शिव स्वरोदय - हिन्दी भाष्य सहित — पृष्ठ 71–80
शिव स्वरोदय - हिन्दी भाष्य सहित · Khemraj Shri Krishna Das · पृष्ठ 71–80
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( ) भाषाटीकासमेत । ६१ अर्थ-जिस मनुष्यके श्वासके प्रवेश समयमें दूत अपने मुखसे वांछित बातको कहै तो हे सुंदरी गमन करते ही उस मनुष्यका अर्थ सिद्ध होताहै ॥ २४६ ॥
लाभादीन्यपिकार्याणिपृष्टानिकीर्तितानिच ॥ जीवेविशतिसिद्धयंतिहा निर्निःसरणेभवेत् ॥ २४७ अर्थ-पूछे और कहे हुये लाभ आदि संपूर्ण कार्य जीव नाडीके प्रवेश समयमें सिद्ध होतेहैं और निकस- नेके समयमें नष्ट होतेहैं ॥ २४७ ॥
नरेदक्षास्वकीयाचस्त्रियांवामाप्रशस्यते ॥ कुंभकोयुद्धकालेचतिस्रोनाट्यत्रयीगतिः २४८ ॥ अर्थ -पुरुषों की अपनी दक्षिण नाडी और स्त्रियों की वाम नाडी और युद्धके समयमें कुंभक नाडी श्रेष्ठ होती है -इस प्रकार तीन नाडींहैं और तीनही उनकी गतिर्हे ॥ २४८ ॥
हकारस्यसकारस्यविनाभेदस्वरःकथम् ॥ सोहंहंसपदेनैवजीवोजयतिसर्वदा ॥ २४ ९ ॥ अर्थ-हकार और सकारके भेद विना स्वरज्ञान कैसे हो सकता है इससे जीव सोहं और हंस इन दो प- दोंसे ही सर्वदा जय को प्राप्त होता है ॥ २४ ९ ॥ शून्यांगंपूरितंकृत्वाजीवांगेगोपयेज्जयम् ॥ जीवांगेघातमाप्नोतिशून्यांगंरक्षतेसदा ॥ २५० ॥
अर्थ -शून्य अंगको पूर्ण करके जीवांगकी रक्षा
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( ) ६२ शिवस्वरोदय । करनेसे जय प्राप्त होतीहै -क्योंकि जीवांगमें घात (नाश ) को प्राप्त होताहै और शून्यांग सदैव रक्षा करता है ॥ २५० ॥
वामेवायदिवादक्षेयदिपृच्छतिपृच्छकः ॥ पूर्णेवातोनजायेतशून्येघातंविनिर्दिशेत् ॥ २५१ ॥
अर्थ-यदि प्रश्नका कर्ता वाम वा दक्षिण की तरफ बैठाहुआ युद्धका प्रश्न करे और उस समय पूर्ण स्वर - होय तो नाश न होगा और शून्य होय तो होगा यह कहै ॥ २५१ ॥
भूतत्त्वेनोदरेघातःपदस्थानेनाभवेत् ॥ उरुस्थानेऽग्नितत्त्वेनकरस्थानेचवायुना ॥ २५२॥
अर्थ-प्रश्न के समय पृथ्वी तत्व होय तो उदरमें- जल तत्व होय तो पैरोंमें अग्नि तत्व होय तो जंघाओंमें और वायु तत्व होय तो हाथोंमें घात होगा अर्थात् शस्त्र लगेगा ॥ २५२ ॥
शिरसिव्योमतत्त्वेचज्ञातव्योघातनिर्णयः ॥ एवंपंचविधोघातःस्वरशास्त्रेप्रकाशिताः ॥२५३॥
अर्थ-यदि आकाश तत्व वहता होय तो शिरमें धावका निर्णय जानना इस प्रकार स्वर शास्त्रमें पांच प्रकारका घाव प्रकाशित कियाहै ॥ २५३ ॥
युद्धकालेयदाचंद्रःस्थायी जयति निश्चितम् ॥ यदासूर्यप्रवाहस्तुयायीविजयतेतदा ॥ २५४ ॥
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( ) भाषाटीकासमेत । ६३ अर्थ-जब युद्धके समयमें चंद्रमाका स्वर चलता हो तोस्थायी(जिसपर चढाई की जाय)की निश्चयसे जय होगी और जो सूर्य स्वरका प्रवाह होय तो याय ( चढनेवाले ) की जयहोय ॥ २५४ ॥
जयमध्येतु संदेहेनाडीमध्यंतुलक्षयेत् ॥ सुषुम्नायांगतेप्राणेसमरे शत्रु संकटम् ॥ २५५ ॥
अर्थ-जो जयके मध्यमें संदेह होय तो नाडीके मध्य को देखे यदि प्राणवायु सुषुम्ना नाडीमें चलता होय तो संग्राममें शत्रुको संकट हो ॥ २५५ ॥
यस्यानाड्या भवेच्चारस्तांदिशंयुधिसंश्रयेत् ॥ तदाऽसौजयमाप्नोति नात्रकार्या विचारणा २५६ अर्थ-जिस नाडीका चार ( चलना) होय युद्धके समयमें उसीदिशामें खडा होय अर्थात् चंद्र नाडीमें पूर्व अथवा उत्तरमें सूर्यनाडीमें दक्षिण अथवा पश्चिममें इस प्रकार वह युद्ध करनेवाला जयको प्राप्त होता है इसमें कुछ विचार नहीं करना ॥ २५६ ॥
यदिसंग्रामकालेतुवामनाडीयदावहेत् ॥ स्थायिनोविजयंविद्याद्विप्रवश्योदयोऽपिच २५७ अर्थ-यदि संग्रामके समय वामनाडी बहती होय तो स्थायीका विजय जाने और शत्रुके वसमें यायीका होना समझे ॥ २५७ ॥
यदिसंग्रामकालेतु सूर्यस्तुव्यावृतोवहेत् ॥ ॥
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( ) ६४ शिवस्वरोदय ।
तदायायिजयविद्यात्सदेवासुरमानवे ॥ २५८॥
अर्थ-जो संग्रामके समय सूर्यका स्वर लगा तार बहता होय तो उससमय देवता राक्षस मनुष्यके युद्धमें यायीके जयको जानना ॥ २५८ ॥
रणेहरतिशत्रुस्तं वामायांप्रविशेन्नरः ॥ स्थानंविषुवचारेणजयः सूर्येणधावता ॥ २५ ९ ॥ अर्थ-जो मनुष्य वामनाडीके प्रचारमें युद्धमें प्रवेश करताहै उसको संग्राममें शत्रु हरलेतेहैं और सुषुम्ना नाडीके बहते जो गमन करे उसको स्थान मिलताहै अर्थात युद्ध नहीं होता सूर्य स्वरके वहते गमन करे तो जयको प्राप्त होताहै ॥ २५९ ॥
युद्धद्वयेकृतेप्रश्नेपूर्णस्यप्रथमेजयः ॥ रिक्तेचैवद्वितीयस्तुजयीभवतिनान्यथा ॥ २६० ॥
अर्थ-यदि एक समय युद्ध विषयकप्रश्न दो होय तो उस समय पूर्ण स्वर वहता होय तो प्रथमका जय और रिक्तस्वर वहता होयतो दूसरेका जय अन्यथा नहीं २६० पूर्णनाडीगतःपृष्ठेशून्यांगंचतदाग्रतः ॥ शून्यस्थानेकृतः शत्रुम्रियतेनात्रसंशयः ॥२६१ ॥
अर्थ-यदि पूर्ण नाडीमें गया होय तो शत्रु पीठपर आवे अर्थात् शत्रु पीठ दे कर भाग जाय शून्य नाडीका अंग होय तो शत्रु आगे आवै और शून्य स्थानमें किया हुआ शत्रु मरणको प्राप्त होताहै इसमें संशय नहीं २६१
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( ) भाषाटीकासमेत । ६५
वामचारेसमंनामयस्यतस्यजयोभवेत् ॥
पृच्छकोदक्षिणे भागेविजयीविषमाक्षरः ॥२६२ ॥
अर्थ -यदि कोई वाम भागमें बैठ कर प्रश्न करै तौ उसके प्रश्नके वा जिस वातको पूछे उसके समाक्षर होय तो उसका जय और विषम अक्षरवालेका पराजय होताहै यदि - दक्षिण भागमें बैठ कर प्रश्न करे तो विषम अक्षरवालेका जय और सम अक्षरवालेका पराजय होय ॥ २६२ ॥
यदापृच्छतिचंद्रस्यतदासंधानमादिशेत् ॥ पृच्छेद्यदातु सूर्यस्यतदाजानीहिविग्रहम्॥ २६३॥
अर्थ-यदि पूछने के समयमें चंद्रमाका स्वर चलै तो संधि ( मिलाफ ) को कहै यदि सूर्यके स्वरमें प्रश्न करे तो उस समय विग्रह ( लडाई) को जाने ॥ २६३ ॥
पार्थिवेचसमंयुद्धसिद्धिर्भवतिवारुणे ॥ युद्धेहितेजसोभंगोमृत्युर्वायौनभस्यपि ॥ २६४॥
अर्थ -यदि पृथ्वी तत्वमें युद्धका आरंभ होय तो युद्धमें बराबरी जलके तत्वमें जयकी प्राप्ति तेजके तत्वमें भंग ( नाश ) वायु और आकाश तत्वमें मृत्यु होताहै ॥ २६४ ॥
निमित्तकप्रमादाद्वायदानज्ञायतेऽनिलः ॥ पृच्छाकालेतदाकुर्यादिदं यत्नेनबुद्धिमान् २६५॥ अर्थ-यदि किसी निमित्तसे अथवा प्रमादसे प्रश्नके
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( ) ६६ शिवस्वरोदय । समयमें दक्षिण या उत्तर स्वरका ज्ञान न होय तब बुद्धिमान मनुष्य यत्नसे यह करे कि ॥ २६५ ॥
निश्चलांधारणांकृत्वापुष्पंहस्तान्निपातयेत् ॥ पूर्णगेपुष्पपतनंशून्यवातत्परंभवेत् ॥ २६६॥
अर्थ - निश्चल धारणा करिके अपने हाथसे पुष्पको पृथ्वीपर गैरे-जो अपने अग्रभागमें पुष्प पडे तो पूर्ण फल और दूर पडे तो शून्य फल जानना ॥ २६६ ॥
तिष्ठन्नुपविशन्नापिप्राणमाकर्षयन्निजम् ॥ मनोभंगम कुर्वाणःसर्वकार्येषुजीवति ॥ २६७ ॥
अर्थ-जो मनुष्य खड़ा होता और बैठताहुआ अपनी प्राण वायुको निश्चल मनसे शरीरके भीतर आकर्षण ( खींचना ) करताहै वह सबकाकी जीवताहै अर्थात् उसके सब कार्य सिद्ध होतेहैं ॥ २६७ ॥
नकालोविविधंघोरंनशस्त्रंनचपन्नगाः ॥ नशत्रुव्याधिचोराद्याःशून्यस्थानाशितुंक्षमाः ॥ अर्थ-काल और अनेक प्रकारके भयानक शस्त्र, सर्प, शत्रु, व्याधि और चोर आदि शून्य स्थानमें टिकेहुये ये सब मनुष्यको नाश करनेको समर्थ नहीं होते २६८ जीवेनस्थापयेद्वायुं जीवेनारंभयेत्पुनः ॥ जीवेनक्रीडते नित्यंद्यूतेजयतिसर्वथा ॥ २६ ९ ॥ || अर्थ-जीव स्वरसे वायुको स्थिर करे फिर जीवसे ही वायुका आरंभ करे और जीवसे ही घृत क्रीडाका
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( ) भाषाटीकासमेत । ६७
आरंभ करे तो यूतमें सर्वथा जय होतीहै ॥ २६ ९ ॥
स्वरज्ञानिबलादग्रेनिष्फलंकोटिधाभवेत् ॥
इहलोके परत्रापिस्वरज्ञानीबलीसदा ॥ २७० ॥
अर्थ-स्वर ज्ञानीके बलके आगे कोटि प्रकारके भी बल निष्फल होतेहैं क्योंकि स्वरका ज्ञानी इस लोकमें और परलोकमें सदैव बलवान् होताहै ॥ २७० ॥
दशशतायु तंलक्षंदेशाधिपबलंक्वचित् ॥ शतक्रतुसुरेंद्राणां बलं कोटिगुणंभवेत् ॥२७१ ॥
अर्थ-किसी मनुष्यको दश, किसीको शत, किसीको दश सहस्र, किसीको लक्ष, किसीको देशके राज्यका बल होताहै-इन्द्र और ब्रह्मा आदि देवताओंको उनसे कोटिगुना बल होताहै इसी प्रकार स्वरका बल सब बलोंसे कोटिगुनाहै ॥ २७१ ॥
देव्युवाच॥ परस्परंमनुष्याणांयुद्धेप्रोक्तोजयस्त्व या ॥ यमयुद्धेसमुत्पन्नेमनुष्याणांकथंजयः ॥ अर्थ -पार्वती बोली कि मनुष्योंके परस्पर युद्धमें जयकी प्राप्ति आपने कही जब यमराजके संग युद्ध होय तब मनुष्यका किस प्रकार जय होवे ॥ २७२ ॥
ईश्वरउवाच ॥ ध्यायेदेवंस्थिरोजीवं जुहुयाज्जीवसं गमे ॥ इष्टसिद्धिर्भवेत्तस्यमहालाभोजयस्तथा ॥ अर्थ -महादेव बोले कि हे पार्वती जो मनुष्य स्थिर हो कर देवताओंका ध्यान करे और जीव संगम (कुम्भ-
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( ) ६८ शिवस्वरोदय । क ) प्राणवायुमें जीवका होम करे उस मनुष्यके इष्ट-की सिद्धि महालाभ और जय प्राप्त होगा ॥ २७३ ॥
निराकारात्समुत्पन्नंसाकारंसकलंजगत् ॥ तत्साकारंनिराकारंज्ञानभवतितत्क्षणात् २७४॥ अर्थ-निराकार परमेश्वरसे आकारवाला सब जगत् उत्पन्न हुआहै निराकार परमेश्वरके ज्ञानसे वह जगत् साकार ( आकारवाला ) उसी क्षणमें हो जाताहै २७४ श्रीदेव्युवाच ॥ नरयुद्धंयमयुद्धंत्वयाप्रोक्तंमहे- श्वर ॥ इदानींदेवदेवानांवशीकरणकंवद॥ २७५ ॥
अर्थ-पार्वती बोली कि हे महेश्वर मनुष्य और यमराज का युद्ध आपने वर्णन किया अब देवताओंके देवोंका वशमें करना कहो ॥ २७५ ॥
ईश्वरउवाच ॥ चंद्रसूर्येणचाकृव्यस्थापयेज्जीवमं- डले || आजन्मवशगारामाकथितेयंतपोधनैः ॥ अर्थ-महादेव बोले कि स्त्रीके चंद्र स्वरको अपने सूर्य स्वरसे आकर्षण करके अपने जीव स्वरको मंडलमें टिकावे तो स्त्री जन्मभर अपने वशमें होती है यह तपस्वियोंने कहाहै यह क्रिया अपनी विवाही स्त्रीमें ही हो सकतीहै || २७६ ॥ जीवेनगृह्यतेजीवोजीवोजीवस्यदीयते ॥ जीवस्थानेगतोजीवोबालाजीवांतकारकः २७७॥
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( ) भापाटीकासमेत । ६९ अर्थ-पुरुष अपने जीव स्वरसे स्त्रीके जीव स्वरको ग्रहण करे और स्त्रीके जीव स्वरमें अपना जीवस्वर दे इस प्रकार जीवके स्थानमें गयाहुआ जीव जिसका ऐसा पुरुष जन्मभरतक स्त्रीके वशमें रहताहै ॥ २७७ ॥
रात्र्यंतयामवेलायांप्रसुप्तेकामिनीजने ॥ ब्रह्मजीवपिवेद्यस्तुबालाप्राणहरोनरः ॥ २७८ ॥
अर्थ -रात्रिके पिछले पहर के समय जिस समय जो मनुष्य ब्रह्म जीव ( सुषुम्ना स्वर ) को पीताहै वह मनुष्य स्त्रियोंके प्राणोंको वसमें करताहै ॥ २७८ ॥
अष्टाक्षरंजपित्वाततस्मिन्कालेगतेसति ॥ तत्क्षणं दीयतेचंद्रोमोहमायातिकामिनी २७९ ॥ अर्थ-उस कालके व्यतीत होने पर अष्टाक्षरमंत्रको जपकर जो पुरुष अपना चंद्र स्वर स्त्रीको देताहै तो वह कामिनी उसी क्षण मोहको प्राप्त होतीहै ॥ २७९ ॥
शयनेवाप्रसंगेवायुवत्यालिंगनेऽपिवा ॥ यः सूर्येणपिवेचंद्रसभवेन्मकरध्वजः ॥ २८० ॥
अर्थ-शयनके समय वा स्त्रीके संगमें अथवा स्पर्शके समय जो मनुष्य अपने सूर्य स्वरसे स्त्रीके चंद्र स्वरको पीताहै वह मनुष्य कामदेवके समान मोह करनेवाला होताहै ॥ २८० ॥
शिवआलिंग्यते शक्त्याप्रसंगेदक्षिणेऽपिवा तत्क्षणाद्दापयेद्यस्तुमोहयेत्कामिनीशतम्२८१ ॥
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( ) ७० शिवस्वरोदय । अर्थ-यदि शिव स्वर ( सूर्य ) शक्ति स्वरसे( चंद्र ) स्त्री संगके समय मिल जाय अथवा पुरुष अपना चंद्रस्वर स्त्रीको वह पुरुष सौकामिनीयोंको मोह सकताहै २८१ ॥ सप्तनवत्रयः पंचवारांन्संगस्तु सूर्यभे ॥ चंद्रेद्वितर्यपटुकृत्वावश्याभवतिकामिनी॥ २८२॥
अर्थ-स्त्रीके चंद्र स्वरको अपने सूर्य स्वरमें देनेके अनंतर सात ७ नव ९ तीन ३ वा पांच ५ वार संगहो जाय अथवा स्त्रीके चंद्र स्वरमें अपना सूर्य स्वर कर दो२ चार ४ वाछः ६ बार मिल जाय तो वह कामिनी वश- में होतीहै ॥ २८२ ॥
सूर्यचंद्रौसमाकृष्यसर्पाक्रांत्याधरोष्ठयोः ॥ महापभेमुखंस्पृष्ट्वावारंवारमिदंचरेत् ॥ २८३ ॥
अर्थ - अपने सूर्य और चंद्र स्वरको सर्पकी गतिसे खींच कर अधरोष्ठों पर स्त्रीके मुखसे अपना मुख स्पर्श करके वारंवार पूर्वोक्त प्रकारसे चंद्र और सूर्यका मेल करे आप्राणमितिपद्मस्ययावन्निद्रावशंगता ॥ पश्चाज्जागर्तिवेलायांचोष्येतेगलचक्षुषी ॥ २८४॥
अर्थ-जितने स्त्री निद्राके वशमें रहै तबतक पूर्वोक्त- प्रकारसे स्त्रीके मुखपद्मका पान करे पीछे जागनेके समय गला व नेत्र इनका चुंबन करे ॥ २८४ ॥
अनेनविधिनाकामीवशयेत्सर्वकामिनीः ॥ इदंनवाच्यमन्यस्मिन्नित्याज्ञापारमेश्वरी ॥ २८५॥