Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 891–900
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 891–900
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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड चले, शक्तिभर इसीप्रकार ( पूर्वोक्त अनवान रूप से एक ही श्वास में ) अनुवचन करने का प्रयास करे - ( स यावदेव वशः स्यात् एयमेवानुविवक्षेत् ) । ( यदि ऐसा सम्भव न होसके, तो उसति में, शक्ति के अभाव में एक ऋचा के मध्य में विश्राम न लेकर पूरी ऋचा समाप्त होजाने पर हो विश्राम कर सकता है । परन्तु ) इस ( मध्य विश्रामात्मक ) पक्ष की निन्दा ही मानी जाती है | ( निन्दा का मूल यही है कि ) - अनवान् ( एकश्वास में ) बोलने की इच्छा ऋङ ्ममन्त्र का उच्चारण करता हुआ होता जब कि मध्य में श्वास का परित्याग कर देता है, तो उस दशा में ( त्रैलोक्य - संधानात्मक ) यह अनवानन - श्रनुवचनकर्म ( मध्म के विराम से व्यव च्छिन्न होता हुआ ) निर्बल ही होजाता है । यही इस पक्ष में ' परिचक्षा ( निर्बलता ) ' है । तात्प-इस परिचक्षाभावप्रदर्शन का यही है कि, जब ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होजाय कि, अब विश्राम लिए बिना आगे उच्चारण असम्भव है, तभी मध्य- विराम अपेक्षित है ' ॥ अथवा उक्त क.ण्डका का इस रूप से भी समन्त्रय किया जासकता है कि - अनुवचन करने वाले होता को चाहिए कि, उसके श्वास में ( जितनी देर ठहरने का ) वल है, उतनी देर तक ही बोले । श्वास पर बल प्रयोग न करे । बाकू शक्त्यभाव में यदि होता तीन ऋचाएँ एक साथ न बोलकर मध्य में विश्राम ले लेता है, तो कोई दोष नहीं है- " सु यावदस्य वशः स्यात्, एवमे वाविवक्षेत् " । उक्त पक्ष को दोषभाक् मानने वालों का प्रतिवाद करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि, नहीं, ऐसी बात नहीं है । अवश्य ही इस पक्ष की ( ऋङ्मध्य - विश्राम की ) परिचक्षा ( निन्दा ) ही है । यदि होता एक श्वास में ( अनधानन ) बोलने का संकल्प कर ( अनुविक्षन् ) मध्य में ( सामि ) हीं विश्राम कर लेगा [ अपान्यान ], तो त्रैलोक्य - सन्तानार्थ होने वाला लोकसन्तानान्यवच्छेदसाधक ] यह क शिथिल होजायगा - “ उत सामि श्रवान्यात्नवान्ननु विवज्ञन्, तत् कर्म्म विद्यत् " । यही इस विश्रामपक्ष में दोष है । ( तः कभी ऋङ्मध्य में अवसान नहीं होना चाहिए ] । उक्त दोनों में आने के प्रकरण की सङ्गति की दृष्टि से दूसरा अर्थ ही अन्य समझना चाहिए || १४ || [ प्रश्न उपस्थित होता है कि, जब विश्राम लेना दोष है, एवं कोई होता अपनी शक्ति से एक श्वास में तीनों का अव्यवच्छिन्न उच्चारण कर नहीं कर सकता, तो ऐसी परिस्थिति में क्या किया जाय? | इसी प्रश्न के सम्बन्ध में पक्षान्तर बतलाती हुई श्रुति कहती है कि ] - वह होता यदि ऐसा करना ( अनवानन रूप से एक श्वास में ) अपनी शक्ति के बाहिर समझता है, ( तो उस दशा मेंऋङ्मन्त्र के मध्य में विश्राम न कर ( एक एक ऋचा का अनवानन् ( एक श्वास में ) अनुवचन करे । ( अर्थात् ऋङ्मध्य में विश्राम करना दोष है, ऋक् के अवसान में दोष नहीं है ) । ( यदि ऋक् के अन्त में त्रिश्राम किया जायगा, तो पूर्वोक्ता आधिदैविकी लोकसम्पत्ति, तथा आध्यात्मिकी प्राणसम्पत्ति कैसे प्राप्त होगी?, जश्न का निराकरण करती हुई श्रुति कहती है ) - इस एक एक ऋचा से ही वह ( क्रमपरम्परया ) तीनों लोकों को सन्तत, तथा इहें बलवान् बनाने में समर्थ हो-जाता है । ( तीनों लोक सन्तत होते हुए पृथक् पृथक्, हैं । ऐसी स्थिति में तीनों के पृथक् पृथक ११५६
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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण किन्तु निरन्तर अनुवचन से लोकसम्पत्ति प्राप्त होजाती है, यही तात्पर्य है । अब जोकि प्रारणा-है- ( उसका समन्वय इसप्रकार होजाता है कि, प्रारण अपान - व्यान, तीनों आध्यात्मिक प्राण आलोमभ्यः, आनखामभ्य, व्याप्त एक ही गायत्रीप्राण के तीन पर्व हैं । फलत त्राणत्र-यात्मिका ) गायत्री ही प्रारण है । सो जो कि होता एक बार में ऋमन्त्ररूप शेप गायत्री का अनुवचन करता है, इससे ( प्राणत्रयगर्भित ) अशेष प्राण का भी आधान करने में समर्थ होजाता है । इसलिए जब ( कि एक एक के अनवान् अनुवचन से लोक - प्राण - सम्पत्तियाँ प्राप्त होजात हैं, तो ) एक एक का नवानन् रूप से अनुवचन कर ( लेना ) चाहिए ॥ १५ ॥
( प्रथम प्रथम की तीन सामिधेनियों के सम्बन्ध में उच्चारण की व्यवस्था बतलाई गई । अब समधिरूप से १५ हों के उच्चारण - सम्बन्ध में विशेष नियम बतलाती हुई श्रुति कहती है कि ) वह होता इन १५ सामिधेनी - ऋचाओं का अव्यवच्छिन्नरूप से ( नैरन्तविधि से ) अनुवचन करता है । ( तात्पर्य यही है कि, पन्द्रहों का उच्चारण क्रमशः परम्परया बिना अन्य कर्म के समा-वेश के निरन्तर - मर्यादा से ही होना चाहिए । कारण इसका यही है कि, ये १५ ऋङ्मन्त्र पूर्वकथ-नानुसार सम्बत्सर के अहोरात्र स्थानीय हैं । सन्तत अव्यवच्छिन्न उच्चारण करता हुआ होता ) सम्वत्सर के अहोरात्र पर्वो को ही सन्तत, तथा अव्यवच्छिन्न करता है । ये वे सम्वत्सर के अहोरात्र पर्व परस्पर मिलकर सन्तानपरम्परारूप से ही चक्रवत् परिवर्तित होते रहते हैं । प्रकृति में अहोरात्रपर्व सन्तत श्रव्यवच्छिन्नरूप से ही परिप्लवमान हैं । अतः तत्स्थानीया सामिधेनी का भी उसी मर्यादा से अनुवचन होना चाहिए । ( अब इस सन्तत - अविच्छिन्नभाव का दूसरा कारण बतलाती हुई श्रुति कहती है कि, सन्तत अविच्छिन्नरूप से अनुवचन करता हुआ होता ) द्वेष रखने वाले ( कृत्रिम ) के लिए, तथा भ्रातृव्य के लिए ( सहजशत्रु के लिए ) इस ( अपने भोग्य-स्थानीय सम्वत्सरचक्र में ) ' उपस्थान ' ( प्रवेशद्वारा ) नहीं करता है । वह होता ( यजमान के इस भोग्य सम्बत्सरचक्र में उभयविध शत्रुओं के लिए ) प्रवेशद्वार ही बनाता है, जो कि असन्ततरूप से सामिधेनियों का अनुवचन करता है । अत सन्तत - अव्यवच्छिन्नरूप से ही अनुवचन करता है ( करना चाहिए ) || १६ || तीसरे अध्याय में पाँचवाँ तथा तीसरे प्रपाठक में दूसरा " ब्राह्मण समाप्त सामिधेनीब्राह्मणानुगत प्रथमब्राह्मण अत्र - उपरत - * --( तीसरा अध्याय समाप्त ) ३ ११६०
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शतपथब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञानभाष्यान्तर्गत चौथा अध्याय प्रारम्भ ४ चौथे अध्याय में पहिला, तथा तीसरे प्रपाठक में तीसर । ब्राह्मण सामिधेनी - ब्राह्मणानुगत - दूसरा ब्राह्मण गायत्री - छन्दस्क १५ मामिवेनीमन्त्र, १५ संख्या, प्रथमोत्तम के तीन तीन मन्त्रों का अनत्रानन् उच्चारण, १५. हों का सन्ततरूप से अनुवचन, इन से क्रमशः ब्रह्म, क्षत्र - सम्वत्सर के अहोरात्र पर्व, प्रवेशद्वाररहित चक्राधिपत्य, इन चार सम्पत्तियों की प्राप्ति बतलाई गई । श्रब उह्नीं सामिधेनियों के सम्बन्ध में उच्चारणानुगत विशेषधर्म का विधान करता हुआ निम्न लिखित प्रकरण उपक्रान्त होता है— वह होता ( सामिवेनी - ऋक् का उच्चारण करने से पहले ) ' हिंकार ' करके ( ' हिं ' शब्द का उच्चारण करके ) अनुवचन ( ऋक् का उच्चारण ) करता है । वैज्ञानिक लोगोंने कहा है कि, ( कोई भी ) बज्ञ असामा ( साम रहित ) नहीं है । ( साथ ही ) ड्रिंकार किए बिना साम नहीं गाया जास-कता । सो जोकि होता ' हिङ् ' करता है, इस से हिंङ्कार का रूप सम्पन्न करता है, एवं ' ओ ३ म्-ओ ३ म् ' इस प्रणव से ही साम के रूप ( रूपसम्पत्ति ) को प्राप्त करता है । इस ( वपूर्वक हिंका-रानुगत अनुवचन ) से सम्पूर्ण यज्ञ समासा ( सामसम्पत्ति से मुक्त ) होजाता है । प्रत्येक मन्त्र प्रवपूर्वक बोला जाता है, प्रणव से पहले यहाँ ' हिं ' और लगाया जाता है । इस हिंकारात्मक– प्रणत्रोच्चारण से सामसम्पत्ति गतार्थ बन जाती है । हमारा यज्ञ ससाम बनजाय, यही हिंकार की एक उपपत्ति है, यही तात्पर्य है ) ॥ १ ॥
जिस ( दूसरे ) प्रयोजन के लिए कि हिङ्कार करता है - वह बतलाते हैं ) - नासिकास्थित श्वास-प्रश्वासाधिप्राता मुख्य ) प्रारण निश्चयेन ' हिंङ्कार ' है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि, ( कोई भी व्यक्ति ) नामाच्छिद्रों को अवरुद्ध कर हिंकार नहीं कर सकता । ( जहाँ हिंकार नासाप्राणात्मक होने से प्राण है, वहाँ ) ऋङ्मन्त्र वागूरूप उच्चारण | पेक्षया बागात्मक है । इसप्रकार हिंकार ‘ प्राण ' बना हुआ हैं, एवं ऋक् ' बाक ' बनी हुई है । इसी वाक् - प्राण के मिथुनभात्र को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है कि- वाकू से ऋक् का अनुवचन करता है, एवं वाक् प्राण, दोनों का ( योषा - वृषात्मक ) ११६१
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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण मिथुन ( दाम्पत्यभाव ) है । ( इसप्रकार हिंकारपूर्गक - प्रारणपूर्वक - ऋक् का - ( वाक् का ) प्रयोग करता हुआ ) होता ( इस हिंकार - ऋकरूप प्रारण वाक् के मिथुन से ) सामिधेनियों के पहले हो मिथुन- प्रजनन करता है । इस ( प्रजनन सम्पत्ति के ) लिए भी हिंकार करके अनुवचन करता है || २ || वह होता उपांशुरूप से मन्दरूप से, किन्तु गम्भीरध्वनि से ) हिंकार करता है । यदि होता ( मन्त्रवत् ) उच्चस्वर से हिङ्कार करेगा, तो इस हिंकार को भी दूसरी वाकू ही बना डालेगा, ( फलत: मिथुनसम्पत्ति प्राप्त न होगी ), इसलिए उपांशु हिंकार करता है ॥ ३ ॥
वह होता ' या ' तथा ' प्र ' से युक्त सामिधेनी ऋक् का अनुवचन करता है । [ इस ' आ ' से उपलक्षित ' ऐति ', तथा ' प्र ' से उपलक्षित ' प्रति ' के समावेश से सामिधेनी - ऋगुरूपा ] गायत्री को ही यह होता [ ति से ] अर्वाची [ भूलोकानुगामिनी ] बनाता है, एवं [ प्रेति से ] पराची [ द्य लोकानु-गामिनी ] बनाता है । पराची गायत्री तो देवताओं के लिए यज्ञ [ आहुतिद्रव्य ] का बहन करती है, एवं अर्वाची गायत्री मनुष्यों का पालन करती है । [ इस उभयविध- फलप्राप्ति के लिए ही ] ' एति-प्रति ' रूप से सामिधेनी का अनुवचन करता है ॥५ ॥
[ एति प्रेति की एक उपपत्ति बतलाई गई । अत्र दूसरी उपपत्ति बतलाते हैं ] - जिस प्रयोजन के लिए कि एति -- प्रेति पूर्वक अनुवचन करता है - [ उसका दूसरा कारण बतलाते हैं ] -परा-गूगति सूचक ] ' प्र ' [ प्रतिरूप मया से ] प्राण है, एवं [ अर्वा गतिसूचक ] ' या ' उदान है । [ ' प्र ' ' आ ' का सम्बन्ध करता हुआ ] होता [ यज्ञातिशयलक्षण भात्री यज्ञपुरुष में ] ' प्राणोदान ' हीं स्था-पित करता है । इसलिए भो ' ऐति प्रति ' पूर्वक अनुत्रचन करता है || ५ || जिसलिए कि ' मा- प्र'- पूर्वक अनुवचन करता है -- [ उसकी तीसरी उपपत्ति बतलाते हैं ] । [ सिच्यमान रेत क्योंकि सिचन करने वाले से पराग्गति रखता है, इस सादृश्य से ] ' प्र ' यह रेत का आधान है, [ सिक्तरंत गर्भाशय से हमारे अभिमुख आता हुआ सिवन करने वाले से अवगूगति रखता है; इस सादृश्य से ] ' या ' यह उत्पत्ति है । [ इस रेतः सेक, तथा प्रजोत्पत्ति - सम्पत्ति के आधान के लिए भी पति - प्रेत- पूर्वक अनुवचन किया जाता है । अपिच - [ तृणादिभक्षरणार्थ पशुओं का जङ्गल में जाना क्योंकि पराग्गति से सम्बन्ध रखता है, इस सादृश्य से ] ' प्र ' यह पशुगमन-स्थानीय है । एवं [ जोकि सांयकाल पशुओं का लौट आना अवगूगति से सम्बन्ध रखता है, इस सादृश्य से ] ' आ ' यह पशुओं का लौटना है । [ इस पशुसमृद्धि के प्रधान के लिए भी एति - प्रति- पूर्वक अनुवचन किया जाता है । इसप्रकार ' एति - प्रति ' के सम्बन्ध में चार उप-पत्तियाँ बतलाकर अन्त में एति प्रतिरूपा गायत्री से उत्पन्न सम्पूर्ण विश्व में - एति - प्रति भाव ११६२
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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड , व्यष्टिरूप [ आदान- विसर्गभाव ] की व्याप्ति बतलाती हुई श्रुति कहती युक्त है ] हैं - सभी । [ इस पड़ार्थ सर्वसामान्य - समष्टि - सम्पत्ति-से उभयथा - [ आदान ] - प्र - [ विसर्ग ] भावों से ही पूर्वक अनुवचन करता है || ६ || आदानबिसर्गत्मिका कर्म्मसम्पत्ति के लिए ही ] एति - प्रति । दूसरे शब्दों [ अनुबन के सम्बन्ध में जो कुछ विशेषताएँ पद्धति बतलानीं - प्रकरण थीं, बतलादीं आरम्भ गई होता है । पद्धत्ति-में अनुवचनानुभक्त उपपत्ति- प्रकरण समाप्त हुआ । श्रब के सम्बन्ध में कुछ विशेष बातें [ ग्रन्था-प्रकरण आरम्भ करें, इस से पहिले सामिधेनी - मन्त्रपाठ नुगत ] लक्ष्य में ले श्रानीं चाहिएँ – प्रकृत ब्राह्मण की सातवीं कण्डिका से श्रारम्भ कर ४० वीं कण्डिका पर्यन्त [ ब्राह्मण समाप्ति पर्यन्त ] जिन सामिधेनी - मन्त्रों की व्याख्या हुई है, वे सामधेनीमन्त्र तैत्तिरीयब्राह्मण में
निम्नलिखित रूप से पठित है-१ - प्र वो वाजा अभिद्यवो हविष्मन्तो घृताच्या ।
देवाजिगातु सुम्नुयुः ॥
- ऋक्सं ० ३।२७ | १ |
२- अग्न श्रायाहि वीतये गृणानो हव्यदातये ।
न होता सत्सि बर्हिषि ॥
-ॠकसं ० ६।१६।१० ।
३ - तं त्वा समिद्भिरङ्गिरो घृतेन वर्द्धयामसि ।
बृहच्छोचा यविष्ठ्य ॥
-ऋक्सं ० ६।१६।११ ।
४- स नः पृथुः श्रवाय्यमच्छा देव विवाससि ।
बृहदग्ने सुवीर्य्यम् ॥
- ऋक सं ० ६ । १६।१२ । ५ - ईडेन्यो नमस्यस्तिरस्तमांसि दर्शतः । समग्निरिध्यते वृषा -ऋक्सं ० ३।२७ / १३ ।
६ -- वषो अग्निः समिध्यते अश्वो न देववाहनः ।
र्तं हविष्मन्त ईडते ॥
-ऋक्रूसं ० ३।२७।१४ । ११६३
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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण ७ -- वृषणं त्वा वयं वृपन - वृषाणः समिधीमहि । अग्दीद्यतं बृहत् । -ऋक्सं ० ३।२७।१५ ।
-- अग्नि दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् ।
श्रस्य यज्ञस्य सुक्रतुम् ॥
-ऋक्सं ० १।१२।१ |
६ समिध्यमानो अध्वरे अग्निः पाचक ईडय: ।
शोचिष्केशस्तमीमहे ॥
- ऋकू ० ३१२७१४ |
१०- समिद्धो अग्न आहुत देवान् यस्त्रिध्वर ।
त्वं हि हव्यवासि ॥
- ऋक्सं ० ५ | २८ | ५ |
११ - श्राजुहोत -- * दुवस्यनाग्नि प्रयत्यध्वरे ।
वृणीध्वं हव्यवाहनम् ॥
- ऋकसं ० ५ | २८ || ( तै ० ना ० ३।५।२ । ) शतपथब्राह्मण उक्त ११ सामिधेनी- मन्त्रों से हो अग्निसमिन्धनकर्म किया जाता है । प्रस्तुत शतपथ-" ब्राह्मण यद्यपि प्रचलित शुक्लयजुः संहिता की क्रमिक व्याख्या करता हुआ इसी का ब्राह्मण माना जाता है, परन्तु आश्चर्य है कि, उक्त ग्यारह मन्त्रों में से यजुः संहिता में केवल " तं वा समिद्भिः ” ( यजुःसं ०३।३ ) यह एक ही मन्त्र उपलब्ध होता है । शेष १० मन्त्र यजुः संहिता में नहीं हैं । इसीप्रकार आगे जाकर जिन मन्त्रों का निगदानुवचन, आर्षेयानुवचन, तथा निचित्पाठ - कम्मों में उपयोग हुआ हैं, वे निम्न लिखित मन्त्र भी यजुः संहिता में अनुपलब्ध हैं । प्रत्येक शाखा का एक ब्राह्मण, एक आरण्यक, तथा एक उपनिषत होता है । बहुत सम्भव है -- प्रथम तो प्रस्तुत शतपथ ब्राह्मण माध्यन्दिनीशाखा का न हो, अथवा प्रचलित यजुः संहिता माध्यन्दिनीशाखा की न हो । अवश्य ही दोनों में से एक पक्ष मीमांस्य है । अन्यथा जो मन्त्र स्वयं ब्राह्मणग्रन्थ में पठित हैं, उन का यजुः संहिता में उपलब्ध न होना कोई अर्थ नहीं रखता । अनुपलब्ध शेष मन्त्र ये हैं-- " वषणः " इति ऋक्संहितायाम् । ८ ** - " आजुहोता " इति ऋक्संहितायाम् । ११६४
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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड " अग्ने महाँ असि ब्राह्मण भारत, ( मामी ) देवेद्रो मन्त्रि ऋषिष्टतो विप्रानुमदितः कविशस्तोत्रह्मशंसितो घृतवाहन, प्रणीर्यज्ञानां रथीरध्वराणाम् । अतू होता तूर्णिर्हव्यबाट । आस्पात्रं जुहूर्देशना चमसो देवपानः । श्रराँ इवाग्ने नेमिर्देवास्त्वं परिभूरसि || वह देवान् यजमानाय अग्निम'न आवह, सोमपावह, अरिमावह, प्रजापतिमावह, शोषोमावावह, इन्द्राग्नी वह, इन्द्रभा वह महेन्द्रमावह, देवाँ भाज्यां वह अग्निहोत्रा यावह, स्त्रं महिमानमावह, आचाग्ने देवान् वह, सुयजा च यज जातवेदः ” । ( तै ० ना ० ३ का ५ प्र ० ) उक्त ११ सामिधेनी- मन्त्रों में से शतपथ में तो सातवें मन्त्र का ' वृषणं त्वा वयं वृषन्-वृषणः - समिधीमहि " इसप्रकार ह्रस्वान्त पाठ है, एवं तै ० ब्रा ० में " वृषणः ' के स्थान में [ ऋकसंहितान्रत् ] ‘ वृषाणः ' पाठ हैं । एत्रमेत्र आगे की निगदादि मन्त्रसमणि के अन्त के-" श्राचाग्ने देवान् वह, सुयजा च यज जातवेद: " इस तैत्तिरीय पाठ के शान में शथपथ में-" याच वह जातवेदः सुयजा च यज " यही पाठ हैं । इसके अतिक्ति ११ में मन्त्र में तै ० ब्रा ॰ के ' श्राजुहोत ' के स्थान में [ ऋक संहितात ] ' आजुहोता ' यह पाठ है । इन सब मन्त्रों का विशद वैज्ञानिक विवेचन आगे के विवेचना- प्रकरण में किया जायगा । प्रकृत मूलानुबाद - प्रकरण में केवल पद्धति ही बतला दी जाती है । ] वह होता [ सर्वप्रथम ] प्र वो वाजा अभिद्यव: ' [ इत्यादि ] इस सामिधेनी ऋचा का अनुवचन करता है । यह अनुवचनकर्म्म ( मन्त्रोपात्त ' प्र ' के सम्बन्ध से परागुगतिरूप ' प्र ' इस भाव का संग्राहक हैं | ( अनन्तर ) ' अग्रायाहि वीतये ' ( इत्यादि ) इस सामिधेनी ऋचा का अनुबचन करता है | यह अनुत्रचनकर्म्म [ मन्त्रोपात्त ' आयाहि ' के सम्बन्ध से अग्गतिरूप ] ' आ ' इस भाव का संग्राहक है । [ दोनों मन्त्रों के प्र- श्रायाहि पदों से यह यज्ञ यज्ञकर्मानुगता आदान - बिसर्गात्मिका स्वाभाविकी सम्पत्ति से युक्त होजाता है, यही तात्पर्य है ] || ७ || क्योंकि ' आयाहि ' ' वीतये ' यह वाक्य स्वर्गस्थ देवताओं की अपेक्षा से पराग्गति का सूचक बन रहा है, अतएव यह भी ' प्र ' भाव का ही समर्थक माना जायगा, इस हेतु को लक्ष्य में रखते हुए ) कितने एक वैज्ञानिकों का कहना है कि, उक्त दोनों सामिधेनीमन्त्र ' प्र ' भाव को ही सम्पन्न करने वाले हैं | ( इनके उक्त हेतु को अवैज्ञानिक बतलाये हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ) –उन वैज्ञानिकों का ( दोनों को ' प्र ' भाव -परक बतलाना ) यह कथन विज्ञान - के ११६५.
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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीबार प्रथमकाराड अतिभाव ( विज्ञान के अजीर्णभाव ) का ही सूचक है । वस्तुतः ' प्र वो वाजा अभिद्यवः ' यह ' प्र ' भाव का ही, तथा ' अग्नऽश्रायाहि वीतये ' यह ' आ ' भाव का ही सूचक है । ( याज्ञवल्क्य का अभिप्राय यही है कि यज्ञ यजमान कर रहा है । सामिधेनी का अनुवचन यजमान के लिए होरहा है । इस यजमान की अपेक्षा से तो आयाहि ' ' अगति का ही ग्राहक बन रहा है । ऐसी स्थिति में ' आयाहि ' को प्राकृतिक नित्य यज्ञपरक मानना सर्वथा अवैज्ञानिक है | ) || 5 || ( १ ) - ( सातवीं कण्डिका में जिन मन्त्रों के अनुवचन का विधान हुआ है, उनके पढ़ों की व्याख्या करती हुई श्रुति कहती है ) - वह होता - प्र वो वाजा अभिद्यव: ' इस मन्त्र का अनु-वचन करता है | ( होता का ) यह अनुवचनकर्म्म ' प्र ' का सम्पादक बनता है । ' १ वाजा ' इस ( वाक्य का तात्पर्य यही है कि ) निश्चयेन अन्न का ही नाम ' बाजा है । इससे अन्न के सम्बन्ध ही कहा गया है । ' २ अभिद्यक: ' इस का अर्थ यही है कि ) अर्द्धमाम ( पक्ष ) ही का नाम है । इह्रीं के प्रति अनुवचन हुआ है । ' ३ हविष्मन्तः इस ( का अर्थ यही है कि ) पशु ही मन्त हैं । इह्रीं के प्रति श्रनुवचन हुआ है ॥६ ॥
( ' ४ घृताच्या ' इस का अर्थ है ). | __ “ पुराने समय में ( ह ) ‘ माथक ' नाम से प्रसिद्ध विदेघ ( विदेह ) राजा ने अपने मुख में वैश्वानर अग्नि को धारण कर लिया । इस राजा का रहूगरण का पुत्र, अतएव नाम से प्रसिद्ध गोतम ऋषि पुरोहित था । उस राजा ने गोतम ऋषि के बुलाने पर इसलिए उत्तर नहीं दिया कि, मेरे मुख से वैश्वानर अग्नि ( बाहिर ) न गिरजाय ॥ १० ॥
( जब सामान्य - लौकिक वाक्य से गोतम ऋषि विदेध [ विदेह के वाङ् मय अग्नि का संयम तोड़ने में समर्थ न होसके, तो उन्होंने अग्नि की स्तुति करते हुए अलौकिक ] ऋङमन्त्रों से [ मुख-१ – बाजयति बलयति ' इस निर्वचन से अन्न को वाज कहा गया है । २ – ' वस्तोः- द्यौर्भानु वासरम ' इत्यादि रूप से ' यु ' शब्द दिन बाचक है । ' द्य नू - दिवसान् - अभिगता: ’ इस निर्वचन से दिनो के अनुगत रहने वाले शुक्ल - कृष्ण पक्षों को अवश्य ही ' अभिद्यत्र: ' कहा जा सकता है । ३ -- क्षीर - दधि श्राज्यादि हवि के उत्पादक होने से ही पशुओं को ' हविष्मन्तः ' कहा गया है । ४ -- ‘ घृताच्या ' पद का मन्त्र में विशेष महत्त्व है । क्योंकि घृत ' तेजो नै आाज्यम ' के अनुसार तेजोलक्षण अग्नि का सजाता है । अतएव यही अग्निसमिन्धन का मुख्य कारण माना गया है । इस पद का एक ऐतिहासिक आख्यान के द्वारा महत्त्व प्रतिपादित हुआ है । ११६६
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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड स्थित अग्नि की स्तुति करते हुए ] बिदेव को बुलवाने का निश्चय किया । [ गोतम कहने लगे कि ] " वीतिहोत्रं त्वा वेद्यमन्तं समिधीमहि । अग्ने वहन्तमारे " ( हे करे! हे अग्ने! यज्ञसमृद्धि-द्ध - स्वरूप- समर्पक, अभिलषित - कलपूरक, कान्तियुत ऐसे आपका इस यज्ञ में मैं-इमकाष्ठ से समिन्धन कर रहा हूँ -यजुः सं ० २ | ४ | ] [ ऋक्सं ० ५ | २६ | ३ | ] इस मन्त्र से न की स्तुति कर अन्त में गोतम ने कहा - ' हे त्रिदेव! ' ॥ ११ ॥
विदेव ने कोई उत्तर नहीं दिया, [ मानो कुछ सुना ही नहीं । पुनः अग्नि को स्तुति के द्वारा प्रबल बनाते हुए गोतम ने यह मन्त्र बोला ] " उदग्ने शुकास्तव भ्राजन्त ईग्ते । तत्र ज्योतींष्य-र्चयः " [ ऋक् सं ० ८ ४८।१७ हे अग्ने! आपकी पवित्र निर्मल शुक्लवर्ण की चमकतीं हुई रश्मियाँ आपकी ज्योतियों ( तेजः पर्यो ) को प्रेरित ( समृद्ध ) कर रहे हैं ) [ इस प्रकार मन्त्रवाक से अग्नि की स्तुति कर प्लुतस्त्रर से, उच्चस्वर से गोतम ने पुनः विदेव का आह्वान करते हुए ] यह कहा - हे त्रिदेव ३! ॥ १२ ॥
राजा विदेध ने फिर भी कोई उत्तर नहीं दिया । ( अन्त में राहूगरण गोतम मुख से “ * तन्त्वा घृतस्नवीमहे " केवल यह मन्त्रभाग ही निकला था कि, बृत शब्द के उच्चारण से ( विदेध के मुख में प्रतिति ) वैश्वानर अग्नि प्रबल वेग से प्रज्ज्वलित होपड़ा । ( उस प्रज्ज्वलित अग्नि को ) अव विदेध मुख में न रख सके । ( उन का संयम टूट गया, फलतः ) वैश्वानर अग्नि उनके मुख से बाहर निकला पड़ा, और इस पृथिवी पर प्राप्त होगया ( गिर पड़ा ) ॥ १३ ॥
( जिस समय गोतम के मुख से निकले हुए ' घृत ' पद के वरण से विदेध का मुखस्थित वैश्वानर अग्नि प्रज्ज्वलित होकर बाहिर गिर पड़ा था ) उस बटना के समय त्रिदेव माथव सरस्वती ( एतन्नामक नदी ) के ही समीप थे । ( यहाँ प्रज्ज्वलित अग्नि भूमि पर गिरा ) यहीं से क्रमशः पूर्व की ओर वह अग्नि इस पृथिवी ( के आर्द्र भाग को ) जलाता ( सुखाता ) हुआ आगे बढ़ने लगा । आगे आगे जलभाग को जलाते हुए इस अग्नि के पीछे विदेघ माधव, और राहूगण गोतम क्रमशः आगे बढ़ने लगे । ( पूर्व की ओर वेग से बढ़ते हुए । उस वैश्वानर अग्नि ने ( मार्ग में पड़ने वालीं इतर सत्र क्षुद्र ) नदियों को सुखा डाला । उत्तगिरि से जो ' सदानीरा ' नाम की नदी निकलती है, केवल इसी को ( उस अग्नि ने ) नहीं सुखाया । क्योंकि इस नदी का * -तं त्वा घृतस्नवीमहे चित्रभानो स्व शम् । देवाँ आ वीतये वह ' ( ऋक् सं ० ५।२६।२ । ) । हे घृतोत्पन्न! हे विविध रश्मियुक्त अग्ने! स्वर्ग को पहिचानने वाले आप से हम प्रार्थना करते हैं कि, आप हविर्भक्षण के लिए ( हमारे यज्ञ में स्वर्गलोक से ) देवताओं को बुलानें । ११६७
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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण वैश्वानर अग्नि के द्वारा शोषण नहीं हुआ, श्रतएव यह सदानीरा ' अनतिदग्धा ' मानी गई । ( इसीलिए ) उस युग से ब्राह्मण लोग इस नदी को पार नहीं करते हैं । हेतु यही है कि, यह वैश्वानर अग्नि से अनदिग्धा है । ( इसे पार करना पतित होना समझा गया, यही तात्पर्य है ) ॥ १४ ॥
इस समय उस ( सदानीरा नदी ) के पूर्व देशों में बहुत से ब्राह्मण रहते हैं । वह ( भूभाग इस अग्निदहनकर्म से ) पहिले कृषि के ( खेती के ) सर्वथा अयोग्य था, और यज्ञादि फल - प्रदान के अयोग्य था । क्योंकि इस से पहिले क्षेत्रस्वरूपसमर्पक, तथा यज्ञादिफलयोग्यता-धावक ) वैश्वानर अग्नि से यह भूभाग अनास्त्रादित ( अनुपभुक्त - संस्पृष्ट ) ही था || १५ || ( परन्तु वैश्वानर अग्नि के अनुग्रह से ) आज वही भूप्रदेश एक उर्जर ( उपजाऊ ) भुप्रदेश बन रहा है | ( एक तो स्वयं विदेध के मुखस्थित वैश्वानर अग्नि से यहाँ का भूभाग विशुद्ध--परिष्कृत -- निवास - योग्य होगया, दूसरे ) वहाँ के निवासी याज्ञिक ब्राह्मणोंने यज्ञानुष्ठानों से अनि द्वारा इसे बुक कर परिष्कृत कर दिया । ( अर्थात् यज्ञानियों के द्वारा याज्ञिकोंने इस स्थान को अनि का स्वाद दिला दिया ) वह सदानीरा नदी प्रचण्ड श्रीष्मकाल में भी एकरूप से प्रवाहित रहती है ( उसका जल कभी नहीं सूखता, श्रपितु सदा समानरूष से प्रवाहित रहता है ) । साथ ही यह ठँढी ( भी ) रहती है । कारण यही है कि, यह नदी ( पूर्वकथनानुसार जलशोषक, तथा ताप प्रवर्त्तक ) वैश्वानर अग्नि से अनतिदग्धा है ॥ १६ ॥
( वैश्वानर अग्नि से भूप्रदेश के आई भाग को उत्तरोत्तर सुखाते हुए दोनों जब सदानीरा के समीप पहुँचे, तो ) मात्र विदेव ने राहूगण गोतम से परामर्श किया कि, ( बतलाओ ) मैं कहाँ रहूँ ( काहाँ अपना राज्यतन्त्र स्थापित करूँ )? । गोतमने उत्तर दिया कि, इस सदानीरा से पूर्वपूर्व का जो भूप्रदेश है, ( वही आप के योग्य है ) । यही कारण है कि, आज भी यही सदानीरा नदी कोसल विदेह - राजाओं की सीमा मानी जाती है । ये कोसल विदेह ( माथव विदेघ के द्वारा राज्यतन्त्र स्थापित किए जाने से ) ' माथव ' नाम से ही प्रसिद्ध हैं ॥ १७ ॥
( प्रासङ्गिक चर्चा बतला कर आख्यान का प्रकृत ब्राह्मण प्रकरण से सम्बन्ध बतलाती हुई श्रुति कहती है कि, ' तं त्वा घृतस्नवीमहे ' इस मन्त्रभाग के बोलने से जब विदेध का बाक संयम टूट गया, तो ) राहूगण गोतम ने प्रश्न किया कि, आप का अनेक बार आह्वान करने पर भी आपने क्यों नहीं प्रत्युत्तर दिया? । विदेध ने उत्तर दिया कि, उस समय मेरे मुख में नैश्वानर अग्नि प्रतिष्ठित था । ( बोलने से ) वैश्वानर अग्नि सुख से निकल न जाय, इस लिए मैंनें ( आपके आमन्त्रण का प्रत्युत्तर नहीं दिया ) ॥ १८ ॥
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