शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 21–30
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 21–30
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( १ ) दण्ड का अत्यधिक माहास्य बतलाया गया है । अतः सभी उपायों में दण्ड ' ' श्रेष्ठ है । होने के उपर्युक्त दण्ड - प्राधान्य की दृष्टि से ही इस ' नीति ' को ' दण्ड - नीति ' ( दण्डेन - अतः ' नीतिः ) कहा जाता है । है नीति को दण्ड - नीति कहने का दूसरा आधार यह है कि दण्ड - शब्द उपाय-होना विशेष - वाचक होने के साथ - साथ उपाय- सामान्य का भी वाचक है । अतः महत्व ' नीति ' के साधन सामादि को दण्ड कहा जा सकता है और उससे साध्य, नीति, को नीति दे - गत को - जब ड का ' दण्ड - नीति ' ( दण्डेन नीतिः ) कहा जा सकता है । अथवा उपाय तथा उपेय - नीति में अभेदोपचार के आधार पर भी ' नीति ' दण्ड - नीति ( दण्ड एव नीतिः ) कहा जा सकता है । तुष्टि यह है कि दण्ड - प्रयोजक राजा भी ' औपचारिक रूप दण्ड-यों के पद- वाच्य हो सकता है इस लिए राजा की नीति को दण्ड - नीति ( दण्डस्य में = राज्ञः नीतिः ) कहा जा सकता 1 भी इस प्रसंग में यह ज्ञातव्य है कि कुछ आचार्यों की दृष्टि में ' नीति ' शब्द का अर्थ सन्मार्ग - प्रापण नहीं है अपितु दण्ड - प्रापण । अतः नीति शब्द दण्ड - नीति का ही लुप्त - पूर्वपद रूप है । इस मत में दण्ड - नीति शब्द में षष्ठी - तत्पुरुष समास है । सम्भवतः आचार्य कौटिल्य ' का समर्थन इसी पक्ष को मिलता वेऽपि
है ।
० ९ ॥
गया यह दण्ड - नीति हमारे दण्ड के स्थान में ही आता है । परन्तु दण्ड एक १. येन सन्दम्यते जन्तुः उपायो दण्ड एव सः ॥ शु ० नी ० सा ० ४१४० ॥ अथवा दण्ड - शब्दोऽत्र दमन - मात्र - वृत्तिः स्व - पर - पक्षद मनोपायाऽशेष -. सामाद्युपग्राही द्रष्टव्यः । का ० नी ० सा ० जय - मङ्गला – पृ ० ५२ ( पूना )
२. दमो दण्ड इति ख्यातः तात्स्थ्याद्दण्डो महीपतिः ।
तस्य नीतिर्दण्डनीतिः - का ० नी ० सा ० २।१२ ॥
दो दण्ड इति ख्यातस्तस्माद्दण्डो महीपतिः ।
तस्य नीतिर्दण्ड - नीतिर्नयनान्नीतिरुच्यते ॥ शु ० नी ० सा ० ११५६ ॥
स राजा पुरुषो दण्डः— म ० स्मृ ० ७ १७ ॥
दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वाः -म ० भा ० ( शान्ति पर्व ) १५२ ॥
३. आन्वीक्षिकी - त्रयी- वार्तानां योगक्षेम - साधनो दण्डः, तस्य नीतिः ।
अ ० शा ०, पृ ० १५ ॥
४. दण्ड - नीतिः स्वधर्मेभ्यचातुर्वण्यं नियच्छति ।
म ० भा ० ( शा ० प ० ) ६ ९ ।७६ ॥
यहाँ दण्डनीति शब्द शास्त्र का वाचक नहीं है । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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( २० ) उपाय है, अतः उसे या उसके प्रापण को राजा का साक्षात् कर्त्तव्य नहीं माना सकता । राजा का कर्त्तव्य तो है ' स्व - स्व- ' धर्म - प्रापण ' ( सन्मार्ग - प्रापण ) ही जा, उसके उपाय के रूप में दण्ड का प्रापण भले ही आता हो । अतः इस अर्थ को अभिव्यक्त करने वाले ' दण्ड - नीति ' शब्द को ' नीति ' ( सन्मार्ग - प्रापण ) का पर्याय नहीं माना जा सकता । साध्य - साधन में अभेदोपचार के आधार पर कहना तो प्रकारान्तर है । अस्तु, प्रकृत ' नीति ' ( सन्मार्ग - प्रापण ) का उद्देश्य है ' अभ्युदय ' । किन्तु भात्माभ्युदय तव तक सर्वाङ्गीण नहीं हो पाता है जब तक पर का अवसाद न ' हो जाय । इसलिए पर - विनाश - पूर्वक आत्माभ्युदय को ' नीति ' का लक्ष्य माना जा सकता है । इस सन्दर्भ में महाकवि माघ का निम्नलिखित कथन द्रष्टव्य है--आम्मोदयः परग्लानिः द्वयं नीतिरितीयती । तदूरीकृत्य कृतिभिः वाचस्पत्यं प्रतायते ॥ अतः यह सिद्ध होता है कि दण्ड अथवा दण्डनीति ( दण्ड - प्रापण ) ' नीति ' ( सम्मार्ग - प्रापण ) और ' नीति ' से ' अभ्युदय ' होता है । अतः अभ्युदय को दण्ड या दण्ड - नीति ( दण्ड - प्रापण ) का भी फल कहा जा सकता है । अत एव सन्मार्गावलम्वन के द्वारा आत्माभ्युदय के प्रसाधक किसी भी तत्व को औपचारिक रूप में दण्ड या दण्ड - नीति ( दण्ड - प्रापण ) माना जा सकता है । उपर्युक्त आत्माभ्युदय के भी दो रूप हैं— ऐहलौकिक तथा पारलौकिक । ऐहलौकिक अभ्युदय पारलौकिक अभ्युदय की भूमिका है । अत एव उचित रीति के द्वारा ऐहलौकिक अभ्युदय - अर्थागम - के प्रयोजक ' वार्ता ' को भी उपचारतः दण्ड - नीति ( दण्ड - प्रापण ) और संक्षेप में ' नीति ' कहा जा सकता १. कुलानि जातीः श्रेणीश्च गणान् जानपदानपि ।
स्व - धर्मात् प्रच्युतान् राजा विनीय स्थापयेत् पथि ।
या ० स्मृ ० १। ३६१ ॥
स्वेषु धर्मेष्ववस्थाप्य प्रजाः सर्वा महीपतिः ।
म ० भा ० ( शा ० प ० ) ६०।१० ॥
इसके स्पष्टीकरण के लिए उद्धरण सं ० १७ भी द्रष्टव्य है ।
२. शिशुपाल वध - २१३० ॥
तुलना कीजिए-नृपस्य परमो धर्मः प्रजानां परिपालनम् ।
दुष्ट - निग्रहणं नित्यं न नीत्या ते विना ह्युभे । शु ० नी ० सा ० १११४ ॥
CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri है । इस ' नीति ' श को हम द सन्निवेश अर्थ हैं — अल का पान यश की भी सत्य वा अतः का फल कहे गए किक अभ जाय तो उक्ति है-तृती दण्ड - प्र १ २. प्रतिपादनी ३. ४ ५
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( २१ ) माना है । इसी लिए याज्ञवल्क्य ने वार्त्ता ' – पशुपालय, वाणिज्य आदि के लिए ) 10 ( ' नीति ' शब्द का प्रयोग किया है । इसी से यह भी सिद्ध है कि वार्त्ता के फल अर्थ को हम दण्ड - नीति ( दण्ड - प्रापण ) का भी फल कह सकते हैं । इस स्थिति के ध्यान से हमें कौटिल्य के द्वारा ' रक्षित सम्वर्धन ' के दण्ड - नीति- फल- प्रसङ्ग में का पर सन्निवेश का अर्थ लग जाता है । अर्थ - शास्त्र में दण्ड - नीति ( दण्ड - प्रापण ) के चार प्रयोजन बतलाए गए हैं— ' अलब्ध - लाभ, लव्ध परिरक्षण, रक्षित - सम्बर्धन तथा सम्वर्धित सम्पत्ति किन्तु का पान में समर्पण । उचित दण्ड प्रयोग से मूर्त्त धन - धान्यादि तथा अमूर्त्त दन माना यश की सम्प्राप्ति होती है । अतः प्रथम फल तो दण्ड - नीति ( दण्ड - प्रापण ) का ही है । द्वितीय फल - लब्ध- परिरक्षण भी दण्ड - प्रापण का ही फल है — यह भी सत्य है । अत एव महाकवि कालिदास का भी कथन है: -यस्मिन् महीं शासति वाणिनीनां निद्रां विहारार्ध - पथे गतानाम् । वातोऽपि नास्रंसयदंशुकानि को लम्बयेदाहरणाय हस्तम् ॥ अतः प्रथम दो को तो हम असन्दिग्ध रूप में दण्ड - नीति ( दण्ड - प्रापण ) का फल मान सकते हैं । यद्यपि ये दोनों फल भी ' नीति ' ( सन्मार्ग - प्रापण ) युदय के ही हैं तथापि औपचारिक रूप में इन्हें दण्ड - नीति ( दण्ड - प्रापण ) के फल अत कहे गए हैं । ये दोनों ही तत्व - अलब्ध - लाभ तथा लब्ध- परिरक्षण - ऐहलौ-को किक अभ्युदय तो हैं ही, यदि इन्हें पारलौकिक अभ्युदय भी मान लिया 1 जाय तो कोई अनुचित न होगा । अत एव गीता में भगवान् श्रीकृष्ण की कक । उक्ति है— चित अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । भी तेषां नित्याभियुक्तानां योग - क्षेमं वहाम्यहम् || ै तृतीय फल है तो ' वार्त्ता ' का परन्तु पूर्व - निर्देशानुसार इसका भी दण्ड - नीति कता ( दण्ड - प्रापण ) के फल के अन्तर्गत निर्देश किया गया है । चतुर्थ- फल का = १ ॥ २४ ॥ १. पालितं वर्धयेन्नीत्या - या ० स्मृ ० ११३१७ नीत्या == वणिक्पथादिकया -- मिताक्षरा । तुलना कीजिए-रक्षितं वर्धयेद्धृद्या २. अलब्ध - लाभार्था प्रतिपादनी च ॥ अर्थ - शास्त्र, ३. रघुवंश - ६७५ ४. दण्ड- नीत्याम् =
५. गीता - ९ ।२२ ।
-म ० स्मृ ० ७ १०१ ॥
लब्ध - परिरक्षणी रक्षित पृ ० १५ ॥।
अर्थ - योग - क्षेमोपयोगिन्याम् ।
॥
- विवर्धनी वृद्धस्य तीर्थेषु मिता ० या ० स्मृ ० १।३११ । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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( २२ ) सम्बन्ध इस दण्ड- नीति ( दण्ड - प्रापण ) से जोड़ना कुछ अधिक अस्पष्ट है । अतः कौटिल्य का फलनिर्देश बहुत उचित नहीं प्रतीत होता है । प्रायः इसी लिए महाभारत ' मनुस्मृति तथा याज्ञवल्क्य स्मृति आदि में दण्ड-( दण्ड - प्रापण ) के दो ही फल - अलब्ध - लाभ तथा लब्ध - संरक्षण- बतलाए गए हैं । दण्ड में प्रयास " का भी समावेश है, अतएव मनुस्मृति तथा याज्ञवल्क्य स्मृति में द्वितीय फल के प्रसंग में क्रमशः ' अवेक्षया ' तथा ' यत्नेन ' जोड़ दिया गया है । परन्तु है तो यह दण्ड - नीति ( दण्ड - प्रापण ) का ही फल । इस ' नीति ' ( सन्मार्ग -प्रापण ) का एक और नामान्तर है ' अर्थ ' -विद्या ' । इसकी पुष्टि इस तथ्य से भी होती है कि इस दण्ड - नीति - शास्त्र को अर्थ- शास्त्र भी कहा गया है, जिसकी चर्चा आगे की जाएगी । इसके अतिरिक्त ' नय शब्द का भी प्रयोग ' नीति - विद्या ' के अर्थ में होता है । उपर्युक्त कथन के आधार पर यह सिद्ध है कि इस नीति - विद्या के नामान्तर हैं: - राज - नीति, राज - धर्म, राज - विद्या, दण्ड - नीति ( दण्डेन - नीतिः अथवा दण्डस्य = राज्ञः नीतिः ), अर्थ - विद्या तथा नय । इसी आधार पर इस विद्या के प्रतिपादक ग्रन्थों के नाम हैं: — नीति - शास्त्र, राज - नीति - शास्त्र, राज - धर्म - शास्त्र ( राज - धर्मानुशासन ), राज - शास्त्र, दण्ड- नीति, दण्ड - नीति - शास्त्र, अर्थ - शास्त्र एवम् नय - शास्त्र । इनमें से हम दण्ड - नीति अर्थ - शास्त्र तथा राज - शास्त्र इन नामकरण का संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत कर रहे हैं: -( क या दण्ड - प्र दण्डनीति ( ख दो फल हैं-फल बतला जाता है । शुक्र - नीति-नीति - शास्त्र इनका पर्या परमावश्यक अर्थ - शास्त्र परन्तु ' बाह दृष्टि से उ पर्याय । अ वास् १. द
१. दण्डनीतिं पुरस्कृत्य विजानन् क्षत्रियः सदा ।
अनवाप्तं च लिप्सेत लब्धं च परिपालयेत् ॥
म ० भा ० ( शा ० प ० ) ६ ९ ।१०३ ॥
२. अलब्धमीहेद्दण्डेन लब्धं रक्षेदवेक्षया ।
रक्षितं वर्धयेद्धृध्या वृद्धं पात्रेषु निक्षिपेत् ॥ म ० स्मृ ० ७१०१ ॥
३. अलब्धमीहेद्धर्मेण लब्धं यत्नेन पालयेत् ।
पालितं वर्धयेन्नीत्या वृद्धं पात्रेषु निक्षिपेत् ॥ या ० स्मृ ० १।३१७ ॥
४. साम्नि प्रयास - धन - व्यय - सैन्य - प्रक्षयादि- दोषाभावात् दण्डे तु तत्सद्भावेऽपि कायं - सिद्धयतिशयात् ॥ कुल्लूक भट्ट, म ० स्मृ ० ७ १० ९ ॥ ५. महाभारत ( द्रोण - पर्व ) ६१ ॥ ६. आन्वीक्षिकी दण्ड- नीतिः तर्क - विद्याऽर्थशास्त्रयोः ॥ अमर - कोश ( शब्दादि बगं ) ७. रघुवंश -४।१०, किरातार्जुनीय - ११७, ९ आदि ।: द द २. प ३. र ४. श्र ५. इ ६. अ अ ४७. क CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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= t: ( २३ ) इसी ( क ) दण्ड - नीति- इस प्रसंग में नीति शब्द का अयं सन्मार्ग - प्रापण नीति या दण्ड - प्रापण नहीं है अपितु प्रख्यापन अथवा ' उपदेश | जिनकी दृष्टि से लाए दण्ड - नीति में प्रयुक्त नीति शब्द प्रापण ( दण्ड - प्रापण ) अर्थ का अभिधायक है तथा उनके मत में इस शास्त्र का नाम होना चाहिए - दण्ड- नीति शास्त्र । हन ' ( ख ) अर्थशास्त्र - हम पहले देख चुके हैं कि दण्ड या दण्ड - नीति के - ही दो फल हैं— अलब्ध - लाभ तथा लब्ध - संरक्षण | अर्थ - शास्त्र के भी ये ही दो फल बतलाए गए हैं । अतएव दण्ड - नीति ( नीति - शास्त्र ) को अर्थ - शास्त्र कहा चा ' । जाता है । यद्यपि नीति - शास्त्र तथा अर्थ- शास्त्र के पर्यायस्व का स्पष्ट संकेत Ta शुक्र - नीति - सार में नहीं है तथापि इसमें किए गए विद्या - परिगणन में य ७ नीति - शास्त्र के पृथक् अनुल्लेख तथा अर्थ - शास्त्र के लक्षण पर ध्यान देने से इनका पर्यायत्व प्रतीत हो जाता है । यतः दण्ड - प्रयोग में धर्म का अनुसन्धान न्तर परमावश्यक बतलाया गया है अतएव महाभारत में धर्म - शास्त्र से अननुमोदित थवा अर्थ- शास्त्र की निन्दा भी की गई है । परन्तु इसका तात्पर्यं उपर्युक्त ही है । के परन्तु ' बार्हस्पत्य- अर्थ - शास्त्र ' में प्रयुक्त अर्थ शब्द का अर्थ व्यापक है और इस दृष्टि से उस अर्थ - शास्त्र का यह अर्थ- शास्त्र या नीति - शास्त्र एक अंश है न कि. शाख पर्याय । अतएव कामन्दक ने कौटिल्य के अर्थ- शास्त्रापरपर्याय नीति - शास्त्र वम् को वार्हस्पत्य अर्थ - शास्त्र का एक अंश माना है । रण ३ ॥ पि i ) १. दण्डनीत्याम् = अर्थ- शास्त्रे - विज्ञानेश्वर - या ० स्मृ ० २।२१ ॥ राजनीतिलक्षणमर्थ - शास्त्रमिह विवक्षितम्-विज्ञानेश्वर - या ० स्मृ ० १।३१३ ॥ ·
दण्डेन नीयते चेदं दण्डं नयति वा पुनः ।
दण्ड- नीतिरिति ख्याता त्रीलोकानभिवर्तते ॥
म ० भा ० ( शा ० प ० ) ५ ९ ७८ ॥
२. पृथिव्या लाभे पालने च यावन्त्यर्थ - शास्त्राणि पूर्वाचार्यैः प्रस्थापितानि
.......। अ ० शां ०, पृ ० १ ।
३. शु ० नी ० सा ० ४।२६७-२७१ ॥
४. श्रुति स्मृत्यनुरोधेन राज - वृत्तं हि शासनम् ।
सुयुक्त्यार्थार्जनं यत्रार्थ - शास्त्रं तदुच्यते ॥ शु ० नी ० सा ० २ ९ ६ - ९ ७ ॥
५. इस प्रसङ्ग में या ० स्मृ ० २।२१ की मिताक्षरा द्रष्टव्य है । ६. अर्थ शास्त्र
- - परो राजा धर्मार्थान्नाधिगच्छति ।
अस्थाने चास्य तद्वित्तं सर्वमेव विनश्यति ॥
म ० भा ० ( शा ० प ० ) ७१।१४
७. का ० नी ० सा ० ११६ ॥
