Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 861–870
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 861–870
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तृतीय अध्याय तृतीय- चतुर्थ ब्राह्मण शतपथब्राहाण प्रथमकाण्डान्तर्गत - तृतीय- अध्याय का चतुर्थ ब्राह्मण एवं तृतीय प्रपाठक का प्रथा ब्राह्मण उपक्रान्त परिधिब्राह्मण यत्र उपक्रान्त तृतीय - प्रपाठक – उपक्रान्तू ३ उक्त क्षज्ञिय वृक्षों में से समयप्राप्त किसी एक यज्ञिय वृक्ष की जो परिचियाँ लीं जातीं हैं, वे गोली होनी हैं । आर्द्रभाव ही इन का जीवनीय रस है, यही इनकी प्रातिश्विक सम्पत्ति है । इस सम्पत्ति - संग्रह की दृष्टि जहाँ आर्द्रभाव अभिप्रेत है, वहाँ प्राप्त्याग्नि के गर्भित स्वरूप की दृष्टि से भी आर्द्रभाव अपेक्षित हैं । तीनों परिधियाँ उस श्रात्याग्नित्रयी की ही प्रतिरूप हैं, जो आपोमय अर्णवसमुद्र में प्रविष्ट है । अतः तत्-सादृश्येन परिधियाँ श्राद्र ' हीं ली जाती हैं । जिसप्रकार आक्रमण - कर्त्ता के व्याक्रमण को वीर पुरुष अपने हाथों की परिधि से रोक देता है, एवमेव ये परिधियाँ श्राक्रमगरक्षक हीं बनीं हुई हैं । अतएव लम्बाई में ये बाहुपरिमाण हीं बनाई जाती हैं ॥ १ ॥
' गन्धस्त्वा ० ' इत्यादि मन्त्र से पश्चिम भाग में परिधि रक्खी जाती है । प्राकृतिक यज्ञ में तृतीय अ स्थानीय साम की ( पारमेष्ठ्य श्राय आमुराक्रमण से ) रत्ना विश्वावसुमुख, एतन्नामक गन्धर्वप्राण से ही होरही है | यहाँ भी परिधि के द्वारा वही रक्षाकर्म्म अभिप्रेत है । अतएव इस परिधिस्थापनलक्षण रक्षाकर्म में उसी प्राकृतिक रक्षक की भावना की जाती है । ' अन्तजगद् विज्ञान ' के अनुसार सम्पूर्ण विश्व, जिसमें कि यह जीवनयात्रा का सञ्चालन कर रहा है, अपना विश्व है । इस की शान्ति स्वास्ति में हीं यज्ञकर्त्ता यजमान की शान्ति स्वस्ति है | इस रक्षाकर्म से इसी के लिए इसी के भोग्य विश्व को सुरक्षित रहने की भावना व्यक्त करने के अभिप्राय से - ' विश्वस्यारिय ' इत्यादि कहा गया है ॥ २ ॥
दक्षिण दिशा की ओर से प्राकृतिक हवियंज्ञ पर जो आसुर आक्रमण होते रहते हैं, वे अग्निसबुक्क् इन्द्रप्राण से रोके जाते हैं * । एवं भौमदेवव्यवस्था के अनुसार दक्षिण दिशा की ओर से होने वाले मनुष्यविध इन्द्र के द्वारा रोके जाते थे । श्रतएव यहाँ भी दक्षिण परिधिस्थापन से इन्द्र के बाहु की भावना से उसी इन्द्ररक्षक की प्राप्ति की जाती है । ' इन्द्रस्य बाहुर सि ' इत्यादि मन्त्र का यही तात्पय्यार्थ है || ३ || उत्तरादिक की ओर से होने वाले आक्रमण तत्रस्थ मित्रावरुण देवताओं से रोके जाते हैं, जैसा कि -" उदीची दिक्, मित्रावरुण देवता " ( तै ० त्रा ० ३ | ११ | ५२ ) इत्यादि कृष्णा श्रुति माणित है । * " दक्षिणा दिक् इन्द्रो देवता " ( शे ० ब्रा ३।११।५।१ ) - " तो हीन्द्रस्तिष्ठन् दक्षिणतो नाष्ट्रा रक्षांस्यपाहन् " ( ० १ | ४ | ३ | ३। ) । ११२८
