Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 771–780

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 771–780

पृष्ठ 771

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तृतीय अध्याय प्रथम ब्राह्मण प्रथमकाण्ड बस यहीं पर इसकी सत्यभाषण- मर्यादा समाप्त होजाती है । यही रहस्य श्रुति स्मृति के साथ सम्बन्ध रखता है | वेद को ति क्यों कहा जाता है? इस प्रश्न के समाधान में बैज्ञानिक पाश्चात्य विद्वानांने यह कहा है कि, " वेदकाल में लेखनकला का अभाव था । उस समय सुन सुन कर ही वे मन्त्र कष्ट किए जाते थे । इम श्रवण - सन्बन्ध से ही वेद ' श्रुति ' नाम से प्रसिद्ध हुआ " । हमारे विचार से पश्चात्य विद्वानोंनें ' श्रुति ' शब्द के उक्त अर्थ के सम्बन्ध में बड़ी ही भूल की है । ' द्रषुर्वाक्यं श्रुतिः श्रोतुर्वाक्य स्मृतिः ' श्रुति स्मृति का यही अर्थ है । जिसने विषय के दर्शन किए हैं, उस की सुनाई हुई बात हमारे लिए श्रुति है, एवं श्रुति के आधार पर मनन करके जिसने श्रुति के उपर हितभाव को हमारे सम्मुख रखा है, उसका वाक्य ही ' स्मृति ' है । द्रष्टा सत्यचतु से देख रहा है । अतएव उसके वाक्य की प्रामाणिकता में किसी प्रकार का सन्देह नहीं रह जाता । अतएव द्रष्टा ऋषियों के वाक्यसंग्रहरूप श्रतिशास्त्र को स्वतःप्रमाण माना गया है । स्मृति श्रुत्यनुगा-मिनी है | अतः इसे परतः प्रमाण माना गया है । प्रकृत में हमें केवल यही कहना है कि, चतुरिन्द्रिय अव श्य ही सत्यभावापेत है । इसी आधार पर ' आँखों देखी परशुराम कभी न झुठी होय ' यह किवदन्ती प्रच लित है । यह चक्षुः सत्य सत्याग्नि है । अग्नि वृषा है । यजमानपत्नी ने अवेक्षण से श्राज्य में योषाप्राण का समाबेश किया था, यजमान का प्रतिनिधिरूप अध्वर्यु श्राज्य में सत्याग्निरूप नृपाप्राण का समावेश करता है । एवं इन सब के द्वारा बोपानृपात्मक यज्ञ की समृद्ध बनाता है ॥ २७ ॥

आाज्य तेजोरूप है | अग्निवृद्धि करना ग्राज्य का पहिला स्वभाव है । शुक्रवृद्धि करना दूसरा स्वभाव है, एवं अमृतपोषण करना तीसरा धर्म है । मनः प्रारण वाक् - तीनों में बाक् शुकतत्त्व है । प्राण तेज है । भन अमृत है । घृत से वाङ्मय शुक्र को वृद्धि होती है । प्राणमय ( आजमय ) शरीराग्नि प्रवृद्ध होता है । एवं मनोमय अभाग का पोषण होता है । इसप्रकार यह आज्य तेजः शुक्र- अमृत-रूप प्राण - बाकू - मन का पोषण करता हुआ भूतात्मा की समृद्धि का कारण बनता है । घृत से बढ़ कर आत्म-समृद्धि के लिए और दूसरा कोई उत्कृष्ट साधन नहीं है । श्राज्य का वास्तव में यही गुण है । ' तेजोऽसि शुक्र-मस्यमृतमसि ' इस सत्यभावना से भावित होकर श्राज्यदर्शन करने वाला अध्वर्यु अवश्य ही श्राज्य को सत्यविभूति से युक्त करता हुआ तद्द्द्वारा दिव्यात्मा को सत्ययुक्त ही बनाता है ॥२८ ॥

--इति - अनुवादप्रकरणम् प्रथमकाण्डानुगत तृतीय अध्याय का प्रथम ब्राह्मण एवं द्वितीय प्रपाठक का चतुर्थ ब्राह्मण उपरत 11 * 1 १०३५

पृष्ठ 772

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श्रीः अथ प्रथमकाण्डे तृतीयाध्याये द्वितीयं ब्राह्मणम द्वितीयप्रपाठके च पञ्चमं ब्राह्मणम् “ आज्यब्राह्मणम् ' 99 १६ - आज्यग्रहणकर्म्म १ – यज्ञप्रतिरूपरहस्यप्रकरणम ( मूल ) - पुरुषो वै यज्ञः । पुरुषस्तेन यज्ञः – यदेनं पुरुषस्तनुते । एष वै ताय-मानो यावानेव पुरुषस्तावान् विधीयते, तस्मात्पुरुषो यज्ञः ॥ १ ॥

तस्येयमेव जुहूः, इयमुपभृत्, आत्मैव वा । तद्वा श्रात्मन एवेमानि सर्वाण्यङ्गानि प्रभवन्ति । तस्मादु वाया एव सर्वो यज्ञः प्रभवति ॥ २ ॥

प्राण एव स्रुवः । सोऽयं प्राणः सर्वाण्यङ्गान्यनुसञ्चरति । तस्मादु स्रुवः सर्वा अनु सचः सञ्चरति ॥ ३ ॥

तस्यासवे जुहू, श्रथेदमन्तरितमुपभृत् इयमेव ध्रुवा । तद्वा श्रस्या एवेमे

सर्वे लोकाः प्रभवन्ति । तस्मादु वाया एव सर्वो यज्ञः प्रभवति ॥ ४ ॥

अयमेव स्रुवो योऽयं पवते । सोऽयमिमान् सर्वान् लोकाननुपवते । तस्मादु स्रुवः सर्वा अनुचः सञ्चरति ॥ ५ ॥

२ – अाज्यगृहणसंख्यानियमनप्रकरणम्-— स एष यज्ञस्तायमानो देवेभ्यस्तायते । ऋतुभ्यः, छन्दोभ्यः । यद्धविः, तद्ददेवानाम् । यत्सोमो राजा, यत्पुरोडाशः, तत्तदादिश्य गृह्णाति अमुष्मै त्वा जुष्टं गृहामीति । एत्रमु हैतेषाम् ॥ ६ ॥

अथ यान्याज्यानि गृह्यन्ते - ऋतुभ्यश्चैव तानि, छन्दोभ्यश्च गृहन्ते । ततदना-दिश्य-- श्रज्यस्यैव रूपेण गृह्णाति । स वै चतुर्जुह्वां गृह्णाति, अष्टौ कृत्व उप-भृति ॥ ७ ॥

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पृष्ठ 773

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तृतीयअध्याय प्रथमत्राह्मण प्रथमकाण्ड स यच्चतुर्जुह्वां गृहणाति - ऋतभ्यस्तद् गृह्णाति, प्रयाजेभ्यो हि तद् गृह्णाति । ऋतवो हि प्रयाजाः । तत्तद्नादिश्य- आज्यस्यैव रूपेण गृहणाति - अजामितायें । ' जाहि कुर्याद्यद्वसन्ताय त्वा ग्रीष्माय वेति गृह्णीयात् । तस्मादनादिश्य - आज्यस्यैव रूपेण गृहणाति ॥ ८ ॥

अथ यदष्टौ कृत्व उपभृति गृह्णाति - छन्दोभ्यस्तद् गृह्णाति, अनुयाजेभ्यो हि तद् गृह्णाति । छन्दांसि ह्यनुयाजा: । तत्तदनादिश्य - आाज्यस्यैव रूपेण गृहणाति - अजा-मितायें । जामिह कुर्याद्यद् गायत्र्यै त्वा त्रिष्टमे त्वेति गृहणीयात् । तस्मादनादिश्य यैव रूपेण गृह्णाति ॥ ३ ॥

अथ यच्चतायां गृहणाति - सर्वस्मै तद् यज्ञाथ गृहणाति । तचदनादिश्य -श्राज्यस्यैव रूपेण गृहणाति । कस्मा उ ह्या दिशेत् यतः सर्वाभ्य एव देवताभ्योऽद्यति । तस्मादनादिश्य - ज्यस्यैव रूपेण गृह्णाति ॥ १० ॥

३ - ज्यगृह णोपपत्तिप्रकरणम् – यजमान एव जुहूमन, योऽस्मा अरातीयति स उपभृतमनु । अचैव जुहूमनु, आद्य उपभृतमनु । अचैव जुहुः, आद्य उपभृत् । स वै चतुर्जुह्वां गृहणाति, अष्टोत्व उपभृति ॥ ११ ॥

स यच्चतुर्जुह्वां गृह्णाति -अत्तारमेवैतत्परिमिततरं कनीयांसं करोति । अथ यदष्टौ कृत्व उपभृति गृह्णाति - प्रद्यमेवैतदपरिमिततर ' भूयांसं करोति । तद्धि समृद्धम् - यत्रात्ता कनीयान, श्राद्यो भूयान् ॥ १२ ॥

सवै चतुर्जुह्वां गृहणन् भूय श्राज्यं गृह्णाति, अष्टौ कृत्व उपभृति गृहणन्-कनीय आज्यं गृणाति ॥ १३ ॥

सच्चतजुह्वां गृहणन भृय आज्यं गृहणाति अत्तारमेवैतत् परिमिततर कनी-यां कुर्वस्मिन् वीर्य्यं बलं दधाति । अथ यदष्टौ कृत्व उपभृति गृहरणन् कनीय आज्यं गृहणाति - द्यमेवैतदपरिमितत भूयांसं कुर्व स्तमवीर्य्यमवलीयांसं करोति । तस्मादुत राजाऽपारां विशं प्रावसाय, अप्येकवेश्मनैव जिनाति । त्वद्यथा त्वत्कामयते, तथा सचते– एतेनो ह तद्वीर्येण – यज्जुह्वां भृय आज्यं गृहणति । स यज्जुह्वां गृह्णाति - जुङ्ख व तज्जु-होति यदुपभृति गृहणाति - जुह्व व तज्जुहोति ॥ १४ ॥

पृष्ठ 774

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तृतीयध्याय द्वितीयत्राह्मया शतपत्राराण तदाहुः करमा उ तहयुपभृति गृहणीयान् यदुपभृतः न जुहोतीति । स यद्धोपभृता जुहुयान् पृथग्धेवेमाः प्रजाः स्युः -- नैवाचा स्यात् नाद्यः स्यात् । अथ यज्जुह्वेव समानीय जुहोति तस्मादिमा विशः क्षत्रियाय बलिं हरन्ति । अथ यदुपभृतिगृह्णाति तस्मादु क्षत्रियस्यैव वशे सति वैश्यं पत्र उपतिष्ठते । अथ यत-ज्जु व समानीय जुहोति तस्माद्यदोत क्षस्त्रियः कामयते अथाह वैश्यम् अपि यो प निहितम्, तदाहरेति, तं जिनाति । त्वद्यथा त्वत्कामपते, तथा सचते - एतेनो ह तद्वीर्येण ॥ १५ ॥

तानि वा एतानि छन्दोभ्य श्राज्यानि गृह्यन्ते । स यच्चतुर्जु ' गृह्णाति - गाय तद् गृह्णाति । अथ यदष्टौ कृत्व उपभृति गृह्णाति - त्रिष्टुब्जगतीभ्यां तद् गृहह्णाति । " अथ यच्चतु दायां गृह्णाति - अनुष्टुभे तद् गृह्णाति । वाग् वा अनुष्टुप् । वाचो वा इदं सर्व प्रभवति । तस्मादु वाया एव सर्वो यज्ञः प्रभवति । इयं वा अनुष्टुप्

इदं सर्व ं प्रभवति । तस्मादु वाया एव सर्वो यज्ञः प्रभवति ॥ १६ ॥

४ – ब्राज्यगूहणपद्धतिप्रकरणम्--स गृहणाति - धाम नामामि प्रियं देवानाम् [ १ ० ३० मं ० ] इति । एतद्वै देवानां प्रियतमं धाम - यदाज्यम् । तस्मादाह - धाम नामासि प्रियं देवानामिति । अनाधृष्टुं देवयजनमसि - [ ० १ ० ३१ ] इति । वचो ह्याज्यम् । तस्मादाह- अना-भ्रष्ट देवयजनमसीति ॥ १७ ॥

म एतेन यजुषा सक्रुज्जुह्वां गृहणाति, त्रिस्तूष्णीम् । एतेनैव यजुषा सदुपभृति गृहणाति, मप्तकृत्वस्तूष्णीम् । एतेनैव यजुपा सकृद् वायां गृहणाति, त्रिस्तूष्णीम् । : -त्रिस्त्रिरेत्र यजुषा गृह्णीयात् त्रिवृद्धि यज्ञ इति । तद् नु सकृत्सकृदेव | अत्रो ह्यव त्रिगृहीतं सम्पद्यते ॥ १८ ॥

तदाहु: -इति - शतपथब्राह्मण विज्ञानभाष्यं प्रथमकाण्डे तृतीयाध्याये द्वितीयं ब्राह्मणम् द्वितीयप्रपाठके च पञ्चमं ब्राह्मणम् ' ग्राज्यब्राह्मण ' -- नामकं उपरतम १०३६

पृष्ठ 775

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यतीतृायय द्वितीयब्राह्मण प्रथमकाण्ड मूलानुवाद-१ – यज्ञप्रतिरूप रहस्यप्रकरण-से पुरुष यह यज्ञ ( मनुष्ययजमान के द्वारा किया जाने वाला पुरुपस्वरूप वैध यज्ञ - सदृश ) निश्चयरूप ) है कि, जो कि ( मनुष्य की ह प्रतिकृति ) है । ( यह ) यज्ञ इसलिए पुरुष (, आदि ऋत्विग् गण, जो पुरुष ( यज्ञकर्त्ता यजमान, दक्षिणाकीत अध्वर्यु, होता, उद्गाता मन्त्र, हत्रि ब्रह्मा , आदि साधनों से विस्तार-कि पुरुष हैं ) इस यज्ञ को वितत करता है ( वेदि, कुण्ड, सम्पन्न होता है, इसलिए यज्ञ को-भाव में परिणत करता है ) । क्योंकि पुरुष के द्वारा ही यज्ञस्वरूप कारण से भी यज्ञ को पुरुष पुरुषकर्तृत्वेन अवश्य की ' पुरुष ' कहा जासकता है । ( एक दूसरे है । कण्डिका का उत्तर वाक्य कहा जा सकता है, जो कि कारण पहिले कारण की अपेक्षा प्रमुख पुरुषों के द्वारा ) वितायमान उसी का स्पष्टीकरण कर रहा है ) । यह ( वैध यज्ञ ) - ( ऋत्विजादि से फैलता हुआ ) निश्चयरूप से होता हुआ ( गार्हपत्य, श्रपाग्नि, आहवनीय वेदि, आदि रूप, उतना ही ( उतने हीं परिमाण जितना ( जितनी लम्बाई के परिमाण से ) पुरुष वितत रहता है की समता से ही यज्ञ को से सम्पन्न किया जाता है । पुरुषपरिणाम - सदृश विस्तारभाव ' पुरुष ' वहना अन्वर्थ बन जाता है ) ॥ १ ॥

यज्ञ की यही ( यज्ञ की प्रतिज्ञात पुरुष ( कारता सिद्ध करती हुई श्रुति कहती है कि ) - जुड़े - बायाँ इस हाथ ) है, ( दक्षिणभुजा - दहिना हाथ ) है, उपभृत् ( इस यज्ञ की ) यह ( प्रकार बाम - जुहू भुजा, उपभृत, ध्रुवा रूप धा ( इस यज्ञ का ) आत्मा ( मध्य अङ्ग - धड़ ही है । ( इस से युक्त रहने वाले यज्ञ से दक्षिण, वाम हस्त, एवं मध्याङ्ग - सम्पत्ति - लक्षणा पुरुषाकृति - सम्पत्ति है, यही तात्पर्य है । को अवश्य ही पुरुष ( पुरुष की प्रतिकृति - पुपसदृश ) कहा जासकता , इस जिज्ञासा का ( ' ध्रुवा ' नामक यज्ञपात्र आत्मा ( मध्याङ्ग ) की प्रतिकृति प्रत्यक्ष कैसे है है कि?, ( तद्वा ) आत्मा समाधान करती हुई आगे जाकर श्रुति कहती है कि ) - यह ( शरीरावयव ) उत्पन्न होते ( मध्याङ्गरूप धड़ ) से हा ये ( हस्त, पाद, मस्तकादि ) सब ) अङ्ग । इस वैधयज्ञ में आज्यपरिपूर्ण हैं ( निकलते हैं, रसप्राप्ति के द्वारा पुष्ट होते रहते है इतर सम्पूर्ण अङ्ग उत्पन्न वापात्र आत्मस्थानीय है, एवं आत्मा से ही अङ्गरूप हस्त पादादि के द्वारा धवा से ही घृत होते हैं, रसग्रहण करते है, अतएव ( यहाँ भी जूहू, - सम्पन्न उपभृत आदि होता है ( यज्ञ की इतिकर्त्तव्यता लेकर ) धवा से ही सम्पूर्ण साङ्गोपाङ्ग वैधयज्ञ - उत्पन्न अवश्य ही ' आत्मा ' माना पूरी की जाती है | अतः यज्ञस्वरूपसाधकभूत ध्रुवा को इस यज्ञपुरुष का जासकता है, यही तात्पर्य है ) ॥ २ ॥

हैं । शिरोभाग ( पुरुष के शरी, में ' हस्त पाद - आत्मा ' ये तीन स्थूल विभाग उपलब्ध । दक्षिणहस्त होते, दक्षिण पाद से आरम्भ कर मूलग्रन्थि पर्य्यन्त प्रदेश श्रात्मा ( धड़ ) माना जायगा १०८०

पृष्ठ 776

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तृतीयअध्याय प्रथमब्राह्मण प्रथम काराड का एक स्वतन्त्र विभाग, एवं वामहस्त, बामपाद का एक स्वतन्त्र विभाग माना जायगा । इसप्रकार पाञ्चभौतिक स्थूलशरीर को आत्मा ( धड़ ), दक्षिणहस्त ( तदुपलक्षित दक्षिणपाद ), बामहस्त ( तदुपलक्षित वामपाद ), इस क्रम से पुरुष को तीन भागों में विभक्त किया जायगा । त्रिविभागा-त्मक इस शरीर में ( शरीर के सम्पूर्ण अवयवों में ) अवारपारीण सवार करने वाला चैतन्यभारण एक चौथा स्वतन्त्र तत्त्व माना जायगा, जिसकी सत्ता बनते जीवनीयरस जड़ - भूत क्रियाशील हुए युक्त रहते हैं । पुरुष संस्था की इन चार अवान्तर संस्थाओं में से आत्मा ( धड़ ), दक्षिणहस्त ( पाद ), वामहस्त ( पाद ), इन तीन भौतिक अवयवों की प्रतिरूपता तो क्रमशः ध्रुवा, जुहू, उपभृत, इन तीन यज्ञपात्रों के द्वारा सिद्ध करदी गई । अब शेप चौथा चैतन्यप्राण रह जाता है । इसकी प्रतिरूपता बतलाती हुई श्रुति कहता है ( इस यज्ञ में उपयुक्त होने वाला ) ' स्व ' नामक यज्ञपात्र प्राण ही है । त्रवपत्र प्रारण-स्थानीय क्यों माना गया?, प्रश्न का समाधान करती हुई श्रुति कहती है ) -( हम देखते हैं कि, पुरुषशरीर में केश - लोम, एवं नखाग्रभागों को छोड़कर ) यह चैतन्य प्राण ( वैश्वानराग्नि ) शरार के सम्पूर्ण अङ्गों ( को लक्ष्य बनाकर इन अङ्गों ) में विचरता रहता है । ( हम देखते हैं कि, इस यज्ञसंस्था में ' स्रुव ' नामक यज्ञपात्र, जुहू - उपभृत् - ध वा आदि इतर सभी कुपात्रों के साथ सम्बन्ध रखता । इसी आधार पर हम कह सकते हैं कि, आत्मा - वाहहस्त ( एवं पाद - स्थानीय ध्रुव- जुहू - उपभृत आदि खचों में सञ्चरण करने वाला खुब अवश्य ही प्राणस्थानीय है ) इसीलिए ( प्राणस्थानीय होने से ही ) तो यह स्रुव - पात्र सब खचों ' को लक्ष्य बनाकर सत्र ) में विचरता है ॥ ३ ॥

यह वैधयज्ञ पुरुष की प्रतिकृति किस आधार पर माना गया? इस प्रश्न का समा-धान श्र तिने पुरुषात्मक आध्यात्मिकयज्ञ के द्वारा किया । पुरुषयज्ञ ( आध्यात्मिकयज्ञ ) का जैसा स्वरूप है, उस में जैसा अवयवसंस्थान है, पुरुपकर्तृक, आधिभौतिक, स्वर्गादि - अभीषु फलसाधक इस वैधयज्ञ का स्त्ररूप, तथा संस्थान भी वैसा ही है । अतः ' समतुलन न्याय ' से इस वैधयज्ञ को भी ' पुरुष ' कहना न्यायसङ्गत बन जाता है । श्रय इस सम्बन्ध में दो प्रासङ्गिक प्रश्न और उपस्थित होते हैं । पहिला प्रश्न यह है कि, जिस पुरुष के आकार के आधार पर वैवयज्ञ का तथाभूत वितान किया जाता है, उस पुरुष ( आध्यात्मिकयज्ञ ) का स्वरूप ही एवंविध ( यज्ञात्मक ) कैसे, और क्यों बना? | जिस आधिदैविक जगत् ( प्रकृति ) से पुरुषयज्ञ ( आध्यात्मिकयज्ञ ) उत्पन्न हुआ है, उसे लोक - वेद में ' यज्ञ ' शब्द से व्यवहृत किया गया है । उसे ( आधिदैविकजगत् को ) यज्ञ किस आधार पर कहा गया?, क्या वहाँ भी जुहू, उपभृत, आदि यज्ञस्वरूप संसाधक परिग्रह विद्यमान हैं? । यही इस सम्बन्ध में दूसरा प्रश्न है । इन प्रश्नों के समाधान ७ द्देश्य केवल यही बतलाना है कि, आधिभौतिकयज्ञ ( मनुष्यकृत बैचयज्ञ ) की प्रतिष्ठा आध्या-त्मिक यज्ञ ( पुरुपाकार | कयज्ञ ) है, एवं इस आध्यात्मिक यज्ञ की प्रतिष्ठा द्यावापृथिव्यात्मक, सम्वत्सरलक्षण आधिदैविक यज्ञ है । मनुष्यकृत - यज्ञ का स्वरूप एवंविध क्यों? इस प्रश्न की उपनिपत् ( उपपत्ति- मौलिकरहस्य ) आध्यात्मिकयज्ञ है । आध्यात्मिक - यज्ञ ( पुरुष ) का एवंविध

पृष्ठ 777

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तृतीय अध्याय द्वितीयत्राहाण शतपथब्राह्मण स्वरूप क्यों? इस प्रश्न की उपनिपत आविदैविक, प्राकृतिक, नित्ययज्ञ है, जिसका कि - ' यद्वै देवा कुस्तत् करवाणि ' - ' देवाननुविधा वै मनुष्याः - ' सह यज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः-' गज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः ' इत्यादि श्रांताप्रमाणां से समर्थन हुआ है । जय श्रति ने आधिभौतिक, आध्यात्मिक यज्ञों का स्वरूप बतला दिया, तो प्रकरणवश श्रुति के लिए भी आवश्यक होगया कि, वह प्रसङ्गोपात्त तीसरे आधिदैविकश्यज्ञ का स्वरूप भी बतलावे, साथ साथ उनकी भी इनके साथ प्रतिरूपता सिद्ध करे । इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए ४-५ कण्डिकाएँ पाठक के सम्मुख उपस्थित होरहीं हैं-उस ( आधिदैविकयज्ञ ) की यह ( बड़ी दूर दिखलाई देने वाला सौरमण्डलोबलक्षित ) ही जुहू ( दक्षिणहस्तपादका प्रतिरूप ) है एवं यह अन्तरिक्ष ( द्यावापृथिवी के मध्य का प्रदेश ) उपभृत् ( बामहस्त का प्रतिरूप ) है । वह पृथिवी ही ध्रुवा ( आत्मा का प्रतिरूप ) है । ( पुरुष यज्ञ की प्रतिरूपता सिद्ध करते हुए धबा की आत्मप्रतिरूपता का समर्थन किया गया था । अतः उसकी भी पुष्टि होनी चाहिए । आत्मा नही माना जायगा, जिस से हस्त पादादि सब अङ्ग उत्पन्न होते होंगे । पृथिवी को बाल क्षरण आत्मा तभी कहा जासकेगा, जब कि वह अन्त-रिक्ष, लोकरूप उपभृत, तथा जुहू, इन दो अङ्गों की उपपत्ति का कारण बन सकेगा । इसी तिरूपता का स्पष्टीकरण करती हुई श्रुति कहती है ) -ग्रह यथार्थ है ( तद्वा ) कि, इसी * पृथिवी से सत्र लोक ( पृथिवी, अन्तरिक्ष द्यौः आपः, आदि लोक ) उत्पन्न हुए हैं । ( क्योंकि पृथिवी से सब लोक उत्पन्न होते हैं, एतएव पृथिवी अवश्य ही आत्मरूप ध्रुवा है । क्योंकि ध्रुवा से ही यज्ञस्वरूप की निष्पत्ति होती है ) । अत ( आधि-for मण्डल में ) पृथिवीरूप ध्रुवा से ही सम्पूर्ण यज्ञ ( आधिदैविक - सम्वत्सरबज्ञ ) उत्पन्न हुआ है ॥ ४ ॥

( स्थूलाङ्गभूत जुहू, उपभृत, तथा ध्रुवा की प्रतिरूपता के सम्बन्ध में क्रमशः द्यौ, अन्तरिक्ष, पृथिवी ( भूषि es ), इन तीन लोकों के द्वारा आधिदैविक यज्ञ की प्रतिरूपता सिद्ध की गई । अब वह सर्वसारी चैतन्य - प्राण शेष रहा, जो कि आधिभौतिक यज्ञ में ' पात्र ' के रूप से, एवं आध्यात्मिक यज्ञ में ( सोमभ्यः, अनखायेभ्यः व्याप्त वैश्वानराग्निप्राण के रूप से प्रतिष्ठित है । इसी चैतन्य-प्राण की आधिदैविकयज्ञ में प्रतिरूपता बतलाती हुई श्रुति कहती है ) - -( इस आधिदैविक यज्ञ का ) यही खुब ( चैतन्यप्राण ) है, जोकि यह ( त्रैलोक्य में ) प्रवाहित है ( वह रहा है ) । ( पुरुषयज्ञ की प्रतिरूपता में प्रारण, और खुब की प्रतिरूपता बतलाई गई थी । * पाठक सन्देह करेंगे कि प्रथम तो पृथिवी से अन्तरिक्षादि लोकों की उत्पत्ति मानना हीं असङ्गत है । यदि श्रभ्युपगमाद से थोड़ी देर के लिए ऐसा मान भी लिया जाय, तत्र भी पृथिवि से पृथिवी की उत्पत्ति मानना तो कथमपि मुमङ्गत प्रतीत नहीं होता? | इस जिज्ञासा का सोपपत्तिक समाधान आगे याने वाले उप-पति - प्रकरण में किया जाकगा । १०४२

पृष्ठ 778

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 778 का मूल पृष्ठ
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वृत्तीय अध्याय द्वितीयवा प्रथम काण्ड अतः यहाँ भी उस प्रतिरूता का स्पष्टीकरण होना चाहिए । आधिदैविकयज्ञ - संस्था में प्रारण बही माना जायगा, जो कि जुहू, उपभृत, ध्रुवोपलक्षित पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोकों को लक्ष्य बनाकर जिन में - सञ्चरण करता होगा । इसी प्रतिरूपता का दिग्दर्शन कराती हुई श्रुति कहती है ) — यह वायु ( केश - लोम - स्थानीय - वनस्पति - प्रोपधि - धातुवर्ग, आदि पिण्डों के आभ्यन्तर भाग ' छोड़कर एवं नवास्थानीय भूपिएड के आभ्यन्तर प्रदेश को छोड़कर, शेष बचे हुए ) इन सब लोकों में ( त्रिवृत्स्थानोय पृथिवीलोक, पञ्चदशस्थानीय अन्तरिक्षलोक, एवं एकविशस्थानीय द्युलोक में, जो कि तीनों लोक आधिदैविकी यज्ञसंस्था के अङ्गस्थानीय हैं, इह लक्ष्य बना कर इन सब में वह ( वायु ) बह रहा है ( सञ्चरण कर रहा है ) । ( क्यों कि वायु सत्र लोकों में सचरण कर रहा है, उधर यज्ञप्रक्रिया में त्रुचों में सवार करने वाला हो स्रुत्र माना गया है, इसी अभिप्राय को व्यक्त करती हुई कहती है ) - अतएव निश्चयरूप से यह खुव ( त्रैलोक्यसञ्चारी बायत्र्यप्राण ) इतर स्त्रु चों को ( जुड़ - उपभृत - ध्रुवा स्थानीय अन्तरिक्ष - पृथिवी को लक्ष्य बना कर ) इन में सच-रण कर रहा है || ५ || ( १ ) — इति - यज्ञप्रतिरूपरहस्यप्रकरणम् * प्रकत ब्राह्मण में प्रधानरूप से ' श्राज्यग्रहण ' की इतिकर्तव्यता ( पद्धति ) का ही निरूपण हुआ है । यज्ञमण्डल में एक नियत स्थान पर आज्य से परिपूर्ण एक नियत पात्र रकबा रहता है । एक ही स्थान पर सदा स्थिररूप से प्रतिष्ठित रहने वाला वही श्राज्यपात्र ' ध्रुवा ' कहलाता है । ध्रुवापात्र एक ही स्थान पर स्थिर क्यों रहता है?, इस प्रासङ्गिक प्रश्न- समाधि के लिए ही श्रुति को पद्धति- प्रदर्शन से पहले यज्ञ का मौलिक स्व-रूप बतलाना आवश्यक प्रतीत हुआ । श्रारम्भ की ५ कण्डिकओं में श्रुति ने प्रतिरूपविधि से अधिभूत, अध्यात्म, अधिदेवत, इन तीन यज्ञ - संस्थाओं का स्वरूप बतलाया । इसी आधार पर पञ्चकण्डिकात्मक प्रक-रण को एक स्वतन्त्र प्रकरण मानते हुए हमने इसे ' यशिप्रतिरूप रहस्यप्रकरण ' नाम दे देना उचित मान लिया है । आधिभौतिक वैधयज्ञ को मध्यस्थ बनाकर यज्ञकर्त्ता यजमान अपने आध्यात्मिक यज्ञ का आधिदैविक यज्ञ के साथ सम्बन्ध कराता है, एवं यही यज्ञ का मूल्य उद्देश्य है । इस उद्देश्य की सफलता के लिए छन्द, तथा ऋतुओं से वेष्टित सम्वत्सरमएलस्थ प्राणदेवताओं का ही यजन होता है, जैसा कि पाटक उपपत्ति प्रकरण में विस्तार से देखेगें । यज्ञ के उद्देश्य प्राणदेवता हैं, एवं इनकी आधिदैविक यज्ञ से तुलना करते हुए आधिदैविक यज्ञ की प्रतिरूपता का परिज्ञान आवश्यकरूप से अपेक्षित है । अतएव पद्धति से पहले प्रतिरूपरहस्य का दिग्दर्शन कराना पड़ा, और इस दिग्दर्शन का मूलकारण बना ' ध्रुवापात्र ' । ब्राह्मण ने ध्रुवा से ज्यग्रहण का विध्वान किया है । वा से ही श्राज्यग्रहण क्यों किया जाय?, इस स्वाभाविक, तथा प्रासङ्गिक प्रश्न के समाधान के लिए ही प्रथम ' यशप्रतिरूप - रहस्य ' बतलाना आवश्यक समझा गया है । क्योंकि आधिभौतिक यज्ञ का अाध्यात्मिकयज्ञ के साथ जैसे अविच्छिन्न सम्बन्ध है, एवमेव आध्यात्मिकयज्ञ का आधिदैविक यज्ञ से साथ भी घनिष्ठ सम्बन्ध है । इस समान - सम्बन्धदृष्टि से भी प्रसङ्गवश श्रुति को अधिभूत, अध्यात्म की प्रतिरूपता के साथ साथ अध्यात्म, एवं अधिदैवत की प्रतीरूपता भी बतलानी पड़ी । १०४३

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 779 का मूल पृष्ठ
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तृतीयअध्याय द्वितीयब्राह्मण शतपथब्राह्मण २ - श्राज्यगृहण संख्या नियमन प्रकरण --( जैसाकि टिप्पणी में स्पष्ट कर दिया गया है, आरम्भ की ५ कण्डिकाओं में निरूपणीया पद्धति का प्रथम कोई निरूपण न होकर ब्राह्मणग्रन्थों की स्वाभाविकशैली से सम्बन्ध रखने वाला “ यज्ञप्रतिरूपग्हस्य ” ही प्रतिपादित हुआ है । अत्र ६ ठी कण्डिका से ही पद्धति - प्रदर्शन का उपक्रम किया जाता है ) — ( यज्ञरहस्यवेत्ता प्रवयुं होता, उद्गाना, ब्रह्मा, आदि विद्वान ऋत्विजों के द्वारा प्रकृत्यनु-सार ) वितायमान यह यज्ञ ( आधिभौतिकयज्ञ ) देवताओं, ऋतुओं, तथा छन्दों के लिए ही त्रिलत किया जाता है । ( आहुतिद्रव्यों में से ) जो हविद्रव्य है, वह ( प्रधान ) देवताओं के लिए नियत है, जोकि आहुतिद्रव्य सोमराजा, एवं पुरोडाश है । ( तात्पर्य यही है कि सोमवल्ली का रस, तथा पुरोडाशलक्षण आहुनिद्रव्य, ये दोनों हविद्रव्य * प्रधान ( आप ) देवताओं के लिए नियत हैं । इह्न नाम ग्रहण पूर्वक ही आहुति दी जाती है, इसी अभिप्राय से आगे जाकर श्रति कहती है ) -क्यों कि X अन्नपुरोडाश, अन्नपुरोडाशोपलक्षित ' पापुरोडाश, ' एवं सामरस, ये तीन आहुति - द्रव्य देवताओं के लिए नियत हैं, एवं देवता ( प्रारण देवता मूलरूप से ३३, ३, १, होते हुए भी अपने महिमारूप से ) संख्या में भी अनन्त हैं, साथ ही तत्तत्यज्ञविशेषों में तत्तद् विशेष देवता ही प्रधान रहते हैं, इसलिए भी ) वह ( हविद्रव्य ) उन उन देवताओं का ( ' अग्नये त्वा जुएं गृह्णामि ' - ' अग्नीषोमाभ्यां त्वां जुएं गृणामि उपयामगृहतोऽसि वायव, इन्द्रवायुभ्यां त्वा जुट गृणामि इत्यादि रूप से नाम निर्देशपूर्वक ही ) ' अमुष्ये त्वा जुएं गृह कामि । श्रमुक देवता के लिए रुचिपूर्वक सेवन योग्य तुह्याग हर्विद्रव्य का ग्रहण करता हूँ ) इत्यादिरूप से नामनिर्देश करके ही ( आहुति द्रव्य का ) ग्रहण करते हैं । ( इस नामनिर्देशपूर्वक हविर्य हा का कारण यही है. कि ) देवताओं के सम्बन्ध में ( परम्परागत यज्ञपद्धतिन्थों में ) यही प्रकार ( हर्विग्रहण साधक मन्त्र पृथक् नाम निह शपूर्वक ही पढे हुए हैं, यही आउन सम्मत प्रकार ) है ॥ ६ ॥

* यज्ञ में जिन देवताओं को आहुति दी जाती वे देवता श्रवाप प्रयाज, अनुयाज भेद से तीन शियों में विभक्त हैं । प्रवान प्राणदेवता ' आवापदेवता ' कहलाती हैं, प्राणात्मिका मुख्य देवताओं की प्रतिष्ठारूपा वसन्तादि ऋतुएँ ' प्रयाजदेवता ' कहलाती हैं । एवं देववाहनरूप गायत्र्यादि छन्द ' अनुयाजदेवता ' कहलाती हैं । सोमरस, पुरोडाशलक्षण हबिदंत्र्य, श्राज्य, ये तीन आहुति द्रव्य हैं । तोनों में सोमरस तथा पुरोडाश तो केवल आवापदेवताओं के लिए नियत है, एवं ऋतु छन्दोरूप प्रयाज- अनुयाज - देवताओं की श्राज्याहुति दी जाती है । X इधि - पशु -- सोम - भेद से यज्ञसंस्था तीन भागों में विभक्त मानी गई है । इन तीनों में से ' इट ' में ' अन्न पुरोडाश ' की ग्राहुति होती है । ' पशुबन्ध ' में प्रारूप से ' पशुपा ' की आहुति होती है । एवं ' ग्रहयागा ' पर्यायक ' मोमयाग ' में प्रवानरूप में - चालीम संख्या में विभक्त ग्रहपात्रों में स्थित ' भोमरस ' की आहुति होती है ।

पृष्ठ 780

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 780 का मूल पृष्ठ
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तृतीयध्याय द्वितीयब्राह्मण प्रथमकाण्ड को प्रथा-( प्रत्येक यज्ञ में " अन्न- पशुवपा- सोमरस ' तीनों में से किसी हवि एक एवं तो आज्य हविद्रव्य भेद से प्रत्येक नता रहती ही है, दूसरा आहुतिद्रव्य आज्य रहता है । इसप्रकार तो प्रधान देवता के साथ यज्ञ में दी आहुतिद्रव्य रहते हैं । इन में से हविद्रव्य का सम्बन्ध करते हैं ) -बतला दिया गया । अब ' आज्य ' नामक आहुतिद्रव्य की व्यवस्था [ विद्रव्य के अतिरिक्त ] जो [ दूसरे ] आज्यों का ग्रहण किया छन्दों जाना के है लिए , उन, ' आज्यों च ' कारान क्रा ग्रहण [ प्रयाजदेवतारूप ] ऋतुओं के लिए, तथा [ अनुयाजदेवतारूप. स्विकृत् - देवता प्रधान देव-स्विकृत्याग ' के लिए ] किया जाता है । [ क्योंकि ऋतु छन्द इन्हीं सब कारणों से अध्वर्यु ताओं की अपेक्षा गौण हैं, साथ ही ये संख्या में भी परिगणित हैं, आज्यरूप से ही [ समप्रिरूप उस आज्य ] का [ प्रयाजानुयाजादि गाँण देवताओं का ] नाम देवता न लेकर के लिए जहाँ हहि नामनिर्दे-से ही ] ग्रहण करता है । तात्पर्य यही हुआ । कि, प्रधान विना नामनिर्देश के ही करना शक होता है, वहाँ प्रयाजानुयाजादि सम्बन्धी आज्य का ग्रहण सम्बन्ध में विशेषता बतलाते हैं | -चाहिए । ग्रहण सम्बन्ध में व्यतिक्रम बतला कर अब ग्रहण पर स्थित आज्यपरिपूर्ण वा में स्र ुत्र के द्वारा घृन ले लेकर ) वह ( अध्वर्यु नियत स्थान बार करके उपभृत् में चार बार तो जुहू में घृत - ग्रहण करता है, एवं ( उसी खुब से ) आठ ग्रहण करता है || ७ || सो जो कि श्रध्वर्यु चार बा करके ( स्रुब से ) जुहू में ( बिना ( चतुर्वार नाम ) निर्देश ज्यग्रहण के ) आज्य- करता ग्रहण करता है ( उसका कारण बतलाते हैं ) । ऋतुओं के लिए ) आज्य प्रयाजदेवताओं के लिए ही है । ( ऋतुरूप प्रयाजदेवताओं के उद्देश्य से चतुर्गृहीत यह । उस आज्य का ( ऋतुरूप प्रयाज देव-ग्रहण करता है । ( क्योंकि ) ऋतुएँ हीं प्रयाज ( देवता ) हैं से ही ग्रहण करता है । ताओं के नाम निर्देश के विना हीं ) * अजामिता के लिए आज्यरूप इत्यादि रूप से ( नाम-( वह अध्वर्यु ' + ' जामि ' करेगा, ओ कि यदि ' वसन्ताय, न ग्रीष्माय हो, इसलिए त्वा ' ) प्रयाज- देवताओ निर्देशपूर्वक ) ज्यग्रहण करगा । इसलिए ( जामि दोष के लिए चतुर्वार जुहू में ज्य ] -का नामनिर्देश न कर आज्य के ही रूप से [ प्रयाजदेवताओं ग्रहण करता है || ८ || सो जो कि अध्वर्यु आठ अर करके [ स्रुव से ] उपभृत के लिए में [ आठ बिना बार नाम करके निर्देश ] आज्य- के ] आज्य - नहण करता है, [ इसका कारण बतलाते हैं । छन्दों कृत्य गृहीत यह ] आज्य अनु-ग्रहण करता है । [ छन्दोरूप अनुयाज - देवताओं के उद्देश्य से अौ हीं अनुयाज हैं । उस आज्य का याज - देवताओं के लिए ही ग्रहण करता है । [ क्योंकि ] छन्द के लिए आज्यरूप उन छन्दोरूप अनुयाज- देवताओं के नाम निर्देश के बिना हीं ] अजामिता से ही ग्रहण करता है । * सभ्यता की रक्षा के लिए । + जामि- असभ्यता,