Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 791–800
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 791–800
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तृतीयध्याय द्वितीयत्रादाया सूत्रानुगतपद्धतिसंग्रहः जुहू में स्र वसे चार बार आज्यगूहण शतपथब्राह्मण ज्याक्षणकर्म के अनन्तर ' ज्यग्रहणकर्म ' होता है । आज्यस्थाली में रखे हुए आज्यको चा के द्वारा जुहू - उपभृत में डालना हीं ज्यग्रहणकर्म है । इसी कम्म की इति-कर्त्तव्यता बतलाते हुए सूत्रकार कहते हैं-“ स्र वेणाज्यग्रहणं चतुजु ' ह्रां - " घामनामेति " सन्मत्रः " इति । —का ० श्री ० सू ० २२७ | ६ | उक्त सूत्रादेशानुसार अध्वर्यु- - " धाम नामासि प्रियं देवानामनाधृषु देवयजनममि " ( हे आज्य! आप देवताओं के लिए प्रिय ' धाम ' नाम वाले हो, आप किसी भी आसुरभाव से धर्पण करने योग्य नहीं होने वाले देवताओं के देवयजन ( देवयजनभूमिस्थानीय ) हो " - यजुः ( १।६१ ) यह मन्त्र बोलता हुआ आज्यम्थाली से सुबा को पूर्ण भर कर चार बार जुहू में आज्य डालता है । इस सम्बन्ध में यह स्मरण रखना चाहिए कि उक्त मन्त्र का प्रयोग प्रथमबार आज्य -ग्रहण में हीं होता है । शेप तान बार बिना मन्त्रोच्चारण के तूष्णीं ह्रीं श्राज्य होता है । तान्पर्य यही हुआ कि, अध्वा को चार बार पूर्णरूप से ज्यस्थाल । में से भरेगा । इस में एक बार तो उक्त मन्त्र बोलता हुआ जुहू में डालेगा, शेष तीन बार चुपचाप जुहू में डालेगा । उपभृत् से से आठ बार ग्राज्यग्रहण जुहू में से पूर्णरूप से चार बार ज्यग्रहण करने के अनन्तर उसी मन्त्र से आठ वार करके अपरिपूर्ण रूप से आाज्यस्थाली में से बचा के द्वारा आठ बार उपभृत् में आज्य ग्रहण किया जाता है | इसी अभिप्राय से सूत्रकार कहते हैं-" अष्टावुपभृत्यल्पीयो ऽनुयाजश्चेत् " ( का ० श्रौ ० सू ० २ | ७ | १० | )! यदि दर्शपूर्णमास में अनुयाज का सम्बन्ध है, तो आठ बार वरके उपभृत में अपूर्ण आठ बों से ज्यग्रहण किया जाता है । प्रकृत दृष्टि में छन्दोरूप अनुयाजक वैकल्पिक है, इस बात को स्पष्ट करने के लिए ' चेन ' कहा गया है । यदि अनुयाजकर्म्म है, तब तो आठ बार उपभृत में आज्यग्रहण होगा, अन्यथा केवल जुहु में हीं चार बार आज्यग्रहण होगा । " कृत्त्व उपभृति गृह्णाति प्रयाजानुयाजेभ्यस्तत्- गृह्णाति " ( तै ० ब्रा ० ३।३।५ ) इस कृष्णब्राह्मणानुसार उपभृत में जो आठ बार ज्यग्रहण होता हैं, उस में चार बार गृहीत आज्य का तो ऋतुरूप प्रयाजदेवताओं से सम्बन्ध है, एवं चार बार गृहीत श्राज्य का छन्दोरूप अनुयाज-देवताओं से सम्बन्ध है । अनुयाजों को पूर्वसूत्रने बैकल्पिक बतलाया है । इस सम्बन्ध में एक १०५.६
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तृतीय अध्याय द्वितीयब्राह्मण प्रथमकाण्ड संशय उपस्थित होता है । यदि प्रकृत इषि मं अनुयाज - कर्म का अभाव है, अथवा तो प्रपदा-ज्यादि द्रव्यान्तर से अनुयाजकम्मं को इतिकर्त्तव्यता पूरी कर ली जाती है, तो ऐसी परिस्थिति अभृत् में में आठ बार ग्रहण करना, अथवा चार बार? | इस सम्बन्ध में अपना निर्णय बतलाते हुए सूत्रकार कहते हैं--' चतुरन्यत्र, प्रतिविभागात् " ( का ० श्र ० सू ० २७/११ ) यदि प्रकृत इष्टकर्म में अनुयाजका अभाव है, अथवा तो पृपदाज्यादि अन्य द्रव्य से अनुयाज-कर्म्म सम्पन्न करना अभी है, तो उस दशा में प्रतिविभाग मर्यादा से उपभृत् में चार बार ही ग्रहण करना चाहिए | उपभृत में प्रतिष्ठित, अतएव भृत् नाम से प्रसिद्ध आज्य ४-४ क्रम से क्रमशः प्रयाज, अनुयाज, दोनों के लिए विहित है । जब कि औपभृत् आज्य उभयार्थ है, और अनुयाजकर्म अपेक्षित नहीं है, तो ऐसी स्थिति में केवल प्रयाजकर्म्म की सिद्धि के लिए चार बार ही आज्यप्रहण करना नियमप्राप्त बनता है । इसी सिद्धान्त के सम्बन्ध में दृष्टान्तरूप से एक दूसरा हेतु बतलाते हुए सूत्रकार कहते हैं--" पश्वातिथ्या दर्शनाच्च " ( का श्र ० सू ० २।६।१२ ) पशुबन्ध में, तथा श्रातिथ्येषि में होने वाले अनुयाजकर्म की सिद्धि के लिए उपभृत में चार चार ही आय ग्रहण देखा जाता है । यदि अनुयाजकर्म वैकल्पिक होता है, तो प्रयाज के लिए चार बार ही यह करना चाहिए, यही प्रतिविभाग- व्यवस्था न्यायतः प्राप्त है । पशुबन्ध के सम्बन्ध में “ जुह्वां चापभृति च चतुर्गृहीतं गृह्णाति " ( आप ० श्र ० ७ १६ ) इत्यादि रूप से स्पष्ट ही प्रतिविभाग - मर्यादा का समर्थन हुआ है । एवमेत्र आतिथ्येष्टि के सम्बन्ध में भी " सर्वा-येव चतुर्गृहीतान्याज्यानि गृहणाति, न ह्यत्रानुयाज । भवन्ति ” ( शत ० ना ० १।३।२ ६ ) इत्यादि रूप से इसी पक्ष का समर्थन हुआ है अब इस सम्बन्ध मैं ब्राह्मणश्रुति के आधार पर एक नया पूर्वपक्ष उठाते हुए सूत्रकार कहते हैं-" न, कृत्स्नोपदेशात् " ( का ० श्रौ ० सू ० २ | ७ | १३ ) ' उपभृत् में आठ बार गृहीत आयों में से चतुर्गृहीत आज्य तो प्रयाज के लिए है, एवं चतुर्गृहीत ज्यअनुयाज के लिए हैं, पूर्व में जो यह सिद्धान्त बतलाया गया है, वह ( श्रुति-विरोध से ) ठीक नहीं है ( न ) । क्योंकि - " अथ यद कृत्य उपभृति गृह्णाति, अनुयाजेभ्यो हि तद् गृह्णाति ” ( शतः ब्रा ० १ ( ३२६ ) इस श्रुति में उपमृत में आठ बार कर के गृहीत सम्पूर्ण आज्य का केवल अनुयाजकर्म के लिए ही विवान हुआ है । ऐसी स्थिति में प्रतिविभाग - मर्यादा का समर्थन नहीं किया जासकता | ' चतुरन्यत्र प्रतिविभागान ' से यह बतलाया गया था कि, उपभृन् में आठ बार गृहीत आज्य में से आधे का प्रयाज में एवं आधे का अनुयाज में उपयोग है । इस का तात्पर्य यही है कि, उपभृत् में आठ बार ग्रहण तो अनुयाज के लिए ही होता है | परन्तु १८५७
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तृतीय अध्याय द्वितीयब्राह्मण शतपथब्राह्मण जैसे प्रयाज के लिए जुहू में गृहीत आज्य का वचन - प्रमाण से उत्तराधार से विनियोग होजाता है, एवमेत्र यहाँ भी प्रयाज में उपयोग होजाता है । दूसरा हेतु ' पश्वातिथ्या दर्शनाच्च ' यह था । इस सम्हन्ध में— " पश्चात बोचनान " ( काः श्र ० सू ० २७/१४ ) यह समाधान ही पर्याप्त होगा । " अनुयाजेभ्यो हि तद् गृह्णाति " ( शतः त्राः १।३।२६ ) इस श्रुतिवाक्य से सम्पूर्ण औपभृत आज्य जब कि अनुयाज के लिए है, तब जहाँ पशुबन्ध में ज्यादिव्यान्तर से अनुयाजेतिकर्त्तव्यता परी का जानी है, एव अतिव्यादि में अनुबाज काही अभाव है, तो उस दशा में वहाँ उपभृत में ग्रहण प्राप्त होने पर वचन से चतुर्गृहीत आय का ही विधान समझना चाहिए । पहिले से प्राप्त का ही दर्शन सम्भव है । पश्वादि में क्योंकि पहले से प्राप्त नहीं है, अतः वहाँ वचन ही मानना उचित है । प्रतिपक्षी का तात्पर्य यही है कि, जिस पश्वादि दर्शन के आधार पर सिद्धान्ती प्रतिविभाग की मर्यादा स्थापित करता हुआ आपभृत आज्यग्रहण के सम्बन्ध में चतुर्गृहीत श्राज्यपक्ष स्थापित करना चाहता है । पश्वादि को इस सम्बन्ध में उपलक नहीं माना जासकता । अपितु " यष्टौ कृत्त्व उपभृति गृहाति, अनुयाजेभ्यो हि तद् गृहाति " इस श्रति से औपभृत आज्य उभयार्थ न हो कर अनुयाजार्थ ही मानना न्यायसङ्गत है । प्रतिपक्षी की इसी चितिपत्ति का निराकरण करते हुए भाव्यकार अपना यह सिद्धान्त स्थापित करते हैं कि, ' यदा कृत्त्व उपभृति गृहणति, प्रयाजानुयाजेभ्यस्तद ग्रहणानि ' ( तै ० ना ० ( 1 ) इस शाखान्तर- वचन के आधार पर औपभृत आज्य का विधान उभयाथ ही मानना चाहिए । ' अनुयाजेभ्यो हि तद् गृह्णाति ' ( श ० वा ११२६ ) यह वाजसनेय वचन तो प्राप्त अर्थका अनुवादमात्र है, न कि विधान । ऐसी स्थिति में मिद्धान्त यही निकलता है कि, अनु--याजाभाव में, किंवा अन्य द्रव्यानुयाज - युक्त कम्म में उपभृत में चतुगृहीत आज्य को ही सिद्धान्त पक्ष समझना चाहिए । जुइ तथा उपभृत के सम्बन्ध में आज्यग्रहण की व्यवस्था कर अब क्रमप्राप्त ध्रुवानुगत अाज्य - व्यवस्था करते हुए सूत्रकार कहते हैं-" धव यांच जुहुवन् " ( का ० श्र ० सू ० २२७/१५ ) 1 वा में, एवं चकारात उपभृत में जुहू की भांति एक चार मन्त्रप्रयागपूर्वक श्रध्यग्रहण होता है, एवं तीन बार तूष्णीं बिना मन्त्र प्रयोग के आय ग्रहण होता है । इसप्रकार अनुया--जपक्ष में तो जुहू - उपभृन ध्रुवा में तीनों में क्रमशः ४ ६-४ बार आध्य ग्रहण होता है, एवं अनुयाजाभावपक्ष में तीनों में क्रमशः ४-४-४ बार श्राज्यग्रहण होता है । दोनों हीं पक्षों में एक एक बार मन्त्र - योगपर्वक ज्यग्रहण होता है, एवं शेष तीन बार तृष्ण आज्यग्रहण होता हैं, एवं आज्य ग्रहण से सम्बन्ध रखने वाले सूत्रानुगतपद्धति - क्रम का यही मक्षिप्त स्पष्टी -करण है | इति — सूत्रानुगतपद्धतिसंग्रहः - ** -१०५८
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तृतीयअध्याय द्वितीयब्राहागा वैज्ञानिक - विवेचना -प्रथमकाण्ड ( भाग्य ) - यज्ञेतिकर्त्तव्यता की उपनिषत क्या? इस प्रश्न के समाधान के लिए ही पहिला ' यज्ञ-प्रतिरूपरहस्य ' नामक प्रकरण आरम्भ होता है । इस उपपत्ति- प्रकरण में प्रथम आध्यात्मिकयज्ञ का स्पष्टीकरण हुआ है, अनन्तर आदिकयज्ञ का विश्लेषण हुआ है । उपपत्ति - प्रकरणारम्भ से पहिले हम आज एक बहुत बड़ी विप्रतिपत्ति की ओर पाठकों का ध्यान आकपित करना चाहते हैं । ' हमारा वेदशास्त्र विज्ञान का भण्डार है ' इस सृक्ति के उच्चारण करते ही वर्त्तमान - जगत प्रश्न-परम्परा हमारे सम्मुख उपस्थित कर देता है । " यदि वेद में विज्ञान है, तो क्या उस वैदिक-विज्ञान के आधार पर भारतीय भी वत्तमान जगत् के ले विविध भौतिक आविष्कार कर सकते हैं? " । इस प्रश्न का महत्त्व उस समय और भी बढ़ जाता है, जब कि वेदाक्षरों की व्याख्या करते समय पदे पढ़े ' विज्ञान ' शब्द का पुनरावर्त्तन होने लगता है । भारतवर्ष के सर्वो-त्कृषु में विमानादि भौतिक आविष्कार उक्त प्रश्न का भलीभांति समाधान कर सकते थे, इस में तो कोई सन्देह नहीं । एवं ऋग्वेदीय कतिपय सूक्त आज भी वाचिकरूप से अपना अनोन अहंभाव सुरक्षित रखने में पूर्ण समर्थ हैं । साथ हो यह भी ध्रुव सत्य है कि, यदि भार-तीय विद्वानों को पूर्ण स्वातन्त्र्य मिले, तो वे आज भी विलुप्तप्राय वैदिक - विज्ञान - परम्परा के पुनरु-द्धार के द्वारा भौतिक आविष्कारों से अपना अतीत वर्त्तमानकाटि में लासकते हैं । इसप्रकार भौतिक विज्ञान के आधार पर प्रतिष्ठित विमानादि भौतिक आविष्कारों के सम्बन्ध में अपने त्रिकालज्ञ, विदितवेदितव्य, कत्तु मकर्त्त मन्यथाकर्त्ती, समर्थ महामहर्षियों के यश: -सौरभ को अणुमात्र भी कम न करते हुए इस सम्बन्ध में हमें अपना यह मन्तव्य स्पष्ट कर ही देना चाहिए कि, भारतीय महर्षियों के " वैज्ञानिक - जगत् " की परिभाषा अपना कोई विशेष ही महत्त्व रखती है । साथ ही यह भी निर्विवाद है कि, ऋषियों की उस तात्त्विक वैज्ञानिक- परिभाषा की तुलना में भौतिक - आविष्कारों से सम्बन्ध रखने वाली वैज्ञानिक- परिभाषा कोई विशेष महत्त्व नहीं रखती! यदि इस सम्बन्ध में यह भी कह दिया जाय, तब भी कोई अतिशयोक्ति न होगी कि, ऋषियों का वैदिक - विज्ञान प्रधानतः जिन तीन श्रेणियों में विभक्त है, उनके अतिरिक्त किसी चौथे ( भौतिक विकारानुगत ) विज्ञान पर उनकी दृष्टि सदा से नहीं के समान ही रही है । यही कारण है कि, जिस देवयुग में विमानादि भौतिक आविष्कार विद्यमान थे, उस युग में भी आविष्कार सर्वलोक - व्यवहार में नहीं आमके थे । भौतिक आविष्कार माननीय बुद्धि में जड़ता का समावेश करते हुए उसमें जहाँ प्रतिहिंसालक्षण असुर - भाव का समावेश कर देते हैं, वहाँ साथ साथ ही इनके अतिशय व्यवहार से मानवसमाज की प्राकृतिक शक्तियाँ, स्वतः सिद्ध पौरुप भी हासानुगत ही बनता रहता है । आत्मस्वातन्त्र्य के अन्यतम शत्रु ये ही भौतिक आविष्कार हैं । ऋपि इन की इस भीषणता से परिचित थे, अतएव इस ओर सदा से उन्होंने उपेक्षावृत्ति को ही प्रधानता दी । फलतः इन भौतिक आविष्कारों के आधार पर न तो वैदिक विज्ञान का महत्त्व कम ह । किया जासकता, न इस सम्बन्ध में वैदिक विज्ञान के सामने आक्षेपात्मक कोई प्रश्न ही उपस्थित करने की धृष्टता की जासकती । १०५६
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तृतीय अध्याय प्रथमत्राह्मण शतपथब्राह्मण ऋषियों का वैदिक - विज्ञान प्रधानतः आधिदैविक, आध्यात्मिक, आधिभौतिक, इन तीन श्रेणियों में विभक्त है । आधिभौतिक विज्ञान ही ' यज्ञविज्ञान ' है, इसी के आधार पर हमारा गृहस्थाश्रमानुबन्धी ' कम्मकाण्ड ' प्रतिष्ठित है । आधिदैविक विज्ञान ही ' ईश्वरविज्ञान ' है, इसी के आधार पर वानप्रस्थाश्रमानुबन्धी ' उपासनाकाण्ड ' प्रतिष्ठित है एवं आध्यात्मिक विज्ञान ही ' जीवविज्ञान ' है, तथा इसी के आधार पर संन्यासाश्रमानुबन्धी ' ज्ञानकाण्ड ' प्रतिष्ठित है । कम्म, उपासना, ज्ञान, ये तीन हीं मानवसमाज के परमपुरुषार्थ हैं । इन तीनों का क्रमशः मनुष्य की बुवा, प्रौढ़, वृद्धावस्थाओं से सम्बन्ध है । अपनी इन तीन अवस्थाओं में श्रश्रमविभाग की मदानुसार क्रमशः तीनों पुरुषार्थो का अनुगमन करने वाले मनुष्य का इहलोक, बरलोक, लोकसंग्रह, आदि सभी कुछ गतार्थ होजाता है । यदि ओर भी मृदमदृष्टि से विचार किया जाता है, तो हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि, उक्त तीनों विज्ञानों का अन्ततोगत्वा ' यज्ञविज्ञान ' पर ही पय्र्यवसान है । ईश्वर के माथ सालोक्य सामीप्य - सायुज्य सारूप्य रूप अपने आत्मा को मिला देना हीं आधिदैविक विज्ञानानुगत उपासनाकाण्ड का चरम फल है । आत्मप्रपचिलक्षणा यह उपासना आत्मा का ईश्वर के साथ यजन कराती हुई यजनलक्षणा यज्ञमर्यादा से ही युक्त है । एवमेव अपने विशुद्ध, अपहतपाप्मा, जीवात्मा को उस निरुपाधिक, विशुद्ध, व्यापक आत्मतत्त्व में समवल रूप से बहुत कर देना हीं आध्यात्मिक-- विज्ञानानुगत ज्ञानकाण्ड का चरम फल है । आत्मसमवलय - लक्षण यह ज्ञान भी आत्मा का आत्मा के साथ यजन कराता हुआ यजनलक्षण यज्ञमर्यादा से बाहर नहीं माना जा--सकता । इसप्रकार यज्ञविज्ञान के गर्भ में इतर दोनों विज्ञानों का भी अन्तर्भाव होरहा है । इसी आधार प * ' यज्ञेन यजमयजन्त देवाः ' - बज्ञेन नात्रः पदवीयमान् " इत्यादि मन्त्रवर्णन अर्थ वन रहे हैं । उक्त तीनों विज्ञानों का समष्टयात्मक एक ही नाम है - ' विश्वविज्ञान ' । क्योंकि सम्पूर्ण विश्व अध्यात्म, अधिदेवत, अधिभूत भेद से तीन हीं भागों में विभक्त है । त्रिपर्वात्मक, विश्वविज्ञा-नात्मक इसी समयज्ञ के लिए ' सबहुत ' - ' सर्वमेध ' इत्यादि नाम प्रयुक्त हैं, जिस का यत्र तत्र
* - यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धम्माणि प्रथमान्यासन् ।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥
- यजुः सं ० ३१।१६
यज्ञेन वाचः पदवीयमायन्तामन्वविन्दन्नृषिषु प्रविष्टाम् ।
तामाभृत्या व्यदधुः पुरुत्रा तां सप्त रेभा अभि सं नवन्ते ॥
- ऋक् सं ० १० / ७१।३ १०६०
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तृतीयप्रयाय द्वितीयब्राह्मण प्रथमकाण्ड प्रकरण - विशेषों में विस्तार से प्रतिपादन हुआ है । सर्वहुतयज्ञ के उक्त तीनों पर्वो का क्रमशः विश्व के ' स्वयम्भू, सूय्यं पृथिवी ' इन तीन पर्वों के साथ क्रमिक सम्बन्ध माना गया है । सहस्रवल्शात्मक -- महामायावच्छिन्न - अश्वस्थवृक्ष के योगमायावच्छिन्न, पञ्चपुण्डीरा-प्राजापत्यचल्शात्मक, अतएव पञ्चपर्वात्मक, विश्व के सुप्रसिद्ध पाँचों पत्रों का " स्वयम्भू परमेष्टी, सूर्य, चन्द्रमा, पृथिवी " रूप से प्रथमखण्ड में अनेक बार उपबृंहण किया जाचुका है । इन पाँचों विश्वपत्र का आगे जाकर ' स्वयम्भू सुखं पृथिवी ' इन तीन पर्वों में हीं विश्राम मान लिया जाता है । इस विश्रान्ति का कारण यही है कि, यज्ञस्त्ररूप-- सम्पादक देवताओं का परस्पर यजन होरहा है । पाँचों के क्रमशः ' ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, सोम, अग्नि, ये पाच देवता हैं । इन में ब्रह्मा स्वतन्त्र रहते हैं । ये ही — ब्रह्म वै सर्वस्य प्रथमजम् ब्रह्म त्रे सर्वस्य प्रतिष्ठा " ( श ० ब्रा ० ६।१ । ) के अनुसार सर्वप्रतिष्ठा हैं, प्रथमज हैं । विष्णु - इन्द्र, दोनों का एक युग्म है, जैसा कि " विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो नि पस्परो । इन्द्रस्य युज्यः सखा ' ( श्रुति ) इत्यादि
- तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ।
छन्दासि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥
तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः ।
गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः ॥
तं यज्ञ ं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः । तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये । - यजुः सं ० ३१, ७, ८.६, “ ब्रह्मवै स्वयम्भु तपोऽतप्यत । तदैक्षत, न वै तपस्यानन्त्यमस्ति, हन्ताहं भूते--वात्मानं जुवानि भूतानि चात्मनि इति । तत् सर्वेषु भूतेष्वात्मानं हुत्वा भूतानि चात्मनि सर्वेषां भूतानां श्रेष्ठ्यं स्वाराज्यं श्राधिपत्यं पयत् । तथैतद्यजमानः सर्व-मेधेन सर्वान् मेधान् हुत्वा सर्वाणि भूतानि त्रैष्ठयं स्वाराज्यमाधिपत्यं पय्येति । स वाऽ-एष सर्वमेधो दशरात्रो यज्ञक्रतुर्भवति । दशाक्षरा विराट्, विराडु कृत्स्नमन्न ं , कृत्स्नस्यैवा-न्नाद्यस्यावरुद्धर्ये । तस्मिन्नग्नि परार्ध्य चिनोति । परमेो वाऽएप यज्ञक्रतूनां यत् सर्वमेधः । परमेणेनेनं परमतां गमयति " । -- शत ० ब्रा ० १३ कां ० ७ ० १ ० १ ० । १०६१
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तृतीयश्रध्याय द्वितीयत्राह्मण शतपथब्राह्मण मन्त्रवन से प्रमति है । एवं इन्द्र - सोम ( चन्द्र ), अग्नि, इन तीनों का एक स्वतन्त्र विभाग है । इसप्रकार ' १-२-३ ' इस क्रम से पाँचों का तीन हीं संस्थाओं के निर्माण में उपयोग होरह । है । प्रथमसंस्था के अधिपति ब्रह्मा हैं, इनका स्वयम्भू से सम्बन्ध है । द्वितीय संस्था के अधि-पति इन्द्रगर्भित विष्णु हैं, इनका सूय्यं से सम्बन्ध है । एवं तृतीय संस्था के अधिपति इन्द्र - सोम-गर्भित अनि हैं, तथा इनका सम्बन्ध पृथिवी से है । ब्रह्मा ब्रह्मा हैं, इन्द्रगर्भित विष्णु विष्णु हैं, एवं इन्द्र - सोम - गर्भित अनि महेश हैं । इसी ' विश्वाविज्ञान ' के आधार पर प्रार्थसर्वस्व ' ( पुराण ) वैदिक - पञ्चवाद के स्थान में त्रिदेवतावाद को ही प्रधानता दी है । ' पुरुषविज्ञान ' के अनुसार भी इसी त्रिपर्व का समर्थन होरहा है । अव्ययपुरुषानुगत ' आनन्द ', श्रक्षर पुरुषानुगत ' ब्रह्मा ' एवं क्षरपुरुषानुगत ' प्राण ' तीनों के सम्बन्ध से आनन्द - त्रह्मा- प्राणमय बनने वाला स्वयम्भू ही ' आध्यात्मिक यज्ञ ' की प्रतिष्ठा है । अव्ययानुगत विज्ञानगर्भित ' मन ', अक्षरानुगत विष्णु-गर्मित ' इन्द्र ', एवं क्षरानुगता गर्भिता ' वाक् ', इन तीनों के सम्बन्ध से मन- इन्द्र - वाङ्मय बनने वाला सूर्य्य ही अधिकयज्ञ की प्रतिष्ठा है । अव्ययानुगता प्राणगर्भिता ' बाकू ', अक्षरानुगत इन्द्रसोमगर्भित ' अग्नि ', एवं क्षरानुगत अन्नगर्मित ' अन्नाद ', इन तीनों के सम्बन्ध से ' बाक - अग्नि- अन्नादमय बनने वाली पृथिवी ही आधिभौतिक यज्ञ की प्रतिष्ठा है । पृथिव्यनुगत, कर्मकाण्डात्मक, आधिभौतिकयज्ञ स्वर्गसुख की प्रतिष्ठा है । सूर्यानुगत उपासनाकाण्डात्मक, आधिदैविकयज्ञ अपरामुक्ति की प्रतिष्ठा है । एवं स्वयम्भू अनुगत, ज्ञानकाण्डात्मक, आध्यात्मिक यज्ञ परामुक्ति की प्रतिष्ठा है । इसप्रकार ' त्रिःसत्या वै देवाः ' के अनुसार त्रित्त्ववाद का समर्थन करने वाला हमारा सर्वहुतयज्ञ त्रिपर्वा न कर सर्वप्रतिष्ठा बनता हुआ । ' इछु-कामधुक् ' नाम को सर्वथैव अन्वर्थ कर रहा है । १ – आनन्दः ब्रह्मा प्राण: स्वयम्भूः ] स्वयम्भूः २ - विज्ञानम त्रिष्णुः आपः परमेष्ठी -सूर्य: १३ – मनः इन्द्रः बाकू सूर्य: - सर्वहुतयज्ञः ४- प्राणः सीमः अन्नम चन्द्रमाः * -पृथिवी ५- वाक अग्निः अन्नादुः पृथिवी
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तृतीय अध्याय द्वितीयब्राह्मण प्रथमकाण्ड १ - स्वयम्भूः - अध्यात्मम ( अध्यात्मयज्ञप्रतिष्ठा -- ज्ञानकाण्डम् ) २– सूर्य्यः – – अधिदैवतम् ( अधिदैवत यज्ञप्रतिष्ठा --उपासनाकाण्डम् ) - सर्वहुतः ३ - पृथिवी - अधिभूतम् ( अविभूतयज्ञ प्रतिष्ठा कर्मकाण्डम् ) प्राकृतिक यज्ञविज्ञान ही विश्वविज्ञान है, एवं इसी के आधार पर पुरुषार्थसंसाधिका वैध - यज्ञत्रयी का ( ज्ञान - उपास्ति - कम्र्मत्रयी का ) महर्षियों के द्वारा आविर्भाव हुआ है । इस मौलिक स्थिति के आधार पर कहा जासकता है कि, हमारा वैदिक - विज्ञान उस नित्य यज्ञविज्ञान से ही सम्बन्ध रखता है, जिसके परिज्ञान से, एवं तदनुकूल वैधयज्ञानुष्ठान से आत्मनिःश्रेयस के साथ साथ लोकाभ्युदय सर्वात्मना पुष्पित, पल्लवित हो-जाता है । प्रकृतिसिद्ध नियमों का अनुगमन करते हुए हम शान्ति, तथा लोकसंग्रहपूर्वक जीवनयात्रा का निर्वाह करते हुए परत्र सद्गति प्राप्त करें, एकमात्र इसी उद्देश्य की सिद्धि के लिए हमारा विज्ञानशास्त्र प्रवृत्त हुआ हुआ है, जिसका मूलम्तम्भ यज्ञविज्ञान ही माना जासकता है । यज्ञकर्म्म ही हमारे विज्ञान का चरमफल है । ऐसी दशा में यज्ञकम्मांतिरिक्त भौतिक - आविष्कारों को लेकर हमारे विज्ञानशास्त्र पर किसी प्रकार का प्रतिप्रश्न नहीं किया जासकता । जब कि केवल यज्ञकर्म ही हमारी प्राकृतिक शक्तियों को सुरक्षित रखता हुआ हमारी सत्र आवश्यकताएँ पूरी कर सकता है, तो फिर हमें हमारे विज्ञानशास्त्र से उन हिंस्रक, अशान्तिवर्द्धक, सहजशक्ति-विनाशक, भौतिक श्राविष्कारों के सम्बन्ध में प्रश्न करने का कोई अवसर ही नहीं बच रहता । निवेदन करने का अभिप्राय यही है कि, ' विज्ञान ' शब्द से भौतिक आविष्कार प्रकृत विज्ञानकाण्ड में सर्वथा अनभिप्रेत हैं । विज्ञान शब्द की मा यज्ञविज्ञान - पर्य्यन्त ही सीमित समझनी चाहिए, जिस के कि गर्भ में याधिदै त्रिक, आध्यात्मिक, श्राधिभौतिक विज्ञान प्रतिष्टित हैं * । उक्त दृष्टिकोण को लक्ष्य में रखते हुए ही हमें प्रकृत ' आज्य ब्राह्मण ' का समन्वय करना है । यज्ञकर्म की सिद्धि के लिए ' श्राज्यग्रहण ' किया जाता है । इस सम्बन्ध में प्रसङ्गात् यह भी स्पष्ट करलेना चाहिए कि, उक्त बज्ञत्रयी में से प्रकृत में प्रधान - लक्ष्य पृथिव्यनुगत आधिभौतिक यज्ञ ही है । उपासना से सम्ब न्ध रखने वाला सूर्यानुगत आधिदैविक बज़ आरण्यकप्रन्थों से सम्बन्ध रखता है, एवं ज्ञान से सम्बन्ध रखने वाला स्वायम्भुव आध्यात्मिक यज्ञ उपनिषद् प्रन्थों से सम्बन्ध रखता है । ब्राह्मण-ग्रन्थों में प्रधानरूप से कर्म से सम्बन्ध रखने वाले पृथिव्यनुगत अधिभौतिक यज्ञ का ही बिश्ले-हुआ है । पृथिव्यनुगत ग्राधिमौतिक यज्ञ में भूपिण्ड, पार्थिव शरीर, भूमहिमा, भेद से तीनो यज्ञों का उपभोग होरहा है । स्वयं भूपिण्ड, तथा औषधि वनस्वति लोष्ठादि अचेतन वर्ग पृथिव्यनुगत व्याधिभौतिक यज्ञ से ही सम्बन्ध रखते हैं । वैश्वानर - तेजस -प्राज्ञात्मक ससंज्ञ पार्थिवशरीर ( अस्मदादि चेतनत्रर्ग ) पृथिव्यनुगत * शतपथ - प्रथमखण्ड के प्रारम्भिक पारिभाषिक सूचनाएँ ' नामक स्वतन्त्र स्तम्भ में भारतीय दृष्टि-कोणानुगत ' विज्ञान ' शब्द का विस्तार से निरूपण किया जाचुका है । १०६३
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तृतीय अध्याय प्रथमत्राह्मण शतपथब्राह्मण आध्यात्मिक यज्ञ से सम्बन्ध रखते हैं । एवं एकविंशस्तोमावच्छिन्ना महापृथिबी ( भूमहिमा ) से सम्बन्ध रखने वाले पार्थिव दियदेवता पृथिव्यनुगत प्राधिदैविक यज्ञ से सम्बन्ध रखते हैं । इसप्रकार केवल पार्थिवसंस्था से सम्बन्ध रखने वाले, कर्म्मप्रधान ग्रधिभौतिक यज्ञ में हीं भूविवर्त्त, पाथत्र चेतनवर्ग, दिव्य देववर्ग, भेद से तीनों यज्ञों का उपभोग सिद्ध हो रहा है । तथ्य यद्यपि अप्रासङ्गिक है । तथापि इसका स्पष्टीकरण करके ही ' ब्राह्मणविज्ञान ' का समन्वय करना चाहिए | विश्व के तीनों पर्वो के स्पष्टीकरण के लिए वेद के पौधेय ब्राह्मणभाग के ' विधि, आर-एक, उपनिषत् ' भेद से तीन काण्ड हमारे सम्मुख उपस्थित हुए हैं । ये तीनों काण्ड कत्तव्यमार्ग का ही प्रद-र्शन कर रहे हैं | शेष ब्रह्म ( मन्त्र ) भाग ज्ञातव्य भाव से सम्बन्ध रखता है । इसप्रकार ज्ञातव्य, कर्त्तव्य-भेद से वेदशास्त्र ' ब्रह्म - ब्राह्मण ' रूप से दो भागों में विभक्त होरहा है । विश्वविज्ञान का क्या स्वरूप है?, इस प्रश्न का समाधान ब्रह्मवेद ( संहितावेद ) कर रहा है । एवं विश्वविज्ञान के आधार पर हमें क्या करना चाहिए?, कैसे करना चाहिए? इस प्रश्न का समाधान ब्राह्मण वेद ( विधि, आरण्यक उपनिषद् वेद ) कर रहा है | इसप्रकार मन्त्रब्राह्मणात्मक सशाख वेदशास्त्र त्रित्त्व के ज्ञातव्य, कर्त्तव्य की पूर्ति करता हुआ सर्वशास्त्र ही बन रहा है । प्रस्तुत माध्य कर्तव्य वेदमाग के कर्मकाण्ड से ही सन्बन्ध रखता है, जिसका कि पृथिव्यनुगत याधिभौतिक यज्ञपर्व से ही सम्बन्ध है । विध्यात्मक ब्राह्मणग्रन्थों में ' इति नु अध्यात्मम ' इति नु अधिदैवतम ' इत्यादि रूप से जिन अध्यात्मादि विवर्तो का स्पष्टीकरण होरहा है, उनका एकमात्र पृथिव्यनुगत श्राधिभौतिक यज्ञपर्व से ही सम्बन्ध समझना चाहिए । निष्कर्ष यही निकला कि, वेदशास्त्र विज्ञानप्रधान है । विज्ञान से प्रधानतः ' विश्वविज्ञान ' ही अभि-प्रेत है । इस विश्वविज्ञान के अध्यात्म, अधिदैवत, अधिभूत, नामक तीन पर्व है । तीनों पर्वो का क्रमश. स्वयम्भूमूर्ख - पृथिवी, से सम्बन्ध है । ये ही तीनों विज्ञान क्रमशः ज्ञानकाण्ड, उपासनाकाण्ड, कर्म्मकाण्ड, की प्रतिष्ठाभूमि हैं । इस विज्ञानत्रयी के ज्ञातव्य, कर्त्तव्य, भेद से दो विवर्त्त हैं । जात्री का स्पष्टीकरण संहितात्मक ब्रह्मवेद में हुआ है, एवं कर्त्तव्यत्रयी का निरूपण ब्राह्मणात्मक वेद में हुआ है । नक्ष-विज्ञान, विज्ञान, आवधि - वनस्पतिविज्ञान, शलविज्ञान, आदि आदि अवान्तर खण्ड - खण्डात्मक समस्त विज्ञानों का इह्रीं तीनों विज्ञानों में अन्तर्भाव है । १ श्रध्यात्मविज्ञानम् - स्वायम्भुवम - विधिः ( कर्तव्यात्मकं कर्म्म ) २ - अविद्वै वनविज्ञानम् -- सौरम् - - आरण्यकः ( कर्त्तव्यात्मिका - उपासना ) ३ – अधिभूतविज्ञानम् - पार्थिवम् उपनिषत् ( कर्तव्यात्मकं ज्ञानम् ) इन तीनों में विशेषता यही है कि, स्वायम्भुव अध्यात्मयज्ञ का ईश्वरीयसंस्था सम्बन्ध है, एवं हस के आधार पर सौर आधिदैविक विज्ञान प्रतिष्ठित है । साथ ही यही श्राधिभौतिक विज्ञान की भी प्रति ' टा बना हुआ है । दूसरे शब्दों में ईश्वराच्मा का अध्यात्म स्वायम्भुव यज्ञ है, अधिदैवत सौर यज्ञ है, एवं अधिभूत पार्थिव यज्ञ है । इन तीनों में से हमारे वैधयज्ञ का एकमात्र ईश्वरीय, पार्थिव आधिभौतिक गज़ से ही सम्बन्ध है । ईश्वरीय आधिभौतिक यज्ञ के पुर्वकथनानुसार भूमहिमा, पार्थिव शरीर एवं मनुष्यकृत वै यज्ञ के भेद से तीन १०६४
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तृतीयमाय २. – पार्थिव शरीराणि -३ – पुरुषप्रयत्नसाध्या वैधमज्ञाः-जायगा । द्वितीयब्राह्मण प्रथनका एड ( पार्थिवः ) ( पार्थिवः ) सैपा आधिभौतिक-यज्ञत्रयी - अध्यात्मयज्ञः - अधिभूतयज्ञः १०६५ होजाते हैं । यहाँ भूमहिमालक्षण यज्ञ श्राधिदैविक यज्ञ है, एवं यही पार्थिव शरीरलक्षण श्राध्यात्मिक यज्ञ की प्रतिष्ठा है । जैसी स्थिति, जो श्रवयवसंस्थान पार्थिव अधिदैविक यज्ञ का है, वैसी ही स्थिति, वही श्रवश्व-संस्थान पार्थिव शरीरात्मक आध्यात्मिक यज्ञ का है । एवं जिस नियम से आध्यात्मिक यज्ञ ( पुरुषसंस्था ) का निर्माण हुआ है, उमी नियम से ऋषियों के द्वारा आधिभौतिक लक्षण वैधयज्ञ का वितान हुआ है । ईश्वरीयसंस्था जहाँ अध्यात्मविदैवत की प्रतिष्ठा थी, वहाँ जीवसंस्था में अधिदैवत अध्यात्म की की प्रतिष्ठा है I १ – एकविंशस्नोमाच्छन्नो भूमहिमा - अधिदैवतयज्ञः ( पार्थिवः ) उक्त स्थिति को लक्ष्य में रखते हुए ही हमें प्रकृत ब्राह्मण के ' प्रतिरूपरहस्य ' का समन्वय करना है । ' पुरुषो वै यज्ञः ' इत्यादि श्रुति यज्ञोद्द श्येन पुरुष का विधान करती हुई यही बतला रही है कि, हमारा यह पुरुष -- ( मानव ) -- प्रयत्नसाध्य यज्ञ पुरुष ( मानब ) की प्रतिकृति ही है । पुरुष इस वैधयज्ञ का वितान कर रहा है, इसीलिए यज्ञ की पुरुष माना जासकता है । ' पुरुष ' शब्द स्वयं बज़स्वरूप का सूचक है । शोणित ग्राग्नेय तत्व है, शुक सोम तत्त्व है, दोनों के यजन का ही नाम यज्ञ है, एवं यही यजत्रक्रिया पुरुषोत्पत्ति का प्रधान कारण है । अतएव पुरुष को अवश्य ही यज्ञ कहा जासकता है । यज्ञात्मक पुरुष का जो व्यापार होगा, वह भी बज़ ही माना जायगा, एवं इस यज्ञव्यापार से जिस कर्म का स्वरूप सम्पन्न होगा, वह कर्म्म भी पिता-पुत्रवत् यज्ञ ही कहा जायगा । यज्ञ उस अतिशय का नाम है, जो प्रक्रियाविशेषों से उत्पन्न होकर यज्ञकर्त्ता के भूतात्मा की स्वर्गादि प्राप्ति का कारण बनता है । अतएव इस अतिशय ( संस्कार ) को ' दैवात्मा ' कहा जाता है । वह दैवात्मा ही वस्तुतः यज्ञ है । इस का उपादान यजमान का कर्म बनता है । जब कि उपादान-स्थानीय वजमानविता पुरुष है, तो तत् पुत्र- स्थानीय, अतिशयलक्षण दैवात्मरूप यज्ञ को भी पुरुष ही कहा इस के अतिरिक्त हम यह भी देखते हैं कि, पुरुषयज्ञ ( मानवशरीर ) का जिस कौशल से वितान हुआ है, उसी कौशल से इस बैधयज्ञ का वितान हुआ है । वैज्ञयज़ से पहिले पुरुषयज्ञ का ही विचार कीजिए । पाञ्चभौतिक शरीरबिएड ' गज्ञसंस्थान ' है । भूतात्मा यज्ञकर्त्ता ' यजमान ' है । आलोमभ्यः, आन-खाप्रेभ्यः व्याप्त वैश्वानरानि ' होता ' है । श्वासप्रश्वासात्मक वायु अध्वर्यु ' है । हृदयस्थ प्रज्ञान मन ' ब्रह्मा ' है । कण्ठस्थित तेजोनाड़ी में प्रतिष्ठित उदानप्राण उद्गाता ' है । मूलाधारमण्डल ' गार्हपत्यकुण्ड ' है, तत्रम्य श्रपानाग्नि ' गार्हपत्याग्नि ' है । जठराग्निमण्डल ' दक्षिण्णग्निकुण्ड ' है । तत्रस्थ. जाठराग्नि ' दक्षिणाग्नि ' है । शिरो एडल ' आहवनीयकुण्ड ' है । तत्रस्थ प्राणाग्रि ' श्रावनी-बाग्नि ' है । केश - लोम बर्हि ' है । अस्थिसमूह ' ममिध ' हैं, द्रव द्रव्य प्रणीता, तथा ' प्रोक्षणी ' हैं । अन्न ' आहुतिद्रव्य ' है । दक्षिणभुजा - दक्षिणपाद ' जुहूः ' है । वामभुजा वामपाद ' उपभृत ' है । मध्याङ्ग ' धुवा ' है । सर्वाङ्गशरीरसंचारी चैतन्यप्रारण ' स्रुत्र ' है । कण्ठ से आरम्भ कर मूला--धार पर्य्यन्त सम्पूर्ण प्रदेश वेदि है । " इसप्रकार हमारी पुरुप्रसंस्था यज्ञस्वरूप का सर्वात्मना प्रतिरूप ही बन