Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 801–810

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 801–810

पृष्ठ 801

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तृतीय अध्याय द्वितीयब्राह्मण शतपथब्राह्मण रही है । ऐसे यज्ञात्मक इस पुरुषाकार के आधार पर ही, तदनुरूप ही क्योंकि इस वैधयज्ञ का विज्ञान होता है, श्रतएव इस वैधयज्ञ को हम अवश्य ही पुरुष का प्रतिरूप कह सकते हैं । पुरुषयज्ञ में दक्षिणभुजा से ग्रन्नाहुति दी जाती है, वामभुजा सहयोगिनी बनी रहता है, चैतन्यप्राण अन्नरस को सर्वाङ्गशरीर में पहुँचाता रहता है, मध्याङ्ग से इतर सम्पूर्ण शरीरावयव रसग्रहण के द्वारा पुष्ट होते रहते हैं । ठीक वही काम इस वैधयज्ञ में जुह्वादि से लिया जाता है । अतएव आहुतिसाधक जुहू को हम इस वैधयज्ञ की दक्षिणभुजा कह सकते है । उपभृत् जुहू की सहयोगिनी है, अतएव इसे वामभुजा माना जासकता है । ध्रुवा से ही ( ध्रुवास्थित आाज्य से ही ) सम्पूर्ण यज्ञ सम्पन्न होता है, अतएव इसे आत्मा ( मध्याङ्ग ) माना जासकता है । स्रुवा का सम्पूर्ण स्रुचों में सञ्चार होता है । अतएव इसे प्राण कहा जासकता है । इसप्रकार दक्षिणभुजा, वामभुजा, मध्याङ्ग, सवारी प्राण, इन चारों के अनुरूप अपना स्थान रखने वाले जुहू, उपभृत, ध्रुवा, सुब, चारों यज्ञपात्र यज्ञ की पुरुषप्रतिरूपता को सर्वात्मना अन्वर्थ बना रहे हैं । निष्कर्षत: जैसा वितानक्रम आध्यात्मिक यज्ञ का है, ठीक वही क्रन इस ग्रामीतिक यज्ञ का है । यहाँ ऐसा - क्यों किया गया?, किस आधार पर किया गया?, इत्यादि प्रश्नों की उपनिषत् यही आध्यात्मिक यज्ञ ( पुरुष-स्वरूप ) है । वैधयज्ञ यज्ञ हैं, उधर प्राकृतिक पुरुषयज्ञ भी यज्ञ है । ' प्रकृतित्रद्विकृतिः कर्त्तव्या यह आदेश है | अतएव यहाँ वैसा ही करना न्यायसङ्गत है । जब यह वैसा ही है, तो इसे वह ( पुरुष ) कहने में कोई भी आपत्ति नहीं की जासकती । “ पुरुष -- यजमान ) - प्रयत्नसाध्य होने से, तथा पुरुषयज्ञानुरूप वितायमान होने से यह वैध -- आधिभौतिक यज्ञ भी पुरुष ही माना जासकता है " उक्त प्रतिरूपता का यही निष्कर्ष है । अत्र इस सम्बन्ध में यह प्रश्न बच रहता है कि, पुरुषयज्ञ का स्वरूप ही एवंविध कैसे हुआ? | दूसरे शब्दों में इस प्रश्न यो भी विश्लेषण किया जासकता है कि, आधिभौतिक -- यज्ञ की उपनिषत् ( प्रतिष्ठा - मूलभित्ति ) तो अध्यात्मयज्ञ है, परन्तु आध्यात्मिक यज्ञ की उपनिषत् क्या है? इस प्रश्न का उत्तर नही पूर्वप्रतिप्रादित पार्थिव आधिदैविक - यज्ञ है । आधिदैविक पार्थिव दिव्ययज्ञ ही इस आध्यात्मिक पुरुषयज्ञ की प्रतिष्ठा है । भूपिण्ड से आरम्भकर २१ वें स्तोम- पय्यन्त व्याप्त महामहिम पार्थिवमण्डल ही ' यज्ञसंस्था ' है । पार्थिव सर्वप्रजापति ( पार्थिव अग्नि ) ही यज्ञकर्त्ता ' यजमान ' है । त्रिवृत्स्तोमावच्छिन्न पार्थिव प्रदेश में व्याप्त वैश्वा-नर अग्नि हीं ' होता ' है । पञ्चदशस्तोमार्याच्छन्न पार्थिव प्रदेशोपलक्षित अन्तरिक्ष में व्याप्त वायु ही ' अध्वर्यु ' है । चान्द्रसांमात्मक पार्थित्र मन ही ' ब्रह्मा ' है । एकविंशस्तोमावच्छिन्न पार्थिवप्रदेशो ५ लक्षित द्युलोक में व्याप्त आदित्य ही ' उद्गाता है । भूपिण्ड ही ' पुराण- गाईपत्यकुण्ड ' है, तत्रस्थ चित्याग्नि हीं ' पुराण गार्हपत्यामि ' है । त्रिवृत्स्तोमान्त पार्थित्रमहिमा प्रदेश ही ' नूतन गार्हत्याकुण्ड ' है, तत्र स्थित पार्थिव घनाग्नि हीं ' नृतनगार्ह-पत्याग्नि ' है । पञ्चदशन्तीमान्त पार्थिवमहिमा - प्रदेश ही ' धिष्यामिकुण्ड ' है, तत्रस्थ ग्रष्टविध नाक्ष-त्रिकाग्नि हीं ' धियाग्नि ' है । एकविंशस्तोमान्त पार्थिवमहिमाप्रदेश ही ' आहवनीयकुण्ड ' है, तथस्थ मौर दिव्याग्नि हीं ' आहवनीयाग्नि ' है । लोकालोकसीमान्तानुगत ' वेन ' नामक आप ही ' बर्हि ' हैं । अन्तरिक्ष में व्याप्त अश्मा सोम हीं ' समिध ' हैं । आन्तरीक्ष्य ' मरीचि ' नामक ' आप ' ही ' प्रणीता ' तथा ' प्रोक्षणी ' हैं, श्रधि सोम, तथा चान्द्रसोम ही ' आहुतिद्रव्य ' है । भूपिण्ड ही हविर्वेदि है । भृमहिमा ही ' महावेदि ' है । एकत्रिंशस्तोमावच्छिन्न द्युलोक ही दक्षिणहस्तस्थानीय ' जुहू ' है । जुहू ( द्यौ ) का आधारभूत पञ्चदशस्तोमा-वच्छिन्न अन्तरिक्षलोक ही बामहस्तस्थानीय उपभृत् ' है । स्वयं भूपिण्ड ही मध्याङ्गस्थानीय ' धुवा ' है । त्रैलोक्य-१०६६

पृष्ठ 802

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तृतीय अध्याय द्वितीयब्राह्मण प्रथमकाण्ड संचारी, चैतन्य - प्राणस्थानीय वायञ्यप्राण ही ' खुच ' है । इसप्रकार पार्थिवमहिमाल ० इस आधिदैविक यज्ञ में भी यज्ञ कित्तव्यता - संसाधक सामग्री - परिग्रह यथानुरूप, यथास्थान व्यवस्थित है । इस का क्योंकि ऐसा स्वरूप है, अतएव इस से उत्पन्न आध्यात्मिक यज्ञ का भी वैसा ही स्वरूप है । एवं जैसा स्वरूप आध्यात्मिक यज्ञ का है, तदनुरूप ही इस वैध-- श्राधिभौतिक -- यज्ञ का वितान किया जाता है । मूलानुवाद में मे यह सन्देह किया गया था कि, प्रथम तो पृथिवी की त्रैलोक्य से उत्पत्ति मानना हीं सङ्गत है । उस पर भी पृथिवी से पृथिवी की उत्पत्ति मानना तो कथमपि सङ्गत नहीं बन सकता । इस सन्देह की निवृत्ति के लिए दो शब्दों में ' पार्थिवसंस्था ' का स्वरूप जान लेना भी आवश्य होगा । भुतिने जिस पृथिवी को मध्याङ्गस्थानीय ' ध्रुवा ' बतलाया है, वह चित्याग्निप्रधान भूषिण्ड है, जिस पर अस्मदादि पार्थिवी प्रजा सपरिग्रह प्रतिष्ठित है । एवं श्रु तिने ध्रुवास्थानीय जिस इस भूपिण्ड से - " अस्या एवेमे सर्वे लोकाः प्रभवन्ति " इत्यादिरूप से जिस त्रैलोक्य की प्रसूति बतलाई है, वह चितेनिधेनाग्निप्रधान भूमहिमा है । अष्टविध त्रिलोकियों में से पृथिवी से सम्बन्ध रखने वाली त्रिलोकी ' स्तौम्य त्रिलोकी ' नाम से प्रसिद्ध है । इस की उत्पत्ति यथार्थ में ध्रुवास्थानीय भृपिण्ड से ही हुई है । " यथाग्निगर्भा पृथिवी, तथा यौरिन्द्रेण गर्भिणी ” इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार भूषिएड अग्निगर्भित है । यह भौमाग्नि हीं भूमि का अधिष्ठाता ' प्रजापति ' है । इस प्राजापत्य भौम अग्नि की अमृत ( चितेनिधेय ), मर्त्य ( चित्य ) भेद से दो व स्था सहज - सिद्धा मानी गई हैं, जैसा कि " अर्द्ध ह वै प्रजापतेरात्मनो मर्त्यमासीद्ध ममृतम " ( शत ० १० २ २ ) इत्यादि वचन से प्रमाणित है । भूपेण्ड मर्त्याग्निप्रधान है, तन्मय है । इस पिण्ड के केन्द्र में प्रतिष्ठित रहने वाला अमृताग्नि हीं रसाग्नि है, यही प्राणाग्नि है, यही देवाग्नि नाम से भी व्यव-हृत हुआ है । सृष्टिकामुक इस रसाग्निलक्षण प्रजापति की कामना स्वयं इस के रसाग्नि - भाग का ऊर्ध्व ( केन्द्र से चारों ओर ) प्रसार करती है । भूपिण्डकेन्द्र से चारों ओर चिंतत होने वाले इस रसाग्नि की बन - तरल-विरल - भेद से तीन अवस्थाएँ होजातीं हैं । जहाँतक घनरस व्याप्त होता है, तदवच्छिन्न प्रदेश ही ' पृथिवी ' ( महिमापृथिवी का पृथिवोलोक ) है । एवं तत्र प्रतिष्ठित घनाग्निरम ही ' अग्नि ' है । जहाँतक तरल रम व्याप्त होता है, तदवच्छिन्न प्रदेश ही ' अन्तरिक्ष ' ( महिमाथित्री का अन्तरिक्षलांक ) है । एवं तत्र प्रतिष्ठित तरल ग्नि ही ' हंस ' नामक ' वायु ' है । जहाँतक विरलरस व्याप्त होता है, तदवच्छिन्न प्रदेश ही ' द्यौः ' ( महिमापृथिवी का द्य लोक ) है । एवं तत्र प्रतिष्टित विरलाग्नि ही ' आदित्य ' है । इसप्रकार रखाग्नि के ऊर्ध्व वितान से वही केन्द्रस्थ अग्नि ' अग्नि, वायु, आदित्य ' अपने इन प्रथम - द्वितीय -द्वितीय - तृतीय- रूपों से त्रैलोक्य का निर्माण करता हुआ ' प्रतिष्ठात्रा ' रूप से त्रैलोक्य में व्याप्त होरहा है * । * " आपो वाऽर्कः । तद्यदर्पा शर ग्रामीत् तत् समहन्यत । सा पृथिव्य -भवत् । तस्यामश्राम्यत् । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजोरसो निरवर्त्तताग्निः । स त्रेधा-त्मानं व्यकुरुत - आदित्वं तृतीयं वायुं तृतीयम् । स एव प्राणः ( जाणाग्निः ) त्रेधा -हितः " इति । -शतः बा ० १०।६।१।१,२, १०६७

पृष्ठ 803

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तृतीयखप्याय द्वितीयब्राह्मण शतपथब्राह्मण इसप्रकार वा स्थानीय भूपिण्ड ही अपने हृदयस्थ रसाम्नि के ऊ वितान के द्वारा अहर्गणात्मक स्तोमों के आधार पर क्रमश: त्रिवृत ( ६ ), पञ्चदश १५ ) एकविंश ( २१ ) रूप से तीन संस्थाओं के रूप में पृथिवी, अन्तरिक्ष श्री का जन्मदाता बन कर ' अस्यागमे सर्वे लोका; प्रभवन्ति ' इस सिद्धान्त का समर्थन कर रहा है, और उक्त सन्देह का निवर्त्तक बन रहा है । इस सम्पूर्ण ' उपपत्तिग्रन्थ ' का फलितार्थ यहीं निकला कि, पार्थित्र आधिभौतिक यज्ञ से सम्बन्ध रखने वाले महिमात्मक आधिदैविक यज्ञ, पार्थिवशरीरात्मक आध्यात्मिक यज्ञ एवं पुरुषप्रयत्नसाध्य आधिभौतिक ( चैत्र ) यज्ञ, तीनों में पूर्व पूर्ण यह उत्तर उत्तर यश की उपनिषत् है ( १, २, ३, ४, ५, ) । पुरुषप्रयत्नसाध्य इस वैचयज्ञ में उपयुक्त होने वाले खुव पात्र हस्त - पाद - मध्याङ्गादि स्थानीय बनते हुए यह प्रमाणित कर रहे है कि यह चैत्र पुरुषविध श्राध्यात्मिक यश का ही प्रतिरूप है । आज्य--पृष्ठ विज्ञान के अनुसार प्रत्येक भौतिक पदार्थ में पृष्ठ एवं आज्य भेद से दो पर्न रहते हैं । भूत मर्त्यपिण्ड ' पृष्ठ ' कहलाता है, एवं जिस जीवनीय प्राणशक्ति से क्षरसंघात - ( क्षरकूट ) - रूप भौतिक परमाणु एकसूत्र में बद्ध रहते हुए नियत समय पर्यन्त स्वस्वरूप प्रतिष्ठा सुरक्षित रखने में समर्थ होते हैं, वह प्राणशक्ति ही ' आज्य ' नाम से व्यवहृत हुई है । जबतक पृष्ट ( पिण्ड ) में श्राज्य ( प्राणशक्ति ) प्रतिष्ठित रहता है, सभीतक पृष्ठ की स्वरूपसता है । पाञ्चनीतिक हस्तपादादि शरीरावयच पिण्डस्थानीय बनते हुए पृष्ठ हैं । इनमें प्रतिष्ठित आग्नेयपाण ( वैश्वानराग्निप्राण ) ही इन की प्राणशक्ति है । इधर वरुण से ( जलीयत से ) प्रतिमूर्च्छित अग्नितस्य का ही नाम श्राज्य ( धृत ) है । इसी आधार पर " तेजो वे आव्य म् ( ० ० १३०१०११८ ) " अग्नेर्वा एतद्रूपं यदाज्यम् " ( ते ० ब्रा ० ३८१४१२ ) – “ प्राणो वा श्रज्यम् " [ तै ० ब्रा ० ३८१४१२,३ ], इत्यादि निगम प्रतिष्ठित हैं । लोकव्यवहार में भी सुप्रसिद्ध है कि. ' घृतही हा पैरों में जीवनीय शक्ति प्रदान करता है ' । वशकर्म से ' पुरुषविध दिव्यात्मा अपन किया जाता है । यज्ञेतिकर्त्तव्यता में संग्रहीत जुहू आदि स्रुक् स्रुव तो पृष्ठ स्थानीय हैं, एवं इन में गृहीत धाज्य प्राणशक्तिस्थानीय है । इसप्रकार इस श्राप -- से भी पुरुषप्रयत्नसाध्य इस यज्ञ की पुरुष-यज्ञप्रतिरूपता भलीभाँति सिद्ध हो रही है । श्राज्यग्रहण क्या देवात्मा के स्वरूप निर्माण में उपयुक्त होता है?, यह प्रश्न है । इस के समाधान के लिए ही अगला प्रकरण उपकान्त हुआ है । पहिले आध्यात्मिकसंस्था का विचार कीजिए । आध्यात्मिक संस्था में प्रधानतः ' आत्मा, शरीर ' ये दो पर्व हैं । एवं शरीर ' पुर ' है, आत्मा इस शरीरपुर में सुरक्षित रहने वाला ' पुरि शेते ' निलंबन से ' पुरुष ' है इस शरीरपुर के ' आकार ' एवं वस्तुतन्य ' मेट से दीप है आयतनरूप • " खादिरः सः स्रुत्रः, पर्णमयी जुह अश्वत्थी उपभृत् त्रैकती धवा एतद्वै सुचां रूपम् " [ तै ० सं ० ३१ + / ७ ] इस वन्चन के अनुसार खुव खदिर [ वैर ] की लकड़ी का, जुहू पर्णमयी पलाश [ छीला ] की, ध्रुवा विकङ्कत का, एवं उपभृत् अश्वत्थ [ पीपल ] की लकड़ी का बनाया जाता है । १०६८

पृष्ठ 804

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तृतीय अध्याय द्वितीयब्राह्मण प्रथमकाण्ड बाह्य आकार ही आकार है, जिसे कि निज्ञानभाषा में ' प्रयोनाथ ' कहा जाता है । यह वनाथ दो + ' छन्द ' है । प्रत्येक वस्तुपिड का कोई न कोई बाह्य आकार अवश्य रहता है, एवं इस बाह्य आकार से त्राकारित वस्तुतत्त्व सीमित रहता हुआ सुरक्षित बना रहता है । छन्दोलण वयोना [ आकार ] से सुरक्षित वस्तुतत्त्व [ [ मृतबिएड ] ही ' जय ' है I जिसकार उदरसीमा से सीमित अन्न ' चय ' है, एवमेव छन्दःसीमारूप उदर में प्रतिष्ठित रहने से ही इस वस्तुतत्त्व को वब [ अन्न ] मान लिया गया है । त्रय सदा वयोनाध से युक्त रहता है । वय -- वयोनाध के समन्वितरूप का ही नाम ' वबुनम ' है । ' सर्वमिदं वयुनम् ' इस सिद्धान्त के अनुसार यच्चयावत् भौतिक पदार्थ वय [ वस्तुतत्त्व ], वयोनाध [ बाह्याकार ] से युक्त रहते हुए, ' वयुन ' हैं । वयुन ही आध्यात्मिक संस्था वा ' शरीर ' नामक पहिला पर्व है । शरीर के वयोभाग का ( भूतभाग का ) निर्माण शुक्र शोणित से हुआ है । ऋतुस्नाता स्त्री में प्रजनकसाधक अत्रिप्राण प्रतिशित रहता है । इस ऋण केस से ही रखता की ' ऋतुमती ' कहा जाता है । अग्नि - सोम की सत्य, ऋत 1 भेद से दो दो अवस्थाएँ मानी गई हैं । सायतन अग्नि सत्य है, सायतन सोम सत्य है । एवं निरातन, वाय्वात्मक अग्नि - सोमत हैं । इन ऋताग्नि - सोमों के पारस्परिक उद्याभ - निग्राम - सम्बन्ध से ही ' ऋतु ' का जन्म होता है इस ऋतु का आग्नेयभाग स्त्री के शोणित में प्रतिष्टित रहता है, एवं सौम्यभाग पुरुष के शुक्र में प्रधानरूप से प्रतिष्ठित रहता है । इस ऋतुप्राण - समन्वय का ही नाम शुक्र शोत का ' दाम्पत्य भाव ' है । यही दाम्पत्यकर्म गर्भाधान का बीज है । इसप्रकार वस्तुतत्त्व - लक्षण वय ( शरीर ) का निर्माण शुक्रशोणित से होता हुआ परम्परया ऋतु से ही होरहा है । शेष रहता है वयोनाध ( बाह्याकार ) । इस का निर्माण ऋतुसहयोगी गायत्र्यादि छन्दों से होता है । गायत्र्यादि छन्द्र स्वष्टाप्राण के सहयोग से ततच्छरीरावयवों में तत्तदाकारविशेष प्रदान करते जाते हैं, तदनुरूप दी ऋतु के द्वारा पुरावयवों का निर्माण होता जाता है । कालान्तर में इस ऋतु, छन्द के समन्वय से आत्मप्रतिष्ठा लक्षण ‘ शरीरपुर ' का स्वरूप पम्पन्न होजाता है । ऋतु - छन्दोमय शुक्र- शोणित के दाम्पत्यभाव में कर्मभोक्ता आँपपातिक जीवात्मा प्रतिष्ठित होजाता है । इसप्रकार आत्मा, शरीर, इन दो पर्वो के आत्मा, वस्तुतत्त्व ( वय ), ब्रह्माकार ( योनाथ ) भेट से तीन पर्व हो जाते हैं । तीनों में आत्मा प्रधान देवता है, इसे ही यज्ञपरिभाषा में ' श्रवापदेवता ' कहा गया है । वस्तुतत्त्व ( वय ) ऋतुदेवता हैं, बाह्याकार छन्दोदेवता हैं । पुर का उपक्रम ऋतु से होता है, उपसंहार छन्द पर होता है । वस्तुतत्त्व उपक्रमस्थानीय है, इसका ऋतु से सम्बन्ध है । इसी उपक्रमलक्षगा प्राथम्य के कारण वस्तुतत्त्वात्मक ऋतु को याज्ञिक - परिभाषा में ' प्रयाजदेवता ' कहा गया हैं । वस्तु का बाह्याकार ही वस्तु की अवसानभूमि है । इस का छन्द से सम्बन्ध है । इसी उपसंहारल क्षण अन्तभाव के कारण बाह्या--कारात्मक छन्द को ' अनुयाजदेवता ' कहा गया है । इसप्रकार ऋतुरूप प्रयाजदेवता तथा इन्दोरून ' अनुयाज-+ - छन्दांसि वै वयोनाघाः " ( शत ० २२८ ) । * - - छन्दोभिहृदं सर्व वयुनं नद्वम् " ( शत ० ८२२८ ) । - ऋतवः समिद्धाः प्रजाब प्रजनयन्ति, ओषधीच पचन्ति ( शन ० ० १२०४७ ) । १०६६

पृष्ठ 805

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तृतीयध्याय द्वितीयब्राह्मण शतपथब्राह्मण ' देवता ', दोनों के समन्वय से ही ' शरीर ' नामक आध्यात्मिक पुर का निर्माण होता है । दूसरा श्रावापदेवता-स्थानीय आत्मा अपने स्वरूप निर्माण के लिए अन्य द्रव्य की अपेक्षा रखता है । पृष्ट ही शरीर है, आज्य का इसी से सम्बन्ध है । इनकऋतु एवं छन्दीदेवता है । फलतः सिद्ध होजाता है कि, यह ऋतु तथा छन्दोदेवताओं की तृप्ति के लिए ही विहित है 1 जैसा आध्यात्म में है, बैसा ही तो यहाँ होना चाहिए, होता है । अध्यात्मवत् अधिभूमे उत्पन्न होने वाली देवात्मसंस्था में भी ' आत्मा - पुर ' मेट से दोनों पर्व अपेक्षित हैं । मुख्यदेवता देवात्मा के आत्मस्वरूप का निर्माण करेंगे एवं ऋतु - न्दोलन गौणदेवता आत्मपुर का निर्माण करेंगे । अतएव विज्ञायमान यश का यही तात्पर्य मानना पड़ेगा कि, अनेक इतिकर्त्ता-स्याताओं से वितायमान यह यश देवता, ऋतु, छन्द, इन तीन देवताओं की सम्वत् - प्राप्ति से ही सम्बन्ध रखता है | मुख्यदेवता का एक स्वतन्त्र विभाग है, इस के लिए नियत आहुतिद्रव्य भी स्वतन्त्र है, एवं यह ' हवि ' नाम से प्रसिद्ध है, जोकि विद्रव्य ' इष्टि, पशु, सोम ' यज्ञ मेद से अन्नपुरोडाश, पशु-पापुरोडाश, बल्लीसोमरस, भेद से त्रेधा विभक्त है । ऋतु छन्दोरूप दोनो प्रयाजानुयाजदेवताओं का ( जिन से कि पुर का निर्माण होगा ) एक स्वतन्त्र विभाग है, इनके लिए आहुतिद्रव्य भी स्वतन्त्र है, एवं यही ' आय ' नाम से प्रसिद्ध है । आत्मा- शरीर, यद्यपि दोनों की समष्टि ' देवदत्त ' है । अर्थात् ' देवदत्त ' नाम यवपि समष्टि से ही सम्बन्ध रखता है । तथापिमानना पड़ेगा कि, यह नाम मुख्यतः श्रात्मभाग से ही सम्बन्ध रखता है, न कि शरीर से । यही कारण कि " जब भूतात्मा प्राप्तसमय पर देह का परित्याग कर देता है, तो उस समय ' देवदत्त ' आज नहीं रहा यह लीकम्यवहार होता है । अवशेष शय - शरीर का कोई नाम नहीं रहता । दूसरी दृष्टि से विचार कीजिए । एक राजा अपने परिकर ( सेवकवर्ग ) के साथ कहीं आतिथ्य स्वीकार करने जाता है । यहाँ राजा का ही नाम मुख्य रहता है, राजा के नामग्रहण का ही व्यवहार लोकसिद्ध है । सेबकवर्ग का राजा के नाम में ही अन्तभांव है । ठीक यही स्थिति यहाँ समझिए । श्रात्मस्वरूप सम्पादक मुख्य देवताओं के लिए तो नामग्रणपूर्वक हरिहर होना चाहिए एवं परिकरस्थानीय ऋतु - छन्दो - देवताओं के लिए बिना नामग्रहण के ही अभ्यग्रहण करता है, यही लोकव्यवहार है, ( एवमु है तेषाम् ) । ' जामि ' दोष एक महादोष माना गया है । यथानुरूप व्यहार न करना ही ' जामि ' दोष है । वह सभ्यता का आग्रह है कि, जो जिस स्थान के योग्य हो, जिम सम्मान का पात्र हो, उसे वही स्थान - सम्मान दिया जाय । समदर्शन एवं चिपमवर्त्तन ही इस सभ्यता का अन्यतम रक्षक है । आत्मदृष्टि से प्राणीमात्र समान हैं, परन्तु व्यवहारक्षेत्र में सब विभिन्न मर्यादा के पात्र हैं । कारण यही है कि, समदर्शन का अखण्ड चिदात्मा से सम्बन्ध है, जोकि आपामर - विद्वज्जन कीटादि पय्यन्त सत्र में, एकरसरूप से प्रतिष्टित है । एवं विश्रमवर्त्तन का क्षेत्र प्रतिशरीर में भिन्न प्राधानिक सम्मत भूतात्मा है । दोनों के क्षेत्र सर्वथा विभिन्न हैं । इसलिए यह आवश्यक है कि, व्यवहारक्षेत्र में जामिदोष ( मर्यादा -- उल्लंघन - लक्षण व्यवहारटोप, असभ्यता ) से बचने के लिए जो जिसके योग्य हो, उसे उसी सम्मान का अधिकारी समझा जाय यहाँ वह उपमृत 9 भुवा में जो क्रमशः ४-८--४ बार करके आाज्यग्रहण किया जाता है, वह ऋतु, तथा छन्दों के लिए ही नियत है । मुख्य १०७०

पृष्ठ 806

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तृतीय अध्याय द्वितीयब्राह्मण प्रथमकाण्ड आत्मदेवता की तुलना में ये देवता अपना अवर स्थान रखते हैं । मुख्य देवताओं की भाँति इन परिकर --स्थानीय देवताओं के लिए भी यदि नामग्रहणपूर्वक ज्यग्रहण किया जायगा, तो श्रणमाभङ्गलक्षण नामिदोष होगा | अतः इनके लिए विना नामग्रहण के ही ज्याग करना चाहिए । ' अन्तरितभाजना ये पशवः ' ( तै ० ब्रा ० १२ १ ३ ) के अनुसार पशुप्राण का अन्तरिक्ष से मन्यन्ध है, उधर ऋतवन्दांसि पशवः ' के अनुसार दजवाहनल ऋ छन्द भी पशुस्थानीय ही हैं । ' तमन्तविज्ञस्य ( शत ० ७ | ५ | ११६ ) के अनुसार आज्या का अन्तरिक्षलोक से सम्बन्ध है । अतएव श्रान्तरिक्ष्य ऋतु छन्दों के लिए आज्यद्रस्य का ग्रहण ही अन्वर्थ बनता है । जुहू में जो चार बार आाज्यग्रहण होता है, उसका प्रयाजलक्षण ऋतुदेवता से सम्बन्ध है, एवं उपभृत् में जो आठ बार करके आाज्यग्रहण किया जाता है, उस का अनुयाज - लक्षण छन्दोदेवता से सम्बन्ध है । दोनों मुख्य देवतापेढ्या अयर रिंग में प्रतिष्ठित होते हुए नामग्रहण की मर्यादा से बहत हैं । शेष रहता है-ध्रुवा । ध्रुवा में जो चार बार आाज्यग्रहण किया जाता है, उसका उपयोग सम्पूर्ण यज्ञ की सिद्धि से सम्बन्ध रखता है । आाज्यसम्बन्धिनी सम्पूर्ण इतिकर्त्तव्यता या स्थित अन्य से ही पूरी की जाती है । जब यहाँ सब का अन्तर्भाव है,, तो यहाँ भी समग्रहण को अवसर नहीं मिल सकता जो वस्तु सच के लिए है, उसमें विशेष व्यक्ति का नामग्रहण ग्रसङ्गत है । इसप्रकार श्रात्मा के पुरनिर्माण करने वाले ऋतु - छन्दों के लिए ग्रहीत ज्य में नामग्रहण का प्रभाव ही अजामिभाव का रक्षक बन रहा है । ( ६,७,८,६,१० ) । ग्रहण - प्रक्रिया में कुछ विशेषता रक्खी गई है T और वह विशेषता यही है कि, गुह में ग्रहमा होता है चार चार ही, परन्तु श्राज्यमात्रा औपभृत् आज्य की अपेक्षा अधिक होती है । इधर उपभृत् मं संख्या की दृष्टि से जुहू की अपेक्षा ग्रहण तो होता है द्विगुणित ( आटचार ), परन्तु आज्यमात्रा उड़ के आज् की अपेक्षा अल्प होती है । इस विशेषता का क्या कारण?, प्रकृत प्रकरण इसी प्रश्न का सोपपत्तिक समाधान कर रहा है । वैदिक विज्ञान से सम्बन्ध रखने वाली सुप्रसिद्ध ' निदान विद्या ' ही इस उपपत्ति का मूलाधार है, जिस विद्या का गीतानिशानभाष्यान्तर्गत ' भक्तियोगपरीक्षा ' नामक भूमिका पञ्चमखण्ड के ' प्रतिमाननिर्माण-रहस्य ' नामक प्रकरण में विस्तार से निरूपण हुआ है । कुछ एक सादृश्यों के आधार पर अन्य में अन्य बस्तु का आरोप करना हीं ' निदान ' कहलाता है । जहाँ लोकव्यवहार में व्यवहारकर्म के सञ्चालन के लिए पदे पदे निदान का आश्रय लिया गया है, वहाँ शास्त्रीय व्यवहार में भी विशेषतः वेदशास्त्र के ब्राह्मणभाग में भी यज्ञकम्मसिद्ध के लिए अनेक स्थलों में इसका आश्रय लिया गया है । पहिले एक लौकिक उदारण ही लीजिए । “ डाक्टर ज्वालाप्रसाद गोविल मोतीलाल शर्मा का दहिना हाथ है ' यह लौकिक निदान का उदाहरण है । वस्तुगत्या ज्वालाप्रसाद कभी मोतीलाल का दहिना हाथ नहीं है, परन्तु आरोप किया जाता है । इस निदानारोप का मूल यही है कि, दहिना हाथ ही कर्म्मसिद्धि का मूलद्वार है । क्योंकि ज्वालाप्रसाद मोती-लाल के कर्म का अन्यतम सहायक है, बस इसी कम्मसादृश्य के आधार पर उसे निदानविधि से दहिना हाथ मान लिया गया है । अत्र एक शास्त्रीय उदारहण भी लीजिए । लोकव्यवहारसञ्चारिणी जगन्माता लक्ष्मी की प्रतिमा के हाथ में ' कमल ' का पुष्प है । यह कमल यूपिएड का सूचक है । भूपिण्ड का प्रारम्भिक उपादान ' आपो वै पुष्करपर्णम् ' ( शत ० ४ ४ २ २ ) इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार पुष्करपत्र है । काल्वालीकृत १०७१

पृष्ठ 807

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तृतीययध्याय द्वितीया शतपथब्राह्मण ( चनभावयुक्त ) अपूतस्य ही पुष्करणा है यही उत्तरोत्तर तेजःस्नेह के क्रमिक यज्ञन से आप: फेनादि आट व्याहृतियों में परिशित होता हुआ कालान्तर में भूपिण्डरूप में परिणित हो जाता है । कमलपुष्प भी उसी अपतत्त्व से सम्बन्ध रखता है । इसी सादृश्य के आधार पर कमल में भूपिण्ड का आरोप करते हुए इसे भूपि -बद का निदान मान लिया गया है " खा प्रजापति पचासन पर विरामान रहते हुए पद्मभूः नाम से प्रसिद्ध हैं ' इस व्यवहार का भी इसी भूनिदान से सम्बन्ध है । इस निदानविद्या को लक्ष्य में रखते हुए ही हमें जुहू उपभृत के श्राज्य का विचार करना है । जुहू को दाहिना हाथ, तथा उपभृत् को वाम हाथ बतलाया है । शकुनशास्त्र के अनुसार पुरुष का दक्षिणभाग शुभ है, वामभाग अशुभ है । दक्षिणाङ्गस्फुरण शुभसूचना का प्रवर्त्तक है, एवं वामाङ्गरकुरण अशुभसूचना का सूचक हैं । कारण यही है कि, पुरुष अग्निवीय्यप्रधान है । पुरुष के दक्षिणाङ्ग में इमी अग्निवीर्य का प्राधान्य रहता है, एव वामाङ्ग मे निर्वीर्यं सोम का प्राधान्य रहता है, जोकि सोम स्त्रीवीर्ध्य माना गया है । वामभाग स्त्रीवी-प्रधान है, इसका स्फुरण पुरुषतत्त्व का विरोधी है, अतएव इसे अशुभ माना गया है । विधि का वाम ( टेढा - प्रतिकूल ) होजाना वामभाग से ही समतुलित है । इसी सादृश्य के आधार पर हम कह सकते हैं कि दक्षिणहस्त- स्थानीय जुहू पुरुषवी का प्रतिनिधि बनता हुआ यजमानस्थानीय है । एवं वामहस्तस्थानीय उपभृत् स्त्रीवीर्य का प्रतिनिधि बनता हुआ अभुभसूचक बनता हुआ यजमानशत्रुस्थानीय है । इस वीर्य्यसूचना के अतिरिक्त प्रदान निरोधमा से भी यह आरोप समन्वित होरहा है । दक्षिणहस्त कम्र्म के द्वारा जहाँ सम्पत्ति के आगमन का कारण बना हुआ है, वहीं वामहस्त कर्म्म का प्रतिनिधि बनता हुआ निरोध का बन्धु पन रहा है । शत्रु का जो काम ( सम्पति - निरोध ) है, वही स्थान वामहस्त का है । इसलिए भी दक्षिणहस्त स्थानीय जुहू को यजमान, तथा वामहस्त स्थानीय उपभृत को यजनानशत्रु कहा जासकता है । दक्षिणहस्त अग्निपीप्रधान एवं वामहस्त समदीयप्रधान बतलाया गया है । अग्निनाद ( मोक्का ) हैं, सोम ( भोग्य ) है । इस दृष्टि से दक्षिणहस्थनीय अग्निप्रधान जुह को ' अन्नाद ' माना जासकता है, एवं वामहस्त स्थानीय सोमप्रधान उपभृत् की ' आय ' कहा जासकता है । इसप्रकार निदानविधि से जुहू, उपभृत को क्रमशः यजमान - यजमानशत्रु तथा अन्नाद् आद्य मानते हुए चतुर्वार अष्टचार, एवं भूयांस-कनीयांसं का समन्वय कीजिए । समृद्धि का लक्षण यही है कि, भोका संख्या में हम ही, एवं भोग्य सामग्री संख्या में अधिक हो । इसी समृद्धिभाव की प्राप्ति के लिए भोभा - स्थानीय जुहू में चार बार ही आज्यग्रहण किया जाता है, एवं भोग्य-स्थानीय उपभृत् में आट बार श्राज्य ग्रहण किया जाता है । यदि भोका की अपेक्षा मोन्यप्रजावर्ग अधिक बलवीर्य्यं युक्त है, तो वह संख्यानुगता समृद्धि निरर्थक है । वास्तविक समृद्धि तो उसे ही कहा जायगा, जिसमें भोक्ता संख्या में तो कम हों, परन्तु बल - वीर्य्य में भोग्य की अपेक्षा भूयाना में इसी - स्मृद्धि के लिए भोका - स्थानीय वुह में जहाँ चार बार करते मात्रावृद्धि की जाती है, वहाँ भोग्य को निर्बल निर्वाय्य बनाने के लिए भोग्य - स्थानीय उपभृत् में हुए आट बार ग्रहण करते हुए भी मात्राहास किया जाता है ।

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तृतीया द्विती प्रथमकाण्ड शारीरिक बल बल है, आत्मबल बीर्य्य है । भूतबल बल बल है, प्राणबल वीर्य है । भोग्य-प्रजा पर सुशासन सुरक्षित रखने के लिए दोनों शक्तियाँ शपेक्षित हैं । हम देखते हैं कि एक राज्य में राजा एक होता है, प्रजा असंख्य होती है परन्तु राजा अपने कोशचल से तथा बहुवी से एक पर का स्वामी रहता हुआ भी अनेकों घरों पर अपना प्रभुत्त्व प्रतिष्टित रखता है । अपनी इच्छानुसार यथासमय इन से अपने उद्देश्य - साधन प्रस्तुत किया करता है । इसी बलवीर्य - प्राप्ति के लिए यहाँ भी कनीयांसं, मर्यादा रक्सी गई है । जुहू में गृहीत आग्य की तो जुड़ से आहुति होती ही है, परन्तु उपभृत् में ग्रहीत आज्य की भी जुहू से हुति होती है । इसका कारण है - ' अन्न अन्नाद की स्वरूप रक्षा ' । उपभृत् प्रजा - स्थानीय है । प्रजा का चल ही राजा का बल है । यदि प्रजा को स्वसंपत्ति - व्यय में स्वतन्त्र कर दिया जायगा, तो प्रजा इस मर्यादा से अपना स्वरूप ही लौ बैठेगी, एवं प्रजासहयोग से वञ्चित राजा भी राज्यश्री से हाथ ही धो बैठेगा । राष्ट्र-समृद्धि के लिए दोनों की ही स्वरूपरक्षा अपेक्षित है । धर्म्मदण्ड जहाँ राजा को सुरक्षित, मर्य्यादित रखता है, वहाँ धर्मानुगत राजदण्ड प्रजा को मध्यदित बनाए रखता है । इस पारस्परिक सहयोग से दोनों का स्वरूप सुरक्षित रहता है । यदि प्रजावित्त पर अपना अधिकार स्थापित करना हीं राजा का एकमात्र लक्ष्य है, तब तो प्रजास्था-नीय उपभृत् में श्राज्यग्रहण की ही आवश्यकता न थी । परन्तु उस दशा में भी वही परिणाम होता, जो श्रम-यांदा में बतलाया गया है । प्रजा जबतक स्वतन्त्ररूप से सम्पत्ति संग्रह में प्रवृत्त नहीं होती, तबतक प्रजासमृद्धि असम्भव है । राष्ट्र का वित्तल, पशुबल आदि प्रजास्थातन्त्र्य पर ही निर्भर है । क्या एकाकी राजा ये कार्थ्यं कर सकता है?, असम्भव अनुचित नियन्त्रण प्रजासमृद्धि के नाश के ही कारण माने गए हैं । होना यह चाहिए कि, प्रजा को सम्पत्ति - संग्रह के सम्बन्ध में पूर्ण स्वतन्त्रता दी जाय, साथ ही व्ययसम्बन्ध में नियन्त्रण लगाया जाय क्षत्र और बिट् के इस पारस्परिक सह-योग से ही प्रकृतिसिद्धा वह वर्णाश्रमव्यवस्था सुरक्षित रह सकती है, जो राष्ट्रासमृद्धि का अन्यतम सूत्र माना गया है । एक स्थान पर प्रतिष्ठित वा ' ब्रह्मल ' है, जुहु ' छात्राल ' है, उपभृत् ' बिल ' है, एवं पशुसम्पत्ति ' शुद्रभाग ' है । प्रत्येक राष्ट्र को राष्ट्राभ्युदय के लिए ज्ञानस्थानीय ब्रह्मवल, क्रियास्थानीय क्षेत्रवल, अर्थ-स्थानीय विड्बल, एवं प्रत्रर्ग्यस्थानीय शूद्रबल, ये चारों बल अपेक्षित हैं । यह तभी सम्भव है, जब कि चारों में परस्पर सहयोग बना रहे । सहयोग तभी सम्भव है, जबकि चारों मर्यादासूत्र से सञ्चालित रहें । इभी समृद्धिरक्षा के लिए उपभृत् से यहीत आज्य की भी जुह से ही आहुति दी जाती है । इसप्रकार राष्ट्रकर्म्मसमृद्धिप कि स्त्रसमृद्धि के लिए यह श्राज्यग्रहणाकर्म क्रमशः गायत्री, त्रिष्टुप, जगती, अनुष्टुप छन्दों से सम्बन्ध रखता है । ' सुपर्शकाद्रवेयाख्यान विज्ञान ' के अनुसार मूलत: सभी छन्द चतुरक्षर ही माने गए हैं । सोमापहरण करने के लिए सर्वप्रथम चतुरक्षर जगतीछन्द का तृतीय य लोक में गमन होता है वहाँ तीन चरण खोकर एक चरण से जगती मतल पर लौट आती है । अनन्तर चतुरक्षरा त्रिष्टुप् सोमापहरण के लिए उत् - लबन करती है । यह अपना एक चरण खोकर तीन १०७३

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तृतीयध्याय द्वितीब्राह्मण शतपथब्राह्मण चरणो से वापस लौट श्राती है । सर्वान्त में सामिधेनीवल से युक्त चतुरक्षरा गायत्री सुबर्ण रूप धारण कर के झपाटा मारती है । फलतः समापहरण के साथ साथ तत्रम्य जगती के तीनों चरण, एवं त्रिष्टुप् का एक चरण लेती हुई गायत्री अपने आपके चारों वरो से सुरक्षित लोट आती है । आरम्भ में चतुरतरा रहने बली यह गायत्री जगती तथा त्रिप.. के चरली से अक्षरा बन जाती है । यक्षरात्रिष्टुप इस अक्षरा गायत्री में आत्मसमर्पण कर एकादशाक्षरा बन जाता है, एवं एकाक्षरा जगती त्रिप युक्का गायत्री में आत्मसमर्पण कर द्वादशाक्षरा बन जाती है । इसप्रकार यद्यपि आज गायत्र्यादि छन्द ८.११-१२ इत्यादि से युक्त प्रतीत होरहे हैं, परन्तु इनका मौलिक स्वरूप चतुरदार ही माना गया है, जैसाकि - ' सर्वारिण ह वा छन्दांसि चतुरक्षाण ' इत्यादि निगम से प्रमाणित है । जुद्ध - स्थत चतुरग्रहीत बज्य चतुग्दर गायत्री छन्द से सम्बन्ध रखता है, उपभृत् स्थित अवार गृहीत ग्राज्य क्रमशः चतुरक्षर त्रिष्टुप्छन्द, एवं चतुरक्षर जगतीछन्द से सम्बन्ध रखता है । एवं ध्रुवास्थित चतुरद्दीत आाव्य अनुपून्द से सम्बन्ध रखता है । भूपिएड, त्रिवित्री पदश अन्तरिक्ष, एक-विशय लोक, चारों के क्रमशः प्रजापति, अग्नि, मरुत्वानिन्द्रगर्भित वायु, आदित्य, ये चार प्रतिष्टावा देवता है एवं चारों के क्रमश: अनुष, गायत्री, त्रिधुप जगती, ये चार छन्द है । चारों का मूल वही भीम बांटम अनुष्टुप है अनुष्टुप् भूपिका हुन्द्र है, भूपिएड शुकलक्षण वाङमय है । इसी वाग्वितान से कारनामा उम साहसी का जन्म होता है, जिसके आधार पर महिमात्मक सम्पूर्ण यज्ञ प्रतिष्टित है । अतएव तत्स्थानीय ध्रुवा वा से ही सम्पूर्ण यश सम्पन्न होता है । ( ११,१२,१३,१४, १५,१६, ) । यहणपद्धति के सम्बन्ध में विशेष वक्तव्य नहीं है । शिव वित्यपृष्ठ ( भूपिण्ड ) में आय ( प्राणशक्ति ) परिपूर्णमात्रा से प्रतिष्ठित रहता है, उस नित्यपृष्ठ में प्राणदेवता उसीप्रकार अभय बन कर अपने आध्यात्मिक यज्ञ की इतिकर्तव्यता निरापद सम्पन्न करते हैं, जैसे कि वज्र की रक्षा से रक्षित मनुष्य अपने कर्म में निरापद बना रहता है । अतएव श्राज्य को बज्र कहा जासकता है । यही वास्तव में देवयजन-भूमि है । बाह्य सामपी - सम्भार उस समय पर्यन्त निरर्थक है, जबतक कि श्राज्य ( प्राणशक्तिलक्षण कम्मसाधक वज्र ) का ब्रहुगा नहीं कर लिया जाता । अध्यात्म का श्राज्य एवं विभूतयज्ञ का आज्यद्रव्य दोनों हीं यज्ञ-स्वरूप की सिद्धि के मुख्य द्वार बने हुए हैं । ' त्रिः सत्या देवाः ' के अनुसार यह यज्ञ त्रि - मर्यादा से युक्त है । कितने एक याज्ञिकों का कहना था कि इस यशसम्पत्ति - मजह के लिए ' जुहू उअभूत् भुवा ' तीनों में तीन तीन बार मन्त्रप्रयोग होना चाहिए । पस्तु परमवैज्ञानिक भगवान याज्ञनक ऐसा करना इसलिए अनुचित समझते हैं कि तीनों का एक ही यज्ञमिद्धि से सम्बन्ध रखते हैं । यदि तीन स्थान पर त्रिवृत् सम्पत्ति का संग्रह किया जायगा, तो यज्ञकृत्स्नता नष्ट होगी । इसलिए ( वशकृत्स्नता सुरक्षित रखने के लिए एक - एक बार ही मन्त्रप्रयोग होना चाहिए । ऐसा करने से यज्ञ करूपता भी मुदत रहेगी, एवं तीनों स्थानों की संख्या के समन्वय से सम्पत्ति भी प्राप्त हो जायगी ( १७,१८, ) । १०७४

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तृतीयश्रध्याय द्वितीयब्राह्मण प्रथमकाण्डानुगत- तृतीय- अध्याय का द्वितीय ब्राह्मण एवं द्वितीय प्रपाठक का पञ्चम ब्राह्मण ' आज्यब्राह्मण ’ नामक उपरत १०७५ प्रथम काण्ड