शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 141–150
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 141–150
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प्रथमोऽध्यायः 44 जा कुरा जीते हुये राजाओं के देश में सदा अपना न्यायालय स्थापित करे अर्थात् न्य समझा अपना शासन रखे । विजित राजा के रहन - सहन के अनुरूप भरण - पोषण के
लिये वेतन का प्रबन्ध कर दे ।
स्वानुरक्तां सुरूपां च सुवस्त्रां प्रियवादिनीम् ॥ ३८० ॥
सुभूषणां सुसशुद्धां प्रमदां शयने भजेत् ।
मता को यामद्वयं शयानो हि त्वत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ ३८१ ॥
किन्तु कभी अपने में अनुराग रखनेवाली, सुन्दर रूपवती, अच्छे वस्त्र पहने हुये; प्रियभाषिणी, सुन्दर भूषणों से युक्त, शुद्ध आचरणवाली ऐसी स्त्री के साथ 11 संभोग करे । दो प्रहर तक सोनेवाला राजा अत्यन्त सुख भोगता है ।
न ' संत्यजेच्च स्वस्थानं नीत्या शत्रुगणं जयेत् ।
स्थानभ्रष्टा नो विभांति दंताः केशा नखा नृपाः ॥ ३८२ ॥
द्वारा साधु राजा अपने स्थान का परित्याग न करे किन्तु नीति से शत्रुगण को जीते. को ज्यादा क्योंकि स्थान से भ्रष्ट हुये दांत, केश नख तथा राजा नहीं सुशोभित होते हैं ।
1 संश्रयेद् गिरिदुर्गाणि महापदि नृपः सदा ।
तदाश्रयाद्दस्युवृत्त्या स्वराज्यं तु समाहरेत् ॥ ३८३ ॥
बड़ी भारी आपत्ति आपड़ने पर राजा सदा पहाड़ी किलों का आश्रय ले । उसके आश्रय में रहकर दस्यु - वृत्ति ( डाकूजीवन ) से अपने राज्य को पुनः रीक्षण का ले ले । कारियों ने हुँचाया है, अधिकारी दस्यु उचित है । को सबसे 1 पत्र भेजें और
विवाहदानयज्ञार्थं विनाऽप्यष्टांशशेषितम् ।
सर्वतस्तु हरेद्दस्युरसतामखिलं धनम् ॥
राजा विवाह, दान, यज्ञ आदि के लिये अष्टमांश हरण करे और दुर्जनों के सम्पूर्ण धन लूट 1 नैकत्र संवसेन्नित्यं विश्वसेन्नैव कं प्रति । सदैव सावधानः स्यात्प्राणनाशं न चिन्तयेत्
क्रूरकर्मा सदोद्युक्तो निर्घृणो दस्युकर्मसु ।
विमुखः परदारेषु कुलकन्याप्रदूषणे ॥
दस्युवृत्ति राजा एक जगह स्थिर होकर निवास न ३८४ ॥ धन छोड़कर शेष ॥ ३८५ ॥
३८६ ॥ करे, और किसी • का विश्वास न करे । सदैव सावधान होकर प्राणनाश का परवाह न. एक बार और यदि करे, क्रूर कर्म करनेवाला, सदा दस्युओं के कर्म करने में उद्योग युक्त, दयाहीन,. दे । परखियों की तरफ उन्मुख नहीं होनेवाला, एवं कुलीन कन्याओं को नहीं भ्रष्ट काल करनेवाला हो ।
1. पुत्रवत्पालिता भृत्याः समये शत्रुतां गताः ।
न दोषः स्यात्प्रयत्नस्य भागधेयं स्वयं हि तत् ॥ ३८७ ॥
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I शुक्रनीति: • विफलं कर्म तपस्तप्त्वा दिवं व्रजेत् । राजा के पारलौकिक कार्य का निर्देश - पुत्र के समान पाले हुये नौकर भी समय विपरीत होने पर शत्रुता कर बैठते हैं इसमें प्रयत्न का दोष नहीं है किन्तु भाग्य की बात है । पुरुषार्थ कर्म को इस भांति से विफल हुआ देखकर
तपस्या करके स्वर्गलोकगामी बने ।
उक्तं समासतो राजकृत्यं मिथेऽधिकं ब्रुवे ॥ ३८८ ॥
( अध्यायः प्रथमः प्रोक्तो राजकार्यनिरूपकः ) इति शुक्रनीतौ राजकृत्या धिकारो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ राज्य - सम्बन्धी कृत्यों का संक्षेप से इस प्रकार वर्णन किया । मिश्र अध्याय में इसका विस्तार से वर्णन करेंगे । ( यह राजकार्य का निरूपण करनेवाला प्रथम अध्याय कहा गया ) । इस प्रकार शुक्रनीति में राजकृस्याधिकार- नामक प्रथम अध्याय समाप्त हुआ । य एकाकी कार्य छोटा स सहज में नही चलाना कैसे बिना म मैं कुशल एव मन्त्रियों के स निर्णय न करे र र सदा सभ्य कौंसिल के म न रहे अर्थात स्वतन्त्र करने में सम उसका प्रकृत प्रत्येक CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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ये नौकर नहीं है द्वितीयोऽध्यायः
देखकर यद्यप्यल्पतरं कर्म तदप्येकेन दुष्करम् ।
पुरुषेणासहायेन किमु राज्यं महोदयम् ॥ १ ॥
एकाकी राजा का राज्यकार्य करने की दुष्करता का निर्देश — यद्यपि कोई कार्य छोटा से छोटा भी हो तथापि उसे सहायक के बिना अकेले कोई पुरुष सहज में नहीं कर पाता है फिर महान अभ्युदय वाला राज्यकार्य अकेले अध्याय चलाना कैसे सहज हो सकता है अर्थात् असंभव है ।
रनेवाला सर्वविद्यासु कुशलो नृपो ह्यपि सुमंत्रवित् ।
मंत्रिभिस्तु विना मंत्रं नैकोऽर्थ चितयेत्कचित् ॥ २ ॥
बिना मन्त्रियों के सलाह लिये व्यवहार- निर्णय का निषेध - सभी विद्याओं मैं कुशल एवं भलीभांति मन्त्रणा ( विचार ) करनेवाला भी अकेला राजा मन्त्रियों के साथ बिना सलाह किये कभी किसी व्यवहार के विषय में कोई निर्णय न करे ।
सभ्या धकारिप्रकृतिसभासत्सु मते स्थितः ।
सर्वदा स्यान्नृपः प्राज्ञः स्वमते न कदाचन ॥ ३ ॥
अच्छे सहायकों से युक्त राजा की श्रेष्ठता का निर्देश - समझदार राजा सदा सभ्य अधिकारी पुरुष ( ऑफिसर ), प्रकृति ( मन्त्री आदि ), तथा कौंसिल के मेम्बरों की राय पर स्थित रहे । कभी भी अपनी ही राय पर स्थिर न रहे अर्थात् अपने मनसे कोई कार्य न करे ।
प्रभुः स्वातन्त्र्यमापन्नो ह्यनर्थायैव कल्पते ।
भिन्नराष्ट्रो भवेत्सद्यो भिन्नप्रकृतिरेव च ॥ ४ ॥
स्वतन्त्रता को प्राप्त हुआ ( मनमानी करनेवाला ) राजा ( स्वामी ) अनर्थ करने में समर्थ होता है, उससे राज्य तत्काल छिन्न - भिन्न हो जाता है और उसका प्रकृति ( मन्त्री आदि ) वर्ग अलग हो जाता है ।
पुरुषे पुरुषे भिन्नं दृश्यते बुद्धिवैभवम् ।
आप्तवाक्यैरनुभवैरागमैरनुमानतः ॥
प्रत्यक्षेण च सादृश्यैः साहसैश्व छलैर्बलैः ।
वैचित्र्यं व्यवहाराणामौन्नत्यं गुरुलाघवैः ॥
नहि तत्सकलं ज्ञातुं नरेणैकेन शक्यते ।
अतः सहायान्वरयेद्राजा राज्यविवृद्धये ॥
प्रत्येक पुरुष में बुद्धि का वैभव ( चमत्कार ) भिन्न ५ ॥ ६ ॥ ७ ॥ २ दिखाई पड़ता है । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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५८ शुक्रनीति: और यथार्थं ( उचित ) कहनेवाले पुरुषों की वातों से एवं आगम ( नीति-शास्त्रादि शब्द प्रमाण ), अनुमान, प्रत्यक्ष, सादृश्य ( उपमान ) इन प्रमाणों से, साहस, छल बल - एवं गुरुता तथा लघुता से जो व्यवहारों में विचित्रता. तथा महत्ता पाई जाती है उन सर्वो का ज्ञान प्राप्त करना से संभव नहीं हो सकता है अतः राजा राज्य की उन्नति के को रखना स्वीकार करे ।
कुलगुणशीलवृद्धाव्छूरान् भक्तान्प्रियंवदान् ।
हितोपेदशकाम्क्लेशसहान् धर्मरतान्सदा ॥
कुमार्गगं नृपमपि बुद्धयोद्धत्तु क्षमान्छुचीन् निर्मत्सरान्कामक्रोधलोभहीनान्निरालसान् ॥ अकेले एक मनुष्य. लिये ऐसे सहायकों ८ ॥
।
९ ॥
जो कुल, गुण और शील से बड़े हों और शूर, राजभक्त, प्रियभाषी, हितकारक उपदेश देनेवाले, क्लेश सहनेवाले, सदा धर्म पर चलनेवाले, कुमार्ग--गामी राजा को अपनी बुद्धि बल से कुमार्ग से हटाने में समर्थ, पवित्र आचरण तथा विचार वाले, मत्सरता, काम, क्रोध, लोभ और आलस्य से हीन हों ।
हीयते कुसहायेन स्वधर्माद्राज्यतो नृपः ।
कुकर्मणा प्रनष्टास्तु दितिजाः कुसहायतः ॥ १० ॥
नष्टा दुर्योधनाद्यास्तु नृपाः शूरा बलाधिकाः ।
निरभिमानो नृपतिः सुसहायो भवेदतः ॥ ११ ॥
बुरे सहायकों से राजा की हानि का निर्देश—- कुत्सित सहायकों से राजा अपने धर्म तथा राज्य से च्युत हो जाता है । जैसे दैत्य लोग और दुर्योधनादि-राजा लोग शूर एवं अधिक बलशाली होते हुये भी कुत्सित कर्म करने तथा कुत्सित सहायकों का साथ करने नष्ट हो गये अतः राजा को अभिमान--रहित तथा अच्छे सहायकों से युक्त होना चाहिये । युवराजोऽमात्यगणो भुजावेतौ महीभुजः तावेव नयने कर्णौ दक्षसव्यौ क्रमात्स्मृतौ युवराजादि राजा के अङ्ग हैं इसका निर्देश - युवराज दोनों क्रम से राजा के दक्षिण तथा वाम अङ्ग के दोनों बाहु, गये हैं । बाहुकर्णाक्षिहीनः स्याद्विना ताभ्यामतो नृपः योजयेच्चिन्तयित्वा तौ महानाशाय चान्यथा इसलिये राजा उन दोनों ( युवराज तथा मन्त्रिगण )
।
॥ १२ ॥
तथा मन्त्रिगण ये नेत्र तथा
।
॥ १३ ॥
के बिना बाहु, कर्ण तथा नेत्र से हीन समझा जाता है । अतः इन दोनों की नियुक्ति सोच - समछ-कर करे । अन नाशकारी हो E युवराज जो राजा का समर्थ होता अपना पुन्न और बढ़े भा अथवा दत्तक क्रम से युवराज बना कष्ट न पहुच और सदा रक्षा ( रक्षा ( रख यद्यपि इनक छिद्र ( मौ रहता है तो के बच्चे र निरंकुश ह CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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द्वितीयोऽध्यायः XE नीति प्रमाण कर करे । अन्यथा ( उचित नियुक्ति न होने से ) ये दोनों भयङ्कर रूप से विचित्रता. नाशकारी होते हैं ।
मनुष्य मुद्रां विनाऽखिलं राजकृत्यं कर्तुं क्षमं सदा ।
सहायकों कल्पयेयुवराजार्थमौरसं धर्मपत्निजम् ॥ १४ ॥
स्वकनिष्ठं पितृव्यं वाऽनुजं वाऽग्रजसंभवम् ।
पुत्रं पुत्रीकृतं दत्तं यौवराज्येऽभिषेचयेत् ॥ १५ ॥
युवराज के कार्य तथा अभिषेकार्ह युवराज के अधिकारियों का निर्देश-जो राजा का मोहर लगाने के अतिरिक्त सभी राजकार्य को सदा करने के लिये समर्थ होता है, ऐसे युवराज- पद के लिये धर्मपत्नी में उत्पन्न औरस ( साक्षात् अपना ) पुत्र चुनना चाहिये अभाव में क्रम से अपना छोटा भाई, चाचा, छोटा भाई नयभाषी, और बढ़े भाई का पुत्र, पुत्रीकृत ( जिसको पुत्र के समान मान लिया जाय ) पुत्र-. कुमार्ग- अथवा दत्तक पुत्र को चुनकर युवराज नियुक्त करना चाहिये । आचरण क्रमादभावे दौहित्र स्वस्त्रीयं वा नियोजयेत् ॥। स्वहितायापि मनसा नैतान्संकर्षयेत्कचित् ॥ १६ ॥
क्रम से पूर्वोक्त के अभाव में दौहित्र ( लड़की का लड़का ) या भानजा को युवराज बनाना चाहिये और अपने हित के लिये कभी मन से भी इन सर्वो को कष्ट न पहुचाना चाहिये । से राजा धनादि. ने तथा
भिमान--स्वधर्मनिरताच्छूरान् भक्तान्नीतिमतः सदा ।
संरक्षयेद्राजपुत्रान् बालानपि सुयत्नतः ॥ १७ ॥
लोलुभ्यमानास्तेऽर्थेषु हन्युरेनमरक्षिताः ।
रक्ष्यमाणा यदिच्छिद्रं कथंचित्प्राप्नुवन्ति ते ॥ १८ ॥
सिंहशावा इव घ्नन्ति रक्षितारं द्विपं द्रुतम् ।
राजपुत्रा मदोद्भूता गजा इव निरंकुशाः ॥। १ ९ ॥
पितरं चापि निघ्नन्ति भ्रातरं त्वितरं न किम् ।
मूर्खो बालोऽपीच्छति स्म स्वाम्यं किं नु पुनर्युवा ॥ २० ॥
और स्वधर्म में निरत, शूर, राजभक्त, नीतिशास्त्रज्ञ राजपुत्रों की भलीभांति गण ये सदा रक्षा ( रखवाली ) करे चाहे वे बालक हों तो भी उनकी विशेष यत्न से माने रक्षा ( रखवाली ) करे अर्थात् राजा इन से अपनी प्राणरक्षा करता रहे क्योंकि यद्यपि इनकी रक्षा भलीभांति की जा रही है तो भी यदि ये किसी प्रकार का छिद्र ( मौका ) पा जाते हैं और उस समय उनके ऊपर किसी का पहरा नहीं रहता है तो राज्य के लोलुप होने से रक्षक राजा को मार डालते हैं जैसे सिंह , कर्ण के बच्चे रक्षक हाथी को भी शीघ्र मार डालते हैं । और मद से मतवाले हु निरंकुश हाथी के समान राजपुत्र जब पिता को या भाई को भी मार डालते. -समझ-CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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-६० शुक्रनीतिः हैं तब इतर को क्यों नहीं मारेंगे अर्थात् अवश्य मारेंगे । क्योंकि मूर्ख बालक भी यदि स्वामी ( राजा ) बनना चाहता है तो फिर युवा ( जवान ) के विषय मैं क्या कहना है अर्थात् वह तो अवश्य चाहेगा ही ।
स्वात्यन्तसन्निकर्षेण राजपुत्रांस्तु रक्षयेत् ।
सभृत्यैश्चापि तत्स्वान्तं छलैर्ज्ञात्वा सदा स्वयम् ॥ २१ ॥
और राजा अपने अत्यन्त सन्निकट में राजपुत्रों को रखते हुये विश्वासी नौकरों के द्वारा, किसी व्याज से या स्वयं उनके हार्दिक भावों को सदा जानकर तदनुसार उनकी रक्षा का प्रबन्ध करे ।
सुनीतिशास्त्रकुशलान् धनुर्वेदविशारदान् ।
क्लेशसहांश्च वाग्दंडपारुष्यानुभवान् सदा ॥ २२ ॥
शौर्ययुद्धरतान् सर्व कलाविद्याविदोंऽजसा ।
सुविनीतान्प्रकुर्वीत ह्यमात्याद्यैर्नृपः सुतान् ॥ २३ ॥
दुराचारी राजपुत्रों में आचार - स्थापना का निर्देश - और राजा मन्त्री आदि के द्वारा अपने पुत्रों को सुन्दर नीतिशास्त्र में कुशल, धनुर्वेद विद्या में विशारद, सदा क्लेश सहन करने में समर्थ, वाग्दण्ड की कठोरता का अनुभव करनेवाला, चीरता के साथ युद्ध करने में निरत, वस्तुतः सम्पूर्ण कलाओं तथा विद्याओं का जाननेवाला, अत्यन्त शिक्षित अथवा विनम्र बनावे ।
सुबत्राचैर्भूषयित्वा लालयित्वा सुक्रीडनैः ।
अर्हयित्वाऽऽसनाद्यैश्च पालयित्वा सुभोजनैः ॥ २४ ॥
कृत्वा तु यौवराज्यार्हान् यौवराज्येऽभिषेचयेत् ।
अविनीतकुमारं हि कुलमाशु विनश्यति ॥। २५ ॥
और उन्हें सुन्दर वस्त्रादिकों से अलंकृत, अच्छे खेलों से लालित, अच्छे आसनों पर बैठाने से सम्मानित करते हुये अच्छे २ भोजनों से उनका पालन-पोषण करके युवराज - पद के योग्य हो जाने पर उन्हें युवराज बनावे क्योंकि जिस राजवंश के युवराज अशिक्षित होते हैं वह शीघ्र नष्ट हो जाता है । राजपुत्रः सुदुर्वृत्तः परित्यागं हि नार्हति । क्लिश्यमानः स पितरं परानाश्रित्य हन्ति हि और अत्यन्त दुर्वृत्त ( दुष्ट आचरणवाला ) भी राजपुत्र योग्य नहीं होता है क्योंकि क्लेश पाने पर वह शत्रुओं अपने पिता राजा को मार डालता है । 1
व्यसने सज्जमानं तं क्लेशयेद् व्यसनाश्रयैः ।
दुष्टं गजमिवोदवृत्तं कुर्वीत सुखबन्धनम् ॥
यदि कोई राजकुमार द्यूत आदि व्यसन में फंस जाय ॥ २६ ॥
परित्याग करने के का सहारा लेकर २७ ॥ तो उस व्यसन के आश्रयदाताओं बुझाकर ठीक सुखपूर्वक बांध अ जो राजा वाले हों उन्हें लिये मार डा विनाश के का अतः दा अन्यथा वे अ स स जो अपन में उत्पन्न हुय कि ये मेरे पु उसके दत्तक उत्पन्न कन्या ६ क्योंकि अतः पिण्डद तृप्ति होती ह और रा क्योंकि वह अन्यथा उसे CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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द्वितीयोऽध्यायः ६१ बालक आश्रयदाताओं के द्वारा उसको क्लेश पहुंचाये पश्चात् किसी भांति समझा-के विषय बुझाकर ठीक रास्ते पर लाये, जैसे उच्छृङ्खल दुष्ट हाथी को क्लेश पहुँचाकर ' ', सुखपूर्वक बांधा जाता है ।
सुदुर्वृत्तास्तु दायादा हन्तव्यास्ते प्रयत्नतः ।
॥ व्याघ्रादिभिः शत्रुभिर्वा छलै राष्ट्रविवृद्धये ॥ २८ ॥
विश्वासी अतोऽन्यथा विनाशाय प्रजाया भूपतेश्च ते । जानकर जो राजा के दायादवर्गवाले ( वंश के लोग ) अत्यन्त दुष्ट आचरण करने-वाले हों उन्हें प्रयत्नपूर्वक व्याघ्रादि, शत्रु या छल के द्वारा राज्य की उन्नति के लिये मार डालना चाहिये । इससे अन्यथा करने पर वे प्रजा तथा राजा के विनाश के कारण होते हैं ।. तोषयेयुर्नृपं नित्यं दायादाः स्वगुणैः परः ॥ २६ ॥
भ्रष्टा भवन्त्यन्यथा ते स्वभागाज्जीवितादपि । त्री आदि अतः दायादवर्ग के लोग श्रेष्ठ अपने गुणों से राजा को सन्तुष्ट रहे
विशारद, अन्यथा वे अपने हिस्से तथा जीवन से विहीन हो जाते हैं ।
नेवाला, स्वापिण्ड्यविहीना ये हान्योत्पन्ना नराः खलु ॥ ३० ॥
नाओं का मनसापि न मन्तव्या दत्ताद्याः स्वसुता इति ।
तद्दत्तकत्वमिच्छन्ति दृष्ट्वा यं धनिकं नरम् ॥। ३१ ॥
स्वकुलोत्पन्नकन्यायाः पुत्रस्तेभ्यो वरो हातः । जो अपने सपिण्ड्य से विहीन ( अपने वंश का नहीं ) होकर दूसरे वंश में उत्पन्न हुये मनुष्य दत्तादिपुत्र होते हैं उन्हें मन से नहीं समझना चाहिये कि ये मेरे पुत्र हैं । क्योंकि वे ( दत्तादिकपुत्र ) जिसको धनी पुरुष देखते हैं , अच्छे उसके दत्तक पुत्र बनने की इच्छा करते हैं अतः उनकी अपेक्षा अपने कुल में पालन- उत्पन्न कन्या का पुत्र ( दौहित्र ) अच्छा होता है ।: क्योंकि अंगादंगात्संभवति पुत्रवद् दुहिता नृणाम् ॥ ३२ ॥
पिण्डदाने विशेषो न पुत्रदौहित्रयोस्त्वतः । क्योंकि पुत्र की भांति मनुष्यों के अङ्ग अङ्ग से कन्या भी उत्पन्न होती है । अतः पिण्डदान में पुत्र और दौहित्र में कोई अन्तर नहीं है अर्थात् दोनों से
करने के तृप्ति होती है ।
लेकर भूप्रजापालनार्थं हि भूपो दन्तं तु पालयेत् ॥ ३३ ॥
नृपः प्रजापालनार्थं सघनश्चेन्न चान्यथा । और राजा पृथ्वी तथा प्रजाओं के पालनार्थं दत्तकपुत्र का पालन करे । क्योंकि वह प्रजापालन तथा धन ( राज्य ) देने के लिये ही दत्तक पुत्र लेता है. व्यसन के अन्यथा उसे कोई आवश्यकता नहीं है ।... CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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६२ शुक्रनीति: परोत्पन्ने स्वपुत्रत्वं मत्वा सर्वं ददाति तम् ॥ ३४ ॥
किमाश्वर्यमतो लोके न ददाति यजत्यपि । अपने इससे बढ़कर संसार में आश्चर्य का विषय क्या है? कि जिस धन को न दुर्योधनभा किसी को देता है और न उससे यज्ञ ही करता है, फिर भी उसी धन को दूसरे -कुल में उत्पन्न दत्तक पुत्र में अपने पुत्र की भावना करके उसके लिये सम्पूर्ण
रूप से त्याग कर देता है ।
प्राप्यापि युवराजत्वं प्राप्नुयाद्विकृति न च ॥ ३५ ॥
स्वसंपत्तिमदान्नैव मातरं पितरं गुरुम् ' भ्रातरं भगिनीं वापि हान्यान्वा राजवल्लभान् ॥ ३६ ॥
महाजनांस्तथा राष्ट्रे नावमन्येत [ पीडयेत् । और युवराज - पद को पाकर दत्तक राजकुमार को विकृति नहीं लानी चाहिये अर्थात् बदल नहीं जाना चाहिये । और अपनी लम्पत्ति के मद से माता, पिता, गुरु ( शिक्षक या गुरुजन ), भाई, बहिन या इनसे अन्य राजा के प्रिय ( मन्त्री आदि ) और राज्य में श्रेष्ठजन हैं इनका तिरस्कार न करे
और न पीड़ा ही पहुंचावे ।
यदा तु कञ्चिण्ज्ञातीनां बाह्यः प्रार्थयते कुलम् ॥ ३७ ॥
न मर्षयन्ति तत्सन्तो बाह्ये नाभिप्रदर्शनम् । जब कोई जातियों से बाहर का व्यक्ति कुल की प्रार्थना करता है तो उसके
-कुलीनता के प्रदर्शन को अच्छे लोग बर्दास्त नहीं करते ।
प्राप्यापि महती वृद्धिं वर्तेत पितुराज्ञया ॥
पुत्रस्य पितुराज्ञापि परमं भूषणं स्मृतम् । बड़ी भारी तरक्की को पाकर भी पिता की आज्ञानुसार
- के लिये पिता की आज्ञा का पालन करना परम भूषण है ।
भार्गवेण हता माता राघवस्तु वनं गतः ॥
पितुस्तपोबलात्तौ तु मातरं राज्यमापतुः ।
शापानुग्रहयोः शक्तो यस्तस्याज्ञा गरीयसी ॥
पिता की आज्ञा से परशुरामजी ने माता की हत्या की ३८ || रहे क्योंकि पुन ३ ९ ॥ ४० ॥ और रामजी बन को गये । किन्तु पिता के तपोबल से पुनः उन दोनों ने क्रम से परशुराम ने माता का पुनरुज्जीवन और राम ने पुनः राज्य - लाभ प्राप्त किया क्योंकि शाप देने और अनुग्रह करने में जो समर्थ हों उनकी आज्ञा सर्वोपरि मान्य होती है ।
सोदरेषु च सर्वेषु स्वस्याधिक्यं न दर्शयेत् ।
भागार्हभ्रातॄणां नष्टो ह्यवमानात्सुयोधनः ॥ ४१ ॥
CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri राजपुत्र की भांति इ पाकर भी उ आदि राज्य से उनके शा अतः चाहिये । चाहिये । भी खेद हो जिसके जिसके साथ या विरुद्ध प्र जासूस ( पलट ) हो और अन्यथा दण्डित करे
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द्वितीयोऽध्यायः ६३ अपने भाइयों के सामने अपनी महत्ता का प्रदर्शन न करे । क्योंकि धनको दुर्योधन • भाग ( अंश - हिस्सा ) पाने योग्य भाइयों के अपमान से नष्ट हो गया । पितुराज्ञोल्लंघन प्राप्यापि पदमुत्तमम् । दू ये सम्पूर्ण तस्माद् भ्रष्टा भवन्तीह दासवद्राजपुत्रकाः ॥ ४२ ॥
ययातेश्च यथा पुत्रा विश्वामित्रसुता यथा । राजपुत्रों की पिता के विषय में कर्तव्यता का निर्देश – राजपुत्र लोग दास की भांति इस लोक में पिता की आज्ञा का उल्लंघन करने से उत्तम पद को -पाकर भी उससे भ्रष्ट ( हीन ) हो जाते हैं । जैसे ययाति राजा के पुत्र यदु आदि राज्यभ्रष्ट और विश्वामित्र के पुत्र गण पिता की आज्ञा का उल्लंघन करने न्हीं लानी - से मद से -से अन्य र न करे
उनके शापवश कुत्ते का मांस भोजन करनेवाले हो गये ।
पितृसेवा परस्तिष्ठेत्कायवाङ्मानसैः सदा ॥ ४३ ॥
तत्कर्म नियतं कुर्याद्येन तुष्टो भवेत्पिता ।
तन कुर्याद्येन पिता मनागपि विषीदति ॥ ४४ ॥
अतः पुत्र को सदा शरीर, वाणी और मनले पिता की सेवा में तत्पर रहना चाहिये । और जिससे पिता प्रसन्न हो उस कर्म को नियत रूप से करना चाहिये । और उस कर्म को नहीं करना चाहिये जिससे पिता को थोड़ा भी खेद हो ।
यस्मिन्पितुर्भवेत्प्रीतिः स्वयं तस्मिन्प्रियं चरेत् ।
यस्मिन्द्वेषं पिता कुर्यात्स्वस्यापि द्वेष्य एव सः ॥ ४५ ॥
असंमतं विरुद्धं वा पितुर्नैव समाचरेत् । जिसके ऊपर पिता का प्रेम है उसके साथ स्वयं भी प्रिय व्यवहार करे । और नोंकि पुत्र जिसके साथ पिता द्वेष करे उसके लिये स्वयं भी द्वेषी एवं जो पिता को असंमत
या विरुद्ध प्रतीत हो उस व्यवहार को न करे ।
चारसूचक दोषेण यदि स्यादन्यथा पिता ॥ ४६ ॥
प्रकृत्यनुमतं कृत्वा तमेकान्ते प्रबोधयेत् ।
अन्यथा सूचकान्नित्यं महदंडेन दण्डयेत् ॥ ४७ ॥
मजी बन जासूस या सूचक ( चुगुलखोर ) के दोष से यदि पिता का भाव अन्यथा शुराम ने ( पलट ) हो जाय तो प्रकृति के अनुकूल करके एकान्त में उन्हें समझावे । क्योंकि और अभ्यथा रीति से सूचना देनेवाले चुगुलखोर या जासूस को भारी दण्ड से र मान्य दण्डित करे या पिता से सदा दिलावे ।
प्रकृतीनां च कपटैः स्वान्तं विद्यात्सदैव हि ।
प्रातर्नत्वा प्रतिदिनं पितरं मातरं गुरुम् ॥ ४८ ॥
राजानं स्वकृतं यद्यन्निवेद्यानुदिनं ततः । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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६४ शुक्रनीतिः एवं गृहाविरोधेन राजपुत्रा वसन् गृहे ॥ ४६ ॥
और सदैव प्रकृतियों ( मन्त्री आदि ) के चित्त के भाव को किसी ध्यान से समझे । प्रातःकाल प्रतिदिन पिता - माता, गुरु को नमस्कार कर एवं जो • प्रतिदिन का अपना किया हुआ कार्य हो उसे राजा से निवेदन करे । इस प्रकार से राजभवन के लोगों के साथ विरोध न रखते हुये राजभवन में राजपुत्र को रहना चाहिये ।
विद्यया कर्मणा शीलैः प्रजाः संरजयन्मुदा ।
त्यागी च सत्त्वसपन्नः सर्वान्कुर्याद्वशे स्वके ॥ ५० ॥
अपनी विद्या, कर्म तथा शील से प्रसन्नता के साथ प्रजा का मनोरञ्जन करता हुआ, त्याग ( दान ) तथा सत्व गुण से संपन्न होकर सब लोगों को अपने वश में रखें ।
शनैः शनैः प्रवर्धेत शुक्लपक्षमृगाङ्कवत् ।
एवंवृत्तो राजपुत्रो राज्यं प्राप्याध्यकटंकम् ॥ ५१ ॥
सहायवान्सहामात्यश्चिरं भुंक्ते वसुन्धराम् ।
समासतः कार्यमुक्तं युवराजस्य यद्धितम् ॥ ५२ ॥
शुक्ल पक्ष की चन्द्रमा की भांति धीरे २ वृद्धि को प्राप्त करे । इस प्रकार आचरण करनेवाला राजपुत्र आगे चलकर अकण्टक राज्य को पाकर सहायकों तथा मन्त्रियों के साथ रहकर चिरकाल तक पृथ्वी का उपभोग करता है इस प्रकार से युवराज के लिये जो हितकर व्यवहार है उसे संक्षेप से कहा गया है ।
समासादुच्यते कृत्यममात्यादेश्च लक्षणम् ।
मृदुगुरुप्रमाणत्ववर्णशब्दादिभिः समम् ॥ ५३ ॥
अमात्यादि भृत्यों के विषय में विचार करने का निर्देश- -अब मन्त्री की मृदुता, गम्भीरता, प्रामाणिकता, जाति और वचन इत्यादि है? इसके साथ उसके लक्षण तथा कृत्य का संक्षेप से वर्णन करते हैं ।
परीक्षकैर्द्रावयित्वा यथा स्वर्णं परीक्ष्यते ।
कर्मणा सहवासेन गुणैः शीलकुलादिभिः ॥ ५४ ॥
भृत्यं परीक्षयेन्नित्यं विश्वास्यं विश्वसेत्तदा ।
नैव जातिर्न च कुलं केवलं लक्षयेदपि ॥ ५५ ॥
स्वर्ण की परीक्षा करनेवाले जिस प्रकार गलाकर स्वर्ण की परीक्षा करते हैं, उसी प्रकार कर्म, सहवास, चरित्र, कुल आदि गुणों से भृत्य ( वेतन पानेवाले अमात्यादि ) की सदा परीक्षा करे । उसके बाद यदि विश्वास योग्य हो तो विश्वास करे और केवल जाति या कुल से परीक्षा न करे । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri जैसा क और कुल स और कुल त जाता है । य स र ए स न e त भ त वि श्रेष्ठ मृत्य उत्पन्न, धनी, जिस भांति अ तथा मानसिक मात्र ही स वाला, कार्यक से विमुख रहन पिता के ऊपर ५०