Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 951–960
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 951–960
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड ' सङ्गीतरत्ना-नाद - श्रुति - स्वरात्मकं सङ्गीत के मर्मज्ञ सर्वश्री महाभाग शाङ्ख नादब्रह्म देव- का विरचित यशोगान - सुप्रसिद्ध हुआ है, प्रायः वही कर ' * नामक ग्रन्थ में उक्त सप्तश्लोकी से जिस वैश्वानरात्मक पद्यों से स्पष्ट हुआ है, जिस इस तथ्य थोड़े शब्दभेद से सुप्रसिद्धा पाणिनीयशिक्षा के निम्न अत्र लिखित उद्ध त कर दिए जाते है, जिनका अर्थसम-सह - समतुलन की दृष्टि से ही ' शिक्षाशास्त्र ' के वे वचनमात्र व पूर्वोक्त सन्दर्भ से ही गतार्थ बन रहा है ।
१ - आत्मा - बुद्धया समेत्यर्थान् - मनो युङ क्तो विवक्षया ।
मनः कायाग्निमाहन्ति, स प्रेरयति मारुतम् ॥
२ -- मारुतस्तूरसि चरन् मन्द्रं जनयते स्वरम् ।
प्रातःसवनयोगं तं छन्दो गायत्रमाश्रितम् ॥
३- कण्ठे माध्यन्दिनयुगं मध्यमं त्रैष्ट भानुगम् ।
तार ' तार्त्तीयसवनं शीर्षण्यं जागतानुगम् ॥
४- सोदीर्णो मृद्ध नर्य भिहतो वक्त्रमापद्य मारुतः ।
वर्णान् जनयते, तेषां विभागः पञ्चधा स्मृतः ॥
- पाणिनीय शिक्षा वैश्वानर अग्नि ही त्रिविध स्वरों का उक्त शिक्षासूत्रों के द्वारा यह भी स्पष्ट होरहा है कि, नादात्मक ने सवनत्रयात्मक तीन छन्दों की ओर अभिव्यञ्जक बनता है - वायु के संयोग से । इसी प्रसङ्ग में शिक्षा ही महत्त्वपूर्ण है । भकेन्द्र से निकल कर भी सङ्क ेत किया है, जो वैदिक - सृष्टिविज्ञान की दृष्टि से अभिव्याप्त अत्यन्त रहने वाले पार्थिव वैश्वानर- प्राणाग्नि अपने २१ एकविंशस्थ महिमात्मक रथन्तरसाम पय्र्यन्त हैं, जो वे तीनों महिमाभाव ही पृथिवी के केही अग्नि वायु आदित्य नामक तीन महिमाविवर्त्त द्यौः- होजाते नामक तीन पार्थिव स्तौम्य लोकों के प्रतिष्ठावा महिमामण्डल में हीं भुक्त क्रमशः पृथिवी अन्तरिक्ष- -- पृथिवी लोक ही पार्थिवयज्ञ मैंनेहुए हैं । आधिदैविकी इस पार्थिवी स्तोम्बा त्रिलोकी का है त्रिवृत्स्तोमात्मक , अग्नि यहाँ के शवसोनपात् हैं । इसी प्रात: -का ' प्रातः सवन ' है, अष्टाक्षर गायत्री छन्द इसका स्वछन्द के भौतिक जीवन का सर्वस्व मानते * — मनः शरीरनिबन्धन प्राकृत इतिहास को ही प्राकृत मानव नृपतिवर श्रीशाङ्खदेव महाभाग इसबीय रहने वाले ऐतिहासिकों की युगधर्मानुगता मान्यता के अनुपात से के अनुसार आज से अनुमानतः सातसौ वर्ष सन् १२००–१३०० - के मध्य में उत्पन्न हुए थे । इस मान्यता १ - वराध्याय, २ – रागाध्याय, ३ - प्रकीर्णा -| उपनिबद्ध ' सङ्गीतरत्नाकर ' नामक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ में – नृत्याध्याय, ये सात अध्याय समा-ध्याय, ४ – प्रबन्धाध्याय, ५ - तालाध्याय, ६ – वाद्याध्याय, भाष्य हुआ है तत्कालीन सङ्गीत मर्म्मज्ञ विष्ट हुए हैं । इस महत्त्वपूर्ण ' सङ्गीतग्रन्थ ' का एक तो विस्तृत, सिंहभूपाल, नृपतिवर रीमाधि-विद्वान् के द्वारा | एवं इसके अतिरिक्त - श्रीकुम्भकरणनरेन्द्र, कालिनाथ हुई हैं, जिनमें से कतिपय टीकाएँ ही आज पति, तथा विद्वत्प्रवर श्रीविश्वनाथ, श्रादि रूपेण ६ टीकाएँ उपलब्ध हैं । १२१६
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण सवनीय पार्थिव गायत्राग्नि से ' मन्दस्वर ' की अभिव्यक्ति हुई है । पञ्चदशस्तोमात्मक अन्तरिक्षलोक ही पार्थिव-यज्ञ का ' माध्यन्दिनसवन ' है, एकादशाक्षर त्रिष्टुप् छन्द ही इसका स्वछन्द है, वायु यहाँ के शवसोनपात् हैं । इसी माध्यन्दिनमत्रनीय श्रान्तरिक्ष्य - त्रैष्टभ - वायु से ‘ मध्यस्त्रर ' की अभिव्यक्ति हुई है । एकविंशस्तोमा-त्मक द्युलोक की पार्थिववश का - ' सायंसवन ' है, द्वादशाक्षर जगतीछन्द ही इसका अपना छन्द है, ग्रादित्य यहाँ के शनसोनपातू हैं । इसी सायंसवनीय- दिव्य -- जागत - आदित्य से - ' तारस्वर ' की अभिव्यक्ति हुई है । जैसा संस्थानक्रम आधिदैविक - पार्थिव - विश्व में है, ठीक वैसा ही संस्थानक्रम मानव की अध्य | म-संस्था में समन्वित है । मानव का सर्वाङ्गशरीर ही उस प्राकृतिक - पार्थिवमण्डल का प्रतिरूप है । ब्रह्मग्रन्थि से आरम्भ कर नाभिपर्य्यन्त प्रदेश पृथिवीलोक है, इसका पार्थिव - आग्नेयप्राण ही ' अपानप्राण ' है, जो कि गायत्रछन्दस्क बनता हुआ प्रातः सवनस्थानीय है । नाभि से हृदयपर्यन्त अन्तरिक्षलोक है, इसका अन्तरिक्ष्य वायव्यप्राण ही ' व्यानप्रारण ' है, जो कि त्रैष्ट भछन्दस्क बनता हुआ माध्यन्दिनसवनस्थानीय है । हृदय से ब्रह्मरन्ध्र - पर्य्यन्त प्रदेश ही द्युलोक है, इसका दिव्य ऐन्द्रप्राण ( आदित्यप्राण ) हीं ' प्राण ' है, जो कि जागतछन्दस्क बनता हुआ सायंसवनस्थानीय है । इन तीनों स्थानों लोकों में व्याप्त वैश्वानर ही, नादात्मक यह शारीरिक अग्नि हीं इन तीन सवनों से क्रमशः मन्द्र - मध्य - तार - स्वरों का अभिव्यञ्जक चनता है । यों अधिदैवत, तथा अध्यात्म, किंवा अण्ड, तथा पिण्ड, दोनों में सर्वात्मना तथाकथित संस्था-नक्रम समतुलित है, जैसाकि निम्न लिखित परिलेखों से स्पष्ट है-इति नु - अधिदेवतम् — भूमहिम ( २१ ) - श्रादित्य: - जगती- सायं सवनम तारस्बरः ( १५. ) - वाय: - - त्रिष्टुप् - माध्यन्दिनंसवनम् - मध्यस्वरः । ( ६ ) - श्रग्निः - गायत्री - प्रातः सवनम् - मन्द्रस्वरः एकविंशास्तीमवच्छिन्नः -- लोकः पञ्चदशस्तोमा बन्छिनः — अन्तरिक्ष लोक: त्रिवृत्स्तोमावच्छिन्नः --- पृथिवीलोक: भौतिक: -भूपिण्डः १२२०
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चतुर्थ - अध्याय इति नु - अध्यात्मम्-शरीरमहिमा सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड हृदयतः — ब्रह्मरन्ध्रपर्य्यन्तमनु- द्युलोक --- - प्राणाग्निरादित्योजागतः - ( सायंसवनम् ) - तारस्वरः नाभेः —— हृदयपर्य्यन्तमनु-- श्रन्तरिक्षलोकः व्यानाग्निर्वायुस्त्रैष्टुभः - ( माध्यन्दिनंसं ० ) –मध्यस्वरः ब्रह्मग्रन्थः – नाभिपर्यन्तमनु- पृथिवीलोकः --- अपानाग्निरग्निर्गायत्र: - ( प्रातः सवनम् ) - मन्द्रस्वरः 1 भौतिक-| शरीरम् एक ही नाट इसप्रकार छन्दोभेदानुगता सवनत्रयी के भेद से हृदय - कण्ठ - शिरो - मेदेन त्रिधा -विभक्त होनाता है, जिस इस तथ्य का ही शाङ्ग देव ने पूर्ण के सप्तम श्लोक के द्वारा, एवं पाणिनीय - शिक्षा ने २-३-४ -- श्लोकों के द्वारा स्पष्टीकरण किया है । वैश्वानराग्नि मूर्ति - त्रिः प्रक्रमात्मक यही ' नाद ' आगे चलकर नाड़ीभेद से अवान्तर २२ ( बाईस ) भागों में विभक्त होजाता है । नाद के ये अवान्तर विभाग श्रुति के द्वारा क्योंकि सुने जाते हैं । अतएव इन अवान्तर अवस्थाओं का नाम सङ्गीतशास्त्र में -- श्रुतिः * होगया है । हृदय से ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त ऋजुभाव से व्याप्ता सुप्रसिद्धा नाड़ी ' सुषुम्णा ' है । इस सुषुम्ना नाड़ी से संलग्ना तिरश्चीनभावानुगता २२ नाड़ियाँ प्रमुख हैं । इन नाड़ियों के भेद से ही नादानुगता श्रुति के २२ विभाग होजाते हैं । ह्रयय -- कण्ठ - शिरोभेद से इन २२ श्रुतियों का त्रिधा वितान होजाता है | हृदयानुगत मन्द्र-नाद से अनुप्राणिता २२ मन्द्रश्रु तियाँ, कण्ठानुगत मध्यनाद से अनुप्राणिता २२ मध्यश्रुतियाँ, एवं
** -- ' ' श्रवणे चास्य धातोः ' क्ति ' प्रत्ययसुसङ्गतः ।
' श्रुति ' शब्दः प्रसाध्योऽयं शब्दजैर्भावसाधनः ॥
श्रन्यदपि — श्रवणेन्द्रियग्राह्यत्वात् ध्वनिरेण श्रुतिर्भवेत् । -- मनङ्गः सा चैका द्विविधा ज्ञेया स्वरान्तरविभागतः ॥
नियतः श्रतिसंस्थानो गीयन्ते सप्त गीतिषु ।
तस्मात् स्वरगता ज्ञेयाः श्रुतयः श्रुतिवेदिभिः ॥
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चतुर्थ- श्रध्याय मन्द्रनादानुगताः श्रुतयः--द्वाविंशति: ( २२ ) १ - मन्द्रा २- प्रतिमन्द्रा ३- घोरा ४- घोरतरा ५- मण्डना ६- सौम्या ७ - सुमना ८- पुष्करा ६- शङ्खिनी १०- नीला ११ - उत्पला १२- अनुनासिका १३- घोषावती १४- नील नादा १५- आवर्त्तन १६ - रणदा १७- एक गम्भीरा १८- दीर्घतारा १६- नादिनी २०- मन्द्रजा २१- सुप्रसन्ना २२- निनटा सामिधेनीब्राह्मण मध्यनादानुगताः श्रुतयः द्वाविंशतिः ( २२ ) २ १- नादान्ता २ - निष्कला ३- नूड़ा ४- सकला ५- मधुरा ६ - गली ७- एकाक्षरा ८- भृङ्गजाती ६- रसगीती १०- सुरखिका ११ -- पूर्णा १२- अलंकारिणी १३- वांशिका १४ -- वैणिका १५ - त्रिस्थाना १६ - सुम्वरा ( १७-- भार्गवी ( सौम्या ) १८- भाषाङ्गी १६- वार्त्तिका २०- सम्पूर्णा २१- प्रसन्ना २२- सर्वव्यापिनिका १६२२ शतपथब्राह्मण तारनादानुगताः श्र द्वाविंशति: ( २२ ) ३ १- ईश्वरी २ -- कीमारी ३-- स्वरावली ४-- भोगवीय्य ५- मनोरमा ६ -- सुस्निग्धा ७- दिव्याङ्गा ८. मुललिता रसगीती १०- महाक ११- मेदिनी १२- गका १३- लज्जा १४- काली १५- सूक्ष्मा १६ -- अतिसूक्ष्मा १७ -- पुष्टा १८- पुष्टिका १६-- विस्पष्टा २०- रोकरी २२- कराली २२ -- विस्फोटान्ता शिरोऽनुगत तारनाद से अनुप्राणिता २० तारश्रुतियाँ, इस भेद से २२ श्रुतियों के भी तीन त्रिक बन जाते हैं, जैसाकि मपृष्ठानुगत ' सङ्गीतसमयसार ' नामक ग्रन्थवचन से स्पष्ट है— ये श्रुतियाँ निम्नलिखित नामों से सङ्गीत - शास्त्र में प्रसिद्ध हैं-
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण त्रीणि स्थानानि हृत् कण्ठ - शिरांसी - ति समासतः ॥ एकैकमपि तेषु स्यात्द्वाविंशति त्रिधायुतम् ॥ १ ॥
द्वाविंशतिविधो मन्द्रो ध्वनिः मञ्जायते हृदि ।
यथोत्तरमसौ तारो वीणावामधरोत्तरम् ॥ २ ॥
स एव द्विगुणो मध्यः कण्ठस्थाने यथाक्रमम् ।
स एव मस्तकं तारः स्यान्मध्याद्विगुणः क्रमात् ॥ ३ ॥
प्रथमकाण्ड -सङ्गीत समाज सरे श्रचतक के मन्दर्भ से हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ा कि, सर्वाङ्गशरीर में व्याप्त वैश्वानराग्नि का धीधूयमान ध्वन्यात्मक शब्द ही सङ्गीत में ' नाद ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । सूक्ष्मदृष्टया नाभि - हृदय-कण्ठ -- शिरः -- मुम्ब -- भेद मे जहाँ इस नाद के क्रमश: अतिसूक्ष्म --सूक्ष्म - पुष्ट ( व्यक्त ) ३ पुष ( अव्यक्त ) -- कृत्रिम – ये पाँच प्रक्रम होजाते हैं, वहाँ लोकव्यवहारनुगता म्थूल दृष्टि से इस नाद के– हृदयानुगत- मन्द्रनाद, कष्ठानुगत मध्यनाड, शिरोऽनुगत तारनाद, रूपेश तीन प्रक्रम भी प्रसिद्ध हैं । हृदयादनुगता प्रमुखा सुषुम्णा नाड़ी से मलग्ना तिर्य्यग्वर्तनी २२ नाड़ियों के भेद से इन तीनों नादों ध्वनियों की अभिव्यक्तियाँ भी २२ - २२ - २२ -- भेद से त्रिया विभक्त होजातीं हैं, और यों ६६ श्रुलियाँ होजाती है, जिन का पवमान २०१२ ही माना गया है । नादध्वनि की श्रवणगोचरा अभिव्यक्तियाँ ही ' श्रुति ' नाम का प्रमुख कारण है । इसी निष्कर्षात्मक तथ्य को लक्ष्य बना कर कहा गया है कि— तस्य द्वाविशतिर्भेदा
हाः: - - श्रवणात् श्रतयो मताः ।
हृद्य नाड़ी संलग्ना नाड्यो द्वाविंशतिर्म्मताः ॥ २ ॥
तिरश्च्यस्तासु तावत्यः श्रतयो मारुताहते ÷ ।
उच्चीच्चतरतायुक्ता प्रभवन्त्युत्तरोत्तरम् ॥ २ ॥
* वक्त मिच्छन् विवक्षमाण आत्मा मन: - अन्तःकरणं प्रेरयति । तदन्तःकरणं-- आत्म-बुद्धिरितं सद् देहस्थितमोद वृद्धिं आहन्ति, ताडयन्ति । स वह्निः मारुतं वायु - प्रो र यति । स पूर्व ब्रह्मग्रन्थिस्थित इदानीं तेन वह्निना प्रेरितः - ऊर्ध्वमार्गेण गच्छन् -आघातेन नाभि - हृदय - कण्ठ - मूद्ध मुखेषु-- ध्वनिं प्रकटयति- इति निष्कर्षः । - ऊर्ध्वनाड़ी सुषुम्णा । तत्संलग्ना तिरश्च्यः तिर्य्यक- स्थिता द्वाविंशतयो नाड्यः । तामु मरुत्सम्बन्धात् तावन्त एव नादा: ' समुत्पद्यन्ते - उत्तरोत्तर - उच्चोच्चतरता बुक्ताः । प्रथमो नाद: हीनतम मन्द्रतमः । ततोऽनन्तर - उच्चतरः । ततोऽनन्तर ' -उच्चतम: -- इत्येवंरूपेण नादानुगताः श्रतः प्रवर्तन्ते-- मौखिक सङ्गीत सङ्गीत--गयिकैः । १२२३
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चतुर्थ - अध्याय सामिधेनीब्राह्मण
एवं कण्ठे तथा शीर्षे श्रतिद्वविशतिता ।
व्यक्तये कुम्हे तासां वीणाद्वन्द्व निदर्शनम् ॥ ३ ॥
शतपथब्राह्मण श्रत्र क्रमप्राप्त उस तीसरे - ' स्वरभाव ' की ओर सङ्गीत -- प्रेमियों का ध्यान आकर्षित किया जारहा है, जिसे हम मौखिक सङ्गीत का ' प्राण ' ही कहेंगे । सङ्गीत में जो एकप्रकार का सहज - " माधुरी ' है, वह इसी ' स्वर ' की महिमा है । स्वर कैसे और क्यों माधुर्य का अभिव्यञ्जक बन जाता है?, प्रश्न का समाधान ' स्वरहर्देवाः सुखः ' ( शतब्राह्मणे ) इस श्रौत निगम पर ही अवलम्बित है । सृष्टिविद्या-वित् विद्वानों को यह विदित ही है कि, पृथिवी को दुधिलोक माना गया है, अन्तरिक्ष को घृतलोक कहा गया है, एवं द्युलोक को मधुलोक माना गया है । दही- घी - शहद - ही दधि घृत- मधु - तत्त्व हैं, जिन का क्रमशः पार्थिवाग्नि, आन्तरिक्ष्य वायु, दिव्य आदित्य इन तीन प्राणदेवताओं से सम्बन्ध माना गया है । दधिरसात्मक पार्थिव वनाग्नि, घृतरसात्मक प्रान्तरिक्ष्य तरल वायु, एवं मधुरसात्मक दिव्य विरलादित्य, इन तीनों पार्थिव - तत्त्वों का हम क्रमशः सङ्गीत के नाड़ - श्रुति - स्वर- इन तीनों भावों से सम्बन्ध मान सकते हैं । बनात्मिका मूल प्रतिष्ठा का नाम हीं ' नाद ' है, और यही -- ' दधि हैवास्य लोकस्य रूपम ' के अनुसार सङ्गीतका अग्निप्रधान -- पार्थिवलोकांश है । घन -- नाद -- पर- प्रतिष्ठित वायव्या - अभिव्यक्तियाँ हीं - ' श्रुति ' है, और यही - - ' घृतमन्तरिक्षस्य रूपम ' के अनुसार सङ्गीत का वायुप्रधान अन्तरिक्ष्यांश है । घननादा-मुगता तरलश्रुतियों के द्वारा अभिव्यका - सन्तनन भावात्मिका - परम्परानुप्राणिता वीचियाँ ( तरङ्ग - ऊर्मियाँ ) हीं --- ' स्वर ' है, और यही- ' मध्वमुष्य रूपम् ' के अनुसार सङ्गीत का आदित्यप्रधान- दिव्यांश है । और यों तीनों लोकों के आग्नेय - वायव्य आदित्य- रसात्मक- ' दधि घृत- मधु - नामक रसों से ही सङ्गीत के ' नाद -२ श्र ति - स्वर - भाव - समन्वित हो रहे है । इसी सम्बन्ध में पुनश्च हमें कुछ और भी समझ लेना है । शब्दब्रह्मरहस्यवेत्ता महर्षियोंने परब्रह्म से अभिन्न शब्दब्रह्म के तीन प्रमुख महिमा - विवर्त माने हैं, जो क्रमशः स्फोट - स्वर - व्यञ्जन - इन नामों से शब्दशास्त्र ( व्याकरण ) में प्रसिद्ध हैं । परब्रह्म के ‘ अत्र्यण ' के. साथ शब्दब्रह्म का ' स्फोट ' समतुलित है । परब्रह्म के ' अक्षर ' के साथ शब्दब्रह्म का ' स्वर, तथा उस के ' क्षर ' के साथ इस का ' व्यञ्जन ' समतुलित है । ' पर ', तथा ' शब्द ' - भेदेन सृष्टि के दो ही प्रमुख विवर्त्तमाने गए हैं, जिस में खण्ड - खण्डात्मक इतर यच्चावत् अवान्तर सृष्टिविवर्त्त ' अन्तर्भूत हैं | वस्तुगत्या पर, और शब्द, ये दो स्वतन्त्र विवर्त्त नहीं हैं । अपितु एक ही षोडशीप्रजापति का पूर्वरूप जहाँ-' परब्रह्म ' कहलाया है, वहाँ उसी का उत्तररूप ' शब्दब्रह्म ' कहलाया है । पूर्वरूपता का अर्थ है - ' विश्वातीत--विवर्त्त ' । एवं उत्तररूपता का अर्थ है- ' विश्वत्रिवर्त्त ' । विश्वातीतदशा में वही ब्रह्म ' परब्रह्म ' कहलाया है, एवं विश्वदशा में वही - ' शब्दब्रह्म ' कहलाया है । क्या तात्पर्य? | तात्पर्य स्पष्ट है । ' विश्व ' का ही नाम ' संसृष्टिलक्षा - सृष्टि ' है । यह सृष्टि आकाश-- वायु -- तेज - जल -- मृत् - रूपेण पञ्चमहाभूतात्मिका है । इन पांचों महाभूतों का मूल सर्वाटि भूत वह ग्राकाशभूत ही है, जिस का सुसूक्ष्म मात्राभाव ही ' शब्दतन्मात्रा ' नाम से प्रसिद्ध है । शब्दतन्मात्रात्मक-सर्वादिभूत - आकाशभूत से बलग्रन्थि के द्वारा स्पर्शतन्मात्रात्मक वायु की अभव्यक्ति होती है । वायु रूपतन्मात्रा-से १२२४
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चतुथ माय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड त्मक जल की, एवं जल से गन्धतन्मात्रात्मिका मृत् की अभिव्यक्ति होती है, हुई है, होती रहती है * । तन्मात्रात्मात्मक शब्दादि गन्धान्त इह्रीं सूक्ष्मतम अतएव - ' तत्त्व ' नाम से प्रसिद्ध पाँचो गुणभूतों से पञ्ची--करणप्रक्रिया के द्वारा आगे चलकर पञ्चात्मक पाँच अणुभूत अभिव्यक्त होते हैं । इन के पञ्चीकरण से पञ्च-पञ्चात्मक -- रेणुभूत अभिव्यक्त होते हैं । इन के पञ्चीकरण से समष्टयात्मक - ' महाभूतात्मक ' जो पञ्च विश्वपुर अभिव्यक्त होते हैं, वे ही क्रमशः आकाशात्मा स्वयम्भूपुर, वाय्वात्मा परमेष्ठीपुर, तेजोमयात्मा--मूर्य्यपुर, जलात्मक चन्द्रपुर, तथा मृदात्मा भूपुर, इन नामों से प्रसिद्ध हुए हैं, जिन इन पाँचों विश्वपुरों की, किंवा यौगिक -- महाभूतों की समन्वितावस्था को नाम ही पञ्चपर्वा विश्व है, जिसका महर्षि श्वेताश्वतरने-' पञ्चपर्वामवमः विश्वप्रकृतिम् ( श्वे ० उपनिषत् ) इत्यादि रूप से यशोगान किया है । पञ्चपर्वात्मक उक्त त्रिश्वस्वरूप - दिग्दर्शन से स्वतः ही हमें इस तथ्य पर पहुँच जाना पड़ा कि, विश्व का मूलकारण विश्वातीत परब्रह्म - आत्मब्रह्म से सर्वप्रथम अभिव्यक्त होने वाली, ' आकाशात्मिका - शब्दत--मात्रा ' ही है । यही प्रथमा शब्द तन्मात्रा उत्तरोत्तग्भाविनी - रसानुगता - बलग्रन्थियों के तारतम्य से पञ्चपर्वात्मक विश्व - स्वरूप में परिणत होरही हैं । और यों आत्मब्रह्म से अभिव्यक्त ' शब्दब्रह्म ' ही विश्व का स्वरूप--परिचायक बना हुआ है | इसी आधार पर -- ' न ह्यशब्द मित्रास्ति ' ( उपनिषत् ) यह सिद्धान्त प्रतिष्ठित है । अतएव शब्द, और अर्थ का श्रौत्पत्तिक सम्बन्ध ही माना है, भगवान् जैमिनिने ÷ । इसी आधार पर ' पासिद्धि: ' यह उपासनातत्त्व व्यवस्थित हुआ है । इसी आधार पर शब्दब्रह्मात्मक नित्य मन्त्र एवं तद्वाच्य प्राणदेवतात्मक अर्थ, दोनों अभिन्न बने हुए हैं । यही मन्त्र का मन्त्रत्व है, यही शब्दब्रह्मात्मक वेदशास्त्र की कूटस्थनित्यतालक्षणा पौरुषेयता है । इसी दृष्टि से यह कहा गया है कि – ' स प्रजापतिः--भूरिति व्याहरत् पृथिव्यभवन ' । अर्थात् आत्मप्रजापति ने अपने मुख से सर्वप्रथम ' भू: ' इश शब्द का ही उच्चारण किया । वही ' भू ' शब्द ( पृथिव्यनुगता शब्दतन्मात्रा ) भूपिण्डरूप में परिणत होगया । इह्रीं कुछ एक निर्दिष्ट तथ्यों के आधार पर हमें यह मान लेना पड़ता है कि, संसृष्टितक्षणा विश्वात्मिका सृष्ट में तो- ' शब्दब्रह्म ' ही प्रमुख है, यही ईश्वर का व्यक्तरूप है, जो परब्रह्मात्मक - बिवत के आधार पर ही प्रतिष्ठित हैं । जैसा स्वरूप- संस्थानक्रम उस परब्रह्म का है, ठीक वैसा ही, किंवा वही संस्थानक्रम विश्वात्मक विश्वरूप -- शब्दब्रह्म का है । इस बोडशीपरब्रह्म में यदि परात्पर - अव्यय - अक्षर -क्षर - नामक चार पर्व हैं, तो इस शब्दब्रह्म में ही अर्द्ध मात्रा - स्फोट - स्वर - व्यञ्जन नामक चार ही प्रमुख विवर्त्त ' है । इसी अभेद के आधार पर ऋषि ने कहा है कि--* तस्माद्वा एतस्मादात्मन ( परब्रह्मण:) आकाशः सम्भूतः । अाकाशाद्वायुः । वायोरग्निः । अग्नेरापः । अद्भ्यः पृथिवी ( मृत् ) । - तैः उपनिपत् " - औत्पचिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धस्तस्य ज्ञानमुपदेशोऽयतिरेकश्चार्थेऽनुपलब्धे तत्प्रमाणे वादरायणस्यानपेक्षच्चात् " । - पूर्वमीमांसासूत्र १२२५
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चतुर्थ - अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण
द्वे वा ब्रह्मणो रूपे शब्दब्रह्म, परं च यत् ।
शाब्दे ब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥
- उपनिपत ' दृष्टिभूला सृष्ट्रिविद्या ' के अनुसार पञ्चपर्वात्मक- विश्व की स्वरूपमीमांसा करते हुए पार्थिवशरीरी-मानव को भूपिण्ड के केन्द्र से ही चलना पडेगा । और इस केन्द्र को आधार बना कर ही इसे शब्दब्रह्म के व्यञ्जन - स्वर - स्फोट - श्रद्ध मात्रा - नामक - चारों विवर्त्तो का समन्वय देखना होगा । स्वय भू ि es व्यञ्जनात्मक - शह्म है । सौम्य चन्द्रमा का पार्थिव निवर्त्त में हीं ग्रन्तर्भाव है । अतएव चन्द्रमा को पार्थिव - उपग्रह माना गया है । अतएव च भूपिण्ड के अनन्तर दूसरा स्थान याता है - ' सूर्य ' का । यह सूर्य्य ही स्वरात्मक शब्दत्रह्म है । तदुत्तर प्रतिष्ठित - ' परमेष्ठी ' ही महद्ब्रह्म में गर्भीभूत - चिदात्माव्यय से श्रभिन्न-स्फोटात्मक - शब्दब्रह्म है । एवं सर्वान्त का अव्यक्त स्वयम्भू ही अर्द्ध मात्रात्मक शब्दब्रह्म है । यों भूकेन्द्र से आरम्भ कर स्वयम्भू- पर्यन्त शब्दब्रह्म के चारों विवर्त समन्वित होरहे है, जैसाकि परिलेख से स्पष्ट है— १ - अव्यक्तात्मा स्वयम्भूः---अर्द्ध मात्रात्मकं शब्दब्रह्म २. महानात्मा परमेष्ठी----- स्फोटात्मकं शब्दब्रह्म ३ - विज्ञानात्मा -- सूर्य: -- शब्दब्रह्मात्मकं विश्वम् --- स्वरात्मकं शब्द त्रह्म ४- मृतात्मात्मा - सचन्द्रो भूपिण्डः व्यञ्जनात्मकं शब्दब्रह्म नादादि के अनुबन्ध से शब्दब्रह्म की स्वरूपदिशा की उपासना की गई । पुनः प्रकृतमनुसराम: । निवेदन किया गया है कि, श्रुति से अभिव्यक्त - ' स्वर ' ही सङ्गीत का मौलिक माधुर्य्य है । ततप्रसङ्ग से ही वह स्वरोपपत्तिप्रसङ्ग उपक्रान्त होपड़ा है । अत्र हमें भूपिण्ड, चन्द्रोपलक्षित - अन्तरिक्ष, एवं आदित्योपलक्षित सूर्य, इन तीन विश्वपर्वों को आधार बनाकर ही नादादि के स्वरूप का समन्वय करते हुए स्वर के माधुर्य्य को लक्ष्य बनाना है । भूपिण्ड का केन्द्रस्थ प्राजापत्य - वैश्वानराग्नि ही ' नादब्रह्म ' हैं, जैसा कि पूर्व में अनेकधा स्पष्ट किया जाचुका है । भूकेन्द्रावच्छिन्न इस ग्राग्नेय नादब्रह्म की अन्तरिक्षानुगता - वायव्या-अवस्था ही ' श्रुति ' है । यही श्रान्तरिक्ष्या श्रुति जत्र विरलावस्था में आकर सौर मण्डल से समा लुत होजाती है, तो यही – ‘ स्वर ' कहलाने लगती है । और यों श्रुति का उत्तरभाव ही ' स्वररूप ' में परिणत होजाता है । तदित्थं भूपिण्ड ', अन्तरिक्ष, सूर्य्य इन तीनों के दधि ' ( घन - घृत ( तरल ) - मधु ( विरल ) --इन तीन रसों के क्रमिक समन्वय से ही सङ्गीतात्मक शब्दब्रह्म ' नाद ' - श्र तिस्त्रर ' इन तीन विवर्तभावों में परिणत होजाता है । पुनरपि इस सम्बन्ध में प्रक्रान्ता - स्वराभिव्यक्ति के सम्बन्ध में किञ्चिदिव समन्वय अपेक्षित है । १२२६
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीत्राह्मण प्रथमकाण्ड हैं, एवं सुप्रसिद्ध ' क ख ग घ श्रादि प्रसिद्ध ' अ ----- ई उ ऊ. ' स्वरों से भी सभी परिचित सम्पूर्ण स्वर सूर्य से ही अभिव्यक्त व्यञ्जनों से भी सभी सुपरिचित हैं । सृष्टिविद्या के अनुसार अकारादि व्यक्त हुए हैं । व्यञ्जन पार्थिव हैं, एवं स्वर हुए हैं, तो ककारादि सम्पूर्ण व्यञ्जन भूपिण्ड से ही व्यञ्जनवाक् का वैज्ञानिक नाम है-मौर हैं, यही वक्तव्य निष्कर्ष है । पार्थिवी - ककारायात्मिका ' बृहती ' । सौरी - ऐन्द्री - बृहतीवाक् के अधि--' अनुष्टुप् ', एवं सौरी काराकारात्मिका स्वरवाक् का नाम है- ' नाम से ही वेद में सुप्रसिद्ध हुई है * । पति ‘ सौर -- इन्द्र ' कहलाए हैं, अतएव यह बृहतीवाक - ' इन्द्रपत्नी - ' पार्थिव अग्नि ' ( नादात्मक वैश्वानराग्नि ) एवमेव पार्थिवी - आग्नेयी- अनुष्टुपधाक् के अधिपति ' ( अग्निर्वैश्वानर एव - अनुष्टुप् --माने गए हैं, जिसे नन्क्ष्य बनाकर ही -- अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं ) प्राविशत् यह कहा गया है । वागात्मक - त्र्यञ्जनरूपेण परिणतः सनमुखं प्राविशन इन दोनों क्वा परस्पर अग्निगर्भा भूपिण्डात्मिका पृथिवी, एवं सूर्य्य इन्द्रगर्भिणी का ही -- उपग्रह सूर्य्यात्मिका है । सूर्यरूप द्यौः महाग्रह का प्रवर्ग्यरूप--ग्रहोपग्रहभाव माना गया है । भूपिएड परम्परया पर ही साम्वत्सरिक क्रान्तिवृत्त पर परिभ्रममाण बनता उपग्रहात्मक भूपिण्ड सौर- ऐन्द्र आकर्षण के आधार - प्रतिष्ठा को आधार बनाए, चिना तदुपग्रहभूत हुआ ' वार्षिक गति ' का प्रवर्त्तक बना हुआ है । सौरी ऐन्द्री । और ठीक यही स्थिति सौरी - बृहती -स्वरत्राकू, भूपिण्ड क्षणमात्र भी स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित नहीं रहसकता है । सौरी बृहती - वाक से भिन्न स्वरों को आधार तथा पार्थिवी अनुष्टुभी व्यञ्जनवाक् के सम्बन्ध में विघटित भी स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित नहीं रहसकते । श्रर्थात् बनाए बिना पार्थिव अनुष्टुप - वाङमय ककारादि व्यञ्जन का उच्चारण भी कदापि सम्भव नहीं है । अकारादि स्वरों को आधार बनाए बिना ककारादि व्यञ्जनों तो स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित - अभिव्यक्त नहीं क्योंकि सौरमण्डल को आधार बनाए बिना भूमिएड भी होसकता । पङ्क्ति - त्रिष्टुप् जगती ', इन ' छन्दोविद्या ' के अनुसार ' गायत्री - उधिलक् अनुष्टुप् बृती- नामों से भी व्यवहृत हुए हैं ) मध्यका सात देवच्छन्दों में से ( जोकि सप्त -- अहोरात्रवृत्त -- पूर्वापरवृत्त आदि छन्द स्वतः प्रत्येक वर्तुलवृत्त का मध्यका वृत्तरूप सर्गतोऽधिक बृहत् ( बड़ा ) छन्द ही ' बृहतीछन्द ' है । कारण ज्योतिश्चक्रात्मक ही तो होगा । इसी बृहद्भाव के ही पार्श्ववर्ती इतर वृत्तों के समतुलन में बड़ा बृहती छन्द ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । यही ( खगोलात्मक महान वृत का मध्यस्थ छन्दोत्रत - ' बृहती ' इक्वेटर ' है, जिसे कि प्रतीन्यभाषा में ' विष्यद्वृत्त'- ' विषुत्र ' आदि नामों से लोकव्यवहार में प्रसिद्ध कहा गया है ।
* वाचं देवा उपजीवन्ति विश्वे वाचं गन्धर्वाः पत्रों मनुष्याः ।
वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता सानो हवं जुषतां ' इन्द्रपत्नी ' ॥
तैव्वा ० रारा ५ । ) - यथाग्निगर्भा पृथिवी, तथा द्यौरिन्द्रेण गर्भिणी । ( मन्त्रसंहितायाम १२२७
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण खगोलीय तथाकथित वृहतीछन्द के केन्द्र में हीं क्योंकि भगवान् सूर्य्यनारायण स्थिररूप से सुप्रतिष्ठित हैं *, अतएव तत्र प्रतिष्ठित सूर्य्यदेव भी ' बृहत् ' नाम से प्रसिद्ध होगए हैं, जैसाकि वृहद्ध तस्थौ भुवनेष्यन्तः पवमानो हरित आविवेश ' इत्यादि मन्त्रवर्णन से स्पष्ट है । इसी बृहद्भावानुबन्ध से तत्र प्रतिष्ठित सूर्य्य --' बृहद्भानु ' नाम से भी प्रसिद्ध है | ' सप्त वै देवच्छन्दांसि ' के अनुसार गायत्र्यादि - जगत्यन्त अहोरात्रवृत्तात्मक ( पूर्वापरवृत्तात्मक ) खगोलीय सातों छन्द क्रमश: पडज़र- सप्ताक्षर - अष्टाक्षर - नवाक्षर - दशाक्षर - एकादशाक्षर - द्वादशाक्षर ( ६-७-८-६-१०-११-१२- अक्षरात्मक ) माने गए हैं, जिन के चतुष्पाद्भाव से क्रमश: २४-२८-३२-३६-४०-४४-४८ - ये अक्षर होजाते हैं । इन सातों छन्दों में से पूर्वोक्त मध्य के उस ' बृहतीछन्द ' की ओर ही हम पाठकों का ध्यान आकर्षित करना चाहते है प्रक्रान्त - स्वरप्रकरण में, जिसके नब ( ६ ) मूलाक्षर हैं, तथा पत्रिशत् ( ३६ ) तूलाक्षर हैं । नवाक्षर इस वृहतीछन्द के केन्द्र में प्रतिष्ठित सूर्य्य का दिव्य -- मधुरसमय ऐन्द्रप्राण ही वह ' बाहुन- स्वर तत्त्व ' है, जिस का अत्र यशोगान किया जारहा है । नवाक्षर का अर्थ है - नवबिन्दु - अनुगत प्रस्तार, जिर का तात्पर्य्यार्थ यही है कि सौर- बार्हत - नवाक्षर -( नवचिन्द्वात्मक स्वर के आधार पर ही पार्थिव यानुष्टुभ व्यञ्जन प्रतिष्टित रहा करते हैं । बार्हत -- स्वर की तनन - मर्य्यादा ( वितानमर्थ्यादा फैलाव ) क्योंकि नव - विन्द्वात्मक है । अतएव उचित था कि, नवचिन्द्वात्मक प्रत्येक स्वर की महिमा में ६ ही व्यञ्जन प्रतिष्ठित होजायँ । किन्तु ऐसा होता नहीं । कारण यही है कि-नवद्दिन्द्वात्मक प्रत्येक स्वर की उक्थ, अर्क -भेट से दो अवस्थाएँ रहतीं है । ' मूलस्वर बिम्ब ' का नाम ही ‘ उक्थस्वर ' है, एवं ‘ तूलस्वररश्मि ' ही ' अर्कस्वर ' हैं । ६. बिन्दुद्रों में से ५ बी ६ टी, इन दो चिन्दुओं को स्वयं उक्थस्वर अपना ब्रह्मौदन ( मूलप्रतिष्ठा ) बना लेता है । अतएव इस प्रातिस्त्रिकी बिन्दुद्वयात्मिका ब्रह्मौदन की सीमा में ( स्व-- भोग्या सीमा में ) तो प्रत्रयभावापन्न ( मर्त्यभावापन्न ) भोग्य -- व्यञ्जनों का प्रवेश निषिद्ध ही बन जाता है और यत्र शेष रह जाती हैं-- अर्करूपा ( रश्मिरूपा ) सात - बिन्दुएँ । अवश्य ही इन सात स्वरचिन्दुओं में सात प्रवर्ग्य - व्यञ्जन प्रतिष्टित होसकते हैं । इस का निष्कर्ष यही हुआ कि, नवत्रिन्द्वात्मक प्रत्येक बाईत स्वर में सात सात व्यञ्जनों को स्वप्रतिष्ठा पर प्रतिष्टित करने की क्षमता है तभी तो सप्त - व्यञ्जनात्मक - सप्त - लोक ( सातों लोक ) उम एकाक्षरमूर्ति स्वरात्मा पर प्रतिष्टित होरहे हैं । शब्दब्रह्ममय्र्यादा में भी प्रकार उकारादि प्रत्येक स्वरात्मक अक्षर सात - सात व्यञ्जनों को निर्धार-रूपे उठा सकता है, उठा लेता है । अर्थात् एक स्वर के आधार पर एक साथ सात व्यञ्जनों का अवस्थान सम्भव है । अर्थात् एक स्वर के आधार पर सात व्यञ्जनों का उच्चारण सम्भव है, जैसाकि प्रातिशाख्य के * नैवोदेता - नास्तमेता । मध्ये - एकल- एव स्थाता । सूर्यो बृहतीमध्यूढस्तपति । - छा ० उप ० १२२८