शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 111–120

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 111–120

पृष्ठ 111

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सकर्म है में निपुण । वाले राजा जाती है 1 । चित तर्क-व्यवहार को इनका ३ ॥ ४ ॥ - में धर्म, य का एवं ङ्ग, ऋग् धर्मशास्त्र, 1 गोपालन, न रखने-। प्रथमोऽध्यायः २५ दमको ' दण्ड ' कहते हैं । इससे ( दण्ड देने से ) राजा दण्ड रूप है । उसकी नीति को दण्डनीति कहते हैं । नयन अर्थात् ले जाने से नीति कहते हैं । भावार्थ यह है कि दण्ड नीति से राजनीति का ग्रहण किया है क्योंकि इसी से वह प्रजाओं को अपने २ धर्म की ओर ले जाता है ।

आन्वीक्षिक्यात्म विज्ञानाद्धर्मशोकौ व्युदस्यति ।

उभौ लोकाववाप्नोति त्रय्यां तिष्टन्यथाविधि ॥ १५८ ॥

आन्वीक्षिकीविद्या आत्मज्ञान कराने से हर्ष तथा शोक को दूर करती है । त्रयी विद्या के अनुसार यथाविधि कार्य करता हुआ राजा इहलोक तथा परलोक दोनों में सुख प्राप्त करता है ।

आनृशंस्यं परो धर्मः सर्वप्राणभृतां यतः ।

तस्माद्राजाऽऽनृशंस्येन पालयेत्कृपणं जनम् ॥ १५६ ॥

सब प्राणियों के संबन्ध में क्रूरता न करना ही परम धर्म है | अतः राजा अक्रूरता से दीन - निःसहाय जन का पालन करे ।

नहि स्वसुखमन्विच्छन्पीडयेत्कृपणं - जनम् ।

कृपणः पीड्यमानः स्वमृत्युना हंति पार्थिवम् ॥ १६० ॥

और केवल, अपने सुख की इच्छा से दीनजन को पीडा न पहुँचाये, क्योंकि पीडित किया जाता हुआ दीन अपनी मृत्यु से ( पीड़ा पहुँचाने से ) राजा को नष्ट कर देता है | सुजनैः संगमं कुर्याद्धर्माय च सुखाय च । सेव्यमानस्तु सुजनैर्महानतिविराजते ॥ १६१ ॥.

सुजनों के साथ संगति करने का निर्देश - धर्म और सुख पाने के लिये सुजनों के साथ संगति रखनी चाहिये, क्योंकि सुजनों से सेवित राजा अत्यन्त महत्व को प्राप्त कर सुशोभित होता है ।

हिमांशुमालीव तथा नवोत्फुल्लोत्पलं सरः ।

आनंदयति चेतांसि यथा सुजनचेष्टितम् ॥ १६२ ॥

जैसे चन्द्रमा तथा नवीन खिले कमलोंवाला तालाब लोगों के चित्त को आनन्दित करता है उसी भांति सुजनों का व्यवहार भी आनन्दित करता है ॥ ग्रीष्मसूर्याशु संतप्तमुद्वेजनमनाश्रयम् 1 मरुस्थलमिवोदग्रं त्यजेद् दुर्जनसंगतम् ॥ १६३ ॥

ग्रीष्म ऋतु के सूर्य की किरणों से अत्यन्त संतप्त, उद्वेग पैदा करनेवाला, छाया के लिये वृक्षादि के आश्रय से हीन मरुभूमि की भांति उद्दण्ड दुर्जन की संगति का परित्याग करना चाहिये । निःश्वासोद्गीणहुतभुग् - धूमधूम्रीकृताननैः । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 112

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२६ शुक्रनीति: वरमाशीविषैः संगं कुर्यान्न त्वेव दुर्जनैः निःश्वास से निकले हुये विषाग्नि के धूम से धूमिल साथ रखना अच्छा है किन्तु दुर्जनों का साथ अच्छा नहीं है क्रियतेऽभ्यर्हणीयाय सुजनाय यथांऽजलिः । ततः साधुतरः कार्यो दुर्जनाय हितार्थिना हित चाहनेवाले व्यक्ति के लिये उचित है कि वह जिस सज्जनों के लिये हाथ जोड़ता है उससे अधिक दुर्जन के लिये सुजन से अधिक दुर्जन का संमान उसके प्रसन्नतार्थं करे ।

