शिव स्वरोदय - हिन्दी भाष्य सहित — पृष्ठ 51–60
शिव स्वरोदय - हिन्दी भाष्य सहित · Khemraj Shri Krishna Das · पृष्ठ 51–60
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( ) भाषाटीकासमेत । ४१ गुणोंको वह उस स्वरको आकाशका जाने और वही स्वर योगियोंको योगका दाता होताहै ॥ १६८ ॥
पीतवर्ण चतुष्कोणंमधुरं मध्यमाश्रितम् ॥ भोगदं पार्थिवंतत्त्वंप्रवाहेद्वादशांगुलम् ॥१६ ९ ॥ अर्थ-जिसका वर्ण पीतहो चौकोरहो और मधुरहो और मध्यमें वहै और जिसका बारह अंगुलका प्रवाह हो वह पृथिवी तत्व होताहै और भोगका दाता होताहै १६९ श्वेतमर्धे दुसंकाशं स्वादुकाषायमाकं ॥ लाभकुद्वारुणंतत्त्वंप्रवाहेषोडशांगुलम् ॥ १७० ॥
अर्थ-जिसका वर्ण श्वेतहो अर्धचंद्राकारहो स्वादु हो-कसेला आई ( गीला ) हो और सोलह अंगुलका जिसके प्रवाह का प्रमाणहो वह जलतत्व होताहै और लाभको देताहै ॥ १७० ॥
रक्तं त्रिकोणंतीक्ष्णंचऊर्ध्वभागप्रवाहकम् ॥ दीप्तंचतैजसंतत्त्वंप्रवाहेचतुरंगुलम् ॥ १७१ ॥
अर्थ-जिसका रंग रक्तहो और जो तिकोना हो और तीक्ष्ण हो और जिसका प्रवाह ऊपरको हो और जो प्रकाशमान हो और जिसका प्रमाण चार अंगुलका हो वह तत्व तेजसंबंधी जानना ॥ १७१ ॥
नीलंचवर्तुलाकारंस्वाद्वम्लंतिर्यगाश्रितम् ॥ चपलंमारुतंतत्त्वंप्रवाहेऽष्टांगुलंस्मृतम् ॥ १७२॥
अर्थ-जो नीला गोल स्वादमें खट्टाहो और तिरछा
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( ) | ४२ शिवस्वरोदय चलताहो और जो चपल हो और जिसका प्रवाह आठ अंगुलका हो वह तत्व पवनसंबंधी जानना ॥ १७२ ॥
वर्णाकारेस्वादवाहे अव्यक्तं सर्वगामिनाम् ॥ मोक्षदंनाभसंतत्त्वंसर्वकार्येषुनिष्कलम् ॥१७३॥
अर्थ-वर्ण आकार स्वाद प्रवाहमें जिसकी गति अव्यक्त हो अर्थात् जिसमें सबका हेल मेल पाया जाय वह आकाशसंबंधी तत्व जानना और सब कार्योंमें निष्फल होताहै ॥ १७३ ॥
पृथ्वीजलेशुभेतत्त्वेते जोमिश्रफलोदयम् ॥ हानिमृत्यु करौपुंसामशुभौव्योममारुतौ॥१७४॥
अर्थ-पृथ्वीतत्व और जलतत्व शुभ होतेहैं-और तेजके तत्वमें मिश्र ( मध्यम ) फल होताहै और आकाश और वायु तत्वमें हानि व मृत्यु आदि अशुभ फल होतेहैं ॥ १७४ ॥
आपूर्वपश्चिमेपृथ्वीतेजश्चदक्षिणेतथा ॥ वायुश्चोत्तरदिग्ज्ञेयोमध्येकोणगतंनभः ॥ १७५ ॥
अर्थ-पूर्वसे लेकर पश्चिम पर्यंत पृथ्वीतत्व और दक्षिणमें तेज तत्व और उत्तर दिशामें वायु तत्व और मध्यकी दिशामें आकाश तत्व जानना ॥ १७५ ॥
चंद्रेपृथ्वीजलेस्यातां सूर्येऽग्निर्वायदाभवेत् ॥ तदासिद्धिर्नसंदेहः सौम्यासौम्ये षुकर्मसु॥१७६॥
अर्थ-चंद्रमाके स्वरमें पृथ्वी और जल तत्व और
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( ) भाषाटीकासमेत । ४३ सूर्य स्वरमें अतित्व जिस समय हों उस समयमें अच्छे और बुरे कर्मोंकी सिद्धि होतीहैं इसमें संदेह नहींहै ॥ १७६ ॥
लाभःपृथ्वीकृतोऽन्हिस्यान्निशायांलाभकृज्जलम् वन्हौमृत्युःक्षयोवायुर्नभःस्थानं दहेत्कचित् १७७ अर्थ - दिनमें पृथ्वी तत्वसे और रात्रिमें जल तत्वसे लाभ होताहै और अग्नि तत्वसे मृत्यु और वायु तत्वसे नाश और आकाश तत्वसे दाहभी कभी २ होजाताहै ॥ जीवितव्येजयेला भेकृष्यांचधनकर्मणि ॥ मंत्रार्थेयुद्धप्रश्चगमनागमनेतथा ॥ १७८ ॥
अर्थ -जीवन- जय लाभ-कृषि-धनका कर्म-मंत्रका कार्य और युद्धका कर्म प्रश्न गमन और आगमन इनमें पृथ्वी तत्व श्रेष्ठ होताहै ॥ १७८ ॥
आयातिवरुणेतत्त्वेशत्रुरस्तिशुभंक्षितौ ॥ प्रयातिवायुतोऽन्यत्रहानिमृत्यूनभोनले ॥ १७९॥
अर्थ-यदि जलका तत्व होय तो शत्रुका आगमन समझना और पृथ्वी तत्वमें शुभ होताहै और वायु तत्व होय तो शत्रु अन्यस्थानमें चला जायगा और आकाश व अग्नि तत्व होय तो शत्रुकी हानि व मृत्यु होगी १७९ पृथिव्यां मूलचितास्याज्जीवस्यजलवातयोः ॥ तेजसाधातुचितास्याच्छून्यमाकाशतोवदेत् ॥ अर्थ-यदि किसके पूछनेके समय पृथ्वी तत्व होय
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( ) ४४ शिवस्वरोदय । तो मूल ( वृक्ष आदि ) की चिंता और जल व वायु तत्वमें जीवकी चिंता और तेजके तत्वमें धातुचिंता समझनी और आकाश तत्वमें शून्य कहै अर्थात् किसी चिंता न कहै ॥ १८० ॥
पृथिव्यांबहुपादाःस्युर्द्विपदस्तोयवायुतः ॥ तेजस्येवचतुष्पादोनभसापादवर्जितः ॥ १८१ ॥
अर्थ-पृथ्वी तत्व होय तो बहुतपादोंसे गमन होताहै अर्थात् बहुतोंके संग गमन करैगा और जल और वायु तत्व होय तो दोपादोंसे ( अकेला ) गमन कहै-और तेज तत्व होय तो चार पादोंसे ( दोमनुष्यसे ) गमन करेगा- और आकाशतत्व होय तो पादोंसे रहित कहै अर्थात कहींभी नजायगा ऐसे कहै ॥ १८१ ॥
कुजोवन्हीरविः पृथ्वीसौरिरापःप्रकीर्तितः ॥ वायुस्थानस्थितोराहुर्दक्षरं प्रवाहकः ॥ १८२ ॥
अर्थ-अमितत्त्वमें मंगल पृथ्वीतत्वमें सूर्य और जलतत्वमें शनैश्वर और वायुतत्वमें राहु तब जानना यदि दक्षिण स्वर चलताहो ॥ १८२ ॥
जलं चंद्रोबुधः पृथ्वीगुरुर्वातः सितोऽनलः ॥ वामनाड्यांस्थिताः सर्वेसर्वकार्येषुनिश्चिताः १८३ अर्थ-यदि वामस्वर वहता होय तो जलतत्वमें चंद्रमा पृथ्वीतत्वमें बुध पवनतत्वमें बृहस्पति -और
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( ) भाषाटीका समेत । ४५ अतित्वमें शुक्र जानना -ये संपूर्णग्रह सर्वकार्योंमें इन पूर्वोक्ततत्वोंमें निश्वयसे स्थित रहतेहैं ॥ १८३ ॥
पृथ्वीबुधोजलादिदुःशुक्रोवह्नीरविःकुजः ॥ वायूराहुशनीव्योमगुरुरेवप्रकीर्तितः ॥ १८४ ॥
अर्थ-पृथ्वीतत्वमें बुध-जलतत्वमें चंद्रमा और अग्नि तत्वमें-सूर्य-मंगल और वायु तत्वमें राहु और शनैश्वर-आकाशतत्वमें बृहस्पति कहाहै ॥ १८४ ॥
प्रवासप्रश्नआदित्येयदिराहुर्गतोऽनिले ॥ तदासौचलितोज्ञेयःस्थानांतरमपेक्षते ॥ १८५॥
अर्थ- यदि कोई मनुष्य परदेशमें गयेहुयेका प्रश्नकरै और उससमय सूर्यके स्वरमें राहु स्थित होयतो यह कहै कि वह परदेशी अन्यत्र जानेके लिये उसस्थानसे चलदिया ॥ १८५ ॥
आयातिवारुणेतत्त्वेतत्रैवास्तिशुभंक्षितौ ॥ प्रवासीपवनेऽन्यत्र मृत्युरेवानले भवेत् ॥ १८६ ॥
अर्थ -यदि प्रकरनेके समय जलतत्त्व वहता होय तो परदेशीके आगमनको कहै और पृथ्वीतत्वहोय तो परदेशी जहां गया हो वहांही सुखीहै ऐसे कहै-और वायुतत्व होयतो अन्यस्थानमें चलागया ऐसे कहै -और अग्नितत्व होय तो परदेशी मरगया ऐसे कहै ॥ १८६ ॥
पार्थिवे मूल विज्ञानंशुभंकार्यजलेतथा ॥ आग्नेयेधातु विज्ञानंव्योग्निशून्यंविनिर्दिशेत् १८७
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( ) ४६ शिवस्वरोदय । अर्थ-पृथ्वीतत्वमें मूल ( वृक्ष आदि ) का जानना-और जलतत्वमें शुभकार्य अग्नितत्वमें धातुओंका ज्ञान-और आकाशतत्वमें शून्यताको कहै अर्थात् किसीके ज्ञानको न कहै ॥ १८७ ॥
तुष्टिःपुष्टीरतिक्रीडाजयहर्षोधराजले ॥ तेजोवाय्वोश्वसुप्ताक्षोज्वरकंपःप्रवासिनः॥ १८८॥
अर्थ - यदि परदेशीके प्रश्नके समयमें पृथ्वी व जल- तत्व होय तो संतोष-पुष्टता प्रीति- रति- क्रीडा-जय और हर्ष ( आनन्द ) और यदि तेज व वायुतत्व होय तो सोना व ज्वरसे कंप परदेशीको कहाहै ॥ १८८ ॥
गतायुर्मृत्युराकाशे तत्त्वस्थानेप्रकीर्तिता ॥ द्वादशैताःप्रयत्नेनज्ञातव्यादैशिकैःसदा ॥ १८ ९ ॥ अर्थ -यदि आकाशतत्व होय तो अवस्थासे रहित परदेशीकी मृत्युको कहै -ये बारह प्रश्न तत्वोंके स्थानमें कहेहैं इनको पंडितजन बडे यत्नसे सदैव जानै ॥ १८ ९ ॥ पूर्वायांपश्चिमेयाम्ये उत्तरस्यांयथाक्रमम् ॥ पृथिव्यादीनिभूतानिवलिष्ठ। निविनिर्दिशेत् १ ९ ० अर्थ - पूर्व पश्चिम दक्षिण और उत्तर इन चारों दिशा ओमें क्रमसे पृथिवी-जल -तेज-और वायु ये चारों तत्त्व बलवान कहे हैं ॥ १ ९ ० ॥ पृथिव्यापस्तथातेजोवायुराकाशमेवच ॥ पंचभूतात्मकोदेहोज्ञातव्यश्ववरानने ॥१ ९ १ ॥
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( ) भाषाटीकासमेत । ४७ अर्थ -हे पार्वति पृथ्वी जल तेज वायु और आकाश इन पांचों भूतरूपही यह देह जानना अर्थात् इन पांच भूतोंसे ही पैदा होताहै ॥ १ ९ १ ॥ अस्थिमांसंत्वचानाडीरोमचैवतुपंचमम् ॥ पृथ्वीपंचगुणाप्रोक्ता ब्रह्मज्ञानेनभाषितम्॥ १ ९ २॥ अर्थ -और इस देहमें अस्थि ( हाड ) मांस त्वचा नाडी और पांचवां रोम ये पांच गुण पृथ्वीके हैं यह बात वेदांत शास्त्रके ज्ञाता ब्रह्मज्ञानी कहते हैं । १ ९ २ ॥ शुक्रशोणितमज्जाश्वमूत्रंलालांचपंचमम् ॥ आपः पंचगुणाप्रोक्ताब्रह्मज्ञानेनभाषितम्॥ १ ९ ३॥ अर्थ-ब्रह्मज्ञानी कहतेहैं कि वीर्य रुधिर मज्जा मूत्र और पांचवी लाला ये पांच गुण जलोंके कहेहैं १ ९ ३ ॥ क्षुधातृषातथानिद्राकांतिरालस्यमेवच ॥ तेजःपंचगुणंप्रोक्तंत्रज्ञानेनभाषितम् ॥ १ ९४॥ अर्थ-ब्रह्मज्ञानियोंका कथन है कि क्षुधा तृषा निद्रा कांति और आलस्य ये पांच गुण तेजके कहेंहैं ॥ १ ९ ४ ॥ धावनंचलनग्रंथःसंकोचनप्रसारणे ॥ वायोः पंचगुणाःप्रोक्ताब्रह्मज्ञानेनभाषितम् ॥ ९५॥
अर्थ-और वेदांती कहतेहैं कि दौडना चलना गांठ देना सकोडना व पसारणा ये पांच गुण वायुके कहे हैं ॥ रागद्वेषौतथालज्जाभयंमोहश्वपंचमः ॥ नभःपंचगुणंप्रोक्तंब्रह्मज्ञानेनभाषितम् ॥ १ ९ ६ ॥
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( ) ४८ शिवस्वरोदय । अर्थ -और वेदांत शास्त्रके जाननेवालोंका कथन है प्रीति-वैर -लज्जा -भय और पांचवा मोह ये पांच गुण आकाशके इस देहमें होतेहैं ॥ १ ९ ६ ॥ पृथ्व्याः पलानिपंचाशञ्चत्वारिंशत्तथभसः ॥ अत्रिशत्पुनर्वायोविंशतिर्नभसोदश ॥ १ ९ ७॥ अर्थ - इस देहमें पृथ्वी ५० पचास पल-जल ४० चालीस पल – अग्नि ३० तीस पल-और वायु २० वीस पल - और आकाश १ ० दंस पल - होतेहैं अर्थात् पृथ्वी आदि तत्वोंमें अगला २ तत्व क्रमसे दश १० पल कम होताहै ॥ १ ९७ ॥ पृथिव्यांचिरकालेनलाभश्चापःक्षणाद्भवेत् ॥ जायतेपवनेस्वल्पःसिद्धोप्यनौविनश्यति १ ९ ८॥ अर्थ-पृथ्वी तत्व होय तो चिरकाल ( बहुदिनों ) में लाभ-और जल तत्व होय तो उसी क्षणमें और पवन तत्व होय तो थोडा लाभ होताहै और अग्नि तत्व होय तो सिद्ध हुआभी कार्य नष्ट होजाताहै ॥ १ ९ ८ ॥ पृथ्व्याःपंचह्यपांवेदा गुणास्तेजोद्विवायुतः ॥ नभस्येकगुणश्चैवतत्त्वज्ञानमिदंभवेत् ॥ १ ९९ ॥ अर्थ-पृथ्वीके पांच गुण जलोंके चार गुण-तेजके तीन गुण वायुके दो गुण और आकाशका एक गुण जानना यही तत्वोंका ज्ञान होताहै ॥ १ ९९ ॥
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( ) भाषाटीकासमेत । ४ ९
फूत्कारकृत्प्रस्फुटिताविदीर्णापतिताधरा ॥
ददातिसर्वकार्येषु अवस्थासदृशंफलम् ॥ २०० ॥
अर्थ-फूत्कार करनेवाली- फूटी हुयी और फटी हुयी और वृथा पडी हुयी यह पृथ्वी सब कार्योंमें अपनी अवस्थाके समान फल देती है ॥ २०० ॥
धनिष्ठारोहिणीज्येष्ठानुराधाश्रवणंतथा ॥ अभिजिदुत्तराषाढापृथ्वीतत्त्वमुदाहृतम् ॥ १ ॥
अर्थ - धनिष्ठा-रोहिणी-ज्येष्ठा-अनुराधा-श्रवण-अभिजित और उत्तराषाढा ये सात नक्षत्र पृथ्वीतत्त कहे हैं ॥२०१ ॥
पूर्वाषाढातथाश्लेषामूलमार्द्राचरेवती ॥ उत्तराभाद्रपदातोयंतत्त्वंशतभिषक्प्रिये ॥ २०२॥
अर्थ-पूर्वाषाढा-आश्लेषा-मूल- आर्द्रा रेवती-उत्तरा- भाद्रपदा और शतभिषा-ये सात नक्षत्र जलतत्व कहेहैं॥ भरणीकृत्तिकापुष्योमघापूर्वाचफल्गुनी ॥ पूर्वाभाद्रपदास्वातीतेजस्तत्त्वमितिप्रिये २०३॥ अर्थ-भरणी-कृत्तिका-पुण्य -मघा-पूर्वाफाल्गुनी-पूर्वाभाद्रपदा और स्वाती ये सात नक्षत्र तेजतत्व २०३ विशाखोत्तरफल्गुन्यौहस्त चित्रेपुनर्वसु ॥ अश्विनीमृगशीपचवायुतत्त्वमुदाहृतम् ॥२०४॥
अर्थ-विशाखा-उत्तराफल्गुनी- हस्त चित्रा -पुनर्वसु- अश्विनी और मृगशिर ये सात नक्षत्र वायुतत्व कहेंहैं ॥ ३
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( ) | ५० शिवस्वरोदय वहन्नाडीस्थितोदूतोयत्पृच्छतिशुभाशुभम् ॥ तत्सर्वसिद्धिमाप्नोतिशून्येशून्यंनसंशयः॥ २०५॥
अर्थ-वहती हुयी नाडीकी तरफ पैठाहुआ जो दूत शुभ वा अशुभ पूछे वह सब सिद्ध होताहै और शून्यमें पूछे तो शून्य होताहै- इसमें संदेह नहीं है ॥ २०५ ॥
पूर्णोऽपिनिर्गमवासेसुतत्त्वेऽपिनसिद्धिदः ॥ सूर्यचंद्रोथवानृणांसंग्रहेसर्वसिद्धिदः ॥ २०६ ॥
अर्थ- पूर्णभी सूर्य तत्व अथवा चंद्र तत्व श्वासमें वहता होय तो सिद्धिका दाता नहीं होता यदि दोनों तत्वोंका संग्रह (मेल) होय तो संपूर्ण सिद्धियोंको देताहै. तत्त्वेरामोजयंप्राप्तःसुतत्त्वेचधनंजयः ॥ कौरवानिहताः सर्वेयुद्धेतत्त्वविपर्ययात् ॥२०७॥
अर्थ-श्रेष्ठ तत्वमें ही रामचंद्र की जय हुयी और श्रेष्ठ तत्वमें ही अर्जुन की -और तत्वोंके विपरीत होनेसे संपूर्ण कौरव युद्धमें मारे गये ॥ २०७ ॥
जन्मांतरीयसंस्कारात्प्रसादादथवागुरोः ॥ केषांचिज्जायतेतत्त्ववासनाविमलात्मनाम् २०८ अर्थ-जन्मांतरके संस्कारसे अथवा गुरुके प्रसादसे किनही निर्मल आत्माओंको तत्वोंकी वासना ( ज्ञान ) होती है ॥ २०८ ॥
लंबीजं धरणीध्यायेच्चतुरस्रांसुपीतभाम् ॥ सुगंधंस्वर्णवर्णाभांप्राप्नुयाद्देहलाघवम् ॥ २० ९ ॥