Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 961–970

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 961–970

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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण _प्रथमकाण्ड _____ -सुप्रसिद्ध – ' स्त्र्यक्'ट् इस उदाहरण से स्पष्ट है * । इस शब्द में आप देखेंगे कि, स्वर तो ' अ ' नामक केवल एक है जो दो बिन्दुओं में उक्वरूप से प्रतिष्ठित है, जिसके आरम्भ में १-२-३-४ चार अर्कात्मिका विन्दुएँ हैं, एवं आगे ७-८-६ - ये तीन बिन्दुएँ है, जिन इन पूर्वापर सात बिन्दुभ्यों में क्रमश: I R a ४ 1 स् --त् -- र् - य् - र + - क - टू - ये सात मर्त्य व्यञ्जन प्रतिष्ठित हो रहे हैं । अब यदि एक भी व्यञ्जन आप इस शब्द में और समाविष्ट करना चाहेंगे, तो आपको अन्य स्वर का ही आश्रय लेना पड़ेगा । क्योंकि सात बिन्दुओं के परिपुर्ण बन जाने पर एकस्वर में स्थानाभाव है अन्य आठवें व्यञ्जन को स्वमहिमा में प्रतिष्ठित करने के लिए । सैपा स्वरस्य -- सन्तनानुगता सहजस्थितिः । उक्त स्वरम्वरूप परिचय के माध्यम से अत्र हमें यह मान लेना पड़ा कि, स्वर, व्यञ्जन, और इन दोनों में से ' वितानात्मक - सन्तनन ' ( फैलाव पसार ) की शकिं नव चिन्द्रात्मक - केवल स्वर में ही है | व्यञ्जन केवल एक चिन्द्रामक है । अतएव व्यञ्जनों में- ' सम्प्रसारणधर्म्म ' ( व्याप्तिधर्म्म ) का सर्वथा अभाव - काम-है । व्यञ्जन तो उच्चारण के साथ ही एक संस्कारहीन - यथाजात - पार्थिवशरीरीमात्र भोगवरायण - प्राकृत - मानव की भाँति परिसमाप्त है — ' जायस्व प्रियस्व ' इस प्रकृतिसिद्ध आविर्भाव तिगे भाग - मनुध से । पूर्वदण में अव्यक्त, केवल मध्यक्षण में व्यक्त, पुनः तदुत्तरक्षण में अव्यक्त, इन तीन दयों में ही मार्च पार्थिवव्यञ्जन का सम्पूर्ण इतिवृत्त परिसमाप्त है, जो कि इस व्यञ्जन से अभिन्न ' क्षरात्मक भूत ' का, किंवा ' भूतात्मक क्षर ' का माना गया है । ' क्षरः सर्वाणि भूतानि ' के अनुसार जो स्वरूप, जो धर्म्म - भौतिक - मत्यं - क्षर का है, ठीक वही स्वरूप, वही धम्मं तदभिन्नमर्त्य - पार्थिव व श्रानुष्टुभ व्यञ्जन का है । और ' स्वर '? | स्वर तो उस ' अक्षर ' से समतुलित, किंवा श्रभिन्न है, जो अक्षरतत्त्व-' न दीयते ' निर्वचनानुसार अपने अमृत - मधु धर्म से सबंधा ' अक्षर ' ( अक्षयभावापन ) ही प्रमाणित श्र ७८ ६ श्र X अपक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत! । अव्यक्तनिधानान्येव तत्र का परिदेवना ( गीता ) । ÷ स्वरोऽक्षरम् । सहाय व्यंजनः पूर्णेश्चावसितैः । - प्रातिशाख्य १२२६ ' त्र्यकट '

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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण होरहा है । अपने मधुमय - सौर -1 और इन्द्रप्रारणात्मक - इसी अक्षरात्मक - धर्म्म से यह स्वर क्षरात्मक व्यञ्जनों का ग्राधार बनता हुआ कुछ समय के लिए इन व्यञ्जनों को भी मधुमयी स्वरूपता - मृत सम्पत्ति प्रदान कर दिया करता है | अक्षराभिन्न- इस अमृत स्वर में हीं सन्तनन की शक्ति है । यह सन्तनन ही स्थायी संस्कार को अभिव्यक्त - प्रक्रान्त रखता है, जिस प्रक्रान्ति को ' चर्चा ' कहा गया है । जिसप्रकार मधुरसात्मिका जिह्वा से समन्वित सुप्रसिद्ध कुक्कुट प्राणी ( मुर्गा ) x काल्वालीकृत ( काढाकीचयुक्त ) चञ्चके द्वारा उप-लब्ध कृमिकीटादि प्रारियों को उत्कट चर्चणा के साथ ( कफेड़ - फफेड़ कर ) अपना भोग्य बनाए रहता है, टीक इसीप्रकार कुक्कुटस्थानीय मधुरसात्मक- सौर चात इन्द्रप्राणत्मक स्वर - अपनी सन्तनन- रूपा चञ्च से पार्थिव मर्त्य - व्यञ्जनों को प्रचण्ड चर्व्वणा से ही सन्तत - वितत करता हुआ इह्नों अपना भोग्य बनाता रहता है । अर्थात् स्वरसन्तनन के द्वारा ही मर्त्यव्यञ्जन भी कुछ दूर पय्यन्त - नादध्वनि के अनुगामी बनते रहते हैं, और यो एकमात्र मधुरसात्मक स्वर के सन्तननानुग्रह से ही व्यञ्जन भी सङ्गीत में कुछ समय के लिए मधुरसात्मक वन जाया करते हैं | इसी प्रकृतिभिद्धा - ऐन्द्री - स्वर - चर्व्वणा के लिए महर्षिने – ' चर्चा य्यमाण ' जैसा महत्त्वपूर्ण शब्द अभिव्यक्त किया है अपनी पुगणीप्रज्ञा से, जिस इस तथ्य का ही निम्न लिखित, अत्यन्त ही रहस्य-पूर्ण मन्त्र से स्पष्टीकरण हुआ है --बीभत्सूनां सयुजं हंसमाहुरपां दिव्यानां सख्ये चरन्तम् । अनुष्टुभमनु चचूय्र्यमाणमिन्द्र निचिक्युः कवयो मनीषा ॥ ऋक्सं ० १० १२४ | ६ | विस्तारभिया उक्त रहृम्यमन्त्र के तात्त्विक विस्तार में न जाते हुए अभी प्रसङ्गोपात्त मन्त्र के सम्बन्ध में यही जान लेना ग्रलं होगा कि, – प्रत्येक मर्त्य- पार्थिव क्षरात्मक भूत पार्थिवी अनुष्टुप् वाक् के सम्बन्ध से अनुष्टुप वाङमय ही है । अनुष्टुभात्मक पार्थिव क्षरभूतों का प्रतिष्ठात्मक आधार वह अमृत - प्रणात्मक सौर - मधु - रसमय - बार्हत - अक्षरात्मक - इन्द्रप्राण ही है, जो चचूर्यमाणवृत्ति से इन मर्त्य भी क्षरभूतों को जीवन--सत्ता प्रदान करता रहता है । अर्थात् अक्षरात्मक - अमृतेन्द्र ही क्षरात्मक मर्त्यभूतो की दिग्देशकालानुगता जीवनसत्ता का कारण बना हुआ है । प्रत्येक क्षरभूत में प्रत्येक पार्थिव अनुष्टुप् में श्राचाररूपेण ग्रमृतेन्द्राक्षर भी विद्यमान है, जिसका मनीषिगण अपनी सात्त्विकी - पुराणी - प्रज्ञा से अन्वेषण कर इन मर्त्यभूतों से भी अमृतपत्ति प्राप्त करने में समर्थ बन जाते है इत्यलमतिपल वितेन - दुर्बोध्यतम- मन्त्रार्थप्रसङ्ग ेन । लौकिक-- उदाहरण के माध्यम से क्षरात्मक अमृतभावापन्न स्वर की मधुरसानुगता मधुरिमा का मर्त्यभावापन्न व्यञ्जन के आधार बनेहुए अक्षरात्मक समन्वय कीजिए । ' छप्पन भोग - छत्तीस - व्यञ्जन ' X कुक्कुटो s सि मधुजिह्नः ( यजुः संहिता ) ( विस्तार के लिए देखिए शतप प्रथमखण्ड ) । * — यह ग्रवधय है कि हत्या - गोतम संवाद ' में इन्द्र के कुक्कुटरूप का भी संग्रह हुआ है ।

---- इह चेदवेदीदथ मत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः ।

भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्र ेत्य - अस्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥

- केनोपनिपत १२३०

पृष्ठ 963

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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड नाम के आभाणक से सभी ऐश्वर्य्यशाली सुपरिचित होंगे । भोज्य - च - चोष्य - लेह्यः भेद से चार श्रेणियों में विभक्त भोज्य पदार्थ पात्रकर्त्ता के कौशल से तथा परिग्रहात्मक पदार्थों के वैशिष्ट्य से जहाँ ' सुस्वादु ' बन जाते हैं, वहाँ पाककर्त्ता के शैथिल्य से, साथ ही साधन परिवहों के दोष से ' अस्वादु ' भी बन जाया करते हैं । छप्पन भोगों से समन्वित ३६ सों व्यञ्जन यों मानवीय मन के लिए स्वादु - - ( मनभावन रुचिकर- प्रिय ) भी बन जाते हैं, एवं स्वादु - ( प्र ) भी बन जाते है । प्रियभावानुगता रुचि से अनुप | शित यह ' स्वाद ' ही सौर ' मधु ' रस है, जो प्रत्येक भोज्यादि व्यञ्जन को ' सुस्वादु ' ( जायकेदार ) बना दिया करता है । दधि घृत- दुग्ध - गोधूम - यत्र -शर्करा -- गुड़ - क्षीर- लप्सिका धूप आदि आदि सभी भोज्य सौर मध भाग के समीकरण से जहाँ सुस्वादु बन जाते हैं, वहाँ पाकादि की असावधानी से मधुरस के अभिभव से बेही व्यञ्जन स्वादु भी बन जाया करते हैं । व्यञ्जनों का वह स्वादुरस ही अमृतात्मक स्वर भाग है, जिसके अभिभूत होजाने पर, किंवा निकल जाने पर सभी व्यञ्जन - गतरस ' बन जाया करते हैं, जिन एवंविध नीरस - अस्वादु-मधुशून्य - व्यञ्जनों को ही ' यातयाम ' कहा गया है । पेप पानी में अन्तर्य्यामरूप से प्रतिष्टित वही मधुरस -' शिवतमरस ' कहलाया है - ' यो वः शिवतमो रसः ' । यही जीवनीय रस माना गया है । यही प्रायुःसूत्र-संरक्षक रस माना गया है । क्यों । इसलिए कि, सौर - बार्हत -- इन्द्रप्राणात्मक - मधु ही ' पत्रिंशत् - बृहती ' ( ३६००० ) संख्याओं में परिणत होता हुआ । अहोरात्र - परिप्लवन से मानव के शतायुर्जीवन का आधार बना हुआ है । सौर - बृहती-छन्द के ३६ अक्षर बतलाए गए है । प्रत्येक अक्षर ' सहस्र भावापन्न ' है । फलतः सौर रश्मिगत बार्हत-अक्षरात्मक - जीवनप्रद - स्वरात्मक - मधुप्राण ३६ सहस्र संख्या में परिणत होजाता है । ये ही मानव के जीवनीय-आयुःसूत्र कहलाए हैं । यही आयुः प्राण विश्वप्रजा का अत्यतम मित्र बनता हुआ - ' विश्वामित्र ' नाम से भी प्रसिद्ध है । इसप्रकार दैनंदिनीय अन्नयज्ञ ( भोजनकर्म ) से अनुप्राणित भौतिक व्यञ्जनों में, पेय पानियों में, श्रवण - दर्शन - गमन - हसन - शयन आदि आदि यच्चयावत् कर्मकलाषों में हम सौर - मधु - रसात्मक - ' स्वर ' को परिन्या'त देखते हैं । मधु - प्राणात्मक ' स्वर ' की अभिव्यक्ति से, समीकरण से, समावेश से जहाँ ये भौतिक - विवर्त्त मधुर - श्र ेय - प्रिय - रुचिकर - मनभावन बने रहते हैं, वहाँ मधुरसात्मक सौर - स्वर की श्रभिभूति से, विषमता से, निर्गमन से वे ही भौतिक विवर्त्त कटु - अप्रिय - अरुचिकर मनोविद्विष्ट - उद्वेगकर ही बन जाया करते हैं । जब भोग्यजगत् मानवीय मन को सभी दृष्टियों से श्रम्वादु - नीरस - यातयाम- प्रतीत होने लगता है, तो निश्चयेन उस अवस्था में जीवनसत्ता संटिग्धा बन जाया करती है, एवं उसी अवस्था के लिए महर्षि ऐतरेय ने – ‘ स यत् करणीयं मन्येत - कुर्य्यात् ' यह उद्बोधन प्रदान किया है । ' रुदन ' एक अप्रतीतिकर - ग्लानिकर - उद्वेगकर - भाव माना गया है । किन्तु मधु मृत - ' सौर- वर-साम ' के समावेश से रुदन जैसा उद्वेगकर - कटु -- कर्म्म भी मधुर बन जाया करता है । अतएव लोक में प्रसिद्ध है कि - ' कलावन्त का तो रोना भी गाना ही है ' । सचमुच स्वरसन्धान से समन्वित तो रोना भी

-- यातयामं गतरसं पूति - पर्युषितं च यत ।

उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥

— गीता १७ / १० / १२३१

पृष्ठ 964

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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीमब्राह्मण शतपथब्राह्मण ' सम ' भावात्मक - समीकरण से - ' सङ्गीत ' बनता हुया - शान्तिप्रद - सुखप्रद ही बन जाया करता है इस मधु--स्वर -- रसात्मक -- रोदन से अपने बालभावापन्न - सौम्य - रस से शिशु का रोदन भी सुखावह बन जाया करता हैं । लोक में हीं क्यों, शास्त्रीय दृष्टि से भी स्वरानुगत रुदन का भी उपासनाजगत् में महत्त्वपूर्ण स्थान माना गया है । ' रुरुदुः --सुस्वरम् ': रूपेण प्रसिद्ध गोपीगीत के स्वरात्मक रुदन से कौन उपासक परिचित न होगा? | यो सम्पूर्ण-- त्रैलोक्य के भूत - भौतिक- पदार्थों में, कर्म - कलापों में, शारीरिक - ऐन्द्रियक- चेष्टा कम्म में सर्वत्र स्वरसामात्मक सौर- मधुरस प्रतिष्ठारूपेण परिव्याप्त है, और यही इन सब भौतिक - विवत्तों की जीवनसत्ता की प्रतिष्ठा है । जबतक ' स्वर ' का अनुग्रह है, तभी तक ' बञ्जनों ' की स्वरूपसत्ता सुरक्षित है । इसप्रकार सभी दृष्टियों से हम व्यापक - स्वरसामात्मक महान् - विश्वसङ्गीत का साक्षात्कार कर सकते हैं, करते रहते हैं | और स्वरात्मक - बड़ी सौर- सङ्गीत व्यञ्जनात्मक - विश्व की जीवनसत्ता का प्रमुख आधार वना हुआ है, जिस इस प्रकृतिसिद्ध महासङ्गीत के आधार पर ही सङ्गीत प्रवर्तक- तुम्बुरु - नारदादि ऋषिप्राणों के द्रष्टा, अतएव तुम्बुरु - नारदात्मक ऋषिप्राणों के नाम से ही लोक में प्रसिद्ध होजाने वाले मान महर्षियों की ओर से स्वरसामात्मक - नृत्यगीतवादात्मक - उस सङ्गीत का सङ्कलन हुआ है, जिसके नाद -- श्रुति-- स्वर - ये तीन प्रमुख प्रक्रम बने हुए है । जिन तीनों के अन्त के ' स्वर ' नामक मधुरिमा -प्रवर्तक - श्रानन्दप्रद - आलापात्मक तथ्य का ही अबतक विभिन्न दृष्टिकोणों से यशोगान प्रक्रान्त है । पड्ज़ - ऋषभ - गान्धार - मध्यम- पञ्चम- धैवत - निषाद ( सा - रे - ग - म - प - ध - नी - ) नाम से प्रसिद्ध - लोकसङ्गीत के प्राणप्रतिष्टा रूप ये सुप्रसिद्ध ' सात - स्वर ' परम्परया सोर - मधु रसात्मक - अमृत-अक्षरात्मक - ' स्वरसाम ' से ही क्योंकि अभिव्यक्त हुए हैं, अतएव इहें भी ' स्वर ' कह दिया जाता है । सहज - सुख । नुभूति - ही - ' स्वर ' का स्वरूप परिचय है । सुखप्रबत्तक इस ' स्वर ' के सम्बन्ध से ही सौर बृहन्मण्डल-‘ स्वः ' – ' स्वर्ग ' - आदि नामों से प्रसिद्ध हुआ है । म्वर्गलोकात्मक ( सुखलोकात्मक ) सौर स्वरसाम ही लोक-सङ्गीत के सप्तविध – स्वरों का अभिव्यञ्जक है । अतएव षड्जादि भाव भी - ' स्वर ' नाम से ही प्रसिद्ध होगए हैं | अपने नवन्द्वात्मक - वितान - श्रातान - प्रस्तार - धर्म से - तत्प्रतिरूप - सत्तस्वरों में हीं वह ' आलापधर्म्म ' अभिव्यक्त है, जिस आलाप की पारिभाषिक संज्ञा है- ' अनुरणन ' । सङ्गीताचार्य की सङ्गीतात्मिका - शब्द-ध्वनि वाताबरण में तरङ्ग --न्यायेन जो एकप्रकार का सुसूक्ष्म शब्दात्मक -- कम्पन उत्पन्न कर देती है, जिस कम्पन - समुद्र में श्रोताओं का मन निमज्जित होजाया करता है, उसी का नाम ' अनुरणन ' है । इसी की लोक अभिधा है- ' समा बँध जाना ' । मन का साम्य ही यह ' समा ' है । साम्यभावात्मक - एकीभावात्मक - इस-' सम् ' से ही तो यह गीत ( गायन ) ' सङ्गीत ' कहलाया है । गीत ( गायन ) वही गीत है, जिसके मूल में

- इति गोप्यः प्रगायन्त्यः प्रलपन्त्यश्व चित्रधा ।

" रुरुदुः सुम्बर " राजन्! कृष्णदर्शनलालसाः ॥

— श्रीमद्भागवत १० पू ० । ३२ ० । १ श्लोक । १२३२

पृष्ठ 965

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चतुर्थ अध्याय सामिधेनी ब्राह्मण प्रथमकाण्ड स्वरात्मक - ' सम् ' भाव प्रतिष्ठित है । सङ्गीत नही सङ्गीत है, जो ' स्वर ' से अभिन्न है । एवं स्वर वही स्वर है, जो परब्रह्म के अक्षर से अभिन्न है * । सङ्गीतज्ञ के सङ्गीत के हृदयानुगत ' नाद ' से उत्थित, - द्वाविंशति - नाड़ियों से विनिःसृत, २२ श्रुतियों के द्वारा ही कण्टद्वार से सप्तधा विभक्त होकर विनिर्गत उसी भाव का नाम ' स्त्र ' है, जो मधुरस का वर्धण ही कर देता है । सङ्गीताचार्य्यं के व्यञ्जनात्मक वर्ण - बोल ( ) आनन्द के प्रवर्त्तक नहीं है । अपितु इन व्यञ्जनों का मूलाधार बना हुआ - श्रालाप - संलाप - मूना आदि से समन्वित - स्वरसन्धान ही स्वयं सङ्गीतज्ञ के लिए, एवं श्रोता के लिए श्रुतिमधुरसत्त्वेन आनन्द वा ( मनस्तुष्टि का ) कारण बना करता है । यही कारण है कि, उच्चश्रेणि के शास्त्रीय सङ्गीत में व्यञ्जन न्यूनतम ही रहा करते हैं । अथ से इति पर्य्यन्त स्वर का ही सन्तनन रहता है । अवश्य ही आज के भूतप्रधान - व्यञ्जनप्रधान - जड़जीवन के जड़ीभूत मन के लिए इत्थंभूत स्वरप्रधान शास्त्रीय सङ्गीत अञ्जसा सुखावह नहीं बन रहा | आजतो जड़ता प्रवर्त्तक -- भौतिक-अनुबन्धों को, तदनुप्राणित- काल्वालीकृत - नर्त्तन - गायन को ( नहीं अपितु उद्दाम वासनात्मक हीनतम उद्व ेग--कर-- विजृम्भृणों को ) ही ' सङ्गीत ' की उपाधि दी जारही है, जिसका बस्तुगत्या - ' सङ्गीत ' शब्द के स्पर्श से भी सम्बन्ध नहीं है । प्रकृतमें इस प्रक्रान्त स्वर - प्रसङ्ग से हमें यही बतलाना है कि, नादानुगता श्रुति के द्वारा अभिव्यक्त अनुरणनात्मक - सप्तधा विभक्त - तत्त्व ही ' स्वर ' का संक्षिप्ततम स्वरूप - परिचय है । ' स्वत एव रञ्जयति - श्रोतृचित्तम् ' हीं इस ' स्वर ' शब्द का निर्वचनात्मक ( सङ्गीतानुगत ) समन्वय है । स्वर के इसी स्वरूप -- परिचय को लक्ष्य बनाकर सङ्गीताचायोंने कहा है--श्रुतिभ्यस्तु स्वर: - पड्ज - पभ - गान्धार - मध्यमाः ॥ पञ्चमो धैवत- -श्चाथ निपाद इति सप्त ते ॥ १ ॥

( तेषां संज्ञाः - स - रि - ग - म - प - ध - नी- त्यपरा मताः ) श्रुत्यन्तरभावी यः स्निग्न्धोऽनुरणनात्मकः ॥ तो रञ्जयति श्रोतृचितं स ' स्वर ' उच्यते ॥ २ ॥

राजदीप्तावस्य धातोः ' स्व ' शब्दपूर्वकस्य च ॥ ' स्वयं हि राजते ' बस्मात् तस्मात् - ' स्वर ' इति स्मृतः ॥ ३ ॥

* प्रथम मान ' ओङ्कार ', - देवन मान ' महादेव ', ज्ञान मान ' गोरख ', ' वेद ' मान ' ब्रह्मा ' | ( प्र ० ) गीत को ' सङ्गीत ' मान, सङ्गीत को ' स्वर ' मान स्वर को ' अक्षर ' मान, ताल लगन्ता कहत बैजू बावरे सुनहू गोपाललाल! दिन मान ' सूरज ', रैन मान ' चन्दा ' । - प्रथम मान ओङ्कार — १२३३

पृष्ठ 966

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चतुथ - अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण नासा - कण्ठ - उर - स्तालु - जिह्वा - दन्ता - स्तथैव च ॥ पभिः सञ्जायते यस्मात् - तस्मात् ' पड्ज ' इति स्मृतः ॥ ४ ॥

नामः समुदितो वायुः कण्ठ - शीर्ष - समाहतः ॥ गन्धर्वसुखहेतुः स्वात् ' गान्धार ' स्तेन उच्यते ॥ ५ ॥

वायुः समुत्थितो नाभेहृ दयेषु समाहतः ॥ मध्यस्थानोद्भवत्त्वाच्च ' मध्यम ' स्तेन कीर्त्तितः ॥ ६ ॥

वायुः समुत्थितो नाभेरोष्ठ - कण्ठ- शिरो - हृदः ॥ पञ्चस्थानसमुद्भूतः पञ्चम ' स्तेन उच्यते ॥ ७ ॥

नाभेः समुत्थितो वायुः कण्ठ- तालु - शिरो - हतः ॥ निषीदन्ति स्वराः सर्वे ' निपाद ' स्तेन कथ्यते ॥ ८ ॥

नराणांतु मुखं यद्वद्दर्पणेषु विवर्त्तितम् ॥ प्रतिभान्ति स्वरास्तद्वत् श्रु तिष्वेव विवर्त्तिनः ॥ ६ ॥

श्रुतयः स्वररूपेण परिणामं व्रजन्ति हि ॥ परिणामे यथा क्षीर दधिरूपेण सर्वथा ॥ १० ॥

षड्जादयः स्वराः सप्त व्यज्यन्ते श्रुतिभिः सदा ॥ 5 अन्धकारस्थिता यद्वत् प्रदीपेन घटादयः ॥ ११ ॥

जैसाकि नाद - प्रसङ्ग में निवेदन किया गया है-- हृदयोपलक्षित- उरःस्थान - कण्ठस्थान - शिरःस्थान, नामक तीन भेदों से मन्द्रनाद - मध्यनाद - तारनाद -- इन त्रिविध नादों से अनुप्राणिता मन्द्रश्रुति -- मध्यश्रुति-तारश्रुति -- इन तीन श्रुतियों की अभिव्यक्तिरूप सप्तस्वर भी ( प्रत्येक स्वर भी ) मन्द्रस्वर- मध्यस्वर--तारस्वर-- भेदने तीन महिमा भावों में परिणत रहते हैं, जिस इस त्रित्त्व का मूलाधार - सवनत्रयात्मक--वह सम्वत्सरमण्डल ही माना गया है, जिसका मन्द्रस्वरात्मक - गायत्री छन्दस्क --अग्निप्रधान- पृथिवीलोक ही प्रातः सवन है । मध्यस्वरात्मक -- त्रिष्टुप छन्दस्क - - वायुप्रधान - अन्तरिक्षलोक ही माध्यन्दिनवन है । एवं तारस्वरात्मक - जगती छन्दस्क - श्रादित्यप्रधान द्यलोक ही सायंसवन है, जिस इस त्रैलोक्यमयी--सच्छन्दस्का - सवनत्रयी का प्रत्येक ग्रहःकाल में ( प्रत्येक दिन में ) भी प्रातः - मध्याह्न - सायं - रूप से क्रमिक-भोग होरहा है जैसाकि परिलेख से स्पष्ट है— १२३४

पृष्ठ 967

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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण मन्द्रनादः मध्यनादः सानुगता त्रयी मन्द्रश्र तिः मध्यश्रुतिः मध्यस्वरः मन्द्रस्वरः शिवृत्स्तोम: ( ६ ) पञ्चदशस्तोमः ( १५ ) पृथिवी अन्तरिक्षम् अधिदैवतम् अग्नि वायु; त्रिष्टुप् गायत्री माध्यन्दिनं सवनम् प्रातः सवनम् प्रतिकालः मध्याह्नकालः कारस्थानम् उर: स्थानम् १२३५ प्रथमकाण्ड तारनादः तारश्रुतिः तारस्वरः एकविंशस्तीम द्यौः श्रादित्यः जगती सायंसवनम् सायंकालः शिरःस्थानम् त्रिस्थान -भेद से तीन प्रमुख भागों में विभक्त सप्त स्वर ही सङ्गीतसास्त्र में ' शुद्धस्वर ' कहलाए हैं, मप्त शुद्धस्वर ही अंतियों के तारतम्य से ' बारह प्रकार की अवान्तर सांयोगिकी अवस्थाओं में परिचित हो जाते हैं । वे ही यौगिक स्वर - ' विकृतस्वर ' कहलाए हैं, जिन का भी प्रसंङ्गोपत्त तालिकामात्र से नामस्मरण कर लिया जाता है-

पृष्ठ 968

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चतुर्थ अध्याय विकृतस्वर - तालिका संख्या नाम १ च्युतषड्जः अच्युत - पड्जः २ विकृतर्षभः ३ साधारणगान्धारः ४ अन्तरगान्धारः II ६ च्युत -- मध्यमः अच्युत - मध्यमः ७ त्रिश्रति पञ्चमः ८ कौशिक - पञ्चमः Ε विकृत - धैवतः १० कौशिक - निषाद: ११ काकली - निषादः १२ सामिधेनीब्राह्मण व्यस्थितिः मन्दासस्थितः छन्दोवतीस्थ रतिकास्थितः वज्रकास्थितः प्रसारिणीस्थ: प्रीतिसंस्थितः मार्जनीस्थः सन्दीपनीस्थः सन्दीपनीस्थ रम्यासंस्थितः तीव्रासंस्थितः कुमुद्वतीस्थः १२३६ शतपथब्राह्मगा अवस्था द्विश्रुतिकः द्विन तिकः चतुःश्रु तिकः त्रिश्र तिकः चतुःश्रतिकः द्विश्रुतिकः द्विश्रतिकः त्रिश्रतिक: चतुःश्रतिकः चतुःश्रुतिकः त्रिश्रतिकः चतुःश्रतिकः

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चतुथ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण ते - मन्द्र - मध्य- तारा - ख्य स्थानभेदात्- त्रिधा मताः ।

ते एवं विकृतावस्था द्वादशा प्रतिपादिताः ।

तैः शुद्धः सप्तभिः सार्द्ध भवन्त्ये कोनविंशतिः ॥ ( १६ ) ॥

अन्यदपि किञ्चित् प्रासङ्गिकं - स्वर - सम्बन्धे - एव — प्रथमत्राह्मण परब्रह्मानुगत - अर्थी के- ' आम्भृणीकुल ' में जैसे वर्ण - जाति - छन्द - ऋषि - देवता - आदि - व्यवस्थाएँ व्यवस्थित हैं, ठीक उसी प्रकार शब्दब्रह्मानुगत ' सरस्वतीकुल ' में सम्भूत इन स्वरों में वर्ण- छन्द - ऋषि-देवता - श्रादि सभी व्यवस्थाएँ व्यवस्थित हैं, जिन के वैज्ञानिक स्वरूप - विश्लेषण का अत्र अवसर नहीं है । पाठको के चिन्तन - मनन- सौकर्य मात्र के लिए उन अवस्थाओं में से कतिपय अवस्थाओं का यहाँ नामस्मरण-मात्र ही कर लिया जाता है । षड्ज़ स्वर ( सा ) के ' ऋषि ' वह्नि ' हैं, ऋषम ( रि ) के ब्रह्मा हैं, गान्धार ( ग ) के चन्द्रमा हैं, मध्यम ( म ) के विष्णु हैं । पञ्चम ( प ) के नारद हैं, धैवत, और निषाद के ( ध - नी - के ) तुम्बुरु हैं | सातों स्वरों के क्रमशः वह्नि, ब्रह्मा, सरस्वती, श, ( महादेव ) विष्णु, गणति, सूर्य, ये सात – ' देवता ' हैं | सातों के क्रमशः – अनुष्टुप् - गायत्री - त्रिष्टुप - बृहती - पछि -- उष्णिक् जगती - ये सात छन्द हैं । पड्ज -- गान्धार - मध्यम ( सा -- गम ), ये तीन स्वर देवकुल से समुत्पन्न हैं । पञ्चम- स्वर ( प ) पितृकुल से उत्पन्न है । ऋषम और धैवत ( रि - ध ), ये दो स्वर ऋषिकुल से अभिव्यक्त हैं । एवं निषाद ( नि ) स्वर असुरकुल से उत्पन्न है । पड्ज, मध्यम, पञ्चम ( सा म प ) ये तीन स्वर वर्णत: ' ब्राह्मण ' हैं । ऋषभ, और धैवत ( रि - ध ) ये दो स्वर ' क्षत्रिय ' हैं । निषाद, और गान्वार, ( नि - ग ) ये दो स्वर ' वैश्य ' हैं । एवं ' अन्तर काकली ' * रूप में परिणत ये ही निषाद- गान्धार-' शूद्र ' हैं । घड्ज ( सा ) पद्मवर्ण ( रक्तवर्ण ) है, ऋषभ ( रि ) पिञ्जरवर्ण ( ईपत् - पीतवर्ण ) है | गान्धार ( ग ) स्वर्णवर्ण ( अतिपीतवर्ण ) है, मध्यम ( म ) कुन्दवर्ण ( श्वेतवर्ण ) है, पञ्चम ( स ) ति श्वेतवर्ण ) है । धैवत ( घ ) पीतवर्ण ( सामान्य पीतवर्ण ) है । एवं निवाद ( नि ) क्यू रेवण ( विचित्रवर्ण ) है । षड्जस्वर ( सा ) बीर, एवं अद्भुत - रमात्मक है, ऋषभस्वर रौद्ररसानुगत है, धैवत ( ध ) स्वर वीभत्स, तथा भयानक - रसात्मक है । गान्धार, और निषाद ( ग - नि ) ये दोनों स्वर करुणारसानुगत है । मध्यमस्वर ( म ) हास्यरसात्मक है, एवं पञ्चमस्वर ( प ) शृङ्गाररसात्मक है । * —निषादः षड्जस्य यदि श्रुतिद्वयं संश्रयेत् षड्जस्य द्वितीयश्रुतौ तिष्ठन् - चतुः - श्रुतिर्भवति - तदा-' काकली ' त्युच्यते । गान्धारस्य मध्यमस्य श्रतिद्वयं गृह्णन् चतुःश्रुतिः सन् ' अन्तर ' इत्युच्यते । तदित्थं-निषाद- गान्धारावेव - अनेन प्रकारेण - ' काकल्यन्तरस्वरौ ' इत्यवधेयम् । १२३७

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 970 का मूल पृष्ठ
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चतुथ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण षड्जस्वर ( सा ) की अभिव्यक्ति जम्बुद्वीप में हुई है । ऋषभस्वर ( रि ) की शाकद्वीप में, गान्धारश्वर ( ग ) की कुशद्वीप में, मध्यमस्वर ( म ) की क्रौञ्चद्वीप में पञ्चमस्वर ( प ) की शाल्मलीद्वीप में, धैवतस्वर ( ध ) की श्वेतद्वीप में, एवं निषादस्वर ( नि ) की अभिव्यक्ति पुष्करद्वीप में हुई है । — अमत्र संमूहः-वह्निर्वेधाः - शशाङ्कश्च लक्ष्मीकान्तश्च नारदः ॥ ऋषयो ददृशुः पञ्च षड्जादी स्तुम्बुरुर्धनी ॥ १ ॥

1: - शर्व्व - श्री - गणेश्वराः ॥ वह्नि - ब्रह्म - सरस्वत्य: -सहस्रांशु - रिति प्रोक्ताः क्रमात् षड्जादिदेवताः || २ || क्रमादनुष्टुप् - गायत्री - त्रिष्टुप् - च बृहती- ततः ॥ पंक्ति - रुष्णक च-- जगती -- त्याहुश्छन्दांसि सादिपु ॥ ३ ॥

गीव कुलसम्भूताः पड्ज - गान्धार - मध्यमाः ॥ पञ्चमः पितृवंशोत्थो, रि - धः - वृषिकुलोद्भवौ ॥ ४ ॥

निषादोऽसुरवंशोत्थो ब्राह्मणाः सम पञ्चमाः ॥ ५ ॥

रि -- धी -- तु क्षत्रियों ज्ञेयौ वैश्यजाती नि - गौ-- मतौ ॥ शूद्रावन्तरका कल्यौ " -... ", " ' स्वरवर्णास्त्विमे क्रमात् ॥ ६ ॥

पद्माभः, पिजरः, स्वर्णवणः कुन्दप्रभोऽसितः ॥ पीतः, कबूर इत्ये T -- षां जन्मभूमिमथ ब्रु वे ॥ ७ ॥

जम्बु शाक- कुश - क्रौञ्च - शाल्मली - श्वेत- नाममु ॥ द्वीपेषु पुष्करं चैते जाताः पड्जादयः क्रमात् ॥ ८ ॥

स- री - वीरेऽद्भुते रौद्र, धो बीभत्से भयानके ॥ कायों ग -- नी -- तु-- करुणे, हास्य शृङ्गारयो- र्म- पौ ॥ ॥ १२३८