Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 881–890

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 881–890

पृष्ठ 881

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 881 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्री अथ - प्रथमकाण्डे चतुर्थाध्याये तृतीयं ब्राह्मणम् तृतीय पाठके च पञ्चमं ब्राह्मणम् [ सामिधेनी - ब्राह्मणानुगतञ्च चतुर्थ ब्राह्मणम् ] यथ - शान्तिकर्म-यो ह वा अग्निः सामिधेनीभिः समिद्ध:, अतितरां ह वै स इतरस्मादग्नेस्तपति, वो हि भवति, अनवमृश्यः ॥ १ ॥

स यथा वाग्निः सामिधेनीभिः समिद्धस्तपति, एवं हैव ब्राह्मण: सामिधेनीविद्वा-ननुवंस्तपति । नष्यो हि भवति, अनवमृश्यः ॥ २ ॥

सोऽन्वाह - ' प्रवः ' इति । प्राणो वै प्रवान् प्राणमेवैतया समिन्धे । ' अग्न याहि वीतये ' इति । अपानो वा एतवान, अपानमेवैतया समिन्धे । ' बृहच्छांचा यविष्ठय'- इति । उदानो वैं बृहच्छोचा, उदानमेवैतया समिन्धे ॥ ३ ॥

' स नः पृथु श्रवाय्यम् ' इति । श्रोत्रं वै पृथुश्रवाय्यम्, श्रोत्रेण हीदपुरु पृथु श्रृणोति श्रोत्रमेतया समिन्धे ॥ ४ ॥

' ईडेन्यो नमस्यः ' इति । वाग् वा ईडेन्या, वाग्धीदं सर्वमीट्ट े

। वाचेदं सर्वमीडि-तम् । वाचमेवैतया समिन्धे ॥ ५ ॥

' अश्वो न देववाहनः ' इति । मनो वै देववाहनम् । मनो हीदं मनस्विनं भूयिष्ठं वनवाह्यते । मन एवैतया समिन्धे ॥ ६ ॥

' अग्ने दीयतं बृहत् ' इति । चक्षुनैं दीदयेव । चक्षुरेवैतया समिन्धे ॥ ७ ॥

१ ९ ४६

पृष्ठ 882

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 882 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय - चतुर्थ अध्याय तृतीय - चतुर्थ ब्राहाण प्रथमकाराद ' अग्नि दूतं वृणीमहे ' इति । य एवायं मध्यमः प्राणः, एतमेवैतया समिन्धे । सा हैपान्तस्था प्राणानाम्, अतो धन्य ऊर्जाः प्राणाः, अतोऽन्येऽवाञ्चः । अन्तस्था ह्न भवति । अन्तस्थामेनं मन्यन्ते य एवमेतामन्तस्थां प्राणानां वेद ॥ ८ ॥

' शांचिकेशस्तमीमहे ' इति । शिश्नं वै शोचिष्केशम् । शिश्नं हीदं शिश्निनं

भूयिष्टं शोचयति । शिश्नमेवैतया समिन्धे ॥ ६ ॥

' समिद्धो न त ' - इति । य एवायमवाङ प्राणः, एतमेवैतया समिन्धे ।

' आजुहोता दुवस्यन ' - इति । सर्वमात्मानं समिधे आ नखेभ्योऽथो लोमभ्यः ॥ १० ॥

स यध ेनं प्रथमायां सामिधेन्यामनुत्र्याहरेत् 1 तं प्रति ब्रूयात् ' प्राणं वा एन-दात्मनोऽग्नावाधाः, प्राणेनात्मन आर्त्तिमारिष्यसि ' इति । तथा हैव स्यात् ॥ ११ ॥

यदि द्वितीयस्य मनुव्याहरेत्, तं प्रति ब्रूयात्- ' अपानं वा एतदात्मनोऽना-वाघाः, अपानेनात्मन आर्त्तिमरिष्यमि ' इति । तथा हैव स्यात् ॥ १२ ॥

यदि तृतीयश्यामनुव्याहरेत् तं प्रति ब्रूयात्- ' उदानं वा एतदात्मनोऽग्नावाघाः,

उदानेनात्मन आर्त्तिमरिष्यसि ' इति । तथा हैव स्यान् ॥ १३ ॥

यदि चतुर्थ्यामनुध्याहरेत् 1 तं प्रति ब्रूयात् श्रत्र वा एतदात्मनोऽग्नावाधाः,

श्रांत्रेणात्मन अर्त्तिमरिष्यसि बधिरां भविष्यमि इति । तथा हैव स्यात् ॥ १४ ॥

यदि पञ्चम्यामनुव्याहरेत्, तं प्रति ब्रूयात्- ' वाचं वा एतदात्मनोऽग्नावाधाः,

वाचात्मन आर्त्तिमरिष्यमि मूको भविष्यसि ' इति । तथा हैव स्यात् ॥ १५ ॥

यदि पष्ठ्यामनुव्याहरेत् तं प्रति ब्रूयात्- ' मनो वा एतदात्मनोऽग्नावाधाः, मनमात्मन निंमरिष्यमि मनोमुषिगृहीनो मोमुघश्चरिष्यमि ' इति । तथा व स्यात् ॥ १६ ॥

यदि सप्तभ्यामनुश्याहरेत् । तं प्रति यान ' चतुर्वा एतदात्मनोऽग्नावाधाश्चतु-पात्मन आर्शिमायस्यन्धो भविष्यमि ' इति । तथा च स्यात् ॥ १७ ॥

१ ९ ५०

पृष्ठ 883

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 883 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय- चतुथ - अध्याय तृतीय- चतुर्थ - ब्राह्मण शतपथब्राह्मण यवष्टम्बामनुव्याहरेत् तं प्रति व बात् - ' मध्यं वा एतत्प्राणमात्मनोऽग्नावाधाः, मध्येन प्राणेनात्मन · आर्त्तिमारिष्वस्युध्माग मरिष्यसि ' इति । तथा हैव स्यात् ॥ १८ ॥

यदि नवम्यामनुव्याहरेत् तं प्रति ब्रूयात् - शिश्नं बा एतदात्मनोऽग्नबाधाः,

शिश्नेनात्मन आर्त्तिमरिष्यसि क्लीयां भविष्यसि इति । तथा हैव स्वात् ॥ १८ ॥

यदि दशम्यामनुव्याहरेत, तं प्रति ब्रबात- अवाञ्च वा एतत्प्राणमात्मनो-ऽग्नावाधाः, वाचा प्राणेनात्मन आर्त्तिमरिष्यस्वपिनद्धो मरिष्यसि इति । तथा हैव स्यात ॥ २० ॥

यद्यकादश्यामनुव्याहरेत् तं प्रति ब्रूयात्- ' सर्व वा एतदात्मानमग्नावाधाः,

सर्वे मनानि मारिष्यमि क्षिप्रेऽमुं लोकमेध्यसि ' इति । तथा हैव स्यात् ॥ २१ ॥

म यथा हैवाग्नि सामिधेनीभिः समिद्धमापद्यात्तिं वेति, एवं हैव ब्राह्मणं सामि-धेनीर्विद्वांसमनुत्र ुवन्तमनुत्र्याहृत्यार्त्ति ं न्येति ॥ २२ ॥

इति - प्रथमकाण्डे चतुर्थाध्याये तृतीयं ब्राह्मणं तृतीयप्रपाठके च पञ्चमं ब्राह्मणं [ मामिधेनी - ब्राह्मणानुगतञ्च चतुर्थं ब्राह्मणं ] उपरतम् ४ इति ब्राह्मणचतुष्टयात्मकं सामिधेनीब्राह्मणं उपरतम् **** —— ११५१

पृष्ठ 884

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 884 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीः ब्राह्मणचतुष्टयात्मक - सामिधेनी - ब्राह्मण शतपथब्राह्मण - प्रथमकाण्डानुगत तीमरे अध्याय में पाँचवाँ ब्राह्मण, एवं तीसरे प्रपाठक में दूसरा ब्राह्मण सामिधेनी - ब्राह्मणानुगत - प्रथम - ब्राह्मण १ मूलानुवाद अथ समिधन्यनुवचनम् ( न्द्रह समित काष्ठ के समूहरूप ) इध्म से ( इस आहवनीय ) अग्नि को ही प्रज्ज्वलित करता है । इसीलिए ( इन्धन - साधन होने से प्रज्ज्वलन - कर्म्मसाधक ) इन काष्ठों को [ ' इन्वे तस्मादिध्मः ' - इस निर्बचन से ) ' इध्म ' कहा जाता है । होता ( एतन्नामक ऋस्विकू--' प्र वो बाजा ० ' इत्यादि ) सामिधेनी ऋचाओं से ( आहवनीय अग्नि को ) समिद्ध करता है, ( अतएव ' समिन्वे तस्मात् सामिधेनी ' इस निर्वाचन से इन ऋचाओं को ) ' मामिधेनी ' नाम से हृत किया जाता है ॥ १ ॥

वह अध्य ' ( सामिधेनी - ऋचाओं के अनुवचन के लिए होता नामक ऋत्त्विक के प्रति प्रैप - अनुज्ञा - करता हुआ ) कहता है – “ अग्नये समिध्यमानाय अनुन हि " ( हे होतः! इध्मकाष्ट से प्रज्वलित हुए अग्नि के लिए, इसे समिद्ध बनाने के लिए जो सामिनी ऋचाएँ हैं, उनक यथाक्रम अनुवन्न करो ) । ( उक्त प्रैपमन्त्र से वह अध्वर्यु ) अग्नि के लिए ही इसे समि बनाने के लिए कहता है ॥ २ ॥

( उक्त प्रैप के सम्बन्ध में ) किनने एक याज्ञिकोंने यह कहा है कि - " अनवे समिध्यमा-नाय होतरन्त्र हि ” ( इत्यादिरूप से होतृपद का उच्चारण करते हुए ) इस रूप से प्रैष करना चाहिए । ( अध्वर्यु को चाहिये कि वह ) वैसा कभी न करे ( प्रैष मन्त्र में ' हो तरनुब्र ू हि ’ इत्यादि रूप से होतृपद का मन्निवेश न करे ) । कारण यही है कि, ( होतृप्रवर पहिले ( इस सामिधेनी - अनुवचन के समय अनुवचन करने वाला ) यह ऋत्विक अहोता ही ११५२

पृष्ठ 885

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 885 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड रहता है । जब ( आगे जाकर ) इसका वरण होता है, तभी यह ' होता ' नाम का अधिकारी बनता है । इसलिए ( बिना होतृपद का सन्निवेश किए ) - " अग्नये समिध्यमानायानुत्र हि " इसी रूप से प्रैप करना चाहिए ॥ ३ ॥

( अध्यष के अनुसार अनुवचनकर्म में नियुक्त ) वह ऋत्विक् आग्नेयी ( अग्निदेवता - सम्बन्धिनी ) सामिधेनी - ऋचाओं का अनुवचन करता है ( अर्थात् इसे आग्नेयी-ऋचाओं का ही अनुत्रचन करना चाहिए । ऐसा करता हुआ यह ऋत्विक ) इस अग्नि को अपने देवता के रूप से युक्त सामिवेतो ऋवा से ही समिद्ध करता है । ( अर्थात् आग्नेयी सामि-धेनी - ऋचा से अनुबचन करना सजातीयभाव से ही अग्नि का समिद्ध बनाना है ) । ( बह ऋत्विक् ) गायत्री ( गायत्री छन्दोयुक्त सामिधेनी ऋचा ) का अनुवचन करता है । गायत्री अग्नि का छन्द है । ( इसका अनुवचन करता हुआ ) अग्नि के अपने हीं छन्द से इसे समिद्ध वनाता है । गायत्री वीर्य्यात्मिका है, गायत्री ब्रह्म ( ब्राह्मणवर्ण ) है, ऐसी अवस्था में गायत्री से अनु-बचन करता हुआ । ऋत्वक ब्रह्मवीर्य से ही इस अग्नि का समिन्धन करता है । तात्पर्य यही हुआ कि, छन्द, वी, वर्ण, सम्पत्तियों के प्रधान के लिए गायत्री छन्दस्का ऋचाओं से ही अनुवचन करना चाहिए ॥ ४ ॥

( जिन सामिवेनी - ऋचाओं से यह ' सामिधेनी - अनुवचनकर्म्म ' होता के द्वारा होने बाला है, उनके सम्बन्ध मं ' अग्नि ' देवता, तथा ' गायत्रीछंद ' की व्यवस्था बतलाई गई । अब संख्या की व्यवस्था करती हुई श्रुति कहती है ) - ऋत्त्विकू ( आगे जाकर ' होत्रप्रवरणकर्म्म ' से ' होता ' कहलाने वाला ऋत्विक् ) ग्यारड् सामिवेनी ऋचाओं का अनुवचन करता है । त्रिप ( छन्द ) ग्यारह अक्षर की है । गायत्री ब्रह्म ( ब्राह्मणवर्णात्मिका ) है, त्रिष्टुप क्षत्र ( क्षत्रिय-वर्णात्मक ) है । ( ब्रह्मात्मिका गायत्री स्वरूप वाली, तथा क्षत्रात्मिका त्रिष्टुप संख्या वाली सामि-धेनी - ऋचाओं का अनुवचन करता हुआ ) यह होता इन दोनों ब्रह्म - तत्र वीयों से युक्त करने के लिए गायत्रीछन्दस्क, एवं एकादश संख्याक ऋचाओं का अनुवचन करता है । इसलिए ग्यारह सामिधेनी - ऋचाओं का अनुवचन करता है ॥ ५ ॥

( संख्या - व्यवस्था के अनन्तर उच्चारण के सम्बन्ध में विशेषता बतलाती हुई श्रुति कहती है ) - वह ऋत्विक पहिली ऋचा का नीन बार अनुवचन करता है, एवं अन्तिम ( ग्याहरवीं ) ऋचा का तीन बार अनुवचन करता है । कारण इसका यही है कि, ' त्रिःसत्या हिं देवाः ' ( तै०-३२ | ३ | ८ \ इत्यादि श्रौत सिद्धान्त के अनुसार प्राकृतिक त्रिसत्य प्राणदेवताओं से सम्बन्ध रखने वाले सम्पूर्ण प्राकृतिक - आधिदैविक- नित्य यज्ञ त्रिवृद् रूप से ही आरम्भ होने वाले हैं, तथा त्रिवृद्-रूप से ही समाप्त होने वाले हैं । इस प्राकृतिक त्रिवृत सम्पत्ति की प्राप्ति के लिए ही होता तीन चार पहिली ऋचाका, तथा तीन बार अन्तिम ऋचा का अनुवचन करता है ॥ ६ ॥

११५३

पृष्ठ 886

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 886 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड ( गायत्री छन्द के सम्बन्ध से अग्नि में वीर्य का आधान होता है, एकादश संख्या से त्रिष्टुवनुगत क्षत्रवीर्य का आधान होता है, एवं त्रिः प्रथमा त्रिरुत्तमा संख्या से त्रिवृद्यज्ञ की त्रिवृ-सम्पत्तिका आधान होता है । इन उपक्रम - उपसंहार की संख्याओं से पन्द्रह सामिधेनी ऋचाएँ होजातीं हैं । इस पञ्चदश संख्या का क्या फल? इसी प्रश्न का संख्यानुवदन - पूर्वक समाधान करती हुई श्रुति कहती है कि ) वे सामिधेनी ऋचाएँ ( त्रिः प्रथमा, त्रिरुत्तम रूप से अनुवचन करने से ) पन्द्रह होजातीं हैं । वज्र ( असुरनाशक प्राशक्त्यात्मक शस्त्र, पञ्चदश सम्पत्ति से युक्त है । वज्र साक्षत वीर्य ( अन्तःशक्ति ) है । ( पन्द्रह संख्या के द्वारा वह ऋत्विक ) इस अग्नि में इसी पञ्चदश वीर्य का सम्पादन करता है । ( पन्द्रह संख्या के प्रभाव से प्रत्येक सामिधेनी - ऋचा वज्रप बन जाती है ) । अतएव इन सामिधेनी - ऋचाओं का अनुवचन करते हुए जिस किसी के साथ ( यजमान ) द्वं प करे ( जो यजमान से शत्रुता रखता हो उसका " इदमहममुं - विद्याशत्रु - अमुकं या अवबाधे " यह बोलता हुआ अपने हाथ के दोनों अंगूठों को जोर से मसल डाले । सचमुच इस अभिचारकम्मं से यह यजमान शत्रु को पीडा पहुँचाने में समर्थ होजाता है । ( तात्पय्य यही हुआ कि सामिधेनी का उच्चारण करना वज्र ही फेंकना है । जिससमय ऋत्विक इनका अनुवचन करता हो, उस समय शत्रु का नाम लेकर ' मैं उसे नष्ट करता हूँ ' यह भावना करता हुआ यज-मान यदि दोनो अंगुष्ठमीढ डालता है, तो अवश्यमेव शत्रु का अनिष्ट होजाता है । यह अभिचार-शक्ति पञ्चदश संख्या से ही इन सामिधेनी ऋचाओं में प्रविष्ट होती है ) ॥ ७ ॥

( पन्द्रह संख्या से वात्मिका अभिचारसाधिका शक्ति से सामधेनी ऋचाओं को युक्त करना, यह पश्चदृश संख्या की एक उपपत्ति है । दूसरी उपपत्ति यह क ) - श्रर्द्धमाम की ( एक पक्ष की ) पन्द्रह रात्रियाँ होती हैं । ( पञ्चदश - रात्रि - समविरूप ) ऐसे अर्द्धमास से ( अर्द्धमास के आवर्तन से ) ही मम्बत्सर अपना स्वरूप सम्पन्न करता है । ( अर्थात् मास के २४ आवर्त्तन से ही सम्वत्सर बन जाता है । फलतः श्रर्द्धमास को पन्द्रह रात्रियाँ सम्पूर्ण सम्वत्सर- रात्रियों की सम्पत्ति का कारण बन जातीं हैं ) । इन पन्द्रह संख्याओं से ( अर्द्धमास की पन्द्रह रात्रिसम्पत्ति के द्वारा वर्त्तन सम्बन्ध से ) यह ऋत्विक उन सम्वत्सर - रात्रियों की सम्पत्ति प्राप्त कर लेता है । ( इस रात्रि - सम्पत्ति के लिए भी पञ्चदश- सामिधेनियों का अनुवचन होता है, यही इस पञ्चदश संख्या की दूसरी उपपत्ति है ) ॥ ८ ॥

( अपि सामिधेनी ऋचा गायत्री है, पञ्चदश संख्या सम्बन्ध से पन्द्रह गायत्री होजाती हैं । प्रत्येक गायत्रीमन्त्र में २४ अक्षर होते हैं । फलतः ) पन्द्रह गायत्रीमन्त्रों के ( २४-२४ के अनुपात I ) तीन, और सी, तथा साठ ( ३६० ) अक्षर होजाते हैं । तीन और सॉं, एवं साठ (. ६० ) ही एक सम्बत्सर के दिन होते हैं । ( पञ्चदश गायत्री ऋचाओं का अनुवचन करत | हुआ ऋत्त्विक् इन ३६० अह्नों को ( अहः सम्पत्ति को ) प्राप्त कर लेता है । इसी के द्वारा ( अहः समुदाय-द्वारा अहः समुदायात्मक ) सम्वत्सर ( सम्बत्सर यज्ञ सम्पत्ति ) प्राप्त कर लेता है ॥ ६ ॥

११५४

पृष्ठ 887

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 887 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय - चतुर्थ अध्याय सामिधेनीबादास प्रथमत्रादान ( क्योंकि - सामिधेनी - संख्या का प्रकरण चल रहा है, अतः प्रसङ्गोपात्त काम्येष्टि से सम्बन्ध रखने वाली सामिवेनी - ऋचाओं की संख्या के सम्बन्ध में भी श्रुति व्यवस्था कर देती है | श्रुति जिस ' इष्टि ' के सम्बन्ध में सख्या को व्यवस्था करने वाली है, उसे दर्शपूर्णमास की विकृतिभूता ' काम्येष्टि ' समझना चाहिए, जैसा कि ' तं काममनपराधं राध्नाति इत्यादि से स्पष्ट है । दर्श-पूर्ण मास में जहाँ पन्द्रह सामिधेनीमन्त्र होते हैं, वहाँ तद् विकृतिभूता काम्येष्टि में, तथा पशुबन्ध में सत्रह सामिधेनीमन्त्र होते हैं जैसा कि “ पञ्चदश सामिधेन्यो दर्शपूर्णमासयोः, सप्तदशेष्टि-पशुबन्धनाम् ” ( आपस्तम्ब श्र ० सू ० ) इत्यादि सूत्र सिद्धान्त से प्रमाणित है । काम्येष्टि के सम्बन्ध में यह विशेषता और समझ लेनी चाहिए कि, जहाँ दर्शपूर्णमास में बापदेवता का उच्चैः यजन होता है, वहाँ काम्ये के आवापदेवता का उपांशु यजन होता है । इसी प्रासङ्गिक काम्येष्टि-सम्बन्धी उपचार - संख्या - व्यवस्था का स्पष्टीकरण करती हुई श्रुति कहनी है ) ----• वह ऋत्त्विक् इष्टि के सम्बन्ध में ( दर्शपूर्णमास की विकृतिभूता काम्येपि के लिए ) सत्रह् सामिधेनी ऋचाओं का अनुवचन ( उच्चारण ) करै । जिस देवता के लिए ( अध्य ) इष्टि ( का-म्ये ) का निर्वाण करता है, उस इडि ] देवता के लिए वह उपांशु तूष्णीं ] यजन करता है । [ इस प्रकार उपांशु यजन होने वाले इस काम्येषिकर्म में सत्रह सामिवेनियों का अनुवचन करता हुआ ऋत्त्विक् सत्रह संख्या से काम सम्पत्ति - अभिलपित फल प्राप्त करने में इसलिए समर्थ होजाता है कि ] एक सम्वत्सर के चैत्रादि बारह [ तो महीनं होते हैं, एवं वसन्नादि पाँच ऋतुएँ -- होती हैं । [ इन सत्रह पर्वों से ] यही सम्वत्सरयज्ञात्मक प्रजापति सप्तदश बन रहा ] है । प्रजापति ही सर्व [ सर्वात्मक अतएव सर्व काम पूरक ] है । [ इसप्रकार काम्येष्टि में सत्रह मामिधेनियों का अनुवचन करता हुआ ऋत्विक् समसंख्या - समतुलिता सर्वात्मिका / प्रजापत्या सम्पत्ति का संग्रह करता हुआ सम्पूर्ण [ अभिलपिन ] ही उस काम अभिलषित | को निरापद समृद्ध करने में प्राप्त करने में ] समर्थ होजाता है, जिस [ संकल्पित ] काम कि प्राप्ति के लिए कि यह इष्टि का निर्वाण करता है । [ काम्येष्टि में आत्रापदेवता का उपांशु यजन क्यों होता है? इस प्रश्न की उपपत्ति व्रत-लाती हुई श्रुति कहती है कि ] यह ऋत्विक उपांशुरूप से देवता का यजन करता है - [ इसका कारण यही है कि ] अनिरुक्त शब्द के द्वारा अप्रकट होने योग्य ] ही उपांशु है । [ उधर ] सर्वभाव भी [ सम की अपेक्षा से ] अनिरुक्त ही है । [ ऐसी परिस्थिति में अनिरुक्त - भावात्मक उपांशुभाव से यजन करता हुआ अध्यय्यु ' ] अनिरुक्तात्मक सर्वभावेन उस कामसमृद्धि को प्राप्त करने में समर्थ होजाता है, जिस काम के लिए कि यह इडि का निर्वान करता है । यहो [ सामिवेनियों का अनुवचन तथा प्रधानदेवता का उपांशुयजन ही ] इस काम्येष्टिका उपचार [ इतिकर्त्तव्यतात्मक त्रिशेषधर्म्म ] है ॥ १० ॥

- " हेमन्तशिशिरयोः समासेन " २१५.५.

पृष्ठ 888

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 888 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड [ दर्शपूर्णमासेष्टि में पूर्व में ' ताः पञ्चदश सामिधेभ्यः सम्पद्यन्ते ' इत्यादि रूप से पन्द्रह सामिधेनियों का विधान बतला गया है । अब इसी सम्बन्ध में पक्षान्तर उद्धत करती हुई श्रुति कहती है ] -कितने एक याज्ञिक कहते हैं कि, अथवा दर्शपूर्णमासेट में २१ सामिधेनी - ऋचाओं का अनुवचन करना चाहिए । [ २१ सामिधेनियों के अनुबचन की उपपत्ति वे याज्ञिक यह बतलाते हैं कि ] - एक सम्वत्सर के बारह [ तो ] महीनें होते हैं, पाँच ऋतुएँ होतीं हैं, [ त्रिवृत्-- पञ्चदश एकत्रिंश- स्तोम भेदभिन्न ] पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, ये यीन [ स्तौम्य - पार्थिव ] लोक होते हैं । इन सब के संकलन से सम्बत्सर के २० पर्व हो जाते हैं । यही २१ वाँ हैं, जोकि यह खगोलस्थ [ वृहती -छन्द -- त्रिष्वद्वृत्त - के मध्य में स्थिररूप से ] तप रहा है । यही [ एकविंश सूर्य यज्ञफलात्मिका ] स्वर्लोकात्मिका गति है, यही ( सर्वयज्ञ ) प्रतिष्ठा है । ( जो यजमान अपनी दर्शपूर्णमासेष्टि में २१ सामिवेनियों का अनुवचन करवाता है ) वह ( २१ के द्वारा ततसमतुलित विंशतिपर्वात्मक सम्वत्सर-यज्ञ का संग्रह करता हुआ इक्कीसवीं सामिधेनी के द्वारा तत्समतुलिता सूर्य्यात्मिका ) इसी गति को, इसी प्रतिष्ठा को प्राप्त होता है । इस गति प्रतिष्ठा - प्राप्ति के लिए २१ सामिधेनियों का ही अनु-वचन करना चाहिए || ११ || ( उक्त पक्ष का खण्डन करती हुई श्रुति कहती है कि ) - इन २१ सामिधेनियांका ( उस ) भाग्य-हीन यजमान के लिए ही उच्चारण करना चाहिए, जो यजमान यह चाहता है कि, न तो मेरा अभ्युदय हो, न पतन हो । ( यजमान अपनी जैसी स्थिति में रहता हुआ यज्ञ करेगा, वैसी ही स्थिति में प्रतिष्ठित ) यजमान के लिए ही वैसी ही सामिवेनियों का अनुवचन करते हैं, एवं वह यजमान वैसा ही ( उसी पूर्व स्थिति में ) रहता है । अथवा तो उस से भी निम्नश्रं रिण में चला जाता है, जिस यजमान के लिए कि ऋत्विक ( २१ सामिधेनी का उपर्युक्त गति प्रतिष्ठात्मिका उपपत्ति बतलाते हुए ) इन २१ सामिधेनियों का अनुवचन करते हैं । और वास्तव में ( यज्ञपद्धतियों के आधार पर बात तो यह है कि ) २१ सामिवेनियों के अनुवचन का पक्ष केवल पक्ष ही पक्ष है. निष्प्रयोजन - मीमांसा ही है, वस्तुतः २१ का ( ऋत्विकू लोग ) कदापि अनुवचन नहीं करते । तात्पर्य्य श्रुति ( याज्ञवल्क्य ) का यही है कि, यज्ञकर्म्म किसी अतिशय की प्राप्ति के लिए ही किया जाता है | श्री ( सम्पत्ति ) की प्राप्ति के लिए अभ्युदय के लिए, एवं पूर्व की सामान्य परिस्थिति से स्थिति में पहुँचने के लिए ही यज्ञ किया जाता है । यह फल तभी सम्भव है, जब कि, पद्धति- प्रदर्शित पञ्चदश- सामिधेनियों का ही अनुवचन किया जाय । केवल संख्या के आधार पर सम्पत्ति का समतुलन करते हुए २१ मामिवेनी करना अनुचित है । जो यजमान यह चाहे कि, मैं श्रीशून्य बना रहूँ, यज्ञ से मेरा कोई विशेष लाभ न हो, अथवा जो यह चाहे कि, न तो मेरा कोई लाभ हो हो, न हानि ही हो, वह अवश्य ही २१ का अनुवचन करवा सकता है । अवश्य ही ऐसे अनुवचन से यजमान जैसे का तैसा हो बना रहेगा और बहुन सम्भव है, इस सामान्य स्थिति से भी गिर जायगा । इसलिए २१ का पक्षान्तर केवल मीमांसा ही समझनी चाहिए । श्रुति के अक्षर- स्वारस्य से १२ की कण्डिका का उक्त अर्थ हो समीचीन प्रतीत होता है । कारण यहाँ है कि माउ एषा मीमांसव, न त्वेवैता अनुच्यन्ते ' बारहवीं कण्डिका के इस उप-१६५६

पृष्ठ 889

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 889 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीवालागा प्रथमकाण्ड संहारवाक्य से यही सिद्धान्त निकलता है कि, २१ का पक्ष याज्ञिकों के केवल काल्पनिक विचार ही विचार हैं । न कभी ऐसा हुआ, न होना चाहिए । अवकाश के समय याज्ञिकों में माविधेनी-संख्या की उपपत्ति के सम्बन्ध में कभी चर्चा चली होगी । वहाँ किसी ने यह कह दिया होगा कि, “ २१ सामिधेनी क्यों न की जाय? । इस से २१ स को गति प्रतिष्ठा प्राप्त हो जायगी " । तनकाल ही कमी वैज्ञानिक याज्ञिक ने उपेक्षापूर्वक उस पक्ष का उपहास करते हुए कह दिया होगा कि, " हाँ ठीक है, जिस यजमान को श्री की अपेक्षा न हो, प्रथम तो उस के यज्ञ में, अथवा जो यजमान यह चाहे कि, न मेरा अभ्युदय हो, न पतन हो, मैं जैसे का तैसा ही बना रहूँ. उस यजमान के लिए अवश्य ही २१ का अनुवचन कर सकते हैं । परन्तु यह भी ध्यान रहे कि, यजमान का अभ्युदय तो नहीं हीं होगा, परन्तु बहुत सम्भव है, उस का अनिष्ट भी होजाय " । उसी सामयिक चर्चा में उपस्थित होने वाले काल्पनिक २१ विंश पक्ष का श्रुति ने उसी आक्षेपात्मक - उपहासास्पद-शब्दों में इतिवृत्त बतलाते हुए सिद्धान्त में १५ सामिधेनी -पक्ष का ही समर्थन किया है । ' ता हैता गतश्रेरेव अत्र यात य इच्छेत् - न श्रेयान् स्यात्, न पापीयान् इति । इस से उपेक्षापूर्वक २१ का अफलात्मक फल बतलाने हुए इस पक्ष का उपहास किया । सर्वान्त में- ' साउ एषा मीमांसा एव, न त्वेनैता अनुच्यन्ते ' इस वाक्य से इस २१ पक्ष का निरसन कर दिया गया । इसी आधार पर हमने १२ वीं कण्डिका को पूर्वपक्ष - खण्डन परक - माना है । परन्तु व्याख्या-ताओं ने १२ वीं कण्डिका का ' अधिकार भेद ' मर्यादा परक लगाते हुए इस का यह अर्थ किया है कि-" जिस यजमान की सम्पत्ति नष्ट हो गई हो, वैसे यजमान के यज्ञ में हीं २१ सामिधेनियों का अनुवचन करना चाहिए । जो यजमान अच्छी स्थिति में है, उस के यज्ञ २१ अनुवचन की कोई यकता नहीं है । " यह अर्थ ' ता हैता गतश्र रेवानुत्र यात् ' इस वाक्य का किया है । एवं इसके आगे के ‘ य इच्छेन्न श्रेयान्त्स्यात्, न पापीयान् यादृशाय है व स तेऽन्याहुस्तादृङ हैव भवति ' वाक्य को ' पापीयान् वा से पृथक् कर उस का यह अर्थ किया है कि- " जो यज्ञ-मान नै दोनों नहीं चाहता है, उस के लिए यथोपलब्ध प्रकार से ( १५ अथवा १७ ) सामिधेनी का अनुवचन करते हैं । आगे जाकर पापीयान्बा ' के ' वा ' उपलक्षण विधि से श्रयान् का ग्रहण करते हुए यह अर्थ किया गया है कि, २१ सामिधेनी- पक्ष में यजमान अच्छी कामना रखता है, तो श्रेयान होता है, अन्यथा पापीयान होता है " । पाठक देखेंगे कि इस व्याख्या में किस प्रकार शब्द - मर्यादा की, प्रकरणसङ्गति की उपेक्षा हुई है? । अस्तु, जो कुछ हो, प्रकृत में कण्डिका का निष्कर्ष यही निकलता है कि, २१ का पक्ष केवल मीमांसा ही है । ऐसा अनुत्रचन होता नहीं, और यही सिद्धान्त यह सिद्ध कर रहा है कि, २१ का पक्ष पक्षान्तर नहीं है, अपितु उपेक्षाभाषा के द्वारा खण्डनात्मक ही बन रहा है । कितने एक व्याख्याता अन्य प्रकार से भी उक्त कण्डिका का समन्वय कर रहे हैं । और - पूर्वोक्त द्वितीय व्याख्या की अपेक्षा प्रस्तुत व्याख्या फिर भी यथा कथंचित् ठीक मानी जासकती है । व्याख्या का ११५.७

पृष्ठ 890

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 890 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय- चतुर्थ प्रध्याय सामिधेनीब्राह्मना प्रथमत्रादाण स्वरूप यही है कि - " अधिकारी के भेद से सामिधेनियों की संख्या की व्यवस्था है । यह जो २१ का अनुवचन है, वह जिस यजमान की सम्पत्ति न होगई है, उसी यजमान के लिए नियत है । क्यों कि प्रतिष्ठारूप २१ से यजमान की उखड़ी हुई प्रतिष्ठा पुनः प्रतिष्ठित होजाती है - ' ता हैता गत रेवानुत्र यात् ' जो यजमान न अपना अभ्युदय चाहता है, न पतन, उस यजमान के लिए उसे उसकी सामान्य स्थिति पर रहने के लिए ऋत्विक् लोग पूर्वोक्त पञ्चदश, किंवा सप्तदश का ही अनुवचन करते हैं- ' य इच्छेन्न श्रयान्तस्यान्न पापीयान् यादृशाय हैव स तेऽन्वाहुः तादृङवा ' हैव भवति ' । दोनों पक्षों में से दूसरे २१ वें पक्ष में दोष बतलाती हुई श्रुति कहती है कि २१ के पक्ष में ' श्र यान् ' के स्थान में ' पतन ' होसकता है । अर्थात् फलप्राप्ति संदिग्ध है - " पापीयान्या ' । ऐसी स्थिति में २१ के पक्ष को केवल मीमांसा [ विचार ] ही समझना चाहिए, इसका अनुवचन नहीं करना चाहिए -- " सा उ एपा मीमांसैव, न त्वेता अनुच्यन्ते ' ॥१२ ॥

[ संख्या के सम्बन्ध में व्यवस्था कर अब उच्चारण- क्रिया में विशेषता बतलाती हुई श्रुति कहती है ] उस ऋत्विक [ भात्री होता ] को पहिली सामिधेनी - ऋच का, तथा अन्त की सामि-घेनी -- ऋचा का तीन तीन बार अनवानन [ अनुच्छवास ] रूप से ही अनुवचन करना चाहिए । [ कहा गया है कि, १ ′ में से १ - १२ वीं ऋचा को तीन तीन बार बोला जाता है । इन के उच्चारण में एक सन्तान भाव ही रहना चाहिए । अर्थात् एक ही श्वास में बिना मध्य में विश्राम किए-आरम्भ की ऋचा का त्रिवार, एवमेव अन्त की ऋचा का त्रिवार उच्चारण करना चाहिए । इस एकश्वासात्मक सन्तानभाव का कारण यही है कि ] प्राकृतिक नित्य आधिदैविक यज्ञ में [ पृथिवी-अन्तरिक्ष - यौः नामक ] तान लोक हैं । [ तीन लोक महिमापृथिवीरूप एक ही लोक के तीन सन्तत पर्व हैं । यहाँ तीनों ऋचाओं का सन्तन उच्चारण करता हुआ ऋत्विक् ] इह्रीं तीनों लोकों को [ यज्ञफलभोक्ता यजमान के लिए प्रातिस्त्रिकरूप से ] एकरूप से [ अविच्छिन्नरूप से ] फैलाता है, किंवा तीनों का परस्पर ग्रन्थिबन्धन करता हैं, एवं तीनों को प्रीणित, तथा [ परस्पर के बन्धन से ] बलयुक्त बनाता है । अपिच | आध्यात्मिक यज्ञमूर्त्ति ] गुरुप में प्राण - व्यान - अपान-भेद से तीन प्राण अव्यवच्छिन्नरूप से ] प्रतिष्ठित है । [ इस अनवानन्- क्रिया से होता । इह्नां तीनों को परस्पर सम्बद्ध सन्तत ], तथा विच्छेदरहित [ अव्यच्छिन्न ] करता हैं । यही का वैज्ञानिक J प्रकार है, अर्थात अनवान रूप से ही अनुवचन करना चाहिए || १३ || ( प्रथम, तथा अन्त की तीन तीन ऋचाएँ यथास्वर - सुस्पषु मर्यादा से एक साथ, एक श्वास से बोल देना साधारण काम नहीं है । मान लीजिए, होता में स्वरसन्धान का उतना बल नहीं है । ऐसी दशा में अनुवचन की क्या मर्यादा होगी?, इसी विप्रतिपत्ति के सम्बन्ध में व्यवस्था करती हुई श्रुति कहती है कि ) - ( उत्तम पक्ष तो यही है कि ) इस होता का जहाँतक वश ११५८