शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 101–110
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 101–110
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करनेवाला, इन्द्रियों का नाशक, क, नीचगुण ला, सुन्दर - के अंश से के अंश से जसे अंश ) भी उसी कार्यों का होता है । सन्तुष्ट नहीं ता है यदि लिये उपाय य न करने । क्योंकि प्रथमोऽध्यायः १५ लोक में यह बात सद्ध है कि अनिष्टकारक कारणों के उपदेशों को प्राप्त कर लेने पर भी कौन ऐसा व्यक्ति है जो उनको प्राप्त करने के के लिये प्रयत्न करता है, अर्थात् कोई नहीं ॥
रज्यते सत्फले स्वान्तं दुष्फले नहि कस्यचित् ।
सदसद्बोधकान्येव दृष्ट्वा शास्त्राणि चाचरेत् ॥ ९ ० ॥
अच्छे फल देनेवाले कार्यों में मनुष्य का मन लगता है और बुरे फलवाले कार्यों में किसी का मन नहीं लगता है अतः सत् ( अच्छे ) तथा भसत् ( बुरे ) कार्यों के बोधक शास्त्रों को देखकर तदनुसार आचरण करना चाहिये ॥
न यस्य विनयो मूलं विनयः शास्त्रनिश्वयात् ।
विनयस्येन्द्रियजयस्तद्युक्तः शास्त्रमृच्छति ॥ ६१ ॥
नीति का मूल विनय है, और शास्त्र में निश्चय होने से विनय होता है । विनय का मूल इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करना है अतः जो इन्द्रियजयी है वही -शास्त्रज्ञान प्राप्त करता है ।
आत्मानं प्रथमं राजा विनयेनोपपादयेत् ।
ततः पुत्रांस्ततोऽमात्यांस्ततो भृत्यांस्ततः प्रजाः ॥ ६२ ॥
परोपदेशकुशलः केवलो न भवेन्नृपः । अतः राजा सर्वप्रथम अपने को विनय से युक्त करे, तत्पश्चात् पुत्रों को, तदनन्तर मन्त्रियों को, उसके बाद भृत्यों को, अन्त में प्रजाओं को विनय से युक्त करे । राजा केवल दूसरों को उपदेश देने में कुशल न हो ॥ प्रजाधिकारहीनः स्यात् सगुणोपि नृपः क्वचित् ॥ ९ ३ ॥
न तु नृपविहीनाः स्युर्दुर्गुणा द्यपि तु प्रजाः ।
यथा न विधवेन्द्राणी सर्वदा तु तथा प्रजाः ॥ ६४ ॥
कहीं - कहीं गुणवान राजा भी प्रजा के ऊपर अधिकार से हीन हो जाता है । किन्तु दुर्गुणवाली भी प्रजा राजा से हीन नहीं होती है 1 । जैसे कभी इन्द्राणी बिना इन्द्र के विश्ववारूप में नहीं रह सकती है वैसे ही बिना राजा के प्रजा भी नहीं रह सकती है ॥
भ्रष्टः स्वामिता राज्ये नृप एव न मन्त्रिणः ।
तथाऽविनीतदायादोऽदांताः पुत्रादयोपि च ॥६५ ॥
राजा ही भ्रष्ट होता है तथा स्वामित्व रखता है । मन्त्री में उक्त बातें नहीं होती हैं तथा अविनययुक्त दायाद ( भाई - पट्टीदार ) वर्ग एवं इन्द्रियों का दमन नहीं कर सकने वाले पुत्रादि के कारण से भी राजा राज्य भ्रष्ट एवं प्रभुत्व से हीन हो जाता है ॥ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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१६: शुक्रनीति: सदानुरक्तप्रकृतिः प्रजापालनतत्परः विनीतात्मा हि नृपतिर्भूयसीं श्रियमश्नुते ॥ ६६ ॥
अत्तः जिस राजा की प्रजा सदा अनुरक्त रहनेवाली होती है । स्वयं प्रजापालन में तत्पर रहता है एवं विनययुक्त होता है वह श्रीको प्राप्त करता है ॥
प्रकीर्णविषयारण्ये धावन्तं विप्रमाथिनम् ।
ज्ञानांकुशेन कुर्वीत वशमिन्द्रियतिनम् ॥ ६७ ॥
इन्द्रियजय की आवश्यकत्ता का निर्देश - राजा नाना विषयरूपी दौड़ते हुये मन को मथ डालनेवाले इन्द्रियरूपी हाथी को ज्ञानरूपी अपने वश में करे ॥
विषयामिषलोभेन मनः प्रेरयतीन्द्रियम् ।
तन्निरुन्ध्यात् प्रयत्नेन जिते तस्मिञ्जितेन्द्रियः ॥ ६८
विषयरूपी आमिष ( मांस ) के लोभ से मन इन्द्रिय को प्रेरित और नो अत्यधिक रुप खेलवाड होकर जङ्गलों में अङ्कुश से से च रूप गिरता || करता है । रस अतः उसे ( मन ) प्रयत्नपूर्वक रोके । उसके जीतने पर मनुष्य ' जितेन्द्रिय ' मीन ( कहलाता है | को प्राप्त
एकस्यैव हि योऽशक्तो मनसः सन्निबर्हणे ।
महीं सागरपर्यन्तां स कथं ह्यवजेष्यति ॥ ६६ ॥
जो राजा केवल एक मन को भलीभांति जीतने में असमर्थ रहता है तो मला वह समुद्रपर्यन्त पृथ्वी को जीतने में कैसे समर्थ हो सकता है । क्रियावसानविरसैविषयैरपहारिभिः गच्छत्याक्षिप्तहृदयः करीव नृपतिर्ब्रहम् ॥ १०० ॥
क्रिया ( भोग ) के अन्त में प्रीति का विषय न रह जानेवाले आकृष्ट करनेवाले विषयों से आकृष्ट चित्त होकर हस्ती की भांति राजा पड़ जाता है |
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः ।
एकैकन्त्वलमेतेषां विनाशप्रतिपत्तये ॥ १०१
i गन भी सम है अर्था , मन को बन्धन में हैं यदि प्राण ले ॥ शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध इनमें से प्रत्येक पृथक् पृथक् विषय लोगों के विनाश करने में समर्थ होते हैं । द्यूत शुचिर्द भकुराहारो विदूरभ्रमणे क्षमः । मद्यपान लुब्धकोद्गीतमोहेन मृगो मृगयते वधम् || १०२ || किन्तु य जैसे शब्द विषय के द्वारा - पवित्र, कुशके अङ्कुरों का आहार करनेवाला; मद्य से अत्यन्त दूर तक भ्रमण करने में समर्थ भी मृग बहेलिया के गीत से मोहिक होकर मृत्यु को प्राप्त होता है ॥ २ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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और जो अत्यधिक जङ्गलों में अङ्कुश से || करता है जितेन्द्रिय ' हता है तो 9 मन को बन्धन में II. य लोगों के करने वाला से मोहित प्रथमोऽध्यायः १७.
गिरींद्रशिखराकारो लीलयोन्मूलितद्रुमः ।
करिणीस्पर्शसम्मोहाद्बन्धनं याति वारणः ॥ १०३ ॥
स्पर्श विषय के द्वारा - पर्वत के शिखर की भांति ऊंचे आकार वाला, -खेलवाड़ से पेड़ों को उखाड़ देने वाला हाथी भी हथिनी के स्पर्श से मोहितः होकर बन्धन को प्राप्त होता है ।
स्निग्धदीपशिखा लोकविलोलित विलोचनः ।
मृत्युमृच्छति सम्मोहात् पतंगः सहसा पतन् ॥ १०४ ॥
रूप विषय द्वारा - स्निग्ध ( स्नेह = तैलयुक्त ) दीप की शिखा के प्रकाशःः से चञ्चल नेत्र वाला पतङ्ग ( फतरिङ्गा ) मोहित होकर सहसा दीपशिखा पर गिरता हुआ मृत्यु को प्राप्त करता है ।
अगाधसलिले मग्नो दूरेऽपि वसतौ वसन् ।
मीनस्तु सामिषं लोहमास्वादयति मृत्यवे ॥ १०५ ॥
रस विषय द्वारा - अगाध जल में डूबा हुआ, दूर से दूर रहता हुआ भी मीन ( मछली ) मोह से मांसयुक्त लौहकण्टक का आस्वाद लेता हुआ मृत्यु, को प्राप्त करता है ।
उत्कर्तितुं समर्थोपि गंतुं चैव सपक्षकः ।
द्विरेफो गन्धलोभेन कमले याति बन्धनम् ॥। १०६ ॥
गन्ध विषय द्वारा — कमल को काट डालने में एवं पल होने से उड़ने में भी समर्थ भौंरा गन्ध के लोभ से कमल के अन्दर संकुचित होने पर बँध जातां है अर्थात् उसी में बँधकर मर जाता है ।
एकैकशो विनिघ्नन्ति विषया विषसन्निभाः ।
किंपुनः पंच मिलिता न कथं नाशयंति हि ॥ १०७ ॥
विष के तुल्य उक्त शब्दादि विषय पृथक् २ रहकर भी प्राणनाशक होते हैं यदि वे पांचों मिलित हों तो क्यों नहीं नाश कर सकते हैं अर्थात् निःसन्देह-प्राण ले सकते हैं ।
द्यूतं स्त्री मद्यमेवैतत्त्रितयं बह्वनर्थकृत् ।
अयुक्तं युक्तियुक्तं हि धनपुत्रसतिप्रदम् ॥। १०८ ॥
द्यूतादिव्यसन के दोषों का निर्देश - द्यूत ( जूभा ) खेलना, स्त्री - सेवन, -मद्यपान ये तीनों अधिक मात्रा में होने से बहुत अनर्थ करने वाले होते हैं । किन्तु यदि इनका उचित उपयोग किया जाय तो धन, स्त्री से पुत्र और मद्य से बुद्धि की प्राप्ति होती है ।
नलधर्मप्रभृतयः सुद्यूतेन विनाशिताः ।
सकापटचं घनायालं द्यूतं भवति तद्विदाम् ॥ १० ९ ॥।
२ शु ० CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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शुक्रनीति: १८ द्यूत कर्म में अनभिज्ञ नल और युधिष्ठिर आदि राजाओं का छूत के द्वारा -विशेष धन - नाश हुआ किन्तु द्यूत कर्म में निपुण लोगों को चालाकी से खेला हुआ चूत धन दिलाने में अत्यन्त समर्थ होता है ।
स्त्रीणां नामापि संह्लादि विकरोत्येव मानसम् ।
किंपुनर्दर्शनं तासां विलासोल्लासितभ्रुवाम् ॥
स्त्रियों का नाम लेना भी आह्लाद पैदा करके चित्त को - युक्त कर देता है । फिर विलासपूर्वक भौहों को नचाने वाली - दर्शन करना क्यों नहीं मन को काम विकार युक्त कर सकता कर सकता है । रहः प्रचारकुशला मृदुगद्गदभाषिणी 1 ११० ॥ काम - विकार से उन स्त्रियों का है अर्थात् अवश्य कं न नारी वशीकुर्यान्नरं रक्तान्तलोचना ॥ १११ ॥
एकान्त में भेट करने में कुशल, कोमल तथा गद्गद वचन बोलने वाली अस्य के साथ थ स्थिरता व नष्ट कर मतवाला प्रयोगक काम कि वह-का, सैन्य एवं अनुरागयुक्त कटाक्ष करने वाली स्त्री किस मनुष्य को वशीभूत नहीं - कर सकती है अर्थात् सभी को वशीभूत कर सकती है । सुनेरपि मनो वश्यं सरागं कुरुतेंऽगना | राज जितेंद्रियस्य का वार्ता किंपुनश्चाजितात्मनाम् ॥ ११२ ॥ धन की
मन को सदा अपने अधीन रखने वाले मुनियों के भी मन को खियां काम-- चासना से युक्त कर देती हैं, जब जितेन्द्रिय की यह दशा है तब इन्द्रियों को नहीं जीतने वाले कामियों के विषय में क्या बात की जाय । अर्थात् उनको पर-- तो अवश्य ही वशीभूत कर सकती हैं ।
व्यायच्छन्तश्च बहवः स्त्रीषु नाशं गता अमी ।
इन्द्रदण्डक्यनहुषरावणाद्या नृपा ह्यतः ॥ ११३ ॥
बहुत से लोग सदा परस्त्रियों में प्रेम करके नाश को प्राप्त हुये हैं जैसे-- इन्द्र, दण्डक्य, नहुष और रावण आदि का उदाहरण प्रसिद्ध है ।
अतत्परनरस्यैव स्त्री सुखाय भवेत्सदा ।
साहाय्यिनी गृह्यकृत्ये तां विनाऽन्या न विद्यते ॥ ११४ ॥
को दण्ड धनी कह प्रज को और में उन्हें स्त्रियों में आसक्ति न रखने वालों के लिये ही स्त्री सदा सुख देने वाली होती है, क्योंकि गृह - कार्यों में उसके अलावा अन्य कोई दूसरी सहायता ' पहुँचाने वाली नहीं हो सकती है । राज अतिमद्यं हि पितो बुद्धिलोपो भवेत्किल । याचक ह प्रतिभां बुद्धिवैशद्यं धैर्य चित्तविनिश्चयम् ॥ ११५ ॥
तनोति मात्रया पीतं मद्यमन्यद्विनाशकृत् । कामक्रोधौ मद्यतमौ नियोक्तव्यौ यथोचितम् ॥ ११६ ॥ इस
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के द्वारा खेला विकार से स्त्रियों का अवश्य " लने वाली भूत नहीं 11 काम-न्द्रियों को तू उनको 11 हैं जैसे-११४ ॥ देने वाली सहायता ॥ प्रथमोऽध्यायः १ ९ ' अस्यन्त मद्य पीने वाले की बुद्धि का निश्चय लोप हो जाता है । और मात्रा के साथ थोड़ा मद्य पीने वाले की प्रतिभा, बुद्धि में उज्ज्वलता, धीरता, चित्त की स्थिरता बढ़ती है 1 । और इससे भिन्न मान्ना से अधिक पीने से मद्य शरीर को नष्ट कर देता है । और मद्य के समान काम तथा क्रोध भी चित्त को अत्यन्त मतवाला बना देने वाला होता है अतः इन दोनों को भी यथोचित रीति प्रयोग करना उचित होता है ।
कामः प्रजापालने च क्रोधः शत्रुनिबर्हणे ।
सेनासंधारणे लोभो योज्यो राज्ञा जयार्थिना ॥ ११७ ॥
कामादि पर जय प्राप्ति की इच्छा रखने वाले राजा के लिये उचित है । कि वह - प्रजा - पालन के लिये काम ( कामना ) का, शत्रु नाश के लिये क्रोध का, सैम्य रखने में लोभ का प्रयोग करे ।
परस्त्री - संगमे कामो लोभो नान्यधनेषु च ।
स्वप्रजादण्डने क्रोधो नैव धार्यो नृपैः कदा ॥। ११८ ॥
राजा कभी भी पर - स्त्री के साथ सङ्ग करने के लिये काम को, अन्य के धन की प्राप्ति में लोभ को, अपनी प्रजा को दण्ड देने में क्रोध को न करे ।
किमुच्येत कुटुम्बोति परस्त्रीसंगमान्नरः ।
स्वप्रजादण्डनाच्छूरो घनिकोऽन्यधनैश्च किम् ॥ ११ ९ ॥
पर - स्त्री के साथ संग करने वाला मनुष्य क्या कुटुम्बी? अपनी प्रजा को दण्ड देने से क्या शूर - वीर और दूसरे के धन को लेने से मनुष्य क्या धनी कहला सकता है? अर्थात् कभी नहीं कहला सकता है ।
अरक्षितारं नृपतिं ब्राह्मणं चातपस्विनम् ।
धनिकं चाप्रदातारं देवा घ्नन्ति त्यजन्त्यधः ॥ १२० ॥
प्रजा की रक्षा नहीं करने वाले राजा को, तपस्या नहीं करने वाले ब्राह्मण को और दान नहीं देने वाले धनी को देवता लोग नष्ट कर देते हैं और अन्त में उन्हें नरक में गिरा देते हैं ।
स्वामित्वं चैव दातृत्वं धनिकत्वं तपः - फलम् ।
एनसः फलमर्थित्वं दास्यत्वं च दरिद्रता ॥
राजा होना, दानी होना एवं धनी होना ये सब तप के याचक होना, दास होना एवं दरिद्र होना ये सब पाप के फल
दृष्ट्वा शास्त्राण्यथात्मानं सन्नियम्य यथोचितम् ।
कुर्यान्नृपः स्ववृत्तं तु परत्रेह सुखाय च ॥
इससे राजा शास्त्रों को देखकर तदनुसार अपने मन को १२१ ॥ फल हैं । और
हैं ।
१२२ ॥
विषयों से यथो-CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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२० शुक्रनीति: चित रोककर पर - लोक और इस लोक में सुख पाने के लिये को उचित रीति से करे ।
दुष्टनिग्रहणं दानं प्रजायाः परिपालनम् ।
यजनं राजसूयादेः कोशानां न्यायतोऽर्जनम् ॥
करदीकरणं राज्ञां रिपूणां परिमर्दनम् ।
भूमेरुपार्जनं भूयो राजवृत्तं तु चाष्टधा ॥ १२४
आठ प्रकार के राजा के व्यवहार का निर्देश- १ दुष्टों अपने आचरण १२३ ॥ जब धन को ह ॥ पहुँचाने ल का निग्रह करना, लगती है २ दान देना, ३ प्रजा का परिपालन, ४ राजसूयादि यज्ञ करना, ५ न्यायपूर्वक राजा को कोश ( खजाना ) बढ़ाना, ६ राजाओं से कर वसूल करना, ७ शत्रुओं का मान उनसे अ मर्दन करना, ८ बार बार राज्य को बढ़ाना, ये ८ प्रकार के राजाओं के वृत व्यक्ति मेरे ( आचरण ) हैं ।
न वर्धितं बलं यैस्तु न भूपाः करदीकृताः ।
न प्रजाः पालिताः सम्यक्ते वै षंढतिला नृपाः ॥ १२५ ॥
राजा के दोष - गुण का निर्देश - जिन राजाओं ने सेना नहीं बढ़ाई, राजाओं को कर देने वाला ( अधीन ) नहीं बनाया, प्रजाओं का भली भांति पालन नहीं किया, वे बांझतिल ( तेल - रहित तिल ) के समान तुच्छ मेरे कहलाते हैं । प्रजा सूद्विजते यस्माद्यत्कर्म परिनिंदति । गुणिभिस्तु नृपाधमः । प्रजा जिससे उद्विग्न हो उठती है और जिसके कर्मों की और जिसे धनिक तथा गुणी लोग त्याग देते हैं वह कहलाता है । नटगायकगणिका मल्लषंढाल्पजातिषु । किन लोग लोगों से १२६ ॥ उन दुर्गुण निन्दा करती है । तिरस्कार राजा नृपाधमं योऽतिसक्तो नृपो निन्द्यः स हि शत्रुमुखे स्थितः ॥ १२७ ॥ यदि
नट, गवैया, वेश्या, पहलवान, जनखा तथा नीच जाति वालों में अत्यन्त करती है आसक्ति रखने वाला राजा निन्द्य कहलाता है । और वह शत्रु के मुख में पर स्वभावव जाता है । भी रामच बुद्धिमंतं सदा द्वेष्टि मोदते वंचकैः सह । और अप स्वदुर्गुणं न वै वेत्ति स्वात्मनाशाय सो नृपः ॥ १२८ ॥
जो राजा सदा बुद्धिमानों से द्वेष रखता है और वंचकों से खुश रहता है । एवं अपने दुर्गुणों को नहीं समझता है वह अपना नाश करने के लिये कारण बन जाता है । नापराधं हि क्षमते प्रदंडो धनहारकः । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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ने आचरण प्रथमोऽध्यायः स्वदुर्गुणश्रवणतो लोकानां परिपीडकः नृपो यदा तदा लोकः क्षुभ्यते भिद्यते यतः गूढचारैः श्रावयित्वा स्ववृत्तं दूषयंति के ॥ भूषयंति च कैर्भावैरमात्याद्याश्च तद्विदः जब जो राजा अपराध को नहीं सहन करता है तथा २१ ॥ १२६ ॥
।
१३० ॥
। उम्र दण्ड देता है । धन को हरण कर लेता है, अपने दुर्गुणों के सुनने पर कहनेवाले को पीड़ा पहुँचाने लगता है तब उससे प्रजा चुभित हो उठती है और भेदभाव रखने निग्रह करना, लगती है अर्थात् राजा से प्रेम हटा लेती है । अतः इनसे बचने के लिये न्यायपूर्वक राजा को उचित है कि वह अपने गुप्तचरों ( खुफिया पुलिस ) को भेजकर ओं का मान उनसे अपने आचरणों को प्रजा पर प्रकट करावे और यह जाने कि - कौन के वृत २५ ॥ ह्रीं बढ़ाई, भली भांति नमान तुच्छ ॥ करती है ना नृपाधमं १२७ ॥ में अत्यन्त सुख में पड़ ६ ॥ खुश रहता है । लिये कारण व्यक्ति मेरे आचरण को दोषयुक्त बताते हैं 1 । और उस वृत्त के
आदि किन आचरणों से मेरी प्रशंसा करते हैं ।
मयि कीदृक् च संप्रोतिः केषामप्रीतिरेव वा ॥
ममागुणैर्गुणैर्वापि गूढं संश्रुत्य चाखिलम् ।
चारैः स्वदुर्गुणं ज्ञात्वा लोकतः सर्वदा नृपः ॥
सुकीर्त्यै संत्यजेन्नित्यं नावमन्येत वै प्रजाः । मेरे गुणों से किन लोगों की मेरे में कैसी प्रीति है? और जानकार मन्त्री १३१ ॥ १३२ ॥ मेरे अवगुणों से किन लोगों की कैसी अप्रीति है? इसे गूढ पुरुषों ( खुफिया पुलिस ) द्वारा लोगों से कहे हुये अपने दुर्गुणों को सर्वदा जानकर राजा अपनी कीर्ति के लिये उन दुर्गुणों को भली भांति छोड़ देवे और निन्दा करनेवाली प्रजा का कभी तिरस्कार न करे लोको निदति राजंस्त्वां चारैः संभावितो यदि ॥। १३३ ॥
कोपं करोति दौरात्म्यादात्मदुर्गुणलोपकः ।
सीतासाव्यपि रामेण त्यक्ता लोकापवादतः ॥ १३४ ॥
यदि जासूस आकर यह सुना कि - ' हे महाराज! प्रजा आप की निन्दा करती है ' इस पर जो अपने दुर्गुण को छिपानेवाला होता है वही राजा दुष्ट स्वभाववश कोप करता है - अन्य नहीं करता है । जैसे कि समर्थ होते हुये भी रामचन्द्र ने लोकापवाद के भय से पतिव्रता सीता का भी परित्याग किया, और अपवाद लगाने वाले धोबी के लिये कभी थोड़ा भी दण्ड नहीं दिया ।
शक्तेनापि हि न धृतो दण्डोऽल्पो रजके क्वचित् ।
ज्ञान विज्ञानसंपन्न - राजदन्ता भयोऽपि च ॥ १३५ ॥
समक्षं वक्ति न भयाद्राज्ञो गुर्वपि दूषणम् ।
स्तुतिप्रिया हि वै देवा विष्णुमुख्या इति श्रुतिः ॥ १३६ ॥
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२२ शुक्रनीति:
किं पुनर्मनुजां नित्यं निंदाजः क्रोध इत्यतः ।
राजा सुभागदंडी स्यात्सुक्षमी रंजकः सदा ॥ १३७ ॥
ज्ञान - विज्ञान से संपन्न राजा द्वारा अभय - दान पाने पर भी कोई का भी व्यक्ति राजा के भय से उसके भारी दोष को उसके सामने नहीं परित्या कहता है 1 । क्योंकि — ऐसा सुना जाता है कि विष्णु आदि देवताओं को भी स्तुति प्रिय लगती है तब फिर मनुष्यों की क्या बात है । और यह नित्य नियम है कि — क्रोध निन्दा से उत्पन्न होता है, इस कारण से राजा को उचित त से दण्ड देनेवाला, भली भांति सहन करनेवाला, सदा प्रजा का मनोरञ्जन करनेवाला होना चाहिये । क यौवनं जीवितं चित्तं छाया लक्ष्मीश्च स्वामिता । के पुत्र चलानि षडेतानि ज्ञात्वा धर्मरतो भवेत् ॥ १३८ ॥ दम्भो
१. यौवन ( जवानी ), २. जीवन, ३. धन, ४. छाया, ५. लक्ष्मी, ६. प्रमुख, षड्वर्ग ये ६ चञ्चल होते हैं, अतः यह जानकर राजा को धर्म में रत होना चाहिये
अदानेनापमानेन छताच्च कटुवाक्यतः ।
राज्ञः प्रबलदंडेन नृपं मुंचति वै प्रजा ॥ १३६ ॥
राजा के दान न करने से, अपमान से, छल से, कटुवचन से, प्रबल से प्रजा उसको छोड़ देती है । अतिभीरुमतिदीर्घसूत्रं चातिप्रमादिनम् 1 व्यसनाद्विषयाक्रान्तं न भजन्ति नृपं प्रजाः ॥ १४० ॥
। श वण्ड रामजी किया अत्यन्त भीरु ( डरपोक ), अत्यन्त दीर्घसूत्र ( धीरे २ कार्य करनेवाले ) अत्यन्त प्रमादी ( असावधान ) और व्यसन होने से विषयों ( भोगों ) में बढ़ाता आसक्त रहनेवाले राजा की प्रजा सेवा नहीं करती है । ( अर्थात् त्याग माता-देती है ) । विपरीत गुणैरेभिः सान्वया रज्यते प्रजा । इनसे विपरीत गुणवाले राजा से अपने वंश के साथ २ सारी प्रजा प्रसन्न रहती है । की व एकस्तनोति दुष्कीर्ति दुर्गुणः संघशो न किम् ॥ १४१ ॥ प्रशंसि
मृगयाऽक्षास्तथा पानं गर्हितानि महीभुजाम् ।
दृष्टास्तेभ्यस्तु विपदः पांडुनैषधवृष्णिषु ॥ १४२ ॥
एक भी दुर्गुण दुष्कीर्त्ति को फैला देती है तो क्या समूह रूप से होने पर न फैलावेगी अर्थात् फैलावेगी ही । मृगया ( शिकार खेलना ), अक्ष ( जुमा खेलना ) और मद्यपान करना ये तीनों राजाओं के लिये निन्दित हैं, क्योंकि मृगया से पाण्डु की, जूए से नल की और मद्यपान से वृष्णियों ( यदुकुलवालों ) रखनेव की विपत्ति देखी गयी है । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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बर भी कोई सामने नहीं को भी स्तुति नित्य नियम उचित रीति मनोरञ्जन १८ ॥ ६. प्रभुत्व, चाहिये । प्रबल दण्ड ४० ॥ करने वाले ) ( भोगों ) में अर्थात् स्या प्रजा प्रसन्न ३१ ॥ २ ॥ से होने पर अक्ष ( जुमा हैं, क्योंकि नदुकुलवाल ) प्रथमोऽध्यायः २३:
कामक्रोधस्तथा मोहो लोभो मानो मदस्तथा ।
षड्वर्गमुत्सृजेदेनमस्मिंस्त्यक्ते सुखी नृपः ॥ १४३ ॥
काम, क्रोध, मोह, लोभ, मान, मद, इनकी ' पढ्वर्ग ' संज्ञा है । इनका परित्याग करना चाहिये । क्योंकि इनके परिस्याग से राजा सुखी होता है ।
दंडक्यो नृपतिः कामात्क्रोधाच्च जनमेजयः ।
लोभादैस्तु राजर्षिर्मोहाद्वातापिरासुरः ॥ १४४ ॥
पौलस्त्यो राक्षसो मानान्मदाद्दम्भोद्भवो नृपः ।
प्रयाता निधनं ह्येते शत्रुषड्वर्गमांश्रिताः ॥ १४५ ॥
काम से दण्डक्य राजा, क्रोध से जनमेजय, लोभ से राजर्षि ऐल ( इला के पुत्र ), मोह से वातापि नामक असुर, मान से पुलस्त्यवंशी रावण, मद से दम्भोद्भव नामक राजा का विनाश हुआ, क्योंकि इन सब ने शत्रु के समानः षड्वर्ग का आश्रय लिया था ।
शत्रुषड्वर्गमुत्सृज्य जामदग्न्यः प्रतापवान् ।
अंबरीषो महाभागो बुभुजाते चिरं महीम् ॥ १४६ ॥
शत्रुतुल्य इस षड्वर्ग को छोड़ देने से जमदग्नि के पुत्र प्रतापी परशु-रामजी एवं महाराज अम्बरीष इन दोनों ने बहुत काल तक पृथ्वी का भोग किया ( राज्य किया ) ।
वर्धयन्निह धर्मार्थों सेवितौ सद्भिरादरात् ।
निगृहीतेंद्रियग्रामः कुर्वीत गुरुसेवनम् ॥ १४७ ॥
इस संसार में राजा सज्जनों के द्वारा सादर सेवित धर्मं और अर्थ को बढ़ाता हुआ, अपने इन्द्रियों को वश में करता हुआ गुरु ( श्रेष्ठ, उपदेशक,. माता - पिता आदि ) जनों का सेवन करें ।
शास्त्राय गुरुसंयोगः शास्त्रं विनयवृद्धये ।
विद्याविनीतो नृपतिः सतां भवति संमतः ॥ १४८ ॥
क्योंकि गुरुओं की सेवा से शास्त्र - ज्ञान होता है और शास्त्र ज्ञान से विनयः की वृद्धि होती है । अतः विद्या से उत्पन्न विनय से युक्त ही राजा सज्जनों द्वारा: प्रशंसित होता है ।
प्रेर्यमाणोप्यसद्वृत्तैर्नाकार्येषु प्रवर्तते ।
श्रुत्या स्मृत्या लोकतश्च मनसा साधु निश्चितम् ॥ १४६ ॥
यत्कर्मधर्मसंज्ञं तद्वयवस्यति च पंडितः ।
आददानः प्रतिदिनं कलाः सम्यङ् महीपतिः ॥ १५० ॥
चुरे आचरण करनेवाले लोगों के प्रेरणा करने पर भी अच्छे - बुरे का विचार रखनेवाला समझदार राजा बुरे कार्य करने में प्रवृत्त नहीं होता है क्योंकि वह CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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२४ शुक्रनीतिः वेद, स्मृति तथा लोक - व्यवहार से अच्छा समझकर जो धर्मसंज्ञक सत्कर्म है -उसका पालन करता है अतः प्रत्येक कार्य के करने न करने की कला में निपुण होने से अच्छा राजा कहलाता है ।
जितेंद्रियस्य नृपतेर्नीतिशास्त्रानुसारिणः ।
भक्त्युच्चलिता लक्ष्म्यः कीर्तयश्च नभःस्पृशः ॥ १५१ ॥
इस प्रकार से जितेन्द्रिय होकर नीति शास्त्र का अनुसरण करनेवाले राजा घर में लक्ष्मी उछलती रहती है तथा उसकी कीर्त्ति स्वर्ग तक फैल जाती है ।
आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दंडनीतिश्च शाश्वती ।
विद्याश्चतस्र एवैता अभ्यसेन्नृपतिः सदा ॥ १५२ ॥
२ आन्वीक्षिकी आदि के लक्षण - आन्वीचिकी ( गौतमादि- रचित तर्क-' शास्त्रादि ), नयी ( अङ्ग के सहित ऋक्, यजु, साम ये ३ वेद ), शास्त्र ), दण्डनीति ( अर्थशास्त्र ) ये चारों विद्यायें सनातन हैं - सदा अभ्यास करना चाहिये । आन्वीक्षिक्यां तर्कशास्त्रं वेदांताद्यं प्रतिष्ठितम् ari धर्मो ह्यधर्मश्च कामोऽकामः प्रतिष्ठितः अर्थानर्थौ तु वार्तायां दंडनीत्यां नयानयौ वर्णाः सर्वाश्रमाश्चैव विद्यास्वासु प्रतिष्ठिताः वार्ता ( व्यवहार । राजा को इनका ॥। १५३ ॥ ॥। १५४ ॥ यहां पर ' आन्वीक्षिकी ' में तर्कशास्त्र - वेदान्तादि की और ' त्रयी ' में धर्म, अधर्म, काम, मोक्ष इनकी बातें हैं । ' वार्ता ' में अर्थ और अनर्थ विषय का एवं ' दण्डनीति ' में न्याय, अन्याय, ४ वर्ण, ४ आश्रम के विषयों का ज्ञान है । इस -भांति से इन विद्याओं में ये सब बातें भरी हुई हैं ।
अंगानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तरः ।
धर्मशास्त्रपुराणानि त्रयीदं सर्वमुच्यते ॥ १५५ ॥
शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्यौतिष, छन्द ये ६ वेद के अङ्ग, ऋग्, न्य, साम, अथर्व ये ४ वेद, मीमांसा, न्याय शास्त्र का विस्तार, धर्मशास्त्र, पुराण इन सबों को ' त्रयी ' कहते हैं ।
कुसीदकृषिवाणिज्यं गोरक्षा वार्तयोच्यते ।
संपन्नो वार्तया साधुर्न वृत्तेर्भयमृच्छति ॥ १५६ ॥
कुसीद ( सूद लेना ), कृषि ( खेती ), वाणिज्य ( व्यापार ), गोपालन, - इन सर्वो को वार्त्ता कहते हैं । इस वार्ता शास्त्र का भली - भांति ज्ञान रखने-वाला राजा जीविका संबन्धी भय को नहीं प्राप्त करता है ।
दम्भो दंड इति ख्यातस्तस्माद्दंडो महीपतिः ।
तस्य नीतिर्दण्डनीतिर्नयनान्नीतिरुच्यते ॥ १५७ ॥
दम उसकी न हैं । भाव इसी से आ नयी दि परलोक स अक्रूरता अ पीडित नष्ट कर स के साथ को प्रा आननि छाया संगति CC - Q. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri