Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 851–860
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 851–860
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तृतीय अध्याय तृतीय- चतुर्थब्राह्मण शतथपत्राह्मण के भाग में प्रतिष्टत रहते हैं । इसी केश लोमसम्पत्ति के संग्रह के लिए यहाँ प्रतिरूप - मद से ि छाई जाती है, यही ' बर्डस्तरण ' की एक उपपत्ति है ॥ ७ ॥
को योषा [ स्त्री ] स्थानीय बतलाया गया है । शिष्टाचार का यह श्राग्रह है कि, कुलीन स्त्री यदि किसी आवश्यक धर्म्मका से भद्रपुरुष मण्डली में बैठे, तो अपने सर्वाङ्गशरीर को ढाँक कर बड़े विनय, तथा लज्जा - भाव से ही युक्त रहे । यहाँ वेद्रिरूपा स्त्री प्राकृतिक प्राणदेवताओं, तथा वज्ञसञ्चालक ऋत्विजो की मण्डली में प्रतिष्ठित है | अतः आवश्यक है कि, इसे नग्न [ निर्लज्ज ] न रहने दिया जाय । इसलिए भी वेदि
पर बर्हि चिल्लाना आवश्यक है । बर्हिस्तरण की बड़ी दूसरी उपपत्ति है ॥ ॥ 1
वेटिं जैसे निदानेन योषा ( स्त्री ) है, वैसे निदानेन यह पृथिवी भी योषा ही है । पृथ्वी के उर्वर, ऊसर, भेद से दो विभाग रहते हैं | ' नि ' त ' नामक दद्धिदेवता ( अलक्ष्मी, धूमावती, रोहिणी, ज्येष्ठा, ) के निग्रह से सस्यादि - प्रजनन के अयोग्य, क्षत - विक्षत भूप्रदेश ऊमर है । एवं ' रोहिणी ' नामक भाग्यदेवता ( लक्ष्मी, कमला ) के अनुग्रह मे मस्यादि - बहुल मम भूप्रदेश उबर है बहुल- श्रधियुक्त भूप्रदेश ही भोग्यतम माना गया है | जो पृथिवी का प्रदेश यहाँ बेटिरूप मे गृहीत है, वह इस यज्ञकर्त्ता यजमान के लिए बहुल ओषधि - वनस्पतिया मे युक्त बनता हुआ जीवनीयतम बने, इसी लक्ष्य से इस पर औषधि - बनस्पति के प्रतिरूप बर्हि बिछाए जातें हैं । यज्ञकर्म में बजमान के निमित्त निदानविधि से ऋत्विक् लोग जिस सम्पत्ति का संग्रह करते हैं, अवश्यमेव यावद्विन तावदात्मा ' इस औत सिद्धान्त के अनुसार वह यजमान की प्रातिस्विक
तम्पत्ति बन जाती है । वही बर्हिस्तरा की तीसरी उपपत्ति है ॥ ६ ॥
पृथिवी के जिस भाग में जितनी अधिक ओषधियाँ प्रतिष्ठित रहती हैं, वह भाग उतना हीं अधिक उपजाऊ कहलाता है । वही उपजीवनीयतम ( भोग्यतम ) प्रदेश माना गया है । इस सम्पत्ति के लिए उस मात्रा से बिछाई जाती है, जिससे वेदि का प्रदेश अप्रत्यक्ष होजाय । श्रधिमूल भूगर्भ में ही प्रविष्ट रहते हैं । इसी प्राकृतिक स्थिति के ममतुलन के लिए बर्हि के अग्रभागों से द्वितीय तृतीय दर्भमुष्टि के मूलभागों को दबा दिया जाता है त्रिसत्य देवताओं के त्रिवृयज्ञ की स्वरूप - निष्पत्ति के लिए ही स्तरणकर्म विहित है । उमी त्रित्त्वानुगता यज्ञसम्पत्ति के लिए तीन बार स्तरमा होता है ॥ १० ॥
' ऊ त्वा स्तृणामि स्वासस्थां देवेभ्यः ' यह स्तरा - कर्मसाधक मन्त्र है | मन्त्र का भाव यही है कि, यद्यपि दर्भा का प्रस्तरा होता है, तथापि भावना ऐसी रखनी चाहिए कि, मानो हम वेदि पर बैटने वाले प्राणदेवताओं के लिए कोमलम्पर्श मे युक्त ग्रामन ही चला रहे हैं । ' अन्य को अन्य भावना से देखना ' यही तो निदान है । एवं भावनात्मक निदान ही तो हमारे कम्मों को श्रेष्ठता का मूलाधार है || ११ || इति- बर्हिस्तरणोपपत्तिः अथग्रग्निकल्पोपपत्तिः-कहा गया है कि, सम्वत्सरात्मक राजपुरुष का एक विशम्तोमात्मक य प्रदेश शिरोभाग है । यहाँ आहवनीयकुण्ड निदानेन इम वैधयज्ञ का शिरोभाग है । शिरोभागस्य मुम्बभाग में आहुति - ग्राहक अन्नादग्नि १११८
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तृतीयमध्याय तृतीय- चतुर्थ - ब्राह्मण प्रथमकाण्ड प्रतिष्ठित रहता है । तत्स्थान में यहाँ ग्राहवनीयकुण्ड में प्रतिष्ठित आहवनीयाग्नि है । यदि अग्नि प्रचल रहता है, तो याहुत अन्न की आकर्षण, दहन, पचनादि क्रिया ठीक ठीक होती है । अग्निमान्य में ये क्रियाएँ निर्बल रहतीं हैं । परिणामतः पुष्टि, तुष्टि, तृप्त, बल, वीर्य्यादि का प्रभाव रहता है । ऐसी अवस्था में यह आवश्यक है कि, शिरोभागांपलक्षित, मुखस्थित, ग्राहुतिग्राहक, आहवनीयाग्नि को आहुतिद्रव्य के आकर्षणादि के लिए इध्मका से भस्मादि हट कर प्रबल बना दिया जाय । यज्ञपुरुष का पूर्णस्त्ररूप शिखा पर्य्यन्त माना गया है । इधर कुशमुष्टिलक्षण प्रस्तर इस वैधयज्ञपुरुष की शिखा है । अतः प्रस्तररूप शिखा का श्राहवनीय के ऊपर सम्बन्ध बनाते हुए पूर्णरूपेा यह प्रत्रलीकरण किया जाता है ॥ १२ ॥
इति - अग्निकल्पोपपत्तिः यथ- परिधिपरिधानोपपत्तिः-जिन तीन परिधियों का आहवनीयकुण्ड के पश्चिम - दक्षिण - उत्तरप्रान्त भागों में क्रमश: स्थापन होता है, उन का विशद वैज्ञानिक विवेचन पूर्व के ' आप्त्या विज्ञान ' में ( शतपथभाष्य- प्रथमखण्ड में ) किया जाचुका है । विरहस्यवेत्ता विद्वानाने अनेकधा विभक्त अग्नि के चार रूपों का प्रत्यक्ष किया । एवं इसी आधार पर ' चतुर्द्धा विहितो हवा अग्रे अग्निरास ' यह अनुगम - वचन प्रतिष्टित हुआ । उन सत्र अग्निचित्त का उक्त ' आपल्यात्राह्मण ' में दिग्दर्शन कराया जाचुका है । प्रकृत प्रकरण के समन्वय के लिए यह आश्यक होगा कि, पाठक एक बार वह करण अपने लक्ष्य में ले आयें । यहाँ प्रकरण-सङ्गति के लिए दो शब्दों में उम्र का सिंहावलोकनमात्र कर दिया जाता है । ' पुरुषाग्नि, प्राकृताग्नि, बिराडग्नि, सम्वत्सराग्नि ' इन चार अग्नियों में से चौथा सम्वत्सराग्नि ही इस कथानक का मूलाधार है । इस सम्बत्सराग्नि को ही ' भूतानांपतिः ' कहा गया है । इस ' भूतानां-पतिः ' सम्वत्सराग्नि की ही आगे जाकर चार अवस्थाएँ होजातीं हैं, जिन के लिए - ' चतुर्द्धा विहितो ह वा अग्रेऽग्निरास ' यह कहा गया है । सम्बत्सरचक्र खौर, पार्थिव, भेद से दो भागों में विभक्त है । पार्थिव सम्वत्सरचक्र गायत्राग्निप्रधान है, एवं सौर सम्वत्सरचक्र सावित्राग्निप्रधान है । प्रकृत में केवल पार्थिवाग्निसम्बन्धी पार्थिवसम्वत्सरचक्र के साथ अग्नि की अवस्थाचतुष्टयी का सम्बन्ध समझना चाहिए । भूपिण्ड के गर्भ में प्रतिष्ठित प्राणाग्मि ' अन्नादाग्नि ' नाम से प्रसिद्ध है । इसी अन्नाग्नि को ' रुद्र ' कहा जाता है । इमी रुद्राग्नि की वितान से आगे जाकर चार अवस्थाएँ होजाती हैं । इन चार पार्थिव सम्वत्सराग्नियों में एक तो पार्थिव यज्ञ के ' होता ' बनते हैं, शेर तीन अग्नि ' आपल्या ' रूप में परिणत होकर * " अस्यां प्रतिष्ठायां भूतानि च भूतानां पतिः सम्वत्सराबादीचन्त । भृतानां पतिगृहपतिरासीद्, उपाः पत्नी । तद्यानि तानि भृतानि ऋतवन्ते । अथ वः स भृतानां पतिः, सम्बत्सरः सः " ( शत ० ६ १ ० १ ३ ब्रा ० ६,७ कं ० ) । १११६.
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तृतीय अध्याय तृतीय- चतुर्थ ब्राह्मण शतपथब्राह्मण इस अग्नि की परिधियां बने रहते हैं । पार्थिव प्रजापति अग्नि की गृहपति, सम्बत्सर, भेद से दो अवस्थाएँ होजाती हैं | गृहपति अग्नि भूपिण्ड में अनादरूप से प्रतिष्ठित रहता है, एवं सम्बत्सराग्नि पार्थिव सम्वत्सर में प्रतिष्ठित रहता है । भृपिण्डस्थ पार्थिव अग्नि की उक्थ अर्क भेद से दो अवस्थाएँ रहतीं हैं । भूकेन्द्र में प्रतिष्ठित ' अनिरुक्तत्रजापति ' नाम से प्रसिद्ध हृद्य अग्नि सर्वप्रभव बनता हुआ ' उक्थ ' नाम से प्रसिद्ध है । यही इस यज्ञ का प्रजापति ( यजमान ) है । पार्थिव उषा इस की पत्नी है । इन्हीं दोनों के दाम्पत्यभाव से पार्थिव प्रजा की उत्पत्ति हुई है । उक्थ से क - ( रश्मियां ) निकला करते हैं । भूकेन्द्रस्थ उक्थाग्नि की प्राणात्मिकारश्मियाँ उक्थ से निकल कर बड़ी दूर पर्यन्त व्याप्त रहतीं हैं । जहाँतक यह कत्मक प्राणाग्नि व्याप्त रहता है, वहाँतक पार्थिवमण्डल की सीमा मानी जाती है, जोकि सीमा सामपरिभाषा में ' रथन्तरसाम ' नाम से प्रसिद्ध है । केन्द्रम्थ उक्थ नामक हृद्य, गृहपति, प्रजापति अग्नि से रूप में परिणत होने वाले इस प्राणाग्नि की आगे जाकर पार्थिव अग्नि, सम्वत्सराग्नि भेद से दो अवस्थाएँ हो जाती हैं । भूपिण्डावच्छिन्न वहीं प्राणाग्नि ( अकग्न ) पवित्र अग्नि है, एवं इसे ही ' भूपनि ' कहा जाता है । भूमहिमावन्न्नि वही कांग्न सम्बत्सराग्नि है, एवं उसे ही पूर्व कथनानुसार ' भूतानांपतिः ' कहा जाता है । भूमहिमा का वषट्-कारमण्डल से सम्बन्ध है, एवं अग्नि के सम्बन्ध से इस वषट्कार के ३३ अहर्गणों में से २१ अहर्गण संग्रहीत हैं | भूपिण्ड से आरम्भकर २१ वें अहरापर्यन्त जो भूमहिमा - प्रदेश है, वही सम्वत्सरचक्र है । इस पार्थिव सम्वत्मरचक्र में हीं वह पार्थित्र प्राणाग्निविध सम्वत्सराग्नि प्रतिष्ठित है । ' भूतानां पतिः ' नामक सम्पूर्ण सम्वत्सरचक्र में एकरूप से प्रतिष्ठित, अतएव ' सम्बत्सर प्रजापति ' नाम से प्रसिद्ध इस महिमाग्नि के आगे जाकर क्रमशः पार्थिव — त्रिवृत ( ६ ), पञ्चदश ( १५ ), एकत्रिंश ( २१ ) स्तोम भेद से तीन भेद होजाते हैं । एकविंशस्तोमावन्छिन्न द्य प्रदेश में प्रतिष्टित वही भूतानांपतिः ' भूतानां पतिः ' नाम मे प्रसिद्ध हैं । यही देवविज्ञानानुसार ' आदित्य ' कहलाया है । पञ्चदश - स्तोमावच्छिन्न अन्तरिक्ष प्रदेश में प्रतिष्ठित वही भूतानांपतिः ' भुवनपति: ' नाम से प्रसिद्ध है । यही देवपरिभाषा में -' वायु ' कहलाया है । एवं त्रिवृत्स्तोनावच्छिन्न पृथिवी - प्रदेश में प्रतिष्ठित वही भूतानांपतिः ' भुवपतिः ' नाम से प्रसिद्ध है । यही देवपरिभाषा में ' अग्नि ' कहलाया है । इसप्रकार म्तोमभेट से पार्थिव सम्वत्सरचक्र में तीन स्थानों में विभक होता हुआ एक ही सम्वत्सराग्नि तीन रूप धारण कर लेता है । निष्कर्ष यही निकला कि. भूपिण्ड केन्द्रम्थ गृहपति अग्नि के उक्थरूप के आधार पर ' भूषिएड, त्रिवृत् पञ्चदृश एकविंशस्तोम ', इन चार प्रदेशों में विभक्त अग्नि के ' भूप भुत्रपति, भुवनपति भूतानांपतिः ' ये चार रूप होजाते हैं । इह्रीं चारों को लक्ष्य में स्वकर ' चतुर्द्धा विहितो ह वा अग्रेऽग्निरास ' यह कहा गया है । भौमाग्निः -- [ १ भूषतिः – भूपिण्डावच्छिन्नः - अर्कविधः – अग्निः, २ - भुवपतिः - पृथिव्यवच्छिन्नः - - अग्निः सम्वत्सराग्निः - २ ३ भुवनपति: अन्तरिक्षावच्छिन्नः 27 वायुः ४ - भूतानांप्रति: - द्युलोकावच्छिनः -,, - श्रादित्यः ११२० भ्राता ज्येष्ठ अग्निभ्रातरः : - उक्था प्रजापतिद्य -ग्रहपतिः पिता
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तृतीयश्रध्याय तृतीय- चतुर्थ ब्राह्मण प्रथमकाण्ड प्रश्न यह है कि, अविध उक्त चारों अग्नियों में से पार्थिव गृहपति यजमान के पार्थिव हर्वियज्ञ— में होता कौन सा अग्नि बनता है? | प्रात्याविज्ञान में एकमात्र इसी प्रश्न का समाधान हुआ है । पार्थिव स्तोम्यत्रैलोक्य में व्याप्त त्रिविधा सम्वत्सराग्नित्रयी इसकम्म में असमर्थ है । क्योंकि, इसका भूपिण्ड से अन्तर्थ्याम-सम्बन्ध सुरक्षित नहीं रहने पाता । कारण इस का यही है कि - ' समुद्रमभितः पिन्वमानम् ' इस मन्त्रवर्णन के अनुसार भूपिण्ड चारों ओर से श्रर्णवसमुद्र से वेष्टित है । इस प्तत्त्व के सम्बन्ध से तत्रस्थ सम्वत्सरा-नित्रयी का भीमयज्ञवहन में अन्तर्याम - सम्वन्ध नहीं होने पाता । आरम्भ में एकरूप से प्रतिष्ठित तीनों साम्वत्सरिक प्राणाग्नि इस समुद्र के गर्भ में चले जाते हैं । अतएव इन का भूपिण्ड से अन्तर्य्याम-सम्बन्ध नहीं रहता । सम्बन्ध रहता है - उस भौम प्राणाग्नि का ही, जिसे ' गायत्र - अग्नि ' भी कहा जाता है । यही अपने ' एति च प्रति चान्त्राह ' बल से तृतीय ध्रु से सोमापहरण में भी समर्थ होता है, एवं पार्थिव देवताओं के यज्ञ के ' हौंत्र - कर्म्म ' का भी सञ्चालन करता है । साम्वत्सरिक — अग्नित्रयी ने क्यों नहीं इस कर्म को अपनाया?, इस का उत्तर है – वषटकार । भूपिण्ड की अपनी एक वाङमयी सीमा है । वही वाक्सीमा ' वषट्कार ' नाम से प्रसिद्ध है । इस भौम-कारसीमा में वही अग्नि अन्तर्याम - सम्बन्ध से प्रतिष्ठित रह सकता है, जो भूमि की प्रातिश्विक वस्तु बना रहता है । सम्वत्सराग्नि की इस वषट्कार- सीमा से सम्बन्ध अवश्य रहता है, परन्तु यह उस में प्रतिष्टित नहीं होसकता । इसी प्राकृतिक स्थिति का आख्यानरूप से निरूपण करते हुए श्रुति ने कहा है कि, तीन अग्नि पलायित होकर ( भाग कर ) पानी ( अर्णव समुद्र ) में जा छुपे, एवं एक अग्नि ( गायत्र ) ने ' हक्षेत्र - कर्म्म ' करना स्वीकार किया । कर्म में नियुक्त गायत्राग्नि इस सम्बत्सराग्नि के सहयोग से सर्वथा वञ्चित रहता है, तथा सम्वत्स— राग्नित्रयीयों को पार्थिवयज्ञ का कोई फल भी नहीं मिलता, यह बात नहीं है । जत्र गायत्राग्नि द्युलोकस्थ देवताओं के समीप हवि लेकर पहुँचते हैं, तो अर्णव समुद्र में व्याप्त ग्राम्य आमुरप्राण के आकमण से ही सम्वत्सराग्नित्रयी इम की रक्षा करती है । पश्चिम - दक्षिण - उत्तर - प्रान्तस्थ साम्वत्सरिक — अग्नित्रयी सीमारूप से इन तीनों ओर से गायत्राग्नि की रक्षा करती है, यही इस अग्नित्रयी का पार्थिवयज्ञ में उपभोग है । साथ ही जो हविर्द्रव्यांश प्रवर्ग्यरूप से सम्वत्सराग्नित्रयी के गर्भ में रह जाता है, वह इन के लिए हुतिद्रव्य बन जाता है । सीमारूप से होता अग्नि की स्वरूपरक्षा तथा प्रतिफल में उच्छिष्टद्रव्य का ग्रहण करना हीं इन का यज्ञसंस्था में उपयुक्त होना है । इस सम्बन्ध मे एक यह विशेषता ध्यान में रखनी चाहिए कि, इस पलायित श्राप्याग्नि की शुद्ध - मलिन भेद से दो अवस्था होजाती हैं, जैसाकि ' याच्या - विज्ञान ' में विस्तार से बतलाया जाचुका 1 सम्वत्सराग्नित्रयी का अवसमुद्र से सम्बन्ध बतलाया गया है । इस अवममुद्र के अध्यभाग में सम्वत्सरा— नित्रयी का जो प्रवर्ग्यभाग प्रविष्ट रहता है, वही मलिन आया है, एवं ब्रह्मदनात्मक सम्वत्सराग्नित्रयी ही शुद्ध आया हैं । ये ही अग्निरक्षक बनते हुए सीमा है । मलिन श्रायायुक्त अपनत्व ही भूपिण्ड का + " तन्द्रो हव्यं वहसि हविष्कृदादिद ेवेषु राजसि " । ( यजुः संहितायाम ) ११२१
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तृतीयध्याय तृतीय- चतुर्थ ब्राह्मण शतपवाहाण उत्पादक है । इस परम्परा से प्रवर्ग्यभूत त्याग्नित्रयी भूपिण्ड में प्रतिष्टित रहती है । जो हर्विद्रव्य भूपिण्ड पर वय - सम्बन्ध से रह जाता है, वह इस मलिन- प्रवर्ग्य - आान्याग्नि की तृप्ति का कारण जनता है । एव द्युलोक में होता - अग्नि के द्वारा ले जाया जाता हुआ जी हर्विद्रव्य प्रवर्ग्यरूप से सम्वत्मरमण्डल में रह जाता है, वह तत्रम्थ, सीमारूप, शुद्ध ग्रात्याग्नित्रयी की तृप्ति का कारण बनता है । यह वैध ह॒विर्यज्ञ उक्त प्राकृतिक - पार्थिव - हर्वियज्ञ का ही प्रतिरूप है । श्रत जैसे वहाँ सीमारूप से पलयित अग्नित्रयी का सम्बन्ध हो रहा है, तथैव यहाँ भी प्रतिरूपविधि से उनका संग्रह होता है । वहाँ की भाँति यहाँ भी प्रवर्ग्य द्रव्य का सम्बन्ध होना हीं चाहिए । वहाँ की भाँति भूगर्भस्थ मलिन प्राप्त्यानित्रयी की तृप्ति का यहाँ भी समावेश हो । हीं चाहिए । इसी उद्देश्य से " देवाननुविधा में मनुष्याः " - " यद्वै देव । अकुर्वस्तत करवाणि " इस आदेश के अनुगमन के लिए प्राकृतिक ग्रग्निसम्पत्ति के संग्रह के लिए पलायित श्राग्नत्रयी के प्रतिरूप में तीन परिधियों का परिवान किया जाता है । इनकी तृप्ति के लिए इन पर प्रत्रयंरूप से आज्यादि डाला जाता है । जो श्राहुतिद्रव्य भूपृष्ठ पर गिर जाता है, वह मलिन आप्याग्नि की तृप्ति का कारण बनता है । परिधिपरिधानकर्म की यही मंक्षिप्त उपपत्ति है ॥ १३, १४, १५, १६, १७, १८ ॥ ये परिधियाँ किस काष्ठ की बनाई जायें? इसका उत्तर ' बज्ञिय - वृक्ष ' हैं । माम्वत्सरिक आपल्या-ग्नित्रय सम्वत्सरयज्ञसीमा के गर्भ में प्रतिष्ठित है । अतः इन का प्रतिरूप काष्ट वहीं बन सकता है, जिन में यज्ञातिशय विकसित हो । पलाश, विकङ्कत, काध्मय्ये, बिल्व, खदिर, उदुम्बर, इन वृक्षों में यज्ञातिशय प्रकृत्या ही विकसित रहता है, अतएव ये यज्ञिय वृक्ष माने गए हैं । इन में से प्रधान पक्ष तो ' पलाश ' ग्रहण का ही है । क्योंकि पलाशवृक्ष में ब्रह्मवी सम्पादक अग्नितत्व प्रधानरूप से प्रतिष्टित रहता है । एवं अग्निमम्पत्तिसंग्रह के लिए ही इन परिथियों का ग्रहण होता है । पलाश के समय पर न मिलने से ही निकङ्कादि ग्रन्य काष्टों का ग्रहण करना चाहिए । पाटका की सुविधा के लिए इन यज्ञि वक्षों के नामान्तर चत्र उद्धत कर दिए जात हैं ॥ १६२० ॥
१- पलाश: -पलाश, किशुक. करक, सुबर्णी, वातपोत, ये सभी शब्द अंशतः समानार्थक माने गए हैं । गुणदृष्टि से इसी पलाश के ये नाम प्रसिद्ध हैं - याज्ञिक, ब्रह्मवृत्त, ब्रह्मपाप, ब्रह्मापनेता,, पतद्र, समिर, काष्ठद्र, पर्ण, त्रिपर्ण, त्रिपत्रक, वक्रपुष्प, रक्तपुष्प, बीजस्नेह, कृमिव्न, चारश्रं प्ठ, इत्यादि । निम्न-लिखित संग्रह श्लोक पलाश के इही गुणों का स्पष्टीकरण कर रहे हैं-कपायतिक्तकटुकः स्निग्धोष्णो दीपनः सरः ॥ भग्नमन्धानक्रुद् वृष्यः पलाशो गुणतो मतः ॥ १ ॥
त्रिदोपहत् क्रमिनोऽयं पलाश यज्ञपादपः ॥ ग्रहण्यश गुल्मगुदरेगप्लीहा व णे हितः ॥२ ॥
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उर्वीययध्याय संस्कृत राष्ट्रभाषा के धरा कांकरिया २- विकङ्कतः– तृतीय - चतुर्थ - ब्राह्मण प्रथमकाण्ड मातुका | परशन पराशु च ू विकङ्कत, वैकङ्कत, रावण, मधुपर्णी, गोपधोएटा, पिण्डार, किकरी, पूतकिकिणी, हिमक, इत्यादि शब्द समानार्थक हैं । गुणदृष्टि से यही इन नामों से प्रसिद्ध है – यज्ञिय, यज्ञवृक्ष, ब्रह्मपादप, गुदारु, बद्रम, खुवावृक्ष, सुधावृक्ष, पृथुवीज, बहुफल, मृदुफल, ग्रन्थिल, दन्तकाष्ठ, पाइरोहिण, व्यापान, घृतिकर, कटकी, कष्टकारी, कण्टपाढ़, कण्टपत्र, स्वादुकण्टक, इत्यादि । निम्नलिखित मंग्रह - श्लोक विकङ्कत के इह्री गुणों का दिग्दर्शन करा रहे हैं— रक्तः पीतैः सितैनीलैः पुष्पैरेव चतुर्विधः ॥ सर्वे समगुणा उक्ताः सितस्तु ज्ञानवर्द्धनः ॥ ३ ॥
विपाकमधुरं ग्राहिशीतलभूषणम् ॥ कपायतिक्तकटुकं वातलं चाप्यमिध्यते ॥ ४ ॥
एतत् पुष्पं करुं पित्तं कुष्टं दाहं तृषामपि ॥ वातरक्त ं रक्तदेोषं मूत्रकृच्छ्रं च नाशयेत् ॥ ५ ॥
फलं विपाककटुकं लघु रूक्षमिष्यते ॥ शूलकुष्ठप्रम हार्शः क्रमिगुन्मोदर हरेत् ॥६ ॥
पाम कतिद्रत्वग्दे । पघ्नं वृक्षवीजकम् ॥
फलवीज कटुस्निग्धोष्णं कृमिघ्नं कफापहम् ॥७ ॥
तन्मूलस्वरसो हन्ति नेत्रच्छायान्ध्यपुष्पकम् ॥
नूतन: पल्लवश्चास्य कृमिं वातं च नाशयेत् ॥ ८ ॥
ग्राही तस्य तु निर्यासो हरेत् स्वेदातिर्निगमम् ॥
मुखरोगांश्च कामांश्च ग्रहणी च विनाशयेत् ॥ ६ ॥ इत्यादि ॥
बंगला महाराष्ट्री गुजराती कर्णाटकी तैलङ्गी तामिली | उत्कल पलाशः पलाश पलास पलस खांखि मुत्तलु
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तृतीय अध्याय तृतीय- चतुर्थ - ब्राह्मण कषायोऽम्लश्च मधुरः पाकेऽतिमधुरो लघुः ॥ विकङ्कतोऽयं नात्युष्णशीतो दीपनपाचनः ॥ १ ॥
कफं पित्तं रक्तदोषान् नेत्रपुष्पं च कामलाम् ॥ शोषं शोकं व्रणं दाहं लूतामशञ्च हन्ति सः ॥ त्रिकङ्कतफलं पक्वं मधुरं सर्वदोषहृत् ॥ २ ॥
शतपथब्राह्मग् मं ० रा ० बँ म ० गु ० क ० तै ० उ ० 1 छोंकर श थोरशमी विजड़ो वत कावन्नि शमीचे शुमी शमी छिकुर छुई लघुशमी नानीखि जड़ी सफेद वाव्ला कीकर ३ काष्मय्यः-काम, कारी, गम्भारी, श्रीपर्णी, भद्रपर्णी, स्निग्धपर्णी, मधुपर्णी, कुमुदा, मोहिनी, गुठि, भद्रा, सुभद्रा, सर्वतोभद्रा, गोषभद्रा, मधुभद्रा, महाभद्रा, सदाभद्रा, रोहिणी, पीतरोहिणी, हीरा, इत्यादि शब्द समानार्थक हैं । इन में ' काध्मय ' शब्द का विशुद्ध ' छन्दोभ्यस्ता ' नामक वैदिकी भाषा से ही सम्बन्ध है । गुणदृष्टि से यही इन नामों से व्यवहृत हुआ है - क्षीरिणी, बिहारिणी, मधुरसा, मधुमन्ती, सुकला, पीतकला, कटुकला, कृष्णकला, कृष्णवृत्ता कृष्णन, अश्वेता, वाहा, स्थूलत्वचा, दृढत्वचा, इत्यादि । निम्न लिखित संग्रह - श्लोकों से काम के इह्रीं गुणों का समर्थन होरहा है— गम्भारी मधुरा रिक्ता कपाया कटुक्का गुरुः ॥ दीपनी पाचन मेध्यो वीर्या मेदनी तथा ॥ । १ ॥ हन्ति ज्वरं दाहं शोपं शोकं तृषां विषम् ॥ मलं प्रमेहार्शस्त्रिदोषं च भ्रमं क्रमिम् ॥ शीतलं मधुरं तितं गुरुस्निग्धं च तत्फलम् ॥ बृंहणं ग्राहि मेध्यं च वृष्यं रसायनम् ॥ ३ ॥
हन्ति मूत्र वातं पित्तं तृपां क्षयम् ॥ दाहं च रक्तदोषं च सतिक्तमधुरं फलम् ॥४ ॥
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तृतीय अध्याय रा ० मं ० गम्भारी | कुम्भरे गांभारी खम्भारी गांभार ४- बिल्वः--तृतीय - चतुर्थ - त्राह्मण III म ० शींवण शवन्य गभारो ११२५ प्रथमकाण्ड क ० साला गुत्रुटी सींचनी कलमम्लक पायं तु गुरुस्निग्धं विशुद्धिकृत् ॥ मूत्रदं बुद्धिदं हन्ति त्रात पिनं क्षयं तृषाम् ॥ ५ ॥
रक्तक्षतं रक्तपित्त रक्तदोषं च हन्ति तत् ॥ आमवातं मूत्रकृच्छ दाहं च प्रदरं हरेत् ॥ ६ ॥
कपायतिक्तमधुरा फलमज्जा ऽसृजोरुजम् ॥ ग्राहिणी वातला बल्या वृप्या पित्त कफं हरेत् ॥ ७ ॥
पायतिक्तमधुरं पुष्पं तस्यास्तु शीतलम् ॥ विपाकमधुरं ग्राहि वातलं रक्तदोपहृत् ॥ ८ ॥
गम्भारी मूलमत्युष्णं मानुषेषु हितं न तत् ॥ ६ ॥
बिल्व, श्रीफल, शलूप, मालूर, शाण्डिल्य, शल्य, सोमहरीतकि, गोहरीतकि, कपीतन, शलाटु, महाकपित्थ, नील मल्लिक, ककट, सुनीतक, इत्यादि शब्द समानार्थक हैं । गुणदृष्टि से यही इन नामों से व्यवहृत हुआ है— शित्रेष्ठ, शिवद्र ुम, मङ्गल्य, अतिमङ्गल, समीरसार, पूतिवात, पीतल, महाफल, लक्ष्मीफल, सदाफल, गन्धफत्त, सत्यफल, सत्यधर्म्म, हृद्यगन्ध, गन्धपत्र, शैलपत्र, त्रिशाखापत्र, त्रिशिख, त्रिदल, पत्रश्रेष्ठ, कण्टकाव्य, सितानन, अधरोरुह, इत्यादि । निम्न लिखित
श्लोक बिल्व के इह्रीं गुणों का समर्थन कर रहे हैं—
कफानिलहर ती स्निग्धं संग्राहि दीपनम् ॥
कटुतिक्तक पायोष्णं वालं बिल्वमुदाहृतम् ॥ १ ॥
तदेव विद्यात् संपक्त्रं मधुरानुरसं गुरु ॥
विदाहि विष्टम्भकर दोपकृत् पूतिमारुतम् ॥ २ ॥
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तृतीय च्याय मंज रा ० तृतीय- चतुर्य ब्राह्मण शतपथत्राह्मण म ० गु ० क ० तै ० ता ० वेल वेलवृक्ष विलोविलु वेललु माडीपन्दू विवा बिल्व झाम ५- खदिर: -खदिर, खद्यपत्री, प्रमुख, कर्कटी, गायत्री, इत्यादि शब्द समानार्थक हैं । गुगादृष्टि से यही इन नामों से प्रसिद्ध हैं - याज्ञिक, यज्ञाङ्ग, मेध्य, यूपद्र म, इन्तधावन, पथिद्र म, रक्तमार, तिक्तसार, बहुसार, क्षितिक्षम, बालपत्र, बालपुत्र, बालतनय, वक्रकण्टक. कटकी, बहुशल्य, सुशल्य, जिह्मशल्य, जिह्वाशल्य, कुष्ठारि, कुछहन, इत्यादि । निम्न लिखित श्लोक वरि - गुणों का ही यशोगान कर रहे हैं— शीतोष्णः खदिरो दन्त्यः कषायकटुतिक्तकः ॥ रिमेदो विखदिरे कदरः खदिरे मिते ॥ १ ॥
करो हन्ति कति कुष्ठ भूतग्रहं ज्वरम् ॥ मुखरोगं पाण्डुरोगं रक्तदोषं कृमि वृणम् ॥ २ ॥
श्वित्रं शोथं चामपित्तं प्रमेहं च विषं तथा ॥ मेदोरोगं वातकफं नाशयेत् खदिरः सितः ॥ ३ ॥
सारो यो रक्तदोषं मुखरोगं क हरेत् ॥ निर्यासो मधुरो बल्यः खादिर: शुक्रवद्धनः ॥ ४ ॥
मैं गु ० म ० गु ० चराइचेड वासु व्यदिग कन्या खएरगाछ खयर कोपिन खैर ताजनगड पपड़िया पांडराखयर बिलीयतत्रि ११२६
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तृतीयश्रध्याय ६ - उदुम्बरः-तृतीय- चतुर्थ - त्राह्मण प्रथमकाण्ड उदुम्बर उदुम्बर, प्रतिष्ठित, सुचक्षु, जन्तुफल, इत्यादि शब्द समानार्थक माने गए हैं । गुणदृष्टि से यही इन नामों से व्यवहृत हुआ है -- यज्ञिय, यज्ञयोग्य, यज्ञाङ्ग, यज्ञसार, यज्ञफल, पवित्रक, ब्रह्मवृक्ष, सौम्य, कालस्कन्ध, श्वेतवल्कल, शीतवल्कल, शीतफल, जनफल, सदाफल, जन्तुफल, अपुष्पफल, पुष्पशून्य, पुष्पहीन, पारिणमुख, क्षीरवृक्ष, हेमदुग्ध, हेमदुग्धी, कृमिकण्टक, इत्यादि । निम्न लिखित श्लोक उदुम्बर के गुण हीं व्यक्त कर रहे हैं--कषायमधुरः शीतो रूक्षो वर्ण उदुम्बरः ॥ व्रणापहोऽस्थिसंधानगर्भसन्धानकृद्गुरुः ॥१ ॥
कफपित्तमतीसार योनियोगं च हन्ति सः ॥ कपाशीतलं वकं गर्भ्यां दुग्धं व्रणापहम् ॥ २ ॥
श्रमं फलं कषायाम्लं मांसवृद्धिकरं जड़म् ॥ दोषलं रक्तरुकारि दीपनं रुचमिष्यते ॥ ३ ॥
अतिशीतं फलं पक्कं कपायमधुरं जड़म् ॥ कृमिकृत् कफकृद् रुच्यं हन्ति पितं प्रमेहकम् ॥ ४ ॥
रक्तरोगं क्षुधां मूर्च्छा दाहं शोपं श्रमं तृपाम् ॥ कोमलं तत्तृषां रक्तदोषं पित्त कफं हरेत् ॥ ५ ॥
किञ्चित् कोमलं स्वादु कषायं शीतलं फलम् ॥ हन्ति प्रहारजं क्लेशं वान्ति पित्तमसृकत्र तिम् ॥ ६ ॥
मं ० रा ० म ० गु ० क ० उदुम्बर: गुजर यज्ञडुमुर उम्बर उम्बरो अत्ति बाइचेह प्रथमकाण्डान्तर्गत- तृतीय अध्याय का तृतीय ब्राह्मण एवं - द्वितीय ब्राह्मण का पष्ठब्राह्मणं उपरत ** अत्र - इध्मब्राह्मण समाप्त द्वितीय प्रपाठक समाप्त २ - * ---