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( २४ ) ( ग ) राज - शास्त्र - म ० म ० काणे ' महाशय का कथन है कि इस शास्त्र का सबसे उचित नाम है ' राज - शास्त्र ' । इसका तात्पर्य यही है कि दण्ड अपने प्राधान्य कारण ' राजा ' या ' शासक ' शब्द से अभिहित होने लगा 1 अतएव दण्ड - प्रख्यापक शास्त्र को राज - शास्त्र कहना उचित ही है । इस दृष्टि के समर्थन में अन्यान्य युक्तियाँ भी स्पष्ट हैं । राजा ऊपर यह बतलाया जा चुका है कि ' नीति ' का अधिकारी है ' राजा ' । हमें राजा शब्द के अर्थ का अनुसन्धान करना चाहिए । राजा शब्द की निष्पत्ति बतलाते हुए यास्क ' ने कहा है कि ' राज दीप्तौ ' धातु से राजा की निष्पत्ति हुई है । इसकी उपपत्ति में निरुक्त के अद्वितीय व्याख्याकार दुर्गाचार्य का कहना है कि यह राजा आठ लोक - पालों की मात्रा से निर्मित शरीर से प्रदी होते रहता है । पाणिनि व्याकरण की दृष्टि से भी ' राज ' धातु से ही ' कनिन् ' प्रत्यय करने से ' राजन् ' शब्द की निष्पत्ति होती है 1 । महाभारत ' में ' रज्ज् ' धातु से राजा की निष्पत्ति मानी गई है । महाकवि कालिदास ने भी इसीका अनुसरण किया है । इसकी व्याख्या में मल्लिनाथ का कथन है कि यद्यपि राजन् शब्द की निष्पत्ति ' राज ' धातु से ही होती है तथापि धातुओं की नानार्थकता की दृष्टि से ' रब्ज् ' धातु से इस शब्द की निष्पत्ति मानी गई है । म ० म ० काणे के द्वारा राज - धर्म - काण्ड से उद्धृत एक वचन के अनुसार १. हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र, पृ ० ४, ( भाग -३ ) २. राजा राजते: - या ० निरुक्त २/३ । ३. दीप्यते ह्यसी पञ्चानां ( अष्टानाम् ) लोकपालानाम् वपुषा । दुर्गाचायं । ४. रञ्जिताश्च प्रजाः सर्वास्तेन राजेति शब्दयते । म ० भा ० ( शा ० प ० ) ५ ९ ।१२५ ।
लोक- रज्जनमेवात्र राज्ञां धर्मः सनातनः ।
म ० भा ० ( शा ० प ० ) ५७।११ ॥
५. राजा प्रकृति - रज्जनात् । रघुवंश ४।१२ ॥
६. यद्यपि राज - शब्दो राजतेः दीप्त्यर्थात् कनिन् - प्रत्ययान्तः न तु
तथाऽपि धातूनाम् अनेकार्थत्वाद् रज्जनात् राजा इत्युक्तम् । मल्लिनाथ रघु ० ४।१२ ॥
७. बलेन चतुरङ्गेण यतो रज्जयति प्रजाः ।
दीप्यमानः स वपुषा तेन राजाऽभिधीयते ॥
हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र, भाग -३, पृ ० २८ ॥
CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri ' राज ' तथ तो राजन राजन् शब जा सकत शार यौगिक, पूर्णतः प्रकार के का सम्बन चार अथ क्षत्रिय जा मीम यजेत ' इ कुमारिल किया है । अर्थ बत अवे प्रयोग की भी ' राज जाति का के आधार १ २ ३ ४ प्रयुञ्जते प सुर राज्ञः क्ष
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( २५ ) इस ' राज् ' तथा ' रज्ज् ' इन दोनों ही धातुओं से राजा की निष्पत्ति होती है । यह क दण्ड तो राजन् शब्द की व्युत्पत्ति को स्थिति हुई । इस व्युत्पत्ति के आधार पर है । राजन् शब्द का प्रयोग किसी भी लोकरञ्जक या दीप्तिमान् पुरुष के लिए किया दृष्टि के जा सकता है । अब हमें इसके प्रवृत्ति - निमित्त की ओर ध्यान देना चाहिए । शास्त्र में शब्द के तीन — यौगिक, रूद तथा योग - रूद — अथवा चार-यौगिक, रूद, योग - रूढ़ तथा यौगिक रूढ़ — प्रकार माने गए हैं । यौगिक शब्द पूर्णतः व्युत्पत्ति - निमित्त तथा प्रवृत्ति निमित्त में सामन्जस्य रखता है । अभ्य 1 अब प्रकार के शब्दों में न्यूनाधिक भाव से व्युत्पत्ति - निमित्त के साथ प्रवृत्ति - निमित्त निष्पत्ति का सम्बन्ध ' रहता भी है और नहीं भी । साधारणतः राजन् शब्द का प्रयोग निष्पत्ति चार अर्थों में प्रसिद्ध है । ये चार अर्थ हैं- प्रजा - पालक मनुष्य- मात्र, का प्रदीप्त कनिन् ' रज्ज् ' ' इसीका ओं की ई है । अनुसार चिायं ।
-१२५ ।
११ ॥
३१२ ॥
२५ ॥
क्षत्रिय जातीय, अभिषिक्त क्षत्रिय तथा प्रशस्त व्यक्ति । मीमांसा दर्शन के अवेष्टयधिकरण ' में ' राजा राज - सूयेन स्वाराज्य- कामो यजेत ' इस वैदिक विधि में प्रयुक्त ' राजा ' शब्द के अर्थ के विवेचन - प्रसङ्ग में कुमारिल भट्ट ने प्रथम अर्थ में राजन् शब्द की लौकिक प्रसिद्धि का उल्लेख किया है | मनु की व्याख्या में कुल्लूक भट्ट आदि ने भी राजन् शब्द का यही बतलाया है । अवेष्टयधिकरण में ही शबरस्वामी ने क्षत्रिय जाति के प्रसङ्ग में राजन् शब्द-प्रयोग की आन्ध्र प्रसिद्धि का उल्लेख किया है 1 । मीमांसा के सिद्धान्त के अनुसार भी ' राजा राजसूयेन यजेत ' इस विधि वाक्य में प्रयुक्त राजन् शब्द क्षत्रिय-जाति का ही वाचक प्रतीत होता है । अत एव महाकवि माघ ने इसी सिद्धान्त के आधार पर युधिष्ठिर के द्वारा राजसूय यज्ञ के अनुष्ठान का समर्थन किया १. अन्यद्धि शब्दानां व्युत्पत्तिनिमित्तम् अन्यच्च प्रवृत्ति - निमित्तम् - विश्वनाथ ।
२. अवेष्टी यज्ञ - संयोगात् ऋतु - प्रधानमुच्यते । पू ० मी ० द ० २।३।३ ॥
३. राज्यस्य कर्त्ता राजेति त्रिषु लोकेषु गीयते । महा - विषयता चैवं शास्त्रस्यापि भविष्यति । तन्त्र - वार्त्तिक । ४. जन - पद - पुर - परिरक्षणवृत्तिमनुपजीवत्यपि क्षत्रि प्रयुञ्जते - शाबर भाष्य २।३।३ । ५. तत्सुराज्ञि भवति स्थिते पुनः कः ऋतु यजतु राज उद्धृतौ भवति कस्य वा भुवः श्रीवराहमपहाय सुराज्ञि = विजय - प्रजा - रक्षणादि - गुण - योगात् शुद्धक्षत्रिये, राज्ञः क्षत्रियस्य, चिह्नम् असाधारणं लक्षणम् - मल्लिनाथ । राज- शब्द मान्धाः - लक्षणम् । योग्यता? शि ० व ० १४।१४ । ...... राज - लक्षणम् = CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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( २६ ) है । महाभारत में सहस्रशः राजन् शब्द ' को क्षत्रिय का पर्याय बतलाया गया है । पाणिनीय अष्टाध्यायी के व्याख्यान के प्रसंग में भी राजन् शब्द का प्रयोग क्षत्रिय जाति के लिए किया गया है । इसका समर्थन वार्त्तिककार के कथन से भी होता है । तृतीय मत के अनुसार राज्याभिषिक्त क्षत्रिय ही राजा है । अत एव मनुस्मृति में क्षत्रियों का ही यह कर्त्तव्य बतलाया गया है । विज्ञानेश्वर भी इसी मत के समर्थक " हैं । मत्स्य पुराण की भी यही सम्मति है । चतुर्थ अर्थ में राजन् शब्द के प्रयोग का निर्देश हमें पाणिनि - सूत्र में तथा आधुनिक व्यवहार में भी मिलता है । उपर्युक्त चार पक्षों में प्रथम पक्ष तो अत्यन्त स्थूल है । राज्य शब्द की व्युत्पत्ति जातिवाची राजन् शब्द से होती है । एवञ्च क्षत्रिय के कर्म से अतिरिक्त जाति के कर्म को राज्य कहना ही जब गौण है तब उस राज्य के अधिकारी क्षत्रियेतर जाति के लिए ' राजा ' शब्द का प्रयोग मुख्य कैसे हो सकता है? प्रजा - पालनादि - स्वरूप राज्य क्षत्रिय का ही कर्म है - यह तो निर्विवाद है । अत एव मनु, ' याज्ञवल्क्य ', महाभारत " आदि ग्रन्थों में अप्रजा-पालन को क्षत्रिय का कृत्य बतलाया गया है । महाभारत में तो एक जगह यह भी बतलाया गया है कि अपने राज्य काल की समाप्ति के बाद भी क्षत्रिय को १. शान्ति - पर्व —६०।२४; ६४ | १ ९; ६३,६४ तथा ६५ अध्यायों में तो क्षात्र धर्म तथा राज - धर्म को बारम्वार पर्याय के रूप में निर्दिष्ट किया गया है । २. पा ० सू ० ५।१।१२४, ४।१।१३७ । ३. पा ० सू ० ४।१।१३७ पर वार्तिक- “ राज्ञो जातावेवेति वक्तव्यम् ” ।
४. ब्राह्मं प्राप्तेन संस्कारं क्षत्रियेण यथाविधि ।
सर्वस्यास्य यथान्यायं कर्त्तव्यं परिरक्षणम् ॥ म ० स्मृ ०.७।२ ॥
५. अभिषेकादि - गुण - युक्तस्य राज्ञः प्रजापालनं परमो धर्मः -- मिताक्षरा - या ० स्मृ ० २१ ॥
६. राज्ञोऽभिषिक्त - मात्रस्य किं नु कृत्यतमं भवेत् । म ० पु ० २१४।१
७. राजा च प्रशंसायाम् - पा ० सू ० ६।२।६३ ॥
८. प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च ।
विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः । म ० स्मृ ० ११८ ९ ॥
९. प्रधानं क्षत्रिये कर्म प्रजानां परिपालनम् । या ० स्मृ ० १।११ ९
१० प्रजाश्च परिपालयेत् । म ० भा ० ( शान्ति पर्व ) ६०।१४ ॥
॥
ही राज्य - प राज्याधिकार अब य अधिकार है क्षत्रिय को शान्ति पर्वा ऐलवायु सम पर ब्राह्मण पृथिवीपालन द्वारा उपेक्षि बात ऐलका है कि राज्य उपर्युक्त राजन्य उ १. स अ ओर भी र य प्र स इस प्रस २. प्र II ३. वि ज ४. ज श ५. प प ६. व ७. य य CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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( २७ ) गया ही राज्य - पद पर प्रतिष्ठित ' करना चाहिए । अतः यह निश्चित है कि यह प्रयोग राज्याधिकार क्षत्रिय का स्वाभाविक है और और अन्य का गौण । कथन अब यहाँ एक प्रश्न उपस्थित होता है कि यदि क्षत्रिय का ही स्वाभाविक अधिकार है राज्य कृत्य तब महाभारत में जो कहा गया है कि ब्राह्मण तथा क्षत्रिय को प्रजापति ने प्रजा का समर्पण कर दिया इसका क्या तात्पर्य है? एव शान्ति पर्वान्तर्गत राजधर्मानुशासन पर्व के बहत्तरवें अध्याय में निर्दिष्ट र भी ऐलवायु सम्वाद से यह प्रतीत होता है कि अग्रजन्मा होने के कारण इस पृथिवी पर ब्राह्मण का प्रथम अधिकार है, परन्तु यतः प्रशस्त ब्राह्मण के लिए पृथिवीपालनार्थ अस्यावश्यक शस्त्रादि - ग्रहण अनुचित है अतः ब्राह्मण - प्रमुख के द्वारा उपेक्षित पृथिवी का अधिकार अनन्तरागत क्षत्रिय पर आता है । यह द की बात ऐलकाश्यप - सम्वाद से भी स्पष्ट होती है । अतः यह प्रतीत होता - से राज्य - कृत्य का व्यावहारिक अधिकार क्षत्रिय पर ही है । अतएव भीष्म न्य के ने उपर्युक्त सम्वाद - द्वय के अन्त में युधिष्ठिर से कहा है कि राष्ट्र का योग - क्षेम हो राजन्य के ऊपर और राजन्य का योग - क्षेम पुरोहित के ऊपर है " । इतना इतो प्रजा-यह को तों I । या ० १. स्थापयित्वा प्रजा - पालं पुत्रं राज्ये च पाण्डव । अन्य - गोत्रं प्रशस्तं वा क्षत्रियं क्षत्रियर्षभः । म ० भा ० ( शा ० प ० ) ६४।१ ९ ॥
और भी देखिए -राजा भोजो विराट् सम्राट् क्षत्रियो भूपतिर्नृपः ।
य एभिः स्तूयते शब्दैः कस्तं नाचितुमर्हति । वही ६८।५४ ॥
प्रजापतिर्हि भगवान् सर्वं चैवासृजज्जगत् । स प्रवृत्ति - निवृत्त्यर्थं धर्माणां क्षत्रमिच्छति । इस प्रसङ्ग में शु ० नी ० सा ० ११३०,४१ आदि २. प्रजापतिहि वैश्याय सृष्ट्वा परिददी पशून् । ब्राह्मणाय च राज्ञे च सर्वाः परिददे प्रजाः ३. विप्रस्य सर्वमेवैतत् यत्कञ्चिज्जगती - गतम् ज्येष्ठेनाभिजनेनेह तद्दर्भ - कुशला विदुः । म ० वही ६५।३० भी द्रष्टव्य हैं । शान्ति पर्व । भा ० ( शा ० ४. ज्या कर्षणं शत्रु - निवर्हणं च कृषिर्वणिज्या पशु - पालनं च ॥
।
६० ३३ ३४ ॥
प ० ) ७२।१० ॥
। शुश्रूषणं चापि तथार्थ हेतोः अकार्यमेतत् परमं द्विजस्य । वही ६३॥१ ॥.
५. पत्यभावे यथैव स्त्री देवरं वृणुते पतिम् ।
एष ते प्रथमः कल्पः आपद्यन्यो भवेदतः । वही ७२।१२ ॥
६. वही ७३।२ ९ -३२ ॥
७. योग - क्षेमो हि राष्ट्रस्य राजन्यायत्त उच्यते ।
योगक्षेमो हि राज्ञो हि समायत्तः पुरोहिते । वही ७४११ ॥
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( २८ ) होने पर भी राज - धर्म का सम्बन्ध जो अन्यान्य जातीय लोगों से जोड़ा ' जाता है उसका कारण इतना ही है कि मध्यम ब्राह्मण आदि अपने कृत्य के सम्पादन असफल होकर जब क्षत्रिय आदि के कृत्य से अपनी जीविका चलाने लगते हैं तो उनके लिए क्षत्रिय आदि के धर्म का अवलम्बन आवश्यक ही है । वस्तुतः प्रजा- पालन का भार ब्राह्मण तथा क्षत्रिय इन दोनों पर है, अत एव दोनों ही राज्य कृत्य के अधिकारी हैं । परन्तु दोनों का क्षेत्र व्यवस्थित है— ब्राह्मण को मन्त्र - वल से तथा राजन्य को याहु - बल एवम् अस्त्र - वल प्रजा १. यद्यपि राजानमधिकृत्य अयं धर्म - कलाप उक्तः तथापि वर्णान्तरस्यापि विषय - मण्डलादि - परिपालनाधिकृतस्यायं धर्मों वेदितव्यः । विज्ञानेश्वर – या ० स्मृ ० १।३६८ ॥ नृप इति न क्षत्रिय - मात्रस्यायं धर्मः किन्तु प्रजा - पालनाधिकृत स्यान्यस्यपीति
दर्शयति । वही २१ ॥
राज- शब्दोऽपि नात्र क्षत्रिय जाति वचनः किन्तु अभिषिक्त-जनपद - पुर - पालयितृ - वचनः । कुल्लूक भट्ट -म ० स्मृ ० इस श्लोक पर मेधातिथि - भाष्य भी द्रष्टव्य है । २. युधिष्ठिर उवाच-व्याख्याता राज- धर्मेण वृत्तिरापत्सु भारत? कथंस्विद्वैश्य - धर्मेण सब्जीवेद् ब्राह्मणो न वा? भीष्म उवाच-अशक्तः क्षत्र- धर्मेण वैश्य धर्मेण वत्र्त्तयेत् । म ० भा ० ( ७। १ ॥ शा ० प ० ) ७८१,२ ॥ ब्राह्मण के लिए शुद्र - कर्म का परिग्रहण सर्वथा प्रतिषिद्ध है । " ब्राह्मणस्य हि आपदि जीवेत् क्षत्रिय धर्मेण इत्यभिधास्यति, वैश्यस्यापि क्षत्रिय - धर्मं शूद्रस्य च क्षत्रिय वैश्य कर्मणी जीवनार्थमापदि जगाद नारदः ” — कुल्लूकं भट्ट -म ० स्मृ ० ७।२ ॥ इस विषय में या ० स्मृ ० ३।३५ की मिताक्षरा भी द्रष्टव्य है । ३. एतत्सर्वं क्षत्रियस्य राज्यं कुर्वतः प्रविहितम् । यदा पुनः अक्षत्रियः क्षत्रियः कार्यं कुर्यात् तदा अनेनाऽपि एवत्सर्वम् अनुष्ठेयम्, “ तत्कार्यापत्त्या तद्धर्म-लाभः ” इति न्यायात् । अपरार्क - या ० स्मृ ० ११३६६ ॥
४. ब्रह्म - क्षत्रमिदं सृष्टमेक - योनि स्वयम्भुवा ।
पृथग्बल - विधानं तद् न लोकं परिपालयेत् ॥
का संरक्षण बाहुबल अ और यही प्रजा - पालन क्षत्रिय ही धर्म है । का उल्लेख शुक्र - नीति-इतना हो भी हुआ ह प्रधानतः र सकता है । यह त और उसके रूप में रा आवश्यकत तप अ ता १. के चा २. र ३. अ ४. ' ३ धराभावे ' द द CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri