शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 151–160
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 151–160
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द्वितीयोऽध्यायः ६
व्याज से कर्मशीलगुणाः पूग्यास्तथा जातिकुलेन हि ।
जो कुछ न जात्या न कुलेनैव श्रेष्ठत्वं प्रतिपद्यते ॥ ५६ ॥
इस प्रकार विवाहे भोजने नित्यं कुलजातिविवेचनम् । जपुत्र को जैसा कर्म, शील तथा गुण से मनुष्य पूजनीय होता है वैसा जातिः और कुल से नहीं क्योंकि श्रेष्ठता जाति या कुल से ही नहीं पाई जाती है और कुल जाता 1 मनोरञ्जन लोगों को इस प्रकार सहायकों इस गया है । मन्त्री की ? इसके तथा जाति का विचार तो केवल विवाह तथा भोजन में किया: सत्यवान् गुणसम्पन्नस्तथाऽभिजनवान्धनी ॥ ५७ ॥
सुकुलश्च सुशीलश्च सुकर्मा च निरालसः ।
यथा करोत्यात्मकार्यं स्वामिकार्यं ततोऽधिकम् ॥ ५८ ॥
चतुर्गुणेन यत्नेन कायवाङ्मानसेन च ।
भृत्या च तुष्टो मृदुवाकार्यदक्षः शुचिर्हदः ॥ ५६ ॥
परोपकरणे दक्षो ह्यपकारपराङ्मुखः ।
स्वाम्यागस्कारिणं पुत्रं पितरं चापि दर्शकः ॥ ६० ॥
अन्यायगामिनि पत्यौ यतद्रूपः सुबोधकः ।
नाप्ता तद्विरं कांचित्तन्न्यूनस्याप्रकाशकः ॥ ६१ ॥
अदीर्घसूत्रः सत्कार्ये ह्यसत्कार्ये चिरक्रियः ।
न तद्भार्यापुत्रमित्रच्छिद्रदर्शी कदाचन ॥ ६२ ॥।
तद्वद् बुद्धिस्तदीयेषु भार्यापुत्रादिबन्धुषु ।
न श्लाघते स्पर्धते न नाभ्यसूयति निन्दति ॥। ६३ ॥
नेच्छत्यन्याधिकारं हि निःस्पृहे मोदते सदा ।
तद्दत्तवस्त्रभूषादिघार कस्तत्पुरोऽनिशम् ॥ ६४ ॥
भृतितुल्यव्ययी दान्तो दयालुः शूर एव हि ।
तदकार्यस्य रहसि सूचको भृतको वरः ॥ ६५ ॥
विपरीतगुणैरेभिर्भृतको निन्द्य उच्यते । श्रेष्ठ मृत्य के लक्षण – सत्य बोलनेवाला, गुणों से युक्त, उच्च वंश में उत्पन्न, धनी, निर्दोष कुलवाला, सुशील, उत्तम कर्म करनेवाला, आलस्य रहित,. जिस भांति अपने कार्य में यत्न करता है उससे अधिक कायिक, वाचिक तथा मानसिक चौगुने यरन के साथ स्वामी का कार्य करनेवाला, केवल वेतन करते हैं मात्र से ही सन्तुष्ट रहनेवाला, मधुरभाषी, कार्य करने में चतुर, पवित्र चित्त--पानेवाले वाला, कार्य करने में स्थिर विचार रखनेवाला, परोपकार करने में निपुण, अपकार हो तो से विमुख रहनेवाला, स्वामी के साथ अपराध करने में प्रवृत्त उनके पुत्र तथा पिता के ऊपर भी निगाह रखनेवाला अर्थात् वे स्वामी का अपराध न कर सकें-५ शु ० CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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शुक्रनीति:. . ३३ ऐसा यत्न करनेवाला, अन्याय - पथ पर चलने वाले स्वामी को सत्पथ पर चलाने में यत्नशील, स्वामी के किसी बात पर आक्षेप नहीं करनेवाला, और उनकी त्रुटियों को देखकर कभी किसी के सामने प्रकाशित न करनेवाला, अच्छे कार्यों में जल्दी और बुरे कार्यों में देर लगाकर कार्य करनेवाला, स्वामी के भार्या, पुन्न, मिन्न के छिद्रों ( दोपों ) को कभी नहीं देखनेवाला ( नहीं प्रकाश करने, चाला ), और स्वामी के सम्बन्धियों के भार्या, पुत्र आदि बन्धुजनों के विषय में स्वामी जैसा आदर - सम्मान करते हों वैसा ही बुद्धि रखकर उन सबों के: साथ व्यवहार करनेवाला, और स्वयं अपनी प्रशंसा नहीं करनेवाला एवं स्वामी या स्वामी के सम्बन्धी जनों के साथ स्पर्धा या उनके गुणों में दोषारोप या निन्दा नहीं करनेवाला, दूसरे के अधिकार पाने की लालसा नहीं रखनेवाला, निःस्पृह होकर सदा प्रसन्न रहनेवाला, स्वामी के समक्ष उसके दिये हुये वस्त्र तथा भूषणादि को सदा धारण करनेवाला, वेतन के अनुसार अपना व्यय करनेवाला, इन्द्रियों का दमन करनेवाला, दयालु, शूर और स्वामी के अनुचित कार्य को एकान्त में उसके सामने सूचित करनेवाला भृत्य ( मन्त्री आदि ) श्रेष्ठ कहलाता
है । और उपरिलिखित गुणों से विपरीत गुणोंवाला भृत्य निन्द्य कहलाता है ।
ये भृत्या हीनभृतिका ये दंडेन प्रकर्षिताः ॥ ६६ ॥
शठाश्च कातरा लुब्धाः समक्षप्रियवादिनः ।
मत्ता व्यसनिनश्चार्ता उत्कोचेष्टाश्च देविनः ॥ ६७ ॥
नास्तिका दाम्भिकाचैवा सत्यवाचोऽप्यसूयकाः ।
ये चापभानिता येऽसद्वाक्यैर्मर्मणि भेदिताः ॥ ६८ ॥
रिपोर्मित्राः सेवकाश्च पूर्ववैरानुबन्धिनः ।
चण्डाः साहसिका धर्महीना नैते सुसेवकाः ॥ ६ ९ ॥
संक्षेपतस्तु कथितं सदसद्द्भृत्यलक्षणम् । निन्यभृत्य के लक्षण —जो भृत्य स्वल्प वेतन पानेवाले, निरन्तर अपराध करने से दण्ड द्वारा अध्यन्त पीड़ित किये, शठ, कायर, लोभी, सामने प्रिय बोलनेवाले, मद्य पीकर मतवाले हुवे, शिकार आदि के व्यसनी, रोगी, घुस लेनेवाले, जूक्षा खेलनेवाले, नास्तिक, दाम्भिक, झूठे, गुणों में दोषारोप करनेवाले, अपमानित, कठोर बाक्यों से मर्म में पीड़ा पहुँचाये गये, शत्रुओं के मित्र या सेवक, पूर्व वैर को मन में रखनेवाले, अत्यन्त क्रोधी, बिना विचारे सहसा कार्य करनेवाले या धर्म से हीन होते हैं वे सुन्दर सेवक नहीं होते हैं अर्थात् ये निन्द्य भृत्यों के लक्षण हैं । इस प्रकार से संक्षेप में अच्छे - बुरे सेवकों
के लक्षण कहे गये ।
समासतः पुरोधादिलक्षणं यत्तदुच्यते ॥ ७० ॥
CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri 1 द दश प्रकृ कहते हैं । सुमन्त्रक, अम कारण ) कह पूर्व - पूर्व एक मांश अधिक अधिक पण्डित अधिक मन्त्री प्रधान का उ पुरोधा का वेत अ अ ए भाठ प्रक से युक्त होता सचिव, अमात्य में परस्पर सम और इि के तरव को जा कार्य करनेवाल इसकी गणना पुर त । सा मा सुम
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चलाने र उनकी च्छे कार्यों के भार्या, 1 द्वितीयोऽध्यायः
पुरोधाच प्रतिनिधिः प्रधानः सचिवस्तथा ।
मन्त्री च प्राड्विवाकश्च पण्डितश्च सुमन्त्रकः ॥
अमात्यो दूत इत्येता राज्ञः प्रकृतयो दश ।
दशमांशाधिकाः पूर्व दूतान्ताः क्रमशः स्मृताः ॥
६७ ७१ ॥ ७२ ॥। नाश करने- दश प्रकृतियों के नाम- अब पुरोहित आदि के जो लक्षण हैं उन्हें संक्षेप विषय में से कहते हैं । पुरोहित, प्रतिनिधि, प्रधान, सचिव, मन्त्री, प्राड्विवाक, पण्डित, के साथ सुमन्त्रक, अमात्य, दूत ये दश राजा के ' प्रकृति ' ( राज्य चलाने में प्रधान स्वामी या कारण ) कहलाते हैं । और पुरोधा से लेकर दूतपर्यन्त इन दशों के वेतन निन्दा पूर्व - पूर्व एक दूसरे की अपेक्षा दशमांश अधिक होते हैं । अर्थात् दूत से दश-निःस्पृह air अधिक अमात्य का, उससे दशमांश अधिक सुमन्त्रक का, उससे दशमांश वस्त्र तथा अधिक करनेवाला, अधिक प्रधान कहलाता - पुरोधा छाता है । पण्डित का, उससे दशमांश अधिक प्राड्विवाक का, उससे दशमांश मन्त्री का, उससे दशमांश अधिक सचिव का, उससे दशमांश अधिक का, उससे दशमांश अधिक प्रतिनिधि का, उससे दशमांश अधिक का वेतन होता है, जो सबसे अधिक होता है ।
अष्टप्रकृतिभिर्युक्तो नृपः कैश्चित्स्मृतः सदा ।
सुमन्त्रः पण्डित मन्त्री प्रधानः सचिवस्तथा ॥ ७३ ॥
' अमात्यः प्राड्विवाकश्च तथा प्रतिनिधिः स्मृतः ।
एता भृतिसमास्त्वष्टौ राज्ञः प्रकृतयः सदा ॥ ७४ ॥
आठ प्रकृतियों के नाम और किसी के मत से राजा सदा ८ प्रकृतियों से युक्त होता है जो कि इस क्रम से हैं- सुमन्त्र, पण्डित, मन्त्री, प्रधान, सचिव, अमात्य, प्राड्विवाक, प्रतिनिधि । ये ८ राजा की प्रकृतियां सदा वेतन में परस्पर समान हैं अर्थात् इनके पूर्वमत की भांति भिन्न - भिन्न वेतन नहीं है । निरन्तर इङ्गिताकारतत्वज्ञो दूरस्तदनुगः स्मृतः । और इङ्गित ( हृद्गतभाव ) तथा आकार ( शरीर की चेष्टायें ) इन दोनों नी, सामने के तस्व को जाननेवाला एवं राजा या सुमन्त्र आदि ८ प्रकृतियों के आज्ञानुसार नी, रोगी, कार्य करनेवाला दूत साधारण नौकरमात्र है अतः इस मत में प्रकृति के अम्बर
दोषारोप इसकी गणना नहीं की गई ।
शत्रुओं के पुरोधाः प्रथमं श्रेष्ठः सर्वेभ्यो राजराष्ट्रभृत् ॥ ७५ ॥
विचारे तदनु स्यात्प्रतिनिधिः प्रधानस्तदनन्तरम् ।
हीं होते हैं । सचिवस्तु ततः प्रोक्तो मन्त्री तदनु चोच्यते ॥ ७६ ॥
डरे सेवकों प्राड्विवाकस्ततः प्रोक्तः पण्डितस्तदनन्तरम् ।
सुमन्त्रस्तु ततः ख्यातो ह्यमात्यस्तु ततः परम् ॥ ७७ ॥
- दूतस्ततः क्रमादेते पूर्वश्रेष्ठा यथागुणाः । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eangotri
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६८ शुक्रनीति: पुरोहितादिकों के अधिकार — पूर्वमतानुसार प्रथम जो पुरोधा ( पुरोहित ) है वह अन्य प्रतिनिधि आदि प्रकृतियों की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ है क्योंकि शास्त्रोक्त पूजन अनुष्ठान के द्वारा विघ्ननाश करने से राजा तथा राज्य की रक्षा करनेवाला होता है । उससे कम प्रतिनिधि, प्रतिनिधि से कम प्रधान, प्रधान से कम सचिव, सचिव से कम मन्त्री, मन्त्री से कम प्राड्विवाक, प्राड्विवाक से कम पण्डित, पण्डित से कम सुमन्त्र, सुमन्त्र से कम अमात्य, अमान्य से कम दूत श्रेष्ठ है 1
। ये सब क्रम से अपने - अपने गुणानुसार पूर्व - पूर्व श्रेष्ठ होते हैं ।
मन्त्रानुष्ठानसम्पन्नस्त्रैविद्यः कर्मतत्परः ॥ ७८ ॥
जितेन्द्रियो जितक्रोधो लोभमोहविवर्जितः ।
षडङ्गवित्सांगधनुर्वेद विश्वार्थधमवित ॥ ७६ ॥
यत्कोपभीत्या राजापि धर्मनीतिरतो भवेत् ।
नीतिशास्त्राम्रव्यूहादिकुशलस्तु पुरोहितः ॥ ८० ॥
सैवाचार्यः पुरोधा यः शापानुग्रहयोः क्षमः । पुरोहितादिकों के लक्षण – यथाविधि मन्त्रों के अनुष्ठान द्वारा कार्य को सिद्ध करनेवाला, तीनों ( ऋग्, यजु, साम ) वेदों का जाननेबाला, कार्य करने में शीघ्रता करनेवाला, जितेन्द्रिय, क्रोध को जीतनेवाला, लोभ तथा मोह से रहित, षडङ्ग ( वेद के व्याकरण, शिक्षा, कल्प, निरुक्त, छन्द, ज्यौतिष इन छ अङ्गों ) का जाननेवाला, साङ्गोपाङ्ग धनुर्वेद का ज्ञाता, अर्थ तथा धर्मं को जाननेवाला एवं जिसके कोप के भय से राजा भी धर्म तथा नीति में रत रहता है ऐसा नीतिशास्त्र, शस्त्रास्त्र चलाने की कला एवं व्यूहरचना में कुशल पुरोहित को होना चाहिये और पुरोहित को ही आचार्य भी कहते हैं । यह शाप तथा
अनुग्रह ( वर ) दोनों के देने में समर्थ भी होता है ।
विना प्रकृतिसन्मन्त्राद्राज्यनाशो भवेदुद्ध्रुवम् ॥ ८१ ॥
रोधनं न भवेत्तस्माद्राज्ञस्ते स्युः सुमन्त्रिणः । पूर्वोक पुरोहित आदि प्रकृतियों के साथ बिना अच्छी मन्त्रणा ( सलाह ) किये राजा यदि कोई कार्य करता है तो राज्य का नाश निश्चय हो जाता है । एवं राजा का रोधन ( कुमार्ग से रोकना ) नहीं हो सकता है । इसलिये उन
सब पुरोहितादि प्रकृतियों को अच्छा सलाह देनेवाला होना उचित है ।
न बिभेति नृपो येभ्यस्तैः स्यात् किं राज्यवर्धनम् ॥ ८२ ॥
यथालंकारवस्त्राद्यैः स्त्रियो भूष्यास्तथा हि ते । जिन पुरोहितादि प्रकृतियों से राजा ने डरे उनसे क्या राज्य की वृद्धि हो सकती है? कदापि नहीं । जैसे अलङ्कार वस्त्र आदि से स्त्रियां केवल सुशोभित होती हैं वैसे ही अच्छी सलाह न देने वाले उन पुरोहितादि प्रकृतियों से राजा -CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri का केवल शो राज्यको को श र जिनकी भावों की अ वे सब व्यर्थ क्या क जानने वाला ' निरीक्षण कर ' सचिव ' कह F नीतिश ' मन्त्री ' कह -लोक - व्यवहा • कहलाता है देश औ एवं आय ( .: जो जाननेवा हद्रतभा कालानुरूप आसन ( कि • मिलकर भीत -लेना ), इन बोलने में च
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द्वितीयोऽध्यायः ६ ९ रोहित ) का केवल शोभामात्र ही है अतः वे पुरोहितादि केवल शोभाधायक हैं उनसे
है क्योंकि राज्य को कोई लाभ नहीं है ।
की रक्षा राज्यं प्रजा बलं कोशः सुनृपत्वं न वर्धितम् ॥ ८३ ॥
, प्रधान यन्मन्त्रतोऽरिनाशस्तैर्मत्रिभिः किं प्रयोजनम् । विवाक जिनकी सलाह से राजा का राज्य, प्रजा, सेना, कोश और राजा के सुन्दर अमात्य से भावों की अभिवृद्धि न हो तो उन मन्त्री आदियों से क्या प्रयोजनं । अर्थात्
- होते हैं । वे सब व्यर्थ हैं ।
कार्याकार्यप्रविज्ञाता स्मृतः प्रतिनिधिस्तु सः ॥ ८४ ॥।
सर्वदर्शी प्रधानस्तु सेनावित्सचिवस्तथा । क्या करने योग्य है? क्या नहीं करने योग्य है! इसको भलीभांति जाननेवाला जो होता है वह ' प्रतिनिधि ' कहलाता है और सब कार्यों का ' निरीक्षण करनेवाला ' प्रधान ' एवं सन्य - संचालन का भलीभांति जाननेवाला
' सचिन ' कहलाता है ।
कार्य को मन्त्री तु नीतिकुशलः पण्डितो धर्मतत्त्ववित् ॥ ८५ ॥
कार्य करने लोकशाखनयज्ञस्तु प्राङ्घिवाकः स्मृतः सदा । मोह से नीतिशास्त्र के जानने एवं तदनुसार कार्य करने में जो कुशल है वह तिष इन ' मन्त्री ' कहलाता है । और धर्म के तत्व को जाननेवाला ' पण्डित ' एवं सदा धर्म को -लोक - व्यवहार तथा शास्त्रोक व्यवहार को जानने वाला ' प्राविवाक '
रत रहता • कहलाता है ।
पुरोहित देशकाल प्रविज्ञाता हामात्य इति कथ्यते ॥ ८६ ॥
शाप तथा आयव्यय प्रविज्ञाता सुमन्त्रः स च कीर्तितः । देश और लेख के विषय को अच्छी तरह जो जाननेवाला है वह ' अमात्य ' एवं आय ( अर्थागम ) और व्यय ( अर्थ का खर्च ) के कार्यों को सुचारु रूप से
जो जाननेवाला है वह ' सुमन्त्र ' कहलाता है ।
- सलाह ) इङ्गिताकारचेष्टज्ञः स्मृतिमान्देशकालवित् ॥ ८७ ॥
जाता है । षाड्गुण्यमन्त्रविद्वाग्मी वोतभीर्दूत इष्यते । लिये उनः हृद्रतभाव तया चेष्टा को समझनेवाला, उत्तम स्मरणशक्तिवाला, देश-* कालानुरूप कर्त्तव्य कर्म को जाननेवाला, सन्धि, विग्रह, यान ( चढ़ाई करना ), 1। ८२ ॥ आसन ( किले आदि में रहकर लड़ना ), द्वैधीभाव ( ऊपर से शत्रुओं से • मिलकर भीतर - भीतर उनसे दुश्मनी रखना ), समाश्रय ( सबल का आश्रय हो । -लेना ), इन सब के विषय में उचित मन्त्र ( विचार ) का जाननेवाला, वृद्धि खोलने में चतुर, नहीं डरनेवाला ' दूत ' कहलाता ' है 1 सुशोभित से राजा अहितं चापि यत्कार्यं सद्यः कर्तुं यदोचितम् ॥ ८८ ॥
1 CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection: Digitized by esangotri
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.७० शुक्रनीति
अकर्तुं यद्धितमपि राज्ञ प्रतिनिधिः सदा ।
बोधयेत्कारयेत्कुर्यान्न कुर्यान्न प्रबोधयेत् ॥ ८ ९ ॥
प्रतिनिधि का कार्य - प्रतिनिधि का यह कर्तव्य है कि वह सदा जो कार्य अहितकर भी है किन्तु जिस समय उसी को शीघ्रता के साथ करना उचित हो “ उसे राजा से कहे और करावे तथा स्वयं करे एवं जो हितकर भी कार्य है जिस , समय उसका करना अनुचित है, उसे न राजा से करने के लिये कहे और न करावे एवं स्वयं भी न करे । सत्यं वा यदि वाऽसत्यं कार्यजातं च यत्किल । -सर्वेषां.. राजकृत्येषु प्रधानस्तद्विचिन्तयेत् ॥ ९ ० ॥ प्रधान का कृत्य — प्रधान का कृत्य यह है कि वह सभी राजकार्यों में • कौन २ कार्य सत्य हैं और कौन २ असत्य हैं इसका विचार करे ।
गजानां च तथाऽश्वानां रथानां पदगामिनाम् ।
सुदृढानां तथोष्ट्राणां वृषाणां सद्य एव हि ॥ ६१ ॥
वाद्यभाषासु संकेतव्यूहाभ्यसनशालिनाम् ।
प्राक्प्रत्यग्गामिनां राज्यचिह्नशस्त्रास्त्रघारिणाम् ॥ ९ २ ॥
परिचारगणानां होनमध्योत्तमकर्मणाम् ।
' अस्त्राणामस्वजातीनां संघः स्वतुरगीगणः ॥ ९ ३ ॥
कार्यक्षमा प्राचीनः साद्यस्कः कति विद्यते ।
कार्यासमर्थः कत्यस्ति शस्त्रगोलाग्निचूर्णयुक् ॥ ६४ ॥
सांग्रामिकश्च कत्यस्ति संभारस्तान्विचिन्त्य च ।
सचिवश्चापि तत्कार्यं राज्ञे सम्यग् निवेदयेत् ॥ ६५ ॥
सचिव के कृत्य - ' सचिव ' का कृत्य यह है कि- हाथी, घोड़े, रथ, पैदल सैनिक, सुइद ऊँट, विदेशी भाषाओं में संकेत और व्यूहरचना का सतत अभ्यास करनेवाले ( अभिज्ञ ), पूर्व तथा पश्चिम दिशा के देशों में जानेवाले, मध्यम तथा उत्तम श्रेणी के कार्य करनेवाले, राजचिह्न ( झण्डा - निशान ), शस्त्र तथा अस्त्र के धारण करनेवाले ऐसे परिचारकगण एवं अस्त्र तथा अस्त्रों के चलाने . के नियमों को विचारकर उपर्युक्त इन सब में तत्काल कितने हैं और उनको क्या दशा है और कार्य में आने योग्य प्राचीन तथा नवीन घुड़सवार कितने हैं तथा कार्य में नहीं आने योग्य कितने हैं । शस्त्र, गोला, बारूद इन सर्वो से युक्त लड़ाई की सामग्री कितनी है? इन सबों को विचार कर राजा से उक • सभी कार्यों को यथार्थ रूप से लिखित निवेदन करे ।
साम दानश्च भेदश्च दण्डः केषु कदा कथम् ।
17 कर्तव्यः किं फलं तेभ्यो बहुमभ्यं तथाऽल्पकम् ॥ ९ ६ ॥
CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri मन्त्री किस प्रकार फल होगा? राजा से निव प्रावि ( विचार पति ( गवाह ) इच्छा से पैद विचार कर ( अग्निपरीक्ष मैं कौन प्रम से विचार क पण्डित समय प्राची धर्म का श उनके प्रचलि लोक तथा सुमन्त्र दिक स्थायी
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जो कार्य किस उचित हो फल है किन्तु राजा कहे और G ॥ जिकार्यों में द्वितीयोऽध्यायः ७१ एतत्संचिन्त्य निश्चित्य मन्त्रो सर्वं निवेदयेत्! मन्त्री के कार्य — मन्त्री का कर्तव्य यह है कि - वह किन विपयों में कब, प्रकार से सन्धि, दान, भेद और विग्रह करना चाहिये एवं उससे क्या होगा? और वह अधिक, मध्यम या अक्ष्प होगा, इन सर्वो का विचार कर से निवेदन करे । साक्षिभिर्लिखितैर्भोगैश्छलैर्भूतैश्च मानुषान्
स्वानुत्पादितसंप्राप्तव्यवहारान्विचिन्त्य ।
दिव्य - संसाधनाद् वापि केषु किं साधनं परम् ॥
युक्तिप्रत्यक्षानुमानोपमानैर्लोकशास्त्रतः बहुसम्मत संसिद्धा न्विनिश्चित्य सभास्थितः ॥ ससभ्यः प्राड्विवाकस्तु नृपं सम्बोधयेत्सदा ॥ ६७ ॥
६८ | ॥ ६६ ॥ । प्राविवाक के कार्य – ‘ ' प्राहृचिवाक " का कर्तव्य यह है कि वह ( विचारपति ) सभा में स्थित हो, सभ्यों ( जूरियों ) के साथ मिलकर साच्ची ( गवाह ) एवं लेखक के द्वारा सत्य या छल से युक्त मनुष्यों एवं अपनी ॥ इच्छा से पैदा किये हुये या यथार्थ रूप से उपस्थित किये गये विवादों को विचार कर उनमें से किसी का साक्षी या लेखक के अभाव में दिव्यसाधन ( अग्निपरीक्षा आदि ) एवं किसी का बहुत लोगों की सम्मति से तथा किसी.. में कौन प्रमाण उचित होगा इसका प्रत्यक्षं, अनुमान, हान्त तथा लोकशास्त्र
विचार कर जो निर्णय हो उसे राजा से सदा निवेदन करे ।
॥
घोड़े, रथ, T का सतत - जाने वाले, वर्तमानाश्च प्राचीना धर्माः के लोकसंश्रिताः ॥ १०० ॥
शास्त्रेषु के समुद्दिष्टा विरुभ्यन्ते च केऽधुना ।
लोकशास्त्रविरुद्धाः के पण्डितस्तान्विचिन्त्य च ॥ १०१ ॥
नृपं संबोधयेत्तैश्च परत्रेह सुखप्रदैः । पण्डित के कार्य - पण्डित का कर्तव्य यह है कि वह प्रजागण इस ), शत्र समय प्राचीन या नवीन में से किस धर्म का पालन कर रहे हैं और किस न धर्म का शास्त्र में निर्दिष्ट होने पर भी आदर नहीं कर रहे हैं और कौन से i के चलाने उनकी उनके प्रचलित धर्म शास्त्र विरुद्ध पड़ रहे हैं, इन सब को विचार कर जो नौर इस ' हैं । लोक तथा पर लोक में सुखप्रद धर्म हैं उन्हें राजा से निवेदन करे । र कितने न सर्वो से जा से उक द्विक ६ ॥ इयच्च संचितं द्रव्यं वत्सरेऽस्मिंस्तृणादिकम् ॥ १०२ ॥
व्ययीभूतमियच्चैव शेषं स्थावरजंगमम् ।
इयदस्तीति वै राज्ञे सुमन्त्रो विनिवेदयेत् ॥ १०३ ॥।
सुमन्त्र के कार्य — सुमन्त्र का कर्त्तव्य यह है कि वह इस वर्ष में तृणा-स्थायी तथा अस्थायी द्रव्य का इतना संचय हुआ था ओर उसमें से CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi, Collection: Digitized by eangotri
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७२ शुक्रनीति: इतना व्यय हुआ और अब इतना बचा हुआ है । इसे राजा से पुराणि च कति प्रामा अरण्यानि च सन्ति हि कति कति भूः केन प्राप्तो भागस्ततः कति ॥
भागशेषं स्थितं कस्मिन्कत्यकृष्टा च भूमिका ।
भागद्रव्यं वत्सरेऽस्मिन्छुल्कदण्डादिजं कति ॥
अकृष्टपच्यं कति च कति चारण्यसंभवम् ।
निवेदन करे ॥
१०४ ॥
१०५ ॥
कति चाकरसंजातं निधिप्राप्तं कतीति च ॥ १०६ ॥
अस्वामिकं कति प्राप्तं नाष्टिकं तस्कराहृतम् ।
संचितं तु विनिश्चित्यामात्यो राज्ञे निवेदयेत् ॥ १०७ ॥
समासालक्षणं कृत्यं प्रधानदशकस्य च । अमात्य के कार्य — अमात्य का कर्त्तव्य यह है कि वह — राज्य में कितने नगर, ग्राम या जंगल हैं? किसने कितनी भूमि जोती है? और उससे कितना उसने धान्य पाया? किस क्षेत्र ( खेत ) में कितना भाग बचा है? कितनी भूमि बिना जुती है? और इस देश में प्रतिवर्ष शुल्क ( मालगुजारी ), और अपराधियों के दण्ड से ( जुर्माना ) आदि से प्राप्त भाग द्रव्य ( राजा के अंश का द्रव्य ) कितना है? बिना जुती भूमि में होने वाला सस्यादि कितना है? जंगल से मिलने वाला द्रव्य कितना है? खान से निकलने वाला द्रव्य कितना है? गली आदि में पड़ी हुई अतएव अज्ञात स्वामी वाली वस्तु कितनी है? बिना स्वामी ( लावारिस ) का द्रव्य कितना है, हरण किया हुआ द्रव्य कितना है? और चोरों से दण्ड रूप में प्राप्त धन कितना है? इन सर्वो की संख्या जोड़कर राजा से निवेदन करे । इस प्रकार से संक्षेप में पुरोहितादि
प्रकृतियों का कृत्य कहा गया ।
उक्तं तल्लिखितैः सर्व विद्यात्तदनुदर्शिभिः ॥ १०८ ॥
परिवर्त्य नृपो ह्येतान्युयादन्योऽन्यकर्मणि । राजा के अन्योन्य के स्थान पर अन्योन्य की योजना का निर्देश - राजा पूर्वोक पुरोहितादिकों के लिये विहित कार्यों को जुबानी एवं उनके लेखों द्वारा जाने । और उन सर्वो को समय २ पर योग्यतानुसार एक दूसरे के पदों पर नियुक्त करता रहे । अर्थात् कभी सुमन्त्र को अमात्य पद पर एवं अमारय को
सुमन्त्र पद पर बदली करता रहे ।
न कुर्यात्स्वाधिकबलान् कदापि ह्याधिकारिणः ॥ १० ९ ॥
परस्परं समबलाः कार्याः प्रकृतयो दश । राज्य के उक्त अधिकारी पुरुषों को कभी अपने अधिकार से अधिक शकि CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri -प्रदर्शन न क बनाये रखे, पुरुषों की नि - और शेष दो पर उन दोन अधिका उसे किसी - लिये समर्थ अधिका • तक एक ही अतः य ... कार्य पर नि योग्य - चलने के ल • करने में कुछ -यदि कर्मचा उसी की नि जब क
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द्वितीयोऽध्यायः ७३ न करे । - प्रदर्शन न करने दे । और पूर्वोक्त १० प्रकृतियों को परस्पर समबल चाला
' बनाये रखे, किसी को उमड़ने न दे ।
एकस्मिन्नधिकारे तु पुरुषाणां त्रयं सदा ॥। ११० ॥
नियुञ्जीत प्राज्ञतमं मुख्यमेकन्तु तेषु वै ।
द्वौ दर्शकौ तु तत्कार्ये हायनैस्तन्निवर्तनम् ॥ १११ ॥
त्रिभिर्वा पञ्चभिवापि सप्तभिर्दशभिश्च वा ।
दृष्ट्वा तत्कार्यकौशल्ये तथा तं परिवर्तयेत् ॥ ११२ ॥
अधिकार की व्यवस्था का निर्देश - राजा एक अधिकार ( पर्व ) पर तीन पुरुषों की नियुक्ति करे और उनमें से जो एक अत्यन्त बुद्धिमान हो उसे मुख्य और शेष दो को दर्शक ( सहायक ) बनावे | और ३, ५, ७, और १० वर्षों राज्य में पर उन दोनों के कार्य तथा निपुणता को देखकर तदनुसार परिवर्तन करे । और उससे बचा है? गुजारी ), राजा के उसे दि कितना - लिये ला द्रव्य कितनी • तक आ द्रव्य सर्वो की रोहितादि
नाधिकारं चिरं दद्याद्यस्मै कस्मै सदा नृपः ।
अधिकारे क्षमं दृष्ट्वा ह्यधिकारे नियोजयेत् ॥ ११३ ॥
अधिकार- योग्य को अधिकार देने का निर्देश- राजा सदा चाहे जो हो किसी अधिकार ( पद ) पर ज्यादा दिन तक न रहने दे अधिकार के समर्थ देखकर उसे किसी अधिकार पर रखे । अधिकारमदं पीत्वा को न मुह्येत्पुनश्चिरम् । अधिकाररूपी मद पीकर कौन नहीं प्रमत्त हो जाता है । अतः चिरकाल
एक ही अधिकार पर न रहने दे ।
अतः कार्यक्षमं दृष्ट्वा कार्येऽन्ये तं नियोजयेत् ॥ ११४ ॥
अतः उस कर्मचारी को कार्य करने में समर्थ देखकर एक कार्य से दूसरे ..कार्य पर नियुक्त कर दे ।
तत्कार्ये कुशलं चान्यं तत्पदानुगतं खलु ।
नियोजयेद्वर्तने तु तदभावे तथा परम् ॥ ११५ ॥
- तद्गुणो यदि तत्पुत्रस्तत्कार्ये तं नियोजयेत् । - राजा योग्य अधिकारी के अभाव में अन्य की योजना का निर्देश — और कार्य खों द्वारा - चलने के लिये उस पद पर स्थित ( असिष्टण्ट ) अन्य जन को जो उस कार्य के पदों पर -करने में कुशल हो- नियुक्त करे । उसके अभाव दूसरे को नियुक्त करे । माथ्य -यदि कर्मचारी का पुत्र पिता के तुल्य कार्य करने वाला हो तो उसके कार्य पर
- उसी की नियुक्ति करे ।
यथा यथा श्रेष्ठपदे ह्याधिकारी यदा भवेत् ॥ ११६ ॥
अनुक्रमेण संयोज्यो ह्यन्ते तं प्रकृति नयेत् । शक्ति जब कोई नया कर्मचारी जैसे २ अपने से श्रेष्ठ पद के योग्य होता जाय क ' CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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७४: शुक्रनीतिः वैसे २ अनुक्रम से ( उत्तरोत्तर ) श्रेष्ठ पद पर उसे नियुक्त करे । अन्त में प्रधान
पद पर नियुक्त करे ।
अधिकारबलं दृष्टा योजयेद्दर्शकान् बहून् ॥ ११७ ॥
अधिकारिणमेकं वा योजयेद्दर्शविना । अधिकार ( कार्य ) की गुरुता ( अधिकता ) समझ कर उसके अनुरूप बहुत से उस कार्य के देखने वाले नियुक्त करे । अथवा बिना दर्शकों के भी
केवल एक ही अधिकारी की नियुक्ति करे ।
ये चान्ये कर्मसचिवास्तान् सर्वान् विनियोजयेत् ॥ ११८ ॥
गजाश्वरथपादात पशूष्ट्रमृगपक्षिणाम् ।
. सुवर्णरत्न रजतवखाणामधिपान् पृथक् ॥ ११ ९ ॥
वित्तानामधिपं धान्याधिपं पाकाधिषं तथा ।
आरामाधिपतिं चैव सौधगेहाधिपं पृथक् ॥ १२० ॥
सम्भारपं देवतुष्टिपतिं दानपतिं सदा, अम्य कर्मों के सचिव की योजना का निर्देश - और जो उक्त दश प्रकृ-तियों ( प्रधानों ) से अन्य अधिकारी कार्य करने में समर्थ हों उन्हें योग्यता. नुसार हाथी घोड़ा, रथ, पैदल सेना, पशु, ऊंट, मृग, पक्षी, सुवर्ण, रत्न, चांदी, वस्त्र इन सर्वो के पृथक् २ स्वामी ( अधिकारी ), एवं धनाध्यक्ष ( पाठान्तर वितानाद्यधिपम् = शामियाना आदि का स्वामी ), धान्याधिप, पाकशाला का अध्यक्ष, बगीचों का अध्यक्ष, राजोचित तथा साधारण गृहों का अध्यक्ष,
देवसेवा ( मन्दिरादि ) का अध्यक्ष, सेनाध्यक्ष पद पर सदा नियुक्त करे ।
साहसाधिपति चैव ग्रामनेतारमेव च ॥ १२१ ॥
भागहारं तृतीयं तु लेखकं च चतुर्थकम् ।
शुल्कमाहं पञ्चमं च प्रतिहारं तथैव च ॥ १२२ ॥
षट्कमेतन्नियोक्तव्यं ग्रामे ग्रामे पुरे पुरे । दण्डाधिपति आदि ६ की योजना का निर्देश — और साहसाध्यक्ष ( संग्राम आदि साहस कर्मों के अध्यक्ष ), ग्राम का अध्यक्ष, भागहार ( प्रजाओं से कर वसूल करने वाला ), लेखक, शुल्क ( व्यवसायादि पर लगे टैक्स ) को वसूल करने वाला, द्वारपाल इन ६ कर्मचारियों की प्रत्येक नगर और ग्राम
नियुक्ति करे ।
तपस्विनो दानशीलाः श्रुतिस्मृतिविशारदाः ॥। १२३ ॥
पौराणिकाः शास्त्रविदो दैवज्ञा मान्त्रिकश्च ये ।
आयुर्वेदविदः कर्मकाण्डज्ञास्तान्त्रिकश्च ये ॥ १२४ ॥
ये चान्ये गुणिनः श्रेष्ठा बुद्धिमन्तो जितेन्द्रियाः । राजा क करने वाले, पुराण के जा के ज्ञाता, 4 गुणी, बुद्धिम समय २ पर • राजा- ऐसा न होती है । त बहुत के करने में का अधिकारी योजना शून्य हो, औषध न हो किन्तु इन स दुर्लभ है । गजांधि जाति - भेद क तथा उनके ' तथा उनके मैं ( राजाध्य ' को वश में CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri