शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 11–20

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 11–20

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सार-हुक " नादि डर " ध्य णा-T: 1 ( & ) एतद्व्याख्या - " एषा वा इति । ज्वलन्ती लोहमयी स्थूणा सुर्मी, सा च कर्णकावती छिद्रवती । अन्तरपि ज्वलन्तीत्यर्थः । तत्समानेयमृक् । एकेन प्रहारेण शतसंख्याकान् मारयन्तः शूराः शततः । असुराणां मध्ये तादृशानेतयर्चा देवा हिंसन्ति । अनया समिदाधानेन शतघ्नीमेनामृचं वज्रं कृत्वा वैरिणं हन्तुं प्रहरति । इति । ( तै ० सं ० का ० १ अ ० ४ अनु ० ७ ) तथा षड्विंशतिशत वर्षेभ्यः प्रागवतीर्णेन महर्षिणा अर्थशास्त्राचार्येण चाणक्येन अस्य च सुवर्णसंशोधनमिषेण तदपसारणे सुर्वाचिकोपयोगित्वं सुवर्णाध्यक्षप्रकरणे उक्तम् । तद्यथा— तु । मूकमूषापूर्ति किट्टः करटकमुखं नालीसन्दंशो म् । जोङ्गनी सुवर्चिकालवणमित्यपसारणमार्गाः । ( २-१४-३२ ) ल- सुर्वाचिकालवणं टंकणक्षार इति केचित् । सुवचिका सुर्वाचिकाख्यः क्षारलवणं प्रतीतमित्यपरे । तदेव सुवर्णमिति श्रेष्ठम् । त्रिपुटकादिना परिवार्य त्रिपुटकच्छायं तदेवेदं सुवर्णमिति वदन्नपहरति । ( प्रतिपदपंचिकायाम् ) अयं पदार्थः वङ्गप्रदेशे प्रचुरमात्रया उपलभ्यते इति ' बङ्गाल साल्ट ' नाम्ना वैज्ञानिकानां परिचितोऽस्ति । तथा च ' गन् पावडर ' वस्तु भारतीयैरज्ञात-नह मासीच्चेत् उपर्युक्तग्रन्थेषु कथमुल्लिख्येत? अतः एतद्वस्तुविषयेऽज्ञातत्वहेतुमपन्यस्य ग्रन्थोऽयं ' पोर्तुगीज ' आक्रमणानन्तरकालिकः इति साधनं स्वरूपासिद्धिरूप- हेत्वा-भास - ग्रस्तमित्यश्रद्धेयम् । किञ्च ऐतिहासिकानां ' बन्दूक ' ' तोप ' विषये— उपर्युक्ता संशोधनरीतिः वास्तविकेतिहासविरुद्धा इति अत्रत्यराजनीतिवर्गसदस्यैः श्रीनटराज-अय्यर एडवोकेट, एम् ०, ए ०, एम ०, एल ० महोदयैरितिहासलेखकानां आर्, सी ० मजुमदार - महाभागानां “ भारतीय सभ्यता " नामकात् ग्रन्थादुद्धृत्य प्रदर्शितम् । ४६० – पृष्ठे – ' ' बन्दूक ' तथा ' गन् पावडर ' का प्रयोग भारतदेश में । १– इसमें कोई सन्देह नहीं कि बन्दूक भारत में पोर्तुगीजों के आने के पूर्व ई ० सन् १४ ९ ८ में सामान्य प्रयोग में थी । 1. Use of Guns and Gunpowder in India. 2. There is no doubt that guns were in common use before the arrival of the Portuguese in India in A. D. 1498. CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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( १० ) २–१३६५–६६ ग्ईसवी के युद्ध में राजा भामिनी ने १३०० तोपें राजा विजयनगरम् महाराज से प्राप्त कीं । इति । * पूर्वकालादारभ्य विवादरत्नाकरादी चण्डेश्वरादिभिः शिष्टैः प्रमाणत्वेन परिगृहीते बृहत्तरशुक्रनीतिसंग्रहेऽस्मिन् शिष्टपरिगृहीते ग्रन्थे मध्ये - मध्ये तत्तत्समये कैश्चित् महाशयैरुपयुक्तदृष्ट्या ते ते विषयाः सन्निवेशिता इति कल्पनापि दृढतरप्रमाणाभावात्तर्कंविचारचातुरीदक्षाणां मीमांसकानां नाभिमता । अतोऽत्रत्याक्षेपाणां निर्मूलत्वात् अस्य ग्रन्थस्य अप्रामाण्यादिकल्पनायां प्रमाणं न पश्यामः । सोऽयं ग्रन्थः ब्रह्मनिर्मित महत्तरनीतिग्रन्थस्य संक्षेपरूपः दुर्लभतां गत आसीत् । तस्य प्रकाशनं महता परिश्रमेण कृत्वा वाराणसीस्थ ' चौखम्बा संस्कृत सीरीज ' — सञ्चालकमहोदयैर्लोकानां पुरतः सोऽयं ग्रन्थः सुलभतां नीतः । अतस्तेषां सर्वविधं मङ्गलं भवत्विति परमेश्वरं प्रार्थये । इति शम् । वाराणसी श्रीगणेशचतुर्थी श्री राजेश्वरशास्त्री द्राविडः वि ० सं ० २०२४ ( तेषामाज्ञया - रा ० शा ० होसमने ) प्राच प्रचलित हैं — पुरा निरुक्त, ज इतनी ही धनुर्वेद, छान्दोग्य में ३२ व स्पष्ट है अन्तर्भाव कौटिल्य १. २. १ a ३. 8 1. "...... in this battle which was fought in 1365-1366 the Bahmani king secured as war - booty A. D., " Vijayanagar Maharaj 1300 cannons from the . " ( THE DELHI SULTANATE by R. C. Majumdar, Page 460. History and Culture People Bhartiya Vidya Bhavan of the Indian , Bombay ). ४. पचमम् विद्याम् ब्र एतद्भगव ५. CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 13

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राजा समये नापि माणं गत स्कृत तेषां प्रस्तावना श्री नारायण मिश्र अध्यापक: संस्कृत पालि - विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय । नीति सागर निष्क्रान्ताः

- कु - प्रज्ञा - मारुतेरिताः ।

पृथक्त्वेनेव दृश्यन्ते नाना - शास्त्र- महोर्मयः ॥

प्राचीन काल से ही विद्या की संख्या के विषय में अनेक मत - मतान्तर प्रचलित हैं । याज्ञवल्क्य स्मृति में १४ विद्याओं का उल्लेख है । उनके नाम हैं — पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्म - शास्त्र, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, छन्दस्, निरुक्त, ज्योतिष, ऋक्, यजुः, साम तथा अथर्ववेद | मनु के मत में भी इतनी ही विद्याएँ मानी गई हैं । विष्णुपुराण ( ३।६।२८ ) में आयुर्वेद, : धनुर्वेद, सङ्गीत - शास्त्र तथा अर्थ- शास्त्र के साथ १८ विद्याओं को माना गया है । ने ) छान्दोग्य उपनिषद् में संक्षेपतः १ ९ विद्याओं का उल्लेख है । शुक्र - नीति - सार " में ३२ विद्याओं का निर्देश तथा उनके लक्षण किए गए हैं । परन्तु इतना तो स्पष्ट है कि किसी मत से किसी मतान्तर का वास्तव विरोध नहीं है, केवल अन्तर्भाव के प्रकार में अन्तर है । अन्तर्भाव की प्रक्रिया का संक्षिप्त रूप हमें कौटिल्य - अर्थ - शास्त्र में उपलब्ध होता है । अर्थ - शास्त्र के उल्लेख के अनुसार १. कामन्दकीय नीति - सार- उपाध्याय - निरपेक्षा - पृ ० ४७ ( आनन्दाश्रम )

२. पुराण - न्याय - मीमांसा - धर्म - शास्त्राङ्ग- मिश्रिताः ।

वेदाः स्थानानि विद्यानाम्...॥ या ० स्मृ ० ११३ ॥

३. अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्याय - विस्तरः ।

धर्म - शास्त्रं पुराणं च विद्यास्त्वेताश्चतुर्दश ॥

( नैषधीयचरित ११४ की ' प्रकाश ' व्याख्या में मनु के नाम से उद्धृत ) ४. ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदं सामवेदम् आथर्वणं चतुर्थम् इतिहास - पुराणं पञ्चमम् वेदानाम् वेदम् पित्र्यम् राशिम् दैवम् निधिम् वाकोवाक्यम् एकायनम् देव-he विद्याम् ब्रह्मविद्याम् भूत - विद्याम् क्षत्र - विद्याम् नक्षत्रविद्याम् सर्प देवजन- विद्याम्

by एतद्भगवोऽध्येमि । छा ० उ ० ७।१।२ ॥

an

५. शुक्रनीतिसार ४ । २६७-३०५ ॥

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पृष्ठ 14

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( १२ ) कौटिल्य चार विद्याओं को मानते हैं - आन्वीक्षिकी, ' 9 त्रयी ( ऋग्, यजुः, साम ) वार्त्ता तथा दण्ड - नीति । कामन्दक तथा महाभारत के आधार पर भी यह मत प्रमाणित है । मानव - सम्प्रदाय के अनुसार त्रयो, " वार्त्ता तथा दण्ड - नीति ये तीन हीं विद्याएँ हैं । इस परम्परा का संकेत रामायण " में भी मिलता है । वृहस्पति - सम्प्रदाय का कथन है कि केवल दो ही विद्याएँ हैं वार्त्ता तथा दण्ड - नीति । परन्तु शुक्राचार्य के अनुसार एक ही विद्या है - दण्ड - नीति । ( यह दण्ड - नीति नीति - विद्या का ही पर्याय है - यह बात आगे बतलाई जायगी । ) इस सम्प्रदाय का कहना है कि दण्ड - नीति के विना किसी भी विद्या की सुरक्षा नहीं हो सकती है । अतः सभी विद्याओं में प्रधान यही है । यह विद्या स्वतः पूर्ण है जब कि अन्यान्य विद्याएँ अपूर्ण अर्थात् आंशिक हैं । यही कारण है कि चार विद्याओं के समर्थक कौटिल्य ने भी इसे सर्वोच्च स्थान ' दिया है । छान्दोग्य उपनिषद् में प्रयुक्त ' एकायन ' शब्द की व्याख्या शंकराचार्य ने की है— एकायनम् " = नीति - शास्त्रम् | इस एकायन शब्द से भी यही सिद्ध होता है कि यह नीति - विद्या सभी विद्याओं में श्रेष्ठ है । महाभारत आदि ग्रन्थों में इसी कारण से इस विद्या की भूयो भूयः प्रशंसा की गई है । अतः यह स्पष्ट है कि नीति - विद्या सभी विद्याओं का मूल अतएव सर्व श्रेष्ठ विद्या है । १. आन्वीक्षिकी त्रयी वार्त्ता दण्डनीतिश्चेति चतस्रः एव विद्याः इति कौटिल्यः । अ ० शा ०, पृ ० १० ( चौखम्बा )

२. आन्वीक्षिकी त्रयी वार्त्ता दण्डनीतिश्च शाश्वती ।

विद्याश्चतस्र एवैताः लोक - संस्थिति हेतवः ॥ का ० नी ० २।२ ॥

३. चातुविद्यञ्च कीर्तितम् - म ० भा ० ( शान्ति पर्व ) ५।१४० ॥

४. त्रयी वार्त्ता दण्ड- नीतिश्चेति मानवाः । अ ० शा ०, पृ ० १० ॥

५. विद्याः तिस्रश्च राघव । वाल्मीकि रामायण ( अयो ० का ० ) १०० ६८ ॥

६. वार्त्ता दण्ड- नीतिश्चेति वार्हस्पत्याः । अ ० शा ०, पृ ० १० ॥

७. दण्ड- नीतिरेका विद्या इत्योशनसाः । तस्यां प्रतिबद्धाः । अर्थ शास्त्र -, पृ ० १० ॥ ८. क्रियैक- देश - बोधीनि शास्त्राण्यन्यानि सन्ति हि । सर्वोपजीवकं लोक - स्थितिकृनीति - शास्त्रकम् । धर्मार्थ - काम - मूलं हि स्मृतं मोक्ष - प्रदं यतः ॥ शु ०

९. तस्यामायत्ता लोक - यात्रा । अ ० शा ०, पृ ० १६ ॥

१०. छा ० उ ० ७ १।२ पर शा ० भा ० ॥

हि सर्व विद्यारम्भाः

नी ० सा ० १।४-५ ॥

' नी ' स्त्रियां परन्तु प्रा तवों की प्रापण ए का कर्त्ता शब्द का विशेष ( ( अप्रेरण वाला ( किया जा व्यक्ति उ निरर्थक कोई य कि अनु परमार्थत अब अधिकारी कि चातुव ' राजनीत स्पष्टतर १. २. ३. ४. CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 15

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साम ) यह नीति है । तथा ति । लाई भी 1 हैं । ख्या द से भारत है । - श्रेष्ठ | भा: ॥ ( १३ ) नीति - विद्या तथा इसके पर्याय ' नीति ' शब्द प्रापण के अर्थ में प्रयुज्यमान नी ( णीञ् प्रापणे ) धातु स्त्रियां ' क्तिन् ' प्रत्यय के द्वारा व्युत्पन्न होता है । अतः इसका अर्थ है ' प्राण ' । परन्तु प्रापण एक सकर्मक क्रिया है अतः इसकी पूर्णता के लिए संक्षेप में चार तवों की आवश्यकता है — कर्त्ता, कर्म; अपादान तथा स्वयम् क्रिया । साथ ही प्रापण एक प्रेरणार्थक क्रिया है अतः इसके दो कर्म होंगे, एक तो अप्रेरणावस्था का कर्त्ता ( प्रयोज्य कर्त्ता ) तथा एक अप्रेरणावस्था का कर्म । एवञ्च ' नीति ' शब्द का स्पष्ट अर्थ है एक मार्ग ( अपादान कारक ) से किसी व्यक्ति-विशेष ( अप्रेरणावस्था का कर्त्ता तथा प्रापण - क्रिया का कर्म ) को दूसरे मार्ग ( अप्रेरणावस्था तथा प्रेरणावस्था का कर्म ) पर ले जाना या पहुंचाना | पहुंच वाला ( अर्थात् इस क्रिया का कर्त्ता ) कौन हो सकता है इसका विवेचन आगे किया जायगा । यह तो विचार करने पर स्पष्ट ही हो जाता है कि यदि कोई व्यक्ति उचित मार्ग पर स्वयम् वर्तमान है तो उसे दूसरे मार्ग पर ले जाना निरर्थक है । मार्गान्तर पर ले जाने की आवश्यकता तो तय होती है यदि कोई व्यक्ति मार्ग - च्युत, अर्थात् अनुचित मार्ग, पर हो । अत एव यह सिद्ध है कि अनुचित मार्ग से किसी व्यक्ति को उचित मार्ग पर ले जाने की क्रिया ही

परमार्थतः ' नीति ' है । अत एव यह कहा गया है-' नयनात् ' नीतिरुच्यते ' ॥

अब हमें यह देखना चाहिए कि इस नीति का कर्त्ता या स्वाभाविक अधिकारी कौन है । नीति - विद्या के अतिद्वय परिष्कारक भीष्म का कथन है कि चातुर्वर्ण्य के धर्म के विप्लव का प्रतिरोध राजा का ही कर्तव्य है । " ' राजनीति प्रकाश ' में उद्धृत ' मत्स्य पुराण ' के कथन से यह अर्थ और भी उ स्पष्टतर हो जाता है । महर्षि याज्ञवल्क्य का भी यही मत है । अन्यान्य १. शु ० नी ० सा ० ११५६ ॥

२. चातुर्वर्ण्यस्य धर्माश्च रक्षितव्या महीक्षिता ।

धर्म - सङ्कर - रक्षा च राज्ञां धर्मः सनातनः । म ० भा ० ( शा ० प ० ) ५७। १५ ॥

३. स्वे स्वे धर्मे व्यवस्थानम् वर्णानां पृथिवीपतेः ।

परो धर्मः सदा प्रोक्तः तत्र यत्नपरो भवेत् ॥

स्वं - धर्म - प्रच्युतान् राजा स्वे स्वे धर्मे नियोजयेत् ।

व्यवस्थानम् = व्यवस्थापनम् । रा ० नी ० प्र ०, पृ ० १२१ ( चौखम्बा ) ॥

४. कुलानि जातीः श्रेणीश्च गणान् जानपदानपि ।

स्व - धर्मात् चलितान् राजा विनीय स्थापयेत्पथि ॥ या ० स्मृ ० १।३६१ ॥

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पृष्ठ 16

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( १४ ) ग्रन्थों में भी इसी का समर्थन किया गया है । अतः यह स्पष्ट है कि प्रापणार्थंक नीति का कर्त्ता है ( प्रधानतः ) राजा । उपर्युक्त विवरण से यह सिद्ध होता है कि यतः राजा का ही यह ' नीति ' कर्त्तव्य है अतः इस ' नीति ' को ' राज - नीति ' या ' राजधर्म ' भी कहा जा सकता है । इस प्रसङ्ग में ' धर्म ' शब्द का अर्थ है ' कर्त्तव्य " । यहाँ यह भी विचारणीय है कि ' नीति ' शब्द के अर्थ के प्रसङ्ग में कहे गए अनुचित मार्ग में अनौचित्य का क्या अर्थ है । एक अनुचित तो वह है जो जिसके लिए विहित नहीं है पर अन्य के लिए विहित है । उदाहरणार्थ, हम तपस्या को ले सकते हैं । यह बहुत ही प्रशस्त आचरण है परन्तु शूद्र के लिए अनुचित है । दूसरे प्रकार का अनुचित उसे कहा जा सकता है जो सर्वथा प्रतिषिद्ध है, जैसे चौर्य, परदाराभिगमन आदि । अनुचित मार्ग के अनुसरण के भी साधारणतः दो कारण होते हैं — अज्ञान तथा भासक्ति । सज्जन तथा दुर्जन दोनों ही कुमार्ग का अवलम्बन कर सकते हैं पर दोनों के अवलम्बन के आधार भिन्न - भिन्न होते हैं । सज्जन के अनुचित मार्गावलम्बन का आधार है ' अज्ञान ' जब कि दुर्जन के प्रसङ्ग में यह आधार है ' आसक्ति ' । यदि ' आसक्ति ' से किसी भी व्यक्ति की प्रवृत्ति अनुचित मार्ग पर होती है तो उसे सज्जन कथमपि नहीं कहा जा सकता है और इसी तरह यदि ' अज्ञान ' से किसी की प्रवृत्ति अनुचित मार्ग की ओर हो जाती है तो उस प्रवृत्ति के आधार पर उसे दुर्जन भी नहीं कहा जा सकता । संक्षेप में अनौचित्य का विवरण यही है । उपर्युक्त अनौचित्य के अवरोध के लिए राजा को उपायों का आश्रयण करना पड़ता है । मनु, ' याज्ञवल्क्य ' आदि के अनुसार ये उपाय चार हैं-साम, दान, भेद तथा दण्ड । मत्स्य पुराण के अनुसार इन चार उपायों के अतिरिक्त भी तीन उपाय हैं — उपेक्षा, माया तथा इन्द्रजाल । यद्यपि ये उपाय प्रधानतः शत्रु - राजाओं के वशीकरण के लिए उपयोगी बतलाए गये हैं तथापि १. धर्म - शब्दश्च कर्त्तव्यता - वचनः - मेधातिथि, धर्म - शब्दोऽत्र दृष्टादृष्टार्थानुष्ठेय - परः - कुल्लूकभट्ट । म ० स्मृ ० ७।१ ॥ २. सामादीनामुपायानां चतुर्णाम्- -म ० स्मृ ० ७ १० ९ ॥ ३. उपायाः साम दानं च भेदो दण्डस्तथैव च ॥ या ० स्मृ ० १।३४६ ॥

४. साम भेदः तथा दानम् दण्डश्च मनुजेश्वर ।

उपेक्षा च तथा माया इन्द्रजालं तथैव च । म ० पु ० २२१।२ ॥

व्यवहार - नि शत्रु का अ या अपना यथायोग्य उपर्य का प्रयोग उपाय का अवगमनीय आश्रित ह प्रकार दान आसक्ति - प से नहीं यह तथ्य इतना तो अनुचित, १. ए व २. त ३. स त ४. य द द न द ५. द य द या द ६. त ज्ञानात् वा CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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( १५ ) र्थिक व्यवहार - निर्वाह के लिए भी इनका महत्व ' साधारण नहीं है । वस्तुतः यदि शत्रु का अर्थ अपकारक है तो अपकारक व्यक्ति - मात्र — चाहे वह पर राजा हो ति ' या अपना पुत्र – शत्रु है । अतः अपकारक व्यक्ति - मात्र के लिए इन उपायों का - जा यथा - योग्य प्रयोग आवश्यक तथा उचित है । उपर्युक्त उपायों में भी व्यवस्था बनी हुई है । सब के लिए सभी उपायों गए का प्रयोग उचित नहीं है । अपराध तथा अपराधी आदि के अनुसार तत्तत् जो उपाय का प्रयोग करना होता है । इस प्रसङ्ग में इतना तो सरलता से ही हम अवगमनीय है कि यदि कोई सज्जन अज्ञान - वश कुमार्ग या मार्गान्तर पर के आश्रित है तो उसे साम मात्र से उचित मार्ग पर लाया जा सकता है । इसी जो प्रकार दान तथा भेद के प्रयोग का भी यथावसर प्रयोग विहित है । परन्तु के आसक्ति - पूर्वक अनुचिताकरण करने वाले दुष्ट को सम्मार्ग पर साम आदि उपायों क्ति । से नहीं लाया जा सकता है, उसके लिए तो एक मात्र समर्थउपाय है ' दण्ड ' । के यह तथ्य दण्ड - शब्द के अर्थ पर ध्यान देने से भी स्पष्ट हो जाता है । हाँ, स्वन इतना तो आवश्यक है कि दण्ड - प्रयोग में अत्यन्त विवेक होना चाहिए । क्ति ' । अनुचित, अर्थात् तीक्ष्ण, दण्ड से प्रजा में आतङ्क फैल जाता है और इससे तो ' से धार चरण यण हैं-यों के उपाय यापि 11 १. एते सामादयः न केवलं राज्य - व्यवहार विषयाः अपितु सकल - लोक-व्यवहार विषयाः । मिताक्षरा, या ० स्मृ ० १।३४६ ॥ २. तत्र साधुः प्रयत्नेन साम - साध्यो नरोत्तम ॥ मत्स्य पुराण २११।४ ॥

३. साम्ना यद्यपि रक्षांसि गृह्णन्तीति परा श्रुतिः ।

तथाऽप्येतदसाधूनाम् प्रयुक्तं नोपकारकम् ॥ म ० पु ० २२१८ ॥

४. यदि ते तु न निष्ठेयुः उपायैः प्रथमैः त्रिभिः ।

दण्डेनैव प्रसह्यैतान् शनकैः वशमानयेत् ॥ म ० स्मृ ० ७।१०८ ॥

दण्डः पूज्य - प्रहीणके —– शु ० नी ० सा ० ४।३५ ॥

न शक्या ये वशे कर्त्तुमुपायत्रितयेन तु ।

दण्डेन तान् वशीकुर्यात् दण्डो हि वशकृन्नृणाम् ॥ म ० पुं ० २२४।१ ॥

५. दण्डो दमनादित्याडुः तेनादान्तान्दमयेत् । गौतम - धर्म - शास्त्र ११।१२८ ॥

यस्माददान्तान्दमयत्य शिष्टान्दण्डयत्यपि ।

दमनाद्दण्डनाच्चैव तस्माद्दण्डं विदुर्बुधाः ॥ म ० भा ० ( शा ० प ० ) १५।८ ॥

यस्माद्दण्डो दमयति अदण्ड्यान् दण्डयत्यपि ।

दमनाद्दण्ड्यनाच्चैव तस्माद्दण्डं विदुर्बुधा ॥ मत्स्य पुराण २२४।१७ ॥

६. तीक्ष्ण - दण्डो हि भूतानामुद्वेजनीयः दुष्प्रणीतः कामक्रोधाभ्याम-ज्ञानात् वानप्रस्थ - परिव्राजकानपि कोपयति किमङ्ग पुनर्गृहस्थान् । अ ० शा ०, पृ ० १६ ( चौखम्बा ) ॥ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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( १६ ) राज्य का मूल शिथिल होने लग जाता है । परन्तु यह समझना चाहिए कि कोई भी दण्ड स्वभावतः तीक्ष्ण या उचित नहीं होता । अपराध तथा देश - काल आदि साथ सामन्जस्य रखने वाला कोई भी दण्ड उचित कहला सकता है और इसके विपरीत होने पर अनुचित या तीक्ष्ण 1 । जैसे — एक हत्यारे के लिए प्राण - दण्ड को तीक्ष्ण नहीं कहा जा सकता. पर यदि एक साधारण चोर को वही दण्ड दिना जाय तो वह अवश्य ही तीचण - दण्ड कहलाएगा । अतः राजा को दण्ड प्रयोग के प्रसङ्ग में अध्यन्त विवेक पूर्ण होना चाहिए । यद्यपि शुक्र नीति - सार में यत्र - तत्र ' अपने राज्य में दण्ड के प्रयोग का प्रतिषेध किया गया है तथापि उसका तात्पर्य अनुचित दण्ड के प्रतिषेध तथा उपायान्तर के सार्थक होने पर दण्ड के प्रतिषेध से है । जहाँ तक उचित दण्ड का प्रश्न है उसका क्षेत्र संकुचित नहीं है । चाहे मित्र हो या शत्रु, अपराध के अनुसार नियमतः दण्ड - भागी होता है । अत एव महाभारत तथा मनु- स्मृति आदि ग्रन्थों में प्रजा - मात्र के प्रति दण्ड का अनुविधान किया गया है । दण्ड के क्षेत्र का निर्देश हमारे महाकवि भारवि के निम्न लिखित श्लोक में बहुत ही स्पष्ट रूप में किया गया है:

। -वसूनि वान्छन्न वशी न मन्युना स्व - धर्म इत्येव निवृत्त - कारणः ।

गुरूपदिष्टेन रिपौ सुतेऽपि वा निहन्ति दण्डेन स धर्म - विप्लवम् ॥

समीक्ष्य सं धृतः सम्यक् सर्वाः रज्जयति प्रजाः ।

असमीक्ष्य प्रणीतस्तु विनाशयति सर्वतः ॥ म ० स्मृ ० ७ । १ ९ ॥

त्रिवर्ग वर्धयत्याशु राज्ञो दण्डो यथा - विधि ।

प्रणीतोऽथा s स ( T ) मन्जस्यात् वनस्थानपि कोपयेत् ॥ का ० नी ० २।३७ ॥

१. स्व - प्रजानां न भेदेन नैव दण्डेन पालनम् । - कुर्वीत साम - दानाभ्याम् सर्वदा यत्नमास्थितः ।

स्व - प्रजा - दण्ड - भेदैश्च भवेद्राज्य - विनाशनम् ।

स्व - प्रजा - दण्डनाच्छ्रेयः कथं राज्ञो भविष्यति ॥

शु ० नी ० सा ० ४ ३८,३ ९, ५२ ॥

२. दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वाः दण्ड एवाभिरक्षति ।

दण्डः सुप्तेषु जागति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः ॥

म ० भा ० ( शा ० प ० ) १५१२; मत्स्य पुराण म ० स्मृ ० ७ १८ ॥ स्व - देशे पर - देशे वा धर्म - शास्त्र - विशारदान् । समीक्ष्य प्रणयेद्दण्डं सर्व दण्डे प्रतिष्ठितम् ॥ मत्स्य ३. किरातार्जुनीय - १।१३ ॥ २२४।१४-१५; तथा पुराण २२४॥४ ॥

CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri किसी स्नातक, माना है । विशेषण स विशेषण से है— चाहे कोई अन्य इस प्रसंग चाहिए-हाँ, दण्ड प्रयोग ' स्व - विषय-है । अन्यन्त्र १. ए माता - पितर धर्मा २.वि न ३ E ३. रा ४. भ i २ शु

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( १७ ) हुए कि किसी स्मृत्यन्तर के प्रामाण्य के आधार पर विज्ञानेश्वर ' ने माता, पिता, तथा स्नातक, पुरोहित, परिव्राजक तथा वानप्रस्थ को दण्ड के क्षेत्र से बहिर्भूत कहला माना है । परन्तु उस स्मृत्यन्तर में ' श्रुत - शील - शौचाचारवन्तः ' इस हेतु - गर्भ -एक विशेषण से और मनु आदि के कथन से यह सिद्ध होता है कि उपर्युक्त द एक विशेषण से हीन होने पर महान् अपराधी कोई भी व्यक्ति दण्डनीय हो सकता T- दण्ड है— चाहे वह स्नातक हो या परिव्राजक । वस्तुतः यदि उक्त विशेषण से सम्पन्न होना कोई अन्य व्यक्ति भी होगा तो उसे दण्ड देने का प्रश्न ही नहीं उठता है । प्रयोग इस प्रसंग में माता पिता आदि को साधारण अपराध का दण्ड नहीं देना तथा चाहिए - इतना माना जा सकता है । - दण्ड हाँ, इस प्रसङ्ग में इतना तो विचारणीय है ही कि शत्रु राजा के विषय में ध के दण्ड- प्रयोग की कटुता का औचित्य कहाँ तक है । विष्णुधर्मोत्तर में वर्णित - स्मृति ' स्व - विषय - दण्ड ' तथा ' पर- विपय - दण्ड ' की विधि में स्पष्ट तारतम्य दीख पड़ता ण्ड के है । अन्यन्त्र भी शत्रु - विषयक- दण्ड की तीक्ष्णता बतलाई गई है । सम्भवतः हुत ही १. एतच्च माता- पित्रादि व्यतिरेकेण । तथा च स्मृत्यन्तरम् - " अदण्ड्यौ माता- पितरी स्नातक - पुरोहित - परिव्राजक - वानप्रस्थाः श्रुत - शील - शौचाचारवन्तः

ते हि धर्माधिकारिणः ” इति । मिताक्षरा ११३५८ ।

१।३७ ॥

५२ ॥

तथा २. पिताऽऽचार्यः सुहृन्माता भार्या पुत्रः पुरोहितः । नादण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्त्रि यः स्वधर्मे न तिष्ठति ।

बह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थश्च भिक्षुकः ।

दण्डस्यैव भयादेते मनुष्याः वत्र्त्मनि स्थिताः ॥

महाभारत ( गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः । उत्पथ - प्रतिपन्नस्य कायं भवति शासनम् ॥ शु ० अपि भ्राता सुतोऽर्थ्यो वा श्वशुरो मातुलोऽपि वा

म ० स्मृ ० ८।३३५ ॥

शा ० प ० ) १५।१२ ॥

नी ० सा ० ४।४७ ॥

नादण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्ति धर्माद्विचलितः स्वकात् ॥

या ० स्मृ ० ११३५८ ॥

आश्रमी यदि वा वर्णी पूज्यो वाऽथ गुरुर्महान् ।

नादण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्ति यः स्वधर्मे न तिष्ठति ॥

मत्स्य पुराण - २२४ । ५ ॥

३. रा ० नी ० प्र ०, पृ ० २ ९ ६ – ३०४ ॥

४. भृश - दण्डश्च शत्रुषु म ० स्मृ ० ७।३२; रिपोः प्रजानां सम्भेदः पीडनं स्व- जयाय वै ॥ शु ० नी ० सा ० ४।३६ ॥ २ शु ० भू ० CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 20

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 20 का मूल पृष्ठ
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( १८ ) मानव - स्वभावागत द्वेष आदि के कारण हुए वैषम्य का ही यथावत् वर्णन शास्त्रों में किया गया है? उपर्युक्त चार प्रधान उपायों में भी मनु ' के अनुसार ' साम ' तथा ' दण्ड ' प्रधान हैं । कुल्लूकभट्ट का कहना है कि धन- सैम्यादि प्रचय - हीन होने के कारण साम प्रशस्त है और दण्ड में धनादि - क्षय होने पर भी फलाधिक्य है अतः दण्ड भी प्रशस्त है । परन्तु कुल्लूकभट्ट के फलातिशय से यह संकेत मिलता है कि दण्ड ही प्रशस्ततर है क्योंकि प्रवृत्ति में उत्कर्ष फलोस्कर्ष - प्रयुक्त ही होना चाहिए । अत एव स्वयम् मनु ने भी अन्यत्र दण्ड को ही सर्वाधिक महत्व दिया है । इसके विपरीत मत्स्य पुराण का कथन है कि ' दान ' ही सर्वोकृष्ट उपाय है । परन्तु यह बहुत उचित नहीं प्रतीत होता है । मेरी दृष्टि से राजनीति से सम्बद्ध ' दान ' में उत्कोच ( Bribe ) का भी समावेश है, यह यज्ञादि - गत विशुद्ध दान नहीं है । दूसरी बात यह है कि दान का क्षेत्र संकुचित है जब कि दण्ड का क्षेत्र असंकुचित । अतः दान की अपेक्षा राजनीति में दण्ड का महत्व अधिक है । अत एव स्वयम् मत्स्य पुराण " ने भी अन्य उपायों के असामर्थ्य में दण्ड के सामर्थ्य का उल्लेख किया है । महाभारत में भी

१. सामादीनामुपायानां चतुर्णामपि पण्डिताः ।

साम - दण्डी प्रशंसन्ति नित्यं राष्ट्राभिवृद्धये । म ० स्मृ ० ७ १० ९ ॥

२. साम्नि प्रयास - धन - व्यय- सैन्य - प्रक्षयादि - दोषाभावात् दण्डे तु तत्सद्भावेऽपि कार्य - सिद्ध्यतिशयात् ॥ कुल्लूकभट्ट -म ० स्मृ ० ७ १० ९ ॥

३. स राजा पुरुषो दण्डः स नेता शासिता च सः ।

• चतुर्णामाश्रमाणां च धर्मस्य प्रतिभूः स्मृतः ॥ म ० स्मृ ० ७११७ ॥

सर्वो दण्ड - जितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्नरः ।

• दण्डस्य हि भयात्सर्वम् जगद् भोगाय कल्पते ॥ म ० स्मृ ० ७ २२ ॥

दण्डे वैनयिकी क्रिया - म ० स्मृ ० ७/६५ इत्यादि ।

४ सर्वेषामप्युपायानां दानं श्रेष्ठ- तमं मतम् ।

सुदत्तेनेह भवति दानेनोभय -लोकजित् । म ० पु ० २२३।१ ॥

इस प्रसङ्ग में यह सम्पूर्ण अध्याय द्रष्टव्य है ।

५. न शक्या ये वशे कर्तुम् उपाय - त्रितयेन तु ।

॥ दण्डेन तान् वशीकुर्यात् दण्डो हिं वशकृन्नृणाम् ॥ वही २२४ । १ ॥

म ० पु ० का यह २२४ अध्याय दण्ड की प्रसंशा में ही पर्यवसन्न है । ६. समस्त पञ्चदश अध्याय ( शान्ति पर्व ) दण्ड- प्रशंसा में ही लिखा गया है तथा अन्यत्र भी दण्ड की अत्यधिक प्रशंसा मिलती है । दण्ड का श्रेष्ठ है । उपय नीतिः नीति विशेष - वा ' नीति ' क को ' दण्ड अथ को दण्ड-चतु पद - वाच्य राज्ञः नी इस का अर्थ स का ही ल समास है है । यह १. २. ३. ४. यहाँ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri