शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 91–100

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 91–100

पृष्ठ 91

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प्रथमोऽध्यायः ला संपूर्ण अपनाना रमन्त्री ॥ प्रजा की से ही ति रूप.. क. भेद: का राजा: चरण में: चरण र होते? तेजस्वी धर्म की प्रशंसा – स्वधर्म - पालन करने के बिना सुख नहीं होता है और अपने धर्म का पालन करना परंम तप है 1 । अतः जिसने स्वधर्म - पालन रूप तप को सदा बढ़ाया है, संसार में उसके देवता लोग भी किङ्कर हो जाते हैं फिर मनुष्यों के विषय में क्या कहना है ॥ सुदण्डैर्धर्मनिरताः प्रजाः कुर्यान्महाभयैः ॥ २५ ॥

नृपः स्वधर्मनिरतो भूत्वा तेजःक्षयोऽन्यथा । राजा अपने धर्म में रत होकर अत्यन्त भयदायक दण्डों के द्वारा प्रजाओं को अपने २ धर्म में रत रक्खे । यदि ऐसा नहीं करता है तो उसका तेज क्षीण हो जाता है ॥ अभिषिक्तोऽनभिषिक्तो नृपत्वं तु यदाप्नुयात् ॥ २६ ॥

बुद्धया बलेन शीर्येण ततो नीत्याऽनुपालयन् ।

प्रजाः सर्वाः प्रतिदिनमच्छिद्रे दंडधृक् सदा ॥ २७ ॥

जिसका अभिषेक हुआ है या नहीं हुआ है, ऐसा राजा जब राज - पदवी को धारण करे तब वह बुद्धि, बल, शूरता तथा नीति से प्रतिदिन सभी प्रजाओं का पालन करता हुआ स्वयं छिद्र ( दोष ) रहित होकर दण्ड को धारण करे ॥. नित्यं बुद्धिमतोऽप्यर्थः स्वल्पकोऽपि विवर्धते तिर्योऽपि वशं यांति शौर्यनीतिबलैर्धनैः ॥ -बुद्धिमान राजा का थोड़ा भी धन नित्य वृद्धि को प्राप्त उसकी शूरता, नीति, बल तथा धन से तिर्यग्योनि के सर्पादि हो जाते हैं ॥ सात्विकं राजसं चैव तामसं त्रिविधं तपः यादृक्तपति योऽत्यर्थं तादृग भवति वै नृपः ॥ साखिकादि गुण भेद से राजा के तीन भेद - सात्विक,

२८ ॥

होता है । और भी उसके वश

२६ ॥

राजस तथा तामस भेद से तप तीन प्रकार का होता है । अतः जो राजा जिस प्रकार का तप करता है उसके अनुसार वह सात्विक, राजस अथवा तामस गुणवाला होता है ॥

i यो हि स्वधर्मनिरतः प्रजानां परिपालकः ।

यष्टा च सर्वयज्ञानां नेता शत्रुगणस्य च ॥ ३० ॥

दानशौण्डः क्षमी शूरो निःस्पृहो विषयेष्वपि ।

विरक्तः सात्विकः स हि नृपोऽन्ते मोक्षमन्वियात् ॥ ३१ ॥

जो राजा अपने धर्म में निरत, प्रजाओं का पालक, सम्पूर्ण यज्ञों का करने चाला, शत्रुगणों को जीतनेवाला, दानवीर, क्षमावान, शूर, इन्द्रियों के CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 92

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शुक्रनीति: ६ विषयों की तरफ मन नहीं लगानेवाला, वैराग्य - युक्त होता है वह ' साविक ' कहलाता है । और ऐसा ही राजा अन्त में मोक्ष को प्राप्त करता है ॥

विपरीतस्तामसः स्यात् सोऽन्ते नरकभाजनः ।

निर्घृणश्च मदोन्मत्तो हिंसकः सत्यवर्जितः ॥ ३२ ॥

और उक्त इन गुणों से विपरीत गुणवाला जो राजा होता कहलाता है और वह अन्त में नरक को प्राप्त करता है मद से उन्मत्त, हिंसा करनेवाला, सत्य से रहित होता है ।