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तृतीय अध्याय तृतीय- चतुर्थ- ब्राह्मण प्रथमकाण्ड उह्रीं रक्षको की भावना के लिए- ' मित्रावरुणौ त्योत्तरतः ० ' इत्यादि मन्त्र बोलते हुए उत्तर की ओर तीसरी परिधि का स्थापन होता है ॥ ४ ॥
अथ - ममिधाभ्याधानोपपत्तिः श्रग्निकल्पार्थ पूर्व में गृहीत समिध आहवनीय में डालना हीं समिधाभ्याधानकर्म है । समिधा -भ्याधान छन्द, तथा ऋतुदेवता के समिन्धन से सम्बन्ध रखता है । अर्थात् यह समिन्धन छन्द, तथा ऋतुओं का ही किया जाता है । बात यह है कि, ग्राहवनीय अग्नि में आहुतिद्रव्य का इत्री अग्नि से लो-कस्थ देवताओं में गमन होने वाला है । अग्नि आहुति ले जाने वाले हैं । इधर अग्नि की प्रतिष्ठा इन्ट, एवं ऋतुएँ हैं । यदि छन्द - ऋतु समिद्ध हैं, तो हव्यवाट् ग्रग्नि भी समृद्ध है । एवं समिद्ध अग्नि हीं हव्यवहनकर्म्म में समर्थ है । ताहुतिकर्म से पहिले छन्द - ऋतु का भी समिन्धन आवश्यक होजाता है । समिन्धन होता है – अग्नि के उद्देश्य से, परन्तु लक्ष्य हैं - ऋतु और छन्द | अग्नितत्त्व सम्वत्सराग्नित्रयी, पार्थिव गायत्राग्नि, भेद से चार भागों में विभक्त बतलाया गया है । तीनों परिधि निदानेन सम्वत्सराग्नित्रयी के प्रतिरूप हैं, एवं आहवनीयाग्नि गायत्राग्नि का प्रतिरूप है । दोनों के समिन्धन के लिए पहिले समिध का परिधि से स्पर्श कराया जाता है, इस से तो परिधिलक्षणा अग्नित्रयी परोक्षरूप से समिद्ध होजाती है, अनन्तर समिव श्राहवनीय में डाली जाती है, इस से इस का प्रत्यक्षरूप से समिन्धन होजाता है || ५ || ' वीतिहोत्रं त्वा ' इत्यादि गायत्रीमन्त्र से ही प्रथम समिध डाली जाती है । इस प्रथम समिध से छन्दों का समिन्धन करता है । उधर छन्द गायत्री - प्रमुख हैं । गायत्रीछन्द ही सब छन्दों का मूल माना गया है । इस एक के समिन्धन से इतर सब छन्दों का समिन्वन होजाता है । अतः सर्वच्छन्द - समिन्धनोद्देश्य से गायत्री मन्त्र के द्वारा गायत्रीछन्द का समिन्धन किया जाता है । समद्धिगायत्री इतर ६ श्री छन्दों का समिन्धन कर देती है । एवं ये समिद्ध छन्द देवताओं के लिए हव्यवहन करने में समर्थ होजाते हैं । तात्पर्य्य इस समिन्धन का एकमात्र है - पार्थिव अग्नि में दिव्य तेजोयुक्त अग्नि का समावेश । जबतक पार्थिव अग्नि में दिव्य तेज का आधान नहीं हो जाता, तबतक यह अग्नि न तो हविर्वहनकर्म में हीं पूर्ण समर्थ बनता, एवं न ऐसे विशुद्ध पार्थिव श्रग्निग्रहीत हवि का दिव्यप्राणाग्निप्रधान प्राणदेवताओं के साथ ही सम्बन्ध होता, जैसा कि आगे के ' सामिधेनी - ब्राह्मणों ' में विस्तार से बतलाया जाने याला है । प्राकृतिक यज्ञ से सौर सावित्राग्नि के द्वारा पार्थिव अग्नि का समिन्धन गायत्रीछन्द से ही होती है । खगोलीय उत्तरम्थ कर्कवृत्त से आरम्भ कर दक्षिणम्थ मकरवृत्तान्त क्रमशः जगती, त्रिष्टुप, पक्ति, बृहती, अनुष्टुप उणिक, गायत्री, ये सात