Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 971–980

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 971–980

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१ ३ I ५ स्वराः--देवाः ' ऋषयः नि कुल छन्दांसि वर्णनातयः ६ वर्णभावाः रसभावाः ८ भूमिः अभिव्यक्ति ) सा ( षडजस्वरः १ -प्रथमः-वह्निः : * ब्राह्मण क्षत्रियः वैश्यः ब्राह्मणः ब्राह्मणः क्षत्रियः वैश्यः | देवकुलम् ऋषिकुलम् देवकुलम् देवकुलम् पित्कुलम् ऋषिकुलम् असुरकुलम् अनुष्टुप् गायत्री त्रिष्टुप् बृहती पाङक्तिः उष्णिक जगती : विधाता सरस्वती गणपतिः सूर्य महादेवः अग्निः नारायणः ) रक्तवर्ण ( ; पद्माभ जम्बुद्वीपे अद्भुतरस एवं वीर ) पत्पीतवर्ण (: पिञ्जराभ रौद्ररस शाकदीपे परस कुशद्वीपे ) ) ) ) अतिपीतवर्ग ( श्वेतवर्ण ( ( कृष्णवर्ण सामान्यपीतवर्ण ::: ( कुन्दाभः अमिताभ स्वर्णाभ पीताभ हास्यरस पे क्रौञ्च शृङ्गाररस शाल्मलीद्वीपे श्वेतद्वी भवानकरस एवं , वीभत्स ) ( विचित्रवर्णं कबूरामः ब्रह्मा चन्द्रमाः विष्णुः नारदः तुम्बुरुः तुम्बुरुः | | | ) ) ) ) ) ) ( ३ ( ग ( म ( १ ( ध ( नी ::: ऋषभस्वरः - - गान्धारस्वर - मध्यमस्वर - पञ्चमस्वरः धैवतस्वरः निषादस्वर - २ - ३ - ४ - ५ ६- - ७-. -: द्वितीयः चतुर्थ पञ्चमः तृतीयः ष्टः रूप्तम पुष्करद्वीपे ' इति ' नवस्व करुणरस | विकृतगान्धारस्यैव ?, नियम्यते का कलीच्यं कथं इति निषादस्यैव स्वराः विकृत - -- सप्तैव नास्ति -सद्भावात् स्वरान्तरचं तयोः तथाचोक्तममियुक्तः । स्वरान्तरयोद्वयोः स्वराः अनाश्रयच्चात् | मैत्रम् सप्तैव इति ? इति ' काकल्यन्तरयोरपि ननु अन्तरत्वम् ' - वक्तव्यम् * ॥ भवेत् त्युत्क्रर्षणाद् द्विश्र संज्ञो ' ' काकली : निवाद ॥ || ॥ १ ॥

तपोः ॥२ दन्तिलः -स्वरसंज्ञकः नोच्यते रुदाहृतौ ' ' दन्तर स्वरता स्या- भेदेन-- गान्धाररावेतावाप्तँ स्तदेव निषाद गन्धार-अनाश्रयच्चाद् अतो

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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण

- विरूपास इद् ऋषयस्त इद् गम्भीरवेपसः ।

तेऽग्नेः परिजज्ञिरे ॥

तोऽङ्गिरसः सूनवः, १२४० शतपथब्राह्मण - शत • ६ | १ | १ | १ | - ऋक्सं ० व्यञ्जन का आधारभूत स्वरतत्त्व सात महिमाभात्रों में क्यों, और कैसे परिणत होगया?, इस प्रासङ्गिक महत्त्व पूर्ण प्रश्न के सम्बन्ध में भी प्रसङ्गात् किञ्चिदिव निवेदन करना आवश्यक है । यह स्पष्ट किया जाचुका है कि, स्वर ' अक्षरतत्त्व ' का ही नाम है । जैसे अव्यय का साहजिक नाम ' मन ' है, क्षर का साङ्केतिक नाम वाक् है, एवमेव अक्षर का साङ्केतिक नाम ' प्राण ' है । मनः- प्राण-बाग् - धन, अव्यय - अक्षर - क्षरात्मक - परात्पर - समन्वित - षोडशी - पुरुषात्मक ' पुरुष ' ही तो ' परब्रह्म ' का कृत्स्न स्वरूप - परिचय है । इत्थंभूत पुरुषात्मा के परात्परान्ययादि चारों महिमाविवतों को ही तो पूर्व में क्रमशः अर्द्ध मात्रा - स्फोट - स्वर - व्यञ्जन इन नामों से समन्ति माना गया है । सर्वात्मक- सर्वनिरपेक्ष-अद्ध ' मात्रात्मक - परात्पररूप अण्डधरातल पर प्रतिष्ठित स्फोटात्मक - ज्ञानशक्तिघन श्राव्यपुरुष ही श्रर्थसृष्टि-का आलम्बनात्मक अधिष्ठानकारण है, स्वरात्मक क्रियाशक्तिमय अक्षरपुरुष ही अर्थसृष्टि का निमित्त -कारणात्मक असमवायिकारण है, एवं व्यञ्जनात्मक - अर्थशक्तिमय क्षरपुरुष ही अर्थसृष्टि का उपादान-कारणात्मक समवायिकारण है । इस कारणत्रयीरूप त्रिपुरुष पुरुषात्मा से ही शब्दात्मक पाञ्चभौतिक पञ्चपर्वा विश्व की, एवं पञ्चात्मिका विश्वप्रजा की अभिव्यक्ति हुई है । सैना स्थिति. । उक्त मूलस्थिति में सृष्टिकर्तृत्व प्रमुखरूप से उस स्वरात्मक अक्षर को ही प्राप्त है, जो क्रियाशक्तियुत प्राण से गतिशील बना हुआ है । ससरणधर्म्मा- गतिशील -- परिवर्तनशील- विश्व का प्रमुख कर्त्ता गति--प्राणात्मक अक्षरतत्व, किंवा तदभिन्न स्वरतत्त्व किंवा तद्रूप ' प्राण ' तत्त्व ही बना हुआ है, जैसा कि -' तथा - अक्षराद्विविधा: -- सौम्य! भावाः प्रजायन्ते तत्र चैत्रापियन्ति ' इत्यादि श्रुति से स्पष्ट है । स्वरा-भिन्न --अक्षररूप इस ' प्राण ' का ही साङ्केतिक नाम है -- ' असत् तत्त्व | सद्रूपता ही सद्घन इस प्राणाक्षर की ' असद् ' अभिधा का कारण है । यही मौलिक असत् ( सद्रूप ) प्राणतत्त्व अपने सहज प्राणनरूप गतिधर्म्म ' रिपति- गच्छति रषन् वा ' इत्यादि निर्णचनानुसार ' ऋषि ' नाम से प्रसिद्ध है । सृष्टि के मूलश्रवर्त्त'क ' असत् ' - नामक ऋविप्राण की एकर्षि, द्वयर्षि, त्र्यर्पि, सन्तर्पि, दशर्षि, आदि विविध जातियाँ है । विरूपास::, विविधरूपासः - इन ऋषिप्राणों में भूतभौतिकी सृष्टि का प्रमुख आधार वह ' सप्तर्पि ' नामक प्राणविशेष ही बना करता है, जिस के इन सात अवयवों के ' ४-२-१ ' इस क्रम से तीन संस्थान माने गए हैं । ये ही तीनों संस्थान क्रमशः चत्वार आत्मा, द्वौ - पक्षौ, पुच्छं प्रतिष्ठा रूप से उपवर्णित हैं । चार प्राणों की समष्टि ही ' चत्त्वार आत्म । ' है । दो प्राणों की समष्टि दो पक्ष हैं, एवं * असद्वा इदमग्र आसीत् । तदाहुः किं तदसदासीदिति १, ऋषयो वाव तदग्रे ऽसदासीत् । तदाहुः - के ते ऋषय इति?. प्राणा वा ऋषयः । ते यत् - अस्मात् - सर्वस्वात् - इद-मिच्छन्तः -- श्रमेण तपसा - अरिपन् - तस्मात् ऋपयः ।

पृष्ठ 973

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चतुथ अध्याय " चचार आत्मा, दक्षिण १ सामिधेनीब्राह्मण २ १ पश्चिम १२४१ प्रथमकाण्ड उत्तर २ एक प्राण प्रतिष्ठात्मक पुच्छंभाव है । प्रत्येक भूतमुष्टि का प्राणात्मक- रेखाचित्र बनाइए, और उसके इन सात-प्राणों को निम्नलिखित रूप से व्यवस्थित कीजिए । और हाँ यह ध्यान रखिए कि इन सातों प्राणों का ही नाम ' चित्यपुरुष ' है, जिस के मन्थन से जो ऊर्ध्व विनिर्गत चितेनिधेय विशुद्ध अमृतभाग है, जो कि-' सप्तानां पुरुषणां श्रीः ' कहलाया है, वही आठवाँ ( सातों के रसात्मक अमृतभाग से अभिव्यक्त - स'तमूर्ति-ऊर्ध्वभाग ) विभाग है । द्वां पक्षी, पुच्छ प्रतिष्ठा " इति सप्तपुरुनात्मकश्चित्यप्रजापतिः -उक्त परिलेख के मध्य के चार चित्यप्राण, दक्षिणोत्तर पाश्वों के दो चित्यप्राण, पश्चिमानुगत एक चित्यप्राण, इन सातों चित्यत्राणों की समष्टि का नाम तो चित्यपुरुष है, एवं पूर्वानुगत उस अष्टम का नाम-' चितेनिधेय पुरुष ' है, जिसे ' अमृत ' कहा गया है । यों मृत मर्त्य के समन्वय से सम्पन्न यह सप्तपुरुषा--त्मक प्राणात्मा - प्रजाप्रति ही वह ' छन्द ' है, जिसमें इसी अनुपात से क्षरात्मक भूत प्रतिष्ठित होते हैं, और क्षरभूतों के यथास्थान प्रतिष्टित होते ही वह अव्यक्त - प्राणपुरुष - व्यक्त भूतरूप में परिणत होता हुआ - ' विश्व '

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चतुथ श्रध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण नाम धारण कर लेता है । लोकप्रसिद्ध सञ्चा [ साँचा - रेखाचित्र - मॉडल ] ही ' छन्दःपुरुष ' है । एव प्रत्येक भूतभौतिकी सृष्टि में यही सप्तप्राणामूर्ति अक्षरात्मक स्वरात्मा मूलाधार बना हुआ है । मनुष्य को लीजिए । जिसे ' घड़ ' कहा जाता है, वही ' मध्याङ्ग ' है, और हृदय से ऊपर कष्ट पन्त, तथा नीचे ब्रह्मग्रन्थि - पर्यन्त सम्पूर्ण मध्याङ्ग में चार प्राण प्रतिष्ठित हैं । क्योंकि प्राणचतुष्टयात्मक इसी मध्याङ्ग के आधार पर मस्तक - हाथ - पैर आदि इतर सभी शारीरिकपर्व प्रतिष्ठित रहते हैं । एतावता ही इस विभागचतुष्टयी को - ' चत्वार आत्मा ' कह दिया जाता है । दक्षिण हाथ - दक्षिण पाट, दोनों की समष्टि एक-प्राणात्मक दक्षिणपक्ष है, वाम हस्त पाद की समष्टि वामपक्ष है । शिरो भाग से आरम्भ कर ब्रह्मग्रन्थि पर्य्यन्त लम्त्र - यष्टिवत्-- वितत- सुप्रसिद्ध मेरुदण्ड [ रीड की हड्डी ] के अन्त में प्रतिष्ठिता त्रिकास्थि का प्राण ही पुच्छात्मक प्रतिष्ठाप्राण है । यह वही प्राण है, जिस को प्रकृतिस्थता में हीं शरीरयष्टि ऋजुभाव से प्रतिष्ठित रहती है, सीधी तनी रहती है । वार्द्धक्य में जब यह प्रतिष्ठाप्राण मूर्च्छित होजाता है, तो मेरूदण्ड अवनत होजाता है, कमर झुक जाती है, और उस दशा में कृत्रिम - पुच्छ प्रतिष्ठा ( लकड़ी - छड़ी ) का श्राश्रय अनि-वानजाया करता है । इन सातों प्राणों के अमृतप्रधान रसात्मक भाग से ही क्योंकि ऊर्ध्वस्थ भाग का निर्माण होता है, श्रतएव उसे ' श्रीः ' कहा गया है । यही परोक्ष नियमानुसार “ शिर: ' [ मस्तक ] नाम से प्रसिद्ध है । यही क्रम पशु के शरीर में है, यही पक्षी के शरीर में है । यही कम कीट -कृमि - सर्ग में है, और यही क्रम उन औषधि - वनस्पत्यादि में है, जिन का एक एक पत्ता भी इन सातों चितियों से समन्वित है । किसी भी वृक्ष - ओषधि के पत्त े को सम्मुख रख लीजिए | आप देखेंगे कि -- पत्ते के मध्य में एक तन्तु है -- वही मेरुदण्ड है, तत्संलग्न भाग ही चत्वार श्रात्मा है । दोनों पार्श्व दोनों पक्ष है । मूलभाग वह पुच्छ प्रतिष्ठा-प्राण है, जिससे पत्ता तना हुआ रहता है, एवं जिसके मूच्छित होते ही पत्ता मुझ जाता है । पार्थिवसृष्टि का सर्वस्वभूत सम्वत्सरप्रजापति जब इत्थंभूत ही है, तो तद्गर्भ में तदंश से ही समुद्भूता चर -- अचर - प्रजा इस सप्तसंस्थान -क्रम से कैसे वञ्चित रह सकती है? । मध्यस्थ विष्वद्वृत्त ही चत्त्वार आत्मा है, प्रणमासात्मक उत्तरायण उत्तरपक्ष है, षण्मासात्मक दक्षिणायन दक्षिण पक्ष है, केन्द्रस्थ प्राजापत्याग्नि ही पुच्छप्रतिष्ठा है । एक पक्षी का जैसा आकार है, सप्तचिति का लगभग वैसा ही आकार है । तभी तो सभी का चित्य - प्राण- ' हंस ' [ जीव ] कहलाया है । इसीलिए इस चित्यपुरुष का साङ्केतिक नाम होगया है - ' सु ' । सम्वत्सरात्मक महासुपर्ण # ही साक्षी सुपर्ण है, एवं तदंशभूत प्राणी ही भोक्ता सुपर्श है । * -अथ ह वा एष महासुपर्ण एव सम्वत्सरः । तस्य यान्पुरस्तात् पयन्ति,, सोऽन्यतरः पक्षः । अथ यानू पडपरिष्टात- सोऽन्यतरः विषुवतः - पण्मासानु -। श्रात्मा विषुवान् । --- शत ० १२२२२३।७

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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड जिसप्रकार त्रिपुरुष - पुरुषात्मक घोडशी - पुरुषात्मा के मनः - प्राण वाङ् मय - त्रिवृद्भाव से आत्मसर्गात्मक विश्व को समष्टि, और व्यष्टिरूप से त्रिपर्वात्मक माना गया है * एवमेव अक्षरप्राणात्मक स'तप्राणात्मक - सतपुरुषात्मक प्रजापति की तथोक्ता श्रात्मा - पक्ष - पुच्छ - रूपा सात चितियों के अनुबन्ध से विश्व को समष्ट्या व्यष्ट्या, उभयथा सन्तपर्वा भी कहा जासकता है, कहा गया है । उदाहरण के लिए सर्वप्रथम मानवशरीर को ही लक्ष्य बनाइए । मानवशरीर में शिरोगुहा, उरोगुहा, उदरगुहा, बस्तिगुहा, नामक चार गुहाविवर्त्त हैं, जिन इनमें ( प्रत्येक में ) सात - सात - प्राणों का समन्वय हो रहा जैसाकि— ' गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ' इत्यादि वचन से स्पष्ट है । गुहानिहित इन चारों सप्तकों का भी शतपथ-प्रथमखण्ड में हीं ( पृ ० सं ० ३३६ में ) परिलेख के माध्यम से दिग्दर्शन कराया जाचुका है । विश्व में स्वरों का ही सप्तक नहीं है । अपितु अक्षरप्राणात्मक - सप्तस्वरों की तथोक्ता सन्तचिति के आधार पर अवस्थित समष्टि – व्यष्टिरूप यच्चयावत् भूत - भौतिक-- पदार्थ सन्त -- भाबापत्र हीं हैं, जिन अगणित सप्तकों में से कुछ एक सप्तकों का तालिकारूपेण यत्र नाम दिग्दर्शन करा दिया जाता है । १- सप्त - प्राण –२ श्रोत्रप्राण, २ चक्षुः प्राण, २ नासा प्राण, १- मुखप्राण । २ सप्त - अर्चि – १ – काली, २- कराली, ३ - मनोजवा, ४ - सुलोहिता, ५ - सुधूम्रवर्णा, ६ - स्फुलिं-गिनी - ७- विश्वरूपा । ३ - सप्त- होम - १ - पाकयज्ञ, २- अग्निहोत्र, ३ - दर्शपूर्णमास, ४- चातुर्मास्य, ५ - सोमयज्ञ, ६ - महायज्ञ, ७- अनियज्ञ । ४ - सप्त - लोक - १ - सत्यम्, २- तपः ३ - जनत, ४- महः, ५- स्वः, ६ - भुवः, -भूः । ५ -- सप्त- अग्निजिह्वा - १ - काली, २- कराली, ३ - रक्तबर्शिका, ४ - धूम्रपुष्पा, ५ - धूम्रशीर्ण, ६- ज्ज्वलनी, ७ - जगवती । ६- सप्त अग्नि - १. .१ - जिह्वा, २- हिरण्या, ३- कृष्णा, ४- रक्तिका, ५- अतिरक्तिका, ६ - गगना, ७ -- बहुरूपा । ७- सप्त- अप्सरा - १ - उर्वशी, २-- मेनका, ३- रम्भा, ४ - सुकेशी ५-- तिलोत्तमा, ६ -- मञ्ज, बोपा, ७- घृताची । ८- सप्त- आवरण - १ - - जल, २ -- अग्नि, ३- वायु, ४- आकाश, ५ - श्रहङ्कार, ६-- महत्तत्त्व, ७- प्रकृति । * शतपथभाग्य - प्रथमखण्ड में इन त्रिपर्वो का संकलन किया जाचुका है ( देखिए! प्रथमखण्ड-पृ ० सं ० ५.११ से ५२० पर्यन्त ।

- सप्त प्राणः प्रभवन्ति तस्मात् सप्तार्चिषः समिधः, सप्त होमाः ।

सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥

- मुण्डकोपनिषत् २१८ । १२४३

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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण ६ सप्त- ऊर्ध्वलोक - १ -- ब्रह्मलोक, २. बैकुण्ठ ३ – शिवलोक, ४ - सुरलोक, ५ -- सूर्य्यलोक, ६- पितृलोक, I सिद्धलोक । १०- सप्त - अधोलोक – १ मायालोक, २ -- यमलोक, ३- गन्धर्वलोक, ४- यक्ष लोक, ५ - किन्नरलोक, ६- नागलोक, ७- दैत्यलोक । ११ - सप्त ऋषि - १ - महर्षि, २ - ब्रह्मर्षि, ३ - देवर्षि, ४- राजर्षि, ५ - परमर्षि, ६ - काण्डर्पि, ७- श्रुि १२- सप्त - कल्प – १ --पार्थित्रकल्प, २- कूम्र्म्मकल्प, ३ - अनन्तकल्प, ४ - ब्रह्मकल्प, ५ -- रुद्रकल्प, ६ -- श्वेतवाराहकल्प, ७ -- प्रलयकल्प । १३- सप्त - पितर – १– आज्यपा, २ - सोमपा, ३- हविर्भुक्, ४ - श्रग्निष्वात्ता, ५ -- सोमसन, ६-- षिन्, ७- सुकाली । १४ - सप्त देवपुरी - १ - विष्णुपुरी, ० - शिवपुरी, ३- ब्रह्मपुरी, ४- यमपुरी, ५ - वरुणपुरी, ६-- अलकापुरी, ७- अमरपुरी । १५ - सप्त - द्वीप – १ -- जम्बु, २ - प्लक्ष, ३ - शात्मली, ४ - कुश, ५ - क्रौञ्च, ६ - शाक, ७ - पुष्कर । १६ - सप्तसमुद्र – १- लवणोद, २- इतुरोद, ३- सुरोद, ४ - घृतोद, ५- दधिमण्डोद, ६ - क्षीरोद, ७ - स्त्रादृदृक् । १७- सप्त - वायु – १ आवह, २- प्रवह, ३ - संग्रह, ४- श्रनुग्रह, ५- विवह, ६- परावह, ७ - परिबाह् । १८- सुप्त - पाताल — १- अतल, २ - वितल, ३ - सुतल, ४- तलातल, ५ - महातल, ६ - रसातल, ७ पाताल - । १६- सप्तनरक – १ व २ - तान, ३ - विमोहन, ४- कृमीश, ५ - लालाभक्ष, ६- श्रधः शिरा, ७- अवीचि । २०- सप्त - स्वर्ग –१ अपोदक, २ ऋतधामा, ३- अपराजित, ४- ब्रध्नस्यविष्टुप् ५ - अधियाँ, ६- प्रद्यौः ७- रोचना । २१- सप्त- पर्वत – १- कुलगिरि, २ - शाखागिरि, ६ - विष्कम्भपर्वत, ७- केसरपर्वत । ३ - पादगिरि, ४ स्तूप गिरि, ५ वर्षपर्वत, २२ - सप्त - नदी — १ - चतुर्गङ्गम्, २ - सप्तगङ्गम्, ३ - नदी, ४- महानदी, ५ - शाखानदी, ६- क्षुद्रनदी, ७ - कुल्या | २३- सप्त- देश - १ - पुरी, २ - पत्तन, ३- महानमर, ४- नगर, ५ ग्राम, ६ खरबट, ७ - उपनिवेश । २४ - सप्त - प्रसिद्ध - पर्वत — १ हिमालय, २- विन्ध्याचत, ३ - हेमकूट, ४ - निपध, ५. मल्लिमान, ६- पारियात्र, ७ - गन्धमादन । १२४४

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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड २५ - सप्त - धान्य — १ - गोधूम ( गैहूँ ), २ - यत्र ( जौ ), ३- तिल, ४- माष ( उई ), ५- मुग्द ( मूंग ), ६- अक्षत ( चाँत्रल ), ७ - बन ( बाजरा ) । २६ - सप्त - राज्याङ्ग – १ - सेना, दुर्ग, ३ मन्त्री, ४ - कोश, ५- देश, ६- मित्र, ७ - स्वामी! २७- सप्त - वार – १- रवि, २- सोम, ३- मङ्गल, ४ बुध, ५ - बृहस्पति, ६- शुक, ७ - शनैश्चर । २८ - सप्त - सर - ( सरोवर ) – १ - मानसर, २ - मणिसर, ३ - बिन्दुसर ( विष्णुसर ), ४- पम्पा -सर, ५ - गरुडसर, ६ - रामसर, ७ - अक्षोदसर । २६ - सप्त - देवच्छन्द १- गायत्री, २- उष्णिक्, ३ - अनुष्टुप, ४ - बृहती, ५ - पंक्तिं, ६ -- त्रिष्टुप, ७ जगती । ३० - सप्त- ज्योतिष्टोम - १ - अग्निष्टोम २ - प्रत्यग्निष्टोम ३ -- उब यस्तोम, ४- पोडशीस्तोम, ५ -- प्रतिरात्रस्तोम, ६ - बाजयेपयस्तोम, अनोर्यामस्तोम । ३१-- सप्त ऊर्ध्व प्रजातन्तु - १ -पुत्र, २ - पिता, ३- पितामह, ४- प्रतितामह, ५- वृद्ध- प्रपितामह, ६--अतिवृद्धप्रपितामाह, ७ - वृद्धातिवृद्ध - प्रपितामह ( सापिण्डय सप्त पौरुषम ) ३२- सप्त- अधः- प्रजातन्तु - १ - पिता, २- पुत्र, ३ - पौत्र, ४ - प्रपौत्र, ५- वृद्धप्रपौत्र, ६ - अतिवृद्धप्रपौत्र, वृद्धातिवृद्धप्रपौत्र । ३३ - सप्त - सङ्गीतस्वर - १ -पड्ज, २ - ऋषभ, ३- गान्धार, ४- मध्यम, ५- पञ्चम ६ - धैवत, ७ - निषाद । ३४- सप्त - स्वरांचारण – १ - सा, २ रे । ३ - ग, ४ – म, ५-५, ६ - ध, ७- नी । तदित्थं- " चत्त्वार आत्मा ( ४ ), द्वौ पक्षौ ( २ ), पुच्छं प्रतिष्ठा ( १ ) " रूपेण सप्तात्मक बने हुए-सप्तपुरुषपुरुषात्मक प्रजापति ( अक्षराभिन्न स्वरात्मक ऋषिप्राण ) से क्षरात्मक व्यञ्जन के द्वारा । अभिव्यक्त, समुद्-भूत, उत्पन्न इस विश्व में इस सप्तचितिक प्रजापति के अनुबन्ध से सर्वत्रैव समष्टि व्यष्टि रूप से सप्त - महिमा -भावों का विस्तार होरहा है | सप्त - पुरुष, सन्त ऋषि, सम- अहोरात्रवृत्त, सप्त - कपाल, सन्त - कर्ण, सम - चक्र, सप्त होता, सप्त- तन्तु सप्त अदितिपुत्र, सप्त - मरुद्गण सप्त ऋतु सप्तप्राणानुगत जिन सप्तकों का पूर्व में सस्मरण हुआ है, उनके अतिरिक्त गणित सख्य- सप्तकों का वेदशास्त्र में यत्र यत्र यज्ञप्रक्रियाओं के भेद से स्वरूप - निरूपण हुआ है, जिनके विस्तार का अत्र अवसर नहीं है । उनमें से कतिपय सप्तक - नामों का संस्म-रण ही पर्याप्त होगा वेदस्वाध्याय - प्रक्रान्ति के अनुबन्ध से सप्तपुरुष ( शत ० ६।१।११ ) । सप्त ऋषि ( शत ० ८ | ४ | ३ | ६ | ), सप्तकपाल ( शत ० २।५।११२ ), सप्तक ( तै ० ० ११७ | २ | ), सप्नकृत्वस् ( तै-बा ० २।३।६।३ । ), सप्तगरण ( तै ० ( ब्रा ० १।६।२३ । ), सप्तचक ( तै ० वा ० २/२/१/५ ) सप्तचितिक ( शत ० ६।६।१।१४ । ), सप्ततन्तु ( गो ० ब्रा ० १ | १ | १२ | ), सप्नतय्यः ( शत ० ६ | ५ | ३ | ११ | ), सप्तनामा ( तै ० प्रा ० ३ | ११ || ), सप्तनिधन ( जै ० ० २।११।५ | ) सप्तपदम् ( ऐ ० ब्रा ० ५।१२।१३ ) सप्तपुत्र ( जै ० उ ० ब्रा ० १२४५

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चतुथ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण २।२।३।८ ), सप्तमुख्य ( सा ० ३। ६ । १० ), सप्तरश्मि ( तै ० ब्रा ० २८ २७१ ), सप्तरात्र ( गो ० ११२।६ । ), सप्तर्च ( शत ० ६।५।२।११ ), सप्तवर्षा ( गौ ० १ ३/७ ) । सप्त - स्वसा ( तै ० ब्रा ० २ / ४,६।१ । ) सप्तहूत तै ( ० ब्रा ० २२३.१११२, सप्तहोता तै ० ० ३ ७ ३ | ), सप्ताह ( शत ० - १३ | १ | ७ | २ । ), इत्यादि रूप से सर्वत्रैव सप्त सप्त मौलिक स्वरप्रागणमूर्ति अक्षरप्रजापति की व्याप्ति देखी जासकती है, जिस के अनुबन्ध से ही सङ्गीतानुगत - नादात्मक - श्र त्यनुगत स्वरों को भी सात ही विवर्त्तभावों में परिणत हो जाना पड़ता है । नाद-वैश्वानर अग्नि ही तो है । नाट ही तो श्रुति के द्वारा ' स्वर ' रूप से अभिव्यक्त हुआ है । वैश्वानर चित्यग्नि उसी सप्तमूर्ति पुरुषप्रजापति के छन्दोरूष आयतन से सप्तचिरूप में परिशित होकर ही प्राणियों की शारीरिक--संस्था का अधिनायक बना हुआ है, जैसा कि - ' सप्तचितिकोऽग्निः ' इत्यादि से स्पष्ट है । सप्तचितिक नादा-त्मक इस वैश्वानरप्राणाग्नि के अनुबन्ध से ही तो तत्र प्रतिष्ठत भूत भी १- रस, २ असृक्, ३ - माँस, ४ - मेद, ५ - अस्थि, ६ - मज्जा, ७ - शुक्र ( सप्तधातवः ), इन सात ही अवयवों में विभक्त होकर चित है । इस सप्त अग्नि-चिति ( प्राणाग्निचिति ), मतभूतत्रिति ( धातुचिति ) के अतिरिक्त सप्त- उपधातु, सप्त रस, सप्त उपरस, सप्त विष, सप्त उपविष, आदिरूपेण शरीर में अन्यान्य भी अनेकविध सप्तचितियाँ हैं । और यों मूलस्वरा-त्मक प्राणात्मक - सप्तपुरुषप्रजापति की सप्तावयवता ही इन यच्चयावत् आध्यात्मिक आधिभौतिक - आधिदैविक-सप्तमहिमाभावों का मूल वर्त्तक बना हुआ है । नादानुगत श्र त्यात्मक स्वर क्यों और कैसे सप्तभावों में परिणत होगया? इस प्रासङ्गिक प्रश्न का यही संक्षिप्त समाधान है, जिस के आधार निम्नलिखित श्रुतिवचन हुए है— १ - " सप्त ते अग्ने! समिधः । प्राणा नै समिधः । प्राणा ह्येतं - अग्निं ( भूतानि ) समिन्धते | सप्त जिह्वा इति । यान् - अमून सप्तपुरुषान् एकं पुरुषमकुर्वन्, तेपामेतदाह । सप्तऋषय इति । सप्त हि तॠषय आसन् । सप्त धाम प्रियाणि इति । छन्दांस्येतदाह । छन्दांसि वा अस्य ( अग्ने ) सप्त प्रियाणि धामानि । सप्त होत्राः सप्तधा त्वा यजन्ति, इति । सप्त ते होत्रा सप्तधा यजन्ति । सप्त योनिरिति । चितिरेतदाह । सप्त सप्त इति सप्तचितिकोऽग्निः । सप्तर्त्तवः सम्बत्सरः । सम्वत्सरोऽग्निः । यावानग्निः यावत्यत्य मात्रा, तावता - एवैनमेतत् प्रीणाति ” । - शतः ब्राह्मण ६ २ ३ ४४ ४५, २ -- “ सप्तर्च ं भवति । सप्तचितिकोऽग्निः । सप्तर्त्तवः । सप्त दिशः । सप्त देवलोकाः । सप्त स्तोमाः । सप्त पृष्ठानि । सप्त छन्दामि । सप्त ग्राम्याः पशवः । तत - श्रारण्याः पशवः । सप्त शीर्षन् प्राणाः । यत् किञ्च सप्तविधं - अधिदेवतं, अध्यात्मं ( अधिभूतंच ), तदेनेन सर्वमाप्नोति " । -शत ० ६५ | २८ | उक्त सप्तक - विवेचन से स्पष्ट है कि, सर्वाङ्गशरीर में व्याप्त सप्तावयव - सप्तचितिक- नादमूर्त्ति वैश्वा-नराग्निप्राण ह्रीं श्रुति के द्वारा सप्त - स्वररूप में परिशित हो रहा है, जिस का सहज निष्कर्ष यही है कि, मानव १२४६

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चतुथ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड का सप्तचितिक प्राणाग्नि ह्रीं ( नाव ही ) मरुतनामक वायुके द्वारा ( श्रुति के द्वारा ) उर - कण्ठ - शिरः-इन तीन स्थानों से प्रत्याहत होता हुआ स्वरात्मिका ध्वनि के रूप में परिणत होता हुया बहिर्मण्डल के माध्यम से तत्र व्याप्त सूक्ष्म वाममुद्र में बीपि से तरङ्गावित बनकर श्रोताओं की कष्कुलियों में प्रतिष्ठित अज्ञानपन पर आघात करता हुआ ' कर्णमधु ' चनता रहता है और यों हृदयोपलक्षित उर: स्थान में उक्थरूप मे पुञ्जीभूत नादाग्नि ही श्रुति के द्वारा ' स्वर ' रूप में परिणत होता हुआ वाहिर निकला करता है । क्योंकि नाद-अति स्वर इन प्रक्रमों के माध्यम से प्राणाग्नि ही भूसाग्नि से समन्वित होता हुआ उक्त क्रम से बाहिर निकलता है, अतएव अधिक शब्द विनिर्गमन से मानव की शरीरसंस्था और प्राशसंस्था, दोनों दीं शिथिल होजाती हैं । नादात्मक - श्रुतिसमन्वित - स्वरभावान्न वितेनिषेवाग्नि से समन्वित इस चित्याग्नि की सुप्त, जायत, भेद से शास्त्र ने दो अवस्था मानी हैं । रात्रि में सुषुप्तिदशा में सो जाने पर ) चित्याग्नि अन्तर्मुख बन जाता है । यही चित्याग्नि की सुप्तावस्था है सूर्योदय के साथ ही ( आधिदैविक अग्नि को अभिव्यक्तिरूप जागरगा के साथ ही ) मानव का शारीरिक अग्नि भी- ' अग्निर्जागार ' रूप से उद्बुद्ध होपड़ता है । सौर ग्रह: -कालपन्त ( शयन से पूर्व पूर्व यो अग्नि जागरूक ही बना रहता है यही इसकी ' जावस्था ' है । सौरसत्तात्मक अहःकाल सूर्योदय से सूर्यास्त पर्यन्त गायत्री - त्रिष्टुप् जगती - नामक तीन छन्दों के अनुपात से प्रातः मध्याह्न सायं - भेद से तीन सवनी में विभक्त है, जिन प्रातः सवनादि तीनों सपनों का पूर्व में दिग्दर्शन कराया जा चुका है । प्रातः ६ से सायं ६ पय्यन्त ४-४-४- होरा ( घन्टा ) के अनुपात से ( सामा-न्यमानानुसार तीन विभाग कर लीजिए इन तीनों में मोरपार्थिव सायेव गायत्र अग्नियों की समस्थिता वस्थारूप अग्नि अपनी अहः कालीना जाग्रदवस्था से क्रमशः मन्द्र - मध्य - तार - नाम की तीन अवस्थाओं में परिया रहता है । ६ से १० काप्रात: का जीन गायत्र छन्दस्क शादग्नि ही ' शतः सवनीय ' ' मन्द्रा-ग्नि ' है । ११ से २ पर्य्यन्त का मध्याह्नकालीन - त्रिष्टुप् छन्दस्क जाग्रदग्नि हीं ' माध्यन्दिनसवनीय'-' मध्याग्नि ' है एवं ३ से ६ पन्त का सायंकालीन जगती - लुन्टर जाग्रदग्नि ही सायंसवनीय ' ' तारा ग्नि ' है ' सामान्य उच्च- अभ्युच्च ' ही मन्द्र मध्य - तार मात्र है और इसी प्राकृतिक स्थिति के तारतभ्या-नुपात से मानव का अहः फालीन जमदग्नि भी प्रातः मध्याइ- सायं रूपेण मन्द्र- मध्य तार - रूपेण तीन हीं अ स्थाओं में परिणत रहता है । मानवशरीर में प्रकृति के प्रातः- मध्याह्न सायं - नामक तीन सवनों के प्रतिरूपात्मक स्थान क्रमशः उ: -कण्ठ - शिर हैं । अतएव शब्दानुगत स्वर रहस्यवेत्ताओंने स्वरात्मक शब्दोचारण के सम्बन्ध में यही व्यवस्था की है कि, प्रातः सवनीय - गायत्र - प्रातः काल में मानव को उर: स्थान से मन्द्र स्वर से ही शब्दोच्चारण करना चाहिए, जैसे कि शार्दूल ( सिंहजातिविशेष ) उरःस्थान से ही बोला करता है । माध्यन्दिन सवनीय-त्रैष्टम- मध्याह्नकाल में मानव को कण्ठस्थान से ही बोलना चाहिए, · जैसे कि चक्रयाकादि कण्ठस्थान से ही बोला करते हैं । एवं सायंसनीय - जागत - सायंकाल में मानव को शिरःस्थान से ही तारस्वर से बोलना चाहिए, जैसे कि मयूर इंसादि शिरस्थान से ही बोला करते हैं । ऐसा क्यों? का उत्तर है- ' प्रकृतिवद विकृतिः कर्त्तव्या ' - ' देवाननुविधा वै मनुष्याः ' इत्यादि निगम । प्रकृति में नादस्वरात्मक - प्राकृतिक-का यही क्रम है वैसा ही यहाँ होना चाहिए । १२४७

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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीवाह्मगा शतपथब्राह्मग रात्रि में सुप्त अग्नि को यदि प्रातःकाल में जागरण के साथ ही बलपूर्वक तारात्मक - उच्च संघर्ष का अनुगामी बना दिया जाता है, तो इस अप्राकृतिक साहस से विविध रोग, विशेषतः ' उरः क्षत ' होजाता है । रक्त निकलने लग सकता है इस अप्राकृतिक संघ से । अतः आरम्भ में मन्द्र- पुनः थोड़ा उच्च, पुनः उच्च, इस क्रमिक अनुपात से ही शब्दोच्चारण प्रक्रान्त होना चाहिए । त्रिसवनी के अति-रिक्त भी मानव जब भी कुछ बोलना चाहे, उसे इसी स्थानत्रयी के अनुपात से मन्दस्वर से ही शब्दो-प्रक्रम करना चाहिए | तभी अग्नि नादस्थिरता के कारण उत्तरोत्तर - सशक्त प्रभावपूर्ण श्रुतिमधुर एवं स्वरमधुर बन सकता है । प्रारम्भ में हीं तारस्वरात्मक - चीत्कार पद्धति से बोलने लग पड़ने वाला आविष्ट मानव न तो अधिक समय पर्यन्त इस शब्दोच्चारणधारा को ही व्यवस्थापूर्वक प्रक्रान्त रख सकता, न ऐसे उत्तेजक उच्चारण में श्रुति स्वर - माधुर्य्य ही अभिव्यक्त होपाता । न केवल शब्दोच्चारण में हीं, अपितु कर्मप्रवृत्ति में भी इसी नियम का अनुगमन श्रेयः पन्था माना गया है । क्योंकि शब्द और अर्थ, दोनों अभिन्न है । अतएव दोनों समान ही नियमधाराओं से समन्वित रहते हैं । इसी आधार पर - ' अल्पारम्भाः क्षेमकराः ' कहा गया है । ग्रावेशपूर्वक श्रारम्भ में हीं प्रचण्ड-वे से किसी कर्म में संलग्न होपड़ने वाले उत्तेजित मानवों के लक्ष्य निष्कल ही प्रमाणित होजाते हैं । ' शनैः कन्या, शनैः पन्थाः शनैः पर्वतलङ्घनन् ' प्रसिद्ध ही है । इसी आधार पर तो यह लोकसूत्र व्यवस्थित हुआ है कि “ एक भाबुक कार्य का आरम्भ करना जहाँ भलीभाँति जानता है, वहाँ वह भावुक कार्य समाप्त करना नहीं जानता एवं नैष्ठिक मानव जहाँ आरम्भ करना नहीं जानता, वहाँ कार्य को समाप्त करना वह अवश्य ही जानता है " । उपक्रम में नादात्मक स्वर, मध्य में श्रुत्यात्मक स्वर एवं अन्त में स्वरात्मक स्वर, यही क्रम शब्दोच्चारण में प्रशस्त माना गया है, जिन इन तोनों का ही वैदिक नाम है— ' हिकार - प्रस्ताव - उद्गीथ ' । उरःस्थानानुगत - नादात्मक ( गुञ्जायमान ) मन्द्रस्वरात्मक शब्द, किंवा ध्वनि ही ' हिङ्कार ' है । उदाहरण सिंह का ध्वन्यात्मक शब्द है । सिंह और शार्दूल सदा उरःस्थान से ही बोलते हैं, अतएब इनका उर, और तत्संलग्न उदर प्रदेश शब्दध्वनिकाल में संकुचित होजाता है, सिकुड़ जाता है । कण्ठस्थानानुगत - श्रुत्या -त्मक [ त्रिना गूँज का -सामान्य ] - मध्यस्वरात्मक शब्द, किंवा ध्वनि ही ' प्रस्ताव ' है । उदाहरण चक्रवाक की कण्ठानुगता ध्वनि है । एवं शिरःस्थानानुगत स्वरात्मक [ बिना गूँज का उच्च ] - नार स्वरात्मक शब्द, किंवा ध्वनि ही उद्गीथ है, जिसे सङ्गीत की लोकभाषा में ' टीप ' कहा गया है | उदाहरगा मयूर की शिरोऽनुगता ध्वनि है, जिसकी प्रक्रान्ति में मयूर का शिरोभाग ही ऊर्ध्व बन कर अवनत होता रहता है । त्रिः प्रक्रमात्मक नाद - श्रुति - स्वर्भावात्मक - गायत्र चैट भ- जागत- भावानुबन्धी इसी स्वरत्रयी का नियमन करते हुए शब्द-शास्त्र के आचार्योंनें कहा है-प्रातः पठेन्नित्यमुरस्थितेन स्वरेण शार्दूलरुतोपमेन || मध्यन्दिने कण्ठगतेन चैव चक्राह्वसंकूजितसन्निभेन ॥१ ॥

ता तु विद्यात् सवनं तृतीयं शिरोगतं तच्च सदा प्रयोज्यम् ॥ मयूर हंसान्यभृतस्वराणां तुल्पेन नादेन शिरः स्थितेन ॥ २ ॥

- पाणिनीयशिक्षा ३६,३७, । १२४८