Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 761–770

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 761–770

पृष्ठ 761

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तृतीय अध्याय प्रथम ब्राह्मण

येषां चेतसि मोह - मत्सर, मद- भ्रान्तिः समुज्जम्भते ।

तेऽयं दयया दयाघनविभो! सन्तारणीयास्त्वया ॥

प्रथमाण्ड उक्त दाम्पत्य रहस्यविज्ञान से अब यह सिद्ध होचुका है कि, आयत के कारुणिक ऋषियोंनें स्त्री-जाति के लिए, जिन नियमों का विधान किया है, वे सब इसके अभ्युत्थान के ही कारण हैं । स्त्री की ऋनमयी, तत्र सत्यशू या सौम्या वृत्ति को लक्ष्य में रखकर एक स्थान पर तो भगवान् मनुने यहाँतक कह

डाला है कि--मात्र स्वादुहित्रा वा न विविकासनो भवेत् ।

चलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥

- मनु. २ | २१ | ५ | ' माता- बहिन- दोहिती आदि के साथ भी पुरुष को निर्जन घर में नहीं बैठना चाहिए ' क्या मनु का उक्त विधान उपहासास्पद है? । मुकुलितनयन बन कर विचार कीजिए । पढ़ें के विरोध की ओट में नारी को उद्दामवासनावासित पश्चिम के प्राङ्गण में ताएडवनृत्य के लिए खड़ा करना क्या स्त्रीजाति की उन्नति का मार्ग है? । खूब सोचिए! ज्यों ज्यों आप विवेकबुद्धि से इस दुरूह प्रश्न का मनन करते जायँगे, त्यों त्यां आपकी विवेकशालिनी बुद्धि चिरन्तन ऋषियों के पुरातन सिद्धान्तों की ओर निश्चयेन आकर्षित होती जायगी । हाँ, तो प्रकृत में हमें उक्त सन्दर्भ से बतलाना यही था कि, स्त्री सौम्या है, ऋतभावापन्ना है । इस ऋतभाव को प्रतिष्टित करने के लिए ही रक्षात्मक - मर्यादासूत्ररूप योक्त्र से पत्नी का सन्नहन किया जाता है । योक्त्रबन्धन के इसी प्रथम कारण का निरूपण करती हुई श्रुति कहती है-" योक्त्रेण हि योग्य युञ्जन्ति ” * । * - ' योक्त्रेण हि योग्यं युञ्जन्ति ' वचन भारतवर्ष की विज्ञानसम्मता प्राचीन स्त्री कीपुरातन वेशभूषा की ओर भी हमारा ध्यान आकर्षित कर रहा है । अवश्य ही उस युग में भारतीय नारी का अधोत्र वैसा की रहा होगा, जिस में सूत्र -मयी, किंवा रेशम की रज्जु ( डोरी ) प्रोत रहती होगी, जिसे कि आज की राजस्थानीया - प्रान्तीया भाषा में ' नाड़ा ' कहा जाता हैं । ' नाड़ा ' निश्चयेन वैदिक युग के ' योक्त्र-बन्धन ' का ही प्रतिरूप है । परमसांस्कृतिक महद्भाग्यशाली राजस्थान में तो आज भी यहाँ की गृहदेवियों की सुसांस्कृतिककी वेशभूषा में योक्त्ररूप - नाड़ाबन्धन रुप से सुसमन्वित सुप्रसिद्ध ' बावरा ' नामक अत्रोवस्त्र ही उपलब्ध हो रहा जिस की ग्रन्थि भी उसी पद्धति से समन्विता है । एतदतिरिक्त ' रास्ना ' नामक आभूषण की प्रतिरूपता का भी अत्र समावेश हुआ हैं | राजस्थान की नारी का सुप्रसिद्ध ' काची ' नामक ( कणकती ) आभूषण भी वैदिक युग की - ' रास्ना ' ही है ।

पृष्ठ 762

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तृतीयव्याव प्रथमत्राह्मण शतपचत्राह्मण पिच - पत्नी का नाभि से नीचे का प्रदेश अनेक कारणों से अपवित्र माना गया है । नाभि से नीचे गर्भाशय में शोगित रहता है । इसी शोणित में शुकादुति होने से प्रजोत्पत्ति होती है । ऋतुमती स्वी के शोणित में तमोभाव के प्रवक सूर्यविरोधी प्राण की सत्ता रहती है । अतएव ऋतुमती को ' आत्रेयी ' कहा जाता है । यह अत्रि अत्मा को मलिन करने वाला प्राण है । अतएव आत्रेयी के स्पर्श का धर्मशास्त्र ने सर्वथा निषेध किया है । यही पहिला अमेध्यभाव है । गर्भाशय में शुक्रशोणित क मिथुनभाव में कर्ममोका भावना वासना से भावित बासित श्रीपपातिक जीवात्मा प्रविष्ट होता है । पापमयी वासना ही जीव के गर्भाशन में प्रवेश का मुख्य कारण है । यही दूरा अमेध्यभाव है । इन सब श्रमेध्यभावों से पत्नी का नाभि से नीचे का प्रदेश अमेध्य माना गया है । श्रमेध्यभाव के समावेश से मेध्ययज्ञ सदोप वन जाता है । इधर केवल पत्नी का यज्ञ में योग ही नहीं होता । अपितु मन्त्र बोलते हुए इसे यज्ञाङ्गभूत ग्राज्य का दर्शन करना पड़ता है । ' आभ्य पृष्ठ ' निशान के अनुसार आध्यात्मिक प्राणदेवताओं के साथ ) आधि-दैनिक प्राणदेवताओं का समन ( अन्थिन्धन ) करवाने वाले ' आय ' नामक ' प्राण ' का प्रतिकृतिरूप यह आाज्य सर्वधा मेध्य है । यदि अपने अमेध्यभान का अवरोध न करती हुई यजमानपत्नी मेध्य श्राज्य का अवलोकन कर लेगी, तो आज्य का मध्यभाव नष्ट होजायगा । इसी विप्रतिपत्ति को दूर करने के लिए ( पत्नी के अमेध्यभाव का अवरोध करने के लिए ) भी योक्त्रवन्धन किया जाता है । यांकन की वही दूसरी उपपत्ति है ॥१३ ॥

पत्नी के ऊपर ही योक्त्र बाँधा जाता है । द्युलोकाग्नि में सोम की आहुति होने से ' श्रद्धा ' नाम से प्रसिद्ध ' चान्द्र पानी उत्पन्न होता है । पर्जन्याग्नि में श्रद्धा की आहुति होने से ' वृष्टि ' का जन्म होता है । पार्थिवाग्नि में त्रृष्टि की आहुति होने से ' कार्पासादि ओषधियाँ ' उत्पन्न होती हैं । जिस कार्पास ( कपास ) से तन्तुवाय ( जुलाहा ) साना जाना लगा कर वस्त्र सम्पन्न करता है, वह वस्त्र उपयुक्त पञ्चाग्निविद्यान सेस्तव में ' ओपधिरूप ही है पानी ही तो काम का है । कपास ही तो वस्त्ररूप में परिणत हुआ है । पानी में रहने वाला संवरधम्म वाला पाया ही ' वरुण ' कहलाता है । विन्धन करना इसी प्राण का स्वरूप है । आप जहाँ कहीं, जैसा भी बन्धन देखते है वहाँ सर्वत्र वरुण की ही सता है । अतएव वरुण को पाश ( बन्धन ) का अधिष्ठाता माना जाता है । वरुणपाश सुप्रसिद्ध है । प्रापोमय होने से ओषधिरूप वस्त्र वरुण देवतामय है । इधर जिस योक्त्ररूप रज्जु ( रहती ) से संनहन किया जाता है, वह भी बन्धन की साधिका होने से वरुणदेवतामयी ही है । यदि वस्त्रों के ऊपर इस बाणी एड का सहन होता है, तो यह रज्जु ( रज्जुगत वारुणप्राग ) शरीरान्ति को किसी प्रकार की पीड़ा नहीं पहुँचाती । वस्त्र सजातीय है । अत: उस पर वारुणी का आक्रमण नहीं होता । पत्नी को इसी वरुणाघात से बचाने के लिए वस्त्रों के ऊपर ही योक्त्र बन्धन किया जाता है ॥ १४ ॥

" अदित्यै रास्नासि " यह मन्त्र बोलते हुए ही संनहनक किया जाता है । पृथिवी का जो भाग सू की ओर रहता है, दूसरे शब्दों में- पृथिवी के जिस भाग पर सौर प्रकाशमय प्राणदेवता अविच्छिन्नरूप से आते रहते हैं, पृथिवी का वही अहर्भाग ' अदिति ' कहलाता है । यही अदिति पृथिवी प्राणदेवताओं को अपने गर्भ में स्वती हुई, दू शब्दों में बसु - रुद्र - श्रादित्य, अश्वनीकुमार इन ३: स प्राणदेवताओं का स्वरूप- सम्पादन करती हुई जहाँ " अदितिर्माता " इत्यादि रूप से देवताओं की माता कहलाती है, वहाँ वहीं • तं वा एवं ' परणं ' सन्तं ' वरुण ' इत्याचक्षते परोक्षेण " । १०२६

पृष्ठ 763

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तृतीयध्याय प्रथम ब्राह्मण प्रथमकाण्ड अदिति उक्त प्राणदेवताओं का भोग - साधन बनती हुई प्रकृत ब्राह्मण में ' देवपत्नी ' - नाम से भी व्यवहृत हुई है । पदार्थविद्या में पति - पत्नी - पुत्र - पिता - स्वसा - दुहिता - श्रादि सत्र व्यवहारों का परस्पर सांक है । पिता पुत्र बन जाता है । पत्नी माता बन जाती है, माता रत्नी बन जाती हैं, एवं पुत्र पिता बन जाता है । पदार्थविद्या के इसी वैज्ञानिक रहस्य को लक्ष्य में रखकर वाजिश्रुति कहती है-“ स एप पिता - पुत्रः । यदेषोऽग्निमसृजत, तेनैषो अनेः पिता । यदेतमग्निः सम-दधात् - तेनैतस्याग्निः पिता । यदेष देवानसृजत - तेनैष देवानां पिता । यदेतं देवाः समदधुः--तेनंतम्य देवाः पितरः । उभय हैतद् भवति पिता च पुत्रश्च ” । - शत ० ना ० ६ कां १२२६ | इति । प्राणदेवताओं की समष्टि ही यज्ञ है । दितिपृथिबी इस यज्ञप्रजापतिरूप यजमान की पत्नी है । इधर चन्द्रगर्भिता इस अदिति से ही स्त्री की उत्पत्ति होती है, जैसा कि में बतलाया जा चुका है । यही अदिति की प्रतिकृति है । साक्षात् श्रदिति है । अतः इसके लिए ' हे रज्जु! तुम श्रदिति के लिए राम्ना ( मेखला-काञ्चोक डोर - कणकती आदि नामों से लोकभाषा में प्रसिद्ध ) हो ' यह कहा गया है । जबतक रज्जु रज्जु है, तत्रतक वह अवश्य ही वरुणभाव से कान्त है । यद्यपि वस्त्रों के उपर बाँधने से रज्जु का वरुणभाव एकप्रकार से शान्त होजाता है, फिर भी परम्परया तो वरुण का आक्रमण प्राप्त हो ही जाता है । इसी विप्रतिपत्तिको मन्त्र भावना से सर्वथा विदूर करने के लिए, दूसरे शब्दों में - रज्जुगत वरुणुभाव की सर्वथा निवृत्ति के लिए ही इस रज्जु में ' रास्ना ' ( मेखला ) की भावना की जाती है । यह रज्जु रज्जु नहीं, अपितु रास्ना है । पत्नी का आभूषण है । बन्धन के स्थान में यह तो सौन्दर्य का ही साधन है-यही तात्पर्य है || १५ || यद्यपि रास्ना की भावना से योक्त्ररूपा रज्जु का वरुणभाव हट गया है । फिर भी यदि योक्त्र के दक्षिण उत्तर - पाशाओं में ग्रन्थिवन्धन कर दिया जायगा ( दोनों अग्र भागों में गाँठ लगादी जायगी तो ) पुनः यह योक्त्र वरुणभाव से युक्त होजायगा । कारण, पूर्व कथनानुसार ग्रन्थिरूप पाशबन्धन के अधिष्टाता वरुणं ही हैं । अतः गाँठ सर्वथा नहीं लगानी चाहिए ॥ १६ ॥

यदि गाँट नहीं लगाई जायगी, तो योक्त्र स्वस्थान में अवस्थित ( रुका ) कैसे रहेगा?, इस विप्रतिपत्ति को दूर करने का उपाय है - ऊर्ध्व भाग में पाशाग्र को खचित कर देना । जिस क्रम से ऊध्वं की ओर उद्गूहन किया जाता है, वह पद्धतिनिरूपण - प्रकरण में विस्तार से बतलाया जाचुका है । “ विष्णोर्वेष्योऽसि " यह मन्त्र बोलते हुए ही योक्त्र का ऊर्ध्व उद्गूहन किया जाता है । पत्नी यज्ञ का पश्चिमार्द्ध भाग है, यह बत-लाया जा चुका है । बिना पत्नी के यज्ञ सम्पन्न नहीं होता, अतः हम इस यजमानपत्नी को अवश्य ही विष्णुरूप यज्ञ की, किंवा यज्ञरूप विष्णु की स्वरूप - सम्पादिका कह सकते हैं । इधर ऋतभावापन्ना पत्नी का योग योक्त्रबन्धन पर ही निर्भर है । योक्त्रबन्धनरूप ऊर्ध्व उद्गृहन का प्रधान साधन योक्त्र का दक्षिण पाशाग्र ही है, जैसा कि पद्धति में बतलाया जाचुका है । दक्षिण में अग्निमता ( ऋतुयज्ञसमर्पक ऋताग्नि की सत्ता ) रहती है । ऋताग्नि में ऋतसोम की आहुति होने से ऋतुसमष्टिरूप सम्वत्सरयज्ञ सम्पन्न होता है । वज्ञ ही विष्णु

पृष्ठ 764

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तृतीय अध्याय प्रथमब्राह्मण शतपथब्राह्मण है । दक्षिणपाश में यही दक्षिणस्थ ग्रग्निमूर्ति यज्ञविष्णु प्रतिष्ठित है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर -“ हे दक्षिणपाश! आप विष्णुरूप यज्ञ के वेधुन हो, यज्ञ के स्वरूप- सम्पादक हो ” इस मन्त्र के द्वारा यही भावना रखते हुए उसका ( दाक्षगुपाशात्र का ) ऊ की ओर ही उद्गूहन किया जाता है । अत्र केवल यह प्रश्न चच जाता है कि, जैसे बज्ञकर्म में युक्त यजमान अध्ब - होता- उद्गाता-ब्रह्मा आदि ऋत्विजों के लिए बैठने के स्थान नियत हैं, तथैव इस पत्नी के बैठने का कौनसा नियत स्थान है?, इसी प्रश्न का सोपपत्तिक समाधान करती हुई श्रुति कहती है-न्यायप्राप्त बात तो यह है कि, यजमानपत्नी को गार्हपत्याग्निकुण्ड के ठीक पश्चिम में पूर्वमुख करके ही बैठना चाहिए था । अर्थात् पत्नीशाला का निर्माण गार्हपत्य से पश्चिम में हीं होना चाहिए था । कारण स्पष्ट है । प्रकृति में सूर्यरूप ग्राहवनीय पूर्व में है । पृथिवीरूप गार्हपत्य इससे पश्चिम में है । पश्चिमस्थ भूषिण्ड ( अदित्युपलक्षित भूपिण्ड ) देवताओं की पत्नी है । पश्चिम में प्रतिष्ठित होती हुई पृथिवी ( भूपिण्ड ) सूर्य की ओर ( पूर्व की श्रीर ) चलती हुई घूम रही है । पश्चिम से पूर्व की ओर जाती हुई, सम्बत्मर का स्वरूप- सम्पादन करती हुई अदिति पृथिवी ही सौर प्राणदेवताओं के सम्वत्सर - यज्ञ का स्वरूप- सम्पादन कर रही है | यजमानपत्नी इसी अदिति पृथिवी के स्थान में है । इश्वर इस वैधयज्ञ में वेदि के पूर्व भाग में व-स्थित चतुरस्र ( चौकोर ) ग्राहवनीयकुण्ड लोक की प्रतिकृति है, एवं वेदि से पश्चिमदिक् में अवस्थित वतु'ल गार्हपत्यकुण्ड श्राद्वैति पृथिवी का स्वरूप है । यही स्वरूप यजमानपत्नी का है । श्रुतः इसे स्वस्थानभूत ( अदितिस्थान भूत ) गार्हपत्य के ठीक पश्चिम में हीं बैठना चाहिए । परन्तु ऐसा न कर गाईंपत्य से दक्षिण नैऋत कोण मे हीं पत्नीशाला बनाई जाती है । कारण इसका यही है, कि, यदि पृथिवी - स्थानीय गार्हपत्य के समीप पश्चिम में पत्नी को बैठाया जायगा, तो यह पत्नी परिभ्रमण करती हुई पृथिवी के साथ युक्त हो जायगी । पार्थिवगति में आरूढ होजायगी, एवं जैसे पृथिवी सम्वत्सर के भीतर भीतर ( परिभ्रमण से ) द्युलोक में पहुँच जाती है, तथैव इस की गतिभावना से आकर्षिता यजमानपत्नी भी द्यलोक में चली जायगी । पत्नी को इसी लोकगमन से बचाने के लिए प्रकृतिसिद्ध स्थान से हटाकर गार्हपत्य से दक्षिण नै तिकोण में ही प्रतिष्ठित किया जाता है ॥ २७ ॥

इति - पत्नी संनहनापपत्तिः ३ – पत्नीकृताज्यावंक्षणोपपत्तिः *** -पत्नी योपाप्राणमयी है । इधर आज्य रेतोरूप होने से वृषाप्राणमय है । आाज्य ( घृत ) दुग्ध का कार्य है । दुग्ध ओषधि का विकार है । ओषधि पानी से उत्पन्न हुई है । पानी सोम का विकार है । सोमद्रव्य साक्षान् रेत है । वही सोम परम्परया श्राज्यरूप में परिणत हुआ है । ऐसी अवस्था में ग्राज्य को अवश्य ही ' रेत ' कहा जासकता है । भाग्यारम्भ में वह बतलाया जाचुका है कि, प्रनो-त्पत्ति में स्त्री, पुरुष का मिथुनभाव कारण नहीं है, अपितु योगा - वृपा प्राण का मिथुनभाव ही प्रजोत्पादक १०२८

पृष्ठ 765

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तृतीय अध्याय प्रथमब्राह्मण प्रथमकाण्ड हैं । इन प्राणों का संयोग दृष्टिसूत्र से भी होसकता है । पुराण में ऐसे अनेक आख्यान उपलब्ध होते हैं कि, ' अमुक ऋषि ने अमुक स्त्री की ओर कामवासना से देखा, एवं दृष्टिपुत्र के सम्बन्धमात्र से गर्भाधान होगया " । यदि श्रात्मा निर्विकार है, भाव प्रबल हैं, तो ऐसा होना कोई असम्भव नहीं है । सत्य श्रात्मा का सत्य-सकल्प कभी व्यर्थ नहीं जाता । यह श्राज्यरूपा रेत - आहुति प्रजोत्पत्ति का कारण बनने वाली है । इसमें यजमानपत्नी का योषाप्राण भी सयुक्त होना चाहिए । बिना इसके यजमान का यज्ञ अधूरा रहता है । योघाप्राणात्मक इसी मिथुनभाव की प्राप्ति के लिए पत्नी को तोरूप ग्राज्य के दर्शत कराए जाते हैं || १८ || यदि चक्षु में किसी भी प्रकार का भावदोष, एवं किमलादि का आवरणदोष रहता है, तो योषाप्राण का आाज्य में प्रवेश नहीं होसकता । मेरे चक्षु सर्वथा निद्दष्ट हैं, मैं निद्दष्ट चतुओं से ही श्राज्य देखती: “ अन त्याचक्षुषा पश्यामि ' यह मन्त्र भाग इसी भावना को हदमूल बनाता है । अग्निज्वाला ही निकी जिह्वा है । साथ ही यह भी सिद्ध वित्रय है कि, जबतक आग्न प्रदीप्त नहीं होता, तबतक प्राणदेवता प्रदीप्त नहीं होते । जबतक प्राणदेवता प्रदीप्त नहीं होते, तबतक आहुति सार्थक नहीं बनती । बाहुति का सफल होना प्राणदेवताओं के आगमन पर ही निर्भर है । प्राणदेवताओं का आगमन प्रदीप्त ( समिद्ध ) अग्नि पर ही निर्भर है । अग्नि की प्रदीप्ति आाज्याहुति पर हीनिर्भर है । अग्नि को प्रदीप्त कर अग्नि में प्राणदेवताओं को प्रतिष्ठित करना आज्य का ही काम है । अतः हम अवश्य ही श्राज्य को अग्नि का शोभन श्राह्नान करने वाला जिह्वा - स्था-न मान सकते हैं । आहुतिद्रव्य से दिव्यात्मा का शरीरनिर्माण होगा, - मन्त्रप्रयोग सफल होंगे । ये सब कर्म्म ज्याहुति पर ही निर्भर हैं । श्राज्य के इसी स्वरूपधर्म्म मी भावना करते हुए- " अग्नेर्जिह्वासि " इत्यादि मन्त्र बोलते हुए ही श्राज्यदर्शन किया जाता है ॥ १६ । इति -पत्नीकृताज्या क्षणांपपत्तिः ४-५ - ६ - परिशिष्ट कर्मानुगता ( आज्यस्थापन, श्राज्यप्रोक्षणी का उत्पवन, एवं अध्व-युकृत आज्यदर्शन ) उपपत्ति— पहिले के कम्मों में यह बतलाया जाचुका है कि, यज्ञिय द्रव्य के परिपाक के सम्बन्ध में दो मत हैं । गाईपत्याग्नि में हविद्रव्य का परिपाक करना, पहिला पक्ष है । एवं श्राहवनीय में परिपाक करना, दूसरा पक्ष है । दोनों हीं पक्ष भ्रुतिसिद्ध हैं । इन पक्षों में यह नियम अवश्य है कि, गार्हपत्यपक्ष में गार्हपत्याग्नि में हीं, एवं आहवनीयपक्ष में आहवनीयाग्नि में हीं हरि का परिपाक होता है । यदि प्रकृत यज्ञकर्त्ता यजमान श्राहवनीय में हविद्रव्य का परिपाक करता है, तो इस पक्ष में दोष आता है । आाज्य भी एकप्रकार से हविद्रव्य है । इसका भी आहवनीयपक्ष में न्यायतः ग्राहवनीयाग्नि में हीं परिपाक होना चाहिए । ऐसी अवस्था में यदि पुरोडाशाधिश्रयणकाल में हीं श्राज्य का भी आहवनीयाग्नि में अधिश्रयण होजाता है, तो पत्नी इसका अत्रे-क्ष'ग नहीं कर सकती । कारण, पत्नी का स्थान गार्हपत्य है । याज्यदर्शन का विधान इसी स्थान पर है । यहाँ से ज्यदर्शनार्थ श्राहवनीय के समीप जाना प्रतिष्ठा से च्युत होते हुए यज्ञस्वरूप विकृत करना है । " पत्नी १०२६

पृष्ठ 766

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 766 का मूल पृष्ठ
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तृतीय अध्याय प्रथमब्राह्मण शतपथब्राह्मण को दर्शन कराना आवश्यक है ' इस विचार से ग्राहवनीयाधिश्रयण के बीच में हीं अध्ययु श्राज्य को ग्रार्हपत्य के समीप लाकर पत्नी को प्रवेक्षण करा दे, यह भी पद्धति के प्रतिकूल है । एवं पद्धतिविरुद्ध कर्म यज्ञस्वरूप का घातक है । इस विप्रतिपत्ति को हटाने का मार्ग पत्नी को ग्राज्य न दिखलाने पर पवसित मान-लिया जाय, यह भी सम्भव नहीं है । यदि पत्नी ने ज्याक्षण न किया, तो उसका यज्ञ से पृथक्करण होजा-यगा । इसप्रकार ग्राहवनीयाधिश्रयणपक्ष में न ध्व पत्नी के समीप आ सकता, न पत्नी आहवनीय के समीप जासकती, न पत्नी को ग्राज्यदर्शन से वञ्चित किया जासकता । यदि गाईपत्याधिश्रयण- पक्ष है, तब तो किसी प्रकार का दोष नहीं ग्रासकता । कारण इस पक्ष में श्राज्याधिश्रयण भी गार्हपत्य में ही होता है । ऐसी अव-स्था में गार्हपत्य के समीप ही नैर्ऋत कोण में बैठी हुई यजमानपत्नी के श्राज्यदर्शन में किसी भी प्रकार की अनु-पपत्ति नहीं होती । परन्तु आहवनीयपक्ष में उक्त विप्रतिपत्ति को दूर करने का क्या उपाय १, इसी प्रश्न का समाधान करते हुए श्रुतिने यह उपाय बतलाया है कि, आहवनीयाधिश्रयणपक्ष में-- पुरोडाशाधिश्रयणकाल में श्राज्या-धिश्रयण नहीं करना चाहिए, अपितु जब पत्नी के आज्या वेक्षण का समय आत्रे, उस समय पहिले अगत्या श्राज्य का गार्हपत्याग्नि में अधिश्रयण कर लेना चाहिए । जब पत्नी गाईपत्यस्थान में हीं आज्यावेक्षण करले, तो श्राहवनीयाधिश्रयणपक्ष की प्राप्तमर्यादा को सुरक्षित रखने के लिए पुनः ( ज्यावेक्षणानन्तर ) वाह-नीयाग्नि में श्राज्याधिश्रया का लेना चाहिए । अधिश्रयणानन्तर आज्य को देवप्राणयुक्त वेदिमण्डल पर रख देना चाहिए । २०/२११२२/२३ | २४ | ' आपोमया: सर्वरसाः सर्वमापोमयं जगन ' ( महाभारत ) इस सिद्धान्त के अनुसार यह दृश्य -भूतभौतिक - पञ्चपर्वा विश्व * अपने मूल में ' अप तत्त्व ' को ही प्रतिष्टित रख रहा है । अर्थात् पाञ्चभौतिक-विश्व का मौलिक उपादानद्रव्य तत्त्व ही माना गया है, जैसाकि निम्नलिखित मनुवचन से स्पष्ट प्रमाणित है-सोऽभिध्याय शरीशत् स्त्रात् मितुर्विविधाः प्रजाः । अप एव ससर्जादौ तासु वीजमवासृजत् ॥ ( मनुः १ । ८ । ऋक् - यजुः - साम - नामक मौलिक ऋषिप्राणात्मक अपौरुषेय - तत्त्वात्मक वेद से कृतरूप अव्यक्त-प्रजापति अपने ऋकमामानुगत यजुः के - ' जू ' रूप वाग्भाग से सर्वप्रथम ' अ ' रूप में हीं परिणत होते है, जो कि यह पतत्त्व सम्पूर्ण विश्व को व्याप्त आप्त करने के कारण - ' आप ' नाम मे, एवं अण्डरूप से सम्पू विश्व का वरण करने मे -- ' बा ' ( ' वारि ' ) नाम से प्रसिद्ध हुआ है । ' तत एडं समवर्त्तत के अनुसार इस अप्तत्त्व के परिवेष्टन मे ही अव्यक्त ब्रह्म ' अण्ड ' रूप में परिणत हुआ है । इसीलिए उस अव्यक्तब्रह्म * स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूर्य - चन्द्रमा पृथिवी ही क्रमशः श्राकाश - वायु - तेज - जल - मृत नामक ' पन्चमहाभूत ' हैं, एवं इन पाँच पर्वों से ही ' पञ्चपर्वा - विश्व का स्वरूप निम्मांण हुआ है, जिसका उपादान द्रव्य ' अप तत्त्व ' ही माना गया है । - सोऽपोऽसृजत वाच एव लोकात् । वागेव किञ्च । तस्मात् ‘ आपः ’ । सर्वमवृणोत् तस्माद्याः १०३० सा ऽसृज्यत । सेदं सर्वमाप्नोत् यदिदं वारि ) | ( शत ० ६ | १ | १ || )

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तृतीयश्रव्याय का यह पञ्चपर्वात्मक - ' म हुआ है । प्रथम ब्राह्मण प्रथमकाण्ड पोमय विश्व ' ब्रह्माण्ड ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । प्रकृत ब्राह्मण की २५ वीं कण्डिका यो हितन ' इस रहस्यपूर्ण निगम के द्वारा अपतत्त्व का ही ' नीर - क्षीर विवेक ' हँसानुगत ' नीर - क्षीर विवेक ' नामक लौकिक - न्याय लोक में सुप्रसिद्ध है, जिस इस लोकप्रसिद्ध न्याय का मूल आधार ' तदसु पयो हितम ' ( सो यह घृत पानी में प्रतिष्ठित है ) यही वचन बन रहा हे । ' नीर ' आप ( पानी ) है, एवं ' तीर ' ' आज्य ' ( घृत ) है । इस पाञ्चभौतिक - विश्व के मूलोपादन भूत विश्व की सीमा में, विश्व के गर्भ में नीर भी है, और क्षीर भी है । अर्थात् आप भी है, और श्राज्य भी है । पानी, और दूध ( आज्य का मौलिकरूप ), दोनों के सम्मिश्रण का नाम हीं ' विश्व ' है । अपनी स्थायी सौम्या पावन श्रद्धा को ' पुरा शास्त्र ' के स्वाध्याय, एवं श्रवण से धन्य - कृत-कृत्य करते रहने वाले मानवश्रेष्ठों के लिए यह सुबिदित ही है कि, पुराण- कथानुसार त्रैलोक्य के पालनकर्त्ता भगवान् विष्णु अनन्त – शेषनाग की सूचिक्कणा - कोमलशय्या पर ' तोरसमुद्र ' में ह्रीं शयन कर रहे हैं । मानवीया प्रज्ञा के अपराध से जब ज भी धर्मस्कम्भ ( स्तम्भ ) त्रिकम्पित होजाता है, तो तत्र तत्र ही देवताओं की करुणापूर्णा प्रार्थना पर करुणावरुणालय शेषशायी भगवान् विष्णु क्षीरसमुद्र का परित्याग कर ग्रंशरूपेणः अवतीर्ण हुआ करते हैं | कौनसा है वह ' क्षीरसमुद्र ', जिसमें विष्णु शयन कर रहे हैं?, इस महान सम्प्रश्न का समाधान व्यवसायात्मिका जिस नैष्ठिकी ज्ञानविज्ञानात्मिका बुद्धि के द्वारा होता है, वही तत्त्वनिष्ठा बुद्धि- ' नीरक्षीर विवेकशालिनीबुद्धि ' कहलाई है, एवं दो शब्दों में विवेकशालिनी उसी सत्त्व-बुद्धि से सम्बन्ध रखने वाले - ' नीर - क्षीर विवेक ' की ओर हम अपने वेदनिष्ट पाटकों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं । स्वायम्भुव -- अव्यक्त -- त्रयीमूर्ति - प्रजापति के वाग्भाग से उत्पन्न, सर्वत्र व्याप्त, अण्डस्वरूप- सम्पादक ‘ अव तत्त्व ' का ही नाम है- ' परमेष्ठी ', इसी का नाम है भृग्वङ्गिरोमूर्ति पारमेष्ठ्य विष्णु, जिसका भार्गव-तत्त्व ही ' लक्ष्मी ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है, एवं आङ्गिरसतत्त्व ही - ' सरस्वती ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है, जोकि सरस्वती ही - ‘ श्रीः ' कहलाई है । सरस्वतीरूपा अङ्गिरसी श्री एवं आम्भृणीरूपा भार्गवी लक्ष्मीः, ये ही दोनों आशेमय पारमंत्र्य विष्णु की पत्नियाँ हैं, जिनके सम्बन्ध में— ' श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पल्यौ ' ( यजुः संहिता ) यह प्रसिद्ध है । सैपा प्राकृत स्थितिः । स्थितस्यैव गतिश्चिन्तनीया नीरक्षीर विवेक-बुद्धया । पारमेष्ट्य विष्णु का भृगुतत्त्व ही अपनी बनावस्था से ' आप ' है, तरलावस्था से ' वायु: ' है, एवं विरलावस्था से -- ' सोमः ' है । श्रापो वायुः सोमः - इत्येते भृगबः ' ( श्रुतिः ) के अनुसार इन तीनों तत्त्वों की समष्टि का नाम हीं -- ' भृगु ' है, जिनसे क्रमश: असुर - गन्धर्व - पितर ' नामक तीन पारमेष्ठ्य - - प्राणात्मक-सर्ग अभिव्यक्त हुए हैं । अमुर पोमय है, गन्धर्ष वायव्य हैं, एवं पितरः सोम्यासः । हैं गन्धर्वप्राणात्मक १०३१

पृष्ठ 768

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 768 का मूल पृष्ठ
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तृतीय अध्याय प्रथमब्राह्मण शतपथब्राह्मण वायव्यतत्त्व ही वह ' अनन्त तेष नाग ' ( सर्पणशील -- ' यज्ञवराह ' नामक पारमेष्ठ्य महान् वायु ) है, जिस पर पारमेष्ठ्य विष्णु भगवान् शयन कर रहे हैं । पारमेष्ठ्य भार्गव आपः ही ' नीर ' ( पानी ) है, भार्गव सोम हो-- क्षीर ( दूध ) है, एवं दोनों का विभाजक है मध्यस्थ भार्गव -शेषनागात्मक - गन्धर्वप्राणात्मक वायु । यों पारमेष्ठ्य ‘ सरस्त्रान् ' नामक महान् समुद्र में- नीर - क्षीर - वायु- इन तीन तत्त्वों की सत्ता सिद्ध हो-जाती है । इस तत्त्वत्रयी को आधार बनाकर ही हमें ' नीरक्षीरात्मक ' विश्व का समन्वय देखना है । क्षीरभाव ' दुग्ध ' हैं, और सौम्य है, अर्थात् सोममय है, जो कि यह सौम्य क्षीर उस आपोमय समुद्र में घुलमिल रहा है । मध्यस्थ- वायु ही इस का नीर से पार्थक्य करता रहता है, एवं इसी पार्थक्य से इस सोममय क्षीर में चिदात्मा [ विष्णु ] अभिव्यक्त होते हैं । चिदात्मा की गर्भभूमि को - ' मह्वह्म ' माना गया है, जो कि बारमेष्ठ्य-- पितरप्राणमय सौम्य तत्त्व ही है, एवं जिसके सत्व - रज- स्तम नामक तीन तो मुप्रसिद्ध गुण माने गए हैं, एवं सूर्य्यानुगत अहङ्कृतितिभाव, चन्द्रमानुगत प्रकृतिभाव, एवं भूपिण्डानुगत -- आकृतिभाव, ये तीन प्रकृतिभाव माने गए हैं । षड्भावापन्न यह पारमेष्ठ्य - महद्रा ही विश्व की मूलप्रकृति - जननी-माता है, जिसमें चिदात्मा विष्णु गर्भधारण करते हैं । इसी भार्गव -महद्ब्रह्म में चिदात्मा क्योंकि गर्भधारण करते हैं, इनके क्योंकि आय - वायव्य- सौम्य नामक तीन महिमा -- विवर्त्त हैं, अतएव महद्ब्रह्ममूलक प्राणी सर्ग ' आयजीग ' ( जल के प्रारणी ) - वायव्यजीव वायु के मानव - पशु - पक्षी कीट - कृमि -प्राणी ) एवं सौम्यजीत्र ( अविध देवयोनिसर्ग ), नामक तीन प्रकार के ही माने गए हैं, जिसका पूर्वसन्दर्भों में यत्र तत्र संक्षेप, एवं स्तिार से स्पष्टीकरण होगया है । चिदात्मा विष्णु जिसमें गर्भ धारण करेंगे, वहीं क्षीर की अभिव्यक्ति होगी, एवं यही मूलसूत्र ' नीरक्षीरविवेक ' का मूलाधार माना जायगा । बात थोड़ी समझने जैसी है । विश्वप्रजा को हम वृपासर्ग, गोपसर्ग, भेद से दो भागों में विभक्त मानेंगे, जिनके मुल- पारमेय - अङ्गिरा और भृगु ही बने हुए हैं । भृगु का मंक्षिप्त नाम हम ' सोम ' रख लेते हैं, एवं अङ्गिरा का संक्षिप्त नाम " अग्नि ' मान लेते हैं । अग्निसृष्टिही वृपासृष्टि है, एवं इसी का नाम है -- ' पुरुषसृष्टि ' | सोमसृष्टि ही ' योपासृष्टि ' है, एवं ÷ पाँच भूती में से मृत -जल- तेज के निःशेष होजाने पर वायु ही शेष बच रहता है, जो प्राणवायु श्राकाशवत् नित्य ही माना गया है । यही भृगु के सम्बन्ध से ' महान ' कहलाया है - [ ' यथाकाशगतो नित्यं वायुः सर्गत्रगो महान ' - गीता ] । इस शेषता से ही यह सर्पगाशील - प्रचण्डवेग से घोधूयमान, आसुर - वारुण-अपतत्त्व से विषाक्त बना हुआ-- शरमेष्ठ्य वाबु ' अनन्तशेषनाग ' ( सर्प ) कहलाया है, जो सोमसम्बन्ध से मसृण कोमल भी है ।

* - मम योनिम्मंहद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भ दधाम्यहम् ।

सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत! ॥ १ ॥

सर्वयोनिषु कौ तेय! मूर्त्तयः सम्भवन्ति याः ।

तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥

२ ॥ --- गीता १०३२

पृष्ठ 769

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तृतीय अध्याय प्रथमत्राह्मण प्रथमकाण्ड इसी का नाम है - स्त्रीसृष्टि ' । नर [ पुरुष ], और मादीन [ स्त्री ], ही प्रमुख दो विश्वसर्ग हैं । आग्नेय पुरुषसर्ग, तथा सौम्य स्त्री सर्ग, दोनों हीं सर्ग शरीगनुन्धेन पोमय ही हैं, जैसा कि - ' इति तु पञ्चम्यामाहुत । त्रापः पुरुपवचसो भवान्त ' इत्यादि छान्दोग्यवचन से स्पष्ट है । वृषात्मक पुरुषों का शरीर भी पोमय ही है, एवं योपात्मिका स्त्रियों का शरीर भी आपोमय ही है । बिग्तु इन दोनों श्रापोमय शरीरों की मूलप्रकृति पृथक पृथक है । ग्राग्नेय वृषा - पुरुष की प्रकृति की मूल प्रतिष्टा जहाँ-' अग्नि ' ही है वहाँ सौम्बा योषा स्त्री की प्रकृति की मूलप्रतिष्टा- ' सोम ' ही है । अतएव अग्निप्रकृतिप्रधाना--वृषात्मिका -- पुरुष की सृष्टि में शरीरानुबन्धेन तत्त्व के विद्यमान रहने पर भी - ' सौम्य क्षीर ' [ सोमात्मक दूध ] की अभिव्यक्ति नहीं होने पाती । इधर सोमप्रकृतिप्रधाना योषात्मिका स्त्री की सृष्टि में इस के मूलप्रकृति-रूप सोमभाव के अनुबन्ध से इस के श्रापोमय शरीर में क्षीर [ दूध ] अभिव्यक्त होपड़ता है । और यों पुरुष और स्त्री, इन दोनों श्रापोमय शरीरों में से एक स्थान पर [ स्त्री के शरीर में ] तो क्षीर अभिव्यक्त होजाता है, एवं एक स्थान पर [ पुरुष के शरीर में ] क्षीर अभिव्यक्त नहीं होता । जहाँ क्षीर अभिव्यक्त होगा, वहीं चिदात्मा गर्भ धारण करेंगे, वहीं, उसी क्षेत्र में प्रजननधर्म अभि-व्यक्त होसकेगा । अतएव सौम्या, क्षीरिणी, मातृजाति ही महद्ब्रह्म की अभिव्यक्ति के द्वारा श्रीपपातिक चिदंश [ जीवात्मा ] को स्वगर्भ में धारण कर इसे भौतिक स्वरूप भी प्रदान करने में समर्थ बनती है, एवं अपने आपोमय शरीर में अपनी मूलभूता सौम्या प्रकृति से अनुप्राणित ' क्षीर ' से इस ' प्रजा ' का पोषण - वर्द्धन करने में भी समर्थ बन जाती है । और यों विश्वम्भर प्रजापति ने सृष्टिप्रक्रिया में - सौम्या - योपा के पोभाग में हीं - ' पग ' [ तीर - दूध- ] हित प्रतिष्ठित किया है - ' तदप्सु फ्यो हितम ' | पिता के लम तुलन में माता का स्थान क्यों सर्वोच्च माना गया?, प्रश्न का भी यही मौलिक रहस्य है । जहाँ--जहाँ -- सौम्य -- गोघा - प्राण अभिव्यक्त होगा, वहीं वहीं उसी उसी श्राप में अवश्य ही क्षीर अभिव्यक्त रहेगा । जहाँ जहाँ क्षीर अभिव्यक्त होगा, वहीं वहीं चिदात्मा अभिव्यक्त होगा । यों इस नीर - क्षीर विवेक के माध्यम से ही मानव जीव के ' जीवत्त्व ' से परिचित होसकेगा, इसी परिचय से इसे स्वरूपत्रोध होगा, एवं यही स्वरूप-' हंसो यथा क्षीरमित्राम्बुमध्यात् ' इस कविसूक्ति के अनुसार ऐसा माना जाता है कि “ यदि हँस नामक पक्षी के सम्मुख पानी और दूध मिलाकर रख दिया जाता है, तो - हँस दूध दूध तो पीजाता है, और जल छोड़ देता है । इसी आधार पर ' नीरक्षीर ' न्याय चल पड़ा है " । सम्भव है, ऐसा भी हो । किन्तु हम तो इस मान्यता के प्रति कोई आस्था नहीं रख रहे । ऐसा केवल कवि की कल्पना का ही साम्राज्य माना जायगा । वस्तुगत्या - ' तृतीयं च हंसमाहुः ' इस श्रति के अनुसार पारमेष्ठ्य गन्धर्वप्राणात्मक वायु का नाम ही ' हंस ' है । हंसात्मक यह पारमेष्ठ्य वायु ही अपनी मध्यस्थता से ग्रापः रूप नीर का, तथा सोमरूप क्षीर का विभाजक बना हुआ है । और निश्चयेन इसी मौलिक सत्तासिद्ध कारण के आधार पर - ' नीरक्षीरन्याय ' प्रक्रान्त हुआ है । यही पारमेष्ट्य हँस नामक वायव्यप्राण क्षीर के सहयोग से ' भोक्तासुवर्ण ' बन कर मातृ-गर्भ में जन्म लेता है । अतएव जीवात्मा का एक नाम ' हंस ' भी होगया है, जैसाकि ' शरीर रह गया, और हँसा उड़ गया ' इस ' लौकिक किंवदन्ती ' से भी स्पष्ट है । नीररूप प्रापोमय ब्रह्माण्ड में कम्र्मानुसार जन्म लेने वाला यह हंसरूप भोक्ता खुपर्ण ( जीवात्मा ) महद्ब्रह्मात्मक सौम्य क्षीर के तत्त्वबोधात्मक विभाजन से ही स्वरूपत्रोध में समर्थ चना करता है । और यही इसका - ' नीर - क्षीर - त्रिवेक ' है । १०३३

पृष्ठ 770

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तृतीय अध्याय प्रथम ब्राह्मण शतपथब्राह्मण जो इसके अभ्युदयनिः यस का कारण बनेगा, जिस इम प्रकृतिसिद्ध । कारणता के आधार पर ही लोक में ' नीरक्षीरन्याय ' प्रकान्स होपड़ा है । सौम्य चीरात्मिका पारमेष्ठ्या जगन्माता हैम अती उमा भगवती के अनुग्रह से ही प्रतिमानी देवनाओंने स्वरूप - बोध प्राप्त किया था, जिसका केनोपनिषत् में वित्तार से विश्लेषण हुआ है । उक्त प्रासङ्गिक नीर - क्षीर विवेक के माध्यम से प्रकृत में यही बतलाना है कि, — में हीं प्रकृति - अप्तत्व ने सीम्पाट [ बोपष्टि ] के अनुबन्ध से वह षय [ दूध ] प्रतिष्ठित किया है, जिसका उत्तर परिणाम ' आय ' [ धृत ] ही माना गया है । दुग्ध का भूत आय यपारूपा स्त्री का प्रकृतिसिद्ध प्रतिष्ठातत्त्व ही L माना गया है । यही क्षीरानुगत आज्य प्रजननधम्र्मानुगता प्रजा का मूलाधार है । आज यज़ के द्वारा दैवात्मा का प्रजनन हीं अपेक्षित है, वह बोत्रा पर ही अवलम्बित है । अतएव बोवाप्राणात्मिका यजमानपत्नी को प्रकृति सिद्ध - तदिदमप्सु जो हितम् इस कारणता के के अनुबन्ध से ही ' आपदर्शन ( कृतदर्शन ) कराया-जाता है । ' पवित्र ' से पहिले धान्य का प्रोक्षण किया जाता है, अनन्तर से प्रोक्षणी पानी का उत्पन होता है । इस प्रोक्षणी श्रोगाता उपसंर्ग से आज्ययुक्त बने हुए पवित्र है यानी में पथ का आचान । पानी में एक प्रकार का जीवनीय रस होता है । इसी जीवनीय रस को लक्ष्य में रखकर " जीवनं भुवनं वनम् ' इत्यादि रूप से पानी को ' जीवन ' कहा जाता है । इसी जीवनीय रस को - " यो वः शिवतमो रसः " ( यजुः ) इत्यादि रूप से " शिवतमरस " नाम से व्यवहृत किया जाता है । दिव्यात्मा इस जोबनीय शिवतम रस से बुक्त बनें, इसी अभिप्राय से यह उत्पवनकर्म किया जाता है ॥ २३ ॥

स्थिक् दक्षिणाकी है । ऋत्वि में अपने मनः प्रागा वाङ् मय आत्मा का जितना अंश व्यय करते हैं, उतना भाग दक्षिणा के द्वारा पूर्ण कर दिया जाता है । यदि दक्षिणादान नहीं होता है, तो बजमान के यज्ञात्मा ( दिव्यात्मा ) में ऋत्विजों का भी आत्मा समाविष्ट रह जाता है । यही यज्ञ का क्षतभाव ( अपूर्णता ) है । इस क्षतभाव की दक्षिणा से दूर किया जाता है । दक्षिणा से ऋगिग यश में जितने कम्मे करते है, देवताओं से जो आशीः माँगते हैं उन सबका साथ यजमान के साथ ही होता है । अतः अस्य को ही प्राज्यदर्शन करना चाहिए । " यजमान आज्यदर्शन करें " प्राचीनों का यह ग्राग्रह विज्ञानकोटि से सर्वथा बहिष्कृत, अतएव उपेक्षणीय ही है ॥ २६ ॥

सूर्य से चतुरिन्द्रिय का निर्माण होता है । सूर्य सत्यमूर्ति है । पुराणने पारमेष्ठ्य समुद्रगर्भित ज्यो-तिम्य चिन्मूर्ति ( सदा जामत ) इसी सौरविष्णु को ( यश को ) ' सत्यनारायण ' नाम से व्यबहुत किया है । यीमय अग्निनृत्तिं, अतएव सत्यमूर्य से निष्पन्न होने वाले चतु में सत्य की प्रतिष्ठा रहती है । मनु-ब्य के समीप चतु ही एक ऐसा साधन है, जिसके आधार पर यह सत्यासत्य के निर्णय पर पहुँच सकता है । अत्र यजमान यज्ञ में दीक्षा लेता है, तो - उसको स वै सत्यमेत्र वदेत् यह आदेश दिया जाता है । इस आदेश के श्रव्यवहितोत्तरकाल में हीं श्र तिने पूर्वपक्ष उठाया है कि, मनुष्य होकर सत्य बोले, यह सर्वथा असम्भव है । क्योंकि मनुष्य अनृतसंहित है । जब वह सत्य बोल ही नहीं सकता, तो फिर उसके लिए - ' तुम सत्य बोलो ' इस आदेश का क्या महत्त्व रह जाता है? । आगे जाकर इस पूर्वपक्ष का समाधान करती हुई श्रुति कहती है कि, यशप्रजापति की ओर से पुरुष में चक्षुःसत्य का निर्माण हुआ है । वह जैसा देखे वैसा बोल ' १०३४