शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 121–130
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 121–130
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प्रथमोऽध्यायः ३४
धान्य तत्रैव कल्पयेद् द्वारं नान्यथा तु कदाचन ।
-मूत्रादि वातायनं पृथक्कोष्ठे कुर्याद्यादृक् सुखावहम् ॥ २३२ ॥
शामें उन्हीं भागों में द्वार बनाना चाहिये इससे अन्य भागों में कभी नहीं दिशा में द्वार बनाना चाहिये 1 | और प्रत्येक कोठरियों में सुविधानुसार हवा आने के लिये जंगले बनवावे ।
अन्यगृहद्वारविद्धं गृहद्वारं न चिन्तयेत् ।
वृक्षकोणस्तम्भमार्गपीठकूपैश्च वेधितम् ॥ २३३ ॥
अन्य किसी गृह के द्वार से विद्ध ( वेध खाता हुआ ) गृह का द्वार नहीं बनाना चाहिये । एवं वृत्त, कोण, स्तम्भ, मार्ग बैठने का चबूतरा तथा कूप से स्त्र तथा भी विद्ध गृहद्वार नहीं होना चाहिये ।
उत्तर प्रासादमण्डपद्वारे मार्गवेधो न विद्यते ।
गृ गृहपीठं चतुर्थांशमुद्रा यस्य प्रकल्पयेत् ॥ २३४ ॥
प्रासाद ( राजा या देवता का मन्दिर ) और मण्डप के द्वार में मार्ग के वेध का विचार नहीं करना चाहिये । गृहपीठ का प्रमाण प्रासाद या मण्डप के 11 चतुर्थांश तुल्य होना चाहिये । चित्रादि-भीत
हैं ।
॥
चाहिये । के अभ्य प्रासादानां मण्डपानामर्धांशं वाऽपरे जगुः परवातायनैर्विद्धं नापि वातायनं स्मृतम् कोई २ ऋषि प्रसाद या मण्डप के अद्धांश तुल्य गृहपीठ दूसरे जंगलों से जंगला विंधा हुआ नहीं होना चाहिये । विस्तारार्घाशमभ्योच्चाच्छदिः खर्परसम्भवा पतितं तु जलं तस्यां सुखं गच्छति वाप्यधः हीना निम्ना छर्दिर्न स्यात्तादृक्कोष्ठस्य विस्तरः
।
॥ २३५ ॥
का प्रमाण बताते
।
॥। २३६ ॥
। गृह के विस्तार के अद्धरा के तुल्य खपड़े की छाजन की मूल ऊंचाई होनी चाहिये । जिससे उसके ऊपर गिरी हुई जल की धारा सुखपूर्वक नीचे ॥ • गिर जाय । जैसा कोठरी का विस्तार हो उससे हीन या निम्न उसका छाजन
एक गृह नहीं होना चाहिये ।
स्वच्छ्रायस्यार्धमूलो वा प्राकारः सममूलकः ॥ २३७ ॥
तृतीयांशकमूलो वा ह्युच्छ्रायार्धप्रविस्तरः ।
' उच्छ्रितस्तु तथा कार्यो दस्युभिर्न विलंघ्यते ॥ २३८ ॥
दो ॥ भागों और अपनी ऊँचाई से आधा या समान मूल भाग जिसका है ऐसा के दो २ प्राकार ' ( ' चाहारदीवारी ) होना चाहिये । अथवा ऊंचाई के तृतीयांश के बरा-देनेवाले चर मूलभाग एवं ऊंचाई की आधी चौड़ाई प्राकार की होनी चाहिये । और उसकी ऊंचाई उतनी होनी चाहिये, जिससे डाकू लोग उसे नाघ न सकें । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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३६ शुक्रनीति: यामिर्क रक्षितो नित्यं नालिकास्त्रैश्च संयुतः । सुगवाक्षप्रणालिकः ॥ २३ ९ ॥. स्वहीन सुबहुदृढगुल्मश्च
प्रतिप्राकारो ह्यसमीपमहीधरः ।
परिखा च ततः कार्या खाताद् द्विगुणविस्तरा ॥ २४० ॥
नातिसमीपप्राकारा ह्यगाघसलिला शुभा । राजा के योग्य दुर्ग बनाने का निर्देश — चौकीदारों से नित्य सुरक्षित तथा नालिकास्त्रों ( तोपों ) से युक्त भलीभांति से बहुत से कुशादि के गुच्छे जिस. पर उगे हुये हों और जिसमें सुन्दर रीति से खिड़कियों की नालियां बनी हो, एवं जिसके बाद में उससे छोटा दूसरा प्राकार बना हो और जिसके समीप मैं पर्वत न हो ऐसा प्राकार ( परकोटा ) बनाना चाहिये । और उसके बाद ऐसी परिखा ( खाई ) बनानी चाहिये । जिसकी चौदाई उसको गहराई से दुगुनी हो । और जिसके अत्यन्त समीप में प्राकार ( परकोटा ) न खिंचा हो,
वं जिसमें अगाध जल भरा हो ।
युद्धसाधनसम्भारैः सुयुद्धकुशलैविंना ॥ २४१ ॥
न श्रेयसे दुर्गवासो राज्ञः स्याद् बन्धनाय सः । युद्ध करने के योग्य साधन - सामग्रियों ( शस्त्रास्त्र, गोला, बारूद ) एवं युद्ध में निपुण योद्धाओं के बिना दुर्ग में केवल निवास करना राजा के लिये कल्याणकारक नहीं होता है प्रत्युत उससे उसका बन्धन हो जाता है । ' राज्ञा राजसभा कार्या सुगुप्ता सुमनोरमा त्रिकोष्ठैः पञ्चकोष्ठैर्वा सप्तकोष्ठैः सुविस्तृता दक्षिणोदकथादीघा प्राक्प्रत्यद्विगुणाथवा त्रिगुणा वा यथाकाममेकभूमिर्द्वि भूमिका । त्रिभूमिका वा कर्तव्या सोपकार्याशिरोगृहा परितः प्रतिकोष्ठे तु वातायनविराजिता राजसभा कैसी बनानी चाहिये इसका निर्देश - राजा ॥ २४२ ॥
।
॥ २४३ ॥
॥ २४४ ॥
। ऐसी राजसभा बनवावे, जो भलीभांति सुरक्षित, अत्यन्त सुन्दर दक्षिण से उत्तर की तरफ लम्बी अथवा पूर्व से पश्चिम की तरफ दुगुनी किंवा तिगुनी लम्बी हो ॥ एवं अपनी इच्छानुसार एकमंजिल, दुमंजिल या तीन मंजिल की हो, शौर जिसमें ऊपर के गृह में शामियाना तना हो और जिसके प्रत्येक गृहों में
खिड़कियां हों ।
पार्श्वकोष्ठात्तु द्विगुणो मध्यकोष्ठस्य विस्तरः ॥ २४५ ॥
पञ्चमांशाधिकं त्वौच्चं मध्यकोष्ठस्य विस्तरात् ।
वस्तारेण समं त्वौच्चं पञ्चमांशाधिकं तु वा ॥ २४६ ॥
CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri बगल और उसकी समान होना हि ज प्र ए यदि बगल के २ स्तम्भों के से सुशोभित पहुंचाने वाले ( घड़ी ) एवं विचार करने II श मन्त्री अ तथा सभा होने चाहिये सदा राजभवन ब अ स स सेनानिव अथवा पूर्व से का गृह राजभ क्रमानुसार रा प्र
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प्रथमोऽध्यायः ३७ बगल के कमरे की अपेक्षा मध्य के कमरे का विस्तार दूना होना चाहिये । और उसकी ऊंचाई कमरे के विस्तार से पञ्चमांश अधिक अथवा विस्तार के
समान होना चाहिये ।
॥
त तथा न्छे जिस. हो, समीप बाद हराई से चाहो, यदि कोष्टकानां च भूमिर्वा छदिर्वा तत्र कारयेत् द्विभूमि के पार्श्वकोष्ठे मध्यमं त्वेकभूमिकम् पृथक्स्तम्भान्तसत्कोष्ठा चतुर्मार्गागमा शुभा जोर्ध्वपातयन्त्रैश्व ' युता सुस्वरयन्त्रकैः
वातप्रेरकयन्त्रैश्च यन्त्रैः कालप्रबोधकैः ।
प्रतिष्ठिता च स्वादशैस्तथा च प्रतिरूपकैः ॥
एवविधा राजसभा मन्त्रार्था कार्यदर्शने | ॥ २४७ ॥
।
॥ २४८ ॥
२४६ ॥
। कमरों के ऊपर छत या खपड़ों का छाजन बनाना चाहिये । दुमञ्जिले बगल के कमरे हों तो मध्य का कमरा एक - मञ्जिला होना चाहिये । पृथक् २ स्तम्भों के अन्त में अच्छे कमरों से युक्त, चारों दिशाओं में बने हुए द्वारों से सुशोभित जलयन्त्रों ( फव्वारों ) तथा सुन्दर स्वरवाले बाज से हवा पहुंचानेवाले यन्त्रों ( यन्त्र- चालित, पङ्खों ) से, तथा समयसूचकं यन्त्रों द ) एवं ( घड़ी ) एवं सुन्दर शीशों तथा चित्रों से सुसज्जित इस प्रकार की राजसना
के लिये विचार करने एवं कार्य देखने के लिये होनी चाहिये ।
३ ॥
३ ॥
तथा ३ ॥ होने सदा राजसभा की तरफ हो । एवं हो, और गृहों में · तथाविधामात्यलेख्यसभ्याधिकृत शालिकाः ॥ २५० ॥
कर्तव्याः प्रागुदक्त्वेतास्तदर्थाश्च पृथक्पृथक् ।
शतहस्तमितां भूमिं त्यक्त्वा राजगृहात्सदा ॥। २५१ ॥
मन्त्री आदि के लिये भवन बनाने का निर्देश - इसी प्रकार से मन्त्री, लेख सभा के सदस्य ( कौंसिल के मेम्बर ) तथा अधिकारी पुरुषों के कमरे चाहिये । इन सब कमरों को पूर्वोक्त प्रत्येक कार्यों के लिये पृथक् पृथक् राजभवन से १०० हाथ की दूरी पर बनवाना चाहिये ।
उदग्विशतहस्तां प्राक्सेना संवेशनार्थिकाम् ।
आराद्राजगृहस्यैव प्रजानां निलयानि च ॥। २५२ ॥
सधन श्रेष्ठजात्यानुक्रमतश्च सदा बुधः ।
समन्ताद्धि चतुर्दिक्षु विन्यसेच ततः परम् ॥ २५३ ॥
सेनानिवेश - स्थान तथा प्रजावर्गों के स्थानों का क्रम — राजभवन से उत्तर अथवा पूर्व सेनाओं के रहने के लिये गृह होना चाहिये । उसके बाद प्रजाओं का गृह राजभवन से दूर होना चाहिये । धनिक और उत्तम वंशवालों का ५ ॥ कमानुसार राजभवन के चारो दिशाओं में गृह होना चाहिये । प्रकृत्यनुप्रकृतयो ह्यधिकारिगणस्ततः । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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३८ शुक्रनीति: सेनाधिपाः पदातीनां गणः सादिगणस्ततः ॥
साश्वश्च सगजञ्चापि गजपालगणस्ततः ।
बृहन्नालिकयन्त्राणि ततः स्वतुरगीगणः ॥
ततः स्वगौल्मिकगणो ह्यारण्यकगणस्ततः ।
क्रमादेषां गृहाणि स्युः शोभनानि पुरे सदा ॥
और नगर में प्रकृति ( मन्त्री ), अनुप्रकृति ( मन्त्री के २५४ ॥ २५५ ॥ २५६ ॥ नीचे काम करने घाले ), अधिकारियों ( अफसरों ) के गण, सेनापति, पैदल सिपाहियों का गण घुड़ सवारों का गण, हयशाला, गजशाला और गजपालों ( हस्तिरतर्कों ) का गण, बड़ी २ तोपें, घोड़ियों का गण, गोपालों का गण, आरण्यकों ( जंगली मिल्लादिकों ) का गण इन सबों के लिये क्रम से गृह होने चाहिये ।
पान्थशाला ततः कार्या सुगुप्ता सुजलाशया ।
सजातीयगृहाणां हि समुदायेन पंक्तितः ॥ २५७ ॥
निवेशनपुरे ग्रामे प्रागुदङ्मुखमेव वा ।
सजातिपण्यनिवहैरापणे पण्यवेशनम् ॥ २५८ ॥
धनिकादिक्रमेणैव राजमार्गस्य पार्श्वयोः ।
एवं हि पत्तनं कुर्याद् ग्रामं चैव नराधिपः ॥ २५ ९ ॥
धर्मशाला के निर्माण का निर्देश - और यात्रियों के ठहरने के लिये धर्म-शाला होनी चाहिये जो कि सुरक्षित हो तथा सुन्दर जलाशय ( कूप आदि ) से युक्त हो और जिसमें समान आकारवाले गृहों का समुदाय कतार से हों ऐसे गृह पुर अथवा ग्राम में पूर्व अथवा उत्तर मुख का बनवाने चाहिये । और आपण ( बाजार ) में एक जाति के पण्यों ( बिकनेवाली वस्तुओं ) के समूह से युक्त दुकानें बनवानी चाहिये । धनिकादियों के क्रम से राजमार्ग के दोनों तरफ दुकानें बनवानी चाहिये । इस प्रकार से राजा नगर या ग्राम का निर्माण करावे ।
राजमार्गास्तु कर्तव्याश्चतुर्दिक्षु नृपगृहात् ।
उत्तमो राजमार्गस्तु त्रिंशद्धस्तमितो भवेत् ॥ २६० ॥
मध्यमो विंशतिकरो दशपञ्जकरोऽधमः ।
पण्यमार्गास्तथा चैते पुरप्रामादिषु स्थिताः ॥ २६१ ॥
राजमार्गादि - निर्माण का निर्देश - राजभवन के चारों दिशाओं में राज-मार्ग ( प्रधान सड़क ) बनवाना चाहिये । उत्तम राजमार्ग ३० हाथ चौड़ी होती है । मध्यम २० हाथ चौड़ी, अधम राजमार्ग १५ हाथ चौड़ा होता है । पुर तथा ग्रामादिकों में इन्हीं ३ प्रकार के पण्यमार्ग ( बाजार की सड़कें ) बनाये जाते हैं । घ र ग्राम हाथ चौड़ी 5 प राजा प्रा राजमार्ग बन सकता है । a व राजधान ६ योजन ( चौड़ी सड़क सड़क ) बन संज्ञक राजमा ग्रामवा पीठ की भांत चाहिये । औ तरफ नालिय और ज हो । और ग गृहों की दो CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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हाथ करने का गण, प्रथमोऽध्यायः II
करत्रयात्मिका पद्या वीथिः पञ्चकरात्मिका ।
मार्गे दशकरः प्रोक्तो प्रामेषु नगरेषु च ॥ २६२ ॥
ग्राम और नगरों में पद्या ( पगडण्डी ) ३ हाथ चौड़ी, वीथि ( गली ) ५. चौड़ी और मार्ग १० हाथ चौड़ा बनाया जाता है ।
प्राक्पश्चाद्दक्षिणोदक्तान् याममध्यात् प्रकल्पयेत् ।
पुरं दृष्ट्वा राजमार्गान्सुबहून्कल्पयेन्नृपः ॥ २६३ ॥
राजा ग्राम के मध्य भाग से पूर्व से पश्चिम और दक्षिण से उत्तर जाने वाले ) का राजमार्ग बनवावे । और उन्हें नगर के अनुसार बहुत सा भी बनवा जंगली सकता है ।
नवीथि न च पद्यहि राजधान्यां प्रकल्पयेत् ।
' षड्योजनान्तरेऽरण्ये राजमार्ग तु चोत्तमम् ॥ २६४ ॥
कल्पयेन्मध्यमं मध्ये तयोर्मध्ये तथाघमम् ।
दशहस्तात्मकं नित्यं ग्रामे ग्रामे नियोजयेत् ॥ २६५ ॥
राजधानी में पद्या ( पगडण्डी ), वीथि ( गली ) नहीं बनवानी चाहिये । ६ योजन ( २४ क्रोश ) के अन्तर पर जङ्गल में उत्तम राजमार्ग ( ३० हाथ चौड़ी सड़क ) बनवाना चाहिये । मध्य में मध्यम राजमार्ग ( २० हाथ चौड़ी सड़क ) बनवाना चाहिये । उन दोनों के मध्य में दश हाथ चौड़ाई का अधम-आदि ) संज्ञक राजमार्ग प्रत्येक ग्राम में सदा बनवाना चाहिये । से हों चाहिये । eit ) $ राजमार्ग या ग्राम पीठ
कूमष्पृष्ठा मार्गभूमिः कार्या ग्राम्यैः सुसेतुका ।
कुर्यान्मार्गान्पार्श्वखाताग्निर्गमार्थं जलस्य च ॥ २६६ ॥
ग्रामवालों को अपने २ ग्राम की सड़कों की भूमि का आकार कछुये की की भांति बनवाना चाहिये । और उसमें आवश्यकतानुसार पुल भी होना चाहिये 1 । और ऐसे मार्ग बनवाने चाहिये, जिसमें जल वहने के लिये दोनों तरफ नालियां बनी हों । 1 में राज-थ चौड़ी होता है । सड़कें ) हों ।
राजमार्गमुखानि स्युर्गृहाणि सकलान्यपि ।
गृहपृष्ठे दासवीथिं मलनिर्हरणस्थलम् ॥
पंक्तिद्वयगतानां हि गेहानां कारयेत्तथा ।
मार्गान्सुधाकरैर्वा घटितान्प्रतिवत्सरम् ॥
अभियुक्तनिरुद्धैर्वा कुर्याद् ग्राम्यजनैर्नृपः । और जितने गृह हों उनके सभी सुख ( प्रधान द्वार ) और गृह के पिछवारे नौकरों के आने - जाने के लिये गली २६७ ॥ २६८ ॥ राजमार्ग की तरफ. एवं पाखाना हो । गृहों की दो पतियों के बीच में ओ रास्ते हों उन्हें प्रतिवर्ष चूना - कङ्कर CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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४० शुक्रनीति: आदि डालकर मरम्मत कराते रहना चाहिये । राजा इसे ग्रामवालों से या
कैदियों से ठीक करावे ।
ग्रामद्वयान्तरे चैव पान्थशाला प्रकल्पयेत् ॥ २६ ९ ॥
नित्यं सम्मार्जितां चैष ग्रामपैश्च सुगोपिताम् ।
तत्रागतं तु संपृच्छेत्पान्थं शालाधिपः सदा ॥। २७० ॥
प्रयातोसि कुतः कस्मात्क गच्छसि ऋतंवद ।
ससहायोऽसहायो वा सशस्त्रः किं सवाहनः ॥ २७१ ॥
का जातिः किं कुलं नाम स्थितिः कुत्रास्ति ते चिरम् ।
इति पृष्ट्वा लिखेत्सायं शस्त्रं तस्य प्रगृह्य च ॥ २७२ ॥
सावधानमना भूत्वा स्वापं कुर्विति शासयेत् ।
तन्त्रस्थान्गणयित्वा तु शालाद्वारं पिधाय च ॥। २७३ ॥
संरक्षयेद्यामिकैश्च प्रभाते तान् प्रबोधयेत् ।
शस्त्रं दद्याच्च गणयेद् द्वारमुद्वाट्य मोचयेत् ॥ २७४ ॥
कुर्यात्सहायं सीमान्तं तेषां । ग्राम्यजनस्सदा । धर्मशाला की व्यवस्था — और दो ग्रामों के बीच में १ धर्मशाला बनवानी चाहिये जिसकी नित्य सफाई और रक्षा का प्रबन्ध ग्राम के जमीनदार या सुखिया के द्वारा होनी चाहिये । धर्मशाला का प्रबन्धक वहां ठहरे हुये यात्री से यह पूछे कि- - यह सच बताओ कि तुम कहां से आये हो? क्यों आये हो? और कहां जा रहे हो? क्या तुम्हारे कोई साथी है या अकेले हो? क्या शस्त्र या सवारी कोई तुम्हारे पास है? तुम्हारी कौन जाति है? तुम किस वंश के हो? । तुम्हारा क्या नाम है? तुम अधिकतर कहां रहते हो अर्थात् तुम्हारा गृह कहां है । ये सब बातें सायंकाल को पूंछ कर लिखे और यात्रियों के श अपने पास रख सावधान - मन होकर ' शयन करो ' ऐसा कहकर यात्रियों पर शासन रखे । एवं वहां पर आये हुये यात्रियों की सायंकाल में गणना कर धर्मशाला के प्रधान द्वार को बन्द कर चौकीदारों से रात्रिभर रक्षा करावे । और प्रातःकाल यात्रियों को जगावे एवं उनके शस्त्रों को लौटाकर पुनः यान्त्रियों की गणना करे और फाटक खोलकर उन्हें बाहर कर दे । और ग्राम के
जाकर यात्रियों की सदा रक्षा करें ।
प्रकुर्याद्दिनकृत्यं तु राजधान्यां वसन्नृपः ॥
उत्थाय पश्चिमे यामे मुहूर्त द्वितयेन वै ।
नियतायश्च कत्यस्ति व्ययश्च नियतः कति ॥
कोशभूतस्य द्रव्यस्य व्ययः कति गतस्तथा ।
व्यवहारे मुद्रितायव्ययशेषं कतीति च ॥
लोग सीमा तक २७५ ॥ २७६ ॥ २७७ || राजाओ निम्नरीति स - व्यय ( खर्च - व्यवहार में लेख से जांच उतना द्रव्य -तक मल - मू -दान करने स समझ - सदा धान्य लिखने एवं और राजा विश्राम करे और प्राड्विवाक के देखने म · क्रीडन ( CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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प्रथमोऽध्यायः ४१
से या प्रत्यक्षतो लेखतश्च ज्ञात्वा चाद्य व्ययः कति ।
भविष्यति च तत्तुल्यं द्रव्यं कोशान्त निर्हरेत् ॥ २७८ ॥
राजाओं के आवश्यकीय दैनिक कृत्य – राजधानी में रहता हुआ राजा निम्नरीति से प्रतिदिन के कार्यों को करे । जैसे रात्रि के चतुर्थ प्रहर में दो मुहूर्त तक आज का कितना नियत आय ( आमद ) है और कितना नियत -व्यय ( खर्च ) है? खजाने में रखे हुए द्रव्य में से कितना - व्यवहार में मुद्रित आय - व्यय होने पर कितना शेष है । यह लेख से जांचकर आज कितना व्यय होगा अतः उसके उतना द्रव्य निकलवा कर अलग रख दे ।
पश्चात्तु वेगनिर्मोक्षं स्नानं मौहूर्तिकं मतम् ।
सन्ध्या पुराणदानैश्च मुहूर्तद्वितयं नयेत् ॥
मुहूतों के विभाग द्वारा राजा के कार्यों का निर्देश — जन्य व्यय हुआ, बात प्रत्यक्ष तथा अनुसार खजाने से २७६ || इसके बाद १ मुहूर्त्त कमल - मूत्रादि का परित्याग और स्नान करे । सन्ध्या कृत्य, पुराणश्रवण और -दान करने में दो मुहूर्त्त तक समय दे ।
वनवानी पारितोषिकदानेन मुहूर्त तु नयेत्सुधीः ।
मुखिया धान्यववस्वर्णरत्नसेनादेशविलेखनैः ॥ २८० ॥
यह पूछे सायव्ययैमुहूर्तानां चतुष्कं तु नयेत्सदा ।
? और स्वस्थचित्तो भोजनेन मुहूर्त ससुहन्नृपः ॥ २८ ९ ॥
स्त्रिया समझदार राजा पारितोषिक ( इनाम ) देने का कार्य १ मुहूर्त्त तक करे । हो? | - सदा धान्य, वस्त्र, सुवर्ण, रत्नों के देखने और सेना के लिये आदेश ( हुक्म ) ह कहां लिखने एवं आय - व्यय के निरीक्षण में: मुहूर्त्त तक समय व्यतीत करे । अपने और राजा अपने मित्रों के साथ भोजन करके १ मुहूर्त तक स्वस्थ चित्त हो शासन विश्राम करे ।
शाला के प्रत्यक्षीकरणाज्जीर्णनवीनानां मुहूर्तकम् ।
ातःकाल ततस्तु प्राड्विवाकादिबोधितव्यवहारतः ॥ २८२ ॥
गणना मुहूर्त चै मृगयाक्रीडनैर्नयेत् ।
मा तक व्युहाभ्यासैर्मुहूर्त तु मुहूर्त सन्ध्यया ततः ॥ २८३ ॥
मुहूर्त भोजनेनैव द्विमुहूर्तं च वार्तया ।
गूढचारैः श्रावितया निद्रयाष्टमुहूर्तकम् ॥ २८४ ॥
और पुरानी तथा नवीन वस्तुओं के निरीक्षण करने में १ मुहूर्त, तथा प्राड्विवाक ( जज या वकील ) आदि से समझाये हुये व्यवहारों ( मुकदमों ) के देखने में २ मुहूर्त समय व्यतीत करे । मृगया ( शिकार खेलना ) तथा क्रीडन ( खेल ) में दो मुहूर्त, न्यूहाभ्यास में १ मुहूर्त तथा सन्ध्या में १ मुहूर्त, CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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४२. शुक्रनीति: भोजन में १ मुहूर्त और गूढचारों ( जासूसों ) से सुनाई गई बातों के सुनने में दो मुहूर्त एवं निद्रा ( सोने ) में ८ मुहूर्त तक समय व्यतीत करें ।
एवं विहरतो राज्ञः सुखं सम्यक्प्रजायते ।
अहोरात्रं विभज्यैवं त्रिंशद्भिस्तु मुहूर्तकैः ॥ २८५ ॥
नयेत्कालं वृथा नैव नयेत्स्त्रीमद्यसेवनः । इस प्रकार से बिहार ( व्यवहार ) करनेवाले राजा को भलीभांति सुख मिलता है । पूर्वोक्त रीति से ३० मुहूर्तों में अहोरात्र ( दिन - रात ) को बांटकर समय व्यतीत करे, न कि स्त्री तथा मद्य का सेवन करने से वृथा समय
व्यतीत करे ।
यत्काले ह्युचितं कर्तुं तत्कार्यं द्रागशंकितम् ॥
काले वृष्टिः सुपोषाय ह्यन्यथा सुविनाशिनी । जिस समय में जो कार्य करने के लिये उचित हो निःशङ्क होकर झटपट कर डाले । क्योंकि - समय पर हुई सुन्दर पुष्टि के लिये होती है अन्यथा ( बे समय की ) वृष्टि
होती है ।
२८६ ॥
उसे उसी समय वृष्टि धान्यादि की धान्यादि - विनाशक कार्यस्थानानि सर्वाणि यामिकैरभितोऽनिशम् ॥ २८७ ॥
नयवान्नीतिगतिवित्सिद्धशस्त्रादिकैर्वर: 1 चतुर्भिः पञ्चभिर्वापि षड्भिर्वा गोपयेत्सदा ॥ २८८ ॥
नीति और नीति की चालों को समझने वाला राजा सदा कार्य के सम्पूर्ण स्थानों की चारो तरफ से शस्त्रादि चलाने में निपुण, प्रहरियों ( पहरेदारों ) से रक्षा करावे । तत्रत्यानि दैनिकानि शृणुयाल्लेख काधिपैः दिने दिने यामिकानां प्रकुर्यात्परिवर्तनम् और उन कार्य- स्थानों की दैनिक कार्यवाहियों को वहां सुने । और प्रतिदिन पंहरेदारों की बदली किया करे । गृहपंक्तिमुखे द्वारं कर्तव्यं यामिकैः सदा तैस्तद्वृत्तं तु शृणुयाद् गृहस्थभृतिपोषितैः अच्छे, ४, ५ या ६
।
॥ २८६ ॥
के लेखाध्यक्षों से ॥। २ ९ ० ॥ प्रहरियों के कर्त्तव्य का निर्देश - गृहों की पंक्तियों के प्रधान द्वार पर नियुक्त पहरेदारों से वहां के रहनेवालों के व्यवहार ( चरित्र ) को सुने । और पहरेदारों को गृहस्थों से वेतन दिला कर पालन - पोषण करे ।
निर्गच्छन्ति च ये प्रामाद्ये ग्रामं प्रविशन्ति च ।
तान्सुसंशोध्य यत्नेन मोचयेद्दत्तलग्नकान् ॥ २६१ ॥
प्रख्यातवृत्तशीलांस्तु ह्यविमृश्य विमोचयेत् । ग्राम से लेकर चिह्न ल प्रख्यात हों प्रत्येक कर पहरेदारो ( परस्त्री गाम प्रजाओ के लिये निय में रहनेवालो शिष्य इनमें तुला सिक्का मात्र जाति के प किसी प्रका कभी किसी चाहिये एव और CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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प्रथमोऽध्यायः ४३. सुनने ग्राम से जो निकल रहे हैं वा प्रवेश कर रहे हैं उनकी यत्नपूर्वक तलाशी लेकर चिह्न लगाने के बाद उन्हें छोड़ देवे । और जिनके व्यवहार तथा शील प्रख्यात हो ऐसे प्रतिष्ठित लोगों को बिना विचार किये ही छोड़ देवे ।. वीथिबीथिषु यामार्थैर्निशि पर्यटनं सदा ॥ २६२ ॥
कर्तव्यं यामिकैरेवं.. चौरजारनिवृत्तये । सुख प्रत्येक गलियों में रात्रि के समय आधे २ प्रहर ( डेढ़ २ घण्टे ) पर घूम २ बांटकर कर पहरेदारों को इस प्रकार से पहरा देना चाहिये जिससे चोर तथा जा
समय ( परस्त्री गामी ) पुरुष दूर रहें ।
शासनं त्वीदृशं कार्य राज्ञा नित्यं प्रजासु च ॥ २६३ ॥
दासे भृत्येऽथ भार्यायां पुत्रे शिष्येपि वा क्वचित् ।
वाग्दंड परुषन्नैव कार्यं मद्देशसंस्थितैः ॥ २६४ ॥
समय प्रजाओं में राजा के आदेशों की घोषणा का निर्देश — और राजा को प्रजाओं दि की के लिये नित्य इस प्रकार से शासन ( आदेश ) देना चाहिये कि - मेरे राज्य नाशक मैं रहनेवालों के लिये लिये यह उचित है कि वे गुलाम, नौकर, स्त्री, पुत्र, शिष्य इनमें से किसी को भी कठोर वचनों से दण्ड न देवें ।
तुलाशासनमानानां नाणकस्यापि वा क्वचित् ।
निर्यासानां च धातूनां सजातीनां घृतस्य च ॥ २ ९ ५ ॥
मधुदुग्धवसादीनां पिष्टादीनां च सर्वदा ।
सम्पूर्ण कूटं नैव तु कार्य स्याद्वलाच लिखितं जनैः ॥ २ ९ ६ ॥
या ६ उत्कोचग्रहणं नैव स्वामिकार्यविलोपनम् । तुला ( तौलने में ) एवं शासन ( आज्ञा ), मान ( बटखरा ), नाणक ( मुद्दा सिक्का मात्र ), निर्यास ( गोंद आदि ), धातु ( स्वर्णादि ); तथा उसके समान जाति के पदार्थ, घृत, मधु, दुग्ध, चर्बी आदि, पिसान ( चूर्ण आदि ) में कभी से किसी प्रकार की बेईमानी या मिलावट लोगों को नहीं करना चाहिये । और कभी किसी से जबर्दस्ती कुछ नहीं लिखाना चाहिये और घूस नहीं लेनी चाहिये एवं स्वामी का कार्य नष्ट नहीं करना चाहिये । पर सुने । दुर्वृत्तकारिणं चोरं जारमद्वेषिणं द्विषम् न रक्षन्त्वप्रकाशं हि तथान्यानपकारकान् । मातॄणां पितॄणां चैव पूज्यानां विदुषामपि नावमानं नोपहासं कुर्युः सद्वृत्तशालिनाम् न भेदं जनयेयुर्वै नृनार्योः स्वामिभृत्ययोः भ्रातॄणां गुरुशिष्याणां न कुर्युः पितृपुत्रयोः और दुष्ट आचरण करनेवाले ( गुण्डे ), चौर, जार ॥ २१७ ॥
॥ २६८ ||
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॥ २६६ ॥
। ( लम्पट ), ये चाहे CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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४४ शुक्रनीति: द्वेषी हों या न हों किन्तु इनकी छिप करके भी कभी रक्षा नहीं करनी चाहिये और इसी भाँति जनता के अपकारक लोगों की भी रक्षा नहीं करनी चाहिये । एवं माता - पिता, पूज्य, विद्वान, अच्छे आचरणवाले सत्पुरुषों का अपमान या उपहास नहीं करना चाहिये । स्त्री - पुरुष तथा स्वामी- नौकर में भेद नहीं डालना चाहिये अर्थात् ऐसा व्यवहार भाई - भाई, गुरु - शिष्य, पिता - पुत्र, इनमें नहीं
करना चाहिये कि ये परस्पर एक दूसरे से पृथक् हो जायँ ।
वापीकूपाराम सीमाधर्मशालासुरालयान् ॥ ३०० ॥।
मार्गान्नैव प्रबाधेयुहनांगविकलांगकान् । बावड़ी, कूप, बगीचा, सीमा, धर्मशाला, देवमन्दिर, मार्ग, हीन तथा
विकल अङ्गवाले लोगों को क्षति तथा पीडा न पहुँचावे ।
द्यूतं च मद्यपानं च मृग्यां शस्त्रधारणम् ॥ ३०१ ॥
गोगजाश्वोष्ट्रमहिषीनृणां वै स्थावरस्य च ।
रजतस्वर्णरत्नानां मादकस्य विषस्य च ॥ ३०२ ॥
क्रयं वा विक्रयं वापि मद्यसंघानमेव च ।
क्रयपत्रं दानपत्रसृणनिर्णयपत्रकम् ॥ ३०३ ॥
राजाज्ञया विना नैव जनैः कार्यं चिकित्सितम् ।
महापापाभिशपनं निधिग्रहणमेव च ॥ ३०४ ॥
और बिना राजा की आज्ञा पाये धूत ( जूभा खेलना ), मद्य पीना, शिकार खेलना, शस्त्र रखना और गो, गज, अश्व, ऊंट, भैंस, स्थावर पदार्थ ( गृहादि ), चांदी, सोना, रत्न, मादक द्रव्य ( भांग अफीम आदि ), विष, इन सब द्रव्यों का क्रय ( खरीदना ) वा विक्रय ( बेंचना ) करना, मद्य का सन्धान ( शराब बनाना ), क्रयपत्र ( खरीदने का पत्र ), दानपत्र, ऋण के निर्णय का पत्र और चिकित्सा, महापाप का दोष लगाना, गढ़े हुये द्रव्य को । लेना, इन सब कार्यों को नहीं करना चाहिये ।
नवसमाजनियमं निर्णयं जातिदूषणम् ।
अस्वामि - नाष्टिक - धनसंग्रहं मन्त्रभेदनम् ॥ ३०५ ॥
नृपदुर्गुणलोपं तु नैव कुर्युः कदाचन । नये समाज के नियमों का निर्णय, जाति को दोष लगाना, बिना स्वामी का एवं नष्ट हुये व्यक्ति के धन को लेना, रहस्य का प्रकाश करना, राजा के
दुर्गुणों को छिपाना, इन सब कार्यों को कभी नहीं करना चाहिये ।
स्वधर्महानिमनृतं परदाराभिमर्शनम् ॥ ३०६ ॥
कूटसाक्ष्यं कूटलेख्यमप्रकाशप्रतिग्रहम् ।
निर्धारितकराधिक्यं स्तेयं साहसमेव च ॥ ३०७ ॥
CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri अपने राजा से छिप साहस के क को मनसे भी वेतन, द्वारा सदा चाहिये । अ सेई, द्रोण रखना चाहि संपूर्ण हों । और ( पुलिस ) उन्हें भलीभ ऐसी करते हैं, ऐ प्रजाओं को राजा चौराहे पर उथत रहे ।