Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 901–910

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 901–910

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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथम काण्ड विदेघ के उक्त उत्तर पर पुनः गोल्म ने प्रश्न किया कि फिर आप के मुख से वैश्वानर अग्नि कैसे निकल पड़ा? ( जिसके निकलने से आप प्रत्युत्तर देने में समर्थ हो सके ) । ( त्रिदेवने उत्तर दिया कि ) जिस समय आपने ( ' तत्वा ' के अनन्तर ) ' घृतस्नवीमहे ' इस वाक्य का उच्च । -र किया, उसी समय ' घृत ' नाम के सम्बन्ध से मुखस्थित वैश्वानर अग्नि मुख में प्रज्ज्वलित होपड़ा । उस प्रबल अग्नि को मैं फिर मुख में धारण करने में समर्थ न होसका । फलत: वह बाहिर ठहरा || १६ || ( जिस प्रयोजन के लिए उक्त आख्यान बतलाया गया है, उम प्रयोजन का दिग्दर्शन कराती हुई श्रति कहती है ) – सो जो कि सामिधेनी मन्त्रों में घृत शब्द युक्त पद है, वह अग्नि-समिन्धन का ही कारण समझना चाहिए । इस घृताच्या ' पदोच्चारण से होता अग्नि का समिन्धन ही करता है, इसमें वीर्य का ही आधान । ( तात्पर्य यही हुआ कि-करता है ' प्र वो वाजा ' इत्यादि सामिधेनीमन्त्र का ' घृताच्या ' पद अग्निसमिन्धन का ही प्रवर्त्तक है ) ॥ २० ॥ -यही ' घृताच्या ' पद की उपपत्ति है । ( तदु घृताच्येति ) ।

प्रथम मन्त्र का शेष भाग है- ' देवाञ्जगाति सुम्नुयुः " । यह यजमान ही ( स्वर्गादि लक्षण सुख़ की कामना रखने से - ‘ मुम्नं सवं इच्छति ' इस निर्वचन से ) ' सुभ्नुयु ' है । यह सुम्नुयु यजमान ( यज्ञ के द्वारा ) इन देवताओं को वश में करने की इच्छा करता है । यह यजमान ही देवताओं को प्राप्त करना चाहता है । ( यजमान उहें प्राप्त करने में समर्थ बने ) यही व्यक्त करने के लिए ‘ देवाञ्जिगाति सुम्नुयुः ' यह कहा है ॥ यह प्रथमा सामिधेनी - ऋचा अग्निदेवतायुक्ता बनती हुई अनिरुक्ता ( नाम विशेष - ग्रहण -त्रिरहिता ) है | सर्व हो अनिरुक्त है । ( इसप्रकार सर्वात्मक अनिरुक्तभाव से युक्ता ) अग्निदेवता-मयी इस प्रथमा सामिधेनी ऋचा का अनुवचन करता हुआ होता सर्वसम्पत्ति को मूल में प्रतिष्ठित करता हुआ ही अनुवचनकर्म्म अरम्भ करता है ॥ २१ ॥ ॥

इति - प्रथममामिधेनी - मन्त्रव्याख्यानम् * - १ – प्रथमा सामिधेनी--9-“ प्र वो बाजा अभिद्यवो हविष्मतो घृताव्या । देवाजिगाति सुम्नुयुः ” ( १ ) | हे ऋतुदेवताओं! अन्न, अद्ध'मास, पशु, स्रुक्, आदि सब मिलकर आप यजमान की सुखैषापूर्ति के कारण बन रहे है । ( इस मन्त्र को अग्निपक्ष में भी लगाया जासकता है, जैसाकि पाठक विवेचना में देखेंगे ) | ११६६

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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण ( २ ) - ( प्रथम - सामिधेनी - ऋङ मन्त्र के अनुवचनान्तर क्रमप्राप्त ) ' अग्न आयाहि वीतये ० ' ( इत्यादि दूसरी ) इसका अनुवचन करता है । यह मन्त्र ' आ ' भाव का स्वरूप -- संग्रहाक है । ( मन्त्रगत ) ' वीतये ' पद का तात्पर्य यही है कि - ) पहिले ( त्रैलोक्य सृष्टि से पहिले ) पृथिवी, अन्तिक्षि, द्यौ, तीनों लोक परस्पर एक साथ मिले हुए से, एकरूप से ही थे ( अर्थात् ' इदमन्तरिक्षं, इयं द्यौः ' इत्यादि रूप से विभक्त न थे ) | ( उस समय ) द्युलोक हाथ से छूने योग्य जैसा ही था । [ समन्तिक होने से सभी समीपतम थे, यही वक्तव्य है ] ॥ २२ ॥

उन देवदेवताओं ने यह कामना की कि, हमारे लोक, [ किंवा हमारी सु - रुद्र आदित्यात्मिका गरण-समति के क्रमिक प्रतिष्ठान के लिए ये लोक ] किस उपाय से एक दूसरे से पर्याप्त दूर हों, एवं कैसे ये विस्तीर्ण | [ अर्थात कैसे तो एक के तीन विभक्त लोक हों, एवं कैसे प्रत्येक लोक बृहत बने ] [ अपनी इस कामना को सफल बनाने के लिए ] देवतानं ' वी - त - ये ' इन तीन अक्षरों से ही पृथक् - पृथक्, एवं वरीयान् कर दिया, [ तभी से ] ये तीनों ले. क [ परस्पर एक-दूसरे से, साथ ही हम से भी हैं, विदूर भी हैं, एवं वरीय भी हैं । इस प्रक्रिया से यह लोक विस्तीर्ण बन गया । उस यजमान के लिए विस्तीर्णा लोकसम्पत्ति प्रतिष्ठित होजाती है, ( जिस यजमान के यज्ञ में ] ' वीतये ' का उक्त रहस्य जानने वाला होता ' वीतये ' पद से युक्त ' अग्न आयाहि वीतये ० ' इत्यादि सामिवेनी - ऋक् का अनुवचन करना है । [ ' वीतये ' पद लोकप्रतिष्ठा का संग्राहक है, यही तात्पर्य है ] ॥ २३ ॥

" गृणानो हव्यदातये " मन्त्र के इस उत्तर भाग का तात्पर्य यही है कि, यजमान ही [ देवताओं के निमित्त हविर्दान देने से ] ' हव्यदाति ' है । ' यजमान के लिए प्रियमाण आप ', यहो ( इस मन्त्र भाग से ) कहा गया है । “ नि होता सरिस बर्हिषि " इस अन्तिम मन्त्रभाग का तात्पर्य यही है कि, अग्नि ही होता ( व्यवहनकर्त्ता, तथा देवताओं का ' आह्वानकर्ता ) है, यही ( पृथिवी ) लोक बांह ( अग्निगर्भित अबूरूप ) है । ( ' नि होता ० ' इत्यादि के द्वारा यह होता ) इसी लोक में अग्नि प्रतिष्ठित करता है । वह यह अग्नि इस लोक में प्रतिष्ठित है । यह ऋक् ( ऋग्भाग ) इसी [ पृथिवी ] लोक को लक्ष्य बनाकर उच्चरित हुई है । जिस यजमान का एवंवित होता इसका अनुवचन करता है, वह यजमान [ होता के इस रहस्य-

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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड मन्त्रभाग पृथिवी - लोक-ज्ञानानुगत अनुवचन से ] इसी [ पृथिवी ] लोक को जीत लेता है । प्रस्तुत सम्पत्ति का ही संग्राहक है, यही तात्पर्य है ॥ २४ ॥ः ॥

इति - द्वितीयसामिधेनी - मन्त्रव्याख्यानम् [ ३ ] - [ द्वितीय - सामिधेनी - ऋङ्मन्त्र के अनुवचनान्तर क्रमप्राप्त - " तन्त्वा समिद्भिरङ्गिरः ० " क्रमश व्याख्या करती हुई इत्यादि तिसरी सामिधेनी का अनुवचन करता है । इसी के वाक्यों की यही है कि, [ आधिदैविक श्रुति कहती है ] - ' तन्त्रा समिद्भिरङ्गिर: ' इस मन्त्रभाग का में तात्पर्य अङ्गिरा नामक प्राणीविध ऋषियों यज्ञ में ] अङ्गिरा नामक प्राणात्मक ऋषियोंनें [ तथा वेधयज्ञ यही है कि, अङ्गिरा नें ] समित्राओं स इस अग्नि का समिन्धन किया है । ' अङ्गिराः ' का अर्थ घृतेन वर्द्धयामसि " अग्नि है । त्यहाँ अङ्गिरा पद से अग्नि ही अभिप्रेत है ) । " घृतयुक्त पद ) है । इस इस मन्त्रभाग का तात्पर्य यही है कि, यह सामिधेनी पद ( अग्निसमिन्धक करता है । ( तात्पर्य यही है से अग्नि का समिन्धन ही करता है, इस में वीर्य का ही प्रधान कि, यह मन्त्रभाग अग्नि के समिन्धन का ही अनुग्राहक है ) ॥ २५ ॥

कि, यह अग्नि प्रज्ज्व-" बृहच्छोचा यविष्ठय " इस अन्तिम मन्त्रभाग का तात्पर्य यही तात्पर्य है यही है कि, ( नित्य लित होता हुआ स्वरूप से बड़ा बन कर तपता है । ' यविष्ठ्य ' का यह कहा गया है । ऋकू युवा बनता हुआ ) यह अग्नि ही यविष्ठ्य है, इसी लिए ' यविष्ठ्य ' वह ऋचा आग्नेयी ( ऋगूभाग ) इसी अन्तरिक्ष लोक को लक्ष्य बनाकर उच्चरित हुई है ही । है इसीलिए । जिस यजमान का एवं-होने के साथ साथ अनिरुक्ता है । यह अन्तरिक्षलोक अग्निरुक्त इस रहस्वज्ञानानुगत अनु-चिन् होता इस ऋचा का अनुवचन करता है, वह यजमान ( होता के + – २ – द्वितीया सामिधेनी-" अग्न आम हि वीतये गृरणानो हव्यदातये । नि होता सत्सि वर्हिपि " [ २ ] “ हे अग्ने! देवताओं को हविः प्रदान करने के लिए, स्वयमपि हविर्भक्षण के लिए स्तूयमान थाप इस यज्ञ में पधारिए । एवं होता बनकर इस दर्भासन पर विराजिए " । ११७१

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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपत्रामना वचन से ) इसी अन्तरिक्ष लोक पर विजय प्राप्त कर लेता | ( प्रस्तुत सामिधेनी - मन्त्र अन्तरि-लोक - सम्पत्ति का ही संग्राहक है, यही तात्पर्य है ) || २६ || || इति तृतीयसामिधेनी - मन्त्रव्याख्यानम् -३– ( ४ ) - ( तृतीय - सामिधेनी - ऋङ मन्त्र के अनुवचनान्तर क्रमप्राप्त " स नः पृथुः श्रवाय्यं ० " इत्यादि चौथी सामिधेनी का अनुवचन करता है । इसी की व्याख्या करती हुई श्रुति कहती है ) -" सनः पृथुश्रवाय्यम् " इस मन्त्रभाग का यही अर्थ है कि, ' वह द्युलोक ' ( इतर लोकों की अपेक्षा ) विस्तीर्ण है, फैला हुआ है, जिस लोक में कि देवता प्रतिष्ठित हैं । ( देवताओं के तत्र नित्राम करने से ही ) वह टालोक इतर लोकों की अपेक्षा ' श्रवाय्य ' ( श्रवण परम् १ रा में प्रशस्त, लाक - वेद में प्रशंसनीय ) है । ' अच्छा देव विवाससि ' इस मन्त्रभाग से यही कहा गया है कि, यह लोक हमें प्राप्त हो ॥ २७ ॥

III " बृहद ने सुवीर्यम् " उस अन्तिम मन्त्रभाग का तात्पर्य यही है कि, वह द्युलोक निश्च-बिस्ती है, जिसमें कि ये ( प्राण ) देवता प्रतिष्ठित हैं । यह लोक ( इन वीर्य्यशाली -ब्रह्म - क्षत्र - विड् - वीय्यं प्रवर्त्तक - देवताओं के निवास करने से ) सुत्रीय्यं ( शोभनत्री ) बन रहा है । यह चौथी ऋचा इसीद्य लोक को लक्ष्य में रखकर उच्चरित हुई है । जिस यजमान का एवंत्रित होता इस ऋचा का अनुत्रचन करता है, वह यजमान ( होता के इस रहस्यज्ञानानुगत अनुवचन से ) इसी लोक पर विजय प्राप्त कर लेता है । ( प्रस्तुत सामिधेनी मन्त्र लाकसम्पत्ति का ही संग्राहक है, यही तात्पर्य है ) ॥॥॥। इति चतुर्थमामिधेनी- मन्त्रव्याख्यानम् –४– * – तृतीया सामिधेनी- " तं त्या समिद्भिरङ्गिरो घृतेन बर्द्धयामसि । बृहच्छोचा यविष्ठ्य " इति । हे श्राङ्गरावशज अग्ने! यज्ञसम्बन्धी काष्ठ से तथा सस्कृत यजिय आाज्य से हम आपको प्रबृद्ध कर रहे हूँ । हे तरुणतम! आप बृहत् रूप से प्रदीप्त निए! X- ऋतुर्थी सामिधेनी- " स नः पृथुश्रवाय्यमच्छा देव विवाससि । बृहदग्ने सुत्रीम " । " हे प्रदीप्त अग्ने! आप विपुल, श्र णीय, मात्रावृद्ध, शोभन वीर्य्ययुक्त धन हमारे लिए प्रदान करें ” । ११७२

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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड ( ५ ) – ( चतुर्थ -- सामिधेनी - ऋङ्मन्त्र के अनुवचनान्तर ) बह होता ( क्रमप्राप्त ) -" ईडेन्यो नमस्यः ” इत्यादि पाँचवीं सामिधेनी का अनुवचन करता है । ( इसी के वाक्यों की क्रमशः व्याख्या करती हुई श्रुति कहती है ) - यह अग्नि निश्चयेन स्तुति करने योग्य है, एवं नमस्कार करने योग्य है | " तिरस्तमांसि दर्शतः " इस मन्त्रभाग का यही तात्पर्य है कि, यह अग्नि प्रज्ज्वलित होकर अन्धकारपुञ्ज का तिरस्कार करता हुआ ही दिखलाई देता है । " समग्नि रिध्यते वृषा " इस अन्तिम भाग का यही तात्पर्य है कि, यह अग्नि निश्चयेन प्रदीप्त रहता है, जो कि वृषा ( यज्ञफलवर्षक ) है ॥ * ॥ इति पञ्चमसामिधेनी - मन्त्रव्याख्यानम् ( ६ ) - ( पञ्चम- सामिधेनी - ऋङ मन्त्र के अनुवचनान्तर वह होता कमप्राप्त - - " " वृषो श्रग्निः समिध्यते ” इत्यादि पष्ठ सामिधेनी - ऋङ मन्त्र का अनुवचन करता है । इसी के बाक्यों की व्याख्या करती हुई श्रुति कहती है ) - " वृषो अग्निः समिध्यते " इस मन्त्रभाग का यही तात्पर्य्य है कि, यह अग्नि निश्चयेन ( सामिधेनी से ) प्रदीप्त होता है ॥ २६ ॥

" अश्वो न देव वाहनः " इस मन्त्रभाग का यही तात्पर्य है कि, यह अग्नि अश्व बन कर ही ( लोकस्थ ) देवताओं के लिए ( अग्नि में आहुत, यज्ञातिशयोत्पादक, अतएव ( यज्ञ ) ( नाम से प्रसिद्ध हविद्रव्य ) का वहन करता है । ( लोकभाषा में जहाँ ' न ' कार निषेधार्थक माना गया है, वहाँ ) ऋक् में ( मन्त्रात्मिका वैदिकी भाषा में पठित ) ' न ' कार ' ओम् ' ( स्वीकृति ) का वाचक है । इसीलिए ' अश्वो न देववाहनः ' यह कहा गया है ॥ ३ ॥

" तं हविष्मन्त ईडते " इस अन्तिम मन्त्रभाग का यही तात्पर्य है कि, ( चरुपुरोडाशादि हविद्रव्यों का सम्पादन करने से ) हविष्मन्त ( नाम से प्रसिद्ध ऋत्विग् यजमानादि ही इस * - पञ्चमी सामिधेनी- “ ईडेन्यो नमस्यस्तिरस्तमांसि दर्शतः । समग्निरिध्यते वृषा " । " हे अग्ने! आप स्तोतव्य हैं, नमस्व हैं, प्रदीप्त होकर तमोर।शि का तिरस्कार कर दिखलाई देने वाले हैं । आप प्रदीप्त हैं, यज्ञफलवर्धक है " । ११७३

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तृतीय- चतुर्थ श्रध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथम काण्ड अग्नि की ( उन इबियों को देवताओं में पहुचाने के लिए ) स्तुति करते हैं । इसीलिए-' तं हविष्मन्त ईडते ' यह कहा गया है || ३१ || * || इति षष्ठसामिधेनी मन्त्रव्याख्यानम् –६– ( ७ ) - ( षष्ठ - सामिधेनी - ऋङ मन्त्र के अनुवचनानन्तर वह होता क्रमप्राप्त - " वृपणं त्वा वयं वृपणः समिधीमहि ० " इत्यादि सातवीं सामिधेनी का अनुवचन करता है । इसी की व्याख्या करती हुई कहती है ) - ' वृपणं त्या वयं वृषन् वृषणः समिधीमहि ' इस मन्त्र भाग का यही तात्पर्य है कि, ऋत्विग्गण अवश्यमेव इस अग्नि को प्रदीप्त करते हैं । ' अपने दीद्यन्तं बृहत् ' इस अन्तिम मन्त्र भाग का यही तात्पर्य है कि, ( पूर्ण सामिवेनियों से ) प्रदीप्न यह अग्नि ( अ अधिक मात्रा से ) बडा, तथा अतिशयरूप से प्रदीप्त बन गया है ॥ ३२ ॥ ॥

इति सप्तमसामिधेनी - मन्त्रव्याख्यानम् --७--' ईडेन्यो नमस्यः ० ' - ' वृषो अग्नि समिध्यते ० ' - वृषणं त्वा वयं वृषन ० ' इन तीन मन्त्रों में ' वृषन् ' शब्द का सम्बन्ध है । अतएव तीनों की समप्रिरूप त्रिच को ' ' नृपण्वन्तत्रिच कहा गया है । इस वृपण्यवन्त चित्रका एक विशेष फल बतलाती हुई श्रुति कहती है ) वह होता ( नृपन शब्द तीन मन्त्रों का क्रमिक अनुवचन करता हुआ ) वृषण्वन्त त्रिच काही अनुवचन करता है । ये सब सामिवेनियाँ आग्नेयीं होतीं हैं ( यज्ञाग्नि के समिन्धन के लिए ही आग्नेयी सामिधेनियों सेअनुवचन किया है । परन्तु अग्नि जबतक इन्द्र को साथ नहीं लेलेते, तबतक इनका समिन्धन * - पष्ठी - सामिधेनी-" वृषो अग्निः समिध्यते श्वो न देववाहनः । तं हविष्मन्त ईडते " । " अश्व की भांति देवताओं के लिए हविर्वहन करने वाला यज्ञकलवर्धक अग्नि प्रदीप्त होरहा है । हविष्मन्त ऋत्विक ऐसे अग्नि की स्तुति कर रहे हैं " । हम - सप्तमी सामिधेनी-" वृपणं त्वा वयं वृषन् वृपणः समिधीमहि । अग्ने दीयन्तं बृहत् " । “ हे यज्ञकलवर्षक अग्ने! आहुतिवर्धक हम ऋत्विग्गण यज्ञाहुतिवर्ष आपको प्रदीप्त कर रहे हैं । ऐसे बृहद्रूप से प्रदीप्त अग्नि का बृहद्रूप से समन्वित कर रहें हैं " । ११७४

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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमका एड अपूर्ण रहता है । क्योंकि ) निश्वयेन इन्द्र ही यज्ञ के देवता ( पति हैं । साथ ही इन्द्र ही वृपा हैं । ( इसप्रकार वृषस्त्रन्त त्रिच के अनुवचन से ) सब आग्नेयी सामिधेनियाँ इन्द्रयुक्त भी बन जातीं हैं । इसी प्रयोजन के लिए वृषएवन्त त्रिच का अनुवचन करता है । ( अन्य आग्नेयी त्रिच रंअनुवचन न कर वृपन पढ़ से युक्त त्रिच से अनुवचन करने का यही प्रयोजन है कि, अग्नि-समिन्धन के साथ साथ यज्ञ में यज्ञपति इन्द्र का भी सम्बन्ध हो जाय, बही तात्पर्च्च है ) || ३३ || ( सप्तम मामिवेनी ऋङ्मन्त्र के अनुवचनानन्तर बह होता " अनि दृतं वृणीमहे ० ' " इत्यादि आठवीं सामिवेनों का अनुवचन करता है । इसी मन्त्र की व्याख्या करती हुई श्रुति कहती है कि ) ‘ “ अग्नि द्रुतं वृणीमहे ॰ " का वह होता अनुवचन करता है, इसका तात्पर्य यही हूँ कि -" एक बार ( प्रजापति की सन्तान होने से ) प्राजापत्य ( नाम से प्रसिद्ध ) देवता, और असुर दोनों परम्पर स्पर्द्धा करने लगे । स्पर्द्धा करते हुए इन दोनों के बीच में ( समझौता कराने के लिए ) गायत्री खड़ी हुई । ( उस समय ) मध्य में खड़ी होने वाली जो गायत्री थी, वही यह ( पृथिवी ही ) तो दोनों के बीच में खड़ी हुई ( थी ) । उन दोनोंन परस्पर यह सन्धा ( शर्त्त ) निश्चित की कि अपन दोनों में से जिन की ओर यह पृथिवी लौट आएगी, वे जीते हुए माने जायँगे, एवं ( इसके सम्बन्ध से वञ्चित ) दूसरे पराजित समझे जायँगे । ( यह सन्धा निश्चित कर ) उस पृथिवी को देवता, तथा असुर दोनों हीं अपनी अपनी ओर बुलाने का प्रयास करने लगे | दोनों नें उसके समीप अपने अपने दूत भेजे । ( इन में ) ' अन्न ' ही देवाताओं के दृत थे. एवं ' सुरक्षा ' नामक असुरों के दूत थे ' दोनों में से पृथिवी देवदूत अग्नि की ओर ही लॉट आई । " इसीलिए- ' अग्नि दूतं वृणीमहे ' यह कहा गया है । वास्तव में ( उक्त पुरावृत्त के अनु-मार ) अग्नि निश्चयेन देवताओं के दूत थे । मन्त्र का दूसरा भाग है - " होतारं विश्ववेदसम् " यह ॥ ३४ ॥

कितने एक याज्ञिक कहते हैं कि, ( ' होतारं विश्ववेदसम् ' के स्थान में ) ' होता यो विश्ववेदसः ' ऐसा मन्त्र बोलना चाहिए । ( कारण इस परिवर्तन का ये ग्राज्ञिक वह बतलाते हैं कि ) ' हम आत्मा को ' अरम् ' न कहैं । ( तात्पर्य यही है कि - ' होतारं विश्ववेदसं ' के ' होतारं ' पड़ में ' होता - अरं ' यह व्यवच्छेद भी बन रहा है । यह ' अ ' शब्द निवारणार्थक माना गया है । इस ' अर'भावना ' से फल यह निकलेगा कि, होता का इस यज्ञसंस्था से पृथक्करण होजायगा । इस आशङ्का से बचने का यही उपाय है कि, ' होतार ' के स्थान में ' होता यो विश्ववेदसः ' इस मन्त्ररूप का ऊड् कर लिया जाय ) " । ११७५.

पृष्ठ 908

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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीत्राह्मगा प्रथमकाण्ड ( इस मानुषकल्पानुगत मन्त्र- ऊह - पक्ष का आमूलचूड खण्डन करते हुए भगवान् याज्ञ-वल्क्य कहते हैं कि ) - होता को चाहिए कि वह वैसा होता यो विश्ववेदसः ', ऐसा ) कभी न बोले । ( अपनी कल्पना से शब्दों की यथेच्छ मनमानी ) उपपत्ति लगाते हुए जो याज्ञिक स्वतः-सिद्ध मन्त्रों के स्त्ररूप में परिवर्त्तन करते हुए यज्ञतिकर्त्तव्यता में यथेच्छ परिवर्तन करते रहते हैं में ( समृद्धि का विनाश ) ) वे यज्ञ मानुप्रभात्र का ही समावेश करते हैं । वह यज्ञ की ' व्यद्धि ' है, जो कि काल्पनिक मानुप्रभाव है । हम अपने यज्ञ में देवसमृद्धि के घातक मानुप्रभाव का समावेश न कर बैठे, इसलिए प्रत्येक दशा में यह आवश्यक है कि, जैसा ऋचा से ( सिद्धमन्त्र से ) कहा गया है, वैसा ही होतार ' विश्ववेदसम् ' इसी रूप से होता को अनुवचन करना चाहिए । “ अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम् " इस मन्त्रभाग का यही नात्पर्य है कि, यही इस यज्ञ का सुकतु ( उत्तमरूप से यज्ञकर्म का सम्पादन करने वाला ) है, जो कि अग्नि है । इसीलिए ' अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम् ' कहा गया है । ( मन्त्रयाख्यान बतला कर पूर्वोक्त आख्यान का उप-संहार करती हुई श्रुति कहती है कि, देवदूत अग्नि के गमन अ ) वह पृथिवी देवताओं की ओर ही लौट आइ । परिणामत: ( निश्चित सन्धा के अनुसार ) देवता जीत गए, एवं असुर परा-जित होगए । वह यजमान अपने आत्मा से ( शत्रुपक्ष की प्रतिस्पर्द्धा में ) विजय - लाभ करता है, एवं उसके शत्रु पराजित होजाते हैं, जिस यमान का एवंवित होता ' अग्नि दूतं ० ' इत्यादि सामि-धेनी का अनुवचन करता है । ( शत्रुपराजय, एयं यजमान का विजय भी इस सामिधेनी-अनुवचन का फल है, यही तात्पर्य है ) ॥ ३५ ॥ +

इति ष्टमसामिधेनी - मन्त्रव्याख्यानम् ८ I ( मूलतः सामिधेनी मन्त्र ११ बतलाए गए हैं । इनमें से ' प्र वो वाजा अभिद्यव: ' इस प्रथम मन्त्र का, तथा “ आजुहोता दुवस्यत ० " इत्यादि ग्यारहवें मन्त्र का तीन तीन बार अनु-+ श्रष्टमी सामिधेनी-" अग्नि दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् । अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम " “ मैं उस देवदृत ग्रग्नि का वरण कर रहा हूँ, जो देवताओं का आह्वान करने से ' होता ' नाम से, विश्वसम्पत्ति के परिज्ञान से ' विश्ववेदसः ' नाम से, एवं इस यज्ञकर्म का श्रं ष्ठ सञ्चालक होने से ' सुक्रतु ' नाम से प्रसिद्ध " है । ११७६

पृष्ठ 909

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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथम काण्ड वचनों की वृद्धि से ११ के स्थान में १५ अनुवचन होजाते हैं । यही अनुवचन के सम्बन्ध में एक पक्ष है । क्रमप्राप्त संख्या के अनुसार ' अग्नि दुतं वृणीमहे ० ' इत्यादि मन्त्र आठवाँ पड़ता है 1 प्रथम - मन्त्र के त्रिर।वृत्त उच्चारण से यद्यपि ' अग्नि दूतं वृणीमहे ० ' मन्त्र १० वीं संख्या पर आकर ठहरता है, थापि क्योंकि उस एक ही मन्त्र का त्रिरावर्त्तन है, अतः ' अग्नि दूतं ० ' की अष्टमी संख्या की मौलिकता सुरक्षित रहजाती है, जिसका कि सुरक्षित रहना श्रावश्यक है । दूसरा पक्ष सप्तदृश - संख्या से सम्बन्ध रखता है । दर्शपूर्णमाम में १७ सामिधेनियों का श्रनवचन करना चाहिए ' इस पक्षान्तर में २ संख्याओं की पूर्ति के लिए ११ मौलिक मन्त्रों से प्रतिरिक्त जिन दो मन्त्रों का इन ग्यारहों में समावेश किया जाता है, उन्हें " उपरिष्टात्-दधाति " इस निर्वचन से - " धाय्या " कहा जाता है । इन ' धाय्या ' नामक ऋचाओं का आधान ( समावेश ) ११ में से कहाँ करना?, यह विचार प्रस्तुत है । सिद्धान्ततः ' अग्नि दूतं वृणीमहे ० ' इस मन्त्र के अनुन्तर ही इन का अनुवचन होता है । तभी इस मन्त्र का अमत्त्व सुरक्षित रह् सकता है । इसी सिद्धान्त पक्ष को दृद्धि में रखती हुई, ' बाय्या ऋचाओं ' के उत्तर में आधान को लक्ष्य बनाती हुई श्रुति कहती है कि ) -‘ आग्न द्रुतं वृणीमहे ० ' इत्यादि ऋवा का अमीरूप से ( आठवी मान कर ' वृपणं त्वा वयं न् ' इत्यादि सातवीं सामिधेनी के अनन्तर ही ) अनुवचन करना चाहिए | क्योंकि यह सामिधेनी ऋचा ( ११ संख्या में से आठवीं संख्या पर पड़ती हुई ) निदानविधि से गायत्री है । गायत्री अक्षरा है, ( गायत्र अग्नि का बन्द है, यहाँ इस सामिधेनी - कर्म से होता को अग्नि का समिन्धन करना है । ऐसी स्थिति में जब निदानमर्यादा से यह ऋचा क्रमद्वारा आठवीं बनती हुई गायत्रमम्पत्ति से स्वतः युक्त होरही है, ' अवश्य ही इसे ) आठवीं बनाकर ही इस का अनु-चचना करना चाहिए । तात्पर्य यही है कि, गायत्राग्नि - सम्पत्ति प्राप्त्यर्थ - ' अग्नि दूतं ० ' इत्यादि सामिवेनी का सातवीं सामिधेनी के अनन्तर ही अनुवचन होना चाहिए ॥ ३३ ॥

( अग्नि दूतं ० ' की संख्यानुवचनगत गायत्रसम्पस में जो आपत्तिजनक पक्ष है, उनको बतलाकर, अन्त में उक्त सिद्धान्त का ही समर्थन करती हुई श्रुति कहती है कि ) -कितने एक याज्ञिक ' अग्नि दूतं मृणीमहे ० ' इस आठवीं ऋचा के पहिले ( तथा ' वषणं त्वा वृषन् ० ' इस सातवीं ऋचा के आगे ‘ पृथु पाजाः ० ' - तं संबाधः ० " इन ) दोनों धारया ऋचाओं का * - “ पृथुपाजा अमृत्यों घृतनिर्णिक् स्वाहुतः । अग्निर्यज्ञस्य हव्यवाट् ” ( ऋक्सं ० ३।२७।५ ) । “ तं संबाधो यतस्रुच इत्था धिया यज्ञत्रन्तः । चकुरग्निमूतये " ( ऋकसं ० ३।२७।६ ) । ११७७

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 910 का मूल पृष्ठ
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तृतीय- चतुर्थ श्रध्याय सामिधेनीबा शतपयत्राह्मण का स्थापन करते हैं । साथ ह । " अन्न का ही नाम ' धाय्या ' है " [ अर्थात " धाय्या ऋचाएँ ' अन्नस्थानीया हैं, क्योंकि अन्न का भी मुख में बाहिर से प्रधान होता है, एवं इन दोनों ऋचाओं का भी अन्नवन बाहिर से इन ११ ऋचाओं में धान होता है । इसी सादृश्य से दोनों धाय्या-ऋचाओं को अन्नस्थानीय कहा जसकता है । उधर आठवीं ऋचा गायत्रमम्पत्ति मे युक्त रहतीं हुई गायत्री छन्दस्क गायत्र - अन्नादग्नि स्थानीया है, अन्नादाग्नि की मुखग्थानीया है । ऐसी स्थिति में इस मुखस्थानीया आठवीं ऋचा से पहिले धाय्या का स्थापन करते हुए हम ] मुख भाग से ही [ अन्नादिाग्नि में ] अन्न का आधान करते हैं, " यह कहते हैं । अर्थात् घुमी से पहिले वाय्या-अनुवचन की वे याज्ञिक उक्त उपपत्ति बतलाते हैं ] । परन्तु होता को चाहिए कि, वह ऐसा कभी न करे । उस होता के लिए वह गायत्री गायत्र-सम्पत्तिसंग्रह में असमर्थ रह जाता है, जो होता इससे पहिले धाय्या ऋचाओं का स्थापन करता है । उस दशा में ‘ अग्नि दृतं वृणीमहे ० ' इत्यादि ऋचा दशमी तथा एकादशी बन जाती है । अर्थात आठवीं से पहिले दोनों के आधान से आठवीं तो दशमी बन जाती है, एक १० वीं ( ' समिध्यमानोऽध्वरे ० ' यह ) एकादशमी बन जाती है ) । ( तात्पर्य यही है कि, जिस अम - संख्यानुगता गायत्रसम्पत्ति के सम्बन्ध से वे याज्ञिक इसे अन्ना मानते हुए अन्न रूप से इससे पहिले धाय्या - ऋचाओं का आधान करना चाहते हैं, उनके मत से तो आठवीं आठवीं न रहकर जब दशमी ही बन जाती है, तो उनकी अन्नानानुगता उपपत्ति भी व्यर्थ होजाती साथ ही आठवीं को उ रखने से यज्ञ में जो गायत्रसम्पत्ति मिलती है, उससे भी वे बञ्चित रह जाते हैं ) उसी यजमान के लिए यह आठवीं ऋचा अनवक्लृप्ता ( गायत्रसम्पत्तिप्रदात्री ) बनती है, जिस यजमान के ( यज्ञ में ) होता इसे अष्मी बनाकर अनुवचन करता है । इसलिए ( ' अग्निं दुतं ० ' ० ' के गायत्र भात्र को सुरक्षित रखने के लिए ) इससे आगे समिध्यमानो अध्वरे ० ' - " समिद्धो अग्न आहुत ० " इन ६ वीं, १० वीं ऋचाओं के मध्य में ही दोनों धाय्या-ऋचाओं का स्थापन करना चाहिए || ३७ || ( अष्टम- सामिधेनी- ऋङ मन्त्र के अनुवचनानन्तर वह होता क्रमप्राप्त " समिध्यमानो अध्वरे ० " इत्यादि नवम - सामिधेनी - मन्त्र वा अनुवचन करता है । इसी की व्याख्या करती हुई श्रति कहती है ) - समिध्यमानो अध्वरे " इस मन्त्रभाग का यही तात्पर्य है कि, यज्ञ ही निश्च-येन अध्वर है । ( प्रकृत मन्त्रभाग के द्वारा ) ' हे अग्ने! आप यज्ञ में प्रदीप्त हैं ', यही कहा ११७८