देवछन्द प्रतिष्टित हैं । जगती उत्तर भाग की अन्तिम सीमा पर है, एवं गायत्री दक्षिण भाग की अन्तिम सीमा पर है । उत्तरादिक सूर्य्यानुगता मानी गई है । अतएव तत्प्रतिरूप उतद्गाता की उदीची ही दिकू मानी जाती है, जैसाकि - ' उदीच्युद्गातुः ( शत ० १३ | ५ | ४ | २४ ) से स्पष्ट हैं | कर्कवृत्तात्मिका उत्तर - प्रदेशोपलचिता उत्तरदिशा में प्रतिष्ठित मोर तेज दक्षिणम्थ गायत्रीछन्द से सम्बन्ध करता हुआ सम्पूर्ण छन्दों को समिद्ध कर देता है । अपि च गायत्री अग्नि का छन्द है । इधर ' अग्निः सर्वा देवता: ' के अनुसार सम्पूर्ण देवता अग्नि की ही अवस्थाविशेष हैं । फलतः अग्नि के गायत्री छन्द का सर्वछन्दोमयत्त्व भलीभाँति सिद्ध होजाता है । गायत्री ११२६
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तृतीयअध्याय तृतीयचतुर्थ - ब्राह्मण शतपथब्राह्मण केसमिन्धन से तच्छन्दस्क पार्थिव अग्नि दिव्यभाव के समावेश से दिव्यदेवताओं के लिए हवि --र्वहन में समर्थ होजाता है । गायत्रीछन्द ही पार्थिवाग्नि को दिव्याग्नि के द्वारा समिद्ध करने वाला माध्यम है । अतएव यह छन्द: -समिन्धनकम्म आवश्यक होजता है । ' वीतिहोत्रं त्वा ० ' इत्यादि मन्त्रपूर्वक ही यह समिन्धनक होता है | गायत्री के द्वारा होने वाले इस - ' समिन्धनकर्म्म ' से ही अग्निदेवता हौत्रकर्म में सफल होते है । इस दिव्यतेज के समावेश से ' द्य तिमान ' बन जाते है, एवं पृथिवीम्थान ( भूस्थान ) से हविग्रहण करते हुए अग्निदेवलोक की ओर गमन करते हुए इस द्य महिमा में वितत - व्याप्त होकर ' बृहत ' बन जाते हैं । इसप्रकार मन्त्र ने -समिन्धन कम - जनित सभी अतिशयों का स्पष्टीकरण कर दिया है || ६ || दूसरी समिध से वसन्त का समिन्धन किया जाता है । हौत्रकर्म्म में दीक्षित पार्थिव अग्नि जिस हवि का ग्रु देवताओं के साथ सम्बन्ध कराने वाले हैं, वही हविद्रव्य दैवात्मा को उत्पन्न करने वाला है | परन्तु जबतक ऋतुप्राण का अग्नि में समावेश नहीं होजाता, तत्रतक प्रजनन सम्भव है । ' सम्बत्सराद् ऋतव रेतो भृतम् ' इस कौषीतकि वचन के अनुसार ऋतुएँ ह्रीं प्रजननकर्म्म की अधिष्ठात्री हैं । आध्यात्मिक यज्ञ में भी ऋतुमती - स्त्री ही गर्भाधान योग्या मानी गई है । फलतः हव्यवहन के लिए जहाँ छन्दःसमिन्धन आवश्यक है, वहाँ प्रजनन के लिए ऋतु: समिन्धन भी श्रावश्क वन जाता है । इस द्वितीय समिधाभ्याधान से वसन्त ऋतु का ही समिन्धन होता है । गायत्री छन्दोवत् वसन्तभृतु इतर ग्रीष्मादि पाँचों ऋतुओं का मूलाधार है । फलतः वमन्त के समिन्धन से इतर ऋतुयों का भी समिन्धन होजाता है । समिद्ध ऋतुओं से अग्नि में ऋतुधर्म का का समावेश होजाता है । एतद्धमविच्छिन्न अग्नि दैवात्मप्रजनन में समर्थ होजाता है । इसी समिन्धनोपपत्ति कोलक्ष्य में रखकर - " ऋतवः समिद्धाः प्रजाश्च प्रजनयन्ति ० " इत्यादि कहा गया है, एवं समिधान्या-धानकर्म की यही संदिप्त उपपत्ति है || ७ || अथ - मन्त्रजपोषपत्तिः परिधिस्थापन के द्वारा तीनों ओर से तो नाट्रा - राक्षों का ग्रक्रमण रोक दिया गया । अत्र पूर्व दिशा बच रहती है । पूर्व दिशा में भगवान् सूर्य का साम्राज्य है! सौरतेज से बढ़कर नाम्रा - राक्षसों का नाशक और कोई दूसरा नही है । श्राहवनीय के पूर्व भाग में इस रक्षक - दिव्य - प्राण के स्थापन की भावना से इस ओर मुख करके - " सूर्यग्वा पुरस्तान पातु कस्याश्चिदभिशस्त्वैः " इत्यादि मन्त्र का जप किया जाता है ॥ ८६ ॥
* -अथ विधृती स्थापनापपतिः ' विधृती ' शब्द ‘ विधृति ' का द्विवचनान्त रूप है, जिसका अर्थ है - दो ' विधृतियों की समष्टि ' । आधिदैविक – विश्व में, एवं तद्रूष ' विश्वयज्ञ ' में इन दो विधुतियों का क्या स्वरूप है? इस प्रश्न के समाधान पर ही इस वैधयज्ञ की कुशामयी दो विवृतियों की उपपत्ति समन्वित होसकती है । धारण करने वाली ' शक्ति ' ही ' विधृति ' है । अतएव जिस शक्ति ने इस विश्व को धारण कर रक्खा है, उसी बिशेष-शक्ति को हम - ' विवृति ' कहेंगे । ११३०
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तृतीय अध्याय तृतीय- चतुर्थ - ब्राह्मण प्रथमकाण्ड ' अग्नीषोमात्मकं जगत ' के अनुसार ' प्राणाग्नि ', एवं तत्र तदाधारेण प्रतिष्टित ' भूताग्नि ', तथा ' प्राणसोम ', और तदाधारेण प्रतिष्ठित ' भूत - सोम ', ये दो ही तत्त्व पाञ्चभौतिक विश्व के प्रमुख उपादान-कारण माने गए हैं । शुष्कगुणक अग्नि, तथा आर्द्रा गुणक सोम, इन दोनों का अन्तर्यामात्मक-यजन ही बिश्वयज्ञ का स्वरूप - निर्माता बना हुआ है । " वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येत्र--सत्यम् ” इत्यादि छान्दोग्य - सिद्धान्तानुसार उपादानकारण ही ( जिसे कि वैदिक - परिभाषा में – ' आरम्भण ' कहा गया है ) स्वकार्थ्य की आधारात्मिका धृतिलक्षणा ' त्रिधृति ' [ प्रतिष्ठा भूमि ] माना गया है । का का उपादानकारण ही कार्य के लिए प्रभव, प्रतिष्ठा तथा परायण है । प्रभव - प्रतिष्ठा - परायणात्मक उपादानकारणात्मक अग्नि- सोम - युग्म इसी दृष्टि से ' विधृति ' मान लिया गया है अग्नीसोमात्मक कार्य्यरूप विश्व का । अग्नि, और सोम के समन्वय - सम्बन्ध से प्रतिष्ठात्मिका यह ' विधुति ' क्योंकि द्विपर्वात्मिका है । अतएव एकवचनान्त ' विवृति ' शब्द द्विवचनान्त ' विवृती ' शब्द में परिणत होगया है । क्या तात्पर्य्यं? | इस तात्पर्य के स्पष्टीकरण के लिए हमें उस ' सम्वत्सरचक्र ' को ही लक्ष्य बना लेना पड़ेगा, जिसमें अग्नि, और सोम के ऋनात्मक, तथा सत्यात्मक, दो दो स्वरूप अभिव्याप्त हैं | वायव्य - धरातल में श्रासमन्तात् अभिव्याप्त वाकय श्रग्नि, तथा वायव्य -- सोम ही ' अहृदयमशरीरं ऋतम ' इस लक्षण के अनुसार ‘ ऋताग्निसोमयुग्म ' है, जिस ऋताग्नि ऋतसोम के वृषा -- पोषात्मक - टाम्पत्य से ही ' ऋतु ' भाव श्रभिव्यक्त हुआ है, एवं जिस ऋतुभाव के अभिलवानुगत परिप्लव स्तोमों से ही पञ्चत ', किंवा पड्तु ' - समष्टि रूप - ' सम्बत्सर ' की अभिव्यक्ति हुई है । अग्निप्रधान सूर्य एवं सोमप्रधान -- चन्द्रमा, हीं ' सहृदयं सशरीरं सत्यम ' इस लक्षण के अनुसार ' सत्याग्निसोमयुग्म ' है, जिस सत्याग्नि [ सूर्य्य ], एवं सत्यसाम [ चन्द्रमा ] । के वृषा - पोषात्मक - प्राण - रयि-- लक्षण दाम्पत्य से ही यथापूर्व सृष्टिधाराएँ प्रक्रान्त हैं IX तदित्थं वायव्य - ऋताग्निसोमद्वयी, एवं सूर्य - चन्द्रात्मिका सत्याग्निसोम - द्वबी, से ही ' सम्बत्सर. चक्र ' का स्वरूप सम्पन्न हुआ है, जिसके कालात्मक, तथा यज्ञात्मक, दो विबर्च माने गए हैं । अग्नि -साम - मय वही सम्वत्सर ' यज्ञात्मक सम्वत्सर ' है । एवं इन दोनों का भोगकालात्मक ' समयतत्त्व ' ही — ' कालात्मक - सम्वत्सर ' है । ' कालो यज्ञ ' समैरयत् [ अथर्वसं • कालसूक्त - १६ अध्याय ] के - - द्वयं वा इदं न तृतीयं - अस्ति शुष्कं चैत्र, आर्द्रश्च । यच्छुष्कं – तदाग्नेयम् । यदाद्र - तत् – सौम्यम् ।
* - कि स्विदासीदधिष्ठानं - आरम्भणं कर्तमित् स्वित् कथासीत् ।
यतो भूमिं जनवन् विश्वकर्मा विद्यामोणौन् महिमना विश्वचक्षाः ॥
x - सूर्याचन्द्रमसौधाता यथापूर्वमकल्पयत् ।
दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः ॥
११३१ - ऋक्सं ० ] १०/७१/२ - ऋक्सं ० १० १६० | ३ |
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तृतीयाध्याय तृतीय चतुर्थ - ब्राह्मण शथपथब्राह्मगा अनुमार कालात्मक सम्वत्सर ही यमोरूष यज्ञात्मक सम्वत्सर का छन्दोरूप - वयोनाघात्मक - ' आपन ' है । कालरूप इसी ' खंब्रह्म ' ( आकाशायतन ) में यज्ञरूप सम्वत्सर सुप्रतिष्ठित है । अग्निरूष सूर्य्य श्रहः काल शुक्लपच - परमासा - उत्तर ( यण, इन मिगात्मक ज्योर्तिभावों के साक्षी हैं, तो चन्द्रमा रात्रिकाल -कृष्णपक्ष - परमामा --दक्षिणायन, इन धूममार्गात्मक नमोभावों के साक्षी हैं । काल - यज्ञात्मक - सम्वत्सर--चक्ररूप ब्रह्माण्ड के सुप्रसिद्ध को अण्डकटाह ही वैदिक - परिभाषा में सूर्यानुगत - ऐन्द्र - मित्रकपाल, तथा चन्द्रमानुगत - वारुण बरुकपाल नाम से प्रसिद्ध हैं । श्रर्द्ध ज्योतिष्वक्रात्मक श्रद्ध खगोल ही सौर- ऐन्द्र - मित्रकपाल है, जिसे- ' पूर्वकपाल ' कहा जाता है । एवं श्रद्ध खगोल ही श्रद्ध वारुण-वरुणकपाल है, जिसे ' पश्चिमकपाल ' कहा जाता है । कपालद्वयात्मक - अण्डकटाहद्वयात्मक - श्रग्नीषोमात्मक - सूर्य - चन्द्रमासमन्वित - यज्ञात्मक विश्वमण्डल ही सम्वत्सरप्रजापति के कालात्मक, तथा यज्ञात्मक स्वरूपेतिवृत्त का मनिप्ततम स्वरूप - दिग्दर्शन है । इस सम्वत्सर मण्डल का मगडल व सौर - चन्द्र- राश्मयों के तिरश्चीन - मात्र से ही अनुप्राणित है, जैसा कि -' तिरनो नितो रश्मिरेपामधः स्विदामीदुपरि विदामीन ' इत्यादि मन्त्रवर्णन से स्पष्ट है ÷ तुलवृत्त का स्वरूप वृत्त की प्रनिभिन्दु की नकता - कुटिलता से ही सम्पन्न होता है । इस बिन्दु - चिन्दु - प्रतिबिन्दु वक्रता - से ही. यज्ञात्मक - सम्बत्मग्काल- ' कुटिलकाल ' कहलाया है, जिस की यह प्रकृतिमिद्धा कुटिलता, किवा वक्रता सौर-चान्द्र - भेदभिन्न- ग्रॉग्न- सोमा नुबन्धी दो गुडकटाही के अनुबन्ध से स्थूल रूपेगा दो भागों में विभक्त होरही है । श्रद्ध - कुटिल - गडकटाह का मादी अग्न्यात्मक सूर्य है, तो श्रद्ध- कुटिल डकटाह का साक्षी सोमात्मक चन्द्रमा है । ये ही श्राधिदैविक विश्व प्रजापति के दो सुप्रसिद्ध चतु हैं - ' चक्षुषी चन्द्रसूय्यौं ' | सूर्य्यात्मक अद्ध ' अण्डकटाह ही उस प्रजापति का दक्षिण- चक्षुनु गत - दक्षिण कुटिल है, एवं चन्द्रात्मक श्रद्ध-अण्डकटाह ही उसका वाम - चक्षुरनुगत - बाम- कुटिल - भ्र है । सौर- चान्द्र - भावानुत्रन्वी अग्नीषोमात्मक-अण्डकटाहद्वय -- ममष्टिरूप - सर्वथैव - वक्ति - कुटिल दोनों भ्रूव ही अग्नीषोमात्मक विश्व के दो ‘ भ्रू ' हैं, जिन के प्रतिरूप ही मानवीय श्राध्यात्मत्मिक - यज्ञ ( शरीर ) के दोनों ध्रुव अभिव्यक्त हुए हैं । दक्षिणध्रुव सौर हैं, तां वामभ्रुव चान्द्र है । इनके स्वरूप - निर्माण में बावनतम सौर अग्नि, तथा बावनतम - ' पवित्र ' नामक ब्राह्मणम्पत्य - मोम ही प्रधान रहते हैं । श्रतएव जनन - मरणादि याशीच - प्रसङ्गों में भ्रुवों का निराकरण नहीं किया जाता । अत्र इस प्रमङ्ग मे यही निवेदनीय है कि, तिरश्चीन ध्रुव ही मानव की स्वरूप- प्रतिष्टा के आधार हैं । इन के शिथिल होते हीं । आँखे बन्द होते ही ) सबकुछ ममाप्त है, वैसे ही, जैसे कि सौर - चन्द्र- अण्डकटाही के प्रलयकाल में पारमेष्ट्य- समुद्र में विलीन होते ही पार्थिव विश्व परिसमाप्त हो जायगा |
- तिरचीनो विततो रश्मिरेपामधः स्विदासीदामीदुपरि स्विदासीत् ।
रेतोधा आसन महिमान आसन्त्स्वधा अवतान्प्रयतिः पुरस्तात् ॥
— ऋक मं ० १० १२६।५ । १३३२
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तृतीय अध्याय तृतीय- चतुर्थ ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मणु अग्निमय सूर्य, तथा सोममय चन्द्रमा, दोनों क्रमशः द्यौः, तथा प्रविथी के भी संग्राहक बने हुए हैं | द्यावापृथिवीरूप - सौर- चान्द्र - अग्नि - सोमात्मक - कालचक्र ही, कालचक्र के डकटाहात्मक दोनों भ्रूहीं अग्नीषोमात्मक विश्व की मूलप्रतिष्टा हैं । तव अवश्य ही इहें ' विधुती ' कहा जासकता है, जिस इस — ' विधुती ' तत्त्व का ' दिग्देशकालस्वरूप --मीमांसा - नामक स्वतन्त्र निबन्ध में - ' त्रिवृतीश्च पुण्याः ' * इत्यादि मन्त्रव्याख्यान में विस्तार से विश्लेषण हुआ है । भ्रवात्मिका इसी ' विधृती ' की प्रतिरूप - सम्पत्ति -प्राप्ति के लिए - यहाँ - कुश त्मिका- ' त्रिधृती ' स्थापित की जाती है, इत्यलमतिविस्तरेण - विधृतितत्त्वस्वरूप– पेतिवृत्तेन । ' विधृती ' उन दो दर्भतृणों की याज्ञिक संज्ञा है, जिन्हें बेदि पर स्थापित किया जाता है । यह वैधयज्ञ पुरुषविध बतलाया गया है । प्रस्तररूप शिखा का स्थापन होगया, आहवनीयादिरूप से शिरोभागादि इतर शरीरावयवों का स्थापन होगया । अब भौंहें शेष हैं । इनका स्थापन और अपेक्षित है । इसी उद्देश्य से ' विधृती स्थापन ' होता है । पुरुषयज्ञसंस्था में मोहें वक्र रहती है, अतः निदानेन तद्रुप विघृती भीतिक ही खीं जातीं हैं । यही तिर्य्यगाधान की एक उपपत्ति है । उमी निदानमयदा के अनुसार प्रस्तर क्षेत्र का प्रति-रूप है, तो इतर बर्हि विट का प्रतिरूप है । स्वरूपरक्षा के लिए दोनों का नियन्त्रण अपेक्षित है । नियन्त्रण करना मर्यादासूत्र का काम है । मर्यादासूत्र स्वभावतः वक्र है, टेढा है, उस में सरलता नहीं है । वह क्षमा करना नहीं जानता । निदानेन विवृता मर्यादासूत्र का ही प्रतिरूप है । अतएव इसे तिर्य्यक रूप से ही स्थापित किया जाता है । इसी क्षेत्र - विद विवरणकर्म से इसे ' विधृतो ' कहना अन्वर्थ बनता है । विती - स्थापन क के अनन्तर जो प्रस्तर बिछाया जाता है, उस की उपपत्ति स्पष्ट है ॥ १०, ११ ॥ अथ व कुस्थापनकम्मोंपपत्तिः विधृती के ऊपर प्रस्तर - स्थापन के अनन्तर वह अध्वर्यु प्रस्तर के साथ अपने वामहस्त का सम्बन्ध बनाए हुए आग्नीध नामक ऋत्विक के हाथ से क्रमशः जुह, उपभ्रत्, ध्रुवा नाम के कुपात्रों को ' घृता-त्र्यसि ं ' इत्यादि मन्त्र बोलता हुआ ले लेकर " सेदं प्रियेण धाम्ना ० " इत्यादि मन्त्र बोलता हुआ इहें वेटि-पर रखता जाता है । यही स्रु ग्रहण स्थापन कर्म है । अनन्तर ' घवा असदन ' इत्यादि मन्त्र बोलता हुआ * कालेयमङ्गिरा देवोऽथ चाधितिष्ठतः इमं च लोकं परमं च लोकं, पुण्यांश्च लोकान् " विधृतीश्च पुण्याः " सर्वा लोकानभिजित् ब्रह्मणा कालः स इयते परमो नु देवः ॥ — अथर्वसंहिता १६।५४।५ । ११३३
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तृतीयश्रध्याय तृतीय- चतुर्थ ब्राह्मण प्रथमकाण्ड स्थापन- स्पर्श कम्र्म की कोई विशेष उत्पत्ति नहीं स्थापन क्रमानुसार इन सत्र का स्पर्श करता है । इस ग्रहण था, वह मूलनुवाद से ही गतार्थ है || १२, १३, है | मन्त्रशब्दार्थ के सम्बन्ध में जो कुछ विशेष वक्तव्यं १४, १५, १६ ॥ प्रथमकाण्डान्तर्गत - तृतीय - यध्याय का चतुर्थ ब्राह्मण एवं तृतीय प्रपाठक का प्रथम ब्राह्मण उपरत परिधित्राह्मण - ग्रत्र समाप्त द्विब्राह्मणात्मक- " इध्म - परिधि - ब्राह्मण ” समाप्त १ ९ ३४
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श्रीः अथ - शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञानभाष्ये सामिधेन्यनुवचनब्राह्मणम् ब्राह्मणचतुष्टयात्मकम्
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श्रीः अथ शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्ये-- सामिधेनी- ब्राह्मणम् ब्राह्मणचतुष्ट्रयात्मकम् अथ - प्रथमकाण्डे तृतीयाध्याये पञ्चमं ब्राह्मणम् तृतीयप्रपाठके च द्वितीयं ब्राह्मणम् ( सामिधेनी - बाह्मणानुगतञ्च - प्रथमं ब्राह्मणम् ) १ १८ – सामिधेन्यनुवचनकर्म्य ( मूल ) इन्धे ह वा एतदध्वर्यु ' रिमेनाग्निम् - तस्मादिध्मो नाम । समिन्धे सामि-धेनीभिर्होता तस्मात् सामिधेन्यो नाम ॥ १ ॥
स आह- “ अग्नये समिध्यमानायानुब्र हि " इति । अग्नये ह्येतत् समिध्य-मानायान्वाह || २ ॥ तदु हैक हु: - अग्नये समिध्यमानाय होतरनुब्रूहीति । तदु तथा न ब्रूयात । होता वा एष पुरा भवति । यदैवैनं वृणीते - अथ होता । तस्मादु यात्- अग्नये समिध्यमानायानुत्र ही, त्येव ॥ ३ ॥
आग्नेयीरवाह | स्वयैवैनमेतद् वतया समिन्धे । गायत्रीरन्वाह । गायत्रं वा-अग्नेश्छन्दः । स्वेनैर्वैनमेतच्छन्दसा समिन्धे । वीर्य गायत्री, ब्रह्म गायत्री वीर -तत्समिन्धे ॥ ४ ॥
एकादशान्वाह । एकादशाक्षरा वै त्रिष्ट ुप् । ब्रह्म गायत्री, क्षत्रं त्रिष्ट ुप् । एताभ्यामंत्र-नमेतदुभाभ्यां वीर्याभ्यां समिन्धे - तस्मादेकादशान्वाह || ५ ॥ ११३७
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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मया शतपथब्राहाण स वैं त्रिः प्रथमामन्वाह, त्रिरुत्तमाम् । त्रिवृत्प्रायणा हि यज्ञाः, त्रिवृदुदयनाः । तस्मात् - त्रिः प्रथमामन्वाह, त्रिरुत्तमाम् ॥ ६ ॥
ताः पञ्चदश सामिधेन्यः सम्पद्यन्ते । पञ्चदशों वै वज्रः, वीर्यं वज्रः, वीर्यमे चैत-त्सामिधेनीरभिसंपादयति । तस्मादेतास्वनुच्यमानासु यं द्विष्यात् तमङ्गुष्ठाभ्यावचाधेत-" इदमहममुमवबाधे " इति । तदेनमेतेन बज्र गावबाधते ॥ ७ ॥
पञ्चदश वा अर्धमासस्य रात्रयः । अर्द्ध मामशो वै संवत्सरो भवन्नति, तद्रात्री-राप्नोति ॥ ८ ॥
पञ्चदशानामु गायत्रीणां त्रीणि च शतानि पष्टिश्वाक्षराणि । त्रीणि च वै
शतानि पष्टिश्च संवत्सरस्याहानि । तदहान्याप्नोति तद्वदेव संवत्सरमाप्नोति ॥ ६ ॥
सप्तदश सामिधेनीरिष्ट्या अनुयात् । उपांशु तस्यै देवतायै यजति यस्या इष्टिं निर्वपति । द्वादश मासाः संवत्सरस्य, पञ्चर्चवः । एष एव प्रजापतिः सप्तदशः । सर्वं वै प्रजापतिः । तत्सर्वेणैव तं काममनपराधं राध्नोति यस्मै कामायेष्टिं निवति । उपांशु देवतां यजति । अनिरुक्तं वा उपांशु सर्वं वा अनिरुक्तम् । तत्सर्वेणैव तं
काममनपराधं राध्नोति यस्मै कामायेष्टिं निर्वपति । एप इष्ट रुपचारः ॥ १० ॥
एकविंशतिं सामिधेनीरपि दर्शपूर्णमासयोरनुत्र यादित्याहुः । द्वदश नै मासाः संवत्सरस्य, पञ्चर्त्तवः, त्रयो लोकाः - तद्विंशतिः । एष एकविंशो य एप तपति । सैपा गतिः, एषा प्रतिष्ठा । तदेतां गतिमेतां प्रतिष्ठां गच्छति । तस्मादेकविंशतिमनु-ब्रूयात् ॥ ११ ॥
ता ता गरेवानुयान् । य इच्छेन्न श्रेयान् स्यान्न पापीयानिति । यादृशाय हैव स ते ऽन्वाहः ताङ वा हैव भवति, पापीयान्वा --यम्यैनं विदुष एता अन्याहुः | सो एपा मीमांसेव, नत्वेनैता अनूच्यन्ते ॥ १२ ॥
त्रिरेव प्रथमां त्रिरुत्तमामनवानन्ननु यात् । त्रयो वा इमे लोकाः, तदिमानंत-ल्लोकान् सन्तनोति, इमान् लोकान् स्पृणुते । त्रय इमे पुरुषे प्राणाः । एतमेवास्मिन्ने-तत्संततमव्यवच्छिन्नं दधाति । एतदनुवचनम् || १३ ॥ ११३८