शिव स्वरोदय - हिन्दी भाष्य सहित — पृष्ठ 41–50
शिव स्वरोदय - हिन्दी भाष्य सहित · Khemraj Shri Krishna Das · पृष्ठ 41–50
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( ) भाषाटीकासमेत । ३१ भागमें पवन चले तो उसको विषम कहै और हे पार्वति •उसका विपरीत फल जानना ॥ १२७ ॥
उभयोरेवसंचारंविषवंतंविदुर्बुधाः ॥ नकुर्यात्क्रूरसौम्यानितत्सवैविफलं भवेत्॥ १२८॥
अर्थ-दोनों नाडियोंके संचारको विषवान् ऐसा पंडित जन कहतेहैं उसमें क्रूर और सौम्य कर्म न करे यदि करे तो वे सब निष्फल होतेहैं ॥ १२८ ॥
जीवितेमरणेप्रश्नेलाभालाभेजयाजये ॥ विषमेविपरीतेचसंस्मरेज्जगदीश्वरम् ॥ १२ ९ ॥ अर्थ -जीने -मरण-प्रश्न -लाभ -अलाभ-जय- पराजय -विषम -और विपरीत स्वरके चलनेमें जगदी- श्वरका स्मरण करै ॥ १२९ ॥
ईश्वरेचिंतितकार्ययोगाभ्यासादिकर्मच ॥ अन्यत्तत्रनकर्तव्यंजयलाभसुखैषिभिः ॥१३० ॥
अर्थ-ईश्वरका चिंतन करके उस समय योगा- भ्यास आदि कर्म ही करना-और जय लाभ सुखके अभिलाषी उस समय और कोई काम न करें॥ १३० ॥
सूर्येणवहमानायांसुषुम्नायांमुहुर्मुहुः ॥ शापंदद्याद्वरंदद्यात्सर्वथैवतदन्यथा ॥ १३१ ॥
अर्थ-जब सूर्यकी नाडी सुषुम्ना वारंवार वहै तो उस समय जो शाप अथवा वर दे वह सब अन्यथा ( विपरीत ) होताहै ॥ १३१ ॥
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( ) ३२ शिवस्वरोदय ।
नाडी संक्रमणेकालेतत्त्वसंगमनेपिच ॥
शुभंकिंचिन्नकर्त्तव्यंपुण्यदानानिकोटिया १३२ ॥
अर्थ-नाडीके संचलन ( मेल ) के और तत्वोंके संचलनमें कोई शुभ कर्म न करना और पुण्य दान आदि कर्मभी न करने ॥ १३२ ॥
विषमस्योदयोयत्रमनसाऽपिनचिंतयेत् ॥ यात्राहानिकरीतस्यमृत्युःक्लेशोनसंशयः ॥ ३३॥
अर्थ-जिस समय विषम स्वरका उदयहो तब मनसे भी किसी कार्यकी चिंता न करे जो उस मनुष्य की यात्रा हानिकी करनेवाली होतीहैं और मृत्यु अथवा क्लेश होताहै इसमें संदेह नहींहै ॥ १३३ ॥
पुरोवामोर्ध्वतश्चंद्रोदक्षाधः पृष्ठतोरविः ॥ पूर्णरिक्तविवेकोयंज्ञातव्योदेशिकैःसदा ॥ १३४ ॥
अर्थ-जब प्रथम वाम स्वर और पीछे चंद्र स्वरो और फिर दक्षिण स्वरके पीछे सूर्य स्वरका उदयहो ये दोनों क्रम पूर्ण और रिक्त ( खाली ) सदैव पंडितों-ने जानने ॥ १३४ ॥
ऊर्ध्ववामाग्रतोदूतोज्ञेयोवामपथिस्थितः ॥ पृष्ठेदक्षेतथाऽधस्तात्सूर्यवाहागतःशुभः॥ १३५ ॥
अर्थ-वाम स्वरसे पीछे वा पहिले यदि आताहुआ दूत वाम भागमें स्थितहो और दक्षिण स्वरके पीछे वा पहिले आताहुआ दूत दक्षिण भागमें स्थित होय तो शुभ होताहै ॥ १३५ ॥
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( ) भाषाटीकासमेत । ३३
अनादिर्विषमःसंधिर्निराहारोनिराकुलः ॥
परेसूक्ष्मे विलीयेत सासंध्यासद्भिरुच्यते ॥ १३६ ॥
अर्थ-अनादि जो विषम संधि ( सुषुम्ना ) निराहार और निराकुल होकर पर सूक्ष्म ब्रह्ममें लीन हो जाय अर्थात्एक रस चलती हुयी जिस सुषुम्नासे ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाय उस सुषुम्नाको सज्जन संध्या कहते हैं १ ३६ नवेदवेदइत्याहुर्वेदोवेदोनविद्यते ॥ परात्मविद्यते येनसवेदोवेदउच्यते ॥ १३७ ॥
अर्थ -पंडित जन वेदको वेद नहीं कहते और वेद वेदहैं भी नहीं - किंतु परात्मा जिससे जाना जाय वहीं ज्ञानियोंने वेद कहाहै ॥ १३७ ॥
नसंध्यासंधिरित्याहुःसंध्यासंधिर्निगद्यते ॥ विषमः संधिगःप्राणःससंधिस्संधिरुच्यते॥१३८॥
अर्थ-संध्याको संधि पंडित जन नहीं कहते और न संध्याको संधि कह सकतेहैं किंतु जब विषम संधिमें प्राणहो वही संधि कहतीहै ॥ १३८ ॥
इति नाडीभेदः ।
श्रीदेव्युवाच ॥ देवदेवमहादेवसर्व संसारतारक ॥
स्थितं त्वदीयहृदयेरहस्यंवदमेप्रभो ॥ १३ ९ ॥
अर्थ-पार्वती बोली कि हे देवों के देव! हे महादेव! हे सब संसारके तारक! जो रहस्य ( गुप्त ) आपके हृद-यमें स्थितहै हे प्रभो! वह मुझे कहो ॥ १३ ९ ॥
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( ) ३४ शिवस्वरोदय । ईश्वरउवाच ॥ स्वरज्ञानरहस्यात्तुनकाचिचेष्ट- देवता || स्वरज्ञानरतोयोगीसयोगीपरमोमतः ॥ अर्थ-महादेव बोले कि-स्वरज्ञानके रहस्यसे परे कोई इष्ट देवता नहींहै-जो योगी स्वरके ज्ञानमें रहतेहैं वही योगी परम मानाहै ॥ १४० ॥
पंचतत्त्वाद्भवेत्सृष्टिस्तत्त्वेतत्त्वंप्रलीयते ॥ पंचतत्त्वं परंतत्त्वंतत्त्वातीतंनिरंजनम् ॥ १४१ ॥
अर्थ-पांच तत्वोंसे सृष्टि होतीहै और तत्वमें ही तत्व लीन होताहै-पांच तत्वही परम तत्वहै और निरंजन ( ब्रह्म ) तत्वोंसे अतीत ( परे ) हैं ॥ १४१ ॥
तत्त्वानांनामविज्ञेयंसिद्धियोगेनयोगिनाम् ॥ भूतानांदुष्टचिह्नानिजानातीहस्वरोत्तमः॥१४२ ॥
अर्थ -योगीजन सिद्धिके योगसे तत्वोंका नाम जाने जो मनुष्य स्वरोंको ही उत्तम समझताहै वह सबप्राणि-योंके दुष्ट चिन्होंको जानसकताहै ॥१४२ ॥
पृथिव्यापस्तथातेजोवायुराकाशमेवच ॥ पंचभूतात्मकं विश्वंयोजानातिसपूजितः ॥१४३ ॥
अर्थ-जो मनुष्य पृथिवी-जल-तेज-वायु और आकाश इन पंचभूतात्मक विश्वको जानता है वही पूजित होता है ॥ १४३ ॥
सर्वलोकस्थजीवानांनदेहोभिन्नतत्त्वकः ॥ भूलोकात्सत्यपर्यंतनाडीभेदःपृथक्पृथक् १४४
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( ) भाषाटीकासमेत । ३५ अर्थ-भूलोकसे सत्यलोकपर्यंत सबलोकमें स्थित जितने जीवहैं उनका देह भिन्न २ तत्वरूप नहींहै परंतु नाडीका भेद पृथक् २ है ॥ १४४ ॥
वामेवादक्षिणेवाऽपिउदयाःपंचकीर्तिताः ॥ अष्टधातत्त्वविज्ञानंशृणुवक्ष्यामिसुंदरि ॥ १४५॥
अर्थ-वामभाग वा दक्षिण भागमें पांच उदय कहे हैं । हे सुंदरि उन तत्वोंको विज्ञान आठ प्रकारका मैं कहताहूं तू सुन ॥ १४५ ॥
प्रथमेतत्त्वसंख्यानं द्वितीयेश्व। ससंधयः ॥ तृतीयेस्वरचिह्नानिचतुर्थेस्थानमेवच ॥ १४६ ॥
अर्थ-प्रथम तत्वोंका संख्यान ( गिनती ) दूसरा भेद श्वासकी संधी-तीसरा भेद स्वरोंका चिन्ह चौथा भेद स्वरोंका स्थान ॥ १४६ ॥
पंचमेतस्यवर्णाश्चषष्टेतुप्राणएवच ॥ सप्तमे स्वादसंयुक्ता अष्टमेगतिलक्षणम् ॥ १४७ ॥
अर्थ-पांचवा भेद तत्वोंका रंग-छठे भेदमें प्राण-सात- वेंमें स्वादका संयोग- आठवेभेदमें गतिके लक्षण- ॥ १४७ एवमष्टविधंप्राणंविषुवंतंचराचरम् ॥ स्वरात्परतरंदेविनान्यथात्वंबुजेक्षणे ॥ १४८ ॥
अर्थ-इस प्रकार चराचरमें व्यापक आठ प्रकारका प्राण होता है - हेदेवि स्वरसे परे अन्यथा ( इतर ) ज्ञान नहीं है ॥ १४८ ॥
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( ) ३६ शिवस्वरोदय ।
निरीक्षितव्यंयत्नेनसदाप्रत्यूषकालतः ॥
कालस्यवचनार्थायकर्मकुर्वतियोगिनः ॥१४९ ॥
अर्थ-प्रातःकालसे लेकर सदैव स्वरको देखना-क्योंकि योगिजन कालक्षेपके लिये कर्मों को करतेहैं परन्तु उनको स्वर और तत्वकी पहिचान रहतीहै ॥ १४ ९ ॥ श्रुत्योरंगुष्टकौमध्यांगुल्यौनासापुटद्वये ॥ वदनप्रांतके चान्यांगुलीर्दद्याच्चनेत्रयोः ॥ १५० ॥
अर्थ-कानोंमें दोनों अंगूठे और दोनों नासिकाके पुटोंमें मध्यकी दोनों अंगुली मुखके प्रान्तभाग ( दोनों- होठोंका मेल ) में और नेत्रोंमें शेष अंगुली अर्थात् नेत्रोंमें तर्जनी और अनामिका और कनिष्ठा मुखप्रांतमें लगावे ॥ १५० ॥
अस्यांतस्तु पृथिव्यादितत्त्वज्ञानंभवेत्क्रमात् ॥ पीतश्वेतारुणश्यामैर्बिदुभिर्निरुपाधिकम् ॥१५१ अर्थ-इसके बीचमें पृथिवी आदि तत्वोंका ज्ञान क्रमसे पीत-श्वेत अरुण ( लाल ) और श्याम बिंदुओंसे उपाधिरहित ( स्पष्ट ) होताहै अर्थात् पृथिवीका पीत- वर्ण जलका श्वेत तेजका लाल वायुका श्याम और आकाशका चित्र वर्ण होताहै ॥ १५१ ॥
दर्पणेनसमालोक्य तत्रश्वासंविनिक्षिपेत् ॥ आकारैस्तुविजानीयात्तत्त्वभेदंविचक्षणः ॥ १५२
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( ) भाषाटीकासमेत । ३७ अर्थ-दर्पणमें मुखको देखकर श्वासको छोड़े और आकारोंको देखकर तत्वके भेदको पंडित जन जाने १५२ चतुरस्त्रंचार्धचंद्वंत्रिकोणंवर्त्तृस्मृतम् ॥ बिंदुभिस्तुनभोज्ञेयमाकारैस्तत्त्वलक्षणम्॥ १५३ - ( )- - अर्थ चतुरस्र चोकोर अर्द्धचंद्राकार त्रिकोण( त्रिकोणा ) वर्तुल ( गोला ) बिंदुओंका आकार नेत्रोंको आगे दीखै तो आकाशतत्वका लक्षण जानना ॥ १५३ ॥
मध्ये पृथ्वीह्यधश्चापश्चोर्ध्ववहतिचानलः ॥ तिर्यग्वायुप्रवाहश्च नभोवहतिसंक्रमे ॥ १५४ ॥
अर्थ- मध्यमें पृथिवी और नीचे जल और ऊपर अग्नि और तिरछा वायुका प्रवाह होताहै और दोस्व- का संक्रम चलता होय तो आकाश तत्वका चलना जानना ॥ १५४ ॥
आपःश्वेताःक्षितिः पीतारक्तवर्णोहुताशनः ॥ मारुतोनीलजीमूतआकाशः सर्ववर्णकः ॥ १५५ ॥
अर्थ-जलोंका श्वेतवर्ण-पृथिवीका पीत- अशिका रक्त-और पवन -नीलमेघवर्ण-और आकाश सब वर्ण-रूप होताहै ॥ १५५ ॥
अब स्थानपरत्वसे तत्त्वज्ञान ।
स्कंधद्वयेस्थितोवह्निर्नाभिमूलेप्रभंजनः ॥
जानुदेशेक्षितिस्तोयं पादांतमस्तकेनभः १५६ ॥
अर्थ-दोनों कंधोंपर अभि-नाभिके मूलमें पवन-
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( ) | ३८ शिवस्वरोदय जानु (गोडे) देशमें पृथिवी -पाद( चरण)के अंतमें जल- और मस्तकमें आकाश तत्व स्थित रहताहै ॥ १५६ ॥
अब स्वादसेतत्वज्ञानप्रकार ।
माहेयंमधुरंस्वादेकषायंजलमेवच ॥
तीक्ष्णंतेजःसमीरोम्लआकाशंकटुकंतथा ॥ १५७
अर्थ -पृथिवीका स्वर मीठा-जलका स्वर खारा- तेजका स्वर तीखा-पवनका स्वर अम्ल -और आका- शका स्वर कटु ( कडवा ) होताहै ॥ १५७ ॥
अब गतीसे तत्त्वज्ञान । अष्टांगुलंवहेद्वायुरनलश्चतुरंगुलं ॥ द्वादशांगु- लिमाहेयं वारुणंपोडशांगुलम् ॥ १५८ ॥
अर्थ-वायुका स्वर आठ अंगुल-पवनका चार अंगुल- पृथिवीका स्वर बारह अंगुल -और जलका स्वर सोलह अंगुल चलताहै ॥ १५८ ॥
ऊर्ध्वमृत्युरधःशांतिस्तिर्यगुच्चाटनंतथा ॥ मध्येस्तंभंविजानीयान्नभःसर्वत्रमध्यमम्॥ १५ ९ ॥ अर्थ-ऊर्ध्व स्वर चलै तो मृत्यु -और नीचा स्वर चलै तो शांति-तिरछा चले तो उच्चाटन - मध्यका स्वर चले तो स्तंभ ( रोकना ) ये काम करै - और आकाश तत्व सब कार्यों में मध्यम जानना ॥ १५९ ॥
पृथिव्यांस्थिरकर्माणिचरकर्माणिवारुणे ॥ तेजसिक्रूरकर्माणिमारणोच्चाटनेऽनिले ॥ १६० ॥
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( ) भाषाटीकासमेत । ३ ९ अर्थ-पृथिवी तत्वमें स्थिर कार्य -और जलमें चर कार्य -और तेजमें क्रूर कार्य और मारुत ( पवन ) में मारण और उच्चाटन कर्म करनेसे सिद्ध होतेहैं ॥ १६० ॥
व्योम्निकिंचिन्नकर्त्तव्यमभ्यसेद्योगसेवनम् ॥ शून्यतासर्वकार्येषुनात्रकार्याविचारणा ॥ ६१ ॥
अर्थ-आकाशमें कुछ काम न करै किंतु योगके सेवनका अभ्यास करे और उसमें सब काम शून्य होतेहैं इसमें विचार न करना ॥ १६१ ॥
पृथ्वीजलाभ्यांसिद्धिःस्यान्मृत्युर्वन्हौक्षयोऽनिले नभसोनिष्फलंसर्वज्ञातव्यंतत्त्ववादिभिः॥ १६२॥
अर्थ -पृथिवी और जल तत्वसे सिद्धि वन्हि तत्वमें मृत्यु -और पवनमें क्षय ( नाश ) और आकाश तत्वमें सब काम निष्फल-तत्ववादियोंको जानने ॥ १६२ ॥
चिरलाभःक्षितेज्ञेयस्तत्क्षणेतोयतत्त्वत्तः ॥ हानिःस्याद्वह्निवाताभ्यां नभसोनिष्फलं भवेत् ॥ अर्थ-पृथ्वी तत्वसे अधिक लाभ हो, जल तत्वसे तत्क्षण लाभ हो, वायु और अग्नि तत्वसे हानि प्रकार, आकाश तत्वसे निष्फल जानना ॥ १६३ ॥
पीतः शनैर्मध्यवाहीहनुर्यावद्गुरुध्वनिः ॥ कवोष्णः पार्थिवोवायुःस्थिरकार्यप्रसाधकः १६४ अर्थ -पीत वर्ण-और शनैः २वा मध्यम चलनेवाला और हनु ( ठोडी ) पर्यंत जिसका शब्द गुरु ( भारी )
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( ) ४० शिवस्वरोदय । हो और जो किंचित् उष्णहो ऐसे पृथिवी संबंधि वायु ( स्वर ) को स्थित कार्योंका साधक कहतेहैं ॥ १६४ ॥
अधोवाहीगुरुध्वानःशीघ्रगःशीतलःस्थितः ॥ यः षोडशांगुलोवायुः सआपः शुभकर्मकृत् १६५ अर्थ-जो नीचेको वहै और जिसकी ध्वनी गुरुहो- जो शीघ्र चलै और जिसकी स्थिति शीतलहो और जो सोलह अंगुल हो स्वर जलका होताहै उसमें शुभ काम करने ॥ १६५ ॥
आवर्त्तगश्चात्युष्णश्वशोणाभश्चतुरंगुलः ॥ ऊर्ध्ववाहीचयःक्रूरः कर्मकारीसतैजसः ॥ १६६ ॥
अर्थ-जो आवर्त (i ) तक चले -अत्यंत उष्णहो और लालहो और चार अंगुल हो और ऊपरको चलै वह स्वर तेजका है उसमें क्रूर कर्म करने ॥ १६६ ॥
उष्णः शीतःकृष्णवर्णस्तिर्यग्गाम्यष्टकांगुलः ॥ वायुः पवनसंज्ञस्तुचरकर्मप्रसाधकः ॥ १६७ ॥
अर्थ-जो शीतोष्ण हो और कृष्णवर्ण हो और तिरछा चलै और आठ अंगुलका हो वह वायु ( स्वर ) पवनका है उसमें चर काम सिद्धि होतेहैं ॥ १६७ ॥
यः समीरः समरसः सर्वतत्त्वगुणावहः ॥ आंबरंतंविजानीयाद्योगिनांयोगदायकम्॥१६८॥
अर्थ-जो पवन (स्वर) एक रस -और सब तत्वोंके