पक्षपातपूर्ण आदेश दे डाले हैं " इतप्रकार का अनर्गल प्रलाप करने वाले उन सुधारक - चन्धुों को हम विश्वास दिलाते हैं कि, मनु भी आपके ही समान सुधारक, किन्तु वास्तविक सुधारक थे । स्त्रीजाति के पतन का दोष आप श्राज जिसप्रकार पुरुषजाति के मत्थ हैं, ग्राप के सहयोगी मनु ने भी पुरुष को ही अपराधी ठहराया है । मनुने स्पष्ट शब्दों में ऐतिहासिक घट-नाओं का निर्देश करते हुए यह सिद्ध किया कि, जिस समाज में स्त्रीजाति का पतन देखो, विश्वास करो! यह पुरुषजाति का ही अपराध है । जिसप्रकार नदी का मधुर जल क्षारसमुद्र के संसर्ग से क्षार बन जाता है, एवमेव स्त्री के गुण गुणहीन पुरुष के संसर्ग से दूषित ही होजाते हैं । ठीक इस के विपरीत पुरुष के सद्गुणों से दुर्गुण स्त्री म सुधर जाती है । अतएव स्त्रीसमाज का अभ्युत्थान चाहने वाले पुरुप समाज को पहिले अपना हीं अभ्युत्थान करना चाहिए । बतलाइए, निम्नलिखित मनुवचन किसे अपराधी ठहरा रहे हैं?, एवं किस के साथ पक्षपात कर रहे हैं?

१ - यागगुणेन भर्त्रा स्त्री संयुज्येत यथाविधि ।

ताग् गुणा सा भवति समुद्र व निम्नगा ॥

२ - श्रमाला वसिष्ठेन संयुक्ताऽधमयोनिजा ।

शारङ्गी मन्दपालेन जगामाभ्पर्हणीयताम् ॥

( १ ) --पिता ' रक्षति कौमारे, भत्ता ' रक्षति ' यौवने 1 ।

' रक्षन्ति ' स्थाविरे पुत्रा न स्त्रो स्वातन्त्र्यमर्हति ॥

- मनुः ६ | ३ |

( २ ) -- अस्वतन्त्राः स्त्रियः कार्या पुरुषैः स्वैदिवानिशम् ।

विषयेषु च सज्जन्त्यः संस्थाप्या श्रात्मनो वशे ॥

- मनुः हा २ रा

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तृतीयध्याय प्रथम ब्राह्मण । ३- - एताश्चान्याश्च लोकेऽस्मिन्नपकृष्टप्रसूतयः उत्कर्षं योषितः प्राप्ताः स्वैः स्वैभऩ गुणैः शुभैः ॥ - मनुः ६२२/२३/२४ | शतपथब्राह्मण ' - रूपा है, - विज्ञान के अनुसार जब सौम्य स्त्री ' शक्ति प्रश्न होसकता है कि, पूर्वप्रदर्शित अग्नीषोम है? | क्या शक्तिरूपा वह स्त्री, जो अपने सहयोग से शक्तिशून्य तो इसे पुरुषरक्षा की क्या आवश्यकता पुरुष को अपने श्रद्धाकाश - प्रदान से पूर्ण पुरुष बना देती है, वह पुरुष को भी शक्तिमान बना देती है, अपूर्ण होता हुआ भी कुतूहल - वद्धक है । स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकती?, प्रश्न साधारण से । यदि इस सम्बन्ध में थोड़ी सी भी विचारशक्ति कुतूहलबुद्धि का कारण है हमारा - बुद्धिवैभव ही नहीं होता । पहिले विज्ञानदृष्टि से समाधान कीजिए । जो काम लिया जाता, तो उक्त प्रश्न उपस्थित स्वयं उस घनतत्त्व का उपयोग नहीं कर सकता । उदाहरण तत्त्व जिस तत्त्व का घन होता है, वह को ही लीजिए । मन ज्ञानशक्ति है, प्राण क्रियाशक्ति है, के लिए मन: - प्राण - वाग्घन अव्ययात्मा शक्तिमन है, अतएव वह स्वयं इसका उपयोग करने में असमर्थ एवं बाकू अर्थशक्ति है । क्योकि आत्माव्यय प्रदेश ही अपेक्षित है । जब वहाँ शक्ति के अतिरिक्त कुछ ओर है । शक्तिसञ्चार के लिए, शक्ति से अतिरिक्त मनः प्राण - वाङ्मूत्ति, किवा ज्ञान - क्रिया- अर्थशक्ति-है ही नहीं, तो उसका प्रसार कहाँ हो? हीं । कहा श्रतएव जाता है - " प्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यतरात परतः परः ” मूर्त्ति व्यय को प्राण, श्रमना ( मुण्डक ) । है, जब कि वह मन से कामना का उदय तभी सम्भव कामना मन का व्यापार अवश्य है, परन्तु श्रव्ययमन और हृदय एक वस्तुतत्त्व है । अतएव मनोचन हृदयरूप सीमाभाव को प्रतिष्ठा चनाले । उधर इत्यादि नामों से व्यवहृत किया जाता है । स्त्रशक्ति का होते हुए भी उसे निष्काम, आप्तकाम, अकाम नहीं होसकता, यह निश्चित है । होसकता है कब?, जब कि यह उपयोग स्त्र में ( अपने धरातल में ) कदापि चतु स्वयं अपना रूप तचतक देखने में असमर्थ है, शक्ति किसी अन्य को प्रतिष्ठा बनाले | विश्वद्रष्टा | क्या कोई वैद्य, अथवा डॉक्टर अपनी चिकित्सा में सफल तत्रतक कि वह दर्पण को आधार न बनाले करने वाल ' लीडर अपने केस में पैरवी नहीं कर सकता, नहीं होसकता है? | दूसरों के मुकद्दमों की पैरवी करनी चाहिए । का शक्तिघन है । अतएव तबतक यह अपनी शक्ति सटीक यही परिस्थिति यहाँ समझिए । स्त्री यह अपना श्राश्रय नहीं बना लेती । कि किसी शक्तिमान् को विकास होगा, सदुपयोग कदापि नही कर सकती, जबतक विकसित होमकता है । इस से स्वयं का भी शक्तिमान के द्वारा ही यह शक्तितत्व बनता हुआ । शिवभाव में परिणत होजायगा । एक समाधान । उधर अशक्त पुरुष भी शक्तिशाली यह आवश्यक है मानस - वृत्तियों के समीकरण के लिए स्थूलदृष्टि से विचार कर लीजिए । वस्तु है, वह उसका उपयोग न करे, यही न करे । जिसके कोश में जो, इसी उद्देश्य कि, कोश का उपयोग स्वयं कोशाधिष्टाता से समाज में शान्ति स्वस्ति रह सकती है । कहना न होगा कि तात्पर्य है । इसी नियम पर चलने

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तृतीयवाय प्रथमब्राह्मण प्रथमकाण्ड सिद्धि के लिए वर्णभ्यवस्था व्यवस्थित हुई है । ब्राह्मण ज्ञान का कोश है, क्षत्रिय पराक्रम का कोश है, वैश्य सम्पत्तकोश है, शूद्र शिल्पकलानुगत सेवाभाव का कोश है । चारों वर्णं चारों के काशाभ्यक्ष हैं । ब्राह्मण का ज्ञान समाज की ' शान्ति ' में बहुत है, क्षत्रिय का पराक्रम समाज की ' तृप्ति ' में आहुत है, वैश्य की सम्पदि समाज की ' तुष्टि ' में बहुत है, एवं शुद्र का सेवावत समाज की ' पुटि ' में है । अपनी स्वरूपरक्षा के लिए इस कोश से कुछ भी लेने का अधिकार नहीं है । लेंगे, अवश्य लेंगे, परन्तु ग्राहुति का शेष भाग । इहें यज्ञोच्छिष्ट से ही स्वरूपरक्षा करने का अधिकार है— “ यज्ञशिष्टाशिनः सन्तु ” | एवं ये निर्धूतकिल्विष रह सकते हैं । ' हम हमारे लिए नहीं, अपितु समाज के लिए हैं ' यही सर्व हुतयज्ञ समाजशान्ति, दूसरे शब्दों में ' समाजस्वातन्त्र्य ' की मूल प्रतिष्ठा है । पारस्परिक अनुशासन में हीं स्वतन्त्रता का बीज प्रतिष्ठित है । वाई, दर्जी, कुम्भकार आदि अवान्तर सामान्य भी कोशाध्यक्ष अपनी सामग्री को अपना माक्षात् हव्य बनालें, तो क्या परिणाम होगा? यह उही विचारशीलों से प्रष्टव्य है । स्त्री शक्तिबना है । उसे स्वयं मक्षादूरूप से उसके उपयोग का कोई अधिकार प्राप्त नहीं है । शक्तिचन को यह विवेक रहता ही नहीं कि, मेरी शक्ति कहाँ, कत्र, कितनी, क्यों, कैसे खर्च हो रही है? । यही एक ऐसी विषमता थी, जिसे रोकने के लिए ही इसका एक ‘ मन्त्री ' बनाना आवश्यक समझा गया | वही मन्त्री, वही रक्षक, बड़ी सैनिक, वही उपासक, वही पजक, विश्य में ' पुरुष ' नाम से व्यवहृत हुआ है । भावुक जन कहते हैं - पश्चिमी देशोंने इसलिए उन्नति की है, कि वहाँ स्त्रियों को पर्ण स्वातन्त्र्य प्राप्त है । सुस्वागतम् १ | श्राप, और आपका भारतवर्ष तो पश्चिम नहीं है । इसका नाम है- " पदेश - कर्मभूमि-आर्यावर्त्त - भारतवर्ष " । क्या आप यह चाहते हैं कि, प ुर्व पश्चिम बन जाय, कर्म्म अक बन जाय, भारतवर्ष केतुमालवर्ण बन जाय? । प्रकृति से ही पूँछ देखिए, देखें वह इस सम्बन्ध में क्या सम्मति प्रदान करती है? | प्रकृति कहती है कि, पूर्वीदेशों में मैं ' इन्द्ररूप ' से प्रतिष्ठित रहती हूँ, एवं पश्चिमीदेशों में मेरा रु-रणरूप प्रधान है । इन्द्रदेवता अग्नि के अनुयायी हैं, एवं वरुणदेवता सोम के । अतएव अग्निप्रतिष्ठा रूपा दक्षिणादिक् इन्द्र की भी, एवं सोमप्रतिष्ठारूप उत्तरादिक वरुण की भी मान ली जाती है, जैसा कि निम्न-लिखित वचनों से स्पष्ट है । इन्द्र : -१- ' अथ यत् पुरस्ताद्वासीन्द्रो राजा ० ' नै ० उ ० ३।२११२ ] | २ – ' अथैन ं [ इन्द्र ] प्राच्याम् ' ऐ ० ८ । १४ । ) । ३ - ‘ प्राचीदिक्, अग्निदेवता ' [ तै ० २।११।५।१ ] | ४- ' दक्षिणादिक इन्द्रोदेवता ' वरुणः १- ' अथ यत् पश्चाद्वामि वरुणो राजा ० ' । १ - ' प्रतीची टिंक वरुणोऽधिपतिः ' ( अथ ० ३।२७।३ ] | ३- ' प्राचीदिक, सोमो देवता ' [ तै ० ३ | ११ | ५ | १ ] । ५- वृषा वा इन्द्रः ' [ को २० । ३ । ] । [ तै ३ | १२ | ६ | २ ] | ४- ' उत्तरा ह वै सोमो राजा ' ऐ ० ८ ] । ५ -- ‘ एषा वै वरुणस्य दिक् ’ [ तै ० ३८ | २० | ४ | ] | १०२३

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 760 का मूल पृष्ठ
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तृतीयमध्याय प्रथमत्राह्मण शतपथब्राह्मण • इन्द्राग्नीरूप पुरुष पुरुपसृष्टि का एवं वरुणसोमरूप स्त्रीसृष्टि का थालम्बन बतलाया गया है । इन्द्राग्निप्रधान पूर्वीदेश पुरुषसृष्टि की प्रधानता के द्योतक हैं. एवं वरुण - सोमप्रधान पश्चिमीदेश स्त्रीप्राधान्य के सूचक है । इस प्राकृतिक भेद के अनुसार अवश्य ही दोनों के आदर्शों को भिन्न भिन्न ही माना जायगा । और यही भेद यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त होगा कि हमारी त्राण प्रचाना दाम्पत्यव्यवस्था कभी उनके भूतप्रधान दाम्पत्यजीवन से समतुलित नहीं होसकती । जाने दिजिए प्राकृतिक कारण को जिन पश्चिमी देशोंने शक्तितस्य को अरक्षित कर लिया है, उन के लिए आज वही शक्तितत्त्व सर्वसंहार का ही उपक्रम बन चुका है, इस नग्नसत्य को कौन स्वीकार नहीं करेगा? | नारी की स्वरूप प्रतिष्ठा तो इसी में है कि, वह अपने आपको स्वतन्त्र न समझ कर अपनी स्वतन्त्रता का आधा भाग पुरुष को ही समझे । उवर आय्यपुरुष का यह कर्तव्य है कि, वह अपनी स्वतन्त्रता का उपयोग इनके सहयोग से ही करे I दोनों की सद्भावना ही हम देश का अभ्युदय कर सकती है । सुधारवादी महोदय आवेश में पड़कर यह भूल जाते हैं कि " हम रूढिवादों का जो सुधार करना चाहते हैं, वह सुधार वास्तविक सुधार नहीं है, अपितु यह तो पश्चिमी देशों का विशुद्ध अनुकरणमात्र है । और इस अनु-करण की तुलना में यह निःसंकोच कहा जासकता है कि, जो अनुकरण, जो सुधार, जो स्वतन्त्रता हमारा मूल-नाश करने के लिए ही मुँ आएँ खड़ी है, हानिकर एवं अशास्त्रीय पर्दे की प्रथा के विरुद्ध सुनाई पड़ने वाली जिन भीष्मप्रतिज्ञाओं की ओट में नारी को आज जो निर्लज्जता का पाठ पढ़ाया जा रहा है, दूषित जाति-भोजों के सुधार के नाम पर पश्चिमानुकरणत्रवान जिन प्रीतिभोजों ( पार्टियों ) का समर्थन किया जारहा है, इन सत्र अकाण्ड ताण्डवों की तुलना में तो हमारी परतन्त्रता, हमारी दूषित प्रथाएँ हीं कहीं अच्छी हैं । इस लिए कि, उन सुधारों से हमारे मूल पर प्रत्यक्षरूप से ही आक्रमण होरहा है । अस्तु, जिस युग में धर्म एक ठेकेदारी की वस्तु बन कर अध - प्रसार ही कर रहा हो, जहाँ ' नश्यन्ति बहुनायकाः " आभाणक ही सर्वात्मना चरितार्थ होरहा हो, वहाँ के सुधारकबन्धु यदि सुधार के नाम पर बिगाह का प्रसार करें, तो इसमें उनका कोई भी दोष नहीं माना जासकता । देशकाल की परिस्थिति का विचार भी आवश्यक है, जिस शासन से हम शासित हैं, उसकी सभ्यता का भाव हम पर न पड़े, यह भी असम्भव है । इन सब तथ्यों को लक्ष्य में रखते हुए पारम्परिक वैमनस्य का परित्याग कर देश के विद्वानों, एवं सुधारनेताओं के सम्मि-लित परामर्श से कोई ऐसा मध्यमपथ निकलना हीं चाहिए, जिससे सामयिक परिस्थिति का भी आदर किया जासके, एवं साथ ही पश्चिम - प के इस भयानक सघर्ष के मध्य में पड़ी हुई अपनी मौलिकता की भी येन केन रूप से रक्षा की जासके । अभी तो यही कहना पड़ेगा कि धर्मानुयायी धर्म्मनेता, एवं समाज, तदनुयायी समाजनेता धर्मा सुधार प्रसार के नाते अथम्मं बिगाड़ ही कर रहे हैं इन पंक्तियों के असमर्थ लेखक के प्रशाकोश में अपनी कीम - शान्ति के लिए इस के अतिरिक्त और क्या बच रहा है कि वह दयानिधि से प्रार्थना करे कि भगवन्! * इस विषय का विशद विवेचन " गीताभाष्यभूमिका " के प्रथम में देखना चाहिए । १०२४