Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 931–940

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 931–940

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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीत्राह्मण प्रथमकाण्ड ही सौरलोक “ स्वर्लोक " कहलाया है, जैसाकि ' स्वरहर्देवाः सूर्यः ' ( ० १ १ | २ | २ | १ ) इत्यादि श्रुति से प्रमाणित है । व्यञ्जनबाक पार्थिवी है, यही ' अनुष्टुप ' कहलाई है । स्वरवाक् सौरी ( ऐन्द्री ) है, यही ' बृहती' कहलाई है जिसका सूर्यो भूता प्रथिवी सारतत्त्व के बिना स्वरूपरक्षा में अस-मर्थ है, एवमेव सौर स्वर को आधार बनाए बिना पार्थिव व्यञ्जनों का भी उच्चारण अस-म्भव ह । * । वैज्ञानिक महर्षियोंनें व्यञ्जनवाक् में अनुस्यूत सौर- स्वरतत्त्व की परीक्षा आरम्भ की । परीक्षा से यह सिद्धान्त निकला कि, “ इस अनुष्टुप् - लक्षणा पार्थिवी - वाकू ( व्यञ्जनवाक् ) में आधार बना हुआ जो स्वर है, वह दिव्यतत्त्व ( इन्द्र ) है । यदि इस दिव्यतन्त्र का ( स्वर का ) इस व्यञ्जनवाक् के साथ नियमपूर्वक सम्बन्ध जोड़ दिया जाय, तो उस नियमित बाकू से बागनुगत नियमित स्वर के आकर्षण से दिव्यलोकस्थ दिव्यप्राणदेवताओं का आकर्षण सम्भव होजाय " । एकमात्र इसी स्वरविज्ञान को मूल बना कर ऋषियोंनें दिव्यप्राणों के तत्तद्विशेष - स्वरूपों की परीक्षा आरम्भ की । उन्होंने देखा कि, दिव्यलोकस्थ अग्नि, इन्द्र, वरुण, आदित्यादि देवप्राण गायत्री, त्रिष्टुप् श्रादि विशेष छन्दों ( वाकपरिमाणात्मक सीमाभाव ) सेन्दित ( सीमित ) रहते हुए उदात्त - श्रनुदात्त - स्त्ररितादि तत्तद्विशेष स्वरवीचियों ( लहरों ) से युक्त हैं । इसी आधार पर उन्होंने व्यञ्जनवाक् में उसी नियम से छन्द - स्वर - सम्पत्ति का समादेश करते हुए यह सिद्ध कर दिया कि, " यदि अमुक छन्द वाले अमुक स्वर युक्त, अमुक मन्त्र का अमुक कर्म्म में, अमुक नियम से प्रयोग किया जायगा, तो इन छन्दः - स्वरों से समतुलित छन्दः- स्वर युक्त - उन प्राणदेवताओं का यहाँ भी सम्बन्ध होसकेगा " | साथ ही इस सम्बन्ध में उह्नोंनें यह भी आदेश दिया कि, " यहाँ मन्त्रवाक् के उच्चारण करते समय यदि मन्त्रप्रयोक्ता छन्द - त्वर-वर्ण आदि में यथाव्यस्थित नियम के विपरीत अणुमात्र भी स्खलन ( असावधानी ) कर देगा, तो इनकी स्त्ररूपानुगता - स्वरलहरी - विकृत हो जायगी, फलतः इन त्रिकृत स्वर - वर्णयुक्त मन्त्रों से उन अधिकृत देवताओं का आकर्षण न होसकेगा । साथ ही इष्ट के स्थान में महान अनिष्ट भी हो-जायगा X । तो अब हमारी उस पूर्वोक्ता विप्रतिपत्ति का समाधान हो गया । हम ऋषि के द्वारा दृष्ट उन मन्त्रों के यथाविधि उच्चारण से उन प्राकृतिक प्राणदेवताओं का अपनी यज्ञसंस्था में ग्रवश्यमेव सम्बन्ध करा सकते हैं । यही तो वेदमन्त्र का मन्त्रत्त्व है, यही तो इसका अपश्यत्त्व है । विज्ञानत्राकू का निर्माण कौन कर * - वीभत्सूनां सयुजं हंसमाहुरवां दिव्यानां सख्ये चरन्तम् । अनुष्ट ुभमनु चर्चार्यमाणमिन्द्र ' निचिक्युः कत्रयो मनीषा ॥ ” - ऋ ० १० १२४।६ | X - " दुष्टः शब्दः स्त्ररतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह । सवाग्वचो यजमामं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् " । ११६६

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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड सकता है? | वह तो ऋषियों के अन्तःकरण में स्वतः प्रादुर्भूत होने वाला मङ्गलमय विधि का महतो -महीयान् मङ्गलविधान है * । इसी मङ्गलमूर्ति विधि के स्मरणपूर्वक हमारा यह सामिधेन्यनुवचनकर्म्म आरम्भ होता है । यह सिद्ध होचुका है कि, ग्राहवनीयाग्नि में दिव्यप्राणाग्नि का सम्बन्ध आवश्यक है । दोनों का एकीभाव ही यज्ञसिद्धि का द्वार है । इस एकीभाव के लिए ही " समिन्धन " ( समित्येकीभावे ) शब्द प्रयुक्त हुआ है । जिस कर्म्मविशेष से अध्वर्यु के द्वारा इद्ध अग्नि समिद्ध बनाया जाता है, वही कर्मविशेष “ सामिधेन्यनुवचनकर्म्म ” नाम से व्यवहृत हुआ है । होता नाम का ऋत्विक् उन मन्त्रों का उच्चारण करता है, जिनका छन्द गायत्री है, स्वरलहरी अग्निदेवतानुगता है । उन मन्त्रों के प्रयोग से अन्तरिक्षस्थ सत्यसंहित प्राणाग्निदेवता आकर्षित होकर श्रवश्यमेत्र इस इद्ध अग्नि में प्रविष्ट होकर इसे समिद्ध ( इस के साथ एकीभूत ) कर देते हैं । क्योंकि निर्दिष्ट ऋचाओं से इस इद्ध का समिन्धन होता है, अतएव इन ऋचाओं को — “ समिन्धे एताभिर्ऋग्भिः ” इस निर्वचन से ' सामिधेनी ' कहा गया है । अध्वर्यु इध्म से ( सामान्य काष्ठ से ) अग्नि को इद्ध करता है । अनन्तर होता सामिधेनी ऋगुच्चारण से दिव्यप्रा-ा । ग्नि के स्थापन द्वारा इस अग्नि को समिद्ध करता है । इसी सम्बन्ध में एक बात का और ध्यान रखना चाहिए | प्राणाग्नि का सम्बन्ध अपेक्षित है । प्रारणानि का स्थिरसम्बन्ध बिना भूत के नहीं हुआ करता । भूत के आधार पर ही प्राण प्रतिष्ठित होता है, भूतद्वार से ही प्रारण का आकरण होता है । यहाँ भी अवश्य ही आगत प्राणाग्नि की स्थिरता के लिए भूतसम्बन्ध अपेक्षित है । इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए जितने सामिधेनी - मन्त्र हैं, उतने हीं ( १५ अथवा १७ ) - इध्मकाष्ठ लिए जाते हैं । होता मन्त्रो -च्चारण कर अन्त में प्रणवोच्चारण करता है, इस से प्राणाग्नि अग्नि में प्रतिष्ठित होता है, अव्यवहितोत्तरकाल में ही अध्वर्यु ' नियत इध्म अग्नि में डालता रहता है । इसप्रकार यावत् सामिधेनी समतुलित इध्मकाष्ठों का प्रतिप्रणव आाधान होता है । कैसा अद्भुत कम्मंकलाप है । उस ओर से मन्त्रशक्ति के द्वारा होता दिव्यप्राणाग्नि को इस यज्ञसंस्था में लाता जाता है, इस ओर से अब प्रतिप्रणव इध्माधान से भूताग्नि को प्रज्जवलित करता जाता है । दोनों का एकीभावात्मक समिन्धन होता जाता है । कर्म्मसमाप्ति में दोनों अग्नि मिलकर एक-अपूर्व – समृद्ध यज्ञानुगत रूप धारण कर लेते हैं । ऐसे समिद्ध अग्नि के प्रति कौन अग्न्युपासक भूसुर नतमस्तक होकर नमन न करेगा? । अत्र इस सम्बन्ध में यह प्रश्न उपस्थित होता है कि, ' इन्धनकर्म्म अध्वर्यु ही क्यों करता है?, एवं समिन्धनकम्मं होता ही क्यों करता है? । इन प्रश्नों की संक्षिप्त उपपत्ति यही है कि, प्राकृतिक-* - युगान्तेऽन्तर्हितान् वेदान सेतिहासानू महर्षयः । लेभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाताः स्वयम्भुवा ॥ ÷ लौकिक - भौ तक - काष्ट से भृताग्नि का ही इन्धन ( प्राजवल ) होता है । श्रतएव इन्धन-( प्रजवलन ) - साधक काष्ठ भी लोकव्यवहार में " इन्धन " नाम से प्रसिद्ध होगया है, जिसका प्राकृतरूप ही राजस्थान में - " ई धन " कहलाने लग पड़ा है ।

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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण सृष्टि में पार्थिव - अग्नि वायु ही ( पङ्ख आदि के झबकने से ही प्रज्ज्वलित होता है । वायु ही प्राकृतिक यज्ञ के वाय्वनुगत यजुर्वेदी अध्व माने गए हैं । अतएव यहाँ भी तत्प्रतिकृतिरूप यजुर्वेदी ध्व इध्मकर्म करता है । पार्थिव मूलाग्नि ही " इत एत उदारुहन -दिवस्पृष्टान्यारुहन् । प्रभूर्जयो गथा पथि द्यामङ्गिरसो वयुः ” इस मन्त्रवर्णन के अनुसार द्युलोकस्थ दिव्याग्नि से मेल कर समिद्ध होते हैं । दूसरे शब्दों में पार्थिव अग्नि हीं समन्धनकर्म के सञ्चालक हैं । ये ही प्राकृतिक यज्ञ के अभ्यनुगत ऋग्वेदी होता माने गए हैं । अतएव यहाँ भी तत्प्रतिकृतिरूप ऋग्वेदी होता ही समिन्धनकर्म्म करता है । " यद्वै देवा अकुर्व स्तत् करवाणि " ही इस उपपत्ति का मूल है । और यही ' सामिधेन्यनुवचनकर्म्म ' की संक्षिप्त उपपत्ति है, जिसका कि प्रकृत ब्राह्मण की प्रथम काडिका में स्पष्टीकरण हुआ है ॥ १ ॥

क्योकि प्रतिरूपानुगता - सजातीयमर्यादा से होता ही समिन्धनकर्म का अधिकारी है, अत: " अग्नये समिध्यमानयानुान हि " इत्यादि रूप से अध्वर्यु इस कर्म के लिए होता को ही प्रेरित करता है । यह भी स्मरण रखना चाहिए कि, सामिषेनी अनुवचन के अनन्तर इस ऋत्विक् का होतृत्त्वेन वरण होनेवाला है । उस से पहिले होता के उद्देश्य से इस कर्म में नियुक्त होता हुआ भी यह विधिपूर्वक ' होतृ ' संज्ञा में परिणत नहीं हुआ है । अत: ‘ होतरनुत्र हि ' इसप्रकार नामनिर्देश पूर्वक प्रेष न कर उक्त सामान्यरूप ( बिना नाम-निर्दोश ) से ही प्रत्र करना चाहिए ॥ २, ३, ॥ इस कर्म से अग्नि का समिन्धनलक्षण एकीभाव सम्बन्ध ही अपेक्षित है । प्राकृतिक जिस देवता का ऋचा के द्वारा श्राकर्षण करना है, वह जात्या अग्नि है, छन्द उस का गायत्री है, साथ ही अग्नित्त्वेन वह ब्रह्म का प्रवर्तक है । देववर्ग में इन्द्र जहाँ क्षत्रवीर्य के प्रवर्तक हैं, विश्वेदेव जहाँ विवि के प्रवत्त के हैं, एवं पूषाप्राण जहाँ शूद्रभाव का स्वरूपसमर्पक है, वहाँ अग्नि ब्रह्मवीर्य के अधिष्ठाता माने गए हैं । एतद्धर्मोपेत अग्नि का उसी ऋचा से श्राकर्षण सम्भव है, जिस का स्वरूप ( अर्थापेक्षया ) अग्निमय होगा । अर्थात् जिस में अग्निस्वरूप का वर्णन होगा, छन्द जिस का गायत्री होगा । इसीलिए मामिधैन्यनु-वचनकर्म्म में उपयुक्ता सामिधेनी सभी ऋचाएँ स्वरूपत: ( अर्थतः ) ग्राग्नेयीं होतीं हैं, एवं छन्दोमर्यादा से इन सत्र का गायत्री छन्द होता है । इस अपने ही छन्द, अपने ही स्वरूप से समतुलित मामिधेनी - ऋचा से अग्नि का समिन्धन तो हो ही जाता है, इसके अतिरिक्त इस में सपतुलित ब्रह्मात्मिका गायत्री से विशेष शक्ति ( ब्रह्मबल ) का भी श्राधान होजाता है । गायत्री को ब्रह्म, तथा बीरूप बतलाना भी एक विशेष महत्त्व रखता है । पार्थिव हृदयस्थ * प्रजा-पति से ( प्रजापति के मुखरूप उक्थ - नभ्यचिन्दु से अकत्मिक पार्थिव अग्नि का, तथा अग्नि सोमलक्षण गायत्री छन्द का आविर्भाव हुआ है । अग्नि ब्रह्म है, इसका छन्द गायत्री है । इस अग्निब्रह्म के सम्बन्ध से * " प्रजापतिर्वाव ज्येष्ठः । स तेनाग्रे ऽगजबत । प्रजापतिरकामयत -- प्रजाये -येति । स मुखतस्त्रिवतं निरमिमीत । तमनिर्देवतान्वसृज्यत, गायत्री छन्दः, रथन्तर साम, ब्राह्मणो मनुष्याणां, अजः पशूनां । तस्मात्ते मुख्य:: मुखतो ह्यसृज्यन्त ” - ० सं ० ७ | १ | १ | ४ | १२०१

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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीमब्राह्मण शतपथब्राह्मण गायत्रीछन्द ब्रह्मवीर्य्यात्मक बना हुआ है । इस के अतिरिक्त इसी गायत्री के द्वारा ' एति - प्रेति ' रूप अभ्यर्थ वीर्य्यं के प्रभाव से तृतीय लोकस्थ सोम का अपहरण होता रहता है । यह गायत्री का अपना प्रातिस्त्रिक वीर्य्य है | मनःप्राणवाङमय श्रात्मा के तीनों धातुओं से क्रमश: कारण - मुक्ष्म - स्थूल शरीरों का आविर्भाव हुआ है । इन तीन पर्वों के सम्बन्ध से तीनों में क्रमशः ' पराक्रम, वीर्य्य, बल ' नाम के धर्म्म उत्पन्न हो-जाते हैं । मनोऽनुग, कारणशरीर पराक्रम का अधिष्ठाता है, एवं मनुष्य इस का उदाहरण है । प्राणानुगत सूक्ष्मशरीर वीर्य का अधिष्ठाता है, एवं सिंह इस का उदाहरण है । वागनुगत स्थूल-शरीर बल का अधिष्ठाता है, एवं हाथी इसका उदाहरण है । तीनों शब्द पृथक् पृथक् तीन अर्थों के वाचक है । साथ ही तीनों पूर्व पूर्व एक दूसरे से गौरवान्वित हैं । यही कारण है कि, अपने शरीरबल से दो चार सिंहों को कुचलने की शक्ति रखता हुआ भी हाथी वीर्य्यशाली सिंह का आक्रमण नहीं सह सकता । इधर सिंह के दर्शनमात्र से कम्पित होपड़ने वाला मनुष्य पराक्रम के बल पर सिंह को पञ्जर ( पिंजरे ) में बन्द कर देता है । प्राणाग्नियुता गायत्री प्राणशक्ति से ही द्युलोकस्थ सोमापहरण में समर्थ होती है । प्राणशक्तिः वीर्य्यात्मिका है । अतएव यहाँ " वीर्य्यं गायत्री ” यह कहा गया है || ४ || सामिधेनी ऋचाएँ आग्नेयीं हैं, गायत्रछन्दा हैं । इस से ब्रह्मवीर्य्य का प्राधान होगया । परन्तु अभी उसमें क्षत्रवीर्य्य के आधान की कमी है, जिस के बिना ब्रा का कोई कर्म्म समृद्ध नहीं हो सकता । ब्रह्म श्रभि-गन्तामात्र है, कर्त्ता तो क्षत्र ही है । ब्रह्म - क्षत्र का युग्म ही कर्म्म की समृद्धि का द्वार है ( देखिए शत ० ४ | १ | २ ) | आवश्यक है कि, ब्रह्मसम्पत्ति - संग्रह के साथ साथ क्षत्रमम्पत्ति का भी यज्ञ में सम्बन्ध कराया जाय । इस के लिए क्षत्रानुगता छन्दः सम्पत्ति का सम्बन्ध अपेक्षित है । जिसप्रकार अग्नि ब्रह्म त्रीय्र्यात्मक है, तथैत्र इन्द्र क्षत्रवीर्य्यात्मक है । एवमेव अग्नि का गायत्रीछन्द जैसे ब्रह्मवीर्यात्मक है, वैसे x इन्द्र का त्रिष्टपुछन्द क्षत्रवीर्य्यात्मक है । इस सम्पत्ति का समष्टिरूप से स्वतः संग्रह होजाता है । सामिधेनी ऋचाएँ ११ हैं, एवं त्रिष्ट छन्द भी एकादशाक्षर ही है । एक एक अक्षर एक एक मन्त्र से समतुलित है । ११ से त्रिष्टुप् के द्वारा प्रकृत्या क्षेत्रसम्पत्ति प्राप्त होजाती है । परिणामत: हमारा भूताग्नि ब्रह्म, क्षेत्र, दोनों वीथ्यों से समिद्ध बन जाता है । ११ ही सामिधेनी क्यों होती है? इस प्रश्न की यही संक्षिप्त उपपत्ति है ॥ ५ ॥

जिस यज्ञकर्म का यजमान सम्पादन करने वाला है, उस यज्ञ की स्वानुरूपा सम्पत्ति वही मानी गई । है कि, इस में जो भी कर्म्म हौं, प्राकृतिक यज्ञ के अनुरूप ही हों । इसी को यज्ञपरिभाषा में " रूपसमृद्धि ” कहा गया है । प्राकृतिक यज्ञ में सर्वत्र त्रिवृद्भाव की प्रधानता देखी जाती है । पहिले पञ्चपर्वा उस ' सर्वहुत ' ' नामक विश्वयज्ञ के स्वरूप पर ही दृष्टि डालिए । महाविश्वयज्ञ की आरम्भभूमि प्राणात्मक स्वयम्भू है | × ‘ “ उरसो बाहुभ्यां पञ्चदशं निरमिमीत । तमिन्द्रो देवतान्वसृज्यत, त्रिष्टुप छन्दः, बृहत् साम, राजन्यो मनुष्याणां अविः पशूनां तस्माचे वीर्यवन्तः । वीर्य्या-द्वयसृजन्त " तै सं ० | १ | १।४-५ ) । १२०२

पृष्ठ 935

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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड इस का उपक्रम -- " वेदाः सत्यं, सूत्र सत्यं, नियतिः सत्यं " इस त्रिवृद्भाव से ही हुआ है । दूसरा प्रमेष्ठीपर्व भी " इट् - ऊक्'- भोग " सम्बन्ध से त्रिवृत् ही बन रहा है । सूर्य्यपर्व भी ज्योतिः - गौ- रायुः भेद से त्रिप ही है । चन्द्रमा भी ' रेतः - श्रद्धा - यशो ' रूप से इस सम्पत्ति से वञ्चित नहीं है । पृथिवी भी ' वाक्-गौ- द्यौः ' से नित्य युक्त है । इसप्रकार पाँच पर्वों से पाक कहलाने वाले इस विश्वयज्ञ का उपक्रम [ स्त्रयम्भू ], पार्श्व परमेष्ठी ], मध्य [ सू ], अवरपार्श्व [ चन्द्रमा ] उपसंहार, सब कुछ त्रिवृत् ही बना हुआ है । शुक्रविज्ञान की दृष्टि से भी बाकू - आपः अग्निः यह अमृता शुक्रत्रयी विश्वयज़ का उपक्रम बन रही है, एवं ' अग्निः - आप- वाकू ' यह मर्त्या शक्रत्रयी विश्वयज्ञ का उपसंहार बन रही है । यज्ञप्रवर्तक यज्ञिय-देवता ' अग्नि - त्राजु - आदित्य ' सम्पत्ति से युक्त रहते हुए त्रिवृत् बन रहे हैं । त्रिःसत्यदेवताओं का यजनरूप प्रत्येक यज्ञकम्म इसी त्रिः सम्पत्ति से युक्त है, जिस का ईशादि विज्ञानभाष्यों में विस्तार से निरूपण किया जाचुका है । वैधयज्ञ में होने वाले ' दीक्षा - सुत्या - उपसत ' के त्रिवृद्भाव से भी त्रिवृत् का यज्ञाङ्गत्त्व सिद्ध हो रहा है । ' तीन पर आरम्भ, तीन पर समाप्त ' यह यज्ञ की आवश्यक सम्पत्ति है । इस सम्पत्ति का भी हमारे इस सामिधेनीकम्मं में संग्रह होना चाहिए । इसी सम्पत्ति संग्रह के लिए ११ मन्त्रों में से प्रथम, तथा अन्तके मन्त्रों का तीन बार अनुवचन होता है | आरम्भ का त्रिः- अनुवचन प्रायणीय - यज्ञसम्पत्ति का, तथा अन्त का त्रिः- अनुवचन उदयनीय - यज्ञसम्पत्ति का संग्राहक बन रहा है । त्रिः - त्रिः - अनुवचन की यही संक्षिप्त उपपत्ति है ॥ ६ ॥

यज्ञानुगता त्रिवृत्सम्पत्ति अपेक्षित थी । इस सम्पत्ति के साथ साथ उसी संख्यानुगता प्रतिरूपता से एक सम्पत्ति और मिल जाती है । श्राद्यन्त के त्रिः - त्रिः अनुवचन से ११ के स्थान में १५ सामिनी ऋचाएँ होजाती हैं । “ इन्दो ह यत्र वृत्राय व प्रजहार " [ शत ० १२६ | ४ | १ ] इत्यादि पूर्वोक्त दर्भविज्ञान में यह बतलाया गया है कि, शस्त्रत्रल से आक्रमण करना क्षेत्र इन्द्र का काम है । इन्द्र की प्रहारशक्ति [ विद्यच्छक्ति ] ही वज्र है । इस वज्रसम्पत्ति का ग्राहक पञ्चदश संख्याभाव [ १५ संख्या ] है । कारण यही है कि, जैसे प्रजापति के मुख से त्रिवृत्स्तोम, एव तदनु गायत्रीछन्द, तथा अग्नि का प्रादुर्भाव हुआ है, एवमेव प्रजापति के उर, तथा बाहुयों से पञ्चदशस्तोम, एवं तदनु त्रिष्टुप्छन्द, तथा इन्द्र का प्रादुर्भाव हुआ है । अग्निब्रह्म ब्राह्मण है, शस्त्र प्रहार करना अभिचार करना इस का धर्म नहीं, क्योंकि श्रुति का इसके लिए- “ सर्वस्य वा श्रयं ब्राह्मणो मित्र, न वा अयं कञ्चन हिनस्ति " [ शत ० २/३ २/१६ ] यही आदेश है । इधर शत्रुनाश, तथा यज्ञकर्म्म पर होने वाले स्वाभाविक असुराक्रमण का निगेध भी अपेक्षित है । यद्यपि एकादशसम्पत्ति से त्रिष्टम् के द्वारा इन्द्रक्षत्र का संग्रह होजाता है । तथापि प्रजापति के साक्षात् बाहुवीर्य से सम्बन्ध रखने वाले पञ्चदशात्मक यायुध का संग्रह नहीं होता । वह काम इस पन्द्रह संख्या से * - श्रथैतानोन्द्र भक्तीत्यन्तरीक्षलोको, माध्यन्दिनं सवनं, ग्रीष्म, स्त्रिष्टुप् पश्च-दशस्तोमो, वृहत्साम, ये च देवगणाः समाम्नाता मध्यमे स्थाने, याश्च स्त्रियः । ” - या ० नि ० ७ १०/१ १२०३

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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीबाह्मण शतथपब्राह्मण पूरा होजाता है । यज्ञाग्नि क्षात्रधर्म्मानुगत श्रायुध - सम्पत्ति से युक्त होजाता है । फल यह होता कि, इन वज्ररूप सामिधेनियों के अनुवचन - कर्म्मरूप वज्रप्रहार करते समय यजमान जिस शत्रु को नष्ट करने की भावना प्रकट करता है, अवश्यमेव वह शत्रु नष्ट होजाता है । यही पञ्चदश संख्या की एक उपपत्ति है ॥ ७ ॥

एक पक्ष की १५ रात्रियाँ होती हैं । इसी श्रद्ध ' मास के ' परिप्लव ' से आगे जाकर सम्वत्सरयज्ञ का स्वरूप सम्पन्न होता है । जिसने एक पक्ष की गत्रियों का संग्रह कर लिया, उसने इस अवयव के द्वारा पूरे सम्वत्सर की रात्रियों का संग्रह करते हुए सम्वत्सरसम्पत्ति ही प्राप्त करली । यह सम्वत्सरयज्ञसम्पत की प्राप्ति ही पञ्चदशसंख्या का दूसरा फल है । अबयव अवयवी के बिना अपूर्ण है । समृद्ध है । साथ ही दर्शपूर्णमास का प्राकृतिक पक्षाग्नि-सोम से सम्बद्ध है, श्रतएव इसे सम्वत्सर का अवयत्र माना जायगा । इस की पूर्णता के लिए, समृद्धि लिए अवयवी का सम्बन्ध अपेक्षित है । वह काम भी इस पञ्चदशसंख्या से गतार्थ होजाता है । वही पञ्चदश-संख्या की तीसरी उपपत्ति है । " अग्निहोत्र, दर्शप र्णमास, चातुर्मास्य, पशुबन्ध, ज्योतिलोम " ये पांचों वैध यज्ञ क्रमशः प्राकृतिक - श्राधिदैविक- नित्य अहोरात्रयज्ञ, पक्षयज्ञ, ऋतुयज्ञ, अजनयज्ञ, सम्बत्सरयंज्ञ, इन पाँच यज्ञों के प्रतिरूप हैं । दर्शपूर्णमाम क्योंकि प्राकृतिक पक्षयज्ञ का प्रतिरूप है, पक्ष में १५ संख्या का समावेश है । अतएव यहाँ १५ संख्या के समावेश से उस पक्षयज्ञ की अनुरूपता भी प्राप्त होजाती है । यही पञ्चदशसंख्या की चौथी उपपत्ति है ॥ ८ ॥

प्रत्येक गायत्रीछन्द के [ त्रिपदा गायत्री के ] तीन तीन पाद होते हैं, प्र येक पाद में ग्राठ आठ अक्षर होते हैं, सम्भूय एक गायत्री के २४ अक्षर होजाते हैं । १५. के सम्बन्ध से १५ गायत्री छन्दस्क सामिधेनी ऋचाओं के प्रत्येक के २४ के अनुपात से कुल ३६० अक्षर होजाते हैं । उधर एक सम्वत्सरयज्ञ में ३६० ही ह होते हैं | इस पन्द्रह संख्या से सम्पन्न गायत्री के ३६० अक्षरों से सम्वत्सर के ३६० अहोरात्र समतुलित हैं । इस रूप से साक्षात् ही सम्वत्मरयज्ञसम्पत्ति का संग्रह होजाता है । यही पञ्चदश संख्या की पांचवीं उपपत्ति है || ६ || यदि दर्शपूर्णमास में काम्येष्टि अपेक्षित है, तो उस समय ५५ के स्थान में १७ मामिधेनियाँ होती हैं । ‘ धाय्या ' नामक दो ऋङ मन्त्रों का ( जोकि ' समिध्यमानो अध्वरे ० ' -समिद्ध अग्न आहुत ० ' इन दोनों मन्त्रों के मध्य में पठित होने से ' समिध्यमान- समिद्धवती ' नाम से व्यहृत हुए हैं ) समावेश और कर लिया जाता है । इस सत्रह संख्या की यही उपपत्ति है कि, इस से सर्वकाम ( अभीष्टकाम, जिसके लिए कि ' काम्येष्टि ' की जाती है ) पूर्ण होजाता है । सर्वकामपूर्ति का मूलाधार ' सर्व प्रजापति ' --- ' अथास्य कर्म्मरमानुप्रदानं, वृत्रवधो, या च का च बलकृति, रिन्द्रकम्-व तत् " ( या ० नि ० ७।१०।२ ) । १२०४

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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीत्राह्मण प्रथमकाण्ड हे भूगर्भस्थ ह प्रजापति अनिरुक्त है । इसे ही ' क ' नाम से वहुत किया गया है । इस केन्द्रस्थ उक्थ अनिरुक्त प्रजापति का वा महिमालचा वपटूकार के आधार पर आगे जाकर पार्थिव सम्वत्सररूप में अर्क रूप से वितान होता है । वही इस का सर्वरूप हैं, उसे ही ' सर्व प्रजापति ' कहा गया है, जो कि ' सः ' नाम से व्यबहुत हुआ है सर्वात्मक इस सम्वत्सर आपति के व्यष्टि - समष्टिरूप से दो बिवस ' है । व्यष्टिरूप इस के अवयत्र हैं, समष्टिरूप अवयवी है । १२ मास ५ ऋतुएँ, इस के अवयव हैं । इन की समष्टि ही सम्वत्सर है । इन १७ अपनों से यह प्रजापति ' सप्तदश ' बना हुआ है । काम्बेष्टि से कामपूर्ति अपेक्षित है । कामपूरक सप्तदशप्रजापति है, इसप्रकार सप्तदश सामिधेनी के अनुवचन से उस स'न्तदश, कामपूरक प्रजापति का संग्रह होजाता है, कामपूर्ति होजाती है । यही सप्तदश संख्या की उपपत्ति है । काम्येष्टि के देवता का उपांशुरूप से यजन होता है । उपांशुभाव अनिरुक्तभाव का ग्राहक है । उधर निरुक्त भाव सर्वरूप का संग्राहक माना गया है । प्रत्येक शब्द की यत्किञ्चित् पदार्थतावच्छेदकावच्छिन्न में हीं शक्ति मानी गई है । इसीलिए प्रत्येक शब्द नियत अर्थ का ही वाचक है । व्यष्टिरूप से ही वस्तुओं का शब्द के द्वारा निर्वाचन सम्भव है । परन्तु समष्टि के लिए ' सर्व ' सब्द के अतिरिक्त और किसी शब्द का व्यवहार नहीं होता । उप शु अनिरुक्त है, अनिरुक्त सर्वभाव है, वही सर्वकाम यहाँ अपेक्षित हैं । इसीलिए ( सर्वकामसमृद्धि के लिए ही ) यहाँ उपांशु बजन होता है । उपांशुभाव सर्वात्मक अनिरुक्तभाव का ही संग्राहक है, यही तात्पर्य है इसके साथ ही श्रुति लोकदृष्टि से यह भी शिक्षा दे रही है । कि, यदि तुझे अपने काम्यकर्म की सिद्धि अपेक्षित है, तो तत्साधक कम्मं का उपांशु रूप से ( चुपचाप - बिना किसी से कहे सुने ) ही अनुगमन करना चाहिए । लौकिक काम्य कर्म्म हो, अथवा शास्त्रीय, उस का घण्टाघोष करने से कर्म निरुक्त बनता हुआ अनिरुक्त आत्मप्रजापति की शक्ति से वञ्चित होजाता है । वागिन्द्रिय का प्रजापति मे सम्बन्ध नहीं है, जैसा कि " स प्रजापतिर्मनस एवानुवाच । तस्माद्यत् किन प्राजापत्यं यज्ञं बिते, उपांश्वेव तत् क्रियते अहव्यवाट्ट वाक् प्रजापतये आसीत् " ( शत ० १४५१२ ) इत्यरूप से आगे विस्तार से बतलाया जाने वाला है । यह विश्वास करने योग्य है कि, जो व्यक्ति अपने कर्म का यागिन्द्रिय से बखान करने लग जाते हैं, वे आत्मसहयोग खोते हुए कर्म्मसमृद्धि से सर्वथा वञ्चित ही होजाते हैं । सचमुच प्रदर्शन ही कार्यसिद्धि का अन्यतम शत्रु है || १० || दर्शपूर्णमास के सम्बन्ध में कितने ही वाशिक २१ सामिपनियों का अनुवचन आवश्यक मानते हैं । इस की उपपत्ति वे यह बतलाते हैं कि, १२ मास, ५ ऋतुएँ, ३ लोक, इसप्रकार सम्वत्सरयज्ञ के २० वर्ष है । २१ व स्वयं सूर्य है यही इस मम्रयज्ञ की अन्तिम गति 1 तथा प्रतिष्ठा है । यदि यहाँ भी २१ सामिधेनियों का अनुवचन होगा, तो २० संख्या से तो तममतुलित उक्त मासादि २० तम्वत्सरपर्वो का संग्रह होजायगा एवं २१ वी के अनुवचन से सूर्यप्रतिष्ठा प्राप्त होजायेगी ॥१२ ॥

परमवैज्ञानिक याज्ञवल्क्य उक्त उपपत्ति का उपहास श्रीशुन्य है, अप्रतिष्ठत है, उसीके लिए २१ का अनुवचन सूर्य " पत्नी श्री की कामना से २१ का समर्थन करेगा | भला ऐसा १२०५ करते हुए कहते हैं कि, जो यजमान सर्वथा करना चहिए अर्थात् जो ऐसा होगा, नही श्रीशुन्य यजमान दर्शपूर्णमास का आरम्भ

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तृतीय- चतुथ - अध्याय सामिधेनीबाह्मण शतपथब्राह्मण ही क्यों करेगा? | इसके लिए तो काम्येष्टि ही पर्याप्त हो जायगी । काम्येष्टि से जब गत- श्रीभाव का अर्जन होसकता है, तो भिर उम प्रतिष्ठा के लिए यह महाप्रयास निरर्थक है । साथ ही सामान्यस्थिति में रहने वाला जमान यदि २१ का अनुगमन करेगा, तो इस से इस में कोई विशेषता नहीं आएगो सूतिष्ठा का आकर्षण तो ज्योतिष्टोमयज्ञ पर ही अवलम्बित है हाँ यह बहुत सम्भव है कि गतिलक्षणा सूपसम्पति की भावना से जमान अपनी रही सही श्री भी और खो बैठे । इसलिए ऐसी उपपत्ति बतलाकर २१ का पक्ष स्थापन करना

केवल विचार ही विचार सरझना चाहिए । वस्तुतः इनका अनुवचन पद्धति विरुद्ध है ॥ १२ ॥

मूलनुवाद में बतलाया गया है कि, ' प्र यो बाजा ' इत्यादि प्रथम चा का, तथा ' श्राजुहोता दुवस्यत ' इत्यादि अन्तिम ऋचा का त्रिरावृत्ति से ( तीन तीन बार ) उच्चारण होता है । इस त्रिरावृत्ति पापीय, त्रिवृत् - उदयनीय - पक्ष की स्वाभाविक त्रिवृत् सम्पति का संग्रह होजाता है, वहाँ इसी त्रिवृद्भाव से लोकत्रयमन्तान - मम्पत्ति तथा प्राणत्रय सन्तान - सम्पत्ति भी प्राप्त होजाती है । निदानेन यह त्रिरावृत्त त्रिच लोकत्रयी, तथा आध्यात्मिक - प्राणत्रयी का प्रतिरूप है । प्रकृति में तीनों लोक एक ही पृथिवी-लोक के तीन वितान हैं । वहीं पार्थिव अग्नि कामदा से त्रिवृत् पश्चदश-- एकविश स्तोमरूप से तीन लोकों के वितान का कारगा बना हुआ है । एक के ही तीन परस्पर बद्ध वितान है । इसीप्रकार अपान--व्यान - प्राण, तीनों आध्यात्मिक प्राण क्रमशः स्तौम्यत्रिलोकी के पृथिवी अन्तरित बौ - लोकों के अग्नि-वायु-- श्रादित्य से सम्बन्ध रखते हुए एक ही के तीन सन्तत -- परपत्रद्ध-- अविच्छिन्नरूप है । जब कि श्राधिदैनिक लोक तथा आध्यात्मिक प्रागाय एक ही के तीन वितान है, साथ ही तीनों वैतानिकरूप एक दूसरे से बद्ध, तथा विच्छेद रहित हैं, तो तत्प्रतिरूपभूता इन दोनों प्रयन्त की त्रिवों में भी उसी सन्तत-का विच्छित्र सम्पत्ति का समावेश करना ही चाहिए तभी इस से उसका समान होगा एवं तभी उस से समतुलित इन के द्वारा लोक - प्राण - सम्पत्तियाँ प्राप्त होसकेंगीं । एकमात्र इसी प्रयोजन के लिए श्राद्यन्त की दोनों त्रिचों का एक ही श्वास में बिना मध्य में, अथ गन्त में विश्राम लिए उच्चारण होता है || १३ || जो याशिक वह कहते हैं कि, " जब एक श्वास में तीनों का उच्चारण नहीं होसके, तो क्या किया नाय? | अपनी शक्ति से ही तो उच्चारण होगा । इसलिए जहाँ श्वास टूटता हो, वहीं विश्राम लेते हुए स्वशक्त्यनुसार ही अनुवचन करलेना चाहिए । इस में कोई दोष नहीं है " । उन याज्ञिकों से हमारा ( याज्ञवल्क्य का ) यही कहना है कि, अभी वे प्राकृतिक यज्ञस्वरूप के परिज्ञान से वञ्चित हैं । उहें यह नहीं भुला देना चाहिए कि, यज्ञ एक प्राकृतिक कर्म है । इस में अपने बुद्धिवाद, एवं तदनुगता अपनी कल्पना का कोई महत्त्व नहीं है । यदि ऋङ मध्य में विश्राम कर लिया जायगा, तो न लोकसम्पत्ति प्राप्त होगी, न प्राणसम्पत्ति । क्योंकि मध्यविश्राम में इन त्रिचों का उन त्रयीभावों से समतुलन ही नहीं होगा । अतः मध्य विश्राम को सर्वधा अवैज्ञानिक ही समझना चाहिए ॥ १४ ॥

यदि होता तीनों का एकसाथ, एकश्वास मे उच्चारण न कर सके, तो कम्मैतिकर्त्तव्यता कैसे पूरी की जाय?, यह विप्रतिपत्ति उठाई जाती है । मध्य में विश्राम करना सर्वथा दोषावह है । ऐसी परिस्थिति में एक एक ऋचा पर विश्वास कर लेने से यथाकथंचित् निर्वाह किया जासकता है । तीनों लोक, तीनों प्राण एक ही के तीन विवर्त्त बनते हुए भी स्वतन्त्र लोक, तथा स्वतन्त्र प्राण है । व्यष्टि - दृष्टि से तीनों पृथक् १२०६

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तृतीय- चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड भी हैं । इसलिए एक एक पर विश्राम करने से भी काम चल सकता है । परन्तु ऋङ मध्य में विश्राम पृथक् करना तो सर्वथा ही अनपेक्षित है । अथवा एकैकानुबचनपक्ष में एक एक ऋचा से भी तीनों लोक - सम्पत्तियों का संग्रह किया जासकता है । प्रत्येक सामिधेनी - मन्त्र गायत्रीछन्द के सम्बन्ध से त्रिपदान्वित है । एक एक पद को एक एक लोक का संग्राहक माना जासकता है । तीनों पदों के ' अनवान् ' ( एकश्वास से ) उच्चारण से तीनों लोकसम्पत्तियाँ प्राप्त होसकती हैं । अब प्रश्न बच जाता है- प्राणसन्धान का । इसका समाधान गायत्री कर रही है । तीन पदों की समष्टि एक गायत्री है । श्राग्नेय - प्राणानुगता गायत्री प्राणात्मिका मानी गई है । एक गायत्री पूर्ण एक प्राण है, जिस के गर्भ में तीन पदों के सम्बन्ध से तीनों प्राण विद्यमान हैं । इस से प्राणत्रयी - सम्पत्ति का भी आधान होजाता है । इसप्रकार तीन पदों से लोकत्रयी का, त्रिपदा कृत्स्ना गायत्री से प्राणत्रयी का संग्रह होजाता है । इसदृष्टि से एक एक पक्ष में लोक - प्राण युग्मों की सन्तति- सम्पत्ति का संग्रह होजाता है । अतः इस ' एकैकामेवाननवानन् ' पक्ष को तो फिर भी माना जासकता है । परन्तु ऋङ मध्य में विश्राम करना तो सर्वथा ही दोघावह है ॥ १५ ॥

कहा गया है कि, गायत्री छन्दस्का १५ सामिधेनियाँ अक्षर - सम्बन्ध से सम्वत्सर के अहोरात्रों की संग्राहिका बन रहीं हैं । सम्बत्सर के अहोरात्र परस्पर बद्ध से विच्छेद रहित बन कर ही ' रात - दिन - दिन-रात ' इस क्रम से चक्रवत् घूमते रहते हैं । ऐसी परिस्थिति में यह श्रावश्यक है कि, १५ हों सामधेनी - मन्त्रों को एक साथ परस्पर सम्बद्ध बना कर ही उच्चारण किया जाय । ऐसा न हो कि एक मन्त्र बोल लिया, इतस्ततः देखने लगे, थोड़ा समय निकल गया, इसप्रकार विच्छेदपूर्वक १५ हों का अनुवचन पूरा किया । जब प्रकृति मे अहोरात्र विच्छेदरहित हैं, तो तत्स्थानीय इन १५ ह्रों का भी विना इधर उधर देखे क्रमत्रद्ध एक के बाद दूसरी, तीसरी, इस क्रम से सन्ततरूप से ही उच्चारण करना चाहिए । यदि ऐसा न कर त्रिच्छेद डाला जायगा, तो अहोरात्र की सन्तत - सम्पत्ति तो प्राप्त नहीं हीं होगी, साथ ही शत्रुप्रवेश को अवसर और मिल जायगा । अहोरात्रसम्पत्ति यजमान की अपनी भोग्या सम्पत्ति है । इसमें विच्छेद डालना शत्रु को दायादभोक्ता ( हिस्सेदार ) बनाने का अवसर ( उपस्थान ) देना है । ऐसी छिद्रानुगता भोग्य-सम्पत्ति शत्रु की दृष्टि में आजाती है । अतः सामिधेनियों का सन्तत ही अनुवचन होना चाहिए || १६ || तीसरे अध्याय में पाँचवाँ एवं तीसरे प्रपाठक में दूसरा सामिधेनी-9 ब्राह्मण समाप्त - ब्राह्मणानुगत प्रथम ब्राह्मण अत्र उपरत .१--- * तीसरा अध्याय समाप्त 3 १२०७

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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीत्राह्मण चतुर्थ अध्याय उपक्रान्त ४ शतपथब्राह्मण चौथे अध्याय में पहिला, एवं तीसरं प्रपाठक में तीसरा ब्राह्मण सामिधेनी - ब्राह्मणानुगत दूसरा ब्राह्मण -२--आग्नेयी सामिवेनी, गायत्रीछन्द, ११ मूलसंख्या, आद्यन्त के मन्त्रों की त्रिरावृत्ति, " पञ्चदश संख्या, " काग्वेयनुगता सप्तदश संख्या, आद्यन्त के दोनों त्रिचों का एकश्वास में उच्चारण, ८१५ हों सामिधेनी मन्त्रों का सन्तत - अविच्छिन्न उच्चारण, इन विशेषधम्मों से क्रमश: ' अग्निःस्वरूप - प्राप्तिपूर्वक ब्रह्मवीर्याधान े प्रातिस्त्रिक गायत्रवीर्याधान, क्षत्रवीर्य्याधान, * प्रायणीयोदयनीयानुगता यज्ञियत्रिवृनसम्पत्ति संग्रह, " वनसम्पत्ति - रात्रि सम्पत्ति - अहः सम्पत्ति, • श्रनिरुक्तानुगता सर्वसम्पत्तिसंग्रह, ७ लोक - प्राणसम्पत्ति संग्रह, ८ अहोरात्र की अनन्यभोग्यता, इन फलों का सोपपत्तिक निरूपण ही पूर्वब्राह्मण के परिगणित विषय हैं । अत्र सामिधेनियों के सम्बन्ध में ही ' सामात्मिका ' एक विशेषता बतलाते हुए इतिकर्तव्यता का स्पष्टीकरण किया जाता है । जिस प्राकृतिक यज्ञ से सम्पूर्ण प्रजा की उपपत्ति हुई है, वह प्राकृतिक यज्ञ सत्य पर ही प्रति--ष्ठत है । इसी सम्बन्ध में ब्राह्मण ग्रन्थों में एक आख्यान आया है--" प्रजापति की सन्तान होने से ' प्राजापत्य " इस उपनाम से प्रसिद्ध देवता और असुर, दोनो पिताप्रजापति के दाय ( सम्पत्ति ) का विभाग कराने की इच्छा से प्रजापति के समीप प्रणतभाव से ( देवता ), एवं अधिकार - भावना से ( असु ( ) उपस्थिति हुए । प्रजापति के दायादकोश ( निजी सञ्चित सम्पति ) अपनी ' सत्य और अनृत ' नाम की वाङमयी सम्पत्ति ही प्रधान थी । प्रजापति ने ' आधा सत्य, आधा अमृत तो देवताओं में बाँट दिया, एवं आधा सत्य, तथा आधा अमृत असुरों में बाँट दिया । देवताओंने चाहा कि, अपने भाग का था अत यदि असुर लेलें, तनस्थान में अपना श्रधा सत्य अपने को देदें, तो बड़ा अच्छा हो । इसीप्रकार असुरोंन भी यही चाहा कि, अपने को जो आवा सत्य मिला है, वह देवता लेलें, और बदले में आधा अमृत हमें देदें, तो बड़ा अच्छा हो " । आगे जाकर ऐसा ही हुआा । फलतः देवताओं के दायाद में सम्पूर्ण सत्य आगया, एवं असुरों के दायाद में सम्पर्ण अनृत श्रागया । १२०८