शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 31–40
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 31–40
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( २६ ) जोड़ा ' कृत्य के का संरक्षण करना पड़ता है । राज - नीति के प्रसङ्ग में वर्णित राज - धर्म में केवल जीविका बाहुबल आदि का विनिर्णय है । इसीलिए इसका सम्बन्ध राजन्य से मुख्य है । नावश्यक और यही धर्मं ब्राह्मण से गौणतः सम्बद्ध है न कि मन्त्र - बल से क्रियमाण प्रजा - पालनात्मक धर्म । अत एव राजन् शब्द का प्रकृत प्रसङ्ग में मुख्य अर्थ क्षत्रिय ही है । यह भी क्षत्रिय मात्र का नहीं अपितु अभिषिक क्षत्रिय का ही धर्म है । अत एव महाभारत ' में भी चातुर्वर्ण्य के धर्म से अतिरिक्त राज - धर्म है- का उल्लेख किया गया है । अन्यान्य धर्म- शास्त्रकारों का भी मत यही है । प्रजा शुक्र - नीति - सार में जो अनभिषिक्त को राजा कहा गया है उसका तात्पर्य इतना ही है कि उसका अभिषेक वैदिक विधि से न होकर यदि लौकिक रूप में रस्यापि भी हुआ हो तब भी वह राजा कहला सकता है । अतः अभिषिक क्षत्रिय ही ० स्मृ ० प्रधानतः राज्याधिकारी है और अन्यजातीय व्यक्ति गौण रूप में ' राजा ' कहला सकता है । स्पीति राजा का मूल यह तो स्पष्ट है कि जब कुमार्ग पर लोग चलने लगे होंगे तभी ' नीति ' की और उसके उपाय के रूप में प्रधानतया ' दण्ड ' और उस ' दण्ड ' के निर्वाहक के रूप में राजा की आवश्यकता हुई होगी । अतएव सर्वत्र ' दण्ड ' की आवश्यकता बतलाते समय ' मारस्य न्याय " का उल्लेख किया गया है । इसी ॥१,२ ॥ यस्यापि ७।२ ॥ क्षत्रियः
तपो - मन्त्र - वलं नित्यं ब्राह्मणेषु प्रतिष्ठितम् ।
अस्त्र - वाहु - वलं नित्यं क्षत्रियेषु प्रतिष्ठितम् ॥
ताभ्यां सम्भूय कर्त्तव्यं प्रजानाम्परिपालनम् म ० भा ० १. के धर्माः सर्व - वर्णानां चातुर्वर्ण्यस्य के पृथक् चातुर्वर्ण्याश्रमाणां च राज - धर्माश्च के मताः म ०
।
( शा ० प ० ) ७४।१३ - १५ ॥
। ? भा ० ( शा ० प ० ) ६० | २ ||
२. राजा अभिषिक्तः क्षत्रियः । हरदत्त - गौ ० ध ० शा ० ११।१ ॥
विज्ञानेश्वर - या ० स्मृ ० २।१ ॥
३. अभिषिक्तो नाभिषिक्तो नृपत्वं तु यदाप्नुयात् । शु ० नी ० सा ० ११२६ ॥
४. ' अप्रणीतो हि मात्स्य -न्यायमुद्भावयति । बलीयानबलं हि ग्रसंते दण्ड-तद्धर्म- धराभावे ' अर्थ - शास्त्र - पृ ० १६ ॥ दण्डाभावे परिध्वंसी मात्स्यन्यायः प्रवर्त्तते ॥ का ० नी ० सा ० २।४० ॥
दण्डश्चेन्न भवेल्लोके विनश्येयुरिमाः प्रजाः ।
जळे मत्स्यानिवाभक्ष्यन् दुर्बलं बलवत्तराः ॥ म ० भा ० ( शा ० प ० ) १५।३० ॥
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( ३० ) लिए यह भी कहा गया है कि राजा के अभाव में प्रजा की रक्षा नहीं हो सकती है । सारांश यही है कि जब अनाचार या अधर्म का संचार हुआ तभी राजा की आवश्यकता हुई । अतः विचारणीय यही है कि अनाचार का संचार कब हुआ युधिष्ठिर के प्रश्न का उत्तर देते हुए महाभारत में भीष्म ने कहा है कि कृत - युग में धर्म के ही प्रसार से अधर्म - निरोधक दण्ड या दण्ड - धर राजा की स्थिति थी ही नहीं, पर जब लोगों में अनाचार का संचार हुआ तब देवताओं की प्रार्थना से ब्रह्मा तथा विष्णु के द्वारा क्रमशः दण्ड- प्रकार आदि के उपदेश के लिए नीति - शास्त्र तथा राजा का आविष्कार किया गया । मनुस्मृति में किए गए कृत - युग के वर्णन तथा राजा की सृष्टि की एकवाक्यता से भी
