Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 781–790
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 781–790
पृष्ठ 781
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीयमध्याय द्वितीयब्राहाण शतपथब्राह्मगा [ अ ] जामिदोष का प्रवतक बनेगा, जो कि यदि ' गाय ये त्या त्रिशु मे त्वा ' इत्यादि रूप से [ नामनिर्देशपूर्वक ] आज्यग्रहण करेगा । इसलिए [ जामिदोष न हो, इसलिए ] अनुयाज देवताओं का नाम निर्दोश न कर श्राज्य के ही रूप से [ अनुयाज देवताओं के लिए
आठ बार करके उपभृत में आज्य । ग्रहण करता है ॥ ६ ॥
T श्राज्यग्रहण के सम्बन्ध में अभी एक बात शेष रह गई । जुहू, उपभृत, धवा, तीनों को ' कू ' कहा जाता है । इनमें जुहू, तथा उपभृत् नाम की खुचों के सम्बन्ध में तो आज्यग्रह्ण की व्यवस्था बतला दी गई । परन्तु अभीतक इस सम्बन्ध में कोई स्पष्टीकरण न हुआ कि, तीसरी वा नाम की ख़ुक में कहाँ से लेकर तो आज्य भरा जाता है, कितनी बार करके भरा जाता है, एवं नाम निर्देश पूर्वक भरा जाता है, अथवा जुहू - उपभृत्, इन अन्य स्रुचों की भाँति बिना नाम निर्देश के श्रज्य प्रहण होता है? | क्योंकि ध्रुवा भी स्रुक है, अतः इतर दोनों स्रुचों के आय की व्यवस्था साथ समानप्रकरण के कारण ध्रुवा नाम की सकु से सम्बन्ध रखने वाली आज्यग्रहण व्यवस्था का भी स्पष्टीकरण होना चाहिए । इसके अतिरिक्त के सम्बन्ध मेंएक सन्देह और उपस्थित होता है । पूर्वप्रतिपादित ध्रुवा ' यज्ञप्रतिरूपगृहम्य ' के अनुसार ध्रुवा आत्मस्थानीय बनता हुआ सम्पूर्ण यज्ञ की प्रतिष्ठा है । इस सर्वयज्ञसम्पन्नता की दृष्टि से ध्रुवापात्र केवल जुहू - उपभृत में क्रमशः चतुर्वार- अवार गृहीत आज्य से सम्बन्ध रखने वाले प्रयाज- अनुयाज नामक गौण देवताओं की ही प्रतिष्ठा नहीं है, अपितु यज्ञिय अन्य आत्राप - देवताओं की भी प्रतिष्ठा है । उधर पूर्व में यह व्यवस्था हुई है कि, प्रधान देवता के लिए तो नामनिर्देश पूर्वक हविग्रह करना चाहिए एवं प्रयाजानुयाज - देव-ताओं के लिए बिना नाम निर्देश के ही राज्यग्रहण करना चाहिए । इधर ध्रुवापात्र गौण, तथा मुख्य, सब देवताओं की प्रतिष्ठा है । ऐसी दशा में यदि विना नामनिर्दश के ध्रुवा में घृत डाला जायगा, तो प्रधान देवता का सम्बन्ध न होगा, और यदि नाम निर्देशपूर्वक घृत डाला जायगा, तो गौण देवता का सम्बन्ध न होगा । अपेक्षित है दोनों का सम्बन्ध, क्योंकि दोनों के समन्त्रय से ही यज्ञस्वरूप निष्पन्न होता है, एवं ध्रुवा सम्पूर्ण यश की प्रतिष्ठा है । फलतः ध्रुवा - सम्बन्धी श्राज्यप्रहण के सम्बन्ध में उक्त सन्देह एक जटिल समस्या बन जाता है । इहीं सत्र विप्र-तिपत्तियों का निराकरण करने के लिए धुत्रा - सम्बन्धी आज्यग्रहण की व्यवस्था बतलाई जाती है ] -[ आरम्भ से यज्ञ समाप्ति - पर्यन्त यज्ञिय कर्म में जितना आज्य अपेक्षित रहता है, अपे-क्षित नियत मात्रा से अन्य सामग्री - सम्भार के साथ साथ श्राज्य का भी एकवार ही संग्रह कर लिया जाता है । यज्ञकम्मोंपयोगी इस श्राज्य को पहिले से ही नियत जिस यज्ञिय पात्र में निंयत स्थान पर कोशरूप से सुरक्षित रख लिया जाता है, वह पात्र श्राव्यस्थाली ' नाम से प्रसिद्ध है । आहुति के लिए धवा में भरे हुए श्राज्य का खुब से उपयोग होता है । जब जब ध्रुवा में श्राज्य अपेक्षित होता है, तत्र तत्र कोशस्थानीया उस श्राज्यस्थाली से इस ध वापात्र में घृत ले लिया जाता है । जिसप्रकार स्रुब के द्वारा ध्रुवा में से जुहू, और उपभृत में बिना नामनिर्देश के क्रमशः
पृष्ठ 782
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीयश्रध्याय द्वितीयब्राह्मण चतुर्वार - आठवा आज्यग्रहण होता है, वैसे ज्यस्थाली में से ध्रुवा में प्रथमकाण्ड कितनी बार में करके आय भरा जाता है?, एवं प्रधानदेवतावत् नामनिर्देशपूर्वक भरा जाता है?, अथवा गौण-देवता बिना नामनिर्देश के?, ये दो प्रश्न हमारे सामने आते है । इह्रीं का क्रमशः समाधान करती हुई श्रुति कहती है ] -जो कि [ अध्वर्यु जुहू - उपभृन् में आज्यस्थाली में से ] चार बार करके ध्रुवा में आज्य-ग्रहण करता है– [ उसका कारण बतलाते हैं ] । उस [ आज्य ] को सम्पूर्ण यज्ञ के लिए [ चार बार करके आज्यस्थाली में से ध्रुवा में ] ग्रहण करता है ॥ तात्पर्य यही हुआ कि, ध्रुवा में आज्यस्थाली से चार बार करके जो आज्यग्रहण किया जाता है, इस आज्यहरण का सम्बन्ध न तो प्रधानदेवता के साथ ही है, न केवल गौणदेवता के साथ ही । अपितु गौण, प्रधान, स्विकृत, आदि सम्पूर्ण देवताओं से युक्त सम्पूर्ण यज्ञ की सिद्धि ही इस आज्यग्रहण का मुख्य उद्देश्य है । क्योंकि सम्पूर्ण यज्ञ इस ग्रहण का उद्देश्य है, एवं ' चतुभ्यं वा इदं सर्वम् ' इस निगम के अनुसार यह सवत्त्व चार पर्वो पर निर्भर है, अतः विना नामनिर्देश के केवल चार बार करके ही थाली से ध्रुवा में आज्यग्रहण करना न्यायसङ्गत बनता है । यही स्पष्ट करते हुए आगे जाकर श्रुति कहती है ] -उस [ आज्य का देवतादि के नामनिर्देश के बिना आज्य के ही रूप से ग्रहण करता है । किस देवता के लिए नामनिर्देश करे, जबकि [ इस ध्रुवा में ] सभी [ गौण, मुख्य, स्त्रिष्कृदादि ] देवताओं के लिए * अवदान ( अंश - विभाग ) करता है । ( अर्थात जब भवा सब की प्रतिष्ठा है, तो मानना पड़ेगा कि, ध्रुवा में स्थित आज्य भी सभी की प्रतिष्ठा । इस में नाम वाले एवं बिना नाम वाले गौण - मुख्य सभी देवता संयुक्त हैं । ऐसी दशा में नाम आग्रह के सम्बन्ध में अधिक से अधिक ' सर्वाभ्यः - सर्वस्मै ' कहना हीं पर्याप्त है । जब ' सर्वस्मै सर्वाभ्यः ' स्वतः सिद्ध है, तो ग्रहणकाल में इन प्रयोगों की भी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती । अतएव ( सर्वप्रति--प्रारूप होने से हो ) किसी का नामनिर्देश किए बिना ( आज्यस्थाली में से ध्रुवा में ) आाज्य के रूप से ही ( चार बार करके श्राज्य ) ग्रहण करता है ॥ १० ॥
÷ २ - इति याज्यगृहणसंख्यानियमन प्रकरणम् * - श्राज्यस्थानी से उपयोगानुसार ध्रुवा से चार बार कर के श्राप ग्रहण करना ही ' अब--दान ' है । ÷ ६ ठी कण्डिका से आरम्भ कर १० वीं कण्डिका पर्यन्त ५ कण्डिकाओं का एक स्वतन्त्र प्रकरण मानना चाहिए । इस प्रकरण में प्रधानरूप से ' आज्यग्रहण ' की संख्याओं का ही विचार हुआ है । इस से आगे उपपत्ति - प्रकरण चलेगा, एवं सर्वान्त में पद्धति - प्रकरण थाएगा पञ्चकण्डिकात्मक प्रस्तुत प्रकरण में केवल संख्याओं का ही विचार हुआ है, अत: इसे ' आज्यग्रहण - संख्यानियमन प्रकरण ' नाम से व्यवहृत करना उचित मान लिया गया है । १०८७
पृष्ठ 783
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय अध्याय द्वितीयत्राह्मण ३ – आज्यगृहणापपत्तिप्रकरणम्— शतपथब्राह्मण ( पर्व प्रकरण में यह स्पष्ट किया जाचुका है कि, जुहू में स्रुव के द्वारा के बुवा से चार बार, एवं उपभृत में आठ बार ज्यग्रहण किया जाता है । ' चतुर्जुह्वा अौ कृत्य उपभृति ' इन चार --संख्याओं की क्या उपनिपत?, षट् कण्डिकात्मक प्रकृत प्रकरण इसी प्रश्न का समाधान कर रहा है ) ----( यज्ञकर्म में दीक्षित, यज्ञफलभोक्ता ) यजमान ही जुहू को लक्ष्य बनाता है, एवं जो ( यजमाम का शत्रु ) इस यजमान के प्रति ( सम्पत्ति - आगमन का द्वार अवरुद्ध करता हुआ इसके साथ ) शत्रुता करता है, व ( शत्रु ) उपभृत् को लक्ष्य बनाना है, ( ' अर्थात् जुहू में प्रतिष्ठित आज्य यजमान का प्रतिरूप है, एवं उपभृत में प्रतिष्ठित आज्य बजमान के शत्रु का प्रतिरूप है ) । अत्ता ( भोक्ता ) ही ड्डू को लक्ष्य बनाता है, एवं आय ( भोग्य ) उपभृत् को लक्ष्य बनाना है । ( अर्थात् जुहू स्थित आाज्य भोक्ता का प्रतिरूप है, एवं उपभृत में स्थित आज्य भोग्य का प्रतिरूप है ) | ( दक्षिण बाहु का प्रतिरूप ) जुहू अत्ता है, एवं ( वामत्र | हु का प्रतिरूप ) उपभृत है । ( उक्त यजमान - बजमानशत्रु, अत्ता - श्राय इन द्वन्द्रों से श्र का अभिप्राय यही है । कि, जुहू को यजमान, तथा, भोक्ता समझ कर, एवं उपभृत् को यजमानशत्रु तथा भोग्य समझ कर ही ज्यग्रहण - सम्बन्धिनी संख्याओं के नियतभाव की उपपत्ति पर दृष्टि डालनी चाहिए । क्योंकि यह द्वन्द्व - भाव हो संख्योपपत्ति की मूल प्रतिष्ठा है । यह है मौलिक परिस्थिति | इस अपने लक्ष्य में रखता हुआ ) वह ( अध्वर्यु ) नियमित रूप से ( ) चार बार जुहू में आज्यग्रहण करता है, एवं आठ बार करके उपभृत् में ( आज्यग्रहण करता है ) ॥ ११ ॥
सो जो कि ( श्रब ) जुहू में चार बार ग्रहण करता है, ( इस की उपपत्ति बतलाते हैं ) | ( जुहू में चार बार करके आया करता हुआ अध्वर्यु इस ग्रहणकर्म्म से ) अत्ता ( यजमान ) को ही अतिशय सीमित, और संख्या में अल्प ( छोटा ) करता है । ( जुहू में श्राज्य-ग्रहण करने के अनन्तर जो कि अध्वर्यु उपभृन में आठ चार करके आयग्रहण करता है, ( उसका कारण बतलाते हैं ) | ( उपभृत् में आठ बार करके आज्यग्रहण करता हुआ ध्व इस ग्रहणकम्म से ) आय ( यजमानशत्रु ) को ही अतिशय विस्तृत और संख्या में बड़ा करता है | जहाँ भोक्ता कम होंगे, एवं भोग्य सामग्री प्रचुर मात्रा में होगी, अवश्य ही वह ( गृहस्थपरिवार, यज्ञकर्म्म, आदि ) समृद्ध हैं ( समृद्ध माने जायँगे ) | ( तात्पय्य यही हुआ कि, पूर्वकथनानुसार जुहू काज्य भोक्ता है, एक उपभृत का आज्य भोग्य है । जहाँ, जिस संस्था में भोक्ता की अपेक्षा भोग्य-सामग्री अधिक होती है, वहाँ समृद्धि मानी जाती है । इसी समृद्धि का यज्ञकर्म में समावेश करने के लिए भोक्ता स्थानीय जुहू का श्राज्यभाग संख्या में कनीयान किया जाता है, एवं भोग्य उपभृत् का
आज्यभाग संख्या में भूयान बनाय । जाता है ॥।१२ ॥
[ ब्राह्मग्रन्थों की यह एक नियत शैली है कि, जब वे कम्मों का ब्राह्मण ( विज्ञान, मौलिकर हस्य, उपपत्ति ) बतलाने का उपक्रम करते हैं, तो आरम्भ में समाधानोपक्रमगर्भित प्रश्नार्थक वाक्यों का प्रयोग करते १०१८
पृष्ठ 784
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय अध्याय द्वितीयब्राह्मण प्रथमकाण्ड हैं, जैसा कि - ' तयदप उपस्पृशति ' ( श ० १ १ १ ) - ' अथातोऽशनानशनस्यैव ' ( श ० १ १ ७ ) ---' अथ यद् द्वन्द्वम् ' ( श ० १ १/२/२ ) इत्यादि प्रश्नार्थक वाक्यों से स्पष्ट है । इन वाक्यार्थों की सङ्गति ---' मोजो कि पानी का उपस्पर्श करते हैं - ( उस की उपबति बतलाते हैं ) - ' अब यहाँ से अशन-अनशन की हो --- ( मीमांसा की जाती है- अब जिस लिए कि द्वन्द्वभाव है ( वह कारण बतलाते हैं ) ' इस रूप से की जायगी । प्रकृत में भी इस स्वाभाविक शैली के अनुसार ही ' अथ यन् चनुर्जुह्वां गृह्णाति ' समाधानोपक्रमगर्भित ( उपपत्ति - जिज्ञासारूप । यह प्रश्नार्थक वाक्य प्रयुक्त हुआ है । अतः इस का अर्थ – जिसलिए कि जुहू में चार बार ग्रहण करते हैं ( उस का कारण बतलाते हैं ) ' यह करना पड़ेगा । अनन्तर अनुवाद - सङ्गति के लिए उक्त वाक्यार्थ के श्रागे ' जुहू में चार बार ग्रहण करता हुआ अभ्वय्यु ', इस वाक्य का सम्बन्ध ऊपर से ओर जोड़ना पड़ेगा! प्रकृत में इस शैली से यही बतलाना है कि, कहीं कहीं व्याख्याताओं – ' सो जो कि जुहू से चार बार आज्य ग्रहण करता है, ता को ही इस ग्रह से परिमिततर करता है ' यह अर्थ किया है । परन्तु ऐसा अर्थ ब्राह्मणशैलो से सर्वथा विरुद्ध तव उपेक्षणीय ही माना जायगा । प्रत्येक दशा में उपक्रम - वाक्य स्वतन्त्र माना जायगा, एवं आगे के उत्तर -- प्रकरगा की मङ्गति के लिये पूर्ववाक्यार्थ से आगे ' तदुच्यते-- ' तत्कारणमीमांसा क्रियते ' इत्यादि नवीन वाक्यों का समावेश करना पड़ेगा । ] वह ( अध्वर्यु ) जुहू में चार बार आन्यग्रहण करता हुआ । ( श्राठ बार वाले उपभृत् की अपेक्षा ) मात्रा में अधिक ज्यग्रहण करता है ( एवं ) उपभृत में आठ वार करके श्रज्यग्रहण करता हुआ ( चार बार बाले जुहू की अपेक्षा ) थोड़ा श्राज्यग्रहण करता है । ( तात्पर्य यही हुआ कि यद्यपि जुहू में वा से आय लिया जाता है चार ही बार, तथापि जुहू की आाज्यमात्रा उपभृत् की मात्रा से अधिक होती है, जब कि जुहू में उपभृत की अपेक्षा चार बार कम डाला जाता है । एवमेव उपभृत में यद्यपि आज्य लिया जाता है - आठ बार, तथापि उपभृत की आज्यमात्रा जुहू. की मात्रा से भी कम रहती है, जब कि उपभृत् में जुहू की अपेक्षा चार बार अधिक डाला जाता है || १३ || सो जो कि ( अव ) जुहू में चार बार ही ज्यग्रहण करता हुआ भी ( उपभृत की अपेक्षा ) अधिक श्राज्यग्रहण करता है, उस का कारण लतलाते हैं ) । ( जुहू में चार बार में ह्रीं उपभृत की अपेक्षा अधिक ज्यग्रहण करता हुआ । अध्वर्यु ) इस भूगोग्रहण कर्म्म से अत्ता को ( चार संख्या से ) अतिशय सीमित, ( एवं ) अल्प करता हुआ, ( भूयोत्रहरण से ) इस ( अत्ता ) ( आय की अपेक्षा ) वीर्य्य, ( और ) बल का आधान करता है । तात्पर्य यह निकला कि, चार संख्या की दृष्टि से जहाँ अत्ता संख्या की अपेक्षा कम है, वहाँ आज्य की अधिकता से वीर्य, तथा बल में श्रद्य की अपेक्षा अधिक है ) । सो जो कि [ व ] उपभृत् में आठ बार आज्यग्रहण करता हुआ [ जुहू की अपेक्षा ] थोड़ा आज्य ग्रहण करता है, [ उस का कारण बतलाते हैं ] । उपभृत में आठ बार में जुहू की अपेक्षा थोड़ा आज्य ग्रहण करता हुआ अध्वर्यु | इस अल्पग्रहण - कर्म्म से आयको [ आठ संख्या से ] अति-शब विस्तृत, [ एवं ] बड़ बनता हुआ [ अल्पग्रहण से ] इसे [ श्रद्य को ] बी, तथा बल में [ त्ता-१०४६
पृष्ठ 785
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय अध्याय द्वितीयब्राह्मण शतपथब्राह्मण की अपेक्षा ] शून्य ही बनाता है । [ तात्पर्य यही है कि आठ संख्या से जहाँ आय संख्या, तथा आयतन मे बड़ा है, वहाँ मौलिक वीर्य्यरूप आज्य की अल्पता से अत्ता की अपेक्षा यही वीर्य्य, तथा बल से शून्य है, निर्वीय्य है, निर्बल है ] । निष्कर्ष यही निकला कि, अत्ता सदा आज्य पर अपना प्रभुत्त्व प्रतिष्ठित रक्खे, आय सदा इसके सामने नतमस्तक रहे, इसी रूपसमृद्धि के लिए अत्ता-स्थानीय जुहू में अधिकमात्रा से तथा आवस्थानीय उपभृत् में अल्पमात्रा से ज्य - प्रण करना प्राकृतिक है । [ एकाकी रहता हुआ भी अत्ता अधिक वीर्य, बल के सम्बन्ध से हीनवीर्य, हीनबल अनेकों आय पर कैसे अपना प्रभुत्त्व प्रतिष्ठित रखता है? इस सम्बन्ध में प्राकृतिक नित्य - वर्णानुगत ' राजा - प्रजा ' का उदाहरण उद्धृत करती हुई श्रुति कहती है ] -इसीलिए तो [ तस्मादुत - श्राद्य की अपेक्षा श्रता के विशेष बलवीर्यवान होने से ही तो राष्ट्राधिपति एक ] सत्ताधीश अपार [ असंख्य अगणित अनगिनती ] प्रजा को प्राप्त होकर भी स्वयं एक घर से ( एकाकी ही उस असंख्य प्रजा को ) अपने वश में कर लेता है । ( यही नहीं, अपितु राष्ट्र की आवश्यता के लिए वह राष्ट्रपति सत्ताधीश जब जब जैसी जैसी जिस जिस वस्तु की कामना करता है, तब तब वैसी वैसी उस उस अभिलपित वस्तु को भी ( उस आद्यस्थानीया प्रजा से बल - वीर्य के प्रभाव से ) प्राप्त करता रहता है । उसा वीर्य से ( सत्ताधीश यह सब कुछ राज्य - प्रजाभव प्राप्त करने में समर्थ होता है ), जो कि यह अपनी जुहू ( रूप दक्षिण बाहु ) अधिक ( वीर्य ) ग्रहण करता है । ( अपने बाहुबल, तथा आत्मबीर्य से सत्ता-धीश एकाकी रहता हुआ भी असंख्यात प्रजायुक्त राष्ट्र पर अपना प्रभुत्त्व बनाए रखता है, यही तात्पर्य है ) । वह अध्वर्यु जिस आज्य को जुहू में लेता है, उस आज्य की ( तो ) आहुति जुहू से देता ( ही ) है, परन्तु ) जिस आज्य का उपभृत से ग्रहण करता है, [ उसकी भी आहुति उपभृत से न देकर] जुहू से ही आहुति देता है । [ तात्पर्य यही हुआ कि, आज्यग्रहण कर्म्म पृथक् पृथक जुहू उपभृत् में होता है, परन्तु आहुति दोनों के आज्य की जुह से ही दी जाती है ॥१४ ॥
** — १२ वी कण्डिका के श्रागे ब्राह्मणग्रन्थ की जिस प्रतिपादन शैली का स्पष्टीकरण किया गया है, प I ठक देखेंगे कि १३ वीं, १४ वी कण्डिकायों के प्रारम्भिक वाक्यों से उस शैली का सर्वात्मना समर्थन होरहा है । उत्तरोपक्रमगर्भित, प्रश्नार्थक वाक्यों का सर्वत्र ' स यन ' - ' अथ यत् ' - ' अथातः ' इत्यादि रूप से आरम्भ होता है । एवं उत्तरवाक्यों से सम्बद्ध पूर्णवाक्यों का उपक्रम ' स ' - ' नद्धि ' तद्वा एतम ' इत्या-दिरूप से होता है, जैसाकि १३ वीं कण्डिका के आगे के प्रकरण से सम्बद्ध " म वै चतुर्जुह्रां गृह्णन भूय आज्यं गृह्णाति " इस सामान्य उपक्रमवाक्य से, एवं १४ वीं कण्डिका के उत्तर प्रकरण से अनन्वित, स्वतन्त्र, अतएव अन्यवाक्यसापेक्ष, उत्तरोपक्रमगर्भित, प्रश्नार्थक -- " स यच्चतुर्जुह्वां गृह्वन भूय आज्यं गृह्णाति ' १०५०
पृष्ठ 786
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीयवाय द्वितीयब्राह्मण प्रथमकाण्ड ( यज्ञपद्धति का यह एक स्वाभाविक नियम देखा जाता है कि, जिस पात्र, किंवा पात्री में आहुति-द्रव्य लिया जाता है, उसी पात्र, किवा रात्री से आहुति दी जाती है । परन्तु पूर्वश्रुति ने ग्रहण बतलाया है उपभृत में, एवं आहुति का विधान किया है जुह से । इस वैपम्य का क्या कारण?, इसी वैपम्य का प्रश्न रूप से उपादान कर, अन्त में समाधान करती हुई श्रुति कहती है ] -[ उपभृत में गृहीत आज्य की उपभृत् से आहुति न देकर जुहू से ही आहुति देनी चाहिए, इस पूर्व सिद्धान्त के सम्बन्ध में । कितने एक विद्वान् कहते हैं कि [ * तदाहुः ], यदि [ उपभृत् में गृहीत आज्य की ] उपभृत से आहत नहीं देते, तो फिर क्यों [ किस प्रयोजन के लिए ] उपभृत् में [ आज्य ] ब्रहण किया जाय? । [ प्रश्नकर्त्ता विद्वानों का अभिप्राय यही है कि, आहुति देने के लिए ही तो ज्य - प्रहण का विधान हुआ है । जब उपभृत से आहुति ही नहीं दीजाती, तो इसमें आज्य ग्रहण की ओर क्या आवश्यकता रह जाती है? ] । [ श्रुतिउत्तर देती है कि ] - यदि वह [ अध्वर्यु ] - [ उपभृत में गृहीत आज्य की ] उपभृत से आहुति देगा, तो ये सम्पूर्ण प्रजाएँ [ अपना स्वाभाविक संघठन तोड़ कर ] स्वतन्त्र बन जायँगी । न श्रत्ता रहेगा, न आय [ सुरक्षित ] रहेगा । [ उत्तर का तात्पर्य यही है कि, उपभृत में गृहीत आज्य एवं उपभृत, दोनों श्रद्यस्थानीय बनते हुए प्रजा स्थानीय हैं । जुहू गृहीत आज्य, तथा जुहू, दोनों अत्ता स्थानीय बनते हुए ' सत्ताधीश- स्थानीय ' हैं । ऐसी परिस्थिति में यदि प्रजा स्थानीय उपभृत् से ही प्रजा - स्थानीय श्राज्य की आहुति दी जायगी, तो उपभृदाज्यस्थानीया प्रजा स्वतन्त्र बन जायगी, जो कि निरंकुश, अमर्यादित स्वातन्त्र्य तत्वतः पारतन्त्र्य बनता हुआ सत्तावीश, तथा प्रजा, दोनों के नाश का ही कारण माना गया है । परन्तु जब उपभृद्गृहीत आज्य की सत्ता स्थानीय जुहू [ के आश्रय ] से आहुति दी जाती है, तो उपभृदाज्यरूप प्रजावर्ग जुहूरूप सत्ताधीश की रक्षा में आकर विप्लव से बच जाता है । इसी ' राष्ट्रीय एकीकरण ' के लिए अमृत- गृहीत श्राज्य की भी जुहू से ही आहुति देना उचित है । इसी अभिप्राय को अपनी स्वा भाविक - शैली से व्यक्त करती हुई श्रुति कहती है ] -( उपभृत् में आज्यग्रहण करने लिए ) अनन्तर जिसलिए कि ( उपभृत - गृहीत भाज्य को ) जुहू में हीं लेकर आहुति देते हैं ( इसका कारण बताते हैं ) | ( औपभृत आज्य को जुहू में [ तत्कारणसुच्यते इति वाक्यशेपः ] " इस वाक्य से स्पष्ट सिद्ध होरहा है । ब्राह्मणग्रन्थों की इन परिभा-पाओं के न जानने से ' मक्षिकास्थाने मक्षिकापातः ' न्याय से व्याकरण के बलपर केवल शब्दार्थ के अनु-गमन से वास्तविक अर्थ - समन्वय में बड़ी भ्रान्ति होजाती है । अत पाठकों से इस सम्बन्ध में साग्रह निवेदन किया जायगा कि, अर्थसमन्त्रय करते हुए वे इन परिभाषाओं का भलीभांति स्पष्टीकरण करलें । * जहाँ कहीं श्रुति को किसी अन्य के द्वारा प्रश्नात्मक आक्षेपयुक्त पूर्णपश्न करना होता है, वहाँ सर्वत्र आरम्भ में ' तदाहुः ' का सन्निवेश रहता हैं । दूसरे शब्दों में ' तदाहः ' वाक्य को सर्वत्र प्रश्नात्मक ही समझना चाहिए । यह भी ब्राह्मणग्रन्थों की एक स्वाभाविक ही शैली है । १०५१
पृष्ठ 787
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
- तृतीयाध्याय द्वितीयब्राह्मण - शतपथब्राह्मण-कर ) आहुति देने से ही ये प्रजाएँ क्षत्रिय राजा के लिए बलि ( कर ) प्रदान करतीं हैं । ( अर्थान इसीलिए प्रजा राज्य को अनुगामिनी बनी रहती है ) । ( अब इस सम्बन्ध में एक प्रश्न और किया जासकता है । वह यही कि, यदि ऐसा है, तो फिर उपभृत् में ज्यग्रहण की ही क्या आवश्यकता रह जाती ११। क्यों नहीं पहिले चार बार जुहू में लेकर अनार की प्राप्ति के लिए आहुति दे दीजाय, अनन्तर आय को अत्ता के आधीन बनाने के लिए जुहू में हीं आठ बार लेकर [ श्रद्यभाव की रक्षा के लिए ] जुहू से ही आहुति दे दी जाय? । पहिले उपभृत में लेना, पुनः उपभृत् से जुहू में लेकर आहुति देना, इस द्रविड़ - प्राणायाम की अपेक्षा तो पहिले से ही जुहू में हीं लेकर क्यों न इतिकर्त्तव्यता पूरी करली जाय? | इसी विप्रतिपत्ति का प्रश्नोत्थानपुत्रक निराकरण करती हुई श्रुति कहती है ) --[ जुहू में चार बार ग्रहण करने के ] अनन्तर जिसलिए कि उपभृत में [ ह्रीं आठ बार श्राज्य ] ग्रहण करते हैं, [ इसका कारण बतलाते हैं । [ आद्यलक्षणा प्रजा से सम्बन्ध रखने बाला उपभृत् - सम्बन्धी श्राज्यग्रहण जुहू में न होकर उपभृत में हीं होता है ] इसलिए ही क्षत्रिय [ राजा ] के वश में [ रक्षा में ] रहते हुए ही वैश्य [ प्रजा ] के प्रति पशु [ सम्पत्तिवर्ग ] उपस्थित होते हैं । [ उत्तर का तात्पर्य यही कि जिसप्रकार राष्ट्रीय प्रजा की रक्षा के लिए भोक्ता की सत्ता अपेक्षित है, उसीप्रकार भोग्य की सत्ता भी आवश्यक है । राजा यदि प्रजा का सर्वस्य अपने स्वार्थ में ह्रीं स्वाहा कर जाय, उसे स्वतन्त्र रहकर ( किन्तु अपनी रक्षा में ) सुसमृद्धि का अवसर न दे, तो प्रजा कभी पशुसम्पत्ति ( धन, कृषि, पशु श्रादि ( वित्त ) से युक्त न वने । और उस दशा में राजा का राजापना ही ' सुरक्षित न रहे । अतः प्रजाविकास के लिए, प्रजासमृद्धि के लिए प्रजा को एकांश से स्वतन्त्र — रखना भी आवश्यक है । उपभृत् जुहू पर रक्खी रहती है । जुहू आधार है, आश्रय है, उपभृत् य है, आश्रित है । यही राजा का प्रजा पर रक्षात्मक अनुग्रह है । इस रक्षा में प्रतिष्ठित वैश्यरूप प्रजावर्ग स्वतन्त्ररूप से पशुसमृद्धि करने में समर्थ बने, इसी प्रयोजन की सिद्धि के लिए जुहू पर रखे हुए उप्रभृत् में ह्रीं श्राज्यग्रहण किया जाता है ) । ( इसप्रकार पहिले उपभृत में ज्यग्रहण कर, अनन्तर औषभृत- आज्य को जुहू में लेकर ही आहुति क्यों दी जाती है? इस प्रश्न का एक समाधान तो कण्डिका के आरम्भ में हीं -' तस्मादिमा विशः क्षत्रियाय बलिं हरन्ति इत्याहरूप से दिया जाचुका है । इस उत्तर का तात्प यही है कि, प्रजा राजा को बलि ( कर ) प्रदान करती रहे, राजा इस वलिप्राप्ति से ओर भी अधिक बलवान बनता हुआ प्रजासमृद्धि में पूर्ण समर्थ बने । अत्र इसी प्रश्न का एक दूसरा समा-धान करने के लिए श्रुति पुनः प्रश्न उठाकर समाधान करती है ) -( जुहू पर रक्खे हुए उपभृत में आठ बार आज्यग्रहण करने के ) अनन्तर जिसलिए कि ( औपभृत- श्राज्य को ) जुहू में लेकर जुहू से ही आहुति देते हैं ( इस की दूसरी उपपत्ति बतलाते हैं ) । क्यों के औपभृदाज्य की उपभृत से आहुति न होकर जुहू से आहुति होती है, अतएब १०५२
पृष्ठ 788
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीय अध्याय द्वितीयब्राह्मगा प्रथमकाण्ड जिस समय भी क्षत्रियराजा ( राष्ट्रहित के लिए जिस सम्पत्ति की ) कामना करता है, कामना के अव्यवहितोत्तरकाल में हीं वह वैश्य ( प्रजा ] को लक्ष्य बना कर आज्ञा देता है कि, वैश्य 1 तुझारा जो अत्यन्त्य सुरक्षित ( सुगुप्त ) पर ( परकीय धन ) है, उसे ( राष्ट्रहित के लिए ) शीघ्र ले आओ । ( आज्ञानन्तर वैश्य के द्वारा प्राप्त धन को ) बह राजा अपने अधिकार में कर लेना है । इसीप्रकार राजा को ( राष्ट्रसालन - कर्म में ) जब जैसी जिन वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती रहती है, इह्रीं सम्पन्न वैश्यों के द्वारा वैसी, वे वस्तुएँ प्राप्त होतीं रहतीं हैं ( और इस स्वाभाविक सम्पत् - प्राप्ति का एकमात्र कारण है ) वीर्य्यप्रभाव । ( तात्पय्ये उत्तर का यही है कि, यदि उपभृत् से ही आहुति दी जायगी, तो इसका यह अर्थ होगा कि राजा ने प्रजा को सचित-धन व्यय के लिए स्वतन्त्रता प्रदान करदी । प्रजाधन ही राजा के राष्ट्र का मुख्य बल है । यदि प्रजाधन पर राष्ट्रपति का नियन्त्रण न होगा, तो राजा के राष्ट्र की अर्थशक्ति न होजायगी । और उस परिस्थति में राजा प्रजा से कामनानुसार राष्ट्रसंचालन के लिए सम्पत्ति - संग्रह न कर सकेगा । ठीक इस के विपरीत जब कि औपभृदाज्य की जुहू के द्वारा ही आहुति होती है, तो इस का यह अर्थ होता है कि, प्रजा के द्वारा सञ्चित धन राजा की रक्षा में जायगा । इसीलिए अब राजा जत्र भी चाहेगा, तभी प्रजा के उस गुप्त ( सुरक्षित ) धन के द्वारा राष्ट्रकामनाएँ पूरी करता रहेगा । इस दूसरे प्रयोजन की सिद्धि के लिए भी औपभृदाज्य को जुहू में लेकर जुहू से ही आहुति दी जाती है || १५ || ( जुहू, और उपभृत में क्रमश: ४-८ बार करके जो ज्यग्रहण होता है. इस के सम्बन्ध में जो कुछ उपपत्ति बतलाना थी. बतला दी गई । अब तीसरो ' धुवा ' नामको स्रुक् शेष रह गई, जिससे कि खुत्र के द्वारा जुहू - उपभृत् में ज्यग्रहण होता है । इस क्रमदृष्टि से यद्यपि यत्र ध्रुवा-सम्बन्धी आज्यग्रहण की उपपत्ति ही अपेक्षित थी । तथापि ध्रुवा पात्र अङ्गभूत इतर दोनों स्रु चों ( जुहू -- उपभृत् ) की प्रतिष्ठा चनता हुआ सर्वयज्ञप्रतिष्ठा है । अतः धवा के इस सर्वभाव को मूल बनाने के उद्देश्य से प्रसङ्गात् पहिले इतर दोनों खं चो का भी सिंहावलोकन कर लिया जाता है । यद्यपि बन्दो रूप अनुयाज, तथा ॠतुरूप प्रयाज, दोनों के लिए क्रमशः उपभृत- तथा जुहू में आयग्रहण होता है. तथापि ध चा सम्बन्ध में बतलाई जाने वाली उपपत्ति का श्रुति प्रधानरूप से छन्द्रः सम्पत्ति के साथ ही सम्बन्ध नाना है, जैसा कि निम्न लिखित मूलानुवाद में में स्पष्ट होरहा है ) । ( आज्यस्थाली से चार वार करके धवा में, ध्रुवा से के द्वारा चार बार कर के जुहू में, एवं ध्रुवा से स्रुव के द्वारा द्वारा आठ वार करके उपभृत में गृहीत होने वाले ) वे ये आज्य छन्दों के लिए ही गृहीत होते हैं -- ( छन्दों के लिए ही श्राज्यों का ग्रहण होता है ) । सो जो कि जुहू में चार बार करके ( आज्य ) ग्रहण करता है, वह गायत्री छन्द के लिए ही गहण करता है । जो कि उपभृन् में आठ बार कर के ( आज्य ) ग्रहण करता है, वह त्रिष्टुप् तथा जगती- छन्दों के ही लिए १०५३
पृष्ठ 789
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीयध्याय प्रथमत्राह्मण शतपथब्राह्मण ग्रहण करता है । जो कि ( आज्यस्थाली से ध्रुवा में चार बार कर के आाज्य ) ग्रहण करता है, वह अनुप छन्द के लिए ही ग्रहण क ता है । अनुष्टुप् ही वाक है । वाकू से ही यह ( सब भौतिक प्रपञ्च ) उत्पन्न हुआ है | इसलिए ( वाक्प्रतिरूप ) वा से ही सम्पूर्ण यज्ञ होता है । अनुष्टुप् ( बाक् ) ही यह ( पृथिवी ) है । इसी ( पृथिवी ) से यह सत्र ( स्तम्यत्रिलोकीरूप भूतप्रपञ्च ) उत्पन्न होता है । इसीलिए ( पृथिवी के प्रतिरूप ) ध्रुवा से ही यह सम्पूर्ण यज्ञ उत्पन्न हुआ है || १६ || * - इति - ज्यगृहणोपपत्तिप्रकरणम् ४- पद्धतिप्रकरणम् किन में, किन से, फिन के लिए, कितनी बार यह होता है?, पूर्व--प्रतिपादित तीन प्रकरणों में इह्रीं प्रश्नों का समाधान हुआ है । अब कैसे श्राज्य ग्रहण करना चाहिए? पद्धतिरूप यह प्रश्न बच रहता है । आगे की क्रमप्राप्त १७-१८ कण्डिकाओं से इस ' श्राज्यप्रहण -पद्धति ' का ही निरूपण करता हुआ अादेश १८ ) कण्डिकात्मक, प्रकरणचतुष्टयात्मक, ' आज्यग्रह् ब्राह्मण ' नामक, १ काण्डानुगत - ३ अध्याय का दूसरा ( ३: २ ), तथा द्वितीय प्रपाठक का पञ्चम ब्राह्मण ( २।५ ) समाप्त होता है । वह अध्वर्यु -- " -- धाम नामासि प्रियं देवानामनाधृषु देवयजनमति ' ( यजुः सं ० २ श्र०-३१ मं ० ) यह मन्त्र बोलता हुआ आज्यग्रहण करता है । ( अर्थसुविधा के लिए मन्त्र को दो भागों विभ कर पहिले प्रथम विभाग का अर्थ करती हुई श्रुति कहती है ) ---- यह देवताओं का अत्यन्त प्रिय स्थान ( रमणमाधन ) है, जो कि आज्य है । इसीलिए ' धाम नामासि प्रियं देवानाम् ' यह कहा गया है । ( मन्त्र के द्वितीय भाग का अर्थ करते हैं ) आज्य वास्तव में वन है, देव-यजन है- ( देवताओं की यज्ञ के द्वारा परस्पर सङ्गति कराने वाला है ) । इसी अभिप्राय से ' अना-' धूप ' देवयजमनमसि ' यह कहा गया है || १७ || वह अध्वर्यु ' इस ( उक्त ) यजु से ( मन्त्र से, मन्त्र बोलता हुआ ) जुहू में एकबार आज्य-ग्रहण करता है, तीन बार चुप चाप ( ग्रहण करता है ) ( तात्पर्य यही है कि, जुहू में चार बार आज्यग्रहण करने का विधान है । इन में आरम्भ में एकबार तो मन्त्र बोलते हुए ग्रहण करना * जैसा कि मूलानुवादप्रकरण के प्रारम्भ में हीं बतला दिया गया है, ११ कण्डिकाओं में ग्राज्यग्रहण की उपपत्ति ही प्रधानरूप से बतलाई गई है । अतएव इस प्रकरण को एक स्वतन्त्र प्रकरण मानते हुए ' आउयग्रहणोपपत्तिप्रकरण ' नाम से मान लिया है । से १६ पर्य्यन्त की ६ हमने षट् - कण्डिकात्मक व्यवहृत करना ऊचित 2016
पृष्ठ 790
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीयध्याय द्वितीयब्राह्मण प्रथमकाण्ड चाहिए, एवं तीन बार बिना मन्त्र बोले चुपचाप ग्रहण करना चाहिए ) । उपभृत् में एकवार ( तो ) इसी यजु में ( मन्त्र बोलना हुआ ) ज्यग्रहण करता है, एवं सात बार चुपचाप ( बिना मन्त्र प्रयोग के ) आज्यग्रहण करता है । धवा में ( आज्यस्थाली में से ) एक बार तो इसी यजु से ( मन्त्र बोलता हुआ ) ज्यग्रहण करता है, एव तीन बार चुपचाप ( विना मन्त्रप्रयोग के ) श्राज्य-ग्रहण करता है । इस सम्बन्ध में कुछ विद्वान् कहते हैं कि, ( ध्रुत्रा, जुहू, उपभृत्, इन तीनों में आज्यग्रह्ण करते हुए प्रत्येक में ) तीन तीन बार यजु से ( मन्त्रपूर्वक ) आज्यग्रहण करना चाहिए । क्योंकि यज्ञ त्रिवृत ( नवाक्षरा - विराट्सम्पत्ति से युक्त ) है । ( आक्षेपगर्भित प्रश्न - कर्त्ता का अभिप्राय यही है कि, जब यज्ञ त्रिवृत् है, और त्रिवृत् - सम्पत्ति विना तीन तीन बार यजुः - प्रयोग - मन्त्रप्रयोग-के सम्भव नहीं, तो ऐसी दशा में जुहू - उपभृत - धवा, तीनों की ४-८-४ इन ब्रह्ण - संख्याओं में से क्रमशः ३–३–३ रूप से ता मन्त्रप्रयोगपूर्वक ज्यग्रहण करना चाहिए, एवं १-५-१ इस सख्याओं के अनुरूप तृष्णीं आज्यग्रहण करना चाहिए, तभी त्रिवृत - सम्पत्ति प्राप्त होस-कती है ) -( उक्त पूर्वपक्ष का तटस्थ रूप से खण्डन करती हुई, सकृत पक्ष को ही सिद्धान्तपक्ष बतलाती हुई श्रति कहती हैं ) -- इस आज्यग्रहण कर्म में एक एक बार ही मन्त्रपूर्वक ज्यग्रहण करना चाहिए | इस ( सकृत् सकृत् परिग्रहणकर्म्म ) में भी आज्य का ( समाहाररूप ) तीन बार ग्रहण होजाता है । ( इसप्रकार सकृत पक्ष में ह्रीं त्रिवृत सम्पति प्राप्त होजाती है || १८ || ४ – इति — याज्यगृहणपद्धतिप्रकरणम् प्रथमकाण्डानुगत - तृतीय अध्याय का दूसरा ब्राह्मण समाप्त ( १ | ३ | २ | ) प्रथमकाण्डानुगत - द्वितीय प्रपाठक का पाँचवाँ ब्राह्मण समाप्त ( १/२/५ | ) मूलानुवाद - समाप्त १०५४