Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 911–920
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 911–920
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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामि बेनीबार प्रथमकाण्ड गया है । " अग्निः पात्रक ईड्यः " इस मन्त्र भाग का यही तात्पर्य है कि, ' यह अग्नि निश्च-येन ( अपने दाहक तेजोधर्म से दूषित परमाणुओं का नाशक बनता हुआ ) पात्रक है, एवं ( प्राणीमात्र के उपयोग में आता हुआ ) यह अग्नि निश्चयेन ( प्राणीमात्र से ) स्तुत्य है । " शोचिष्केष तमीमहे " इस अन्तिम मन्त्रभाग का यही तात्पर्य हैं कि, ( सामि-धेनी ) प्रदीप्त इस अग्नि के केश ( स्थानीय रश्मियाँ ) प्रज्ज्वलित से रहते हैं || || इति - नवमसामिधेनी- मन्त्रव्याख्नम् -ह-( १० ) – ( नत्र न- सामिधेनीमन्त्र के अनुवचनानन्तर यह होता क्रमप्राप्त “ समिद्धो अग्न आहुत ० " इत्यादि दशम - मामिधेनीमन्त्र का अनुवचन करता है । श्रुति क्रमप्राप्त उसी की व्या-ख्या करती है ) —— समिद्धो अन्न आहुत " इति । ( इस अनुवचनकर्म से पहिले होने वाले एक विशेषकर्म की प्रासङ्गिक इति कर्त्तव्यता बतलाती हुई श्रुति कहती है कि ) - इस दशमी - सामि -नी के अनुवचन से पहिले पहिले अग्निसमिन्धनार्थ गृहीत सम्पूर्ण दध्मकाष्ठ, अनुयाजार्थ केवल एक समिधा के अतिरिक्त अग्नि में डाल देना चाहिए । ( इस अनुवचन से पहिले पहिले ही क्यों सर्वेध्मकाष्ठ का अभ्याधान आवश्यक माना गया?, इसका समाधान करती हुई श्रति कहती है कि ) इस ' समिद्धो अग्न आहुत: ' रूप अनुवचन कर्म्म से होता अग्निसमिन्धन कर्म समाप्त कर लेता है तभी तो ' समिद्धो न श्रहुतः ' कहना अर्थ बनता है । अर्थात जिस अग्निसमिन्धनकर्म्म के लिए इध्मकाष्ठ का ग्रहण होता है, वह कर्म इससे पहिले पहिले समाप्त है । फलतः अब इध्म बचाना निरर्थक बन जाता है ) । अनुराजार्थ एक इध्म के अतिरिक्त यदि हम बच रहता है, तो वह अतिरिक्त ( यज्ञकर्म से अतिरिक्त बचा हुआ अधिक ) कहलाता है । जो यज्ञ का अतिरिक्त ( उपयोग से बचा हुआ - उबरा हुआ ) भाग है, वह यज्ञकर्त्ता यजमान के कृत्रिम, तथा सहजशत्रु की समृद्धि का ही कारण बनता है । इसलिए इससे पूर्व पूर्व अनुयाजार्थ क समिध को छोड़कर शेष बचे सम्पूर्ण इध्मकाष्ठ को अग्नि में हीं डाल देना चाहिए || ३८ || X —नवमीसामिधेनी — “ समिध्यमानो अध्वरे अग्निः पावक ईड्यः । शोचि केशस्तमी -महे " । “ इस यज्ञ में सामिधेनियों से समिद्ध बनता हुआ अग्नि पावक है, स्तुत्य है । प्रज्ज्वलित केश ( रश्मि ) वाले ऐसे अग्नि की हम स्तुति कर रहे हैं । ११७६
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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीबाह्मण शतपथब्राह्मण " देवान् यज्ञिस्त्रध्वर " इस मन्त्रभाग का यही तात्पर्य है कि, अध्वर यज्ञ का ही नाम है, ( प्रकृतमन्त्र भाग से ) " हे सुयज्ञिय आप देवताओं का यजन कीजिए " यही कहा गया है । " त्वं हि हव्यवाडसि " इस अन्तिम मन्त्र भाग का यही तात्पर्य है कि, ' यही अग्नि ( देव-ताओं के लिए द्य ुलोक में पृथिवी से हविहन करने के कारण ) हव्यवाट् कहलाए हैं । इसीलिए त्वं हि हव्यवाडमि ' यह कहा गया है ॥ ॥ इति -- दशमसामिधेनी - मन्त्रव्याख्यानम् -१०-( ११ ) - ( दशम - सामिधेनी - मन्त्र के अनुवचनानन्तर वह होता क्रमशान " श्राजुहोता दुवस्यत ० " इत्यादि एकादश सामिवेनीमन्त्र का अनुवचन करता है । इसी की व्याख्या करती हुई श्रुति कहती है – “ श्राजुहोता दुवस्यताग्मि प्रयत्यध्वरे । वृणीध्वं हव्यवाहनम् ' इस सामि-धेनी - ऋचा से अग्नि को ( स्वकम्मप्रवृत्ति के लिए ) प्रेरित ही ( नियुक्त ही ) करता है । ' अजुहोता दुत्र यत ' इस मन्त्रभाव से ) हे ऋचिजा! हवन कीजिए, देवताओं का यजन कीजिए, जिस कम्मं के लिए, जिस कामना के लिए अग्नि को होता ने समिद्ध किया है, वह कीजिए " यही कहा है । " अग्नि प्रयत्यध्वरे " इस मन्त्रभाग का यही है कि, अध्वर यह यज्ञ का नामान्तर है । ( प्रकृत मन्त्र भाग से ) " यज्ञकर्म के आरम्भ होने पर अग्नि को यही कहा गया है । " वृणीध्वं हव्यवाहनम् " इस अन्तिम मन्त्रभाग का तात्परन्व यही है कि, यह जो अग्नि है, वही हव्यवाहन है । इसलिए ' वृणीध्वं हव्यवाहनम् ' यह कहा गया है || ३६ ||||| इति एकादशमामिधेनी मन्त्रव्याख्यानम् * -दशमी सामिधेनी--99-" समिद्धो अग्न आहुत देवान् यज्ञश्वध्वर । त्वं हि हव्यवाडसि " ' ममिवकाष्ठ से युक्त अग्नि समिद्ध होगया है । हे सुयज्ञिय यज्ञाग्ने । आप देवताओं का यजन कीजिए । आप निश्चयेन देवताओं के लिए हवि लेजाने वाले हैं । X - एकादशमी सामिधेनी-" आजुहोता दुवस्यतानि प्रयत्यध्वरे । वृणीध्वं हव्यवाहनम् " । हे ऋत्विजो? जिसकर्म के लिए अग्नि का समिन्धन किया था, वह आहुतियजनकम्मं आरम्भ करें ॥ यज्ञ प्रकान्त होगया । हव्यवाहन अग्नि का वरण करो । ११८०
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तृतीय - चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड ( “ समिध्यमानोअध्वरे ० ” – “ समिद्धो अग्न आहुत् " श्राजुहोता दुवस्यत ० 11 ' इन बीन मन्त्रों में ' अध्वर ' शब्द का सम्बन्ध है । अतएव तीनों मन्त्रों की समरूप इस त्रिच को ' अध्वरवन्त ' त्रिच कहा जाता है । जैसे पूर्व ' वृषण्वन्त ' त्रिच का एक विशेष फल बतलाया गया था वैसे ही इस अध्वरवन्त त्रिच का अग्निममित्रन्धन के अतिरिक्त एक विशेष फल बतलाती हुई श्रुति कहती है ) - वह होता ( ' अध्वर ' शब्द से युक्त तीन मन्त्रों का उच्चारण करता हुआ ) अध्वरवन्त त्रिच का ही अनुवचन करता है । [ इसका फल यही हैं कि ] - यज्ञ से यजन करते हुए देवताओं के ऊपर सहजशत्रु असुरोंने हिंसात्मक आक्रमण किया । [ परन्तु इस अध्वरन्त त्रिच के प्रभाव से ] हिसात्मक आक्रमण करते हुए भी असुर इनकी हिंसा करने में समर्थ न होसके । [ यही नहीं, अध्वरवन्त त्रिच के प्रभाव से ] ये उलटे परास्त हो गए । ( क्योंकि इस यज्ञाग्भिरूप यज्ञ ने देवताओं को हिंसा से बचा लिया ) श्रतएव यज्ञका नाम ' अध्वर ' होगया । उस यजमान के वे हिंसक शत्रु यजमान पर हिंसात्मक आक्रमण करते हुए स्वयमेत्र परास्त होजाते हैं, जिस यज्ञमान के ( यज्ञ में ) एवंत्रित होता अध्वरवन्त विच का अनुवचन करते हैं । ( शत्रु - आक्रमण निरोधपूर्वक शत्रु पराभव हो इस अवयवन्त त्रिवानुवचन का एक विशेष फल है, यही तात्पर्य है ) ॥ अपि च - [ श्रध्वर शब्द सोमयाग में रूढ है, जैसाकि - " सौम्ये अध्वरे " इत्यादि वचनों से स्पष्ट है । इस दर्शपूर्णमास में सामिवेन्यनुवचनकर्म में जब अध्वरयन्त त्रिच का सम्बन्ध करा दिया जाता है, तो ] सोग्य अध्वर से यजन कर यजमान जितना - जो फल प्राप्त करता है, वही फल इसे इस अध्वरशब्दयुक्त दशपूर्णमास से मिल जाता है । [ यही अध्वरवन्त त्रिच का एक दूसरा महत्त्वपूर्णफल है ] ॥ ४० ॥
इति सामधेन्यनुवचनम् चौथे अध्याय में पहिला, तथा तीसरे प्रपाठक में तीसरा ब्राह्मण समाप्त सामिधेनी-- ब्राह्मणानुगत द्वितीय ब्राह्मण अत्र उपरत ११८१
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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण. शतपथब्राह्मण _____ शतपथब्राह्मण प्रथमकाण्डानुगत चौथे अध्याय में दूसरा ब्राह्मण एवं तीसरे प्रपाठक में चौथा ब्राह्मण सामिधेनी - ब्राह्मणनुगत- तृताय ब्राह्मण ३ - * --यथ - निगदानुवचनम् देवा [ इस सामिवेनी अनुवचन के द्वारा ] अग्नि को * गुरुतम कार्य में नियुक्त किया जोकि होतृत्त्व में नियुक्त किया, जिस गुरुतनकार्य का स्वरूप ] ' हमारा यह हव्य [ पृथिवी से लोक में तत्रास्य देवताओं के लिए ] लेजाओ ' यह है । इसप्रकार उस अग्नि को ऐसे गुरुमका में नियुक्त कर देवताओंने इस [ श्रभि की प्रशंसा करना आरम्भ किया ] आप बीर्य्यवान् हैं | आप ( वास्तव में इस हविर्वहनकर्म में समर्थ हैं, इत्यादिरूप से इसमें बीर्य्य-धान करते हुए ही । जैसेकि [ लोकव्यवहार में ] मनुष्य अपनी जाति में से जिसे किसी गुरुतम कार्य में नियुक्त करते हैं, उसको बढ़ावा देते हैं कि, आप वीयंत्रान हैं, आप अमुक काम ' करने में समर्थ हैं, इसप्रकार उसमें वीर्य्याधान करते हुए ही । [ तात्पर्य यही है कि, लाक में गुरुतम कार्य में नियुक्त व्यक्ति का उत्साह बढ़ाने के लिए नियोक्ता लोग जैसे उसकी स्तुति किया करते हैं, उसे बढ़ावा देते हैं, ठीक वैसा ही यह ' निगदानुवचनकर्म्म ' है ] । वह ऋत्विक् सामिधेनी- अनुवचन के अनन्तर जिन मन्त्रों का उच्चारण करता है, उन से वह इस अग्नि को बढ़ावा ही देता है, [ और इस बढ़ावे से श्रमि में श्री का ही आधान करता है । [ यही निगदानुवचनकर्म की उपपत्ति है ] ॥ १ ॥
[ उपनि बतलाकर अब पद्धति बतलाती हुई श्रुति कहती है- ] ' अग्ने महाँ अमि ब्राह्मण भारत " इति । अग्नि ही ब्रह्म ( ब्राह्मणजाति ) है, इसी अभिप्राय से ' ब्राह्मण ' यह कहा गया है । ‘ भारत ' सम्बोधन का यही तात्पर्य है कि, यही अग्नि [ पृथिवीलोक से द्युलोक में तत्रस्थ ] देवाताओं के लिए हुत्रि का भरण करता है, इसलिए ' यह अनि भरत है ' यह प्रसिद्ध है । अपि च प्राणरूप [ वैश्वानराग्निप्राणरूप ] में परिणत होकर यही सम्पूर्ण पार्थिव प्रजा का * गुरुतम उत्तरदायित्त्वपूर्ण कार्य ( जिम्मेवरी का कार्थ्य ) ११८२
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तृतीय- चतुथ - अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड भरण पोषण करता है, इसलिए भी ' भारत ' यह कहा है । [ आधिदैविक देवजा का हवि के द्वारा, एवं आध्यात्मिक पार्थिव प्रजा का अन्न के द्वारा भरणपोषण करने के कारण अग्नि ' भारत ' कहलाया है, यही तात्पर्य है ] । याप महान हैं, वर्णों में ब्राह्मणवर्ग बनते हुए सर्वमूर्द्धन्य हैं, एवं त्रैलोक्यप्रजा के पालन में समर्थ बनते हुए भारत हैं, आप अवश्य ही इस हौत्रकर्म्म को पूरा करेंगे, यही इस निगदानुवचन का तात्पर्य है ) ॥ २ ॥
इति — निगदानुवचनम् 0000 अथ -- आर्षेयानुवचनम् ( उपमदात्मक स्तुतिकर्म्म में अनन्तर होतृकर्तृक ' आर्षेयक ' की इतिकर्त्तव्यता बतलाती हुई श्रुति कहती है ) वह होता उक्त स्तुतिकर्म के अनन्तर प्रार्षेय प्रवरण करता है । ( इस कर्म्म से यह ) होता ( इस यजमान को ) ऋषियों, तथा देवताओं के लिए ही निवेदित करता है, यह यजमान ( सचमुच ) बड़ा पुरुषार्थी हैं, जो इस यज्ञ ( जैसे महत्कर्म ) को प्राप्त कर सका, इसी भावना के लिए । ( अर्थात् यजमान को यशस्वी बनाने के लिए ही यह कर्म होता है ) इसलिए होता आर्षेय - प्रवरण करता है ॥ ३ ॥
पूर्व से इधर की ओर प्रवरण करता है । ( कारण बही है कि ) पूर्व की ओर से अक--प्रजाएँ उत्पन्न होतीं हैं । अपिच इस क्रम से होता पूर्व के ज्येष्ठ पुरुषों के महत्त्व को सुरक्षित रखता है । यह पिता पहिले है, अनन्तर पुत्र, है, अनन्तर पौत्र है, ( यही कम है ) । इसलिए ( भी ) पहिले से इस ओर के क्रम से ही वरण करता है ॥ ४ ॥
( जब कोई व्यक्ति किसी महत्कार्य में प्रवृत्त होता है, तो इस से उस के पूर्व वंशजों का कीर्त्तिविस्तार माना जाता है । इसी यशोविस्तार के लिए यजमान के पितामह, पिता, स्वयं का. इसी क्रम से -- ( अमावसौ ' रूप से आय प्रवरण होता है । इस प्रकरण का ऋषि से सम्बन्ध है | उस ऋपिपरम्परा से ही प्रत्ररण होता है, जैसा कि आगे आगे वाले ' उत्तराधारब्राह्मण ' में स्पष्ट होने वाला है । ) इति – आर्षेयानुवचनम् ११८३
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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण अथ - निवित्पाठः शतपथब्राह्म! आर्पेय कह कर वह होता ' देवेभ्यो मन्विद्ध ० ' इत्यादि रूप से निनिपाठ करता है । सब से पहिले देवताओंनें हीं इस अग्नि को प्रज्ज्वलित किया था, इसीलिए – ' देवेद्धः ' यह कहा गया है । ( देवताओं के अनन्तर मनुष्य सम्प्रदाय में ) सत्र से पहिले इस अग्नि को मनु ने प्रज्ज्वलित किया था, इसीलिए ' मन्विद्धः ' यह कहा है ॥ 2 ॥
' ऋषिष्टुत: ' इस निवित् का यही तात्पर्य है कि, सब से पहिले ऋषियोंनें ही इस अग्नि की स्तुति की थी, इसीलिए ' ऋषिष्टुतः ' यह कहा है ॥ ६ ॥
' विप्रानुमदित: ' इस निति का यही तात्पर्य है कि ये ही निश्चयेन विप्र कहलाए हैं, जो कि ऋप हैं । इन ऋषियों ने इस अग्नि को प्रसन्न किया था, अतएव ' विप्रानुमदितः ' यह कहा है || ७ || ' कविशस्तः ' इस निति का यही तात्पर्य है कि, ये ही निश्चयेन कवि नाम से प्रसिद्ध हैं, जो कि ऋषि हैं । उह्रीं ऋषियों ने इस अग्नि का ( सुप्रसिद्ध यजुरनुगता शस्त्रप्रक्रिया से ) शंसन किया था, अतएव ' कविशस्तः ' यह कहा है ॥ 5 ॥
' ब्रह्मसंशित: ' इस निवित् का यही तात्पर्य है कि, यह अग्नि निश्चयेन ब्रह्म से सुतीक्ष्ण किया गया है । ' घृतहवन: ' इस नित्रित का यही तात्पर्य है कि, [ यह अग्नि स्वरूपरक्षा के लिए ] घृत का आह्वान करने वाला [ घृतप्रिय ] है ॥ ६ ॥
' प्रणीर्यज्ञानां रथीरध्वराणाम् ' [ इस निचित् के ' प्रणीर्यज्ञानाम् ' भाग का यही तात्पर्य्य है कि ] ऋत्त्त्रिग् गण इसी अग्नि के द्वारा सम्पूर्ण यज्ञों को पूर्ण करने में समर्थ होते हैं, जो कि पाकयज्ञ हैं, एवं जो अन्य यज्ञ हैं । इसीलिए - ' प्रणीर्यज्ञानाम् ' यह कहा है || १० || [ उक्त निचित् के ] ' रथीरध्वराणाम् ' इस निवित् का यही तात्पर्य्यं कि, यह अग्नि रथ बन कर देवताओं के लिए यज्ञ [ इत्रि ] का वहन करता है । इसीलिए - ' रथीरध्वराणाम् ' यह कहा है ॥११ ॥
' तूत होता तूर्हिव्यवाट् ' इस निवित् का यही तात्पर्य है कि, इस अग्नि को राक्षस पार नहीं कर सकते । इसीलिए ' अतू होता ' यह कहा गया है । ' तुर्हिव्यवाट् ' का यही तात्पर्थ्य है कि, यह श्वग्नि स्वयं सब पात्माओं को पार करने में समर्थ है । इसीलिए - तूर्णिर्हव्यवाट् यह कहा है || १२ || ११८४
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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड ' आपात्रं जुहूर्देवानाम् ' नामक निचित् का यही तात्पर्य है कि, यह अग्नि ( सर्वदेवताहुति-मुख - स्थानीय बनता हुआ ' देवपात्र ' है । इसीलिए अग्नि में सम्पूर्ण देवताओं के लिए आहुति देते हैं । क्योंकि यह वास्तव में देवपात्र है । जो अग्नि की इस पात्रता को जानता है, वह जिस पात्र [ भोग्यवस्तु ] को प्राप्त करना चाहता है, अभी पात्र को प्राप्त कर लेता है || १३ || ' चमसो देवपान: ' इस निवित का यही तात्पर्य है कि, चमसरूप में परिणत हुए ही इस अग्नि से देवता आहुतिद्रव्य खाते हैं । इसीलिए ' चमसो देवपानः ' यह कहा है || १४ || ' अराँ २ || इवाग्ने नेमिदँ वास्त्वं परिभूरसि ' इस नित्रित का यही तात्पर्य है कि, जिस प्रकार [ शकटस्थ ] अरों को नेमि चारों ओर से व्याप्त करतीं हैं, इसीप्रकार [ अग्नि ] देवताओं के चारों ओर से व्यान ( घेरे रहते हैं, प्रकृत नित्रित से यही कहा है । १५ ॥ इति — निवितपाठः अथ देवतावाहनम् ( उक्तरूप से नित्रित्पाठ करने के अनन्तर देवतावाहनक होता है । उसी की इति कर्त्तव्यता बतलाती हुई श्रुति कहती है।-' आवह देवान् यमानाय ' इस आवाहन मन्त्र से इस यज्ञ के प्रति अग्नि को देवताओं · के आह्वान के लिए ही कहा गया है । ' अग्निमग्न आवह ' इस मन्त्र से अग्नि को आनं य श्राज्यभाग के प्रति अग्नि को लाने के लिए कहा गया है । ' सोममावह ' इस मन्त्र से अग्नि को सौम्य श्राज्यभाग के प्रति सोम को लाने के लिए कहा गया है । ' अग्निमावद् ' इस मन्त्र से अग्नि को, जो कि दर्श - ओर पूर्णमास, दोनों यज्ञों में अपरिहार्य आग्नेय - पुरोडाश है, उस के प्रति श्रग्नि को लाने के लिए ही कहा गया है ॥ १६ ॥
( दर्शपूर्णमास- दोनों में जो अग्नि पुरोडाशका देवता है, उसके आवाहन के ) अनन्तर ( निर्वा-पकाल में जिस जिस देवता के लिए जिस क्रम से देवता के लिए हविर्निपि हुआ था, उसी क्रम से ) उस उस देवता का ' अग्नीषोमावावह ' इत्यादि रूप से आवाहन करना चाहिए । “ देवाँ २ || आज्यपाँ ” इस मन्त्र से ( आज्यपान करने वाले ) प्रयाज- अनुयाज देवताओं के आह्नान के लिए अग्नि से प्रार्थना करता है । प्रयाज ( ऋतु ), अनुयाज ( छन्द ) देवता ही ११८५
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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथवा बाण श्राज्यपा देवता हैं । " अग्नि होत्रा यावह " इस मन्त्र से हौत्रकर्म के लिए अग्नि के आह्वान के लिए अग्नि से प्रार्थना करता है । " स्वं महिमानमावह " इस मन्त्र से अग्नि की अपनी महिमा ( साहस्रीरूप ) के आह्वान के लिए हो अग्नि से प्रार्थना करता है । वाक् ही इस अग्नि की अपनी महिमा ( बाङ्मयी बपट्काररूपा महिमा ) है । इससे इस बाकू के आह्नान के लिए ही प्रार्थना करता है । “ आा च वह जातवेदः सुयजा च यज " इस मन्त्र से जिन देवताओं के आह्वान की यह प्रार्थना अभीष्ट है, उह्नीं के आह्नान के लिए प्रार्थना करता है! ' हे अग्ने! आप उन ( यज्ञिय अभीष्ट ) दवताओं को इस यज्ञ में लाइए, एवं यथाविधि उन श्रागत देवताओं का यजन कीजिए ' यही कहा है, जोकि - ' सुयजा च यज ' यह कहा है ॥१७ ॥
वह होना खड़ा होकर देवताधानकर्म करता है । वाहनक अनुवचनकर्म है ( देवताह्वानकर्म्म है ) । एवं यह ( विदूरस्थ ) द्युलोक निश्चयेन श्रनुवाक्या है । अर्थात लोक पृथिवी पर खड़ा हुआ सा है । ऐसी अवस्था में खड़ा खड़ा द्यलोकस्थ देवताओं का आह्वान करता हुआ होता ) इस द्युलोकसम्पत्ति सदृश बनकर ही आह्वान करता है । इसलिए खड़ा खड़ा ही देवता वाहन- मन्त्रों का उच्चारण करता है ॥ १८ ॥
( खड़े खड़े वाहनकर्म करने में दोषोद्घाटन करती हुई श्रुति कहती है ) - ह ऋत्त्विक् ( अध्वर्यु ' ) बैठकर याज्या ( एतन्नामक ऋचा ) का उच्चारण करता है । यही ( पृथिवी ) याज्य है । ( यह बैठी हुई सी है ) । इसीलिए कोई भी याज्ञिक खड़ा खड़ा याज्या का उच्चारण नहीं करता । निश्चयेन पृथिवी याज्या है । ( बैठकर याज्या का उच्चारण करता हुआ ) अध् याज्यारूपा पृथिवी के स्वरूप में परिणत होकर ही याज्या का उच्चारण करता है । इसलिए बैठकर याज्या - यजन करता है । ( तात्पर्य यही हुआ कि अनुवाच्या द्युलोक है, एवं याज्या भूलोक हैं । श्रह्नान कर्म्मका द्युलोक से सम्बन्ध हैं, एवं यजन कर्म का भूलोक से सम्बन्ध है । द्युलोक तिष्ठत् है, एवं भूलोक आसीन है । अतः इसी रूप से अनुवाक्या, एवं याज्या कर्म्म होना चाहिए । बिरुद्ध करना प्राकृतिक - यज्ञसम्पत्ति से वचित रहना है ) ॥ १६ ॥
इति - देवतावाहनम् चौथे अध्याय में दूसरा, तथा तीसरे प्रपाठक में चौथा ब्राह्मण समाप्त सामिधेनी-- ब्राह्मणानुगत - तृतीय ब्राह्मण अत्र उपरत ११८६
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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड शतपथब्राह्मणप्रथमकाण्डनुगत चौथे अध्याय में तृतीय ब्राह्मण एवं तीसरे प्रपाठ में चतुर्थ ब्राह्मण सामिधेनी – बाह्मणानुगत - चतुर्थ ब्राह्मण -४-शान्तिकर्म्म [ अभिचारात्मकम् ] जो अग्नि भामधेनी ऋचाओं से समिद्ध होजाता है, वह इतर सामान्य प्रज्ज्वलित अग्नियों की अपेक्षा अतिशयरूप से प्रज्ज्वलित रहता है । ऐसा समिद्ध अग्नि घर्षण के, तथा स्पर्श के अयोग्य होजाता है । ( न इसका कोई कुछ बिगाड़ ही सकता, न कोई स्पश ही कर सकता, क्योंकि इसमें मन्त्रविद्युत् का समावेश रहता है, यही तात्पर्य है ) ॥ १ ॥
सो जिसप्रकार सामिधेनीं- मन्त्रों से यह अग्नि समिद्ध होजाता है, वैसे ही वह सामिधेनी मन्त्रों का उच्चारण करता हुआ ब्राह्मण ( होता ) भी ( प्रखररूप से ) तपने लगता है | ( साथ ही मन्त्रपूत समिद्ध अग्नि की माँति मन्त्रप्रयोक्ता यह ब्राह्मण भी घर्षण, तथा स्पर्श के प्रयोग्य बन जाता है || २ || ( जिसप्रकार सामिधेनी - मन्त्रों से आहवनीय अग्नि के अङ्ग प्रत्यङ्ग समिद्ध होजाते हैं, एवमेव इनके अनुवचन से अनुवचनकर्त्ता होता के अङ्ग प्रत्यङ्ग भी समिद्ध होजाते हैं । किस सामिवेना ऋग्भाग से कौन सा अङ्ग समिद्ध होता है, इसी प्रश्न का क्रमिक समाधान करता हुआ निम्नलिखित प्रकरण आरम्भ होता है ) -| — वह होता ' प्र वो वाजा ० ' इत्यादि प्रथमा सामिधेनी - ऋक् का ( जिस समय ) उच्चारण करता है, ( उस समय अपने प्राणसमिन्धन की भावना करता है ) । प्राण निश्चयेन ( ' प्र ' शब्द युक्त होता हुआ, साथ ही गतिधर्मा बनता हुआ ) ' प्रवान् ' हैं । इस प्रथम ऋचा से यह होता अपने ' प्राण ' को ही प्रज्ज्वलित करता है । ' अग्र आयाहि वीतये ' ( इसका अनुवचन करता है ) । अपान निश्चयेन ‘ एतबान् ’ ( आगमनधर्म्मा ) है । इस दूसरी ऋचा से होता अपने ' अयान ' को ही समिद्ध करता है । ' तं वा समिद्भिः ० इत्यादि तृतीय सामिधेनी -- ऋचा के ) ' बृहच्छोचा यविष्ठय ' ( इसके अनुवचन से उदान का ही समन्धिन करता है ) । उदान निश्चियेन बृहच्छोचा ( तेजो-११८०
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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण नाड़ी से सम्बन्ध रखना हुआ अधिक तेजोयुक्त ) है । इस ऋग्भाग से होता अपने ' उदान ' को ही समिद्ध करता है ॥ ३ ॥
" स नः पृथुश्रवाय्यम् " ( इसके अनुवचन से श्रोत्र का ही समिन्धन करता है ) । श्रोत्र निश्चयेन पृथुश्रवाय्य ( विस्तीर्ण श्रवण साधन ) है । श्रोत्र से ही विशाल अन्तरित में व्याप्त शब्द सुनता है । इस ऋकू से होता अपने ' श्रोत्र ' को ही समिद्ध करता है || ४ || “ ईडेन्यो नमस्यः ” ( इसके अनुवचन से बाक् का ही समिन्धन करता है ) । बाक् निश्चयेन ईडेन्या ( स्तुति करने वाली, किंवा स्तुति का साधन, किंवा स्तुति करने योग्य ) है । बाकू ही इस सम्पूर्ण जगत की स्तुति ( उपादानत्वेन वितान - विस्तार ) करती हैं, एवं बाक् सम्पूर्ण विश्व ईडित ( स्तुत -त्रित ) है । इस ऋचा से होता अपनी बाक् को ही समिद्ध करता है || ५ || ' वृषो अग्निः समिध्यते ' इत्यादि ६ की ऋचा से ) ' अश्वों न देववाहनः ' ( इस ऋग्भाग से मन का ही समिन्धन करता है ) । मन ही ' देववाहन ' ( देवनिम्मित इन्द्रियों की आधारभूमि, तथा यज्ञिय देवताओं की संकल्प के द्वारा आधारभूमि ) है । मन हीं मनस्त्री पुरुष को ( सामान्य पुरुष की अपेक्षा ) अतिशयरूप से समृद्ध बनाए रखता है, उठाए रखता है, उन्नत रखता है । इस ऋग् भाग से होता ' मन ' को ही समिद्ध करता है ॥ ६ ॥
( ' वृषणं त्वा वयं धृषन् ० इत्यादि ७ वीं ऋचा के ) ' अग्ने दीद्यन्तं बृहत् ' ( इस ऋग्-भाग से ' चतु का ही समिन्धन करता है ) । चक्षु निश्चयेन प्रज्वलित ङ्गार से हैं, इस ऋग्भाग से होता अपने ' चशु ' को ही समिद्ध करता है ॥ ७ । ' अग्नि दूतं वृणीमहे ' इस श्रार्षेयी ऋचा से, जो कि इसका मध्यप्राण ( ध्यान ) है, उसी को समिद्ध करता है | ‘ अग्नि दूतं वृणीमहे ' यह सामिधेनी ऋक् प्रारणादि पश्च प्रणों के मध्य में प्रतिष्ठित व्यानप्राण- स्थानीया है । इस से अन्य ( दिव्य ) प्राण ( इस के ) ऊर्ध्व भाग में प्रतिष्ठित हैं, एवं इस से अन्य ( पार्थिव ) प्राण ( इसके ) अधो भाग में प्रतिष्ठित हैं । जो इस प्रकार प्राणों के मध्य में से इस मव्यस्था प्राणदेवता का स्वरूप पहिचान लेता है, वह लोक में मध्यस्थ ( श्रेष्ठ- मुखिया निर्णायक ) बन जाता है ॥ ८ ॥
( ' समिध्यमानो अध्वरे ० ' इत्यादि नवमी सामिधेनी के ) ' शोचिष्केशस्तमीमहे ' ( इस ऋग्भाग से शिश्नेन्द्रिय का ही समिन्धन करता है ) शिश्न निश्चयेन शोचिष्केश ( अभिल-११८८