शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 131–140

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 131–140

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प्रथमोऽध्यायः ४५ चाहिये मनसापि न कुर्वन्तु स्वामिद्रोहं तथैव च । हिये । अपने धर्म की हानि, झूठ बोलना, परस्त्री - सम्भोग, झूठी गवाही, झूठा लेख, नया राजा से छिपाकर किसी वस्तु का लेना, निर्धारित कर से अधिक लेना, चोरी, डालना साहस के कार्य ( डाका आदि ), और स्वामी के साथ द्रोह.इन सब कार्यों

नहीं को मनसे भी नहीं करना चाहिये ।

भृत्या शुल्केन भागेन वृद्धया दर्पबलाच्छलात् ॥ ३०८ ॥

आघर्षणं न कुर्वन्तु यस्य कस्यापि सर्वदा ।

परिमाणोन्मानमानं धार्यं राजविमुद्रितम् ॥ ३०६ ॥

- तथा वेतन, चुंगी, भाग ( कर या अंश ); वृद्धि ( सूद ), दर्प, बल, छल इनके द्वारा सदा चाहे जो हो किसी का भी कभी दबाकर पीड़ा नहीं पहुँचानी चाहिये । और परिमाण ( बटखरा तौलने का ), उन्मान ( नापने का माना, सेई, द्रोण आदि ) इनका मान राजमुद्रा से युक्त अर्थात्, ( राज - संमत ) रखना चाहिये ।

गुणसाधनसंक्षा भवन्तु निखिला जनाः ।

साहसाधिकृते दद्युविनिगृह्याततायिनम् ॥ ३१० ॥

उत्सृष्टा वृषभाद्या यैस्तैस्ते धार्याः सुयंत्रिताः । संपूर्ण जन गुणों के साधन ( गुण - सम्पादन ) में अच्छी तरह से निपुण पीना, हों । और आततायिओं ( अपराधियों ) को पकड़ कर साहस के अधिकारी पदार्थ ( पुलिस ) के अधीन कर देवे । और जिन्होंने बैल आदि छोड़ दिये हैं वे

विष, उन्हें भलीभांति बांधकर रक्खें ।

नद्य का इति मच्छासनं श्रुत्वा येऽन्यथा वर्तयन्ति तान् ॥ ३११ ॥

ऋण के विनिशिष्यामि दण्डेन महता पापकारकान् ॥

व्य को इति प्रबोधयेन्नित्यं प्रजाः शासनडिंडिमैः ॥ ३१२ ॥

ऐसी मेरी राजाज्ञा को सुनकर भी जो लोग उससे अन्यथा आचरण-करते हैं, ऐसे उन पापियों को मैं भारी से भारी दण्ड से दण्डित करूंगा । ऐसी प्रजाओं को राजाज्ञा सूचनार्थ ढिढोरा पीटकर नित्य सूचित करावे ।

लिखित्वा शासनं राजां धारयेत चतुष्पथे ।

स्वामी सदा चोद्यतदण्डः स्यादसाधुषु च शत्रुषु ॥ ३१३ ॥

जा के राजाओं के कर्तव्य का निर्देश— और राजा इस राजाज्ञा को लिखकर चौराहे पर टंगा देवे एवं दुष्ट तथा शत्रुजनों के लिये सदा दण्ड देने को उद्यत रहे ।

प्रजानां पालनं कार्यं नीतिपूर्व नृपेण हि ।

मार्गसंरक्षणं कुर्यान्नृपः पान्थसुखाय च ॥ ३१४ ॥

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पृष्ठ 132

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४६ शुक्रनीति: पान्थप्रपीडका ये ये हंतव्यास्ते प्रयत्नतः । राजा को नीतिपूर्वक प्रजा - पालन करना चाहिये । और यात्रियों के सुख के लिये मार्ग की रक्षा ( मरम्मत ) करनी चाहिये एवं यात्रियों

( लूट - मार ) पहुँचाने वाले जो हों उन्हें प्रयत्नपूर्वक नष्ट करना चाहिये ।

ग्रामस्य द्वादशांशेन ग्रामपान् संनियोजयेत् ॥ ३१५ ॥

त्रिभिरंशैर्बलं धार्यं दानमर्धाशकेन च ।

अर्धाशेन प्रकृतयो ह्यर्धांशेनाधिकारिणः ॥ ३१६ ॥

अर्घाशेनात्मभोगश्च कोशोंऽशेन स रक्ष्यते । राजा को ग्राम के आय के १२ वाँ भाग देकर ग्रामरक्षकों की नियुक्ति करनी चाहिये और अपने आय के ३ भागों से सेनां का खर्च चलाना चाहिये, आधे भाग से दान - कार्य, आधे भाग से दीवान आदि, आधे भाग से अधिकारी ( अफसर ) पुरुष, आधे भाग से अपना खर्च, १ भाग से कोश की वृद्धि, का

कार्य चलाना चाहिये ।

आयस्यैवं षड्विभागैर्व्ययं कुर्यात्तु वत्सरे ॥ ३१७ ॥

सामन्तादिषु धर्मोऽयं न न्यूनस्य कदाचन । इस प्रकार से राजा आय के ६ भाग करके उनसे वर्ष भर का कार्य चला अर्थात् उक्त कार्यों में तदनुसार व्यय करे । यह धर्म सामन्त आदि - संज्ञक

' राजाओं के लिये है, उनसे न्यून के लिये कभी नहीं है ।

राज्यस्य यशसः कीर्तेर्धनस्य च गुणस्य च ॥ ३१८ ॥

प्राप्तस्य रक्षणेऽन्यस्य हरणेऽनुद्यमोपि च ।

संरक्षणे संहरणे सुप्रयत्नो भवेत्सदा ॥ ३१६ ॥

शौर्यपांडित्यवक्तृत्वं दातृत्वं न त्यजेत्कचित् । राज्य, यश, कीर्त्ति, धन और गुण इनके पाने पर उनकी रक्षा करने में तथा दूसरे के राज्यादि लेने में यत्न करना चाहिये । और इन सबों की भली प्रकार

से रक्षा तथा लेने में अधिक प्रयत्नशील सदा होना चाहिये ।

बलं पराक्रमं नित्यमुत्थानं चापि भूमिपः ॥ ३२० ॥

और शूरता, पण्डिताई, वक्तृता, दानशीलता, बल, पराक्रम, नित्य उत्थान ( चढ़ाई ), इन सर्वो को राजा कभी न छोड़े ।

समितौ स्वात्मकार्ये वा स्वामिकार्ये तथैव च ।

त्यक्त्वा प्राणभयं युध्येत्स शूरस्त्वविशंकितः ॥ ३२१ ॥

निःशङ्क होकर जो युद्ध में अपने या स्वामी के हित के लिये प्राण जाने के भय को त्याग कर युद्ध करता है वही शूर कहलाता है । पक्षं संत्यब्य यत्नेन बालस्यापि सुभाषितम् । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri जो पक्ष कहलाता है जो राज नकि गुण कहलाता है । ' जिसको कोई हिचकि जिससे जिससे पराक्रम है । विषादि मुर्गा आदि देखते ही ह लगते हैं, म मल - मूत्र त्य सारिका पर परीक्षा कर

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प्रथमोऽध्यायः ४० गृह्णाति धर्मतत्त्वं च व्यवस्यति स पण्डितः ॥ ३२२ ॥।

के सुख जो पक्षपात ( दुराग्रह ) को छोड़कर बालकों की कही हुई अच्छी को पीडा बार्तो को ग्रहण करता है और धर्मतत्व का निश्चय करता है, वही पण्डित 1 कहलाता है ।

राज्ञेोपि दुर्गुणान्वति प्रत्यक्षमविशङ्कितः ।

स वक्ता गुणतुल्यांस्तान्न प्रस्तौति कदाचन ॥ ३२३ ॥

जो राजा के सामने ही निःशङ्क होकर उसके दुर्गुणों की निन्दा करता है गुण के समान उन ( दुर्गुणों ) की कभी स्तुति करता है, वही वक्ता कहलाता है ।

चाहिये, अदेयं यस्य वै नास्ति भार्यापुत्रादिकं धनम् ।

अधिकारी आत्मानमपि सन्दन्ते पात्रे दाता स उच्यते ॥ ३२४ ॥

' जिसको उपयुक्त पात्र के निमित्त स्त्री - पुत्रादिक, धन तथा शरीर दे देने में कोई हिचकिचाहट नहीं है वही दाता कहलाता है 1 अशङ्कितमो येन कार्यं कर्तुं बलं हि तत् ।

जिससे कार्य करने के लिये निःशङ्क समर्थ होता है वही बल है ।

चलावे किंकरा इ येनान्ये नृपाद्याः स पराक्रमः ॥ ३२५ ॥

दे - संज्ञक युद्धानुकूलव्यापार उत्थानमिति कीर्तितम् । जिससे अन्य राजा लोग किङ्कर ( दास ) के समान वश्य हो जाते हैं वही

पराक्रम है । युद्ध के अनुकूल व्यापार को उत्थान कहते हैं ।

विषदोषभयादन्नं विसृशेत् कपिकुक्कुटैः ॥ ३२६ ॥

हंसाः स्खलन्ति कूजन्ति भृङ्गा नृत्यन्ति मायूराः ।

विरौति कुक्कुटो माद्येत् क्रौंचो वै रेचते कपिः ॥ ३२७ ॥

में तथा हृष्टरोमा भवेद् बभ्रुः सारिका वमते तथा ।

प्रकार दृष्ट्वैवं सविषं चान्नं तस्माद्भोज्यं परोक्षयेत् ॥ ३२८ ॥

१. विषादि से दूषित अन्नादि परीक्षा का निर्देश - विष दोष के भय से बन्दर मुर्गा आदि के द्वारा अन्न की परीक्षा करनी चाहिये । क्योंकि विषयुक्त अन्न को उत्थान देखते ही हंस लड़खड़ाने लगते हैं । भौरे शब्द करने लगते हैं । मयूर नाचने लगते हैं, मुर्गे बोलने लगते हैं, क्रौञ्च पक्षी मतवाला हो जाता है । बन्दर मल - मूत्र त्याग करने लगता है । बभ्रु ( बढ़ानेवला ) रोमाञ्चयुक्त हो जाता है । सारिका पक्षी वमन करने लगती है, इस रीति से सविष अन्न देखकर उसकी जाने परीक्षा करनी चाहिये ।

भुञ्जीत षडसं नित्यं न द्वित्रिरस संकुलम् ।

- हीनातिरिक्तं न कटु मधुरक्षारसंकुलम् ॥ ३२६ ॥

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पृष्ठ 134

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४८ शुक्रनीतिः २-३ रसों से युक्त, तथा हीन एवं अधिक रसों से युक्त और कटु, मधुर तथा चार से युक्त अन्न नहीं भोजन करना चाहिये ।

आवेदयति यत्कार्यं शृणुयान्मन्त्रिभिः सह ।

आरामादौ प्रकृतिभिः स्त्रीभिश्च नटगायकैः ॥ ३३० ॥

विहरेत्सावधानस्तु मागधैरैन्द्रजालिकैः । और यदि कोई किसी कार्य के लिये निवेदन करे तो राजा मन्त्रियों के साथ उसे सुने । और बगीचा आदि में प्रकृति ( मन्त्री आदि ), स्त्री, नट, गवैया, मागध ( राजा की वंशावली के वर्णन करनेवाले ), इन्द्रजाल विद्या

के ज्ञाता ( जादूगर ) इन सब के साथ विहार करे ।

गजाश्वरथयानं तु प्रातः सायं सदाभ्यसेत् ॥ ३३१ ॥

व्यूहाभ्यासं सैनिकानां स्वयं शिक्षेच्च शिक्षयेत् । राजा प्रातः तथा सन्ध्या समय में हाथी, घोड़े तथा रथ की सवारी का प्रतिदिन अभ्यास करे 1 । और सैनिकों को व्यूहाभ्यास ( व्यूह - रचना का

अभ्यास = कवायद ) करावे और स्वयं करे ।

व्याघ्रादिभिर्वनचरैर्मयूराद्यैश्च पक्षिभिः ॥ ३३२ ॥

क्रीडयेन्मृगयां कुर्याद् दुष्टसत्त्वान्निपातयन् । मृगया - व्यापार ( शिकार खेलने ) का वर्णन - राजा व्याघ्र आदिक, चनचर ( कोल - मिल्लादि ), मयूर आदि पक्षियों के साथ क्रीडा करे और दुष्ट

हिंस्र जीवों को मारता हुआ शिकार खेले ।

शीर्य प्रवर्धते नित्यं लक्ष्यसन्धानमेव च ॥। ३३३ ॥

अकातरत्वं शखाखशीघ्रपातनकारिता ।

मृगयायां गुणा एते हिंसादोषो महत्तरः ॥ ३३४ ॥

शिकार खेलने से निष्य शूरता बढ़ती है । निशाना ठीक होता है । कायरता नहीं रहने पाती है । एवं शस्त्रास्त्र को शीघ्र चलाने का अभ्यास होता है । शिकार खेलने में ये सब गुण हैं किन्तु एक हिंसारूपी सबसे महान दोष है ।

इङ्गितं चेष्टितं यत्नात्प्रजानामधिकारिणाम् ।

प्रकृतीनां च शत्रूणां सैनिकानां मतं च यत् ॥ ३३५ ॥

सभ्यानां बान्धवानां च स्त्रीणामन्तःपुरे च यत् ।

शृणुयाद् गूढचारेभ्यो निशि चात्ययिके सदा ॥ ३३६ ॥

सावधानमनाः सिद्धशस्त्रास्रः संल्लिखेश्च तत् । राजा यत्नपूर्वक प्रजाओं तथा अधिकारियों के इङ्गित तथा चेष्टा को, प्रकृति ( अमात्यादि ), शत्रु, सैनिक, सभासद, बान्धव और अन्तःपुर ( रनिवास ) में CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri में रहनेवाली तथा संकट - क करे और जो ६ स झूठ बो प्राण तथा ध घ प्र ब्रह्मचार जासूस की या झूठ । f बिना होती है । ज है । और जासूसों की राजा क क्योंकि बहुत बिना स्वामी E राजकुल बहुत राज्य योग्य होता लिये सम्पूर्ण ४ शु ०

पृष्ठ 135

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प्रथमोऽध्यायः 89 श्री मधुर मैं रहनेवाली स्त्रियों का जो विचार हों, उन्हें जासूसों से सुने । और रात्रि में तथा संकट काल उपस्थित होने पर सावधान- चित्त होकर शस्त्रास्त्र को धारण करे और जो जासूसों से सुने उसे लिखे भी । त्रियों के श्री, नट, प्राण विद्या असत्यवादिनं गूढचारं नैव च शास्ति यः ॥ ३३७ ॥

स नृपो म्लेच्छ इत्युक्तः प्रजाप्राणधनापहः । झूठ; बोलनेवाले जासूस को जो राजा दण्ड नहीं देता है वह प्रजाओं के

तथा धन को अपहरण करनेवाला ' म्लेच्छ ' कहलाता है ।

वर्णि - तपस्वि - संन्यासिनीचसिद्धस्वरूपिणम् ॥। ३३८ ॥

प्रत्यक्षेण छलेनैव गूढचारं विशोधयेत् । ब्रह्मचारी, तपस्वी, संन्यासी तथा नीच, सिद्ध के रूपको धारण करनेवाले जासूस की प्रगट तथा गुप्त रूप से जांच करे अर्थात् वह सच कहता है

बारी का या झूठ ।

का विना तच्छोधनात्तत्त्वं न जानाति च नाप्यते ॥ ३३ ९ ॥

अशोधकनृपान्नैष बिभेत्यनृतवादने ।

प्रकृतिभ्योऽधिकृतेभ्यो गूढचारं सुरक्षयेत् ॥ ३४० ॥

बिना उसका जांच किये तत्त्व ( असलियत ) का ज्ञान अथवा प्राप्ति नहीं होती है । जांच न करनेवाले राजा से झूठ बोलने में कोई जासूस नहीं डरता आदिक, है । और प्रकृति ( मन्त्री आदि ) और अधिकारी पुरुषों ( अफसरों ) से र दुष्ट जासूसों की सुरक्षा करनी चाहिये ।

सदैकनायकं राज्यं कुर्यान्न बहुनायकम् ।

नानायकं क्वचिदपि कर्तुमीहेत भूमिपः ॥ ३४१ ॥

राजा को राज्य का स्वामी ( उत्तराधिकारी ) सदा एक ही बनाना चाहिये । क्योंकि बहुत ' स्वामियों का होना राज्य के लिये अहितकर होता है । और राजा ता है बिना स्वामी के राज्य को रखने की इच्छा न करे ।

न होता राजकुले तु बहवः पुरुषा यदि संति हि ।

महान तेषु ज्येष्ठो भवेद्राजा शेषास्तत्कार्यसाधकाः ॥ ३४२ ॥

गरीयांसो वराः सर्वसहायेभ्योऽभिवृद्धये । राजकुलों में राजा बनाने के योग्यों का निर्देश - यदि राजकुल में बहुत राज्य पाने के अधिकारी हों तो उनमें जो ज्येष्ठ हो वह राजा बनाने के. योग्य होता है । शेष उसके कार्य के सहायक हों । क्योंकि राज्य की वृद्धि के लिये सम्पूर्ण सहायकों की अपेक्षा उनमें ज्येष्ठ ही उत्तम होता है । + ज्येष्ठोपि बधिरः कुष्ठी मूकोऽन्धः षंढ एव यः ॥ ३४३ ॥

को, एवं स राज्यार्हो भवेन्नैव भ्राता तत्पुत्र एव हि । ( a ) # ४ शु ० CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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: ५० शुक्रनीति: स्वकनिष्ठोपि ज्येष्ठस्य भ्रातुः पुत्रस्तु राज्यभाक् ॥ ३४५ ॥

यथाऽग्रजस्य चाभावे कनिष्ठा राज्यभागिनः । राज्य का उत्तराधिकारी ज्येष्ठ यदि कोढ़ी, गूंगा, अन्धा या नपुंसक हो तो वह राज्य पाने के योग्य नहीं होता है बल्कि उसका छोटा भाई अथवा उसका पुन्न किं वा उसके भाई का पुत्र राज्य का उत्तराधिकारी होता है जैसे बड़े पुत्र

के अभाव में छोटे राज्य के भागी होते हैं ।

दायादानामैकमत्यं राज्ञः श्रेयस्करं परम् ॥ ३४५ ॥

पृथग्भावो विनाशाय राज्यस्य च कुलस्य च ।

अतः स्वभोगसदृशान् दायादान्कारयेन्नृपः ॥ ३४६ ॥

अव्याहताज्ञः संतुष्येच्छत्र सिंहासनैरपि । दायाद ( हिस्सेदारों ) का राजा के साथ ऐकमस्य ( एक राय होकर -रहना ) राजा ( राज्य ) के लिये अत्यन्त कल्याणकारक होता है । और इनका भिन्न २ राय रहना राज्य तथा कुल के लिये विनाशकारक होता है । अतः राजा दायादों ( हिस्सेदारों ) के लिये अपने समान राजसी ठाट - वाट के रहने के निमित्त गुजारे का प्रबन्ध कर दे और जिसकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं होता

है, ऐसा राजा केवल छत्र सिंहासन से सन्तुष्ट हो ।

राज्यविभाजनाच्छु यो न भूपानां भवेत्खलु ॥ ३४७ ॥

अल्पीकृतं विभागेन राज्यं शत्रुर्जिघृक्षति । राज्य का विभाग होने से राजाओं का निश्चय कल्याण नहीं होता है । क्योंकि विभाग करने से राज्य के छोटे हो जाने पर उसे शत्रु लोग लेने की

इच्छा करने लगते हैं ।

राज्यशदानेन. स्थापयेत्तान्समंततः ॥ ३४८ ॥

चतुर्दिदेवथवा देशाधिपान्कुर्यात् सदा नृपः ।

गोगजाश्वष्ट्रकोशानामाधिपत्ये नियोजयेत् ॥ ३४६ ॥

माना मातृसमा या च सा नियोज्या महानसे । राजा के सम्बन्धी ज्ञाति तथा बान्धवादिकों का राजा द्वारा निर्धारित कर्तव्यों का निर्देश - राजा अपने राज्य के चतुर्थांश देकर उन सब दायादों को चारों दिशाओं में राज्य के चारों ओर सदा स्थापित करे अथवा उन्हें देशों का अधिपति ( गवर्नर ) या गो, हाथी, घोड़ा, ऊँट, खजाना इनका अधिपति बनाकर रखे । और माता या माता के समान जो पूज्य खियां हैं उन्हें पार्क

शाला का अधिकार देवे ।

सेनाधिकारे संयोग्या बान्धवाः श्यालकाः सदा ॥ ३५० ॥

स्वदोषदर्शकाः कार्या गुरवः सुहृदश्च ये । और बान अधिकार का देखने के लिय व स वस्त्र, अ करे । और स बाद अपना मुहर लगादे ३ रात्रि के निर्जन जगन्ह विचार करे परिषद् बान्धव, सेन में सदा वि और रा और उसके प पुत्र, प मैं दक्षिण औ चाचा, CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 137

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W ( 62 ) 1: 1x4, 4. प्रथमोऽध्यायः 452K18 ५१ 11 और बान्धव ( खानदान के लोग ) तथा साले के लिये सेनासम्बन्धी अधिकार का प्रदान करे । और जो गुरुजन या मित्र हों उन्हें अपने दोषों को होतो देखने उसका पुत्र करे । बाद मुहर होकर इनका के लिये नियुक्त करे । वस्त्रालंकारपात्राणां स्त्रियो योज्याः सुदर्शने स्वयं सर्वं तु विसृशेत्पर्यायेण च मुद्रयेत् वस्त्र, अलंकार तथा वर्तनों की देखभाल करने के लिये और सभी कार्यों को पर्याय ( पारी पारी ) से स्वयं अपना मोहर लगा । अर्थात् इस कार्य का निरीक्षण लगादे | अन्तर्वेश्मनि रात्रौ वा दिवाऽरण्ये विशोधिते मन्त्रयेन्मन्त्रिभिः सार्धं भाविकृत्यं तु निर्जने ॥ ३५१ ॥

| स्त्रियों को नियुक्त निरीक्षण करने के हो चुका है इसका ॥। ३५२ ॥ । रात्रि के समय भलीभांति देखभाल कर महल के अन्दर और दिन में । अतः निर्जन जङ्गल में आगे होने वाले कार्यों के विषय में मन्त्रियों के साथ रहने के

विचार करे ।

होता सुहृद्भिर्भ्रातृभिः सार्धं सभायां पुत्रबांधवैः ॥ ३५३ ॥

राजकृत्यं सेनपैश्च सभ्याद्यैश्चितयेत्सदा । परिषद् की व्यवस्था का निर्देश - राजा सभा के बीच में मित्र, भाई, पुत्र, बान्धव, सेनापति और सभासद ( मेम्बर ) गणों के साथ राजकार्य के विषय ता है । में सदा विचार करे । लेने की और निर्धारित यादों को सभायां प्रत्यगर्धस्य मध्ये राजासनं स्मृतम् ॥ ३५४ ॥

दक्षसंस्था वामसंस्था विशेयुः पार्श्वकोष्ठगाः । और राजसभा में पश्चिम ओर मध्य में राजा का सिंहासन रहना चाहिये ।

उसके पार्श्व के खानों में बैठनेवाले लोग दक्षिण तथा वामभाग में बैठें ।

पुत्राः पौत्रा भ्रातरश्च भागिनेयाः स्वपृष्ठतः ॥ ३५५ ॥

दौहित्रा दक्षभागात्तु वामसंस्थाः क्रमादिमे । पुत्र, पौत्र, भाई और भानजे तथा दौहित्र ये सब सिंहासन के पृष्ठ भाग का मैं दक्षिण और बाएँ तरफ क्रम से बैठें । देशों अधिपति न्हें पार्क-० ॥ पितृव्याः स्वकुलश्रेष्ठाः सभ्याः सेनाधिपास्तथा ॥। ३५६ ॥

स्वा दक्षिणभागे तु प्राक्संस्थाः पृथगासनाः ।

मातामहकुलश्रेष्ठा मन्त्रिणो बांधवास्तथा ॥ ३५७ ॥

श्वशुराश्चैव श्यालाश्च वामात्रे चाधिकारिणः । चाचा, अपने कुल के श्रेष्ठ सभासद, सेनापति ये सब सिंहासन के आगे ॐ वेद वेदाङ्ग पुस्तकालय at j CC - 0. Mumukshu Bhawali varanasi detection. Digitized 2248 by eGangotri aes...

पृष्ठ 138

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१२ शुक्रनीति: दक्षिण भाग में पृथकू २ आसनों पर बैठें । नाना के कुल के श्रेष्ठ पुरुष, मन्त्रिगण,

बान्धव, श्वशुर, साला ये सब वामभाग में बैठने के अधिकारी हैं ।

वामदक्षिणपार्श्वस्थौ जामाता भगिनीपतिः ॥ ३५८ ॥

स्वसदृशः समीपे वा स्वार्धासनगतः सुहृत् । वाम - दक्षिण भाग में दामाद तथा बहनोई बैठें । अपने समान हैसियतवाले

अथवा मित्र सिंहासन के समीप या अर्धभाग के ऊपर बैठें ।

दौहित्रभागिनेयानां स्थाने स्युर्दत्तकादयः ॥ ३५६ ॥

भागिनेयाश्च दौहित्राः पुत्रादिस्थानसंश्रिताः । दौहित्र तथा भानजों के स्थान में दत्तक आदि बैठें । भानजे तथा दौहित्र

आदि पुन्नादि के स्थान पर बैठें ।

यथा पिता तथा चार्यः समश्रेष्ठासने स्थितः ॥ ३६० ॥

पार्श्वयोरप्रतः सर्वे लेखका मंत्रिपृष्ठगाः । जैसे, पिता वैसे आचार्य पूज्य होते हैं अतः उन्हें सिंहासन के समान श्रेष्ठ आसन देना चाहिये | और अग्रभाग में दोनों तरफ मन्त्रियों के पीछे सभी

लेखकवर्ग बैठें ।

परिचारगणाः सर्वे सर्वेभ्यः पृष्टसंस्थिताः ॥ ३६१ ॥

स्वर्णदंडधरौ पार्श्वे प्रवेश नतिबोधकौ । और सम्पूर्ण परिचार ( सेवक ) गण सर्वो के पीछे बैठें । एवं सिंहासन के दोनों पार्श्व ( बगल ) में सुवर्ण के दण्ड को लिये हुए लोगों के प्रवेश तथा

प्रणाम करने की सूचना राजा को देने के लिये दो मनुष्य खड़े रहें ।

विशिष्ट चिह्नयुग्राजा स्वासने प्रविशेत्सुखम् ॥ ३६२ ॥

सुभूषणः सुवसनः कवची मुकुटान्वितः ।

सिद्धाखनग्नशस्त्रस्सन् सावधानमनाः सदा ॥ ३६३ ॥

राजा को राजचिह्न रखने का निर्देश - राजा सदा सावधान -चित्त होकर सुन्दर भूषण, वस्त्र, कवच तथा मुकुट धारण किये हुए, चलाने के लिये प्रस्तुत किये हुये अस्त्र तथा नग्न ( ज्यान से निकाले हुये ) शस्त्र • लिये हुये, विशिष्ट राजचिह्नों विभूषित होकर सिंहासन पर सर्वस्मादधिको दाता शूरस्त्वं धार्मिको ह्यसि इति वाचं न शृणुयाच्छ्रावका वंचकास्तु ते ॥

रागालोभाद्भयाद्राज्ञः स्युर्मूका इव मंत्रिणः ।

नताननुमतान्विद्यान्नृपतिः स्वार्थसिद्धये ॥

पृथक्पृथङ्मतं तेषां लेखयित्वा ससाधनम् ।

यत्कुर्याद्बहुसम्मतम् ॥

( तलवार ) को सुखपूर्वक बैठें ॥ ३६४ ॥ ३६५ ॥ ३६६ ॥ -राजा के दाता, शूर त उनके वचनों जायें तो ऐसे को युक्ति ( प्र जो बहुसम्मत ग स स बुद्धिमान ( गुलाम ), कर प्रयत्नपूर्व श स f f 1 और १० को सभी प्रक समाप्त हुआ ' तथा कला म इस प्रकार स को सदा कर f राजा भ करे जो क्रूर प्रस्तुत ) अ ३ राजा ह पर्यटन करे । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 139

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प्रथमोऽध्यायः ५३ न्त्रिगण, १. राजा के कर्त्तव्य - और राजा अपनी स्वार्थसिद्धि के लिये ' आप सबसे अधिक दाता, शूर तथा धार्मिक हैं, इस वचन को सुनानेवाले यदि वञ्चक हैं और उनके वचनों को सुनकर यदि किसी के राग, लोभ या भय से मन्त्री लोग मूक हो जायें तो ऐसे लोगों को अनुमत ( सच कहनेवाला ) न समझे । और उनके मतों यतवाले को जो दौहित्र युक्ति ( प्रमाण ) सहित पृथक् २ लिखाकर अपने मत से विचार करे 1 । और बहुसम्मत हो उसे करे ( वैसा निर्णय करे ) ।

गजाश्वरथपश्वादीन् भृत्यान्दासांस्तथैव च ।

संभारान्सैनिकान् कार्यक्षमान्ज्ञात्वा दिने दिने ॥ ३६७ ॥

संरक्षयेत्प्रयत्नेन सुजीर्णान् संत्यजेत्सुधीः । * बुद्धिमान राजा हाथी, घोड़े, रथ, पशु आदि, मृत्य ( नौकर ) दास ( गुलाम ), सामग्री, सैनिक इन सबों में जो कार्य के योग्य हों उन्हें समझ कर प्रयत्नपूर्वक उनकी रक्षा करे जो पुराने हों उन्हें प्रतिदिन अलग कर दे । मान श्रेष्ठ छे सभी हासन के विश तथा को शतक्रोशभवां वार्ता हरेदेकदिनेन वै ॥ ३६८ ॥

सर्वविद्याकलाभ्यासे शिक्षयेद् भृतिपोषितान् ।

समाप्तविधं संदृष्ट्रा तत्कार्य तं नियोजयेत् ॥ ३६६ ॥

विद्याकलोत्तमान्दृष्ट्वा बत्सरे पूजयेश्च तान् ।

विद्याकनानां वृद्धिः स्यात्तथा कुर्यान्नृपः सदा ॥ ३७० ॥

और १०० क्रोश की बातें १ दिन में ही जान ले । और वृत्ति देकर लोगों सभी प्रकार की विद्याओं तथा कलाओं की शिक्षा दिलावे । और अध्ययन समाप्त हुआ समझकर उन्हें उनके योग्य कार्यों में नियुक्त कर दे । एवं विद्या ' तथा कला में जो अत्यधिक निपुण हों उनका प्रतिवर्ष आदर - सत्कार करे । इस प्रकार से विद्या तथा कला की वृद्धि जिस भांति से हो वैसा प्रयत्न राजा को सदा करना चाहिये । त होकर पृष्टाप्रगान्क्रूरवेषान्नतिनीतिविशारदान्-ये प्रस्तुत सिद्धाखनग्नशस्त्रांश्च भटानारान्नियोजयेत् ॥ ३७१ ॥

र ) को राजा अपने आगे - पीछे चलनेवाले ऐसे सैनिक लोगों को पास में नियुक्त क बैठें । करे जो क्रूर वेषवाले, नमन करने एवं नीति में कुशल, सिद्ध ( चलाने के लिये प्रस्तुत ) अस्त्र तथा नग्न खड्ग आदि शस्त्रों को धारण किये हों ॥ i पुरे पर्यटयेन्नित्यं गजस्थो रंजयन्प्रजाः । • राजा हाथी पर बैठकर प्रजा का मनोरञ्जन करता हुआ नगर में नित्य

I पर्यटन करे ।

राजयानारूढितः किं राज्ञा श्वा न समोपि च ॥। ३७२ ॥

शुना समो न किं राजा कविभिर्भाव्यर्तेऽजसा । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 140 का मूल पृष्ठ
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48 शुक्रनीति: • राजा की सवारी पर चढ़ा हुआ कुत्ता क्या राजा के समान और राजा कुता के समान पण्डितों द्वारा वस्तुतः नहीं समझा जाता है अर्थात् अवश्य समझा

जाता है ।

अतः स्वबांधवैर्मित्रैः स्वसाम्यप्रापितैर्गुणैः ॥ ३७३ ॥

प्रकृतिभिर्नृपो गच्छेन्न नीचैस्तु कदाचन । अतः राजा अपने बान्धव, मिन्त्र तथा गुणों के द्वारा अपनी समता को प्राप्त किये हुये लोग, प्रकृति ( मन्त्री आदि ) के साथ गमन करे, किन्तु कभी

भी नीच पुरुषों के साथ गमन न करे ।

मिथ्यासत्यसदाचारैर्नीचः साधुः क्रमात्स्मृतः ॥ ३७४ ॥

साधुभ्योऽतिस्वमृदुत्वं नीचाः संदर्शऽयन्ति हि । क्रम से मिथ्या के द्वारा व्यक्ति नीच तथा सत्य और सदाचार द्वारा साधु समझा जाता है । और साधु की अपेक्षा नीच लोग अपनी

दिखाते हैं ।

प्रामान्पुराणि देशांश्च स्वयं संवीक्ष्य वत्सरे ॥

अधिकारिगणैः काश्च रंजिताः काश्च कर्षिताः ।

प्रजास्तासां तु भूतेन व्यवहारं विचिन्तयेत् ॥

न भृत्यपक्षपाती स्यात्प्रजापक्षं समाश्रयेत् । राजा को प्रतिवर्ष राज्य में भ्रमण कर देश के अधिकारियों मृदुता को ज्यादा ३७५ ॥ ३७६ ॥ के निरीक्षण का निर्देश - प्रतिवर्ष ग्राम, नगर तथा देश का स्वयं निरीक्षण करके अधिकारियों ने किन प्रजाओं का मनोरञ्जन किया और किन लोगों को कष्ट पहुँचाया है, इसमें प्रजासम्बन्धी जो सत्य व्यवहार हो उसका विचार मृत्यों का पक्षपाती न होकर प्रजा का पक्षपाती होना राजा के प्रजाशतेन संद्विष्टं संत्यजेदधिकारिणम् ॥

अमात्यमपि संवीक्ष्य सकृदन्यायगामिनम् ।

एकांते दंडयेत्स्पष्टमभ्यासागस्कृतं त्यजेत् ॥

अन्यायवर्तिनां राज्यं सर्वस्वं च हरेन्नृपः । दि १०० प्रजामिलाकर किसी अधिकारी के विरूद्ध तो उस ( अधिकारी ) को राजा निकाल दे । और यदि करे । अधिकारी

लिये उचित है ।

३७७ ॥

३७८ ॥

आवेदन पत्र भेजे मन्त्री एक बार अम्याय करनेवाला दिखाई दे तो उसे एकान्त में दण्ड दे । और बारंबार अपराध करनेवाला हो तो उसे सबके समक्ष दण्ड दे और निकाल दे ।

अन्यायी अधिकारियों के राज्य तथा सर्वस्व को हर ले ।

जितानां विषये स्थाप्यं धर्माधिकरणं सदा ॥ ३७६ ॥

भृतिं दद्यान्निर्जितानां तच्चारित्र्यानुरूपतः । जीते ह अपना शासन लिये वेतन क अपने म प्रियभाषिणी संभोग करे राजा अ क्योंकि स्थान बड़ी भ उसके आश्रय ले ले । दस्यु र को सबसे ह और द • का विश्वास करे, क्रूर कम परस्त्रियों की करनेवाला ह CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri