शिव स्वरोदय - हिन्दी भाष्य सहित — पृष्ठ 31–40
शिव स्वरोदय - हिन्दी भाष्य सहित · Khemraj Shri Krishna Das · पृष्ठ 31–40
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( ) भाषाटीकासमेत । २१ स्वर और सायंकालको सूर्यका स्वर चलै तो उस दिन जय और लाभ कहाहै और विपरीत चलें तो वजेदे अर्थात् अनिष्ट फल होताहै ॥ ८६ ॥
वामेवादक्षिणेवापियत्रसंक्रमतेशिवः ॥ कृत्वातत्पादमादौचयात्राभवतिसिद्धिदा ॥८७॥
अर्थ-यात्राके समय वाम वा ददिण जो स्वर चलताहो उसी चरणको प्रथम आगे रखकर यात्रा करे तो वह यात्रा सिद्धिकी दाता होतीहै ॥ ८७ ॥
चंद्रःसमपदःकार्योरविस्तु विषमःसदा ॥ पूर्णपादं पुरस्कृत्ययात्राभवतिसिद्धिदा ॥ ८८ ॥
अर्थ-चंद्रमाका स्वर चलता होय तो सम पद२-४ ६-आदि आगे रखने और सूर्यका स्वर चलता होय तो विषम पद १-३-५-आदि आगे रखने इस प्रकार पूर्ण पाद आगे रखनेसे यात्रा सिद्धिको दाता होतीहै ८८ यत्रांगेवहतेवायुस्तदंगकरसत्तलात् सुप्तोत्थितोमुखंस्पृष्ट्वालभते वांछितं फलम्॥८ ९ ॥ अर्थ -जिस अंगका स्वर चलताहो उसी अंगके हाथके तलसे शयनसे उठ कर मनुष्य मुखका स्पर्श करे तो वांछित फलको प्राप्त होताहै ॥ ८९ ॥
परदत्तेतथाग्राह्येगृहान्निर्गमनेऽपिच ॥ यदंगे वहतेनाडीग्राह्यंतेनकरांत्रिणा ॥ ९ ० ॥
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( ) २२ शिवस्वरोदय । अर्थ-दूसरेको दान देने वा ग्रहण करनेमें वा घरसे बाहर जानेमें जिस अंगकी नाडी चलतीहो उसी हाथ वापरको आगे करके वस्तुको ग्रहण करे तो ॥ ९ ० ॥ नहानिःकलहोनैवकंटकैर्नापिभिद्यते ॥ निवर्त्तते सुखाचैवसर्वोपद्रववर्जितः ॥ ९ १ ॥ अर्थ-न हानिहो कलह हो और न कंटक ( शत्रु ) से विधै और वह सर्वदा सुखी रहै और सब उपद्रवसे वर्जित रहैगा ॥ ९ १ ॥ गुरुबंधुनृपामात्येष्वन्येषुशुभदायिनी ॥ पूर्णांगेखलुकर्त्तव्य( कार्यसिद्धिर्मनःस्थित।॥९ २॥ अर्थ-गुरु-बंधु - राजा मंत्री आदिसे शुभ देनेवाली कार्य की सिद्धि करनी होय तो पूर्ण हाथसे अर्थात हाथमें कोई फल आदिलेकर करनी वह सिद्धि मनवां छित फलको देतीहै ॥ ९ २ ॥ अग्नि चोराधर्मधर्मां अन्येषांवादिनिग्रहः ॥ कर्त्तव्याःखलु रिक्तायां जयलाभसुखार्थिभिः ९ ३ अर्थ-अभिका दाह-चोर -अधर्म कार्य और बादिका निग्रह ( बैंड ) करना होय तो रिक्त ( खाली ) हाथसे ही जय लाभ सुखके अभिलाषी मनुष्य कार्य सिद्धिको करै ॥ ९ ३ ॥ दूरदेशे विधातव्यं गमनंतु हिमद्युतौ ॥
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( ) भाषाटीकासमेत । २३
अभ्यर्णदेशदीप्ते तुतरणावितिकेचन ॥ ९ ४ ॥
अर्थ-कोई ऐसे कहतेहैं कि दूर देशमें जाना होय तो चंद्रमाके स्वरमें और समीपके देशमें जाय तो सूर्यके स्वरमें गमन करै ॥ ९ ४ ॥ यत्किचित्पूर्वमुद्दिष्टंलाभादिसमरागमः ॥ तत्सर्वपूर्णनाडीषुजायते निर्विकल्पकम् ॥ ९ ५ ॥ अर्थ-जो कुछ लाभ आदि प्रथम कहाहै वह सब युद्धके समय तभी निःसंदेह होताहै जब नाडी पूरे २ स्वरसे चलतीहो ॥ ९ ५ ॥ शून्यनाड्याविपर्यस्तं यत्पूर्वप्रतिपादितम् ॥ जायतेनान्यथाचैव यथासर्वज्ञभाषितम् ॥ ९ ६ ॥ अर्थ-और शून्य नाडी चलती होय तो वह पूर्वोक्त फल शिवजीके कथनानुसार अन्यथा( उलटा)होताहै९ ६ व्यवहारेखलोच्चाटेद्वेषिविद्यादिवचके ॥ कुपितस्वामिचोराद्ये पूर्णस्थाःस्युर्भयंकराः ॥९ ७ अर्थ -व्यवहार-दुष्ट- मनुष्यका उच्चाटन -वैरी- विद्या आदिसे ढगना-स्वामीका कोप और चौर आदि क्रूर कामोंमें पूर्ण स्वर भयके कर्ता होतेहैं अर्थात् अच्छे नहीं. दूराध्वनिशुभ चंद्रोनिर्विघ्नोभीष्टसिद्धिदः ॥ प्रवेशकार्यहेतोचसूर्यनाडीप्रशस्यते ॥ ९८ ॥
अर्थ -जो मनुष्य दूर मार्गमें जाया चाहे उसको चंद्र
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( ) | २४ शिवस्वरोदय माका स्वर शुभहै और निर्विघ्न वांछितकी सिद्धि करताहै और प्रवेशके कार्यमें सूर्यकी नाडी श्रेष्ठ होतीहै॥ ९ ८ ॥ अयोग्येयोग्यतानाड्यायोग्यस्थानेऽप्ययोग्यता ॥ कार्यानुबंधन जीवोयथारुद्रस्तथाचरेत् ॥ ९९ ॥
अर्थ - अयोग्य कार्यमें नाडीकी योग्यता और योग्य
कार्यमें अयोग्यताको कार्यका अनुबंधी जीव प्राप्त होताहै।
इससे जैसा स्वरहो तैसाही आचरण मनुष्य करै ॥ ९९ ॥
चन्द्रचारेविषहते सूर्यो बलिवशंनयेत् ॥
सुषुम्नायांभवेन्मोक्षएकोदेवस्त्रिधास्थितः ॥ १०० ॥
अर्थ-चंद्रमाका स्वर चलै तो किसीके किये अप- राधकोभी मनुष्य सह लेताहै -और सूर्यका स्वर चलै तो बलवान्भी वशमें हो सकताहै और सुषुम्ना नाडीका स्वर होय तो मोक्ष होताहै इस प्रकार एक देव ( स्वर ) तीन प्रकारसे स्थितहै ॥ १०० ॥
शुभान्यशुभकार्याणिक्रियते हर्निशंयदा ॥ तदाकार्यानुरोधेनकार्यनाडीप्रचालनम् ॥१०१ ॥
अर्थ-जिस समय रात दिन शुभ और अशुभ किये जांय- तब कार्यके अनुसार नाडीको चलावे ॥ १०१ ॥
अथ इडा ।
स्थिरकर्मण्यलंकारेदूराध्वगमनेतथा ॥
आश्रमेधर्मप्रासादे वस्तूनांसंग्रहे पिच ॥ २ ॥
अर्थ-स्थिरकार्य -भूषण -दूर मार्गमें गमन-आश्रम-
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( ) भाषाटीकासमेत । २५ धर्म -प्रासाद ( मंदिर ) और घरकी वस्तुओंके संग्रह ( संचय ) करने में और ॥ १०२ ॥
वापीकूपतडागादिप्रतिष्ठास्तंभदेवयोः ॥ यात्रादानेविवाहेचवस्त्रालंकारभूषणे ॥ १०३ ॥
अर्थ-बावडी -कूप-तलाव-औरदेव-स्तंभ इनकी प्रतिष्ठा -और यात्रा -दान -विवाह -वस्त्र -अलंकार-भूषण इनमें ॥ १०३ ॥
शांतिके पौष्टिकेचैव दिव्यौषधिरसायने ॥ स्वस्वामिदर्शनेमित्रेवाणिज्येकणसंग्रहे ॥ १०४॥
अर्थ-शांति और पुष्टिके कर्म -दिव्य औषधि -रसा-यन-अपने स्वामीके दर्शन - मित्र -और व्यापार और कण ( अन्न ) के संग्रहमें ॥ १०४ ॥
गृहप्रवेशेसेवायांकृपौ चवीजवापने ॥ शुभकर्मणिसंधौचनिर्गमेचशुभःशशी ॥ १०५ ॥
अर्थ -और गृहप्रवेश -सेवा-खेती - बीजका बोना-शुभ कर्म -और संधि ( मेल ) और गमन इनमें चंद्रमा-का स्वर ( इडा ) शुभ होताहै ॥ १०५ ॥
विद्यारम्भादिकार्येषुबांधवानांचदर्शने ॥ जन्ममोक्षेचधर्मे चदीक्षायांमंत्रसाधने ॥ १०६ ॥
अर्थ -और विद्यारंभ आदि कार्योंमें और बांधवोंके २
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( ) २६ शिवस्वरोदय । दर्शनमें -जन्म और मोक्षमें धर्ममें और यज्ञ आदिकी दीक्षामें-और मंत्रकी सिद्धिमें ॥ १०६ ॥
कालविज्ञानसूत्रेतुचतुष्पादगृहागमे ॥ कालव्याधिचिकित्सायांस्वामिसंबोधनेतथा १०७ अर्थ-कालका ज्ञान व सूत्र और चतुष्पादों ( पशु ) के घरमें आगमनमें -कालकी व्याधिकी चिकित्सामें और स्वामीके संबोधन ( बुलावना ) में ॥ १०७ ॥
गजाश्वारोहणेधन्विगजाश्वानांचबंधने ॥ परोपकरणे चैवनिधीनांस्थापनेतथा ॥ १०८ ॥
अर्थ-हाथी व घोडेकी सवारी- धनुष्यका धारण- हाथी व घोडेका बांधना परका उपकार करना -और निधी ( खजाना ) का स्थापन करना ॥ १०८ ॥
गीतवाद्यादिनृत्यादौनृत्यशास्त्रविचारणे ॥ पुरग्रामनिवेशेचतिलकक्षेत्रधारणे ॥ १० ९ ॥ अर्थ-गीत वादित्र (बाजा ) नृत्य और नृत्य शास्त्रका विचार-पुर और ग्रामका प्रवेश और तिलक और खेतका धारण इनमेंभी चंद्र नाडी ( इडा ) शुभ होतीहै ॥ १० ९ ॥ आर्तिशोकविषादेचज्वरिते मृच्छितेपिवा ॥ स्वजनस्वामिसंबंधे अन्नादेर्दारुसंग्रहे ॥ ११० ॥
अर्थ-रोग-शोक-विवाद ( उदासी ) ज्वर पीडा- मूर्च्छा-अपने जन और स्वामीके संबंधमें और अन्न
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( ) भाषाटीकासमेत । २७
और काठके संग्रही चंद्र नाडी श्रेष्ठहै ॥ ११० ॥
स्त्रीणांदतादिभूषायांवृष्टेरागमने तथा ॥
गुरुपूजाविषादीनांचालनेचवरानने ॥ १११ ॥
अर्थ-स्त्रियोंको दंत आदिका भूषण- वृष्टिका आग- मन गुरुकी पूजा और विष आदिका चालन ( बाहिर- निकासना ) में हे पार्वति चंद्र नाडी श्रेष्ठहै ॥ १११ ॥
इडायांसिद्धिदं प्रोक्तंयोगाभ्यासादिकर्मच ॥ तत्रापिवर्जयेद्वायुंतेजआकाशमेवच ॥ ११२ ॥
अर्थ-इडा नाडीमें योगाभ्यास आदि कर्म सिद्धिका aar कहाहै तथापि इडा नाडीमें जब वायु और आकाश तत्व वहते हों तब इडाकोभी वर्ज दे ॥ ११२ ॥
सर्वकार्याणिसिद्धयंति दिवारात्रिगतान्यपि ॥ सर्वेषु शुभकार्येषु चंद्रचारः प्रशस्यते ॥ ११३ ॥
• अर्थ-दिन और रात्रिके सब काम इडानाडीमें सिद्ध होतेहैं और संपूर्ण शुभ कार्योंमें चंद्रमाका चार ( इडा ) उत्तम होता है ॥ ११३ ॥
अथ पिंगला ।
कठिनक्रूरविद्यानांपठनपाठनेतथा ॥
स्त्रीसंगवेश्यागमनेमहानौकाधिरोहणे ॥ ११४ ॥
अर्थ-कठिन और क्रूर ( मारण आदि ) विद्याओंके पठने व पढानेमें स्त्रीका संग और वेश्याके गमनमें और महानौका ( जहाज ) के चढनेमें ॥ ११४ ॥
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( ) २८ शिवस्वरोदय । भ्रष्टकार्येसुरापानेवीरमंत्राद्युपासने || विह्वलो- द्धंसदेशादौविषदानेचवैरिणाम् ॥ ११५ ॥
अर्थ- ष्टकार्य -मदिराकापान -वीरमंत्र आदिकी उपा सना-विह्वलहोना-देशका विध्वंस और वैरियोंको विष देना-इनमें और ॥ ११५ ॥
शास्त्राभ्यासेचगमनेमृगयापशुविक्रये ॥ इष्टिकाकाष्ठपाषाणरत्नघर्षणदारणे ॥ ११६ ॥
अर्थ-शास्त्रका अभ्यास -गमन -मृगया पशुओंका बेचना- ईंट काठ -पत्थर रत्न इनका घिसना और तोडना इनमें सूर्यनाडी ( पिंगला ) श्रेष्ठ है ॥ ११६ ॥
गत्यभ्यासेयंत्रतंत्रेदुर्गपर्वतरोहणे ॥ द्यूते चौयँगजाश्वादिरथसाधनवाहने ॥ ११७ ॥
अर्थ-गमनका अभ्यास- यंत्र -तंत्र किला और पर्वत- पर चढना- द्यूत ( जुआ ) और चोरीकरना- हाथी घोडा रथ-इनको साधना व चलाना- इनमें ॥ ११७ ॥
व्यायामे मारणोच्चाटेपटुर्मादिकसाधने ॥ यक्षिणीयक्षवेतालविषभूतादिनिग्रहे ॥ ११८ ॥
अर्थ-व्यायाम ( कसरत ) मारण-उच्चाटन-षट्क- मोंको सिद्धकरनाऔर यक्षिणी यक्ष बेताल-विष भूत आदिका निग्रह ( रोकना ) इनमें ॥ ११८ ॥
खरोष्ट्रमहिषादीनांगजाश्वारोहणेतथा ॥ नदीजलौचतरणेभेषजेलिपिलेखने ॥ ११ ९ ॥
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( ) भाषाटीकासमेत । २९ अर्थ-गधाऊंट भैसा हाथी घोडा इनपर चढना और नदी जल वेगसे पार उतरना औषध करना और लीपना व लिखना-इनमें ॥ ११ ९ ॥ मारणेमोहनेस्तंभविद्वेषोच्चाटनेवशे ॥ प्रेरणे कर्षणेक्षोभेदानेचक्रयविक्रये ॥ १२० ॥
अर्थ-मारना-मोहना स्तंभ ( रोक ) करना विद्वेष ( वैर ) करना उच्चाटन और वशमें करना प्रेरण और खेती करना क्षोभ दान और लेन देनमें ॥ १२० ॥
प्रेताकर्षणविद्वेषशत्रनिग्रहणेपिच ॥ खड्ड- हस्तेवैरियुद्धे भोगवा राजदर्शने || भोज्येस्ना- नेव्यवहारेदीतकार्येरविःशुभः ॥ १२१ ॥
अर्थ-प्रेतका आकर्षण ( बुलाना ) शत्रुका निग्रह दंड खड्ग ( तलवार ) को हाथमें लेना वैरीके संग युद्ध भोग वा राजा दर्शनमें भोजन व स्नान और व्यवहार-दीप्त (प्रकाशित कार्य) इनमें सूर्यनाडी ( पिंगला) शुभकहीहै ॥ भुक्तमार्गेणमंदाग्नोस्त्रीणांवश्यादिकर्मणि ॥ शयनंसूर्यवाहनकर्तव्यं सर्वदाबुधैः ॥ १२२ ॥
अर्थ-भोजनके द्वारा मंदाग्निकरनेमें और स्त्रियोंको वशमें करना सोना ये सब काम पंडितजन सूर्य स्वरके चलते समयमें करे ॥ १२२ ॥
क्रूराणिसर्वकर्माणिचराणिविविधानिच ॥ तानिसिद्धयंतिसूर्येणनात्रकार्याविचारणा १२३॥
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( ) | ३० शिवस्वरोदय अर्थ- संपूर्णक्रूरकर्म और अनेक प्रकारके चरकर्म वे सब सूर्य की नाडी ( पिंगला ) में सिद्ध होतेहैं इसमें कोई विचार नहीं करना ॥ १२३ ॥
अथ सुषुम्ना ।
क्षणंवामेक्षणंदक्षेयदावहतिमारुतः ॥
सुषुम्नासाचविज्ञेयासर्वकार्यहरास्मृता ॥ १२४ ॥
अर्थ-जो पवन क्षणभर वामभाग और क्षणभर दक्षिण भागमें चलै वह नाडी सुषुम्ना जाननी और सुषुम्ना सब कार्योंको हारनेवाली कहीहै ॥ १२४ ॥
तस्यांनाढ्यांस्थितोवह्निर्ज्वलतेकालरूपकः ॥ विषवत्तंविजानीयात्सर्वकार्यविनाशनम् ॥ १२५ ॥
अर्थ-उस नाडीमें टिकी हुयी अभि काल रूप जलती है उस अग्निको विष वाली और सब कार्योंका नाशक जानना ॥ १२५ ॥
यदानुक्रममुल्लंघ्ययस्यनाडीद्वयंवहेत् ॥ तदातस्यविजानीयादशुभंनात्रसंशयः ॥ १२६ ॥
अर्थ-जब अपने २ स्वाभाविक क्रमका अवलं- घन करके जिस पुरुषकी दोनों नाडी चलै तब उस पुरुषका अशुभ जानना इसमें संदेह नहींहै ॥ १२६ ॥
क्षणवामेक्षणंदक्षेविषमंभावमादिशेत् ॥ विपरीतं फलंज्ञेयंज्ञातव्यंचवरानने ॥ १२७ ॥
अर्थ-क्षणभर वाम भाग और क्षणभर दक्षिण