नित्यं मनोपहारिण्या वाचा प्रह्लादयेज्जगत् ।

उद्वेजयति भूतानि क्रूरवाग्धनदोऽपि सन् ॥

॥ १६४ ॥

मुखवाले सर्पों का ॥। १६५ ॥ प्रकार आदरणीय हाथ जोड़े अर्थात् १६६ ॥ मनोहर वचन बोलने का निर्देश - नित्य मनोहर वचनों से जगत् को आनन्दित करना चाहिये । क्योंकि यदि धन देनेवाला कुवेर के समान भी हो किन्तु क्रूर वाणी बोलने से वह मनुष्यों को उद्विग्न ही करता है ।

sa यथा संतप्यते जनः ।

पीडितोऽपि हि मेघावी न तां वाचमुदीरयेत् ॥ १६७ ॥

पीडित होने पर भी बुद्धिमान व्यक्ति ऐसी वाणी न बोले जिससे सुन वाला व्यक्ति हृदय में बाण से विद्ध हुये की भांति अत्यन्त छटपटाने लगे ।

प्रियमेवाभिधातव्यं नित्यं सत्सु द्विषत्सु वा ।

शिखीव केकां मधुरां वाचं ब्रूते जनप्रियः ॥ १६८ ॥

सज्जन अथवा दुर्जन सभी के साथ सदा मधुर वचन बोलना चाहिये, क्योंकि जो मनुष्य मयूर की भांति प्रिय वचन बोलता है वह जनप्रिय होता है ।

मदरक्तस्य हंसस्य कोकिलस्य शिखंडिनः ।

हरंति न तथा वाचो यथा वाचो विपश्चिताम् ॥ १६६ ॥

मद से युक्त हंस, कोकिल या मयूर को वाणी वैसा मनको नहीं हरण करती है जैसा अच्छे विद्वानों की वाणी ।

ये प्रियाणि प्रभाषते प्रियमिच्छति सत्कृतम् ।

श्रीमन्तो वंद्यचरिता देवास्ते नरविग्रहाः ॥ १७० ॥

जो लोग प्रिय वचन बोलते हैं और अपने प्रिय का सत्कार करना चाहते हैं, ऐसे प्रशंसनीय चरितवाले श्रीमान लोग मनुष्य रूप में देवता ही हैं ॥

नहीदृशं संवननं त्रिषु लोकेषु विद्यते ।

दया मैत्री च भूतेषु दानं च मधुरा च वाक् ॥ १७१ ॥

तीनों लोकों में ऐसा दूसरा कोई वशीकरण नहीं है जैसा कि - प्राणियों पर दया आ की भा सा सज्जनों और उ भृत्य ज वाला वस्तुतः प होकर राजा शीघ्र होता और हैं उन CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 113

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1 सर्पों का आदरणीय दे अर्थात् जगत् को न भी हो 7 । , क्योंकि. । हरण चाहते 1 प्राणियों प्रथमोऽध्यायः २७. पर दया तथा मैत्री का भाव रखना एवं उन्हें अभीष्ट दान देना तथा प्रिय वचन बोलना है, इनसे मनुष्य वशीभूत हो जाता है ।

श्रुतिरास्तिक्यपूतात्मा पूजयेद्देवतां सदा ।

देवतावद् गुरुजनमात्मवच्च सुहृज्जनम् ॥ १७२ ॥

आस्तिकता से पवित्र चित्त होकर सदा देवता की पूजा करे और देवता की भांति गुरुजनों की एवं अपने समान सुहृज्जनों का संमान करें ॥

प्रणिपातेन हि गुरून् सतोऽनू चानचेष्टितैः ।

कुर्वीताभिमुखान्देवान् भूत्यै सुकृत कर्मणाम् ॥ १७३ ॥

साङ्ग - वेदज्ञ ब्राह्मणों से युक्त होकर राजा प्रणामं के द्वारा गुरुजनों तथा सज्जनों एवं देवताओं को अपने अनुकूल करै । इससे पुण्य की वृद्धि होती है और उससे वह सुखी होता है ।

सद्भावेन हरेन्मित्रं सद्भावेन च बांधवान् ।

स्त्रीभृत् प्रेममानाभ्यां दाक्षिण्येनेतरं जनम् ॥ १७४ ॥

सद्भाव से मित्र तथा बान्धवों के, प्रेम तथा मान ( सरकार ) से स्त्री और भृत्य के एवं मनके अनुकूल कार्य करने से मूर्ख के चित्त को अपने वशीभूत करे ।

बलवान्बुद्धिमान्शूरो यो हि युक्तपराक्रमी ।

वित्तपूर्णा महीं भुंके स भूयो भूपतिर्भवेत् ॥

जो राजा बलवान, बुद्धिमान, शूर तथा उचित समय वाला होता है, वह धन से पूर्ण पृथ्वी का उपभोग करता वस्तुतः राजा है । पराक्रमो बलं बुद्धिः शौर्यमेते वरा गुणाः । एभिर्होनोऽन्यगुणयुग्महीभुक् सघनोऽपि च

महीं स्वल्पां नैव भुंक्ते द्रुतं राज्याद्विनश्यति ।

महाधनाश्च नृपतेर्विभात्यल्पोऽपि पार्थिवः ॥

अव्याहताज्ञस्तेजस्वी एभिरेव गुणर्भवेत् राज्ञः साधारणास्त्वन्ये न शक्ता भुप्रसाधने

पराक्रम, बल, बुद्धि, शूरता ये श्रेष्ठ गुण कहलाते हैं ।

१७५ ॥

पर पराक्रम करने-है और वही राजा-॥ १०६ ॥

१७० || ॥। १७८ ॥ इन गुणों से होन होकर यदि इनसे भिन्न गुणों से युक्त भी हो और धनवान भी हो तो वह राजा थोड़ी भी भूमि का स्वामी नहीं होता है और यदि हो तो उसका राज्य शीघ्र नष्ट हो जाता है । महाधनवान् राजा की अपेक्षा छोटा राजा भी सुशोभित होता है क्योंकि पराक्रमादि इन्हीं गुणों से उसकी आज्ञा नहीं टाली जाती है. और वह तेजस्वी होता है । राजा के इससे भिन्न सभी गुण साधारण माने जाते हैं उनसे पृथ्वी - पालन या राज्य का विस्तार नहीं हो सकता है । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 114

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1 २८ शुक्रनीति:

खनिः सर्वधनस्येयं देवदैत्यविमर्दिनी ।

भूम्यर्थे भूमिपतयः स्वात्मानं नाशयत्यपि ॥ १७६ ॥

यह पृथ्वी सब धर्मो की खान तथा देवता और दैत्यों का नाश करा वाली है क्योंकि राजा लोग पृथ्वी के लिये अपने को भी नष्ट कर देते हैं ।

उपभोगाय च धनं जीवितं येन रक्षितम् ।

न रक्षिता तु भूर्येन किं तस्य धनजीवितैः ॥ १८० ॥

जिसने उपभोग करने के लिये अपने धन तथा जीवन की रक्षा की, किन्तु ' पृथ्वी की रक्षा नहीं की, उसके धन तथा जीवन से क्या है अर्थात् कुछ लाभ नहीं है ।

न यथेष्टव्ययायालं संचिते नु धनं भवेत् ।

सदागमाद्विना कस्य कुबेरस्यापि नाञ्जसा ॥ १८१ ॥

चाहे वह कुबेर ही क्यों न हो किसी का भी संचित धन नित्य धनागम के बिना इच्छानुसार व्यय करने के लिये योग्य नहीं होता है अर्थात् एक दिन समाप्त हो जाता है । इसलिये पृथ्वी धन से बढ़कर अन्य कोई धन नहीं है ।

पूज्यस्त्वेभिर्गुणैर्भूपो न भूपः कुलसंभवः ।

नकुले पूज्यते यादृग्वलशौर्य पराक्रमैः ॥

इन पूर्वोक्त गुणों से ही राजा वस्तुतः पूज्य होता है, उत्पन्न होने वैसी केवल से नहीं, क्योंकि जैसी प्रतिष्ठा बल, शूरता और कुल से राजा की प्रतिष्ठा नहीं होती । लक्षकर्षमितो भागो राजतो यस्य जायते वत्सरे वत्सरे नित्यं प्रजानां त्वविपीडनैः सामंतः स नृपः प्रोतो यावल्लक्षत्रयावधि तदूर्ध्वं दशलक्षांतो, नृपो मांडलिकः स्मृतः

तदूर्ध्वं तु भवेद्राजा यावद्विंशतिलक्षकः ।

पंचाशल्लक्षपर्यन्तो महाराजः प्रकीर्तितः ॥

१८२ ॥

राजकुल में केवल पराक्रम से होती है ॥ ॥ १८३ ॥

| ॥ १८४ ॥।

१८५ ॥ राजा के सामन्तादि भेदों का निर्देश - जिसके राज्य से प्रतिवर्ष बिना प्रजा को पीडित किये ही एक लक्ष ( १००००० ) राजत ( चांदी का ) कर्ष ( रूपया ) से लेकर ३ लक्ष तक वार्षिक कर ( मालगुजारी ) मिलता है वह राजा ' सामन्त ' कहलाता है । उसके बाद १० लक्ष पर्यन्त वार्षिक कर मिलने से ' माण्डलिक ' राजा और उसके बाद २० लक्षतक वार्षिक कर मिलने से ' राजा ' कहलाता है एवं ५० लक्ष तक वार्षिक कर मिलने से ' महाराज ' कहलाता है । ततस्तु कोटिपर्यंतः स्वराट् सम्राट् ततः परम् । उस ' स्वराट् ' ' सम्राट् ' इस इसके प्रज स्थित र रा सामन्त सामन्त ज देकर प भ है । किया द जाता ग्रहण CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 115

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कराने किन्तु - कुछ नागम दिन 1 केवल ती है प्रजा • कर्ष वह मिलने ने से हाराज ' प्रथमोऽध्यायः २६ दशकोटिमितो यावद्विराट् तु तदनन्तरम् ॥। १८६ ॥ उसके बाद १ कोटि ( करोड़ ) पर्यन्त वार्षिक आय होने से राजा ' स्वराट् ' कहलाता है और उसके बाद १० कोटि पर्यन्त आय होने से ' सम्राट् ' कहलाता है । उसके बाद ५० कोटि पर्यन्त ' विराट ' कहलाता है ।

पंचाशत्कोटिपर्यंतं सार्वभौमस्ततः परम् ।

सप्तद्वीपा च पृथिवी यस्य वश्या भवेत्सदा ॥ १८७ ॥

इससे अधिक वार्षिक आय होने से राजा ' सार्वभौम ' कहलाता है और इसके सदा अधीन सातो द्वीपों से युक्त संपूर्ण पृथ्वी रहती है । 1

स्वभागभृत्या दास्यत्वे प्रजानां च नृपः कृतः ।

ब्रह्मणा स्वामिरूपस्तु पालनार्थं हि सर्वदा ॥ १८८ ॥

प्रजाओं से अपना वार्षिक कर रूप वेतन स्वीकार करने से स्वामी रूप में स्थित राजा को ब्रह्मा जी ने प्रजाओं के पालनार्थ सदा दास बनाया है ।

• सामन्तादिसमा ये तु भृत्या अधिकृता भुवि ।

तेन सामन्त संज्ञाः स्यू राजभागहराः क्रमात् ॥ १८६ ॥

राजा के द्वारा भूमि का कर संग्रह करने के लिये रखे हुये जो. नौकर सामन्त आदि के तुल्य हैं अर्थात् १ लाख कर संग्रह करते हैं वे ' अनु--सामन्त ' कहलाते हैं |

सामन्तादिपदभ्रष्टास्तत्तुल्यं भृतिपोषिताः ।

महाराजादिभिस्ते तु हीनसामन्तसंज्ञकाः ॥

जो महाराज आदि के द्वारा सामन्त आदि पद से हटाकर देकर पालित होते हैं वे ' हीनसामन्त ' कहलाते हैं । शतंग्रामाधिपो यस्तु सोऽपि सामन्तसंज्ञकः । शतप्रामे चाधिकृतोऽनुसामन्तो नृपेण सः १ ९ ० ॥ उसके तुल्य वेतनः ॥ १६१ ॥

और १०० ग्रामों का जो अधिपति होता है वह भी ' सामन्त ' कहलाता है 1 । और जो राजा द्वारा १०० ग्रामों का कर - संग्रहार्थं वेतन देकर नियुक्त. किया जाता है वह भी ' अनुसामन्त ' कहलाता है ।

अधिकृतो दशग्रामे नायकः स च कीर्तितः ।

च स्वराडपि || १ ९ २ ॥

आशापालोऽयुतप्रामभागभाक् दश ग्रामों का कर - संग्रहार्थं जो अधिकारी ( वेतन देकर ) नियुक्त किया जाता है वह ' नायक ' कहलाता है । और १०००० दश हजार ग्रामों से कर ग्रहण करने वाला ‘ आशापाल ' अथवा ' स्वराट् ' कहलाता है ।

भवेत्क्रोशात्मको ग्रामो रूप्यकर्षसहस्रकः ।

प्रामार्धकं पल्लिसंज्ञं पल्ल्यर्ध कुंभसंज्ञकम् ॥ १६३ ॥

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३० शुक्रनीति: भूमि के मानभेदों का निर्देश - ग्राम १ क्रोश वर्ग का होता है । और उसकी मालगुजारी १००० रजत मुद्रा ( रूपये ) की होती है । ग्राम का आ ' प्रमाण ' पी ' का होता है और पल्ली का आधा प्रमाण ' कुम्भ ' का होता है ।

करैः पंचसहस्त्रैर्वा क्रोशः प्रोक्तः प्रजापतेः ।

हस्तैश्वतुः सहसैर्वा मनोः क्रोशस्य विस्तरः ॥ १६४ ॥

पांच हजार ५००० हाथों का प्रजापति - संबन्धी ' क्रोश ' होता है । और चार हजार ४००० हाथों का विस्तार मनु - सम्बन्धी क्रोश का होता है ।

सार्धं द्विकोटिहस्तैश्च क्षेत्रं क्रोशस्य ब्रह्मणः ।

पंचविंशशतैः प्रोक्तं क्षेत्रं तद्विनिवर्तनैः ॥ १६५ ॥

ढाई ॥ करोड़ हाथों का ब्रह्मा के क्रोश का क्षेत्र होता है । और उसके २५०० विनिवर्त्तनों से क्षेत्र कहलाता है ।

मध्यमामध्यमपर्वदैर्घ्यं यच्चतुरंगुलम् ।

यत्रोदरैरष्टभिस्तु दृष्य स्थौल्यं तु पंचभिः ॥ १६६ ॥

मध्यमा अंगुलि के मध्यम पर्व की भांति लम्बाई १ अंगुल की होती है । और ८ जौ के उदर के समान लम्बाई तथा पांच जौ के उदर की भांति मुटाई 1 बकुल की होती है ।

चतुर्विंशत्यंगुलैस्तैः प्राजापत्यः करः स्मृतः ।

स श्रेष्ठो भूमिमाने तु तदन्यास्त्वधमा मताः ॥ १६७ ॥

वैसी २४ अंगुलियों का १ प्राजापत्य कर ( हाथ ) होता है । और भूमि के नापने में यही श्रेष्ठ होता है, इससे अन्य सभी अधम कहलाते हैं हैं ॥

चतुःकरात्मको दंडो लघुः पंचकरात्मकः ।

तदङ्गुलं पंचयवैर्मानवं मानमेव तत् ॥ १६८ ॥

४ हाथ का जो ' दण्ड ' होता है वह ' लघु ' कहलाता है । और ५ हाथ का ' दण्ड ' दीर्घ ' कहलाता है । और जो ५ जौ का अंगुल होता है वह मानव-मान से होता है ।

वसुषण्मुनिसंख्याकैर्यवैर्दण्डः प्रजापतेः ।

यवोदरैः षट्शतैस्तु मानवो दण्ड उच्यते ॥ १६६ ॥

७६८ यव - प्रमाण ' प्रजापति ' का दण्ड होता है । ६०० यव - प्रमाण ' मानव -दण्ड ' होता है ।

पंचविंशतिभिर्दण्डैरुभयोस्तु निवर्तनम् ।

त्रिंशच्छतैरङ्गुलैर्यवैखिपश्च सहस्रकैः ॥ २०० ॥

२५ पचीस दण्डों का दोनों का निवर्तन होता है । अथवा ३००० अंगुल न्या १५००० यर्वो का उक्त निवर्तन होता है । १२५ २४०० होता है । दोनों २५ होते हैं । ७५०० ' प्राजापत्य ' ३१२ परिवर्तन ह ४८०००० मनु परिव परिवर्तन CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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की गधा है । और प्रथमोऽध्यायः ३१

सपादशतहस्तैश्च मानवं तु निवर्तनम् ।

ऊनविंशतिसाहस्रद्विशतैश्च यवोदरैः ॥ २०१ ॥

१२५ हाथों का मानव निवर्त्तन होता है या १ ९ २०० यवों का होता है ।

चतुर्विंशशतैरेव ह्यंगुलैश्च निवर्तनम् ।

प्राजापत्यं तु कथितं शतैश्चैव करैः सदा ॥ २०२ ॥

२४०० अंगुलों का निवर्त्तन होता है, १०० हाथों का प्राजापत्य निवर्त्तन होता है ।

सपादषट्शतं दंडा उभयोश्च निवर्तने ।

निवर्तनान्यपि सदोभयोर्वै पंचविंशतिः ॥ २०३ ॥

सके दोनों के निवर्त्तन में ६२५ दण्ड होते हैं । उन दोनों के निवर्त्तन सदा २५ होते हैं ।

पंचसप्ततिसाहस्रंरंगुलैः परिवर्तनम् ।

मानवं षष्टिसाहस्रैः प्राजापत्यं तथांगुलैः ॥ २०४ ॥

है । ७५००० अङ्गुलों का ' मानव'- संज्ञक परिवर्तन और ६०००० अङ्गुलों का ' प्राजापत्य ' परिवर्तन होता है ।

पञ्चविंशाधिकैईस्तै रेकत्रिशशतैर्मनोः ।

परिवर्तनमाख्यातं पचविंशशतैः करैः ॥ २०५ ॥

प्राजापत्यं पादहीनचतुर्लक्षयवर्मनोः ।

मि अशीत्यधिक साहस्रचतुर्लक्षयवैः परम् ॥ २०६ ॥

३१२५ हाथों का ' मानव ' परिवर्तन और २५०० हाथों का ' प्राजापत्य ' परिवर्तन होता है । और ३००००० यवों का ' मानव परिवर्तन ' होता है । ४८०००० यर्वो का ' प्राजापत्य परिवर्तन ' होता है । का च. व ल निवर्तनानि द्वात्रिंशन्मनुमानेन तस्य वै चतुःसहस्रहस्ताः स्युर्दंडाश्चाष्टशतानि हि ॥ मनु के मान से ३२ निवर्तनों का ४००० हाथ, और

पचविंशतिभिर्दुडैर्भुजः स्यात्परिवर्तने ।

करैरयुतसंख्याकैः क्षेत्रं तस्य प्रकीर्तितम् ॥

परिवर्तन में २५ दण्डों का भुज होता है १०००० परिवर्तन का क्षेत्र होता है । चतुर्भुजैः समं प्रोक्तं कृष्टभूपरिवर्तनम् प्राजापत्येन मानेन भूभागहरणं नृपः

२०७ ॥

८०० दण्ड होते हैं ।

२०८ ॥

दश हजार हाथों का

|| २०६ ॥

सदा कुर्याच्च स्वायत्तैर्मनुमानेन नान्यथा ।

लोभात् सङ्कर्षयेद्यस्तु हीयते सप्रजो नृपः ॥ २१० ॥

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३२ शुक्रनीतिः जोती हुई भूमि का परिवर्तन ४ भुजों के समान कहा गया है । राजा सदा ' प्राजापत्य ' मान से पृथ्वी के भाग का ग्रहण करै । और आपत्ति - काल में ' मानव ' मान से ग्रहण करे । इससे अन्यथा रीति से भूभाग न ग्रहण करे । यदि लोभवश प्रजा से उक्त नियम से अधिक भूभाग ग्रहण प्रजा सहित हीन हो जाता है ।

न दद्याद् द्वथंगुलमपि भूमेः स्वत्वनिवर्तकम् ।

वृत्त्यर्थं कल्पयेद्वापि यावद्ग्राहस्तु जीवति ॥

और दो अङ्गुल भी भूमि बिना कर की न छोड़े कर लगाकर देवे । अथवा जितने से वह अपनी जीविका चला उसे दे देवे । ऐसा राजा का कर्त्तव्य है ।

गुणी तावद् देवतार्थं विसृजेच्च सदैव हि ।

आरामार्थ गृहार्थं वा दद्याद् दृष्ट्वा कुटुम्बिनम् ॥

गुणवान राजा देवता के मन्दिर या बगीचा - निर्माणार्थं सदा करता है तो वह २११ ॥ अर्थात् सब पर सके उतनी भूमि २१२ ॥ भूमि का बिना कर के दान करे और कुटुम्बी को देखकर उसे गृह - निर्माणार्थं भूमि देवे ।

नानावृक्षलताकीर्णे पशुपक्षिगणावृते ।

सुबहूदकधान्ये च तृणकाष्ठसुखे सदा ॥ २१३

आसिंधु नौगमाकूले नातिदूरमहीधरे ।

सुरम्यसमभूदेशे राजधानीं प्रकल्पयेत् ॥ २१४

राजधानी बनाने योग्य प्रदेश के लक्षण - नाना प्रकार लता से व्याप्त, पशु तथा पक्षिगणों से युक्त, बहुत जल पूर्ण, सदा तृण तथा काष्ठ मिलने की सुविधा से युक्त, समुद्र गमन करने लायक नदी के तट एवं सुरम्य सम भूमिवाले ऐसे राजधानी का निर्माण करे ।

अर्धचन्द्रां वर्तुलां वा चतुरस्रां सुशोभनाम् ।

सप्राकारां सपरिखां ग्रामादीनां निवेशिनीम् ॥

सभामध्यां कूपवापीतडागादियुतां सदा ॥।

के वृक्ष तथा तथा धान्य से पर्यन्त नौका से भूप्रदेश में राजा २१५ ॥ चतुर्दिक्षु चतुर्द्वारां सुमार्गारामवीथिकाम् ॥ २१६ । दृढ सुरालयमठपान्थशालाविराजिताम् कल्पयित्वा वसेत्तत्र सुगुप्तः सप्रजो नृपः ॥ २१७ ॥

देखने में अर्धचन्द्र या गोल या चौकोर आकारवाली, अत्यन्त शोभायमान, प्राकार ( चहारदीवारी ) और परिखा ( खाई ) से युक्त, ग्रामादि बसाने लायक हो और जिसके मध्य में सभा मण्डप हो, एवं सदा, कूप, बावड़ी, तडाग आदि से युक्त, चारों दिशाओं में ४ द्वार बने हुये, सुन्दर मार्ग, बगीचा, CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri गली से युक्त, बनाकर राजा र 5 स श प्र श स घ न राजधानी धानी में राजा अन्दर गोशाल भारों से भ दक्षिण की तर एक भुज तथा गृह हों ) के है । शस्त्र तथा से युक्त परिखा 8 द्वारों से यु बदलते हुये घ सुरक्षित हों, स राजभवन सद वर भ और उसक भोजन खाने - प नि धा गो ३ शु ०

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प्रथमोऽध्यायः ३३ राजा गली से युक्त, मजबूत मन्दिर, मठ, धर्मशाला से सुशोभित ऐसी राजधानी -काल बनाकर करे । वह पर भूमि , राजा उसमें प्रजासहित सुरक्षित रह कर निवास करे ।

राजगृहं सभामध्यं गवाश्वगजशालिकम् ।

प्रशस्तवापीकूपादिजलयन्त्रैः सुशोभितम् ॥ २१८ ॥

सर्वतः स्यात्समभुजं दक्षिणोच्चमुदङ्नतम् ।

शालां विना नैकभुजं तथा विषमबाहुकम् ॥ २१ ९ ॥

प्रायः शाला नैकभुजा चतुःशालं विना शुभा ।

शस्त्रास्त्रघारिसंयुक्तप्राकारं सुष्ठु यन्त्रकम् ॥ २२० ॥

सत्रिकक्ष चतुर्द्वारं चतुर्दिक्षु सुशोभनम् ।

दिवा रात्रौ सशस्त्राखैः प्रतिकक्षासु गोपितम् ॥ २२१ ॥

चतुर्भिः पंचभिः षड्भिर्यामिकैः परिवर्तकैः ।

नानागृहोपकार्याट्टसंयुतं कल्पयेत्सदा ॥ २२२ ॥

बिना राजधानी में राजोचित विविध शालायें बनाने का निर्देश — और राज-धानी में राजा का गृह ऐसा हो कि जिसके मध्य में सभाभवन हो, और उसके भन्दर गोशाला, अश्वशाला तथा गजशाला बनी हो, अच्छी बावड़ी, कूप आदि एवं. फुमारों से भलीभांति सुशोभित हो । और जिसके चारों भुज सम हों एवं जो दक्षिण की तरफ ऊँचा और उत्तर की तरफ नीचा हो, जिसमें शाला के बिना: एक भुज तथा विषम भुज न हो । क्योंकि चतुःशाल ( जिसके चारो तरफ. गृह हों ) के विना अन्य शाला एक भुज होने से शुभदायिका नहीं होती तथासे | शस्त्र तथा अस्त्र के धारण करनेवाले सैनिकों से युक्त, और अच्छे - अच्छे यन्त्रों से से युक्त परिखा तथा चहारदीवारी से घिरा, तीन कक्षाओं एवं चारों दिशाओं में * द्वारों से युक्त, सुन्दर हो और जिसमें दिन - रात शस्त्रास्त्र - धारी प्रहर २ पर. राजा बदलते हुये घूम २ कर पहरा देनेवाले ४, ५ या ६ चौकीदारों से प्रत्येक कक्षायैः सुरक्षित हों, सदा नाना प्रकार के गृह, तम्बू, शामियाना, अटारी से युक्त ऐसा. राजभवन सदा बनावें ।

वस्त्रादिमार्जनार्थं च स्नानार्थ यजनार्थकम् ।

भोजनार्थ च पाकार्थ पूर्वस्यां कल्पयेद् गृहान् ॥ २२३ ॥

और उसमें वस्त्र धोने के लिये और स्नान तथा यज्ञ करने के लिये एवं भोजन खाने - पकाने के लिये पूर्व दिशा में गृहों का निर्माण करे । न साने बी,

निद्रार्थं च विहारार्थं पानार्थं रोदनार्थकम् ।

घरटार्थ दासीदासार्थमेव च ॥ २२४ ॥

उत्सर्गार्थं गृहान्कुर्याद्दक्षिणस्यामनुक्रमात्! गोमृगोष्ट्रगजाद्यर्थं गृहान्प्रत्यक् प्रकल्पयेत् ॥ २२५ ॥:

चा, ३ शु ० CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 120 का मूल पृष्ठ
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३४ शुक्रनीति: और सोने के लिये, विहार, जलपान तथा रोदन करने के लिये, धान्य आदि तथा जांत रखने के लिये, दासी दासों के रहने के लिये एवं मल - मूत्रादि स्याग करने के लिये क्रम से ( सिलसिलेवार ) गृह दक्षिण दिशा में बनवावे । । और गो, मृग, ऊंट, हाथी आदि के लिये पश्चिम दिशा में गृह बनवावे ।

रथवाक्यस्त्रशस्त्रार्थं व्यायामायामिकार्थकम् ।

वस्त्रार्थकं तु द्रव्यार्थं विद्याभ्यासार्थमेव च ॥ २२६ ॥

उदग्गृहान् प्रकुर्वीत सुगुप्तान् सुमनोहरान् ।

यथासुखानि वा कुर्याद् गृहाण्येतानि वै नृपः ॥ २२७ ॥

रथ, घोड़े, अस्त्र, शस्त्र के लिये, कसरत का विस्तार करने के लिये, वन तथा द्रव्य रखने एवं विद्याभ्यास करने के लिये सुरक्षित तथा सुन्दर गृह उत्तर दिशा में बनवावे । अथवा राजा अपनी सुविधा के अनुसार इन सब गृहों को बनवावे |

घर्माधिकरणं शिल्पशालां कुर्यादुदग्गृहात् ।

पंचमांशाधिकोच्छ्राया भित्तिर्विस्तारतो गृहे ॥ २२८ ॥

राजा भवन से उत्तर दिशा की ओर कचहरी और शिल्पशाला ( चित्रादि-गृह ) बनवावे । गृह की लम्बाई से पांचवें भाग के बराबर ऊंची भीत बनवावे ।

कोष्ठविस्तारषष्ठांशस्थूला सा च प्रकीर्तिता ।

एकभूमेरिदं मानमूर्ध्वमूर्ध्वं समं ततः ॥ २२६ ॥

कोठरी के लम्बान से छठां भाग के समान मोटी भीत उठानी चाहिये । यह एक मञ्जिले मकान के लिये मान कहा है । इसके बाद ऊपर - ऊपर के अभ्य मंजिलों का भी इसी भांति समझना चाहिये ।

स्तम्भैश्च भित्तिभिर्वापि पृथक्कोष्ठानि संन्यसेत् ।

त्रिकोष्ठं पचकोष्ठं वा सप्तकोष्ठं गृहं स्मृतम् ॥ २३० ॥

स्तम्भों अथवा भित्तियों से पृथक् कोठरियों को बनवावे । और एक गृह में ३-५ अथवा ७ कोठरियां बनवावे ।

द्वारार्थमष्टधा भक्तं द्वारस्यांशौ तु मध्यमौ ।

द्वौ द्वौ ज्ञेयौ चतुर्दिक्षु धनपुत्रप्रदौ नृणाम् ॥ २३१ ॥

द्वार बनाने के लिये गृह के आठ भाग करके उसमें से बीच के दो भागों में द्वार बनाना चाहिये । इसी भांति से चारो दिशाओं में मध्यम के दो २ भागों में द्वार बनाना चाहिये । ऐसे द्वार मनुष्यों के धन तथा पुत्र देनेवाले होते हैं । ६ उन्हीं भ द्वार बनाना लिये जंगले छ अन्य वि बनाना चाहि भी विद्ध गृह प्र I प्रासाद वेध का विच चतुर्थांश तुल ८ कोई २ हैं । दूसरे जंग f गृह के होनी चाहिये गिर जाय । ज नहीं होना और अप प्राकार ( बर मूलभाग उसकी ऊंचाई CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri