शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 211–220

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 211–220

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होता है । त उस पर वेधी वाक्य तृतीयोऽध्यायः

अथ साधारणं नीतिशास्त्रं सर्वेषु चोच्यते ।

॥ सुखार्थाः सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः ॥ १ ॥

सबों के सुख के अर्थ प्रवृत्ति का निर्देश — अब युवराजादि के लक्षणादि प्तः । का निरूपण करने के बाद राजा प्रजा सभी लोगों के लिये नीति शास्त्र का या । वर्णन करते हैं । सभी प्राणियों को किसी भी कार्य करने की जितनी प्रवृत्तियां हैं वे सभी आत्मसुख के लिये होती हैं । धर्म के अतः धर्म कहते हैं । बचाते हुये करे अर्थात्

सुखं च न विना धर्मात्तस्माद्धर्मपरो भवेत् ।

त्रिवर्गशून्यं नारम्भं भजेत्तं चाविरोधयन् ॥ २ ॥

अनुयायात्प्रतिपदं सर्वधर्मेषु मध्यमः । बिना सुख न मिलने का निर्देश - धर्म के बिना सुखा नहीं होता है । में तत्पर होना चाहिये । धर्म, अर्थ, काम इनके वर्ग को ' त्रिवर्ग ' इससे शून्य किसी कार्य को न करे । उक्त त्रिवर्ग के विरोध को मध्यवर्ती होकर सभी कार्यों में प्रतिपद पर निवर्ग का अनुसरण

त्रिवर्गं का पालन न छोड़े ।

नीच रोमनखश्मश्रुर्निर्मलां त्रिमलायनः ॥ ३ ॥

स्नानशीलः सुसुरभिः सुवेशोऽनुल्बणोज्ज्वलः ।

धारयेत्सततं • रत्नसिद्धमन्त्रमहौषधीः ॥ ४ ॥

सर्व साधारण के लिये विहिताचरण का निर्देश - रोम ( बाल ) -दाढ़ी - मूछ तथा नखों को नीच ( छोटे २ अर्थात् बढ़े हुये नहीं ) एवं पैर तथा कान, नाक, आंख, मुख आदि को स्वच्छ किये हुये, स्नान किये हुये, सुगन्धित इत्र आदि लगाये हुये, अनुद्धत तथा उज्वल सुन्दर वेश बनाये हुये, रत्न, सिद्ध मन्त्र. एवं महौषधियों को नित्य धारण करना चाहिये ।

सातपत्रपदत्राणो • विचरेद्युगमात्रढक् ।

निशि चात्ययि के कार्ये दण्डी मौली सहायवान् ॥ ५ ॥

छाता तथा जूता धारण किये हुये, युग ( बैल आदि को रथ में जोतनेः के समय उनके कन्धों पर रखनेवाला काष्ठ ) के बराबर दूरी पर दृष्टि रख कर मार्गं चलना चाहिये । रात्रि में किसी दुर्घटनावश यदि घर से निकलना पड़े तो हाथ में दण्ड लेकर तथा सिर पर पगड़ी बांध कर एवं साथ में किसी सहायक का लेना उचित है । न वेगितोऽन्यकार्यः स्यान वेगानीरयेद् बलात् । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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१२६ शुक्रनीति: भक्त्या कल्याणमित्राणि संवेतेतरदूरगः ॥ ६ ॥

निषिद्धाचरणों का निर्देश — मल - मूत्रादि का वेग रोके हुये, किसी कार्य के करने में तत्पर न हो, और उक्त बेर्गों को बलपूर्वक न रोके तथा इस ( दुर्जनादि ) से दूर रहकर कल्याणकारी कार्य और मित्रों का भक्तिपूर्वक सेवन करे ।

हिसास्तेयान्यथाकाम — पैशुन्यं परुषानृतम् ।

सम्भिन्नालापव्यापादममिध्यादृग्विपर्ययम् ॥ ७ ॥

पापकर्मेति दशधा कायवाङ्मानसैस्त्यजेत् । दशविध पापों का निर्देश - हिंसा ( किसी की हत्या या कष्ट पहुँचाना ) स्तेय ( चोरी ), अन्यथाकाम ( अवैध रीति से मैथुन ), पैशुन्य ( चुगलखोरी ), निष्ठुर भाषण, झूठा व्यवहार, भेदयुक्त बातों से दिल को तोड़ना, अविनय ( अशिष्टता ), नास्तिकता, अवैध आचरण ये १० प्रकार के पाप कर्म हैं । इ

“ शरीर, वाणी तथा मन से छोड़ देना उचित है ।

धर्मकार्यं यतत्र शक्त्या नो चेत् प्राप्नोति मानवः ॥ ८ ॥

प्राप्तो भवति तत्पुण्यमत्र वै नास्ति संशयः । यदि मनुष्य यथाशक्ति प्रयत्न करने पर भी धर्मकार्य का फल ( बीच में विघ्न होने से ) नहीं प्राप्त करता है तो वह इस संसार में दूसरे किसी समय में अवश्य उस पुण्यकार्य के फल को प्राप्त करता है - इसमें कोई सन्देह

नहीं है ।

मनसा चिन्तयन् पापं कर्मणा नाभिरोचयेत् ॥ ६ ॥

तत् प्राप्नोति फलं तस्येत्येव धर्मविदो विदुः । ' मनसे पाप - कर्म की चिन्ता करता हुआ भी मनुष्य कभी उसे कार्य रूप में परिणत करने की इच्छा न करे । क्योंकि पापकर्म करने पर उसके फल को ।

वह अवश्य पाता है ' ऐसा धर्म के जाननेवाले पण्डितजन कहते हैं ।

अवृत्तिव्याधि - शोकार्ताननुवर्तेत शक्तितः ॥ १० ॥

आत्मवत् सततं पश्येदपि कीटपिपीलिकम् । दरिद्री आदिकों का रक्षण करने का निर्देश - जीविका से रहित तथा ज्याधि या शोक से आतंलोगों की यथाशक्ति सहायता पहुँचाकर उपकार करना चाहिये एवं कीड़े तथा चीटियों तक के भी सुख - दुःखादि को अपनी ही भांति

समझना चाहिये ।

उपकार प्रधानः स्यादपकारपरेऽप्यरौ ॥ ११ ॥

संपद्विपत्स्वेकमना हेतावीर्षेत् फले न तु । अपने साथ अपकार करने में तत्पर शत्रु के साथ भी प्रधान रूप उपकार ही क दोनों में एक कारणों के वि विषय में कभ इसकी ईर्ष्या बन जाऊं समय पहले स्वयं सुशील तथा होने पर बोलना चा नहीं करना जो उसके य अपने होकर भी किया हुआ प्रकाशित न परारा व्यक्ति को हो उसके इन्द्रि से बलपूर्व रख कर CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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तृतीयोऽध्यायः १२७ ॥किसी उपकार ही करना चाहिये । और संपत्ति ( अभ्युदय ) तथा विपत्ति पढ़ने पर कार्य दोनों में एकसी मन की दशा रखनी चाहिये एवं किसी उन्नति विषयक तथा इता कारणों के विषय में ही करने की ईर्ष्या रखनी चाहिये । उन्नति रूप फल के भक्तिपूर्वक विषय में कभी ईष्या नहीं करनी चाहिये अर्थात् यदि कोई धनी हुआ तो इसकी ईर्ष्या करनी चाहिये कि ' मैं भी वैसा क्यों न उद्योग करूं कि धनी

न जाऊं किन्तु धन के साथ ईर्ष्या करना अनुचित है ।

काले हितं मितं ब्रूयादविसंवादि पेशलम् ॥। १२ ॥

पूर्वाभिभाषी सुमुखः सुशीलः करुणामृदुः । पहुँचाना ) समय पर हित और मित वचन कहने का निर्देश – अहङ्कार - शून्य होकर गलखोरी ), पहले स्वयं वार्तालाप करना चाहिये । मुख की मुद्रा अच्छी रखनी चाहिये । अविनय सुशील तथा करुणा से कोमल चित्त होना चाहिये । और योग्यकाल उपस्थित हैं । इन्हें होने पर थोड़े शब्दों में, सुसङ्गत ( ऊटपटाङ्ग नहीं ) और मधुर वचन

बोलना चाहिये ।

५ ॥ नैकः सुखी न सर्वत्र विस्रब्धो न च शङ्कितः ॥ १३ ॥।

अकेले सुखों का उपभोगादि करने का निषेध - अकेले सुखों का उपभोग ( चीच में नहीं करना चाहिये । सर्वत्र विश्वास या शङ्का रखना उचित नहीं है अर्थात् केसी समय जो उसके योग्य हों उन पर विश्वास या शंका रखना उचित है ।

देह न कचिदात्मनः शत्रुं नात्मानं कस्यचिद्रिपुम् ।

प्रकाशयेनापमानं न च निःस्नेहतां प्रभोः ॥ १४ ॥

अपने अपमान को प्रकाशित न करने का निषेध - किसी को अपना शत्रु • होकर भी दूसरे को नहीं बताना चाहिये तथा अपने स्वामी का अपने ऊपर कार्य रूप किया हुआ अपमान तथा स्नेह का अभाव यदि हो तो उसे भी किसी से के फल को प्रकाशित नहीं करना चाहिये ।

जनस्याशयमालक्ष्य यो यथा परितुष्यति ।

- ॥ तं तथैवानुवर्तेत पराराधनपण्डितः ॥ १५ ॥

पराराधन - पण्डितों के व्यवहार का निर्देश - दूसरे को खुश रखने में निपुण रहित तथा - उपक्ति को चाहिये कि वह लोगों के भावों को समझकर तदनुसार जो जैसे खुश कार करना हो उसके साथ वैसा व्यवहार करे!

ही भांति न पीडयेदिन्द्रियाणि न चैतान्यतिलालयेत् ।

इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ १६ ॥

इन्द्रियों को वश में रखने का निर्देश - चन्तु आदि इन्द्रियों को उनके विषयों ॥ से बलपूर्वक अलग रख कर अधिक पीड़ित नहीं एवं विषयों में अधिक आसक्ति से रख कर लालित भी नहीं करना चाहिये अर्थात् नियमपूर्वक रहकर समभाव रूप CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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१२८ शुक्रनीति: से विषय भोग करना चाहिये । और इन्द्रियां यदि अधिक प्रबल हो जायें तो वे जबरदस्ती मन को अपनी ओर आकृष्ट कर लेती हैं अत एव इनका सदा दमन करते रहना उचित है ।

एणो गजः पतङ्गश्च भृङ्गो मीनस्तु पञ्चमः ।

शब्दस्पर्शरूपगन्धरसैरे हताः खलु ॥ १७ ॥

इन्द्रियों को वश में न रखने से अनर्थ का निर्देश - हरिण, हस्ती, फतरि ( पाखी ), भोर, मछलियां ये पांचों क्रम से शब्द, स्पर्श, रूप, गन्ध तथा रख इन पांचों विषयों का उपभोग करने से निश्चय मारे जाते हैं, जैसे हरिण-स्वर युक्त सुन्दर गान सुनने में फंसकर नहीं भागता हुआ व्याध से मारा जाता है 1 । हस्ती - हस्तिनी के स्पर्श करने में आसक्त होने से नहीं भागता हुआ बझानेवाले से पकड़ा जाता है । पतङ्ग ( फतरिङ्गा ) – दीपक की शिखा का सुन्दर रूप देखने से उन्मत्त होकर उसी पर गिर जाने से मर जाता है ।. भृङ्ग- गन्ध के लोभ से कमल के संकुचित होने पर उसी के पत्तों के अन्दर बन्द हो जाता है । मत्स्य -मांस के रस का आस्वाद लेने में फंस कर कांटा चुभ जाने से तड़फड़ा कर मर जाता है ।

एषु स्पर्शो वरस्त्रीणां स्वान्तहारी मुनेरपि ।

अतोऽप्रमत्तः सेवेत विषयांस्तु यथोचितान् ॥ १८ ॥

मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नात्यन्तैकान्तिकं वसेत् । स्त्रियों के स्पर्श की भी अनर्थकारिता का निर्देश - इन शब्दादि विषयों में से उत्तम सुन्दरियों का स्पर्श सत् - असत् का विचार करनेवाले मुनियों के भी मन को हरण करनेवाला होता है । अतः असावधानी न रखते हुये यथोचित रीति से उक्त विषयों का सेवन करना चाहिये क्योंकि अधिक सेवन से विनाश होता है । और माता, बहन या लड़की के साथ भी अधिकतर

एकान्त स्थान में नहीं रहना चाहिये ।

यथा सम्बन्धमाहूयादा भाष्याश्वास्य वै स्त्रियम् ॥

स्वीयां तु परकीयां वा सुभगे भगिनीति च । स्त्रियों के प्रत्ति सम्बोधन - प्रकार — और अपने या दूसरे के को सम्बन्धानुसार हे सुभगे! वा हे भगिनि! इत्यादि रूप से

सन देते हुये बुलाना चाहिये ।

सहवासोऽन्यपुरुषैः प्रकाशमपि भाषणम् ॥

स्वातन्त्र्यं न क्षणमपि ह्यावासोऽन्यगृहे तथा ।

१ ९ ॥

संपर्क की स्त्री पुकारकर आश्वा २० ॥ एक क्षण भी स्त्रियों के स्वातन्त्र्य का निषेध - अन्य पुरुषों के साथ अधिक सहवास रखना या प्रकाश रूप से ( सामने होकर ) भी बात चीत करना, CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri क्षण भर के लि ये सब स्त्रियों भ पति, प गृहकृत्यों कात्रियों को च प त्य नपूर्वक क्रोधी ), पण प्रवास में रहन रोगी, सदा पर हो जाती है को पूर्व व स्व वस्त्र, अन्न हुये अपने अत्य च ना चैत्यादिक विशेष ), गुरुज वस्तु, बालू ( इनका उल्लङ्घन न सा तैर कर न को नहीं पार चाहिये पाठान्त जाने में समर्थ & शु ०

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तृतीयोऽध्यायः १२३ हो जायें क्षण भर के लिये भी स्वतन्त्रता देना या दूसरे के घर में निवास करने देना इनका सदा ये || फरि वे गन्ध तथा का से हरिण. सेमारा ह्रीं भागता की शिखा जाता है ।

सब स्त्रियों के लिये दोष हैं अतः इन से दूर रखना उचित है ।

भर्त्रा पिताऽथवा राज्ञा पुत्रश्वशुरबान्धवैः ॥ २१ ॥

स्त्रीणां नैव तु देयः स्याद् गृहकृत्यैर्विना क्षणः । पति, पिता, राजा, पुत्र, श्वशुर, बान्धव इन सबों के लिये उचित है कि गृहकृत्यों के अतिरिक्त अन्य कार्यों के लिये थोड़ा भी समय फुर्सत

त्रियों को नहीं ही देवे ।

चण्डं षण्डं दण्डशील मकामं सुप्रवासिनम् ॥ २२ ॥

सुदरिद्रं रोगिणं च न्यस्त्रीनिरतं सदा ।

पति दृष्ट्वा विरक्ता स्यान्नारी वाऽन्यं समाश्रयेत् ॥ २३ ॥

त्यक्त्वेतान् दुर्गुणान् यत्नात्ततो रक्ष्याः स्त्रियो नरैः । यस्नपूर्वक स्त्रियों की रक्षा करने का निर्देश - चण्ड च ( अत्यन्तं के अन्दर क्रोधी ), षण्ढ ( नपुंसक ), सदा दण्ड देनेवाले, अनुराग - रहित, अधिकं कर कांटा प्रवास में रहनेवाले ( पत्नी से अलग विदेश में रहनेवाले ), अत्यन्त दरिद्र, रोगी, सदा पर- स्त्री में आसक्त रहनेवाले अपने पति को देखकर स्त्री विरक्त. हो जाती है अथवा अन्य पुरुष का आश्रय: पकड़ लेती है अतः इन दुर्गुणों

को यत्नपूर्वक छोड़कर मनुष्यों को सदा स्त्रियों की रक्षा करनी चाहिये ।

वस्त्रान्नभूषणं प्रेममृदुवाग्भिश्च शक्तितः ॥ २४ ॥

विषयों में स्वात्यन्तसन्निकर्षेण स्त्रियं पुत्रं च रक्षयेत् । मुनियों वस्त्र, अन्न, आभूषण, प्रेम तथा मृदु वचनों से यथाशक्ति व्यवहार करते

खते हुये हुये अपने अत्यन्त समीप में रखकर स्त्री तथा पुत्र की रक्षा करे ।

अधिक चैत्यपून्यध्वजाशस्तच्छायाभस्मतुषाशुचीन् ॥ २५ ॥

अधिकतर नाक्रामेच्छर्करालोष्ट बलिस्नानभुवोऽपि च । चैत्यादिकों के लंघन का निषेध - चैत्य ( रास्ते के देवाधिष्ठित वृत्तः विशेष ), गुरुजन, पताका, अप्रशस्त वस्तुओं की छाया, भस्म, भूसी, अपवित्र-वस्तु, बालू ( कंकरीलो भूमि ), ढेला, बलि ( पूजा द्रव्य ) तथा स्नानभूमिं

की स्त्री इनका उल्लङ्घन करना उचित नहीं है ।

आश्वा • नदीं तरेन बाहुभ्यां नाग्नि स्कन्नमभित्रजेत् ॥ २६ ॥

सन्दिग्धनावं वृक्षं च नारोहेद् दुष्टयानवत् । तैर कर नदी को पार आदि करने का निषेध — बाहुओं से तैर कर नदी को नहीं पार करना चाहिये । ढकी हुई अग्नि को पैर से नहीं मसलना: चाहिये पाठान्तर में अग्नि की राशि की तरफ नहीं जाना चाहिये । पार ले - अधिक जाने में समर्थ है या नहीं ऐसी सन्देहयुक्त नौका पर और चढ़ने पर भार: - करना & शु ० CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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१३० शुक्रनीति: संभाल सकता है या नहीं ऐसे सन्देहयुक्त वृक्ष पर एवं दुष्ट घाई

चाहन पर नहीं चढ़ना चाहिये ।

नासिकां न विकृष्णीयान्नाकस्माद्विलिखेद् भुवम् ॥ २७ ॥

न संहताभ्यां पाणिभ्यां कण्डूयेदात्मनः शिरः । व्यवहार नाक को अंगुली से नहीं कुरेदना चाहिये अर्थात् उससे नासामल नहीं व्यवहार के ` निकालना चाहिये | अकस्मात् पृथ्वी पर रेखा आदि नहीं खींचना चाहि अथवा खोदना नहीं चाहिये । और अपने सिर को दोनों हाथों से एक साथ

नहीं खुजलाना चाहिये ।

नाङ्गैश्चेष्टेत विगुणं नासीतोत्कटुकञ्चिरम् ॥ २८

देवाक्चेतसां चेष्टाः प्राक् श्रमाद् विनिवर्त्तयेत् । अङ्ग को टेढा - मेढ़ा करके चेष्टा नहीं करें, कठिन आसन पर देर तक ए विवेचनापूर्ण में लोक का ६ राजादिय सज्जन इनके करे । सामथ्य आसन से नहीं बैठना चाहिये । देह, बाणी तथा मन के व्यापार को श्रम न करे । होने के पहले ही बन्द कर देना चाहिये अर्थात् थकावट जब तक न हो तमी- इ -तक कार्य करना चाहिये । नोर्ध्वजानुश्चिरं तिष्ठेन्नक्तं सेवेत न द्रुमम् ॥ २६ ॥ आग्रहप

तथा चत्वरचैत्यं न चतुष्पथसुरालयान् | कहा गया हो शून्याटवीशून्यगृहश्मशानानि दिवापि न ॥ ३० ॥। करना चाहिय

देरतक उकरू बैठने, रात्रि में वृक्ष पर चढ़ने आदि का निषेध - ऊपर जा ही लोग होत करके ( उकरू ) देर तक नहीं बैठना चाहिये । रात्रि में पेड़ के तले नहीं । रहना चाहिये एवं किसी देवता के चबूतरे या वृक्ष, चौराहा तथा देवमन्दिा में रात्रिनिवास नहीं करना चाहिये और शून्य जङ्गल या गृह और श्मशान इसलिय मैं दिन में भी नहीं रहना चाहिये, रात्रि में तो नहीं ही रहना चाहिये । -को उन्हें छो सर्वक्षेत नादित्यं न भारं शिरसा वहेत् । - कल्पना नही नेक्षेत सततं सूक्ष्मं दीप्ता मेध्याप्रियाणि च ॥ ३१ ॥

सूर्य को निरन्तर देखने का निषेध - किसी भी प्रकार से देर तक सूर्य की तरफ नहीं देखना चाहिये और सिर से बोझा नहीं उठाना चाहिये ॥ किंचित निरन्तर सूक्ष्म, अत्यन्त चमक से युक्त, अपचित्र या अप्रिय वस्तुओं को दें । हजारों अपरा -तक नहीं देखना चाहिये ।

सन्ध्या स्वभ्यवहारस्त्रीस्वप्नाध्ययनचिन्तनम् ।

मद्यविक्रयसन्धानदानादानानि नाचरेत् ॥ ३२ ॥

सन्ध्या समय में भोजनादि का निषेध-- सन्ध्या समय मैं भोजन, प्रसङ्ग, सोना, पढ़ना या किसी विषय की चिन्ता करना, मद्य का बेच चुआना, देना या लेना ये सब कार्य नहीं करना चाहिये । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri क्या बिगड़ करना चाहि पापचिन्तन अच्छे

पृष्ठ 217

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तृतीयोऽध्यायः १३१

घोड़े बाद आचार्यः सर्वचेष्टासु लोक एव हि धीमतः ।

॥२७ अनुकुर्यात् तमेवात लौकिकार्थे परीक्षकः ॥ ३३ ॥

॥ उयवहार में लोक की आचार्यता का कथन - बुद्धिमान जनका प्रत्येक 1 सामल यवहार के लिये लोक ( जनसमाज ) ही आचार्य ( उपदेष्टा ) है । अतः ना नहीं । विवेचना पूर्ण कार्य करनेवालों के लिये यही उचित है कि वह लौकिक कार्यों से चाहि में लोक का ही अनुसरण करे ।

एक साथ राजदेशकुलज्ञातिसद्धर्मान् नैव दूषयेत् ।

शक्तोऽपि लौकिकाचारं मनसापि न लङ्घयेत् ॥ ३४ ॥

3 राजादिगत धर्म में दोष लगाने का निषेध - राजा, देश, कुल, ज्ञाति और सज्जन इनके जो भी धर्म हो उनको दोष न लगावे अर्थात् उसकी निन्दा न देर तक एक करे | सामर्थ्य रहते हुये भी लौकिक आचारों का मन से भी उल्लङ्घन पार को धर न करे ।

न हो तभी अयुक्तं यत् कृतं चोक्तं न बलाद्धेतुनोद्धरेत् ।

दुर्गुणस्य च वक्तारः प्रत्यक्षं विरला जनाः ॥ ३५ ॥

२६ ॥ आग्रहपूर्वक भाषण का निषेध - किसी से जो अनुचित रूप से किया या - कहा गया हो उसे जबरदस्ती या मिथ्या कारण दिखाकर उचित नहीं सिद्ध -करना चाहिये । संसार में किसी के सामने उसके दुर्गुणों को कहनेवाले विरले - ऊपर जानु ही लोग होते हैं ।

के तले नहीं लोकतः शास्त्रतो ज्ञात्वा ह्यतस्त्याज्यांस्त्यजेत् सुधीः ।

देवमन्दि अनयं नयसंकाशं मनसापि न चिन्तयेत् ॥ ३६ ॥

और श्मशान इसलिये लोक तथा शास्त्र से स्याज्य विषयों को जानकर बुद्धिमान व्यक्ति हिये । को उन्हें छोड़ देना चाहिये । ' अनीति नीति के समान है ' इसकी मनसे भी - कल्पना नहीं करनी चाहिये ।

॥ अयं सहस्रापराधी किमेकेन भवेन्मम ।

देर तक पूर्व मत्वा नाघं स्मरेदीषद्विबन्दुना पूर्यते घटः ॥ ३७ ॥

चाहिये । किंचित् भी पाप का स्मरण करने का निषेध – ' यह दूसरा व्यक्ति तो ना तुओं को दे हजारों अपराधों से भरा हुआ है फिर यदि मेरे में एक दोष है तो उससे क्या बिगड़ सकता है ' ऐसा समझ कर थोड़े से भी पाप का चिन्तन नहीं करना चाहिये क्योंकि जैसे बिन्दु - बिन्दु से घड़ा भर जाता है वैसे थोड़ा २ पापचिन्तन से वह व्यक्ति भी पाप से भर जाता है ।

॥, सी नक्तं दिनानि मे यान्ति कथम्भूतस्य सम्प्रति ।

भोजन दुःखभाग् न भवेदेवं नित्यं सन्निहितस्मृतिः ॥ ३८ ॥

का अच्छे का ग्रहण एवं बुरे के स्याग का निर्देश- इस समय प्रतिदिन किस CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 218

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१३२ शुक्रनीति: ढंग से मेरे दिन या रात्रि व्यतीत हो रहे हैं — इस तरह से जो निस्य अपने-भले या बुरे कर्मों का स्मरण ( ख्याल रखता है वह बुरा का त्याग एवं अच्छे का ग्रहण करने से कभी दुःखी नहीं होता है ।

समास - व्यूह हेत्वादि - कृतेच्छार्थं विहाय च ।

स्तुत्यर्थवादान् संत्यव्य सारं संगृह्य यत्नतः ॥ ३६ ॥

धर्मतत्त्वं हि गहनमतः सत्सेवितं नरः ।

श्रुतिस्मृतिपुराणानां कर्म कुर्याद्विचक्षणः ॥ ४० ॥

सार को यत्नपूर्वक ग्रहण करने का निर्देश - विद्वान् मनुष्य श्रुति स्मृति तथा पुराणों के वचनों समास ( तत्पुरुष बहुव्रीहि आदि से पद की एकता ) करने से किंवा विशिष्ट तर्क करने से या हेतु आदि दिखलाने से इच्छानुरूप अर्थं तथा प्रशंसापरक अर्थवाद को छोड़कर और यत्नपूर्वक उनके सारभार को ग्रहण कर सज्जनों से सेवित गहन धर्म - तत्व समझ कर तदनुकूल कर्म कोकरे ।

न गोपयेद्वासयेच्च राजा मित्रं सुतं गुरुम् ।

अधर्मनिरतं स्तेनमाततायिनमप्युत ॥ ४१ ॥

अधर्म रत - मित्र - पुत्रादि को राज्य से निकाल देने का निर्देश - राजा अघ । में निरत मित्र, पुत्र या गुरु की एवं चोर या आततायी की रक्षा न करे और न उन्हें अपने राज्य में रहने दे ।

अग्निदो गरदचैव शत्रोन्मत्तो धनापहः ।

क्षेत्रदारहरश्चैतान् षड् विद्यादाततायिनः ॥ ४२ ॥।

आतताइयों के लक्षण - अग्नि लगानेवाला, विष देनेवाला, शस्त्र से उन्मत्त होकर मारने के लिये उद्यत, धन लूटनेवाला, खेत तथा स्त्री को छीनने • चाला इन ६ व्यक्तियों को ' आततायी ' समझना चाहिये ।

नोपेक्षेत स्त्रियं बालं रोगं दासं पशुं धनम् ।

विद्याभ्यासं क्षणमपि सत्सेवां बुद्धिमान्नरः ॥ ४३ ॥

एक क्षण भी स्त्री आदि की उपेक्षा न करने का निर्देश - स्त्री, बालक, रोग, दास, पशु, धन, विद्याभ्यास, सज्जन ( साधु ) पुरुषों की सेवा इन सर्वो के विषय में क्षणभर भी उपेक्षा नहीं रखनी चाहिये । सदा इनका ध्यान रखना चाहिये ।

विरुद्धो यत्र नृपतिर्धनिकः श्रोत्रियो भिषक् ।

आचारश्च तथा देशो न तत्र दिवसं वसेत् ॥ ४४ ॥

• विरुद्ध राजादिक जहां हों वहां एक दिन भी रहने का निषेध- जिस देश में राजा, fan प्रतीत न र जिस राज चा साहसी ( अधिकारी व स राजा विवेक | वाले हों, सद लोग ) झूठ हो वहां पर होगी ' इसकी ि 1. मात्रादि बाल्यकाल म राजा होकर अर्थात् ऐसी व्यर्थ ही हो मित्र, कुपित हों कोई वश न CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 219

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तृतीयोऽध्यायः १३३ नित्य अपने देश में राजा, धनी, बेद का ज्ञाता ब्राह्मण, वैद्य, आचार और देश अपने से - स्याग एवं विरुद्ध प्रतीत हों वहां पर एक दिन भी नहीं ठहरना चाहिये ।

नपुंसकश्च स्त्री बालश्वण्डो मूर्खश्च साहसी ।

यत्राधिकारिणश्चैते न तत्र दिवसं वसेत् ॥ ४५ ॥

जिस राज्य में नपुंसक ( मेहरा ), स्त्री, बालक, अत्यन्त क्रोधी, मूर्ख वा साहसी ( सहसा विना विचारे कार्य करनेवाला ) इनमें से कोई भी अधिकारी वर्ग का हो, वहां पर एक दिन भी नहीं ठहरना चाहिये । श्रुति स्मृति की एकता ) इच्छानुरूप के सारभाव नुकूल कर्म राजा वाले 1 लोग

अविवेकी यत्र राजा सभ्या यत्र तु पाक्षिकाः ।

सन्मार्गोन्झितविद्वांसः साक्षिणोऽनृतवादिनः ॥ ४६ ॥

दुरात्मनां च प्राबल्यं स्त्रीणां नीचजनस्य च ।

" यत्र नेच्छेद्धनं मानं वसतिं तत्र जीवितम् ॥ ४७ ॥

अविवेकी राजादिक से धनादि की इच्छा करने का निषेध - जहां पर विवेक करनेवाला न हो और राजसभा के सभासद् गण पक्षपात रखने-हों, सदाचार से हीन पण्डित लोग हों, साक्षीगण ( गवाही देनेवाले ) झूठ बोलनेवाले हों और जहां दुष्टों, स्त्रियों एवं नीचजनों की प्रबलता जा अघ । हो वहां पर रहने से ' धन, इज्जत, रहने के लिये स्थान और जीवन इनकी रक्षा क्षा न करे होगी ' इसकी इच्छा भी न करे अर्थात् कल्याण नहीं है अतः वहां रहना अनुचित है ।

माता न पालयेद्वाल्ये पिता साधु न शिक्षयेत् ।

॥ राजा यदि हरेद्विन्तं का तत्र परिदेवना ॥ ४८ ॥

शस्त्र से मात्रादिक के पालनादि न करने पर शोक न करने का निर्देश – यदि को छीनने • बाल्यकाल में माता पालन एवं पिता अच्छी प्रकार से शिक्षा न दिलावे और राजा होकर यदि प्रजा का धन हरण करे तो इसमें खेद करना वृथा है । अर्थात् ऐसी स्थिति में बालक या प्रजा का अपना कोई दोष नहीं है अतः खेद व्यर्थ ही होता है ।

श्री, बालक, सुसेविताः प्रकुप्यन्ति मित्रस्वजनपार्थिवाः ।

बाइन सर्वो गृहमग्न्यशनिहतं का तत्र परिदेवना ॥ ४ ९ ॥

ध्यान मित्र, स्वजन तथा राजा इनकी भलीभांति सेवा करने पर भी यदि ये नका कुपित हों और गृह अग्नि से या विजुली गिरने से नष्ट हो जाय तो अपना कोई वश न होने से खेद करना वृथा है ।

आप्तवाक्यमनाहृत्य दर्पेणाचरितं यदि ।

- जिए 1. फलितं विपरीतं तत् का तत्र परिदेवना ५० ॥

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शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 220 का मूल पृष्ठ
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१३४ शुक्रनीति: और यदि किसी ने विश्वस्त या हितैषी योग्य व्यक्ति के बात को अहंकार. अधिक सोना वश टालकर कोई कार्य करता है और उसका विपरीत ( बुरा ) फल पाता है । तो उस पर उसका खेद करना वृथा है ।

साबधानमना नित्यं राजानं देवतां गुरुम् ।

अग्निं तपस्विनं धर्मज्ञानवृद्धं सुसेवयेत् ॥ ५१ ॥।

सावधानी से राजादि की सेवा करने का निर्देश – सावधान - चित्त होकर राजा, देवता, गुरु, अग्नि, तपस्वी एवं धर्मं या ज्ञान में वृद्ध ( बड़े ) लोगों की नित्य अच्छी तरह से सेवा करनी चाहिये । मातृपितृगुरुस्वामि - भ्रातृपुत्रसखिष्वपि न विरुध्येनापकुर्यान्मनसाऽपि क्षणं कचित् ॥ ५२ ॥

माता आदि के साथ विरोधादि करने का निषेध - माता, पिता, गुरु स्वामी, भाई, पुत्र तथा मित्र इन सबों का क्षण भर के लिये मन से भी कमी विरोध या अपकार नहीं करना चाहिये ।

स्वजनैर्न विरुद्धचेत न स्पर्धेत बलीयसा ।

न कुर्यात् खीबालवृद्धमूर्खेषु च विवादनम् ॥ ५३ ॥

स्वजनादि से विरोधादि एवं स्त्री आदि से विवाद का निषेध - स्वजनों के साथ विरोध, बलवान के साथ स्पर्धा ( बराबरी का दावा ) एवं स्त्री, बालक, वृद्ध या मूर्ख के साथ विवाद कभी नहीं करना चाहिये ।

एक: स्वादु न भुञ्जीत एकोऽर्थान विचिन्तयेत् ।

एको न गच्छेदध्वानं नैकः सुप्तेषु जागृयात् ॥ ५४ ॥

अकेला स्वादिष्ट भोजनादि का निषेध - अकेले स्वादिष्ट भोजन नहीं करना चाहिये, अकेले किसी कार्य के विषय में विचार नहीं करना चाहिये, अकेले मार्ग नहीं चलना चाहिये, और सोये हुये लोगों के बीच में अकेले नहीं जागना चाहिये । नान्यधर्म हि सेवेत नाद्वै कदाचन हीन कर्मगुणैः स्त्रीभिर्नासीतैकासने क्वचित् ॥ ५५ ॥

अन्य धर्म के सेवन का निषेध - और कभी भी दूसरे धर्म को स्वीकार या उसका द्रोह नहीं करना चाहिये । और कभी हीन कर्म या गुण वाले दुर्जनों एवं स्त्रियों के साथ एक आसन पर नहीं बैठना चाहिये ।

षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।

निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ॥ ५६ ॥

प्रभवन्ति विघाताय कार्यस्यैते न संशयः । य्याज्य निद्रादि दोषों का निर्देश - इस संसार में १. निद्रा ( दिन में पा ५. आलस्य, लगाकर करन क्योंकि ये स उ स व मनुष्य व निर्देश - प्रत्य का ज्ञाता, प्र बक्का ( बोल वाला एवं बो f f नित्य दे शीघ्र कहनेव चाहिये और किसी व सामने अपनी में हानि तथ स्वयं किसी विना प घर के कार्य थोड़े अक्षरों सुन्दर वात विना CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri