Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 941–950
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 941–950
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड अपने इस कृत्स्न सत्य को प्राप्त कर देवताओंने यह निश्चय किया कि, अपन यज्ञ कर के इस सत्य को त्रैलोक्य में फैलादें । देवताओंने ऐसा ही किया । जिस यज्ञ के आधार पर देवताओंने बाक्सत्य का वितान किया था, वह वाक् सत्य यही त्रयीविद्या है " ' शत ०६।५।१ ब्रा ० ) । उक्त श्राख्यान की वैज्ञानिक व्याख्या की ओर न जाते हुए प्रकृत में इस से यही बतलाना है कि, सत्य और यज्ञ का घनिष्ठ सम्बन्ध है । यज्ञ से हो सत्य का वितान होता है, एवं सत्य के आधार पर ही यज्ञकर्म्म सम्पादित होता है । यह सत्यतत्व श्रुति के शब्दों में हीं " ऋ -यजुः -- सामात्मिका त्रयीविद्या ' ' ही है । इस से यही निष्कर्ष निकलता है कि, त्रयीवेद ही यज्ञ को मूलप्रतिष्ठा है, जिस तत्त्वात्मिका त्रयीविद्या का शब्दात्मक वेदग्रन्थों में निरूपण हुआ है । ‘ ऋक् - यजुः - साम ' तीनों तत्त्वों के आधार पर हृद्य प्रजापति यज्ञ करने में समय हुए हैं । ऋक् - वेद से अग्नितत्त्व का, यजुः से वायु का, तथा माम से आदित्य का आविर्भाव हुआ हैं । त्रयीवेदोत्पन्न अग्निवाय्वादि देवताओं का परस्पर सङ्गम ही ' यज्ञ ' है * । प्रत्येक वस्तुपिड एक एक स्वतन्त्र यज्ञसंस्था है । इस प्रत्येक यज्ञसंस्था में ' पदं पुनःपदम् ' भेद से दो दो पर्व हैं । स्वयं वस्तुपिण्ड ' पदम ' है, एवं वस्तु पिण्ड के केन्द्र से प्राणरूप से निकल कर वस्तु पिण्ड के चारों ओर बड़ी दूर पर्यन्त अपनी व्याप्ति रखने वाला बहिर्मण्डल उस वस्तु पिएड का ' पुनः पदम् ' है । इसी पुन: पढं को ' महिमामण्डल ' - ' साहस्रीमण्डल ' - ' चपट्कार मण्डल ' - ' विश्वरूप ' यादि नामों से व्यवहृत किया गया है । प्रत्येक वस्तुपिण्ड को वस्तु पिण्ड, वस्तुमहिमामण्डल, एवं पिगड - मण्डलान्तर्गत भेट वस्तुतत्त्व, से तीन भागों में विभक्त देखा जासकता है । पिण्ड भी कोई सतासिद्ध वस्तु नहीं है, अपितु आकारमात्र है । मण्डल भी कोई सत्तासिद्ध पदार्थ नहीं है, अपितु आकारमात्र है । जिस का यह पिण्ड है, जिस का यह मण्डल है, पिण्ड, तथा मण्डल से पिण्डायित - मण्डलायित वही तत्त्व सत्तासिद्ध पदार्थ है । पिण्डात्मिका सीमा अन्तःसीमा है, एवं मण्डलात्मिका सीमा बहि: मीमा है । इन दोनों सीमाओं से पिण्ड मण्डल - गत वस्तुतत्त्व सीमित बना हुआ है । पिण्डसीमा ही, जिसे कि हम ' मूर्त्ति ' कहेंगे, ' ऋग्वेद ' है । मण्डलसीमा को हो ' सामवेद ' कहा जायगा, एवं उस तीसरे सीमित सत्तासिद्ध वस्तुतत्त्व को ' यजुर्वेद ' कहा जायगा । इसप्रकार इस त्रयीदृष्टि से प्रत्येक वस्तु में त्रयीवेद की उपलब्धि होरही है । दूसरे शब्दों में त्रयीविद्या के गर्भ में ही सम्पूर्ण भौतिक पदार्थों की उपलब्धि हो रही है, जैसा कि - " त्रय्यां वाव विद्यायां सर्वाणि भूतानि ' ( शत ० १० | ४ | २ | २२ ) इत्यादिं श्रुति से प्रमाणित हैं । ऋग्वेद छन्दोबेद है. सामवेद वितानवेद है, एवं यजुर्वेद रसवेद है, जैसा कि ' उपनिष— द्विज्ञानभाष्यभूमिकादि में विस्तार से प्रतिपादित है । छन्दो - लक्षण ऋग्वेद मूर्ति का निर्मापक है । त्रितानलक्षण सामवेद मूर्त्तिमण्डल - लक्षण बाह्य तेजोमण्डल का स्वरूपसमर्पक है, एवं रसलक्षण * - ' अनि वायु -रावयस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम् । दोह यज्ञसिद्धयर्थमृग्यजुःसामलक्षणम् ' ( मनुः ) । १२०६
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चतुथ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण यजुर्वेद मूर्त्तिमण्डलान्तबंर्त्ती रसात्मक गतिभाव का प्रवतक है । इस तात्त्विक वेदस्वरूप - विवेचन से निष्कर्ष यही निकला कि, वेदत्रयी के आधार पर जिस यज्ञ की स्वरूप - निष्पत्ति बतलाई गई है, उस का प्रधान स्थान बहिर्मण्डलात्मक वितान लक्षण सामवेद ही बन रहा है । पूर्व में साम का आदित्य से सम्बन्ध बतलाया गया है । पाठकों को सम्भवतः यह भी स्मरण होगा कि, हम पूर्वब्राह्मण के विवेचना - प्रकरण में ' स्वर विज्ञान ' का स्पष्टीकरण करते हुए यह बतलाया था कि, स्वर का आदित्य से सम्बन्ध है, एवं स्वर्लोकस्थ दिव्यप्राण देवता भी स्वरात्मक ही हैं । इन स्वरात्मक प्राण देवताओं का परस्पर यजन ही यज्ञ है । स्वरतत्त्व श्रदित्यात्मक है, आदित्य सामात्मक है । फलतः ‘ स्वर ’ - और ‘ साम ' की एकरूपता सिद्ध होजाती है । पिण्डात्मिका ऋक् यदि पद्यस्थानोया है, मध्यस्थित यजुः यदि गतिधम्मं से गद्यस्थानीय है, तो मण्डलात्मक साम इसी वितानात्मक स्वरभाव से गेयात्मक है । वितान ही गान है, गान ही साम है, साम ही तत्तद्वस्तु - महिमा मण्डल की अबसान -भूमि है । केन्द्र से बाह्य परिधि - पर्यन्त वर्त्त लवृत्ताकारात्मकं सहस्र मण्डल होते हैं । अतएव सामतत्त्व सहस्र-वर्मा कहलाया है । इस सहस्रवर्मा साम के उस स्वरूप का हमें विचार करना है, जिस की सीमा के गर्भ में पार्थिव सम्वत्सरयज्ञ प्रतिष्ठित है । इस सम्वत्सरयज्ञ का वितान भूपृष्ट से आरम्भ कर २१ एकर्विशस्तोम पन्त होता है । २१ स्तोमपर्य्यन्त पार्थिव मण्डल ही ' रथन्तरसाम ' कहलाया है । त्रिवृदग्नि, पञ्चद-शत्रायु, एकत्रिंश आदित्य, ये मुख्य देवता, अग्निप्रमुख आठ वसुगरण, वायुप्रमुख ११ रूद्रगण, आदित्यप्रमुख १२ श्रादित्यगण, १ प्रजापति, १ वपट्कार, ३३ प्राणदेवता यज्ञियदेवता कहलाए हैं ÷ । इन यज्ञिय देवताओं से ही यज्ञ का स्वरूप निष्पन्न हुआ है । यह यज्ञमण्डलात्मक महिमामण्डल उभयतः-परितः - उसी वितानात्मक साम से परिग्रहीत है । दूसरी दृष्टि से सामव्याप्ति का विचार कीजिए । पार्थिव सामपृष्ठों को हृदयपृष्ठ, स्पृश्यपृष्ठ ( भूपिण्ड ), त्रिवृत्पृष्ठ, पचदशपृष्ठ, सप्तदशपृष्ठ एकविशपृष्ठ, पारावतपृष्ठ भेद से सात भागों में विभक्त किया जासकता है । ये सातों पृष्ठ सामपरिभाषा में क्रमश: हिंकार, प्रस्ताव, आदि, उद्गीथ, प्रतीहार, उपद्रव, निधन, इन नामों से व्यवहृत हुए हैं । यदि त्रिवृत् का स्पृश्यपृष्ठ में अन्तर्भाव कर लिया जाता है, तो त्रय-स्त्रिंशपृष्ठ एक स्वतन्त्र पृष्ठ बन जाता है । उस समय हृयपृष्ठ, त्रिवृदन्तःस्पृश्य - दृश्यपृष्ठ, सप्त-दशपृष्ठ, एकविशपृष्ठ, त्रयस्त्रिंशपृष्ठ, पारावतपृष्ठ ( अष्टाचत्वारिंशत्पृष्ठ ) इस क्रम से सात पृष्ठ
* " भ्यो जातां सर्वशो मूर्तिमाहुः सर्वा गतिर्याजुषी हैव शश्वत् ।
सर्वं तेजः सामरूप्यं ह शश्वत् सर्व हीदं ब्रह्मणा हैव सृष्टम् ” ॥
- तै त्रा ० ३ १२६,१,२ " इति स्तुतासो सथा रिशादसो येस्थ त्रयश्च त्रिंशच्च । मनोर्देवा यज्ञियासः " ॥ [ ८ । ३० । २ । ] । १२१०
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चतुथ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड हो जाते हैं । यदि पृष्ठ का भूपृष्ट में अन्तर्भाव मान लिया जाता है, तो त्रिणव के समावेश से सात पृष्ठ होजाते है । इसप्रकार ' लोकेषु सप्तविधं सामोपासीत ' इस अनुगमवचन का तीन प्रकार से समन्वय किया जा सकता है । ? – हृद्य पृष्ठ ( केन्द्र ) —– हिङ्कार – २ -स्पृश्यपृष्ठ ( भू पिएड ) प्रस्ताव -३ – त्रिवृत् पृष्ठ ( ६ ) – आदि ४ – पञ्चदशपृष्ठ ( १५ ) - उद्गीथ-५-( - सप्तदशपृष्ठ ( १७ ) - प्रतीहार ६ – एकविंशपृष्ठ ( २१ ) - उपद्रव -७- - पारावतपृष्ठ ( ४८ ) - निधन --१ हृद्यपृष्ठ-( केन्द्र ) – हिङ्कार २ – त्रिवृदन्तर्भूपृष्ठ ( ६ ) —प्रस्ताव ३ – पञ्चदशपृष्ठ ( १५ ) —- आदि " इत्थं सप्तविधं सामोपासीत " ४ – सप्तदशपृष्ठ ( १७ ) — उद्गीथ ५ – एकत्रिंशपृष्ठ ( २१ ) – प्रतीहार - * " " इत्थं वा सप्तविधं सामोपासीत " ६ - त्रयस्त्रिंशपृष्ठ ( ३३ ) – उपद्रव ७— श्रष्टा चत्वारिंशत्पृष्ठ ( ४८ ) – निधन - * --१२११
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चतुर्थ अध्याय १ - हृत् त्रिवृदन्त पृष्ठ - हिङ्कार-२ – पञ्चदशपृष्ठ – प्रस्ताव ३ – सप्तदशपृष्ठ —-आदि ४ – एकत्रिंशपृष्ठ —- उद्गीथ-५ – त्रिणवपृष्ठ - प्रतीहार ६ – त्रयस्त्रिंशपृष्ठ - - उपद्रव - अष्टाचत्वारिशत पृष्ठ - निधन ७. – हिङ्कार -१ – भूपृष्ठ-२ -- त्रिवृत् पृष्ठ प्रस्तान ३ – पञ्चदशपृष्ठ आदि ४- सप्तदशपृष्ठ उद्गीथ -५ -- एकत्रिंशपृष्ठ - प्रतीहार ६ -- त्रिणव पृष्ठ-- उपद्रव ७- त्रयस्त्रिंशपृष्ठ - निधन---सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण * " इत्थं वा सप्तविधं सामोपासीत " - " इत्थं वा सप्तविधं मामांपासीत ” १२१२ उक्त साम विपत्तों की विवेचना की ओर न जाते हुए प्रकृत में हमें केवल यही बतलाना है कि, सामतत्त्व ही प्रकृति - यज्ञ की प्रतिष्ठा है । इस साममण्डल की उस उक्थ- हृद्य बिन्दु को, जहाँ से प्राणात्मक साम का प्राथमिक उदय होता है, ऋषियोंनें ' हिङ्कार ' नाम से व्ववहृत किया है । एवं तदव्यवहित प्रदेश में प्रतिष्टित उपक्रम बिन्दु को ' प्रणव ' नाम से व्यवहृत किया है । हिङ्कारात्मक यही प्रणवसाम सप्तदश स्थान में ‘ उद्गीथोङ्कार ' रूप में परिणत होता है । एवं सर्वान्त में यही सर्वरूप में परिणत होता हुआ-' सर्वोङ्कार ' कहलाया है । इसप्रकार हिङ्कारात्मक प्रणवसाम के ग्रहण से सम्पूर्ण साम गृहीत होजाता है ।
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चतुथं त्रध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड अत्र संक्षेप से सङ्गीतदृष्टि से भी हिङ्कारात्मक साम की मीमांसा कर लीजिए । नाद, स्वर, श्रुति, शब्दादि भेद से सङ्गीत के अनेक पर्व माने गए हैं । इन में नाद ही सङ्गीत की सर्वमूलभित्ति है । नादब्रह्म के आधार पर ही श्रुति का उत्थान होता है । श्रुति के द्वारा ही स्वर का आविर्भाव होता है. एवं स्वर ही आगे जाकर शब्दाभिव्यक्ति का जनक बनता है । सङ्गीतानुगतं - नादश्रुति - स्वर - स्वरूप - दिग्दर्शनम् सामानुगत ‘ हिंकार ' के समन्वय - - प्रसङ्ग में ' नाद - श्रुति स्वर ' मावों से समन्वित उस ' सङ्गीत ' की स्वरूप - मीमांसा का भी हमें दो शब्दों में यशोगान कर लेना चाहिए, जिस इत्थंभूत ' सङ्गीत ' को आत्मबुद्धि से समता संचिन्मूला निष्ठा से संस्टष्ट ही मानते हुए ऋषिप्रज्ञा ने आत्मबुद्धिनिष्ठा प्रधान एतद्द ेशीय ‘ ब्राह्मरण ' के लिए तो सर्वात्मना नियन्त्रित ही कर दिया है, जैसा कि - ' तस्याद् ब्राह्मणो न नृत्येत ’ न गायेत ' इत्यादि श्रौत - सन्दर्भ से स्पष्टतमरूपेण प्रमाणित है । इस प्रमाणन का कारण भी स्पष्टतम है । प्रकृति के तात्विक स्वरूप के परीक्षक वैज्ञानिक महर्षियोंनें मानवीय मन का एक प्रधान दोष माना है--' आाग्ला ', एवं मानवीय शरीर का एक प्रधान दोष माना है- ' मालय ' । एवं गायन - नर्त्तन - याद्यात्मक सङ्गीत येन केन रूपेण ये दोनों दोष न्यूनाधिकमात्रा से सन्निविष्ट रहते हीं हैं । इन दोनों से - क्रमशः मनोऽनुगत-' आग्ला ' दोष से तो मानवीय आत्मा की चिन्तन - निधिध्यासन -मूला ' संवित् ' शक्ति अभिभूत होजाती है, एवं शरीरानुगत ' माय दोषसे मानवीया बुद्धि का निष्टानुगत - व्यवसायात्मक- " वृतिगुण ' अभिभूत होजाता है । ' माल्व्यदोष ' को सङ्गीत के ' नृत्यविभाग ' में समाविष्ट माना गया है, जिस ' नृत्याङ्ग ' का प्रधानरूप के शरीर से ही सम्बन्ध है | एवं ' आग्लादोष ' को सङ्गीत के ' गायनविभाग ' में समाविष्ट माना गया है, जिस ' गायनाङ्ग ' का प्रधानरूप से मन से ही सम्वन्ध माना गया है । दोनों दोषों के स्वरूप के सम्बन्ध में बात कुछ समझने जैसी है । प्रकृतिसिद्ध पञ्चपर्वा प्राकृत- विश्व के सुप्रसिद्ध ' चन्द्रमा ' से तो मानवीय ' मन ' का स्वरूप निर्माण हुआ है, एवं भूपर्व ( पाञ्चभौतिक-भूपिड ) से मानवीय ' शरीर ' की स्वरूप - निष्पत्ति हुई है । चान्द्र मण्डल सौम्य - गन्धर्व - प्राण की यावासभूमि माना गया है, एवं पार्थिव मण्डल " अद्भ्यः पृथिवी ' रूप से अन्य प्राणात्मक - ' ग्रप्सरा प्राण ' की श्रावासभूमि माना गया है । मनोऽनुगत चान्द्र गन्धर्वप्राण ही गायन का प्रवर्तक है, एवं शरीरानुगत पार्थिव सराप्राण ही नर्त्तन का प्रवर्तक है । हास, परिहास, आमोद, प्रमोद, क्रीड़ा, रति, श्रादि आदि मनः- शरीर - निबन्धन यच्चयावत् कामभोग चान्द्र पार्थिव गन्धर्व, तथा अप्सरा प्राणों से हीं अनुप्राणित माने गए हैं, जैसा कि ' निम्न लिखित कतिपय श्रुतिवचनों से स्पष्ट प्रमाणित है— ( १ ) - मनोविभूतयः -१ – असो वै सोमो राजा विचक्षणश्चन्द्रमाः ( कौ ० ब्रा ० उप ०४ | ४ | १० ) । २ - चन्द्रमा गन्धर्वः ( यजुः सं ० १८४०१ ) - ( शत ० ६ | ४ | ४ | ६ | ) । ३ – रूपभिति गन्धर्वाः - उपासते ( शत ० १०५/२/२० । ) । १२१३
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चतुथ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण ४ – योषित्कामा वै गन्धर्वाः ( शत ० ३ | २ | ४ | ३ | ) ५ – स्त्रीकामा वै गन्धर्वाः ( ऐ ० ब्रा ० १।२७ । ) । ६ – मनो मे, रेतो मे, पुनः सम्पूतिम्में, तन्मे त्वयि चन्द्रमसि ( जै ० उ ० ब्रा ० ३।२७।१४ ) । ७ – गन्धो मे, मोदो मे, प्रमोदो मे, तन्मं युष्मासु गन्धर्वेषु ( जै ० उ ० ब्रा ० ३।२५ | ४ | ) ( २ ) - शरीरविभूतयः -शतपथब्राह्मण १ – इयं वै पृथिवी भूतस्य प्रथमजा ( यजुः सं ० ३४ | ४ | ) -शत ० १४।१।२।१० । २ – अद्द्भ्यः पृथिवी ( तै ० उप ० २1१1 ) । ) । ३ – गन्ध इत्यप्सरसः - उपासते ( शत ० १० १५ २।२० ४ – किन्नु मेऽस्मासु -- अप्सरस्सु इति १ - हासो मे, क्रीड़ा मे, मिथुनम्मे ( जै ० उ ० ३२५८। ) । ५- गन्धेनैव च रूपेण गन्धर्वाप्सरसश्चरन्ति ( शत ० ६ | ४ | १ | ४ | ) ) प्राकृतिक--चान्द्रमनोऽनुगत गन्धर्वप्राण, एवं पार्थिवशरीरानुगत अप्सराप्राण इन दोनों ' नारद ' ( पारमेष्टय आपोमय नार--प्राणों के आधार पर सुप्रसिद्ध - ' तुम्बुरु ', तथा - गन्धर्वजात्यनुगत- - वाद्यात्मक मनः शरीरनिबन्धन ' सङ्गीत ' प्रवर्त्तक प्राण ) नामक ऋषिप्राणों के समन्वय से ही नृत्य गीत ' कार, नारद ऋषिप्राण का आद्यक्षर ' न ' कार, का अविर्भाव हुआ है । तुम्बुरु ऋषिप्राण का श्रावक्षर ' त अक्षरों की समष्टि इसी तथ्य के आधार पर एवं ' ऋषि ' का आद्यक्षर ' कार ', इन तीनों ' तन र ' है, जैसा कि " त -- न - न-- रीम् " - त - न - न--सङ्गीतविशारदों के सङ्गीतोपक्रममें माङ्गलिक- संस्मरण - बन रही - नारद - नामक - सङ्गीतस्त्ररप्रवर्त्तक रीम् ” - ( ‘ त ’ – तुम्बुरु, ' न ' नारट, र ऋषि अर्थात् कर -- रहे तुम्बुरु हैं ) - इत्यादि से प्रसिद्ध है । ऋषियों का संस्मरण करके ही हम सङ्गीत आरम्भ , एवं अप्सराप्राणात्मक गन्धर्वप्राणात्मक मन के साथ प्रधानरूप से ' तुम्बुरुप्राण ' का सम्बन्ध है - पार्थिव शरीर के केन्द्र में चित्य-शरीर के साथ प्रधानरूप से - ' नारदप्राण ' का सम्बन्ध है । पाञ्चभौतिक - अमृत मृत्युमय * आग्नेय प्रजापति ( मर्त्यमूत ) चितेनिधेय ( अमृत - प्राण ) - समन्वयात्मक * अर्द्ध ह वै प्रजापतेरात्मनो मर्त्यमासीदद्ध ममृतम् ” - शतपथब्राह्मणे अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन! " ( गीतायाम् ) । १२१४
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड कि – “ प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानः " इत्यादि प्रतिष्ठित माने गए है, जैसा - प्रजापति का प्राणमहिमात्मक प्रमाणित है । इस केन्द्रस्थ श्राग्नेय-- पार्थिव यजुःश्रुति से में, तथा स्वरात्मक सङ्गीत वह ' नाहमण्डल ' है, जिस के गर्भ श्रति मण्डल ही सङ्गीत में हृद्य प्राजापत्य अग्नि ( कायाग्नि ), अभिव्याप्त रहता है, जिस इस नाद श्र ति समन्वयात्मक - नामक वर ( मन्द - मध्य - तार -- नाम की मन, चायव्यप्रारण, तदनुप्राणित उदा - अनुदात्तस्वरित, ये भाव समन्वित रहते हैं, जिनके स्वरू५-स्वरत्रयी ), एवं व्यञ्जनात्मिका ध्वनिर्भावोपेता वैखरीबाकू ही सङ्गीत प्रेमियों का ध्यान आकर्षित किया समन्वय के लिए सङ्गीतशास्त्र के सुप्रसिद्ध इन पद्यों की ओर जारहा है-चैतन्यं सर्वभूतानां निवृत्त ' जगदात्मना ॥ ' नादब्रह्म ' तदानन्दमद्वितीयमुपास्महे ॥ १ ॥
नादोपासना देवा ब्रह्म - विष्णु - महेश्वराः ॥ भवन्त्युपासिता नूनं यस्मादेते तदात्मकाः ॥ २ ॥
आत्मा विवक्षमाणोऽयं मनः प्रेोरबते, मनः - ॥ देहस्थं वह्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम् ॥ ३ ॥
ब्रह्मग्रन्थिस्थितः सोऽथ क्रमादूर्ध्वपथे चरन् ॥ २ 3 नाभि हृत्कण्ठ मूर्द्धा - स्वामिर्भावयते ध्वनिम् ॥ ४ ॥
I 8 ५ नादोऽति, सूक्ष्मः सूक्ष्मश्च, पुष्टो ऽपुष्टश्व, कृत्रिम: ॥ इति पञ्चाभिधां धचे पञ्चस्थानस्थितः क्रमात् ॥ ' न ' -- कारं ' प्राण ' नामानं, ' द ' - कारं ' अनल ' विदुः ॥ जातः प्राणाग्निसंयोगात्, तेन - ' नादो ऽभिधीयते ॥ ६ ॥।
व्यवहारे त्वसौहृदि मन्द्रोऽभिधीयते ॥ कण्ठे मध्यो, मूर्ध्नि तारो, द्विगुणश्चोत्तरोत्तरः ॥ ७ ॥
--शार्ङ्ग देवविरचिते - सङ्गीतरत्नाकरे -- स्वराध्याये-से पुञ्जीभूत, एवं सम्पुटित ज्ञानजनित - भावना - संस्कारपुञ्जों से, तथा कम्र्म्मजनित - वासना - संस्कारपुटों के साथ समन्वित होकर ही मानव की कर्म्मभोक्ता कर्म्मात्मा देही ( ' जीव ' नामक ' आत्मा ' ) अपनी बना सौरी रहता बुद्धि है । इत्थंभूत भोक्तात्मा से समन्विता प्रारब्ध - कर्म्मजनिता ऐहलोकिकी जीवनयात्रा का श्रभियन्ता सौम्य प्राणात्मक मानवीय मन इन्द्रियों के प्रेरणात्मिका बुद्धि के प्रेरणाचल को अपना आधार बना कर चान्द्र अनुपात से ऐन्द्रियक - भौतिक अर्थों - विषयां की माध्यम से भोक्तात्मा के जन्मान्तरीय शुभ - अशुभ- विषयकामना संस्कारों के ) को हम आत्मा की इच्छा कह सकते हैं, कामना करता रहता है, जिस इस श्रर्थकामना ( १२१५
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शथपथब्राह्मण एवं मन की इच्छा कह सकते हैं । वस्तुगत्या आत्मा, ( आत्मानुगत संस्कार ), बुद्धि ( संस्कारप्रेरिका बुद्धि ), एवं मन ( इन्द्रियमाध्यम से आत्मसंस्कारानुगता बौद्धिकी प्रेरणा को अभिव्यक्त करने वाला विषयानुगत मनोव्यापार ), इन तीनों की समन्वितावस्था को ही हम ' मानव की इच्छा ' कह सकते हैं । अथवा यों कह लीजिए कि, आत्मेच्छा पहिले बुद्धि में सङ्क्रान्त होती है, बुद्धि के द्वारा वही सांस्कारिकी इच्छा मन पर आती है, एवं मनोद्वार से इस का अनुधावन इन्द्रियों के प्रति होता है । अपनी तथोक्ता मानसेच्छा का ही परिणाम ' शब्दोत्पत्ति ' माना गया है, जिस का निष्कर्ष यही है कि, आत्मबुद्धि से समन्विता अर्थानुगता मानसेच्छा का प्रथम प्रथम उस शारीरिक - अग्नि पर ही आघात होता है, जो प्राणाग्नि पाञ्चभौतिक शरीर में आलोमभ्यः श्रनखाग्रेभ्यः ( कैशलोमों को, तथा नख के अग्रभागों को छोड़ कर सर्वाङ्ग शरीर में ) परिव्याप्त रहता है, एवं जिस का ' वैश्वानराग्नि ' रूप से उपनिषदों में स्वरूप - निरूपण हुआ है । ' आयो द्यां भात्या - पृथिवीम् ' - ' वैश्वानरो यतते सूर्येण ' के अनुसार जैसे आधिदैविक वैश्वानराग्नि भूकेन्द्र से आरम्भ कर सूर्य्य - पर्यन्त अभिव्याप्त है, तथैव तदंशभूत यह आध्यात्मिक- वैश्वानर - अग्नि भी भूकेन्द्रात्मका ब्रह्मग्रन्थि से आरम्भ कर सूर्यकेन्द्रात्मक ब्रह्मरन्ध्र पर्य्यन्त परिव्याप्त है । पार्थिव - पञ्चभूतों को अपना अधिष्ठान ( व्याप्तिस्थान ) बनाए रखने वाला, अतएव अपने त्र्यात्मक रूपों से भूपति - भुनस्पति- भुवनपति - नामों से प्रसिद्ध रहने वाला यह वैश्वानराग्नि प्रचण्डवेग से शरीर में धक् धक् ही कर रहा है, जिस के अनुबन्ध से ही मानव की भौतिकी स्वरूप – सत्ता सुप्रतिष्ठिता रहा करती है । हम अपने भौतिक शरीर का जहाँ से भी स्पर्श करते हैं, उसे वहीं से उष्ण ( तापधर्मा - गरम ) उपलब्ध करते हैं । प्रत्यक्षानुभूता यह ऊष्मा ( ताप - गर्मी ) भूतानुगता उसी वैश्वानर अग्नि की साक्षात् दृष्टि ( दर्शन - साक्षात्कार ) है । एवमेव यदि हम अपने दोनों हाथों की दोनों अनामिका - अङ्ग लियों से दोनों नासाच्छिद्र, एबं दोनों अङ्गुष्ठों से दोनों कच्छिद्र अवरुद्ध कर लेते हैं, तो हमें अपने हीं शरीर में उसी प्रकार का एक वक् - धक्- शब्द सुनाई पड़ता है, जैसे कि - प्रज्ज्वलित भूताग्नि का शब्द हम सुना करते हैं । यही नादात्मक शब्द - श्रवण वैश्वानर अग्नि की श्रुति ( श्रवणात्मक साक्षात्कार ) है । यही ' अनाहतनाद ' ( बिना - किसी अन्य -- अघात - प्रत्याघातों के अजस्ररूप से प्रक्रान्त रहने वाली निनाद - ध्वनि ) है | शरीरात्मक अध्यात्मवत् इस पार्थिव ब्रह्माण्ड में भी आधिदैविक - वैश्वानराग्नि का यह - ' अनाहतनाद ' प्रचण्डरूप से घोधूयामान है, जो आध्यात्मिकी योगमाया के आवरणानुग्रह से ही हमें सुनाई नहीं पड़ता । यदि यह मायादुर्गं न होता, तो उस प्रचण्ड गर्ज्जनात्मक महानाद से निमेषमात्र में हीं मानव की जीवनलीला समाप्त होजाती । अमुक विशेष योगप्रक्रिया के द्वारा यहाँ के अर्वाचीन -- दार्शनिकोंनें अपने आध्यात्मिक--अनाहतनाद को उस महान् श्राधिदैविक अनाहतनाद के साथ समन्वित करने का तत्त्वात्मक प्रयास किया है, जिसका श्रुतिसिद्धा आचारनिष्टा के प्रचारात्मक प्राङ्गण में यत्किञ्चित् भी तो महत्त्व नहीं माना जासकता । अनाहतनादात्मक वैश्वानर अग्नि के शब्दायमान इसी - ' नाद ' भाव को, तथा स्पर्शानुभव को लक्ष्य बनाते हुए श्रुति ने कहा है— १२१६
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड ( १ ) - यत्रैतत् -- अस्मिन् - शरीरे संस्पर्शेन - उष्णिमानं विजानाति, तस्यैषा श्रतिः । यत्रैतत् - कर्णौ - गृह्यनिनदमित्र नदथुरिव - अग्नेरिव ज्ज्वलत उपशणोति, तदेतत्--दृष्टं च श्रुतञ्च इत्युपासीत् । - छान्दोग्योपनिषत् २।१३ । ८ । ( २ ) - श्रयमग्निर्वैश्वानरः -- योऽयमन्तः पुरुषे, येनेदमनं पच्यते यदिदमद्यते । तस्यैष घोषो भवति -- यमेतत् -- कर्णौ - - श्रपिधाय शखोति । - बृहदारण्यकोपनिषत् ५ शहा १ श श्रात्मबुद्धि - समन्विता मानसेच्छा का प्रथमाघात इसी तथाकथित वैश्वानर - अग्नि पर होता है । इस आघात से प्रत्याहित वैश्वानर अग्नि का श्राघात तत्रैव व्याप्त वायव्यप्राण पर होता है । श्राहित वैश्वानर अग्नि से प्रत्याहत वायव्यप्राण ही आग्नेयप्राण से समन्वित होता हुआ -- शरीराकाशरूप प्रदेश में ऊर्ध्व उत्क्रान्त होता हुआ शब्दोत्पत्ति का कारण बन जाता है, जैसाकि वायुः खात - शब्दस्तत् ' इत्यादि प्रातिशाख्य- सिद्धान्त से भी स्पष्ट है । अग्नि ही मरुत् के सहयोग से क्योंकि यों ध्वन्यात्मिका - वागूरूप में परिणत होता रहता है, अतएव सिद्ध है कि, मानव का शारीरिक - वैश्वानराग्नि ही मरुत् के द्वारा अभिव्यक्ति में आकर कट से बहिर्विनिःसृत होता हुआ ' शब्दमयी वैखरीबाकू ' ( मर्त्या वाक् ) रूप में परिणत होता रहता है । ' अग्निर्वाग्भूत्त्वा मुखं प्राविशत् ' इत्यादि औपनिषद - सिद्धान्त इसी तथ्य का स्पष्टीकरण कर रहे हैं । यही कारण है कि, अधिक शब्दोच्चारण से, उच्च स्वर से उच्चारण करने से शरीर विकम्पित होपड़ता है, मुखं च परिशुष्यति । शक्ति का अनुभव होने लगता है । यो प्रत्यक्ष में ही हमारा अग्नि हीं शब्दोत्पत्ति का मूल प्रवर्त्तक प्रमाणित होरहा है । ब्रह्मग्रन्थि ( मूलद्वार ) में अपानप्राण प्रतिष्टित है, ब्रह्महृदय ( केन्द्र ) में व्यानप्राण प्रतिष्ठित है, कण्ठ में उदानप्रारण प्रतिष्ठित है, एवं मूह रलक्षित ब्रह्मरन्ध्र में ( जो कि ' नान्दनद्वार ' नाम से प्रसिद्ध है ) ‘ ऐन्द्र - विज्ञानप्राण ' प्रतिष्ठित है । यों - प्रन्थि - हृदय - कण्ठ - रन्ध्र - भेद से वैश्वानराग्नि के चार प्रतिष्ठान - बिन्दु होजाते हैं, जिन के अनन्तर ही यह अग्नि शब्दरूप में परिगत होकर पाँचवें -- ' प्रास्य ' ( मुख ) स्थान को अपना अन्तिम अधिष्टान बनाता है । वैश्वानराग्नि का पूर्वोक्त ' नाद ' ही इन पाँच स्थानों के भेद से पञ्चधा विभक्त होता हुश्रा ब्रह्मग्रन्ध्यनुगत अतिसूक्ष्मनाद ब्रह्महृदयानुगत सूक्ष्मनाद, कण्ठानुग - त-पुष्टनाद, ब्रह्मरन्ध्रानुगत अपुष्टनाद, एवं आस्थानुगत कृत्रिमनाद ( भौतिकनाद -जिसे - ‘ गूँज ' ,
* - श्रहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥
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चतुर्थ - अध्याय सामिधेनीवाह्मण शतपथब्राह्मण कहा गया है ), इन पाँच अवस्थाओं में परिणत होजाता है । पूर्वोद्वत श्लोकों में से आरम्भ के पाँच
श्लोकों में इसी सम्पूर्ण तथ्य का स्पष्टीकरण हुआ है । ( १ से ५ पर्य्यन्त व्याख्यात - ) ।
छठे श्लोक के द्वारा - ' नाद ' शब्द का निर्वाचनात्मक अर्थसमन्वय हुआ है, जिसका तात्पर्य्य स्पष्ट है । यद्यपि शब्दोत्पत्ति में अनल ( अग्नि ) के साथ अनिल वायु ) का भी सहयोग है | यही नहीं, अपितु अनिलात्मक वा ही अनलात्मक शब्द को बाह्याभिव्यक्ति के, तथा बाह्यानुगति के अनुरूप बनाता है । यदि वायु का सहयोग अग्नि को न मिले, तो शब्दोत्पत्ति की कथा तो बिदूर रही, स्वयं ग्रग्नि की स्वरूप-स्थिति भी सम्भव नहीं है । श्वास - प्रश्वासात्मक वायु का सञ्चार ही शारीरिक - अग्नि का स्वरूप - रक्षक माना गया है । सम्भवत: इसीलिए महर्षि शाकायनि ने ' वायु ' को ही ' अग्नि ' संज्ञा प्रदान कर दी है-" वायुरग्निरिति शाकायनिन उपासते " ( शत ० १०१४ | ५ | १ | ) | यह सब कुछ मान लेने पर भी तत्त्वतः शब्द का मौलिक - उपादानत्त्व तो अग्नि को ही समर्पित किया जायगा, जब वायु को तो शब्द के प्रति निमित्तकारण ही माना जायगा । शब्दात्मक कार्य का उपादानकारणभूत यह अनल ( अग्नि ) भूत और प्रारण भेद से द्विधा विभक्त रहता है । भूताग्नि ही मर्त्य - चित्याग्नि है, जिसका प्रचण्ड ज्वालारूप से हम खाक्षात्कार करते रहते हैं, एवं जिससे भोजनपाकादि कर्म्म सम्पन्न होता है । इस भूताग्नि की मूल प्रतिष्ठारूप सुसूक्ष्माग्नि ही -अमृत - चितेनिधेयाग्नि है । भूत बिना प्राण को आधार बनाए अनुपपन्न है, तो प्राण भूत को अग्रणी बनाए बिना अनभिव्यक्त है । इस अमृताग्नि को ही कहा जाता है - ' प्राण ', एवं मर्त्याग्नि को ही कहा जाता है- ' अनल ' । इन दोनों अग्नियों के लिए ही क्रमशः नकार - दुकार सङ्केतित हैं । नकारात्मक, अर्थात्-निषेधात्मक - अर्थात् - प्रापात्मक - अर्थात् - सद् - रूपात्ताक - ( सद्घनात्मक ) - मौलिक तत्त्वाग्नि ही अपने ‘ अव्यक्तप्राण ' रूप से असद्भावापन्न - ' न ' से संग्रहीत है । दूसरा भूताग्निरूप अनल प्रत्यक्ष में विशकलन-धर्म्मा है । पिण्ड की घनता को विशकलित कर देना, रुद्ध को द्रुत कर देना हीं इस ' रुद्र ' मूर्त्ति भूतानल का स्वरूपधर्म है । एक पिण्ड को खण्ड खण्डरूप में परिणत कर देना हीं इसका सहज - स्वभाव है । अतएव खण्डनार्थक – ‘ दो धातु ' ( दो - अवखण्डने ) से इसके लिए ' द ' का सङ्केत होगया है । नकारा-त्मक प्राणाग्नि, तथा दकारात्मक भूताग्नि, दोनों की समन्वितावस्था ही — ' वैश्वानर ' है, जैसा कि पूर्व में स्पष्ट किया जाचुका है । इसीलिए नकार - टकारात्मक - शब्दप्रवर्त्तक - इस वैश्वानराग्नि का साङ्केतिक नाम होगया है - ' नाद ', जिस इस तथ्य का ही ६ ठे श्लोक से स्पष्टीकरण हुआ है । आत्म- बुद्धि- सहकृता मानसेच्छा से प्रत्याहत, वायुसंयोग से ब्रह्मग्रन्थि से ऊर्ध्वप्रेरित - ब्रह्मग्रन्थ्यनुगता ' नाभि, २ हृदय, कण्ठ, मूर्द्धा, आस्य इन पाँच प्रक्रमों में क्रमशः श्राता हुआ इसी क्रमानुपात से क्रमशः अतिसूक्ष्म - सूक्ष्म - पुष्ट - पुष्ट- कृत्रिम इक पांच भावों में परिणत भूत- प्राण - समष्टि-रूप - ' नादात्मक ' इत्थंभूत वैश्वानर अग्नि के, किंवा तद्रूप ' नाद ' के सामान्य स्थूल - व्यवहार की अपेक्षा से क्रमशः ' हृनप्रक्रम, कण्ठप्रक्रम, शिरः प्रक्रम, ये तीन प्रमुख प्रक्रम मानलिए गए हैं, जिन इन तीनों नादप्रक्रमों में उत्तरोत्तर द्विगुणित तार ( उच्च ) - स्वर - क्रम व्यवस्थित माना गया है । सप्तम श्लोक में इसी व्यावहारिक तथ्य का स्पष्टीकरण हुआ है ।