यदि न प्रणयेद्राजा दण्डं दण्डेचण्वतन्द्रितः ।
शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन् दुर्बलान् वलवत्तराः ॥ म ० स्मृ ० ७।२० ॥
१. रक्षार्थमस्य लोकस्य राजानमसृजत् प्रभुः ॥ म ० स्मृ ० ७२ ॥
यदि न स्यान्नरपतिः सम्यङ्नेता ततः प्रजाः 1 अकर्ण - धारा जलधी विप्लवेतेह नोरिव ॥ शु ० नी ० सा ० १।६५ ॥
२. नियतस्त्वं नरव्याघ्र शृणु सर्वानशेषतः ।
यथा राज्यं समुत्पन्नमादी कृत युगेऽभवत् ॥ शा ० प ० ५ ९ ।१३ ॥
न वै राज्यं न राजाऽसीत् न दण्डो न च दाण्डिकः ।
धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥ शा ० प ० ५ ९ ।१४ ॥
ते मोह - वशमापन्ना मनुजा भरतर्षभ ॥ शा ० प ० ५ ९ ।१६ ॥
X X X
नष्टे ब्रह्मणि धर्मे च देवांस्त्रासः समाविशत् ।
ते त्रस्ता नरशार्दूल ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥ शा ० प ० ५ ९ ।२२ ॥
x X x ततोऽध्यायः सहस्राणां शतं चक्रे स्व - बुद्धिजम् ॥ शा ० प ० ५ ९ ।२ ९ ॥ X X x
अथ देवाः समागम्य विष्णुमूचुः प्रजापतिम् ।
एको योर्हति मत्त्र्येभ्यः श्रैष्ठ्यं वै तं समादिश ॥ शा ० प ० ५ ९ ।६७ ॥
ततः सञ्चिन्त्य भगवान् देवो नारायणः प्रभुः ।
तैजसं वै विरजसं सोऽसृजद् मानसं सुतम् । शा ० प ० ५ ९ ।८८ ॥
३. चतुष्पात् सकलो धर्मः सत्यं चैव कृते युगे ॥
1 नाधर्मेणागमः कश्चिन्मनुष्यान् प्रति वर्त्तते । म ० स्मृ ० ११८१ ॥
४. म ० स्मृ ० ७३ ॥
साधारणतः थी । इसी परन्तु कोई महत्व इन लोगों की उत्पत्ति परिवर्तित निश्चित न देश - काल अ और कभी कृत युग की थी ही नही रूप में अश की भी स्थि इस प्र हमारे प्राची ग्रन्थों को मत भी सि पूर्वोक्त मत महाभारत तथा कलि-और अल्प १. द तद दण् चत अध तत दण प्रज CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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( ३१ ) नहीं हो साधारणतः यही प्रतीत होता है कि कृत - युग में राजा की कोई आवश्यकता न र हुआ थी । इसी प्रकार का मत कई ग्रन्थों में पाया जाता है । चार का परन्तु आधुनिक विचारक — जिनकी दृष्टि में कृत - युग, त्रेता आदि का कोई महत्व नहीं है— इस मत को मानने में पूर्णतः सपक्ष नहीं हो सकते । कहा है इन लोगों की दृष्टि में राजा भी एक मनुष्य ही होता है और मानव - जाति राजा की की उत्पत्ति के साथ - साथ ही राजा की भी एक मानव के रूप में उत्पत्ति देवताओं हुई है यद्यपि उसके राज्य - पद पर नियोजन के प्रकार समय - समय पर उपदेश परिवर्तित होते रहे हैं । न्याय्य तथा अन्याय्य आचरण की अवधि कुछ स्मृति में निश्चित नहीं हो सकती है, जिसे कृत - युग या कलि - युग कहा जा सके । से भी देश - काल आदि के अनुसार कभी न्याय्य आचरण का प्राधान्य हो सकता है । और कभी अन्याय्य आचरण का । इस लिए यह कहना उचित नहीं है कि ॥ कृत - युग की कोई निश्चित अवधि रही और उसमें किसी राजा की आवश्यकता थी ही नहीं, अपितु यही मानना उचित है कि सब दिन लोगों में अत्यधिक रूप में अशान्ति रही और उसके प्रतीकार के लिए एक व्यवस्थापक या शासक ॥ की भी स्थिति अवश्य हो, अधिकार - तारतम्य के साथ - साथ, रही होगी । इस प्रसङ्ग में यह विचारणीय है कि इस आधुनिक मत का समर्थन 1 हमारे प्राचीन ग्रन्थों से भी होता है । जिन महाभारत या मनुस्मृति आदि ग्रन्थों को पूर्वोक्त प्रथम - पक्ष का समर्थक बतलाया गया है उन्हीं से यह आधुनिक ॥ मत भी सिद्ध होता है । हमें तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इन ग्रन्थों के पूर्वोक्त मत का भी वस्तुतः तात्पर्य यही है जो आधुनिक मत का तात्पर्य है । महाभारत में युधिष्ठिर के प्रति भीष्म का कथन है कि सत्ययुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग का अर्थ है ' दण्ड ' के प्रयोग में राजा के अवधान का आधिक्य और अल्पत्व ' । इससे यही सार निकलता है कि राजा की कुशलता तथा ॥ 9 11
१. दण्ड- नीत्यां यदा राजा सम्यक्कात्स्न्र्त्स्न्येन वर्त्तते ।
तदा कृत - युगं नाम कालसृष्टं प्रवर्त्तते ॥
दण्ड - नीत्यां यदा राजा त्रीनंशाननुवर्त्तते ।
चतुर्थमंशमुत्सृज्य तदा त्रेता प्रवत्तते ॥
अर्ध त्यक्त्वा यदा राजा नीत्यर्धमनुवत्तते ।
ततस्तु द्वापरं नाम स कालः सम्प्रवर्त्तते ॥
दण्ड- नीति परित्यज्य यदा कार्त्स्न्येन भूमिपः ।
प्रजाः क्लिश्नात्ययोगेन प्रवर्त्तेत तदा कलिः ॥
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( ३२ ) अकुशलता के ऊपर ही कृत - युग तथा कलियुग निर्भर हैं, इनकी कोई निश्चित अवधि नहीं है । फिर कृत - युग में राजा की कोई आवश्यकता नहीं थी— इस कथन का क्या अर्थ है? वसुमना तथा ' बृहस्पति के सम्वाद से भी उपर्युक्त कथन की ही पुष्टि होती है । शुक - नीति - सार में भी राजा को ही युग - प्रवर्त्तक ' माना गया है । मनु भी जब यह कहते हैं कि स्वभावतः सत्पथ-प्रवृत्त ' मनुष्य दुर्लभ है तो इससे यही मत परिपुष्ट होता है कि राजा दण्ड-प्रयोग - नैपुण्य से ही प्रजा में सम्पूर्ण रूप से सत्पथ - प्रवृत्ति हुई है न कि किसी युग - विशेष का धर्म - स्थापन में कोई मूल्य है । मनु की व्याख्या में कुल्लूक भट्ट द्वारा उद्ध्टत एक श्रुति - वाक्य से भी यह सिद्ध होता है कि मनुष्य मूलतः सर्व - दोष - विनिर्मुक्त नहीं था । राज्य का अधिकारी क्षत्रिय है, जैसा पहले बतलाया जा चुका है, और ' पुरुष सूक्त ' में वर्णित क्षत्रिय की उत्पत्ति से भी कुछ अस्पष्ट समर्थन इस मतको मिलता है । ' प्रजापति ' की भावना में भी राजा की ही भावना निहित है । यह दूसरी बात है कि राजा तथा ' प्रजापति ' के कर्त्तव्यों में कुछ तारतम्य हो, परन्तु इतना तो स्पष्ट ही है कि ' प्रजापति ' के वैदिक सिद्धान्त का ' राजा ' के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है । इस तथ्य से भी यही प्रमाणित होता है कि किसी न किसी रूप में सृष्टि के प्रारम्भ से ही राजा की अनुवृत्ति होती आ रही है । फिर भी कृत - युग में जो राजा या दण्ड आदि की सत्ता का प्रतिषेध किया गया है उसका तात्पर्य इतना ही प्रतीत हो रहा है । कि दण्ड प्रयोग के द्वारा प्रजा को सुव्यवस्थित कर दिए जाने पर राजा की मुख्य कृत्य — दण्ड- प्रयोग — से जो निवृत्ति हो जाती है इसी लिए यह अर्थ - वाद मात्र है कि राजा या दण्ड आदि की सत्ता कृत - युग में नहीं थी । किन्तु यह तो कथमपि नहीं कहा जा सकता कि कृत - युग में धर्म ही धर्म स्वभावतः प्रसृत था और राजा की कोई आवश्यकता ही नहीं थी । इसका एक बहुत ही स्पष्ट चित्र गया है केरा नहीं हो प राजा विवरण क चाहिए । राजा ast स्थि कहा गया उत्कर्ष हो उद्धार के की रचना विषयों का १. २.
राजा कृत - युग स्रष्टा त्रेताया द्वापरस्य च ।
युगस्य च चतुर्थस्य राजा भवति कारणम् ॥
शान्ति -इस प्रसङ्ग • शा ० प ० ९ १६, १४११ ९ -श्लोक भी द्रष्टव्य हैं ।
१. शान्ति पर्व ६८ । ६–३६ ॥
२. शु ० नी ० सा ० ४।५५ ॥
३. म ० स्मृ ० ७ २२ ॥
४. ' सत्यवाचो देवा अनृत - वाचो मनुष्याः ' ।
पर्व- ६ ९ ।८०,८७,८ ९, ९ १, ९ ८ ॥
१०, उद्योग - पर्व १३२।१६ आदि कुल्लूक भट्ट -म ० स्मृ ० ११२ ९ ॥ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri ३. इस द्रष्टव्य हैं । ४. ३ श
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निश्चित 1 थी- स्पष्ट गया कोही नल नहीं सरपथ-के दण्ड-( ३३ ) चित्रण हमें नैषधीयचरित के श्लोक में भी मिलता है जिसमें यह कहा है कि यद्यपि कृत - युग में भी अधर्मं का एक पाद वर्त्तमान था परन्तु राजा के राज्य - विधान के द्वारा धर्म की पूर्ण - प्रतिष्ठा हो जाने से वह अधर्मं व्यापृत हो पाता था । राजा के मूल के विषय में अन्यान्य प्राचीन तथा अर्वाचीन मतों के किसी विवरण के लिए म ० म ० काणे ' महाशय का " हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र " देखना चाहिए । कुल्लूक मूलतः पहले से भी वह में भी कहा जापति ' नीति - विद्या का मूल तथा इसके प्रवर्त्तक आचार्य राजा या राज्य के मूल के विषय में जो स्थिति बतलाई गई है साधारणतया स्थिति राजनीति विद्या के मूल के प्रसङ्ग में भी है । महाभारत में यह गया है कि जब धर्म - विप्लव के कारण लोगों में अनाचार का अध्यधिक उत्कर्ष हो गया तब सन्त्रस्त देवता- गण ब्रह्मा के यहां पहुंचे और उनसे धर्म के जापति ' उद्धार के लिए प्रार्थना की । तदनन्तर ब्रह्मा ने एक लाख अध्यायों में एक शास्त्र भी की रचना की और उसमें सभी पुरुषार्थ और दण्ड - नीति आदि प्रायः सभी उपयोगी दी राजा विषयों का समावेश किया गया था । इस शास्त्र का नाम था ' नीति - शास्त्र " आदि रहा है नर्थ वाद न्तु यह भावतः हुत ही .९ ८ ॥ = आदि १. पदैश्चतुभिः सुकृते स्थिरीकृते कृतेऽमुना के न तपः प्रपेदिरे? भुवं यदेकाकिनिष्ठया स्पृशन् दधावधर्मोऽपि कृशस्तपस्विताम् ॥ २. नष्टे ब्रह्मणि धर्मे च देवांस्त्रासः समाविशत् ते त्रस्ता नर - शार्दूल ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥
प्रसाद्य भगवन्तं तं देवं लोक - पितामहम् ।
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे दुःख - वेग - समाहताः ॥
भगवन्नर - लोकस्थं ग्रस्तं ब्रह्म सनातनम् । लोभ - मोहादिभिर्भावैः ततो नो भयमाविशत् अत्र निःश्रेयसं यन्नस्तद्ध्यायस्व पितामह । शान्ति पर्व ३. ततोऽध्याय - सहस्राणां शतं चक्रे स्व - बुद्धिजम् यत्र धर्मस्तथैवार्थः कामश्चैवाभिर्वािणतः ॥ नै ० ० च ० ११७ ॥
।
॥
५ ९ ।२२, २३, २४, २७ ॥
।
शा ० प ० ५ ९ ।२ ९ ॥
इस शास्त्र के विषय विवरण के लिए इस अध्याय के ७४ श्लोक तक
द्रष्टव्य हैं ।
४. तत्सर्वं राज - शार्दूल नीति शास्त्रेऽभिर्वाणितम् ॥ वही ५ ९ ।७४ ॥
॥२ ९ ॥
