Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 921–930

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 921–930

पृष्ठ 921

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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीत्राह्मण प्रथमकाण्ड ति कामपूर्ति के अभाव में अतिशय रूप से सन्तापजनक, स्वयमपि सन्तप्त, है । शिश्नी ( कामी ) को शिश्न अतिशयरूप से सन्तप्त करता है । इस ऋभाव से होता शिश्न को ही समिद्ध करता है ॥ ६ ॥

' समिद्धो अग्न आहुतः ' इस ऋचा से, जो कि यह अत्राप्राण है, उसी को समिद्ध करता है | ' जुहोता दुवस्यत ' इस ऋचा से ( समष्टिरूप से ) सम्पूर्ण शरीर को - नख - लोम भागों को छोड़कर - समिद्ध करता है ॥ १० ॥

( उक्त प्रकार से होता के अवयवों का समिन्धन बतलाया गया । अब उसी समिन्धनक्रम से अभिचारक की इतिकर्त्तव्यता बतलाई जाती है ) - प्रथम सामिधेनी के अनुवचन करते समय यदि होता के प्रति इस का शत्रु द्वेप - भात्र प्रकट करे, तो उस समय होता को सामिधेनी अनुवचन के साथ ही - ' तूने अपना प्राण इस समिद्ध प्राणाग्नि में डाला है, तू आत्मा के ( शरीर के ) प्राणाङ्ग से पीडित होगा ' यह बोल दे * । श्रवश्यमेत्र वैसा ही होगा । ( अर्थात् शत्रु के प्राण छटपटाने लगेंगे ) ॥ ११ ॥

द्वितीय सामिधेनी के अनुवचन करते समय यदि ० । ' तूने अपने अपान को इस समिद्ध अपानाग्नि में डाला है । तू आत्मा ( शरीर ) के अपान भाग से दुःखी होगा ' ॥ १२ ॥

तृतीय सा ० । तू ने उदान को मेरे उदानाग्नि में आहुत किया है । तू शरीर के उदान भाग से दुःखी होगा ० ' ॥ १३ ॥

चतुर्थ सा ० । ‘ तूने अपने श्रोत्र को मेरे आत्माग्रि में आहुत किया है । तुझे पीड़ा होगी, तू बहिरा हो जायगा ० ' ॥ १४ ॥

पञ्चमी सा ० । ' तूने अपनी वाक् को मेरे आत्माग्नि में बहुत किया है । 1 तुझे

वाक् - पीड़ा होगी । तू मूक ( गूँगा ) होजायगा ० ' ॥ १५ ॥

पष्ठी सा ० । ' तूने अपने मन को मेरे आत्माग्नि में आहत किया है । तू खोबा हुआ सा, पागल सा फिरता फिरेगा ० ' ॥ १६ ॥

| * इन अभिचार मन्त्रों का स्वरूप मूलपाठ से गतार्थ है । प्रयोगकाल में उह्नीं का उच्चारण होना चाहिए । यहाँ केवल अर्थ ही बतलाया गया है । ११८६

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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण सप्तमी सा ० । ' तूने चक्षु को मेरे आत्माग्नि में आहुत किया है । तुझे चक्षुः-पीड़ा होगी, तू अन्धा होजायगा ० ' ॥ १७ ॥

अष्टमी सा ० । ' तूने अपने मध्य प्राण को मेरे आत्माग्नि में बहुत किया है ।

तुझे पानप्राणपीड़ा ( मलावरोध ) होगी, तू पेट फूल कर मरेगा ' ॥ १८ ॥

नवमी सा ० । तूने अपने शिश्न को मेरे श्रात्माग्नि में बहुत किया है । तुझे शिश्न पीड़ा ( उपादशादि ) होगी, तू नपुंसक बन जायगा ० ' ॥ १६ ॥

दशमी सा ० । ' तूने अपने अाङ प्राण को मेरे आत्माग्नि में बहुत किया है ।

तू इस प्राण से कष्ट पाएगा । बद्धकोष्ठ होकर तू मरेग । ० ' ॥ २० ॥

एकादशी सा ० । ' तूने अपने सर्वाङ्ग शरीर को मेरे श्रात्माग्नि में आहुत किया

है । तुझे सर्वाङ्ग शरीर से दुःख होगा । तू तत्क्षण मर जयगा- ' ॥ २१ ॥

जिसप्रकार सामिधेनियों से प्रसिद्ध श्रग्नि को प्राप्त होकर मनुष्य दुःख उठाते हैं, एवमे सामिधेनी के मौलिक रहस्य को जानने वाले विद्वान होता के अनुवचन करते समय उसका उपहास करने वाले भी ( उक्त प्रतियाँ ) प्राप्त करते हैं । ( इसलिए ऐसे विद्वान का तिरस्कार-उपहासादि नहीं करना चाहिए ) ॥ २२ ॥

इति शान्तिकर्म्म चौथं अध्याय में तीसरा तथा तीसरे प्रपाठक में पाँचवां ब्राह्मण उपरतम् मामिधेनो - ब्राह्मणानुगत चतुर्थ ब्राह्मण उपरत ४ इति ब्राह्मणचतुष्टयात्मक - सामिधेनी - ब्राह्मण समाप्त ११६०

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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सन्दर्भ संगति-सामिधेनीत्राह्मण सूत्रानुगतपद्धति संग्रहः प्रथमब्राह्मण स्रुक्स्थापन - कर्म्म के अनन्तर वह अब वेदिस्थान से गार्हपत्य के समीप श्राता है । यहाँ आकर पुरोडाशद्रव्य को आज्य से अक्त करता है । अनन्तर कपालों को घृत से अक्त करता हैं । अनन्तर उद्वासन करता है । इस कर्म के अनन्तर आज्य पुरोडाशादि हबिद्रव्यों को वेदिस्थित ध्रुवापात्र के उत्तर भाग में इहें रखकर जुहू - उपभृ [ - ध्रुत्रा - आज्य - पुरोडाशादि का निधानक्रम से स्पर्श करता है । सर्वान्त में अपने आपका स्पर्श करता है । यही ' सर्वालम्भनकर्म ' है । इस सर्वालम्भनकर्म्म के अनन्तर ' सामिधेन्यनुवचनकम्म ' आरम्भ होता है । इसी की इति -कर्त्तव्यता यहाँ से आरम्भ होती है-१ – वेद्या उत्तरश्रोणिरुत्तरतो होतृषदनं कुशास्तीर्ण संस्थाप्य समिधमादाय सामि-धेन्यनुवचनार्थं होता ' प्रषयत्य॒ध्वर्युः । सर्वालम्भनकर्म्म के अनन्तर वह अध्वर्यु वेदि के पश्चिम भाग में, अथवा वेदि - श्रोणि के उत्तर भाग में होता के बैठने के लिए दर्भासन बिछाता है । आसन बिछाकर ' एहि होतः ' इन शब्दों में होता का आमन्त्रण करता है । इस आमन्त्रण से होता आचमन कर * संचरमार्ग से होता हुआ उस दर्भासन पर बैठ जाना है । अनन्तर वह अध्वयुं इष्मकाष्ठ - सम्भार में से एक समिध ( एतन्नामक काष्ठ एंकर होता के प्रति-“ श्रग्नये स मध्यमानायानुत्र ुहि ' ' । यह करता है । अध्वर्युकृत प्रैप के अनन्तर होता ब्रह्मा ब्रह्मा के प्रति निम्नलिखित वाक्य का उच्चारण करता है-' ब्रह्मन्! सामिधेनीरनुवच्यामि ' अनुज्ञा प्राप्त करने के लिए ब्रह्मा उक्त वाक्य सुनने के अनन्तर पहिले उपांशु रूप से निम्न लिखित मन्त्र का जप करता है--' श्रोम् - प्रजापते ऽनुन हि यज्ञं देवता वर्द्धय त्वं च नाकस्य पृष्ठे यजमानो अस्तु सप्त ऋषीणां सुकृतां यत्र लोकस्तत्रेमं यज्ञ यजमानं च धेहि ' । * —यज्ञमण्डप में ऋत्विजो के ग्राहवनीय - बेटि - गार्हपत्य - दक्षिणाग्नि- कुण्ड आदि के समीप कर्म्मार्थ आने जाने के लिए जो नियत मार्ग बना रहता है, वही ' सञ्चर मार्ग ' कहलाता है । १ ९ ६१

पृष्ठ 924

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तृतीय- चतुर्थ- श्रध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण उक्त मन्त्र का उपांशु ÷ उच्चारण कर ब्रह्मा निम्नलिखित वाक्य उच्चस्वर से पढ़ता हुआ होता को अनुवचनकर्म्म के लिए अनुज्ञा प्रदान करता है— ' ओ ३ मनुब्र ू ३ हि ' । इस प्रकार सामिधेन्यनुवचनकर्म के लिए ब्रह्मा से श्रनुज्ञा मिल जाने पर स्वासन पर प्रति-ष्ठित होता अङ्ग लिपर्व के प्रभागों को मिलाकर अञ्जलि को अपने हृदय से स्पष्ट करता हुआ ।, अपने दाहिने पैर को वेदि की उत्तर श्रोणि के समीप रखता हुआ अन्तरिक्ष की ओर देखता हुआ निम्नलिखित ‘ नमःक्रन्द ' नामक निगद का जप करता है -श्रो ३ म् - नमः - प्रवक्त्रे, नम उपवक्त्रे, नमो द्रष्टे, नमोऽनुख्यात्रे ' क ' इदमनुवक्ष्यति, ' स ' इदमनुवदयति, ' क ' श्रविज्यं करिष्यति ' स ' आर्चिज्यं करिष्यति, ऋचः प्रपद्य े , यजुः प्रपद्य े , साम प्रपद्ये, ब्रह्म प्रपद्ये, नार्त्ता छन्दमां मातरं प्रपद्य े , भूः प्रपद्ये, भुवः प्रपद्य े , स्वः प्रपद्ये, भूर्भुवः स्वः सर्व प्रपद्य ' इति । उक्त निगदपाठ के अनन्तर यज्ञकर्त्ता यजमान ' स्फ्य ' हाथ में लेकर निम्नलिखित वाक्य से ( अनुवचनकर्म्म के लिए ) होता को प्ररणा करता है--' सन्तन्वभिव मे नत्र हि ' । इस सम्बन्ध में सूत्रकार एक विशेष नियम बतलाते हुए कहते हैं कि, ' स्विष्टकृद्याग ' नामक कर्म के अनुष्ठान से पहिले पहिले इतिकर्त्तव्यता में पटित ऋङ्मन्त्र, एवं निममन्त्रों का कुछ उच्चस्वर से उच्चारण करना चाहिए, जिसे कि ' सामान्यस्वर ' भी कहा जाता है । स्विष्टकृत से आरम्भ कर इडाप्राशन कर्म्म पर्यन्त सम्पूर्ण मन्त्रों का मध्यम स्वर से उच्चारण करना चाहिए | एवं इडा - कर्म्म से आरम्भ कर कर्म - समाप्ति पर्यन्त उच्च स्वर से उच्चारण करना चाहिए । दूसरी विशेषता है होता के प्रति प्रैष करने के सम्बन्ध में । कितने ही याज्ञिक पूर्व प्रैष-वाक्य के स्थान में ‘ अग्नये समिध्यमानाय होतरनुत्र हि ' यह प्रैप करते हैं । परन्तु वस्तुतः ऐसा होना नहीं चाहिए | क्योंकि - ' तदु तथा न त्रपात् । अहाता वा एष पुरा भवति ' ( शत ० १ ३ ४ ३। ) के अनुसार अभी यह ऋत्विक होतृत्त्वेन वृत नहीं हुआ है । इह्रीं सब विशेषताओं के साथ उक्त इतिकर्त्तव्यता बतलाते हुए आगे के सूत्र हमारे सम्मुख आते हैं--- जिह्वोष्ठी चालयेत् किञ्चिद्देवतता गतमानसः । निजश्रवणयोग्यः स्यादुपांशुः स जपः स्मृतः ' । ११६२

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तृतीय- चतुथ - अध्याय तृतीय- चतुर्थ- ब्राह्मण प्रथमब्राझण १ – “ हो तृषदनं कृत्वाऽपरेण वेदिं श्रोणि बोत्तरेण - इध्मात् समिधमादाय ' अग्नये समि-ध्यमानायानुब्र हि ' इत्याह " ( का ० श्र ० ३ | १ | १ । ) । २ – ' होतरिति चैके ' ( का ०, श्री ० सू ० ३।२।१ । ) । ३ – ' प्रथमस्थानेन प्राक स्विष्टकृतः ' ( वा ० श्री ० ० ३।१।३ । ) । ४ -- ' मध्यमेने डायाः ' ( का ० श्री ० सू ० ३ । १ । ४ । ) । - ' शेषमुत्तमेन ' ( का ० श्री ० ०३ | १ | ५ | ) | ६— ‘ सन्तन्वन्निव मेऽनुब्र हि ' इत्याह यजमानः ' ( का ० श्र ० सू ० ३११।६ । ) । उक्त यजमान - प्रेषानन्तर जब होता तीन बार हिङ्कार कर के ' प्र वो बाजा ० ' इत्यादि सामिधेनी - ऋचाओं का उच्चारण करने लगता है, उस समय यजमान अपने पाँच के अँगूठों से भूमि को दबाता हुआ ( शत्रु के नाम का समावेश कर ) निम्नलिखित अभिचार - वचन का उच्चारण करता है--' इदमहं पञ्चदशेन बाग़व णामुम बत्राधे ' । यदिशत्रु के नाम का पता न हो, साथ ही शत्रुता का परिज्ञान श्रवश्य हो, तो उस दशा में-- ' इदमहं पञ्चदशेन वागवज्र ेण द्विषन्तमवबाधे ' यह बोलना चाहिए । यदि कोई शत्रु ( कृत्रिम ) ही न हो, तो ( सहजशत्रु नाश के लिए ) ' इदमहं पञ्चदशेन वाग्वत्रेण भ्रातृव्य मत्रवाधे ' यह बोलना चाहिए । यदि काम्येष्टि का प्रभाव है, तो १५ सामिधेनियों का, यदि काम्येष्टि है, तो १७ सामिधेनियों का होता के द्वारा अनुवचन होगा । फलतः प्रत्येक के साथ यजमान को ' इदमहं ' ० इत्यादि बोलते हुए पादाङ्ग ष्ठों से भूमि को दबाना पड़ेगा । तात्पर्य यही है कि, तत्तत् कर्म्मविशेषों में १५, १७, २१, २४, ३, ६, इत्यादि सामिधेनी - ऋचाओं का विशेष विधान है । दर्शपूर्णमास में १५, तद्विकृति - भूता काम्येष्टि में, तथा पश्वादि में १८, प्राजापत्यपशुबन्ध में २१, इष्टकाप-शुबन्ध में २४, पित्र्येष्टि में ३, उपसद्धोम में ६, सामिधेनियों का विधान है । इन सामिधेनी-संख्याओं के अनुसार ही उक्त अभिचारमन्त्र में - क्रमशः ' इदमहं पञ्चदशेन ०. सप्तदशेन " एकविंशेन ०, चतुर्विशेन ०, तृतीयेन ०, नवमेन ०, इस रूप से तत्तद्विशेष संख्याओं का समावेश करते हुए, शत्रु का नाम विदिति हो तो नाम का समावेश करते हुए, नाम अविदित हो, तो ' द्विषन्तं ' पद का, और यदि कृत्रिम शत्रु न हो तो ' भ्रातृव्यं ' पद का सन्निवेश करते हुए सामिधेनी – संख्या-समान उतने हीं अभिचार वाक्यों का प्रयोग करना चाहिए । ११६३

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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मगा शतपथब्राह्मगा हिङ्कारपूर्वक प्रणव सहित सामिधेनी का उच्चारण होता है । इस प्रणव का सम्बन्ध मन्त्र के दोनों ओर होता है । जब जब होता सप्रणव सामिधेनी ऋकू का उच्चारण कर ऋगन्त में प्रणब का उच्चारण करता है, तब तब ही ( प्रतिप्रणव ) अध्वर्यु अग्नि में इध्म डालता जाता है । दोनों के सामिधेनी - ऋङ्मन्त्रोच्चारण के साथ साथ अध्वर्यु का इध्म डालना इध्मकर्म है । जितने सामिधेनी मन्त्र होते हैं, उतने हीं इध्म होते हैं । दर्श- पूर्णमास में क्योंकि १५ सामिवेनी - ऋङ्ग्– मन्त्र हैं, फलतः वहाँ १५ ही का प्रधान होता हैं । “ समिद्धो अग्न आहुतः ० " इस ऋङ मन्त्र के उच्चारण से, पहिले पहिले वह अध्वर्यु इससे पहिले मन्त्र के अन्तिम प्ररणत्रोच्चारण के साथ साथ सम्पूर्ण इध्मकाष्ठ अग्नि में डाल देता है | यदि अनुयाजकर्म्म अभीष्ट है, तो इन में से एक इध्मकाष्ठ बचा लिया जाता है । तात्पर्य यह हुआ कि, ( काम्येष्टि के अभाव में ) जबकि दर्श-- पूर्णमास में पञ्चदश सामिवेनी - अनुवचन विहित हो, तो उस दशा में प्र वो बाजा ० इत्यादि ११ तो सामिधेनी मन्त्र हैं । एवं आयन्त के मन्त्र तीन तीन बार पढ़े जाते हैं । इस त्रिरावर्तन से ११ के १५ सामिवेनी मन्त्र होजाते हैं । इस इष्टि में इस इध्मकर्म के लिए कुल ( अनुयाजपक्ष में ) १८ इध्मकाष्ठों का संग्रह होता है । इनारह मों में से पूर्वोक्त परिधि - परिधानकर्म के अनन्तर एक समिध का " वीतिहोत्रं त्वा वेद्यमन्तं समिधीमहि अग्ने वहन्तमध्वरे " [ प्रथमं परिधिं समिधों-परस्पृश्य ' बीतिहोत्र ' मित्यादधाति " का ० श्र ० सू ० २ | = | २ ) इस मन्त्र से परिधि का स्पर्श करते करते हुए अग्नि में आधान होजाता है । एवं एक समिध का त्रिना परिधि का स्पर्श किए " समिदमि " ( " अनुपस्पृश्य द्वितीयां समिदसी ' ति " का ० श्र ० सू ०२८ ( ३ ) यह मन्त्र बोलते अग्नि में प्रधान होजाता है । इसप्रकार १८ में से २ का प्रयोग तो परिधिक हुए समाप्ति पर होने वाले समिधाधानकर्म में हीं होजाता है । अब इस समय कुल १६ इध्म बच रहती हैं । १६ की व्यवस्था यह है कि, “ प्र वो वाजा ० " से आरम्भ कर " अग्निं दूतं वृणीमहे ० " इस आठवें सामिधेनी मन्त्र पर्य्यन्त प्र वो वाजा " की त्रिरावृत्ति से १० मन्त्र होजाते हैं । इन दसों का प्रणत्रोचारण के साथ अध्वर्यु के द्वारा आवान होजाता है । आगे तीन मन्त्र शेप हैं, अन्तिम मन्त्र की त्रिरावृत्ति से ५ मन्त्र शेष हैं । सामिधेनी ६ शेष हैं । इन छ के सम्बन्ध में यह व्यवस्था हुई है कि, पञ्चमन्त्रसम्बन्धिनी पाँचों सामिधेनियों का “ समिद्ध अग्न आहुत: " इस १२ वीं मामिवेनी के उच्चारण से पूर्व, एवं “ समिध्यमानो अध्वरे ० ' १ ९ ८४

पृष्ठ 927

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तृतीय - चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड इस ११ वीं सामिधेनी के अन्त में होने वाले प्रणयोचारण के साथ ही अग्नि में आधान कर देना चाहिए । जो एक सामिधेनी शेष रहेगी, उसका अनुयाजकर्म में उपयोग होगा । इस प्रकार पञ्चदश-- सामिधेनीपक्ष में १५ इध्म सामिधेनी मन्त्रों के सम्बन्ध से, १ अनुयाज सम्बन्ध से, दो परिधिकम्र्मानन्तर होनेवाले अभ्याधानकर्म्म के सम्बन्ध से, १८ इध्मों का ग्रहण होगा, एवं इनका विनियोग उक्त प्रकार से होगा । काम्येिष्टि का भी यदि दर्शपूर्ण मास में संग्रह है, तो सत्रह सामिधेनी मन्त्र होंगे । और उस दशा में १८ के स्थान में २० इध्म - काठ लिए जायँगे । जिन दो मन्त्रों का उपरिष्टात् संग्रह होता है, वे " धाय्या " कहलाए हैं । साथ ही " समिध्यमानवती समिध्यवतीं चान्तरेण पृथुपाजावत्यौ धाये दधाति " ( आपस्तम्ब श्री ० सू ० ) " तृतीयस्यां सामिधेन्याबावपते प्रागुपोत्तमायाः पृथुपाजा अमर्त्य इति द्वे धाय्ये इत्युक्त प्रतीयात् " ( आश्वलायन श्र ० सू ० ) ' ' समिध्य मानवतीं समिद्धवतीं चान्तरेण धाय्या स्युः " ( तै ० सं ० ५ | ३ | ४ | ५ | --( ३ ) इत्यादि के अनुसार इन दोनों घाय्या ऋचाओं का सन्निवेश समिध्यमान पदवटित " समिध्यमानो अध्वरे ० " इस मन्त्र के, तथा समिद्धपदघटित " समिद्धो अग्न आहुत ० " इस मन्त्र के, दोनों के मध्य में निधान होता है । क्योंकि ये दोनों धाय्या ऋचाएँ दोनों के मध्य में सन्नित्रि रहती हैं, अतएव इनकी - " समिध्यमान समिद्धवती " यह संज्ञा ( नाम ) मानी गई है । पूर्वोक्त क्रमानुसार परिधिकम्मोंत्तरभावी अभ्याधान कम्मोंपयुक्त २ इध्मकाष्ठों, तथा १० मन्त्रों के प्रणव के साथ होने वाले १० उध्मकाष्ठों के अभ्याधान के अनन्तर ८ इध्मका बच रहते हैं । इनमें से १ तो अनुयाज के लिए रखली जाती है, शेष सातों का १० वीं के अन्तिम प्रणवोच्चारण के साथ अभ्याधान होजाता है । एवं यही इस सप्तदश सामिधेनीपत में २० इध्म-काष्ठों का विनियोग है । " अब इस सम्बन्ध में एक जिज्ञासा बच रहती है । कहा गया है कि, ऋगुच्चारणकाल में यजमान दोनों पैरों के अँगूठों से भूमि दबाता हुआ - " इदमहम् " इत्यादि रूप से अभिचार कर्म्म करता है । उधर श्रुति में - " यं द्विध्यात् तं श्रङ्ग ुष्ठाभ्यामवनात इदमहममुमवाधे ” ( शत ० १३५०७ ) इत्यादि रूप से सामान्यतः " अङ्ग ठ " पद उद्धृत हुआ है । इससे पैर के. अङ्ग ुष्ठ का ही ग्रहण किस आधार पर किया गया? इस प्रश्न का समाधान - " पाद्याभ्या मङ्ग ुष्ठाभ्यामवबाधेत " ( का ० ना ० २१३३५ ) इस का एवब्राह्मणवचन के अनुसार प्रकृत ४१६५.

पृष्ठ 928

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तृतीय- चतुर्थ अध्याय तृतीय- चतुर्थ- ब्राह्मण शतपथब्राह्मण सामान्यवचन का विशेष ( पाद ) विधि में सङ्कोच करना न्यायसङ्गत होजाता है । इसी पूर्वोक्ता इतिकर्त्तव्यता का स्पष्टीकरण करते हुए भगवान कात्यायन कहते हैं. ( ७ ) – “ अङ्ग ुष्ठाभ्यां चावबाधते पाद्याभ्यां वेदमहममुमवबाध इति द्व ेष्यम् " ( का ० श्र ० सू ०: | ११७ ) | ( ८ ) - " भावे द्विषन्तं, भ्रातृव्यमिति वा " ( का ० श्री सू ० ३।१८ ) । ( ६ ) " यावत् सामिधेनि वेदेदमहं तावतिथेन वज्रेणेति " ( का ० श्रौ ० सू ० ३१६ ) । ( १० ) - " प्रतिप्रणवमाधानम् " ( का ० श्र ० सू ० ३ | १ | १० ) । ( ११ ) – “ ' समिद्ध ' इति प्रागतः सर्वमिध्यम कवर्जमनुयाजाश्च ेत् " -( का ० श्र ० सू ० ३ | १ | ११ ) । इति — सूत्रानुगतपद्धतिसंग्रहः ११६६

पृष्ठ 929

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तीसरे अध्याय में पाचवाँ, तीसरे प्रपाठकमें दूसरा ब्राह्मण सामिधेनी - ब्राह्मणानुगत प्रथम ब्राह्मण वैज्ञानिक - विवेचना-१ ( भाष्य ) - यज्ञेतिकर्त्तव्यताओ में ' ग्निसमिन्धन ' कर्म अपना एक विशेष महत्त्व रखता है । ' अग्निरु वै यज्ञ ': इस निगम के अनुसार अग्नितत्त्व ही यज्ञ कर्म की मूलप्रतिष्ठा है । आधिदैविक, आधि-भौतिक तथा आध्यात्मिक, इन त्रेताग्नियों के समन्वय से जो एक अपूर्व श्रतिशय उत्पन्न होता है, उसे ही ' दैवात्मा ' कहा जाता है । यह दैवात्मा खगोलीय पार्थिव सम्वत्सर के त्रिणाचिकेत नामक सप्तदशस्तोम स्थान में प्रतिष्ठित होजाता है । इस देवात्मा के प्राण का रश्मिरूप से यज्ञकर्त्ता यजमान के साथ हृदयन्थिबन्धन सम्बन्ध रहता है | उधर वह दैवात्मा दिव्यलोकस्थ स्वर्गीय प्राणदेवताओं के साथ बद्ध रहता है । यावद । यु-भोगपर्य्यन्त इस भूपृ पर जीवनयात्रा का निर्वाह करता हुआ यजमान जत्र अपने भौतिक शरीर का परित्याग करता है, तो इसका कर्म्मभोक्ता - वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ – त्रितयमूर्ति भूतात्मा ( मानुषात्मा ) उस दैवात्मा के आकर्षण से आकर्षित होता हुआ उस सप्तदशस्तोमात्मक स्वर्गलोक में चला जाता है । जबतक यज्ञाति-शयरूप देवात्मा स्वस्वरूप से सुरक्षित रहता है, तबतक मानुषात्मा वहाँ प्रतिष्ठित रहता है । समय पाकर यज्ञातिशयलक्षण पुण्यसंस्कार के क्षीण हो जाने से तद्रूप देवात्मा विलीन होजाता है, पुन: उस मानुषात्मा को ' क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोके वसन्ति ' के अनुसार उसी जन्म मरण - प्रवाह में जाना पड़ता है । और यही यज्ञकर्म का एक महत्त्वपूर्ण फल है । इस यज्ञफलसिद्धि के लिए तीनों अग्नियों का पहिले परस्पर ग्रन्थिबन्धन अपेक्षित है । श्रधिभौ-तिक अग्नि पार्थिव अग्नि है, आध्यात्मिक अग्नि शरीराग्नि है, एवं आधिदैविक अग्नि सौर सावित्राग्नि है । पार्थिव अग्नि सौर सावित्राग्नि का ही प्रवर्ग्य रूप है । वही सावित्राग्नि प्रवर्ग्य - सम्बन्ध से दिव्यसंस्था से पृथक होकर अपने दिव्यरूप से वञ्चित होता हुआ भूगर्भ में आकर कृष्ण ( अप्रत्यक्ष ) रूप में परिणत होजाता है । इसी को विज्ञानभाषा में - ' कृष्णमृग ' कहा गया है । काबाद में यही मृग्य अग्नि सुत है, जिसका ' शेत्रे वनेषु मात्रो ' मन्त्र से स्वरूपोल्लेख होरहा है । काष्ठादि में प्रसुप्त यही आधि-भौतिक अग्नि मनुष्य के प्रयास से प्रज्ज्वलित होकर मनुष्यों के लौकिककर्म्म ( पाकादिकर्म्म ) सम्पादन करता है, जैसाकि – ' सन्त्वा मर्त्तास इन्धते ' इस मन्त्रभाग से स्पष्ट है । प्रज्ज्वलित होने के अनन्तर यह भूताग्नि अपने भूतभाग को छोड़ता हुआ कालान्तर में अपने उसी दिव्यप्राणरूप में परिणत होकर य लोक में चला ११६७

पृष्ठ 930

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तृतीय- चतुर्य च्याय सामिधेनीवाह्मण शतपथब्राह्मण जाता है । ' अतन्द्रो व्यंसि हविष्कृदादिदे वैषु राजसि ' इस मन्त्रोत्तराद्ध ' से इसी स्थिति का प्रति-पादन हुआ है । भूताग्नि प्रज्ज्वलित होकर बालान्तर में युलोक में इसीप्रकार जाता रहता है परन्तु इस स्वाभाविक-गति से यज्ञकर्म का कोई सम्बन्ध नहीं है । यज्ञ में तो यह भूताग्नि ही उपयुक्त माना जायगा जिसमें यहीं, इसी लोक में प्रतिष्ठित रहते हुए दिव्यानि का समावेश करा दिया जायगा भूतानि को प्रज्ज्वलित किया जायगा, इसमें दिव्यप्राणाग्नि का समावेश कराया जायगा । अनन्तर आहुति के द्वारा यजमान अपने शरीराग्नि का इन दोनो से सम्बन्ध करा देगा । परिणाम इसका यह होगा कि, अत्र जो भूताग्नि द्यलोक में जायगा, उसके गर्भ में दिव्यानि रहेगा, पक्षमा का शरीरान्ति रहेगा, आहुतिद्रव्यानुशय रहेगा इन सच के समन्वितरूप का नाम होगा पूर्वोक्क ' देवात्मा ' वह वहाँ जायगा, इसका यजमान के मानुषात्मा से सम्बन्ध रहेगा, और यही आकर्षण स्वर्गफलप्राप्ति का कारण होगा । , भूताग्नि को प्रज्ज्वलित सभी करते हैं । तद्वत् यहाँ भी अध्वर्यु " इध्म " नामक सामान्य का प्रक्षेप से इसे प्रज्वलित कर लेता है । इस सामान्य प्रज्ज्वलनकर्म को विज्ञानपरिभाषा में " इन्धन " कहा गया है । आहवनीयाग्नि प्रतिरूपमय्यांदा से यद्यपि दिम्याग्नि की प्रतिकृति है परन्तु यह तभी दिव्य कहला सकेगा, जबकि इसमें किसी विशेष वैज्ञानिक प्रक्रिया से लोकस्थ देवतामय दिव्य प्राणाग्नि का सम्बन्ध करा दिया जायगा । जचत पार्थिव भूतरूप प्रति अग्नि का इस दिव्य प्रारूप अग्नि के साथ एकीभावात्मक सम्बन्ध नहीं होजाता, तत्रतक इम आहवनीय इध्म अग्नि का एक चूल्हे की सामान्य अग्नि से अधिक कोई विशेष महत्व नहीं है । दिव्याग्निशून्य ऐसे प्रज्ज्वलित अग्नि में श्राणदेव की अयोग्यता है । फलतः इसमें चाहे लाखों मन श्री डाल दीजिए, अपरिमित आहुति द्रव्य डाल दीजिए, अहर्निश स्वाहा स्वाहा करते रहिए, साथ ही यज्ञविद्या को जगत् की दृष्टि में महत्व शून्य सिद्ध करने का कलङ्क उठाते रहिए, कभी ऐसे लौकिक भग्नि से फलसिद्धि नहीं होसकती फल तय मिलेगा, जब प्राकृतिक प्राणदेवताओं के गर्भ में आहुतिद्रव्य का समावेश होगा । ग्राहुतिद्रव्य का देवताओं के गर्भ में समावेश तत्र होगा, जब इस प्रज्ज्व— लित भूताग्नि में देवप्राणाकर्षक दिव्यानि का एकीभाव होगा I जीर यह एकीमाय तब सम्भव होगा, अवकि, ऋषिप्रदिष्ट सुप्रसिद्ध – “ सामिधेन्यनुवचन ' कर्म का आश्रय लिया जायगा । प्रश्न हमारे सामने यही है कि, युलोक में प्रतिष्ठित दिव्यप्राणदेवता प्राणात्मक हैं । उधर प्राण की - -" रूप - रस- गन्ध - स्पर्श - शब्दशून्यत्त्वे - सति अधामन् छदत्त्वमेव प्राणत्त्वम् " यह परिभाषा मानी गई है । एतल्लक्षण दिव्यमान अस्मदादि के लिए सर्वथा अतीन्द्रिय बनता हुआ ब्राह्म है । जब यह अग्राह्य है, तो उसका इस अग्नि में सम्बन्ध कैसे कराया जाय?, यही एक महती विप्रतिपत्ति है । उक्त विप्रतिपत्ति का निराकरण " स्वरसमन्वय " से होरहा है । पृथिवी और सूर्य, दोनों वस्तुतः एक थे, जैसा कि पाठक आगे देखेंगे । पृथिबी सूर्य का ही उपग्रह माना गया है । दोनों में परस्पर आधारा-चेयभाव सम्बन्ध है । सूर्य की प्रवर्ग्यभागात्मिका पृथिवी सौर आकर्षण - प्रतिष्ठा को आधार बनाकर स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित है । गौरूप सूर्य्य ने हीं रश्मिरून शुद्ध ( सींग ) के आधार पर भूभार वहन कर रक्त्या है । इस मौर प्राण का ही नाम ' स्वर ' है, एवं पार्थिव भूत का ही नाम ' व्यञ्जन ' है । स्वरप्राण के सम्बन्ध से ११६८