राजसो दांभिको लोभी विषयी वंचकश्शठः ।

मनसाऽन्यश्च वचसा कर्मणा कलहप्रियः ॥

नीचप्रियः स्वतंत्र नीतिहीनश्छलांतरः ।

स तिर्यक्त्वं स्थावरत्वं भविताऽन्ते नृषाधमः ॥

जो दाम्भिक, लोभी, विषयी, ठग, शठ, मन से अन्य व्यवहार करनेवाला, चाणी और कर्म से कलहप्रिय, नीचों से है वह ' तामस ' तथा दयारहित, ३३ ॥ . ३४ ॥ बाहर से अन्य प्रेम रखने वाला, स्वतन्त्र, नीति से होन, भीतर छल रखनेवाला होता है ऐसा राजा ' राजस ' कहलाता है । और वह मरने पर तिर्यग्योनि ( सर्पादि योनि ) अथवा स्थावर-योनि ( वृक्षादि योनि ) को प्राप्त करता है ॥

देवांशान् सात्त्विको भुंक्ते राक्षसांशांस्तु तामसः ।

राजसो मानवांशांस्तु सत्त्वे धार्यं मनो यतः ॥ ३५ ॥

इ होता ह स कहला प्राप्त ह देवता दयालु ज वाला, ' साविक राजा देवता के अंश को, तामस राक्षसों के अंश को तथा राजस मनुष्यों के अंश को भोगता है । अतः सत्व गुण में चाहिये ॥

सप्त्वस्य तमसः साम्यान्मानुषं जन्म जायते ।

यद्यदाश्रयते मर्त्यस्तत्तुल्यो दिष्टतो भवेत् ॥

सश्व गुण तथा तमो गुण की समता से मनुष्य का जन्म भाग्यवश — जैसे गुणों का मनुष्य आश्रय लेता है उसी होता है ॥ कर्मैव कारणं चात्र सुगतिं दुर्गतिं प्रति मन को लगाना ३६ ॥ मिलता है । और के अनुसार वह

कर्मैव प्राक्तनमपि क्षणं कि कोऽस्ति चाक्रियः ॥ ३७ ॥

सुगति - दुर्गंति भेद से प्राचन कर्म की कारणता — इस संसार में सुगति ज दूकान करनेव इ शान्त करने व और दुर्गंति के प्रति कर्म ही कारण होता है । वह भी प्राक्तन होता है । अर्थात् पूर्व कर्म ही प्रारब्ध कर्म कहलाता है । क्या कोई जीव बिना कर्म किये क्षण भर भी रह सकता है अर्थात् नहीं रह सकता है ॥ पीड़ा कहल

न जात्या ब्राह्मणञ्चात्र क्षत्रियो वैश्य एव न ।

न शूद्रो न च वै म्लेच्छो भेदिता गुणकर्मभिः ॥ ३८ ॥

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पृष्ठ 93

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' साविक ' २ ॥ ' तामस ' दयारहित, से अन्य ने वाला, ' राजस ' T स्थावर-1 था राजस लगाना है । औ सार वह ॥ सुगति । अर्थात् किये क्षण 1 प्रथमोऽध्यायः इस संसार में जन्म से कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या होता है, वस्तुतः गुण तथा कर्म के भेद से ही होता है ॥

ब्रह्मणस्तु समुत्पन्नाः सर्वे ते किं नु ब्राह्मणाः ।

न वर्णतो न जनकाद् ब्राह्मतेजः प्रपद्यते ॥ ३६

संपूर्ण जीव ब्रह्मा से उत्पन्न हुये हैं अत एव वे सभी कहला सकते हैं? नहीं, क्योंकि वर्ण ( जाति ) से और पिता से प्राप्त होता है ॥ ज्ञानकर्मोपासनाभिर्देवताराधने रतः म्लेच्छ नहीं ॥ क्या ब्राह्मण ब्रह्मतेज नहीं शांती दांतो दयालु ब्राह्मणञ्च गुणैः कृतः ॥ ४० ॥

' ज्ञानकाण्ड, कर्मकाण्ड और उपासना काण्ड का प्रकाण्ड विद्वान होता हुआ, देवता की आराधना में लीन, शान्तचित्त, इन्द्रियों का दमन करने वाला, दयालु होना ' – इन सब गुणों से ब्राह्मणों का निर्माण हुआ है ॥

लोकसंरक्षणे दक्षः शूरो दांतः पराक्रमी ।

दुष्टनिप्रहशीलो यः स वै क्षत्रिय उच्यते ॥। ४१ ॥

जनता की भली भांति रक्षा करने में चतुर, शूर, इन्द्रियों का दमन करने-वाला, पराक्रमयुक्तं, स्वभावतः दुष्टों को दण्ड देनेवाला जो है वह इन गुणों से ' क्षत्रिय ' कहलाता है ।

क्रयविक्रयकुशला ये नित्यं पण्यजीविनः ।

पशुरक्षाकृषिकरास्ते वैश्याः कीर्तिता भुवि ॥ ४२ ॥

जो लोग क्रय ( खरीदना ) - विक्रय ( बेचना ) करने में कुशल, निय दूकानदारी से जीविका चलानेवाले, पशु - पालन तथा कृषि कर्म ( खेती ). करनेवाले होते हैं वे संसार में ' वैश्य ' कहलाते हैं ॥

द्विजसेवाचंनरताः शूराः शांता जितेन्द्रियाः ।

सीरकाष्ठतृणवहास्ते नीचाः शूद्रसंज्ञकाः ॥ ४३ ॥

जो लोग द्विज ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ) जाति की सेवा में निरत, शूर, शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, हल, काष्ठ तथा तृण ( घास आदि ) का भार वहन करनेवाले होते हैं वे नीच एवं ' शूद्र ' कहलाते हैं ।

त्यक्तस्वधर्माचरणा निर्घृणाः परपीडकाः ।

चंडाश्च हिंसका नित्यं म्लेच्छास्ते ह्यविवेकिनः ॥ ४४ ॥

जो लोग स्वधर्माचरण का परित्याग करनेवाले, दयाशून्य, दूसरे को पीड़ा पहुँचानेवाले, अत्यन्त क्रोधी तथा हिंसा करनेवाले होते हैं वे ' म्लेच्छु ' कहलाते हैं 1 । और उनमें विवेक का लेश भी नहीं होता है । प्राक्कर्मफलभोगार्हा बुद्धिः संजायते नृणाम् । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 94

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८: शुक्रनीतिः ... पापकर्मणि पुण्ये वा कर्तुं शक्तो न चान्यथा ॥ ४५ ॥

मनुष्यों को पूर्वार्जित कर्मों के फल भोगने के योग्य जब जैसी बुद्धि उत्पन्न होती है तब उसके अनुसार पाप अथवा पुण्य कर्म करने में मनुष्य - समर्थ होता है, अन्यथा असमर्थ रहता है ॥

बुद्धिरुत्पद्यते तादृग्यादृक्कर्मफलोदयः ।

सहायास्तादृशा एव यादृशी भवितव्यता ॥ ४६ ॥

जैसे कर्मों का फल उदय होता है उसी के अनुसार वैसी बुद्धि होती है - तथा जैसी भवितव्यता ( होनहार ) होती है उसी के अनुसार वैसे सहाय ( साथी ) भी होते हैं ॥ R. )

प्राकमवशतः सर्व भवत्येवेति निश्चितम् ।

तदोपदेशा व्यर्थाः स्युः कार्याकार्यप्रबोधकाः ॥ ४७ ॥

यदि यही निश्चित हो कि जो कुछ होता है वह सब प्राक्तन कर्म के ' अनुसार ही होता है तो ' यह कर्त्तव्य है और यह नहीं कर्त्तव्य है ' इसके बोधक -सभी उपदेश व्यर्थ हो जायँगे ॥

धीमन्तो वन्द्य चरिता मन्यन्ते पौरुषं महत् ।

अशक्ताः पौरुषं कर्तुं क्लीबा दैवमुपासते ॥ ४८ ॥

जो बुद्धिमान एवं प्रशंसनीय चरितवाले हैं वे पुरुषार्थ को बढ़ा मानते हैं । अर्थात् उद्योग करते हैं । और जो पुरुषार्थ करने में असमर्थ कायर पुरुष हैं वे भाग्य की उपासना करते हैं अर्थात् भाग्य के भरोसे बैठे रहते हैं ॥

दैवे पुरुषकारे च खलु सर्वं प्रतिष्ठितम् ।

पूर्वजन्मकृतं कर्मेहार्जितं तद् द्विधा कृतम् ॥ ४६ ॥

भाग्य और पुरुषार्थ इन दोनों के ऊपर ही सम्पूर्ण जगत् के कार्य स्थित हैं । इनमें पूर्वजन्म में किया हुआ कर्म ' भाग्य ' और इस जन्म में किया हुआ कर्म ' पुरुषार्थ ' कहलाता है, इस भांति से एक ही कर्म के दो भेद किये गये हैं ।

' बलवत्प्रतिकारि स्याद् दुर्बलस्य सदैव हि ।

सबलाबलयोर्ज्ञानं फलप्राप्त्याऽन्यथा नहि ॥

भाग्य और पुरुषार्थ इन दोनों में से जो दुर्बल होता चाला सदा बलवान् होता है । सबल और दुर्बल का ज्ञान से होता है । अन्य त्रीति से नहीं होता ॥

फलोपलब्धिः प्रत्यक्षहेतुना नैव दृश्यते ।

प्राक्कर्म हैतुकी सा तु नान्यथैवेति निश्चयः ॥

५० ॥

हैं उसको हटाने • केवल फल प्राप्ति ५१ ॥ ' प्रत्यक्ष कारण ( पुरुषार्थं ) से फल की प्राप्ति नहीं दिखाई देती है, वह तो प्राकन कर्म के वश से ही होती है, अन्य से नहीं होती है ' यह निश्चित है ॥ दिखाई पुरुषार्थ अर्थात् युक्त दीप आचार्य य बुद्धि तथ अर्थात् इस मध्यम रा ध्वंस हो को वि हुई || औ जब दैव CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 95

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मनुष्य होती है सहाय कर्म बोधक मानते हैं स्थित हैं । कर्म हैं । को हटाने • फल - प्राप्ति वह तो ॥ प्रथमोऽध्यायः ९

यज्जायतेऽल्पक्रियया नृणां वापि महत्फलम् ।

तदपि प्राक्तनादेव केचित् प्राहि कर्मजम् ॥ ५२ ॥

और कभी २ स्वल्प कर्म से ही मनुष्यों को जो अधिक फल की प्राप्ति दिखाई देती है वह प्राक्तन कर्म के वश से ही होती है, कोई २ आचार्य उसे पुरुषार्थ से हुआ ही मानते हैं ।

वदन्तीहैव क्रियया जायते पौरुषं नृणाम ।

सस्नेहवर्तिर्दीपस्य रक्षा वातात् प्रयत्नतः ॥ ५३ ॥

' मनुष्यों का जो पुरुषार्थं फलप्राप्ति के लिये होता है उसमें इसी जन्म के अर्थात् तात्कालिक कर्म ही कारण होता है । जैसे लोक में तेल तथा बत्ती से युक्त दीपक की हवा से रक्षा प्रयत्न करने से ही होती है ' ऐसा कोई २ आचार्य कहते हैं ॥

अवश्यंभावभावानां प्रतीकारो न चेद्यदि ।

दुष्टानां क्षपणं श्रेयो यावद्बुद्धिबलोदयैः ॥ ५४ ॥

यदि अवश्य होनेवाले कार्यों का प्रतीकार होना संभव न होता तो अपने बुद्धि तथा बल के अनुसार दुष्टों का नाश करना कल्याणकारक न होता अर्थात् पुरुषार्थं से दुर्बल भावी ( होनहार ) को मिटाया जा सकता है ॥

प्रतिकूलानुकूलाभ्यां फलाभ्यां च नृपोऽप्यतः ।

ईषन्मध्याधिकाभ्यां च त्रिधा दैवं विचिन्तयेत् ॥ ५५ ॥

इससे राजा प्रतिकूल तथा अनुकूल फल देनेवाले दैव ( भाव ) के थोड़ा, मध्यम तथा अधिक इन तीनों भेदों से तीन प्रकार का समझे ॥

रावणस्य च भीष्मादेर्वनभंगे च गोग्रहे ।

प्रातिकूल्यं तु विज्ञातमकस्माद्वानरानरात् ॥ ५६ ॥

रावण को अशोक वाटिका का अकेले एक हनुमान नामक वानर द्वारा एवंस होने से और अकेले एक नर ( अर्जुन ) द्वारा भीष्म आदि ( दुर्योधन ) को विराट नगर में गार्यो को पकड़ कर रख लेने से दैव की प्रतिकूलता ज्ञात हुई |

कालानुकूल्यं विस्पष्टं राघवस्यार्जुनस्य च ।

अनुकूले यदा दैवे क्रियाऽल्पा सुफला भवेत् ॥ ५७ ॥

और रामचन्द्र और अर्जुन के समय की अनुकूलता तो प्रगट ही है । अतः जब दैव अनुकूल रहता है तब थोड़ा भी पुरुषार्थं सफल हो जाता है ।

महती सत्क्रियाऽनिष्टफला स्यात् प्रतिकूलके ।

बलिर्दानेन संबद्धो हरिश्चन्द्रस्तथैव च ॥ ५८ ॥

और देव प्रतिकूल रहने पर अत्यन्त अच्छी भी क्रिया ( पुण्यकार्य ) अनिष्ट CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 96

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१० शुक्रनीति: फल देनेवाली हो जाती । जैसे- -दान से राजा बलि बाँधे गये और राजा हरिश्चन्द्र को भी डोम के यहां नौकरी करनी पड़ी ॥ पर ले च भवतीष्टं सत्क्रिययाऽनिष्टं तद्विपरीतया । मल्लाह ) शास्त्रतः सदसञ्ज्ञात्वा त्यक्त्वाऽसत्सत्समाचरेत् ॥ ५ ९ ॥ अच्छे कार्यों से अच्छा फल होता है, उससे विपरीत ( चुरे ) कार्यों से बिन बुरा फल होता है अतः शास्त्र द्वारा अच्छे बुरे कार्यों का ज्ञान प्राप्त कर का त्याग तथा अच्छे का ग्रहण करना चाहिये ॥

कालस्य कारणं राजा सदसत्कर्मणस्त्वतः ।

स्वक्रौर्योद्यतदण्डाभ्यां स्वधर्मे स्थापयेत् प्रजाः ॥। ६० ॥

सत् ( अच्छा ) तथा असत् ( बुरा ) कर्म को करानेवाले काल का कारण ( विधाता ) राजा होता है । अतः राजा अपनी क्रूरता से तथा देने के लिये उद्यत रह कर प्रजाओं को अपने २ धर्म पर स्थिर रक्खे ॥

स्वाम्यमात्यसुहृत्कोशराष्ट्रदुर्गबलानि च ।

सप्तांगमुच्यते राज्यं तत्र मूर्धा नृपः स्मृतः ॥ ६१ ॥

राजा के ७ अङ्ग का निर्देश- १ राजा, २ मन्त्री, ३ मित्र, ४ बुरे पर बिना भी न्या अर्थ, का दण्ड राजा अप करता है । कोश धर्म ( खजाना ), ५ राष्ट्र ( देश ), ६ दुर्ग ( किला ), ७ सेना, ये राज्य के ७ अङ्ग rai से कहलाते हैं । इनमें राजा को शिर हगमात्यः सुहृच्छ्रोत्रं हस्तौ पादौ दुर्गराष्ट्र और मन्त्री नेत्र, मित्र - कर्ण, हाथ, राष्ट्र दोनों पैर इस भांति से अंगानां क्रमशो वक्ष्ये यैर्गुणैस्तु सुसंयुक्ता माना गया है ॥

मुखं कोशो बलं मनः ।

राज्यांगानि स्मृतानि हि ॥ ६२ ॥

कोश - मुख, बल ( सैन्य ) मन, दुर्ग राज्य के अङ्ग माने गये हैं ।

गुणान् भूतिप्रदान् सदा ।

वृद्धिमन्तो भवन्ति हि ॥ ६३ ॥

अध - दोनों. को प्राप्त करना च अब सदा ऐश्वर्यं देनेवाले अङ्गों के उन गुणों का क्रमशः वर्णन करूँगा । जिनसे भली - भांति युक्त होने पर राजा लोग अभ्युदयशाली हो जाते हैं ॥ उत्पन्न ह राजाऽस्य जगतो हेतुर्बुद्धयै वृद्धाभिसंमतः । अंश से नयनानन्दजनकः शशांक इव तोयधेः ॥ ६४ ॥ कहलाता

' इस जगत् के अभ्युदय ( वृद्धि ) का कारण राजा है, जो प्रजाओं के नेत्रों को आनन्द देनेवाला है । जैसे चन्द्रमा - समुद्र की वृद्धि में कारण है । ' ऐसा वृद्धों काम है | यदि न स्यान्नरपतिः सम्यङ् नेता ततः प्रजाः । अकर्णधारा जलधौ विप्लवेतेह नौरिव ६५ ॥ राज यदि लोक में राजा उत्तम रीति से नेता ( प्रजाओं को अपने २ धर्म चन्द्र, क CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 97

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और राजा -९ ॥ कार्यों से कर बुरे ० ॥ का भी तथा दण्ड ॥ व, ४ कोश के ७ अङ्ग दुर्ग - दोनों 11

न करूँगा ।

हैं ॥

के नेत्रों को ऐसा वृद्ध ॥ २ धर्म प्रथमोऽयायः ११ पर ले चलनेवाला ) न हो तो समुद्र में बिना कर्णधार ( पतवार पकड़ने वाले मल्लाह ) नौका की भांति प्रजा नष्ट हो जाती है ॥

न तिष्ठन्ति स्वस्वधर्मे विना पालेन वै प्रजाः ।

प्रजया तु विना स्वामी पृथिव्यां नैव शोभते ॥ ६६ ॥

बिना राजा के प्रजा अपने २ धर्म में स्थित नहीं रहती है । और पृथ्वी पर बिना प्रजा के राजा भी नहीं शोभित होता है ॥

न्यायप्रवृत्तो नृपतिरात्मानमथ च प्रजाः ।

त्रिवर्गेणोपसंघन्ते निहन्ति ध्रुवमन्यथा ॥ ६७ ॥

न्याय में प्रवृत्त रहनेवाला राजा अपने को तथा प्रजावर्ग को त्रिवर्ग ( धर्मं, अर्थ, काम ) से युक्त करता है । अन्यथा अर्थात् अन्याय में प्रवृत्त रहनेवाला राजा अपने को तथा प्रजावर्ग को त्रिवर्ग से रहित करने से करता है ॥

धर्मा जवनो राजा विधाय बुभुजे भुवम् ।

अधर्माच्चैव नहुषः प्रतिपेदे रसातलम् ॥ ६८

धर्म से पवित्र हुआ राजा पृथ्वी का पालन कर उसका भोग अधर्म से नहुष राजा इन्द्रलोक को प्राप्त करके भी रसातल को

वेनो नष्टस्त्वधर्मेण पृथुर्वृद्धः स्वधर्मतः ।

तस्माद्धर्मं पुरस्कृत्य यतेतार्थाय पार्थिवः ॥ ६६

निश्चय नष्टः ॥ करता है और पहुँच गया ॥ ' ॥ अधर्म से राजा वेन नष्ट हो गया और धर्म से राजा पृथु वृद्धि ( अभ्युदय ) -को प्राप्त हुआ । इससे धर्म को प्रधान कर के ही राजा को अर्थ के लिये प्रयत्न करना चाहिये ॥

यो हि धर्मपरो राजा देवांशोऽन्यश्च रक्षसाम् ।

अंशभूतो घमंलोपी प्रजापीडाकरो भवेत् ॥ ७० ॥

जो धर्म में तत्पर रहनेवाला राजा है वह देवांश ( देवताओं के अंश से उत्पन्न हुआ ) कहलाता है - इससे अन्य अर्थात् अधर्म में तत्पर राजा राक्षसों के अंश से उत्पन्न, धर्म का लोप करनेवाला एवं प्रजा को पीडा पहुँचाने वाला कहलाता है ।

इन्द्रानिलयमाणामग्नेश्च वरुणस्य च ।

चन्द्रवित्तेशयोश्चापि मात्रा निर्हृत्य शाश्वतीः ॥ ७१ ॥

जंगमस्थावराणां च हीशः स्वतपसा भवेत् ।

भागभाग रक्षणे दक्षो यथेन्द्रो नृपतिस्तथा ॥ ७२ ॥

राजा के देवांश होने का निर्देश – इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, चन्द्र, कुबेर इन लोकपालों के निरन्तर रहनेवाले अंशों को अपने में धारण CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 98

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१२ शुक्रनीति:: कर अपनी तपस्या के प्रभाव से राजा स्थावर - जङ्गमात्मक जगत् का स्वामी होता है । और अपने भाग ( कर ) को ग्रहण करनेवाला तथा लोक की रक्षा करने गुणों से में निपुण इन्द्र के समान ही होता है ॥ यदि उक्त

वायुर्गन्धस्य सदसत्कर्मणः प्रेरको नृपः ।

1. धर्मप्रवर्त्तकोऽधर्मनाशकस्तमसो रविः ॥ ७३ ॥

जिस प्रकार से वायु भले - बुरे गन्ध का प्रेरक होता है उसी प्रकार राजा अपन ' भी भले - बुरे कर्म का प्रेरक होता है । एक सूर्य जैसे अन्धकार का नाशक वैसे राजा चाहिये । एवं धर्म का प्रवर्त्तक होता है वैसे राजा भी अधर्म का नाशक तथा धर्म का तथा उन प्रवर्तक होता है ॥ चाहिये ।

दुष्कर्मदण्डको राजा यमः स्याद्दण्डकृद्यमंः ।

अग्निश्शुचिस्तथा राजा रक्षार्थं सर्वभागभुक् ॥ ७४ ॥

. दुष्कर्म का दण्ड देनेवाला होने से राजा यम के समान है । क्योंकि यम जिस भी दुष्कर्म का दण्ड देते हैं । और अग्नि के समान राजा स्वयं शुद्ध तथा लोक- वि - रचार्थं सब लोगों से भाग ( कर या हवि ) ग्रहण कर भोग करने वाला सुन्दर को भी ह होता है ।

पुष्यत्यपां रसैः सर्व वरुणः स्वधनैर्नृपः ।

करैचन्द्रो ह्रादयति राजा स्वगुणकर्मभिः ॥ ७५ ॥

वरुण जैसे जलसंबन्धी रसों से सबको परिपुष्ट करता है वैसे अपने धन से सब का पोषण करता है । चन्द्र जैसे अपनी किरणों से आह्लादित करता है, वैसे ही राजा भी अपने गुण तथा कर्मों से आह्लादित करता है ॥

कोशानां रक्षणे दक्षः स्यान्निधीनां धनाधिपः ।

चद्रांशेन विना सर्वैरंशैनों भाति भूपतिः ॥ ७६ ॥

जैसे कुबेर अपनी निधियों की रक्षा करने में निपुण होता है वैसे अपने कोशों की रक्षा करने में निपुण होता है । यदि चन्द्र का अंश केवल अन्य लोकपालों के अंशों से राजा की शोभा नहीं हो सकती ( अंश ) ग्रहण कर राजा भी जगत् को जिस जगत् को रक्षा करन लिये होन एवं यम राजा भी न हो तो प्रक है अर्थात् चन्द्र के समान आह्लादकस्व गुण राजा में न हो तो अन्य सभी गुण व्यर्थ है अत एव राजा की सार्थकता प्रजा को आह्लाद पहुँचाने से ही होती है ॥ पिता माता गुरुर्भ्राता बन्धुर्वैश्रवणो यमः । जो नित्यं सप्तगुणै रेषां युक्तो राजा न चान्यथा ॥ ७७ ॥ दमन क

७ गुणों से युक्त राजा की प्रजा रंजकता का निर्देश – १. पिता, २. माता, युक्त होन ३. गुरु, ४. भ्राता, ५. बन्धु, ६. कुबेर, ७. यम, इन सातों के वच्यमाण होती है CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection Collectio. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 99

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प्रथमोऽध्यायः १३ स्वामी होता रक्षा करने गुणों से नित्य युक्त होने पर ही वस्तुतः राजा कहलाने योग्य होता है, अन्यथा यदि उक्त गुण न हो तो राजा नहीं कहला सकता है ।

गुणसाधनसंदक्षः स्वप्रजायाः पिता यथा ।

क्षमयित्र्यपराधानां माता पुष्टिविधायिनी ॥ ७८ ॥

अपनी प्रजा ( सन्तान ) को गुणवान बनाने में पिता जैसे निपुण होता है. प्रकार राजा वैसे राजा को भी अपनी प्रजा ( जनता ) को गुणवान बनाने में निपुण होना का नाशक तथा धर्म का ॥ क्योंकि यम तथा लोक करनेवाला से राजा भी से जगत् को जगत् को ॥ से राजा भी शन हो तो ती है अर्थात् गुण व्यर्थ हैं है ॥ ॥ , २. माता, 5 वच्यमाण चाहिये । और जिस प्रकार माता अपनी प्रजा के अपराधों को क्षमा करनेवाली. तथा उनको पुष्ट करनेवाली होती है उसी प्रकार राजा को भी होना, चाहिये ||

' हितोपदेष्टा शिष्यस्य सुविद्याऽध्यापको गुरुः ।

स्वभागोद्धारकृद् भ्राता यथाशास्त्रं पितुर्धनात् ॥ ७६. ॥

जिस प्रकार गुरु अपने शिष्य के लिये हित का उपदेश करनेवाला एवं सुन्दर विद्या को पढ़ानेवाला होता है उसी प्रकार अपनी प्रजा के लिये राजा को भी होना चाहिये । जैसे भ्राता शास्त्रानुसार पिता के धन में से अपने भाग ( अंश ) को ग्रहण करनेवाला होता है वैसे राजा को भी प्रजा से भाग ( कर ). ग्रहण करना उचित है ।

आत्मस्त्रीधनगुह्यानां गोप्ता बन्धुस्तु मित्रवत् ।

धनदस्तु कुबेरः स्याद्यमः स्याश्च सुदण्डकृत् ॥ ८० ॥

जिस प्रकार बन्धु अपने बन्धु के शरीर, स्त्री, धन तथा गुप्त रहस्य की रक्षा करनेवाला मित्र के समान होता है उसी प्रकार राजा को भी प्रजा के लिये होना चाहिये । और आवश्यकता पड़ने पर कुबेर के समान धन देनेवाला. एवं यम के समान अपराधी को यथार्थ दण्ड देनेवाला होना चाहिये ॥

प्रवृद्धिमति सम्राजि निवसन्ति गुणा अमी ।

एते सप्त गुणा राज्ञा न हातव्याः कदाचन ॥ ८१ ॥

प्रकृष्ट बुद्धिवाले श्रेष्ठ राजाओं में ये सभी गुण रहते हैं । अतः राजाओं को उचित है कि इन ७ गुणों को वे कभी भी न छोड़ें ॥

क्षमते योऽपराधं स शक्तः स दमने क्षमी ।

क्षमया तु विना भूपो न भात्यखिलसद्गुणैः ॥ ८२ ॥

जो अपराधों को क्षमा करनेवाला होता है वह ' क्षमाशील ' एवं जो दुष्टों का दमन करनेवाला होता है वह ' शक्तिमान् ' कहलाता है । किन्तु संपूर्ण गुणों से. युक्त होने पर भी राजा यदि उमा से रहित होता है तो उसकी शोभा नहीं होती है । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 100 का मूल पृष्ठ
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२४ शुक्रनीति:

स्वान् दुर्गुणान् परित्यज्य ह्यतिवादांस्तितिक्षते ।

दानैर्मानैश्च सत्कारैः स्वप्रजारंजकः सदा ॥ ८३ ॥

दान्तः शूरश्च शस्त्रास्त्रकुशलोऽरिनिषूदनः ।

अस्वतन्त्रश्च मेधावी ज्ञानविज्ञानसंयुतः ॥ ८४ ॥

नीचहीनो दीर्घदर्शी वृद्धसेवी सुनीतियुक् ।

गुणजुष्टस्तु यो राजा स ज्ञेयो देवतांशकः ॥ ८५ ॥

लोक में । लेने पर है, अर्था जो राजा अपने दुर्गुणों का परित्याग कर निन्दा को सहन करनेवाला, अच कार्यों म -दान, मान तथा सस्कार से अपनी प्रजा को सदा प्रसन्न रखनेवाला, इन्द्रियों कार्यों के को दमन करनेवाला, शूर, शस्त्रास्त्र चलाने में निपुण, शत्रुओं का नाशक, उच्छृङ्खलता से रहित धारणाशक्तिसंपन्न, ज्ञान तथा विज्ञान से युक्त, नीचगुणों -सेवा नीच संगति से रहित, दूरदर्शी, वृद्धों की उपासना करनेवाला, सुन्दर नीति से युक्त, गुणियों से सेवित होता है उसे ' देवांश ' ( देवताओं के अंश से नी उत्पन्न होनेवाला ) समझना चाहिये || विनय क विपरीतस्तु रक्षोंऽशः स व नरकभाजनः । शास्त्रज्ञा नृपांशसदृशो नित्यं तत्सहायगणः किल ॥ ८६ ॥

इन गुणों से विपरीत गुणों वाला राजा ' रतोऽश ' अर्थात् राक्षस के अंश से उत्पन्न हुआ कहलाता है और वह नरकगामी होता है । और राजा जसे अंश का होता है निश्चय उसके सहायकगण ( पार्श्ववर्त्ती मन्त्री इत्यादि ) भी उसी अत अंश वाले होते हैं ॥ तदनन्त तत्कृतं मन्यते राजा संतुष्यति च मोदते । युक्त कर तेषामाचरणैर्नित्यं नान्यथा नियतेर्बलात् ॥ ८७ ॥

और देव के वश से विवश होकर राजा उनके किये हुये कार्यों का अनुमोदन करता है एवं उनके आचरणों से नित्य सन्तुष्ट एवं हर्षित होता है । अन्यथा नहीं होता है अर्थात् भिन्न अंशवाले सहायकों से वैसा सन्तुष्ट नहीं का रहता है ॥ किन्तु अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतकर्मफलं नरैः इ प्रतिकारैर्विना नैव प्रतिकारे कृते सति ॥ ६८ ॥ बिना इ

किये हुये कर्मों का फल मनुष्यों को अवश्य भोगना पड़ता है यदि नहीं रह उसकी निवृत्ति के लिये उपाय न किया जाय । और यदि निवृत्ति के लिये उपाय किया जाय तो नहीं भोगना पड़ता है ॥ तथा भोगाय भवति चिकित्सितगदो यथा । श उपदिष्टेऽनिष्टहेतौ तत्तत्कर्तुं यतेत कः ॥ ८ ९ ॥ नहीं हो जैसे जिस रोग की चिकित्सा होती है, उसकी निवृत्ति का उपाय न करने दमन न पर वह भोग के लिये होता है और उपाय करने पर नहीं होता है । क्योंकि से होन CC - 9. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri