शिव स्वरोदय - हिन्दी भाष्य सहित — पृष्ठ 61–70
शिव स्वरोदय - हिन्दी भाष्य सहित · Khemraj Shri Krishna Das · पृष्ठ 61–70
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( ) भाषाटीकासमेत । ५१ अर्थ- ( लं ) यह बीज पृथ्वी तत्वमें चतुरस्र ( चकोर ) सुवर्ण के समान प्रकाशमान पीतवर्ण -सुगंध ध्यान करना -और ध्यानका करनेवाला कांति व देहके लाघवको प्राप्त होताहै ॥ २० ९ ॥ वंबीजं वारुणं ध्यायेत्तत्त्वमर्द्धशशिप्रभम् ॥ क्षुत्तृष्णादिसहिष्णुत्वंजलमध्येचमज्जनम् २१० ॥ अर्थ- ( वं ) यह बीज जलतत्वमें ध्यान करने योग्य है - और अर्द्धचंद्रके समान इसका आकार है-इसके ध्यान करने वाले को क्षुधा और तृषाकी बाधा नहीं होती और जलमें डूबनेकी सामर्थ्य होती है अर्थात् डूबनेसे दुःख नहीं होता ॥ २१० ॥
बीजम निजं ध्यायेत्रिकोणमरुणप्रभम् ॥ बह्वन्नपानभोक्तृत्वमातपानिसहिष्णुता ॥ २११ ॥
अर्थ- ( रं ) यह बीज अग्नि तत्वमें तिकोना-रक्त वर्ण- ध्यान करने योग्यहै इसके ध्यान करने वालेको बहुत अन्नपान भक्षण करनेकी सामर्थ्य होतीहै और धूप और अनिके वेगको सहसकताहै ॥ २११ ॥
यं बीजं पावनंध्यायेद्वर्तुलंश्यामलप्रभम् ॥ आकाशगमनाद्यंचपक्षिवद्गमनंतथा ॥ २१२ ॥
अर्थ- ( यं ) यह बीज पवन तत्वमें ध्यान करने योग्य है और वर्तुल ( गोल ) और श्यामरंगे होताहै- इसको ध्यान करनेवाला आकाशमें गमन और पक्षियोंके समान गमन कर सकता है ॥ २१२ ॥
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( ) ५२ शिवस्वरोदय ।
हंबीजं गगनंध्यायेन्निराकारंबहुप्रभम् ॥
ज्ञानंत्रिकालविषयमैश्वर्यमणिमादिकम्॥२१३ ॥
अर्थ- ( है ) यह बीज आकाश तत्वमें ध्यान करने योग्य है जो निराकार और अधिक कांतिवालाहै -इसके ध्यान करनेवालेको त्रिकाल ( भूत भविष्यत् वर्तमान ) का ज्ञान और अणिमा आदि आठ सिद्धि होतीहैं ॥ २१३ ॥
स्वरज्ञानीनरोयत्रधनंनास्तिततः परम् ॥ गम्यतेस्वरज्ञानेनानायासंफलंभवेत् ॥ २१४ ॥
अर्थ-जिस स्थानमें स्वरका ज्ञानी हो उससे परे और कोई धन नहींहै -जो मनुष्य स्वरके ज्ञानसे गमन करता है उसको अनायास ( विना परिश्रम ) से फल मिलता है ॥ २१४ ॥
श्रीदेव्युवाच ॥ देवदेवमहादेव महाज्ञानंस्वरो दयम्। त्रिकालविषयंचैवकथंभवतिशंकर २१५ अर्थ-पार्वती बोली-कि हे देवताओंके देव महादेव हे शंकर यह महान् ( बडा ) स्वरोदय का त्रिकाल ( भूत भविष्यत् वर्तमान ) विषयक ज्ञान किस प्रकार होताहै ॥ २१५ ॥
ईश्वरउवाच ।
अर्थकालजयप्रश्रशुभाशुभमितित्रिधा ॥
एतत्रिकालविज्ञानंनान्यद्भवतिसुंदरि ॥ २१६ ॥
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( ) भाषाटीकासमेत । ५३ अर्थ -महादेव बोले कि हे सुंदरी -अर्थ ( प्रयोजन वा धन ) भूत भविष्यत् वर्तमान तीनों कालोंका जय-प्रश्न- शुभ अशुभ (पराजय आदि)का जो तीनों कालोंमें ज्ञान है उसका कारण स्वरोदय है अन्य नहीं ॥ २१६ ॥
तत्त्वेशुभाशुभं कार्यंतत्त्वेजयपराजयौ ॥ तत्त्वे सुभिक्षदुर्भिक्षेतत्त्वंत्रिपदमुच्यते ॥ २१७ ॥
अर्थ-तत्वके ही आधीन शुभ अशुभ कार्य हैं और तत्वके आधीन जय और पराजय हैं-और तत्वोंके ही आधीन सुभिक्ष और दुर्भिक्ष हैं-इस प्रकार तत्वको ही त्रिपद ( तीनों कालोंके कार्योंका कर्ता) कहतेहैं॥ २१७ ॥
श्रीदेव्युवाच ॥ देवदेवमहादेवसर्वसंसारसागरे ॥ किनराणां परंमित्रंसर्वकार्यार्थसाधकम् ॥२१८॥
अर्थ-पार्वती बोली कि हे देवताओंके देव महादेव इस संपूर्ण संसार समुद्रमें मनुष्योंका परम मित्र और मनु- योंके सब कार्योंका साधक क्याहै सो कहो ॥ २१८ ॥
ईश्वरउवाच ॥ प्राणएव परंमित्रंप्राणएवपरःसखा ॥ प्राणतुल्यःपरोबंधुर्नास्तिनास्तिवरानने ॥ २१ ९ ॥ अर्थ-महादेव बोले कि हे सुंदरमुखी पार्वती प्राण ही परम मित्र है और सखा है प्राणके समान अन्य और बंधु नहीं है नहीं है ॥ २१ ९ ॥
श्रीदेव्युवाच ।
कथंप्राणस्थितोवायुर्देहःकिंप्राणरूपकः ॥
तत्त्वेषुसंचरन्प्राणोज्ञायते योगिभिःकथम् २२० ॥
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( ) ५४ शिवस्वरोदय । अर्थ-पार्वती बोली कि प्राणमें वायु किस प्रकार स्थित है और क्या देह प्राणरूप है और तत्वोंके विषय विचरते हुये प्राण को योगिजन किस प्रकार जान जाते हैं ॥ २२० ॥
श्रीशिवउवाच ।
कायानगरमध्यस्थोमारुतोरक्षपालकः ॥
प्रवेशे दशभिः प्रोक्तोनिर्गमेद्वादशांगुलः॥२२१ ॥
अर्थ-शिवजी बोले कि हे पार्वती इस कायारूपी नगरमें टिका हुआ प्राणवायु रक्षपाल ( चौकीदार ) है- और वह प्राण प्रवेशके समय दश अंगुल और निकसने के समय बारह अंगुलका कहाँहै ॥ २२१ ॥
गमनेतुचतुर्विशन्नेत्रवेदास्तुधावने ॥ मैथुनेपंच पष्टिश्चशयनेचशतांगुलम् ॥ २२२ ॥
अर्थ-और गमन के समय चौवीस २४ अंगुल- का -और धावन ( दौड़ना ) के समय बियालीस ४२ अंगुलका -और मैथुन के समय पैंसठ ६५ अंगुलका-और सोनेके समयमें सौ १०० अंगुलका कहाहै २२२ ॥ प्राणस्यतुगतिर्देविस्वभावाद्दादशांगुलम् ॥ भोजनेवमनेचैवगतिरष्टादशांगुलम् ॥ २२३ ॥
अर्थ-और हे देवी -प्राण की स्वाभाविक गति बारह १२ अंगुल है और भोजन और वमनके समय प्राणकी गति अठारह १८ अंगुल होजाती है ॥ २२३ ॥
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( ) भाषाटीकासमेत । ५५
एकांगुलंकृतेन्यूनेप्राणेनिष्कामतामता ॥
आनंदस्तुद्वितीयेस्यात्कविशक्तिस्तृतीयके २२४ अर्थ -यदि प्राणकी गति एक अंगुल कम योगी 'करले तो निष्कामता की प्राप्ति होती है और दो अंगुल कम करले तो आनंद की प्राप्ति और तीन अंगुल कम करनेसे कविताकी प्राप्ति होती है ॥ २२४ ॥
वाचासिद्धिश्चतुर्थेचदूरदृष्टिस्तु पंचमे ॥ षष्ठेत्वाकाशगमनंचंडवेगश्चसप्तमे ॥ २२५ ॥
अर्थ-चार अंगुल कम करले तो वाणी की सिद्धि- पांच अंगुल कम करले तो दूर दृष्टि-छ: अंगुल कम करले तो आकश गमनमें शक्ति और सात अंगुल कम करले तो प्रचंड वेग हो जाता है ॥ २२५ ॥
अष्टमेसिद्धयश्चैवनवमे निधयोनव ॥ दशमे दशमूर्तिश्वछायानैकादशे भवेत् ॥ २२६ ॥
अर्थ-आठ अंगुल कम करले तो अणिमा-आदि सिद्धियोंकी प्राप्ति -नौ अंगुल कम करनेसे नौ निधियों की प्राप्ति -और दश अंगुल कम करनेसे दशों मूर्तियों ( अनेक रूपों ) की प्राप्ति और ग्यारह अंगुल कम होनेसे देहकी छाया का अभाव-प्राप्त होताहै २२६ ॥ द्वादशेहंसचारश्वगंगामृतरसंपिवेत् ॥ आनखायंप्राणपूर्णेकस्यभक्ष्यंचभोजनम् २२७॥ अर्थ-बारह अंगुल प्राणकी गति कम हो जाय तो
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( ) ५६ शिवस्वरोदय । हंस गति गंगा जलके समान अमृत रस का पान प्राप्त होता है यदि शिखासे लेकर नख पर्यंत प्राणों को पूर्ण योगी करले तो भक्ष्य और भोजन किसको अर्थात भक्ष्य भोजन निवृत्ति हो जाती है ॥ २२७ ॥
एवंप्राणविधिःप्रोक्तः सर्वकार्यफलप्रदः ॥ जायतेगुरुवाक्येननविद्याशास्त्रकोटिभिः २२८॥ अर्थ -इस प्रकार संपूर्ण कार्यों के फल देने वाली प्राण की विधि कही हैं और जिसका ज्ञान गुरुके वाक्यसे होता है -विद्या और कोटि भी ग्रंथोंसे नहीं होता ॥ २२८ ॥
प्रातश्चंद्रोरविःसायंयदिदैवान्नलभ्यते ॥ मध्याह्नान्मध्यरात्राच्चपरतस्तुप्रवर्त्तते ॥ २२ ९ ॥ अर्थ-यदि प्रातःकाल चन्द्रस्वर और सायंकाल को सूर्य स्वर दैववश न मिलें तो मध्याह्न अथवा आधी रात्रिसे परे प्रवृत्त होतेहैं अर्थात् मिलते हैं २२ ९ दूरयुद्धजयी चंद्रः समासन्नेदिवाकरः ॥ वहनाढ्यागतः पादःसर्वसिद्धिप्रदायकः ॥ २३० ॥
अर्थ- यदि दूर देशमें युद्ध कर्तव्य होय तो चंद्र-माका स्वर जयकारी होताहै और समीपके युद्धमें सूर्यका स्वर जयकारी होताहै यदि वहती हुयी नाडी के समय गमन कालमें पैर रक्खा जाय तो सब सिद्धि-योंको देताहै ॥ २३० ॥
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( ) भाषाटीका समेत । ५७
यात्रारंभेविवाहेच प्रवेशेनगरादिके ॥
शुभकार्याणिसिध्यं तिचंद्रचारेषु सर्वदा ॥ २३१ ॥
अर्थ-यात्राके आरंभमें-विवाह गृह वा नगर प्रवेश आदि संपूर्ण शुभ कर्म चंद्रस्वरके चार में सदैव सिद्ध होते हैं ॥ २३१ ॥
अयनतिथिदिनेशैःस्वीयतत्त्वेचयुक्ते यदिवहतिकदाचिदैवयोगेनपुंसाम् ॥ सजयतिरिपुसैन्यंस्तंभमात्रस्वरेण प्रभवतिनचविघ्नंकेशवस्यापिलोके ॥ २३२ ॥
अर्थ - अयन -तिथि -वार इनके स्वामियोंसे युक्त पुरुषोंमें अपना स्वर वा तत्व दैवयोगसे वहै तो वह पुरुष शत्रुकी सेनाको स्वरके स्तंभ ( रोकना ) मात्रसे ही जीतता है -और वैकुंठ लोकमें भी उसको विघ्न नहीं होता ॥ २३२ ॥
जीवंरक्षजीवंरक्षजीवाङ्गे परिधायच ॥ जीवोजपतियोयुद्धेजीवञ्जयतिमेदिनीम्॥२३३॥
अर्थ -जीव ( अपने ) अंगपर वस्त्रोंको पहिरकर जो जीव ( जीवंरक्ष जीवंरक्ष ) युद्धमें ऐसे जपताहै वह पुरुष जीवताहुआ संपूर्ण पृथ्वीको जीतताहै ॥ २३३ ॥
भूमौजलेचकर्त्तव्यं गमनंशांतिकर्मसु ॥ वह्नौवायप्रदीप्तेपुखेपुनर्नोभयेष्वपि ॥ २३४ ॥
अर्थ-शांतिके कर्मोंमें पृथ्वी या जलतत्वमें गमन-
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( ) ५८ शिवस्वरोदय । करै -और प्रदीन ( उग्र ) कर्मोंमें अग्नि और वायुतत्वमें गमनकरे -और आकाशतत्वमें पूर्वोक्त दोनों प्रकारके कर्मों में गमन नकरै ॥ २३४ ॥
जीवेनशस्त्रंबीयाज्जीवेनैवविकाशयेत् ॥ जीवेनप्रक्षिपेच्छस्त्रंयुद्धे जयतिसर्वदा ॥ २३५ ॥
अर्थ-जीव स्वरमें शस्त्रको बांधे अर्थात् जिस तर- फका स्वरच उसीहाथसे शस्त्रको धारण करे और जीव- स्वरसेही शस्त्रको खोले —और जीवस्वरमेंही शस्त्रको जो फेंके वह मनुष्य युद्धमें सदैव जयको प्राप्तहोताहै २३५ आकृष्यप्राणपवनंसमारोहेतवाहनम् ॥ समुत्तरेपदं दद्यात्सर्वकार्याणिसाधयेत् ॥ २३६ ॥
अर्थ-जो मनुष्य प्राण वायुको खींच कर अश्व आदि सवारीपर चढे - और पवनके उतारपर घोड़े की रकावमें पैर रक्खे वह संपूर्ण कार्योंको सिद्ध करेगा ॥ २३६ ॥
अपूर्णशत्रुसामग्रीपूर्णवास्वबलंतथा ॥ कुरुते पूर्णतत्त्वस्थोजयत्ये कोवसुंधराम् ॥ २३७॥
अर्थ -पदि अपूर्ण स्वरमें शत्रुकी सामग्री-और संपूर्ण स्वरमें अपनी सामग्रीका बल होय तो पूर्ण तत्वमें इस प्रकार टिकाहुआ पुरुष अकेलाभी पृथ्वीको जीतताह ॥ २३७ ॥
यानाडीवहतेचांगेतस्यामेवाधिदेवता ॥ सन्मुखेऽपिदिशातेषां सर्व कार्यफलप्रदा ॥ २३८॥
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( ) भाषाटीकासमेत । ५ ९ अर्थ-अपने अंगमें जो नाडी ( स्वर ) वहती हो और उसी नाडीमें उस नाडीका देवता और उनकी दिशा सन्मुख होय तो सब कार्योंका फल देतीहै ॥ २३८ ॥
आदौतुक्रियते मुद्रापश्चाद्युद्धंसमाचरेत् ॥ सर्पमुद्राकृतायेनतस्यसिद्धिर्नसंशयः ॥ ३ ९ ॥ अर्थ- मनुष्य पहिले मुद्राको करै और पश्चात् युद्ध करै जो मनुष्य सर्प मुद्रा करताहै उसकी सिद्धि होतीहै
इसमें संशय नहींहै । २३ ९ ॥
चंद्रप्रवाहेप्यथसूर्यवाहेभटाःसमायांतिचयो छुकामाः ॥ समीरणस्तत्त्वविदांप्रतीतोया शून्यतासाप्रतिकार्यनाशम् ॥ २४० ॥
अर्थ-चंद्र स्वरके अथवा सूर्य स्वरके चलनेके समय यदि समीरण ( जल तत्त्व ) वहता हो और तत्वके ज्ञाताओंको वहताहुआ प्रतीत होजाय तो युद्ध करनेके लिये भट ( योद्धा ) भली प्रकार आवेंगे और यदि शून्यता हो अर्थात् वायुवा आकाश तत्त्व बहते होय तो कार्यका नाश होताहै ॥ २४० ॥
यदिशंवहते वायुर्युद्धं तद्दिशिदापयेत् ॥ जयत्येवनसंदेहःशक्रोऽपियदिचाग्रतः ॥ ४१ ॥
अर्थ-जिस दिशाका पवन तत्त्व चलता हो उसी दिशामें युद्धके लिये सेनाको भेजे तो चाहै आगे इंद्रभी होतो भी जय होगी इसमें संदेह नहींहै । २४१ ॥
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( ) ६० शिवस्वरोदय ।
यत्रनाड्यां वदेद्वायुस्तदंगेप्राणमेवच ॥
आकृष्यगच्छेत्कर्णीतंजयत्येवपुरंदरम् ॥ २४२॥
अर्थ-जिस नाडीका पवन तत्त्व वहता हो उसी नाडी के पवनको कर्ण पर्यंत आकर्षण ( खींच ) करके गमन करै तौ पुरंदर ( इंद्र ) कोभी जीतसकता है ॥ २४२ ॥
प्रतिपक्षप्रहारेभ्यःपूर्णांगंयोभिरक्षति ॥ नतस्यरिपुभिःशक्तिर्वलिष्ठैरपिहन्यते ॥ २४३ ॥
अर्थ-जो योद्धा प्रतिपक्ष ( शत्रु ) के प्रहारोंसे अपने संपूर्ण अंगोंकी रक्षा करताहै उस योद्धाकी शक्ति को बलवान् शत्रुभी नष्ट नहीं कर सकते ॥ २४३ ॥
अंगुष्ठतर्जनीवंशेपादांगुष्ठेतथाध्वनिः ॥ युद्धकालेचकर्त्तव्योलक्षयोद्धाजयी भवेत् २४४ ॥ अर्थ-अँगूठा और तर्जनी अंगुलि इनके वंशमें और चरणके अँगूठेमें युद्धके समय जो ध्वनि शब्द करे तो लक्ष योद्धाओंको जीतसकताहै ॥ २४४ ॥
निशाकरेरवौचारेमध्येयस्यसमीरणः ॥ स्थितोरक्षेद्दिगंतानिजयकांक्षीगतःसदा ॥ २४५ ॥
अर्थ-चंद्रमा वा सूर्यके प्रवाह में यदि वायु तत्व वहे तो उस समय गमन करनेवाला दिगंतों की रक्षा करताहै और सदैव जय को पाताहै ॥ २४५ ॥
श्वासप्रवेशकालेतुदूतोजल्पतिवांच्छितम् ॥ तस्यार्थःसिद्धिमायातिनिर्गमेनैव सुंदरि ॥ २४६ ॥