३ शु ० भू ० CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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( ३४ ) किम्वा ' दण्ड - नीति " । महाभारत में ही अन्यत्र ब्रह्म - प्रणीत नीति - शास्त्र के प्रचारक के रूप में स्वायम्भुव मनु का भी नाम आया है और इसी मानव - शास्त्र के आधार पर उशना तथा बृहस्पति के द्वारा अपने - अपने शास्त्र का प्रणयन किए जाने का उल्लेख है । शुक्र - नीति - सार के अनुसार इस ब्रह्म - प्रणीत ' नीति - शास्त्र ' में एक करोड़ श्लोक थे । परन्तु प्रजा की आयु में हास को देखकर भगवान् शङ्कर ने उस ' नीति - शास्त्र ' को दश हजार अध्यायों में संक्षिप्त किया । इस संक्षिप्त शास्त्र का नाम भगवान् शङ्कर के पर्याय ' विशालाक्ष ' के आधार पर ' वैशालाक्ष नीति - शास्त्र " पड़ा । पुनः इन्द्र ने उस वैशालाच शास्त्र को ५ हजार अध्यायों में संक्षिप्त किया और उसका नाम पड़ा ' बाहुदन्तक - शास्त्र " । तत्पश्चात् बृहस्पति ने तीन हजार अध्यायों में उस ' बाहुदन्तक - शास्त्र ' का सार निकाला जिसका नाम ' बार्हस्पत्य ' शास्त्र ' पड़ा । परन्तु सर्वान्त में महान् शुका-चार्य ने एक हजार अध्यायों में उसका संक्षिप्त रूप प्रस्तुत किया । शुक्र - नीति-सार के विवरण के अनुसार इस शुक- कृतः संक्षिप्त शास्त्र में केवल २२०० " श्लोक थे । वे २२०० श्लोक सम्पाद्यमान शुक्र नीति - सार में वर्त्तमान हैं, यद्यपि
१. दण्डेन नीयते चेदं दण्डं नयति वा पुनः ।
दण्ड - नीतिरिति ख्याता त्रींल्लोकानभिवर्त्तते ॥ शा ० प ० ५ ९ ।७८ ॥
२. शा ० प ० ३३६।३८-४६ ॥
३. शतलक्ष - श्लोक - मितं नीति - शास्त्रमथोक्तवान् ।
स्वयम्भूर्भगवांल्लोक - हितार्थं संग्रहेण वै ॥ शु ० नी ० सा ० १।२,३ ॥
४. प्रजानामायुषो ह्रासं विज्ञाय भगवान् शिवः ।
संचिक्षेप ततः शास्त्रम् महास्त्रं ब्रह्मणा कृतम् ॥
' वैशालाक्ष ' मिति प्रोक्तं तदिन्द्रः प्रत्यपद्यत ।
दशाध्याय - सहस्राणि सुब्रह्मण्यो महातपाः ॥
५. भगवानपि तच्छास्त्रं संचिक्षेप पुरन्दरः ।
सहस्रैः पञ्चभिस्तात यदुक्तं बाहुदन्तकम् ॥
६. अध्यायानां सहस्रैस्तु त्रिभिरेव बृहस्पतिः ।
संचिक्षेपेश्वरो बुद्धया बार्हस्पत्यं तदुच्यते ।
७ अध्यायानां सहस्रेण काव्यः संक्षेपमब्रवीत् ॥
८. मन्वाद्यैरादृतो योऽर्थस्तदर्थो भार्गवेण वै ।
शा ० ५० ५ ९।८१-८२ ॥
वही ५ ९ ।८३ ॥
वही ५ ९ ।८४ ॥
वंही ५ ९ ।८५ ॥
द्वाविंशति शतं श्लोका नीति - सारे प्रकीर्तिताः ॥
शु ० नी ० सी ० ४।१२४१-४२ ॥
वस्तुस्थिति २३६ ९ श्ल
श्लोकों के
है | परन्तु हजार अध्य तथा बृहस्प स्थान पर ( सहश्राक्ष राज - शास्त्र-उल्लेख हु हैं — मानव सम्प्रदाय क तथा ' एके कुछ आचार किसी अज्ञा लिखित आ पिशुन, १.६ २. ३.६ ५. ६. व ७. व ८. व ९. ११. व १३. व १४. व १५. व १७. व १ ९. व CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Gollection. Digitized by eGangotri
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( ३५ ) न के -शास्त्र वस्तुस्थिति तो यह है कि ' खिल ' को छोड़ कर भी प्रकृत शुक्र - नीति - सार में किए २३६ ९ श्लोक हैं और ' खिल ' के साथ २४५४ श्लोक । कुछ सम्वादात्मक शास्त्र ' श्लोकों के पृथक्करण से २२०० श्लोक ही मौलिक हैं — ऐसा कहा जा सकता भगवान् है । परन्तु यह कुछ असङ्गत सा प्रतीत हो रहा है कि जिस शास्त्र में एक हजार अध्याय थे उसकी श्लोक संख्या केवल २२०० होंगी । उशना ' ( शुक्र ) तथा बृहस्पति का उल्लेख महाभारत में अनेक वार किया गया है । आधार स्थान पर महाभारत ने ' ' बृहस्पति ', ' विशालाक्ष ', ' काव्य ' ( शुक्र ), ' इन्द्र ' को ( सहश्राक्ष महेन्द्र ), ' प्राचेतस मनु ', ' भरद्वाज ' तथा ' गौर - शिरा ' मुनि को ऋ १५ । राज - शास्त्र - निर्माता बतलाया है । उसमें एक जगह शम्बर ' तथा आचार्य का भी सार उल्लेख हुआ है । कौटिल्य के अर्थ- शास्त्र में ५ सम्प्रदायों के नाम उल्लिखित शुक्रा- हैं— मानव, ५ " बार्हस्पत्य, औशनस, पाराशर तथा आम्भी । इन नीति- सम्प्रदायों के अतिरिक्त सर्वनाम का भी प्रयोग मिलता है- ' अपरे ', " ' एके'११ लोक तथा ' एके " " । यह कहना कठिन है कि कौटिल्य ने ज्ञात आचार्यों में से ही द्यपि कुछ आचार्यों के लिए ' अपरे ', ' एके ' आदि सर्वनाम का प्रयोग किया है या किसी अज्ञात आचार्य के लिए । इन नामों के अतिरिक्त अर्थ - शास्त्र में निम्न-लिखित आचार्यों के नाम उल्लिखित हैं: भारद्वाज, १३ विशालाक्ष ", पराशर, १५ पिशुन, 58 पिशुन पुत्र, १७ ७ कौणप दन्त, " वात घ्याधि ", वाहुदन्ती- पुत्र ( इन्द्र ), । १. शा ० पर्व ५७।२; ५७७४०; ३७ | १० ५६ २८; अनु ० पर्व - ३ ९ १८ इत्यादि । २. शा ० पर्व ५६।३८; ५७६; ३७ १०; अनु ० पर्व - ३ ९ १८ इत्यादि । ३. शा ० पर्व - ५८ ।१-३ । ४. शा ० पर्व - १०२३१-३२ । ५. अर्थ - शा ० ६. वही - पृ ० ॥ ७. वही - पृ ० ८. वही - पृ ० ९. वही - पृ ० ११. वही - पृ ० १३. वही - पृ ० १४. वही - पृ ० १५. वही - पृ ० १७. वही - पृ ० १ ९. वहो - पृ ० - पृ ० १०, ५७, ३७२, ४०१ ( चौखम्बा १ ९ ६२ ई ० ) । १०, ५७, ३७२, १०, ५७, ३७२, ५४,६४, ६८२, ६६ । ७२६ । २५, ६४, ५२८ २५, ५४, ६४, २५ । १६. ५२५ । २६, ६६, ५४ ९ ४०२, ८१२ । ४०१, ८१२ । ६ ९ ६ । १०. वही - पृ ० ३४५ । १२. वही - पृ ० ७२६ | , ६५० इत्यादि । ६८१, आदि । वही - पृ ० २६, ५५, ६४, ५२५, आदि । १८. वही - पृ ० २६, ६४ आदि । आदि । २०. वही - पृ ० २७ | CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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( ३६ ) कात्यायन, ' कणिङ्क भारद्वाज, दीर्घ चारायण ( दीर्घश्चारायणः ), घोटमुख तथा किञ्जल्क " । अर्थ- शास्त्र में ही भूयो भूयः ' आचार्या: 8 का भी उल्लेख किया गया है । यह निर्णय करना कठिन है कि यहां अन्यान्य आचार्यों का ही मत ' आचार्याः ' शब्द से खण्डनार्थ प्रस्तुत किया गया है या किसी व्यक्ति - विशेष का संकेत है । महाभारत में मी एक जगह आचार्य का उल्लेख हुआ है परन्तु वहां तो यही प्रतीत होता है कि नीति - विद्या- विशाद के अर्थ में आचार्य शब्द का प्रयोग किया गया है । महाभारत में एक ' भाष्य " का भी उल्लेख है । कामन्दकीय नीति- सार की उपाध्याय - निरपेक्षा व्याख्या में किसी ग्रन्थान्तर के उद्धरण से यह वतलाया गया है कि ब्रह्मा ने एक लाख अध्यायों में सम्पन्न एक शास्त्र की रचना की और बाद में नारद, शुक्र ( इन्द्र ), बृहस्पति, भार्गव ( शुक्र ), भारद्वाज, भीष्म, पाराशर, मनु तथा अन्यान्य ऋषियों द्वारा उस ब्राह्म - शास्त्र को संक्षिप्त बनाया गया और पश्चात् पुनः विष्णुगु ( कौटिल्य ) ने राजाओं के उपयोग के लिए देश - काल के अनुसार उसका संक्षेप किया । काम - सूत्र " के अनुसार यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मा ने एक लाख अध्यायों में विभक्त एक शास्त्र की रचना की और बाद में उस शास्त्र में १. बही - पृ ० ५२४ । २. वही - पृ ० ५२४ ( सम्भवतः पूर्वोक्त भारद्वाज से ये अभिन्न हैं ) । ३. वही - पृ ० ५२४ । ४. वही - पृ ० ५२४ । ५. वही - पृ ० ५२५ । ६. वही - पृ ० १६, ३३२, ३४५, ३८८, ४०२, ७. शान्ति - पर्व - १०२ । ३२ ॥ ८.
९. ब्रह्माध्याय - सहस्राणां शतं चक्रे स्व - बुद्धिजम् ।
तन्नारदेन शक्रेण गुरुणा भार्गवेण च ॥
भारद्वाज - विशालाक्ष - भीष्म- पाराशरैस्तथा ।
संक्षिप्तं मनुना चैव तथा चान्यैर्महर्षिभिः ॥
प्रजानामायुषो ह्रासं विज्ञाय च महात्मना । ४० ९ आदि । शान्ति पर्व १०३।४४ । संक्षिप्तं विष्णु - गुप्तेन नृपाणामर्थं सिद्धये ॥ उ ० निरपेक्षा- पृ ० ८ ( पूना ) । १०. प्रजापतिहि प्रजाः सृष्ट्वा तासां स्थिति - निबन्धनं त्रिवर्गस्य साधनम् अध्यायानां शत - सहस्रेण अग्रे प्रोवाच । तस्य ऐक- देशिकं स्वायम्भुवो मनुः
धर्माधिकारिकं पृथक् चकार । बृहस्पतिः अर्थाधिकारिकम् ॥ का ० सू ० १ । १ । ५-७ ॥
वर्णित धर्म सुसङ्गठित प्रवर्त्तकम का | नी शुक्र, भार आङ्गिरस और बुद्ध-निर्माताओ नीति- सार ructed ) पुत्र तथा गया है । विरुद्ध दो उपर्य त्रिपयक ) ग्रन्थों की कुछ आच ऊपर और ग्रन्थ लिख में धर्म - श फिर भी में धर्म क का भी म मार्मिक वि शास्त्र - प्रवर १. ३. ४. ६. 5. नास्ति तथ या ० स्मृ ० CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Gollection. Digitized by eGangotri
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( ३७ ) UT:), चर्णित धर्म - शास्त्र को स्वायम्भुव मनु ने और अर्थ - शास्त्र को बृहस्पति ने T र्या: 8 सुसङ्गठित किया । महाभारत में भी स्वायम्भुव मनु को धर्म - शास्त्र का न्यान्य प्रवर्त्तक माना गया है और प्राचेतस मनु को अर्थ- शास्त्र ( नीति - शास्त्र ) का । नीति प्रकाशिका में ब्रह्मा, महेश्वर, इन्द्र, प्राचेतस मनु, बृहस्पति, शुक्र, भारद्वाज, वेद व्यास तथा गौर - शिरा का, दशकुमार चरित्र में शुक्र, विशाद आङ्गिरस ( बृहस्पति ), विशालाक्ष, वाहुदन्ती - पुत्र तथा पराशर ( इत्यादि ) का एक और बुद्ध चरित " में भृगु, अङ्गिरा, शुक्र तथा बृहस्पति का उल्लेख राज - शास्त्र निर्माताओं के रूप में किया गया है । शुक्र नीति - सार में वशिष्ठ आदि को नान्तर नीति - सार - संग्राहक बतलाया गया है । एड्गर्टन के द्वारा पुनरुद्धृत ( Reconst-उपन्न ructed ) पञ्चतन्त्र के प्रथम श्लोक में मनु, बृहस्पति, शुक्र, पराशर, पराशर-स्पति, पुत्र तथा चाणक्य का नृप - शास्त्र के प्रतिष्ठापक के रूप में अभिवन्दन किया गया है । चाणक्य तथा कौटिल्य के विषय में एकता तथा अनेकता के परस्पर-द्वारा विरुद्ध दो मत प्रचलित हैं । णुगुप्त उसका उपर्युक्त भाचार्यों में से कुछ आचार्यों के राज - नीति - विषयक ( अर्थ - शास्त्र-चिपयक ) ग्रन्थ की स्थिति तो प्रामाणिक है पर सभी आचार्यों के तद्विषयक ग्रन्थों की स्थिति में अभी प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं । ऐसा प्रतीत होता है कि लाख त्र में कुछ आचार्यों ने धर्म - शास्त्र के ऊपर, कुछ ने अर्थ- शास्त्र ( राज - नीति - शास्त्र ) के ऊपर और कुछ आचार्यों ने धर्मं- शास्त्र तथा अर्थ- शास्त्र इन दोनों पर स्वतन्त्र ग्रन्थ लिखे थे । परन्तु धर्म - शास्त्र में भी अर्थ -शास्त्र की चर्चा और अर्थ - शास्त्र में धर्म - शास्त्र की चर्चा अत्यावश्यक है, अन्यथा दोनों ही अपूर्ण रह जाते हैं । फिर भी दोनों को अलग - अलग मानने का मुख्य कारण यही है कि धर्म - शास्त्र में धर्म का प्राधान्य होता है जब कि अर्थ - शास्त्र में अर्थ का । यही विज्ञानेश्वर ' का भी मत है । बहुत सम्भव है कि जिन धर्म - शास्त्र ग्रन्थों में राज - नीति का T मार्मिक विवेचन किया गया होगा उन धर्म - शास्त्रों के आचार्यों को भी नीति-शास्त्र - प्रवर्त्तक के रूप में मान लिया गया हो! परन्तु उपर्युक्तलिखित सूचियों
१. शान्ति - पर्व २१।१२ ॥ २. शान्ति पर्व ५७ ४३, ५८।२ ॥
३. हिस्ट्री ऑफ् धर्म - शास्त्र, भा ०, ३, पृ ० ४ ॥
४. द ० कु ० च ०, उ ० पी०-८ ॥ ५. बुद्ध चरित - ११४६ ॥
112 ( 1 ६. शु ० नी ० सा ० ११३ ॥ ७. वही ४।२ ९ ४ - ९ ५ ॥ मिताक्षरा २।२१ ॥
८. यद्यपि समानकर्तृकतया अर्थ - शास्त्र - धर्म - शास्त्रयोः स्वरूप - गतो विशेषो धनम् नास्ति तथापि प्रमेयस्य धर्मस्य प्राधान्यात् अर्थस्य च अप्राधान्यात्... मिताक्षरा -मनुः या ० स्मृ ० २१२१ । 116-CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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( ३८ ) में कुछ ऐसे भी आचार्य हैं जिनका संकेत अत्यल्प है । उदाहरणार्थं कौटिल्य के द्वारा उल्लिखित पिशुन, पिशुन - पुत्र, कौणप दन्त तथा वात - व्याधि को ले सकते हैं । इन आचार्यों का संकेत भी इतना दुर्लभ है कि यह कहना कठिन है कि इन आचार्यों के ग्रन्थ भी कभी थे! यदि अर्थ - शांस्त्र के ऊ ' नय चन्द्रिका ' व्याख्या लिखने वाले माधवयज्वा ( जिसका सम्पादन डा ० जौली तथा डा ० स्मित ने किया है ) के अनुसार पिशुन को नारद का, कौणपदन्त को भीष्म का और वात - व्याधि को उद्धव का पर्याय मान लिया जाय तो कथञ्चित् कुछ समाधान मिल जाता है । इनमें से भीष्म तथा उद्धव की राजनीति महाभारत आदि कुछ ग्रन्थों को छोड़ कर स्वतंन्त्र रूप में उनके द्वारा उपनिबद्ध नहीं हुई है । जो कुछ भी हो इतना तो निश्तित है कि किसी भी सूची को पूर्ण नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि अपने से पूर्ववर्ती सभी आचार्यों का संग्रह किसी भी सूचीकार ने नहीं किया है । उपर्युक्त आचार्यों के ग्रन्थों में से अर्थ - शास्त्र या नीति - शास्त्र से स्वतन्त्र रूप में सम्वद्ध केवल तीन ग्रन्थ - कौटिल्य अर्थशास्त्र, शुक्र - नीति - सार तथा चाणक्य सूत्र – अथवा डा ० एफ. डब्ल्यू.० थॉमस द्वारा सम्पादित बार्हस्पत्य-सूत्र को लेकर चार ग्रन्थ उपलब्ध है । विद्वानों का मत है कि इस बार्हस्पत्य-सूत्र का मूल रूप यद्यपि प्राचीनतम है तथापि वर्त्तमान रूप नवम या दशम शतक का है । शुक्र - निति - सार का भी सात्तात् सम्बन्ध शुक्राचार्य से सिद्ध करना कुछ कठिन है | इन ग्रन्थों के अतिरिक्त आचार्य वामन्दक का ' नीति - सार ' ( जिसका प्रथम - संघटन ४०० ई ० के आस - पास हुआ था और द्वितीय - संघटन १७ वीं शताब्दी में माना जाता है ), वैशम्पायन के द्वारा निर्मित ' नीति- प्रकाशिका ', भोज का ' युक्ति- कल्पतरु ' सोमदेव ( ९ ५ ९ ई ० ) का ' नीति- वाक्यामृत '; लक्ष्मीधर के ' कृत्य - कल्पतरु ' का ' राजनीति - काण्ड ', चण्डेश्वर का ' राजनीति- रत्नाकर ', मित्र- मिश्र का ' राजनीति प्रकाश ', नीलकण्ठ का ' नीति- मयूख ' अथवा ' राज-नीति- मयूख ' अनन्तदेव का ' राज - धर्म- कौस्तुभ ' आदि राज - नीति - शास्त्र के प्रमुख ग्रन्थ हैं । पुराणों में भी अग्नि पुराण ( अध्याय – २१८ - २४२ ), गरुड़ पुराण ( अध्याय – १०८ - ११५ ), मत्स्य पुराण ( अध्याय - २१५- २४३ ), मार्कण्डेय-पुराण ( अध्याय – २४ ), कालिका - पुराण ( अध्याय – ८७ ) आदि विशेषतः अवलोकनीय हैं । स्मृतियों में मनुस्मृति ( सप्तम से नवम अध्याय तक ), बृहत्पाराशर - स्मृति ( अध्याय – १० ) बुद्ध - हारित स्मृति ( अध्याय -७ ) आदि द्रष्टव्य हैं । महाभारत के वनपर्व ( अध्याय – १५० ), सभापर्व ( अध्याय १-१३० काण्ड के भार के साथ आदि हैं अनेकशः शब्द से ब्राह्म - नीति ' अमितन प्राचीन प संकेत पह इस रूप अर्थ- शाख की विद्या के नीति-को । यह बत १ २ ३ ४ ५ विश्व - वि ६ 19 G 913 CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri