शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 271–280
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 271–280
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॥ १८ ॥
लिये सज्जन लिये उपदेश और सर्पों होता है 1 ॥ राजा के पुनः उनके उसके बाद शत्रु भी सीन तथा दिशाओं में शत्रु, मित्र अमास्य हैं । -हीनबल T ता करे । तथा उन्हें चतुर्थाध्याये मिश्रप्रकरणम् १८५ . जिस प्रकार से उपाय द्वारा सर्प, हाथी तथा सिंह को अपने वश में किया खाता है उसी प्रकार से यथायोग्य उपाय से मित्र तथा शत्रु को अपना बशवर्त्ती
बनाना चाहिये ।
भूमिष्ठाः स्वर्गमायान्ति व भिन्दन्त्युपायतः ॥ २५ ॥
क्योंकि उपाय से मनुष्य भूमि में रहकर स्वर्ग पहुँच जाता है और वज्र को भी विदीर्ण कर देता है ।
सुहृत्संबन्धि स्त्री पुत्रप्रजाशत्रुषु ते पृथक् ।
सामदानभेददण्डाश्चिन्तनीयाः स्वयुक्तितः ॥ २६ ॥
मित्रादि के प्रति सामादिकों का विचार स्वयुक्तियों से करने का निर्देश-मिन्न, संबन्धी, पुत्र, प्रजा और शत्रु इन सब के विषय में उक्त साम, दान, तथा दण्ड का अपनी युक्ति से पृथक् २ विचार करना चाहिये ।
एकशीलव यो विद्या जातिव्यसनवृत्तयः. ।
साहचर्ये भवेन्मित्रमेभिर्यदि तु साजवैः ॥ २७ ॥
मित्रता होने के कारणों का निर्देश - जिनके परस्पर स्वभाव, अवस्था, विद्या ( ज्ञान ), जाति, व्यसन ( आदत ), आजीविका ये सब समान हैं वे यदि निष्कपट भाववाले सरल होकर एक जगह मिलते हैं तो मित्र हो जाते हैं ।
त्वत्समस्तु सखा नास्ति मित्रे साम इदं स्मृतम् ।
मम सर्व तवैवास्ति दानं मित्रे सजीवितम् ॥ २८ ॥
मित्र के लिये साम तथा दान वाक्यों के लक्षण - तुम्हारे समान मेरा दूसरा कोई मित्र नहीं है ' ऐसा मित्र के लिये कहना ' साम वाक्य ' कहलाता है । और ' जीवन के सहित मेरी सभी वस्तुयें तुम्हारी ही हैं ' यह मित्र के लिये कहना ' दान वाक्य ' कहलाता है । मित्रेऽन्यमित्रसुगुणान् कीर्तयेद् भेदनं हि तत् मित्रे दण्डो न करिष्ये मैत्री मेवंविधोऽसि चेत् भेद तथा दण्ड - वाक्यों के लक्षण - ' मित्र के सामने अन्य -गुणों की प्रशंसा करना ' यह मित्र के लिये ' भेद - वाक्य ' और हो तो मैं तुम्हारे साथ मित्रता नहीं रखूंगा ' यह कहना मित्र -वाक्य ' कहलाता है |
यो न संयोजयेदिष्टमन्यानिष्टमुपेक्षते ।
उदासीनः स न कथं भवेच्छत्रुः सुसान्धिकः ॥
।
॥ २६ ॥
मित्र के सुन्दर ' तुम यदि ऐसे के लिये ' दण्ड-३० ॥ उदासीन के शत्रु बनने का निर्देश - जो स्वयं अभीष्ट कार्य की सिद्धि CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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१८६ शुक्रनीतिः न करे और दूसरे के किये हुये अनिष्ट की उपेक्षा करे, वह उदासीन भलीभांति सन्धि करने पर भी क्यों न शत्रु हो अर्थात् सन्धि करने पर भी वह शत्रु ही हो जाता है । सामादि परस्परमनिष्टं न चिन्तनीयं त्वया मया । का व्य नीति सुसाहाय्यं हि कर्तव्यं शत्रौ साम प्रकीर्तितम् ॥ ३१ ॥ दाननी
शत्रु के प्रति सामवाक्य के लक्षण – ' तुम्हें और हमें परस्पर एक दूसरे बाद प्रकारों सभी के अनिष्ट का विचार नहीं रखना चाहिये. बल्कि सहायता ही करनी चाहिये प्राण - संकट ऐसा शत्रु के लिये कहना ' सामवाक्य ' कहलाता है | उचित होता
करैर्वा प्रमिते प्रमैर्वत्सरे प्रबलं रिपुम् ।
तोषयेत्तद्धि दानं स्याद्यथायोग्येषु शत्रुषु ॥ ३२ ॥
शत्रु के लिए दान का स्वरूप - निर्देश - ' प्रबल शत्रु को वर्ष में थोड़ा सा शत्रुभेद कर ( मालगुजारी ) या छोटा सा कोई ग्राम देकर या योग्यतानुसार कुछ. लिये साम देकर संतुष्ट करना ' शत्रु के लिये ' दान ' कहलाता है ।
शत्रुसाधकही नत्वकरणात् प्रवलाश्रयात् ।
तद्धीनतोज्जीवनाञ्च शत्रुभेदनमुच्यते ॥ ३३ ॥
शत्रु के प्रति भेद का स्वरूप - निर्देश - ' शत्रु के सम्पूर्ण साधनों को देना, शत्रु से अधिक बलशाली का आश्रय लेना एवं शत्रु से हीन को प्रबल बना देना ' इन सर्वो से ' शत्रु का भेद ' होना कहा है ।
दस्युभिः पीडनं शत्रोः कर्षणं धनधान्यतः ।
तच्छिद्रदर्शनादुप्रबलैर्नीत्या प्रभीषणम् ॥ ३४ ॥
प्राप्तयुद्धानिवृत्तित्वेनासनं दण्ड उच्यते । शत्रु के प्रति दण्ड का स्वरूप - निर्देश - ' डाकुओं से शत्रु को पीड़ा अपने बराबर दण्ड का प्रय हीन बना मित्र के बलवालों तथा दान क दण्ड का प्रय पहुँचाना रिपु- पी ( लुटवाना ), धन - धान्य को क्षीण कर देना, दोष देखना, उग्र सेना तथा नीति प्रजाओं के स से अत्यन्त डराना, यदि युद्ध हो रहा हो तो उस पर डटे रहने से ना होता है । पहुँचाना ' ये सब शत्रु के लिये ' दण्ड ' कहलाता है 1 । करना चाहि क्रियाभेदादुपाया हि भिद्यन्ते च यथार्हतः ॥ ३५ ॥ होता है ।
योग्यतानुसार क्रिया में भिन्नता होने से सामादिक उपायों में भी भिन्नता होती है । सर्वोपायैस्तथा कुर्यान्नीतिज्ञः पृथिवीपतिः । स्वप्रज यथा स्वाभ्यधिका न स्युर्मित्रोदासीनशत्रवः ॥ ३६ ॥ तथा दंड स
मित्र, शत्रु तथा उदासीन राजाओं को बलवान् न होने देने का निषेध- उचित है । नीति के जाननेवाले राजा को हर एक उपायों से यही करना चाहिये कि उसके मिन्न, उदासीन तथा शत्रु राजा लोग अपने से अधिक बलवान न होने पावें । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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न भलीभांति भी वह शत्रु ३१ ॥ एक दूसरे चतुर्थाध्याये मिश्रप्रकरणम् १८७
सामैव प्रथमं श्रेष्ठं दानं तु तदनन्तरम् ।
सर्वदा भेदनं शत्रोर्दण्डनं प्राणसंशये ॥ ३७ ॥
सामादिकों को करने में क्रम का निर्देश - शत्रु के लिये सर्वप्रथम साम-नीति का व्यवहार करना ही श्रेष्ठ होता है, इससे भी कार्य न होने पर उसके दाननीति का प्रयोग उचित होता है, यदि इससे भी कार्यसिद्धि न हो तो सभी बाद प्रकारों से भेदनीति करनी चाहिये और इसके भी विफल होने पर यदि करनी चाहिये ' ' प्राण - संकट उपस्थित हो जाय तो अन्त में शत्र के लिये दण्डनीति का प्रयोग-11 में थोड़ा सा " तानुसार कुछ. को हीन बना हीन बलवालों T तथा नीति रहने से नास 1 भी भिन्नता का निषेध-ये कि उसके होने पायें ।. उचित होता है ।
प्रबलेऽरौ सामदाने साम भेदोऽधिके स्मृतौ ।
भेददण्डौ समे कार्यों दण्डः पूज्यः प्रहीनके ॥ ३८ ॥
शत्रुभेद से सामादिकों की व्यवस्था का निर्देश – अत्यन्त प्रबल शत्रु लिये साम और दान का, अपने से अधिक बलवान् के लिये साम और भेद का, अपने बराबर के लिये भेद तथा दण्ड का एवं अपने से हीन शत्रु के लिये कंवल-दण्ड का प्रयोग करना श्रेष्ठ होता है । मित्रे च सामदाने स्तो न कदा भेददण्डने । मित्र के लिये केवल साम - दान के प्रयोग का निर्देश - मित्र के लिये साम तथा दान का ही प्रयोग उचित होता है और कभी भी उसके लिये भेद तथा
दण्ड का प्रयोग उचित नहीं होता ।
रिपोः प्रजानां संभेदः पीडनं स्वजयाय वै ॥ ३ ९ ॥
रिपुप्रपीडितानां च साम्ना दानेन संग्रहः ।
गुणवतां च दुष्टानां हितं निर्वासनं सदा ॥
रिपु - पीड़ित प्रजाओं का साम - दान से संग्रह करने का प्रजाओं के साथ मेल करके शत्रु को पीड़ा पहुंचाना अपनी होता है । और शत्रु से पीड़ित लोगों को साम तथा दान से करना चाहिये ॥ और दुष्ट गुणवानों को भी देश से निकाल होता है ।
स्वप्रजानां न भेदेन नैव दण्डेन पालनम् ।
कुर्वीत सामदानाभ्यां सर्वदा यत्नमास्थितः ॥
स्वप्रजाओं का साम - दान से पालन का निर्देश - अपनी तथा दंड से नहीं किन्तु यत्नपूर्वक सर्वदा साम तथा दान से उचित है । स्वप्रजादण्डभेदैश्च भवेद्राज्यविनाशनम् ४० ॥। निर्देश - शत्रु की विजय का कारण अपने पास संग्रह देना सदा उचित ४१ प्रजाओं का भेद ही पालन करना 1 हीनाधिका यथा न स्युः सदा रक्ष्यास्तथा प्रजाः ॥ ४२ ॥
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१८५ शुक्रनीतिः प्रजाओं के साथ दण्ड तथा भेद के प्रयोग से राज्य - नाशका निर्देश अपनो जो प्रजाओं का दण्ड तथा भेद से पालन करने से राज्य का विनाश हो जाता जाते हैं- डरने व है । नहीं अतः जिस प्रकार से प्रजायें क्षीण - बल और प्रबल न हों किन्तु समवल में रहे धर्मरार्थ द उसी प्रकार से उनका पालन करना चाहिये । निवृत्तिरसदाचाराढमनं दण्डतश्च तत् । येन संदस्यते जन्तुरुपायो दण्ड एव सः ॥ ४३ ॥ घमण्डी
दण्ड के लक्षण - दण्ड के द्वारा असत् ( बुरे ) आचरण से निवृत्ति और कर्तव्य कर्म दमन होता है अतः जिस उपाय से मनुष्य का अच्छी तरह दमन होता है दण्ड देना उसे ' दण्ड ' कहते हैं । स उपाय नृपाधीनः स सर्वस्य प्रभुर्यतः । वह दण्ड नामक उपाय राजा के अधीन रहता है क्योंकि वही सर्वो का दण्ड - स स्वामी है ( अतः दण्ड वही दे सकता है ) । हैं, क्योंकि घ निर्भर्त्सनं चापमानोऽनशनं बन्धनं तथा ॥ ४४ ॥
ताडनं द्रव्यहरणं पुरान्निर्वासनाइने । दुष्टों व्यस्तक्षौरमसद्यानमङ्गच्छेदो वधस्तथा ॥ ४५ ॥ होने से यज्ञ
युद्धमेते छुपायाश्च दण्डस्यैव प्रभेदकाः । हिंसा भी अ दण्ड के भेद का निर्देश – झिड़कना, अपमान ( सम्मान पद से अलग कर देना ), उपवास कराना, बांधना, मारना, धन हर लेना, शहर या राज्य से निकाल देना, दाग देना, बुरे ढग से शिर मुड़वा देना, गदहे आदि पर घड़ा उचिता देना, किसी अङ्ग ( नाक - कान आदि ) को कटवा देना, प्राणदण्ड देना, शुद्ध दण्ड देने यो
करना, ये सभी उपाय दण्ड के ही भेद माने जाते हैं ।
जायते धर्मनिरताः प्रजा दण्डभयेन च ॥ ४६ ॥
करोत्याधर्षणं नैव तथा चासत्यभाषणम्
।
क्रूराश्च मार्दवं यान्ति दुष्टा दौष्टयं त्यजन्ति च ॥ ४७
पशवोऽपि वशं यान्ति विद्रवन्ति च दस्यवः ।
पिशुना मूकतां यान्ति भयं यान्त्याततायिनः ॥ ४८ ॥
करदाश्च भवन्त्यन्ये वित्रासं यान्ति चापरे ।
अतो दण्डधरो नित्यं स्यान्नृपो धर्मरक्षणे ॥ ४६ ॥
एवं अपराध राजा का प ॥। ' अल्प शास्त्रानुसार कहा है, होने के लिय दण्ड के प्रभाव एवं राजा को धर्मरक्षार्थं दण्डधर होने का निर्देश - दण्ड भय से प्रज्ञा अपने २ धर्मों में रत रहती है । और वह किसी दुर्बल पर आक्र. मण तथा असस्य - भाषण नहीं करती है 1 । क्रूर लोग कोमलता को धारण कर लेते हैं, दुष्ट लोग दुष्टता को छोड़ देते हैं, पशु भी वश में हो जाते हैं, डाकू लोग भाग जाते हैं, चुगुरूखोर जबान बन्द कर लेते हैं, आततायी अश्वम लोग डर CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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चतुर्थाध्याये मिश्रप्रकरणम् १८६ निर्देश - अपनो हैं- जो कोई कर नहीं देते हैं वे कर देने लग जाते हैं, और जो कोई हो जाता है जाते डरने वाले होते हैं वे विशेषतः डरने लगते हैं । अतः राजा को नित्य समवल । नहीं दण्डधर ( दण्ड देनेवाला ) होना चाहिये । में रहें ३ ॥ निवृत्ति और दमन होता है वही सर्वो का
धर्मरक्षार्थं गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः ।
उत्पथ प्रतिपन्नस्य कार्य भवति शासनम् ॥ ५० ॥
घमण्डी आदि गुरुजनों को भी अकर्तव्य कर्म को नहीं जाननेवाला, देना राजा का कर्तव्य होता है दण्ड राज्ञां सदण्डनीत्या हि दण्ड एव हि धर्माणां दण्ड - सहित नीति का व्यवहार दण्ड देने का निर्देश - घमण्डी, कर्तव्य और और कुमार्ग पर चलनेवाले गुरुजन को भी ।
सर्वे सिध्यन्त्युपक्रमाः ।
शरणं परमं स्मृतम् ॥ ५१ ॥
करने से राजा के सभी कार्य सिद्ध होते हैं, क्योंकि धर्मों का परम रक्षक दण्ड ही माना गया है । 1 से अलग कर या राज्य से नादि पर चढ़ा ड देना, शुद्ध ४७ ॥ ८ ॥ 11 श - दण्ड के ल पर आक धारण कर जाते हैं, डाकू यी लोग डर अहिंसैवासाधुहिंसा पशुवच्छुत्तिचोदनात् । दुष्टों की हिंसा को अहिंसा मानने का निर्देश— और जैसे वेद की आज्ञा होने से यज्ञ में पशु की हिंसा अहिंसा मानी जाती है वैसे ही दुष्ट पुरुषों की हिंसा भी अहिंसा होती है । I दण्ड्यस्यादण्डनान्नित्यमदण्डचस्य च दण्डनात् ॥ ५२ ॥
अतिदण्डाच्च गुणिभिस्त्यज्यते पातकी भवेत । उचितानुचित दण्ड देने से राजा के इष्टानिष्ट फलकथन का निर्देश - निश्य दण्ड देने योग्य व्यक्ति को दण्ड न देने से, नहीं दण्ड देने योग्य को दण्ड देने से एवं अपराध से अधिक दण्ड देने से विद्वान् लोग ऐसे अनुचित दण्ड देनेवाले
राजा का परित्याग कर देते हैं और वह राजा उक्त कर्म से पातकी होता है ।
अल्पदानान्महत् पुण्यं दण्डप्रणयनात् फलम् ॥ ५३ ॥
शास्त्रेषूक्तं मुनिवरैः प्रवृत्त्यर्थं भयाय च । ' अल्प ( थोड़ा जो कुछ ) दान करने से भी बहुत बड़ा पुण्य होता है एवं शास्त्रानुसार दण्ड देने से बहुत बड़ा फल होता है ' ' यह जो शास्त्रों में सुनिवरों ने कहा है, वह क्रम से लोगों को दान में प्रवृत्ति कराने एवं पाप से भयभीत
होने के लिये ही कहा है ।
अश्वमेघादिभिः पुण्यं तत् किं स्यात् स्तोत्रपाठतः ॥ ५४ ॥
क्षमया यत्तु पुण्यं स्यात्तत्किं दण्डनिपातनात् । स्वप्रजादण्डना डनाच्छु यः कथं राज्ञो भविष्यति ॥ ५५ ॥
तद्दण्डाज्जायते कीर्तिर्धनपुण्यविनाशनम् । अश्वमेधादि यज्ञों से जो पुण्य होता है वह क्या केवल स्तोत्रों के पाठमान्नः CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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१६० शुक्रनीति: से होगा? अर्थात् कभी नहीं । क्षमा करने से जो पुण्य होता है वह क्या जिस देने से होगा? अर्थात् कभी नहीं । अतः अपनी प्रजाओं को दण्ड देने से का कसे कल्याण होगा अर्थात् कभी नहीं, बल्कि उन सर्वो को दण्ड
उल्टे राजा की कीर्त्ति, धन तथा पुण्य का नाश ही होगा ।
नृपस्य धर्मपूर्णत्वाद्दण्डः कृतयुगे न हि ॥ ५६ ॥
त्रेतायुगे पूर्णदण्डः पादाधर्माः प्रजा यतः ।
द्वापरे चार्धधर्मत्वात् त्रिपाद्दण्डो विधीयते ॥ ५७ ॥।
प्रजा निःस्वा राजदौष्टयाद् दण्डार्ध तु कलौ यथा । दण्ड राजाओं होती हैं देने से में लीन रह पापी अ पृथ्वी अधि राज्य ) क सत्ययुगादि में दण्ड का अभाव एवं त्रेतादियुगों में क्रम से पूर्ण, पौन “ एवं अर्ध दण्ड देने का सकारण निर्देश - सत्ययुग में धर्म चारों पार्दो से परिपूर्ण धन का · था, अतः उस समय किसी के लिये भी दण्ड नहीं दिया जाता था, त्रेतायुग में प्रजाओं में तीन पाद ( १२ आने ) धर्म के साथ २ एक पाद ( ४ आने ) I अधर्मं भी रहता था, अतः उस समय पूर्ण दण्ड दिया जाता था, द्वापरयुग में पीनेवाला · आधा अंश धर्म और आधा अंश अधर्म अर्थात् दोनों समान भाव से थे, अतः क्रोधी राज तीन पार्दो के साथ ( १२ आने ) दण्ड का विधान था तथा कलियुग में संताप देता राजाओं की दुष्टता से प्रजायें कर अधिक बढ़ जाने से एवं राजा द्वारा धन हरण -लोप कर करने से अत्यन्त निर्धन होती हैं अतः आधा अंश दंड देने का विधान है । दूषित कर युगप्रर्वतको राजा धर्माधर्मप्रशिक्षणात् ॥ ५८ ॥
युगानां न प्रजानां न दोषः किन्तु नृपस्य हि । राजा को युगप्रवर्तक होने का निर्देश - प्रजाओं को धर्म तथा अधर्म की राजा शिक्षा देनेवाला राजा के होने से वही सत्ययुग आदि ४ युगों का प्रवर्तक होता -बुद्धि तथा है, अतः अधर्म की प्रवृत्ति में युगों का या प्रजाओं का दोष नहीं है अर्थात् युग भ्रष्ट नहीं या प्रजाओं के ऊपर अधर्मं भावना नहीं अवलम्बित है प्रत्युत राजा के अवलम्बित है अर्थात् राजा के अधार्मिक होने से प्रजाओं मैं या युग में
फैलता है ।
प्रसन्नो येनं नृपतिस्तदाचरति वै जनः ॥ ५६ ॥
लोभाद्भयाच्च किं तेन शिक्षितं नाचरेत् कथम् । धार्मिक तथा अधार्मिक प्रजाओं के होने के कारणों का निर्देश- -जब -लोभ से प्रजायें जिससे राजा प्रसन्न हो वैसा आचरण करने लगती हैं तब ऊपर क्योंकि स काम, -लोभ से प्र कि काम, भला होना राजा के भय से उसके द्वारा सिखाये जाने पर तदनुसार कैसे नहीं वे चाहेंगी चाह -अर्थात् अवश्य चलेंगी । सुपुण्यो यत्र नृपतिर्धर्मिष्ठास्तत्र हि प्रजाः ॥ ६० ॥ ' राज
महापापी यत्र राजा तत्राधर्मपरो जनः । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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वह क्या दण्ड देने से राजाओ दण्ड देने से ८६ ॥ २७ ॥ था । से पूर्ण, पौन पादों से परिपूर्ण था, त्रेतायुग में द ( ४ आने ) ना, द्वापरयुग में नासे थे, अतः कलियुग में द्वारा धन हरण
विधान है ।
६ ॥
तथा अधर्म की ' प्रवर्तक होता है अर्थात् युग राजा के ऊपर युग अध २६ ॥ श - जब हैं तब भला ह्रीं वे चलेंगी Lo II चतुर्थाध्याये मिश्रप्रकरणम् १६१ जिस राज्य में राजा अत्यन्त धर्मात्मा होता है वहां पर प्रजाय भी धर्मिष्ठ हैं और जहां पर राजा अत्यन्त पापी होता है वहां पर प्रजायें भी अधर्म होती
मैं लीन रहती हैं ।
न कालवर्षी पर्जन्यस्तत्र भूर्न महाफला ॥ ६१ ॥
जायते - राष्ट्रहासश्च शत्रुवृद्धिधनक्षयः । पापी राजा राज्य में समय पर वृष्टि न होने का निर्देश - और वहां पर अधर्म अधिक होने से मेघ समय पर पानी बरसानेवाला नहीं होता है और पृथ्वी अधिक धान्य तथा फल से युक्त नहीं रहती है, एवं राज्य ( देश या राज्य ) का दिन - प्रतिदिन ह्रास होने लगता है तथा शत्रुओं की वृद्धि और
धन का चय होता है ।
सुराप्यपि वरोराजा न खैणो नातिकोपवान् ॥ ६२ ॥
लोकांचण्डस्तापयति स्त्रैणो वर्णान् विलुम्पति । स्त्रैण और क्रोधी होना राजा को निषिद्ध होने का निर्देश – मद्य ( शराब ) पीनेवाला राजा अच्छा है किन्तु स्त्री में आसक्त ( ऐयाश ) तथा अत्यन्त क्रोधी राजा का होना अच्छा नहीं है क्योंकि अत्यन्त क्रोधी राजा लोगों को संताप देता है और स्त्री में आसक्त ( लम्पट ) राजा ब्राह्मणादि जातियों का छोप कर देता है अर्थात् व्यभिचार द्वारा वर्ण - सङ्कर उत्पन्न करके वर्णों को
दूषित कर देता है ।
मद्यप्येकश्च भ्रष्टः स्याद् बुद्धया च व्यवहारतः ॥ ६३ ॥
कामक्रोधौ मद्यतमौ सर्वमद्याधिकौ यतः । राजा को काम - क्रोध त्याग करने का निर्देश- -मथ पीनेवाला अकेले स्वयं - बुद्धि तथा व्यवहार में भ्रष्ट होता है किन्तु प्रजाओं की बुद्धि तथा व्यवहार को अष्ट नहीं करता है । और काम तथा क्रोध ये दोनों मद्य से भी अधिक हैं
क्योंकि सभी मादक वस्तुओं से बढ़कर मादक होते हैं ।
धनप्राणहरो राजा प्रजायाश्चातिलोभतः ॥ ६४ ॥
तस्मादेतत् त्रयं त्यक्त्वा दण्डधारी भवेन्नृपः । काम, क्रोध तथा लोभ याग कर दण्ड देने का निर्देश- - राजा अत्यन्त - लोभ से प्रजा का धन तथा प्राण का हरण करनेवाला होता है, इसलिये काम, क्रोध तथा लोभ इन तीनों को छोड़ कर राजा को दण्ड देनेवाला "
होना चाहिये ।
अन्तर्मृदुर्बहिः क्रूरो भूत्वा स्वां दण्डयेत् प्रजाम् ॥ ६५ ॥
अत्युग्रदण्डकल्पः स्यात् स्वभावाद्धि तकारिणः । ' राजा ऊपर से ' होकर दण्ड देवे ' इसका निर्देश- -राजा को हृदय में यूर CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection: Digitized by eGangotri
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शुक्रनीति: १ ९ २ कोमलता रखते हुये ऊपर से क्रूर ( तीक्षण ) होकर अपनी प्रजा को दण्ड चाहिये । अर्थात् ऊपर से अत्यन्त कठोर दण्ड देनेवाले के समान देना और स्वभाव से हितकारी होना चाहिये । मानस राष्ट्रं कर्णेजपैर्नित्यं हन्यते च स्वभावतः ॥ ६६ ॥ आदि भावो
अतो नृपः सूचितोऽपि विसृशेत् कार्यमादरात् । वचनों से को समझक चुगुलखोरों से देश नष्ट होने का निर्देश – स्वभावतः चुगुलखोर छोरा में दण्डविच गुलखोरी से परस्पर विगाड़ कराकर राज्य को नष्ट करने की चेष्टा करते हैं अतः राजा किसी की चुगुही सुनने पर यत्नपूर्वक विचार कर तदनुसार, कार्य करे । दण्ड आत्मनश्च प्रजायाश्च दोषदर्श्यत्तमो नृपः ॥ ६७ ॥। साहस ( च
विनियच्छति चात्मानमादौ भृत्यांस्ततः प्रजाः । उत्तम राजा के लक्षण तथा स्वयं दोषमुक्त होने का निर्देश - अपने हुआ प्रजाओं के दोषों को देखनेवाला राजा उत्तम कहलाता है और वह प्रथम तथा पूंछ कर छो नामक ( २ को दोषमुक्त बनाता है पश्चात् मृत्यों को, उसके बाद प्रजाओं को दोषमुक्त बनाता है । कायिको वाचिको मानसिकः सांसगिकस्तथा ॥ ६८ ॥ यदि
पैसों का, द चतुर्विधोऽपराधः स बुद्धबुद्धिकृतो द्विधा । अपराध के ४ भेद पुनः प्रत्येक के दो - दो भेदों का निर्देश - कायिक ( शरीर से होनेवाला ), वाचिक ( वाणी से होनेवाला ), मानसिक ( मनसे होनेवाला ), सांसर्गिक ( संसर्ग से होनेवाला ), इस प्रकार से अपराध ४ प्रकार का होता है । और उसमे प्रत्येक बुद्धिकृत ( जानबूझ कर होनेवाला ) एवं अबुद्धिकृत
( बिना जाने होनेवाला ) भेद से दो - दो प्रकार का होता है ।
पुनर्द्विधा कारितश्च तथा ज्ञेयोऽनुमोदितः ॥ ६६ ॥
सकृदसकृदभ्यस्तस्वभावैः स चतुर्विधः । पुनः उक्त अपराधों के २ भेद एवं सभी अपराधों के पुनः ४ भेदों का निर्देश - वह अपराध पुनः दो प्रकार का होता है एक कारित ( कराया हुआ ) दूसरा अनुमोदित ( अनुमोदन किया हुआ ) और वह अपराध सकृस्कृत ( एक बार किया हुआ ), असकृत्कृत ( बार - बार किया हुआ ), अभ्यस्त कृत ( निरन्तर किया हुआ ), स्वभावकृत ( स्वभाव से किया हुआ ) इस प्रकार
से 8 प्रकार का होता है ।
नेत्रवक्त्रविकारायैर्भावैर्मानसिकं तथा ॥ ७० ॥
क्रियया कायिकं वीक्ष्य वाचिकं क्रूरशब्दतः 1 सांसर्गिकं साहचयैर्ज्ञात्वा गौरवलाघवम् ॥ ७१ ॥
CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri उत्तम दण्ड इस प्र साधारण री बाद यदि क उसके बाद ( जुर्माना ) उत्तम नेल देने का अपराध ) क प्रथम साहस पर मध्यम १३ श
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को दण्ड देना समान और ६ ॥ गुलखोर लोग चेष्टा करते हैं, कर तदनुसार ॥ - अपने तथा ह प्रथम अपने को दोषमुक्त ८ ॥ कायिक ( शरीर होनेवाला ), कार का होता ॥ : ४ मेदों का राया हुआ ) ध सकृत्कृत - अभ्यस्तकृत ) इस प्रकार ॥ चतुर्थाध्याये सुहृदादिलक्षणप्रकरणम् १६३ उत्पन्नोत्पत्स्यमानानां कार्याणां दण्डसावहेत् । मानसिकादि ४ अपराधों की परीक्षा का निर्देश - नेन तथा मुख की भङ्गी आदि भावों से मानसिक अपराध को एवं क्रिया के द्वारा कायिक कर्कश • से वाचिक और सहवास से सांसर्गिक अपराध के गौरव और, वचनों लाघव को समझकर उत्पन्न हुये तथा आगे होनेवाले कार्यों ( अपराध ) के संबन्ध
मैं दण्डविचार करना चाहिये ।
प्रथमं साहसं कुर्वन्नुत्तमो दण्डर्महति ॥ ७२ ॥
न्याय्यं किमिति संपृच्छेत् तवैवेयमसत्कृति ' । दण्ड के योग्य पुरुषों के लक्षण - उत्तम पुरुष यदि प्रथय वार साधारण साहस ( चोरी आदि पाप ) करे तो क्या यह तुम्हारा कार्य न्याय युक हुआ है? और क्या तुम्हारा ही किया हुआ यह अपराध है । इसको उससे पूँछ कर छोड़ देना चाहिये । उसके बाद पुनः करने पर प्रथम साहसदण्ड
नामक ( २५० पैसों का ) दण्ड ( जुर्माना ) करना चाहिये ।
अपराधं यथोक्तं च द्विगुणं त्रिगुणं ततः ॥ ७३ ॥
यदि उत्तमजन दुबारा वही । अपराध करे तो उससे दूना अर्थात् ५०० पैसों का, तिबारा करे तो ७५० पैसों का दण्ड ( जुर्माना ) करना चाहिये ।
मध्यमं साहसं कुर्वन्नुत्तमो दण्डमर्हति ।
घिग्दण्डं प्रथमं चाद्यसाहसं तदनन्तरम् ॥ ७४ ॥
यथोक्तं तु तथा सम्यग्यथावृद्धि ह्यनन्तरम् । उत्तम पुरुष पूर्वकी अपेक्षा अधिक मध्यम साहस ( अपराध ) करे तो उसे दण्ड इस प्रकार देना चाहिये अर्थात् उत्तम पुरुष यदि प्रथम उक्त अपराध साधारण रीति से करे तो उसे धिक्कार वचन सुनाकर दण्ड देना चाहिये उसके बाद यदि करे तो प्रथम साहस दण्ड ( २५० पैसों का जुर्माना ) करना चाहिये. उसके बाद अपराधों की वृद्धि के अनुसार उक्त रूप से द्विगुण, त्रिगुण दण्ड.
( जुर्माना ) अच्छी तरह से करे ।
उत्तमं साहसं कुर्वन्नुत्तमो दण्डमर्हति ॥ ७५ ॥
प्रथमं साहसं चादौ मध्यमं तदनन्तरम् ।
यथोक्तं द्विगुणं पश्चादवरोधं ततः परम् ॥ ७६ ॥
उत्तम पुरुष के विषय में प्रथमादि अपराधों के दण्डों का पूर्व अन्त में बैल देने का निर्देश और उत्तम पुरुष यदि उत्तम साहस ( अत्यधिक अपराध ) करे तो इस भांति दण्ड देना चाहिये कि -प्रथम अपराध होने पर प्रथम साहस दण्ड ( २५० पैसों का जुर्माना उसके बाद पुनः अपराध करने ' पर मध्यम साहस दण्ड ( ५०० पैसों का जुर्माना ), उसके बाद भी अपराधः १३ शु ० CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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शुक्रनीति: १६४ करने पर उससे दूना ( १००० पैसों का जुर्माना ) करना चाहिये उसके चाद ) जेल भेद देना चाहिये । बुद्धिपूर्वनृघातेन विनैतद्दण्डप । उपरि लिखित दण्ड की व्यवस्था वृद्धिपूर्वक नरहत्या
के लिये ही है, अन्य के लिये नहीं समझनी चाहिये ।
उत्तमत्वं मध्यमत्वं नीचत्वं चात्र कीर्त्यते ॥
गुणेनैव तु मुख्यं हि कुलेनापि धनेन च । यहां पर उत्तम, मध्यम तथा अधम की व्याख्या मुख्य
के गुण, कुल तथा धन के अनुसार ही समझनी चाहिये ।
प्रथमं साहसं कुर्वन् मध्यमो दण्डमर्हति ॥
घिग्दण्डमर्धदण्डं च पूर्णदण्डमनुक्रमात् । ( अपराध दण्ड ( ५० ( १५०० )
नहीं करने वालो चाहिये ।
७७ ॥
अधम रूपसे, अपराधी ( १२५ पैस पैसों का ), ७८ ॥ देना चाहिय मध्यम पुरुष यदि प्रथम साहस ( अपराध ) करे तो उमे धिग्दण्ड ( तुम्हें धिक्कार है ऐसा वचन दण्ड ) देना चाहिये, उसके बाद प्रथम साहस दण्ड ( २५० पैसों का जुर्माना ) का आधा दण्ड ( १२५ पैसों का ) करना चाहिये । मार्गों उसके बाद पूर्णं दण्ड ( २५० पैसों का ) अनुक्रम से अर्थात् अपराध के बार साहस ( -बार करने या गौरव - लाघव के क्रम से करना चाहिये । उसके बाद द्विगुणं त्रिगुणं पश्चात् संरोधं नीचकर्म च ॥ ७६ ॥ पर झाडू दि
संरोध और नीच कर्म के योग्य पुरुष के लक्षण - उसके बाद प्रथम ' साहस दण्ड ( २५० पैसों का ), दुगुना ( ५०० ) तिगुना ( ७५० ) उसके बाद कैद और नीच कर्म ( मल - मूत्रादि साफ करना आदि ) का अपराध के न्यूनाधिक्य के अनुसार दण्ड देना चाहिये । अधम मध्यमं साहसं कुर्वन्मध्यमो दण्डमर्हति । पुरुष यदि पूर्व साहसमादौ तु यथोक्तं द्विगुणं ततः ॥ ८० ॥। ( ५०० पैस
ताडनं बन्धनं पञ्चात्पुरान्निर्वासनाङ्कने । उसके बाद शास्त्रोक्त दण्डनीय पुरुषों के लक्षण - मध्यम पुरुष यदि मध्यम साइस का दण्ड देन ( अपराध ) करे तो उसे प्रथम साहस दण्ड ( २५० पैसों का ) पुनः करने पर दूना ( ५०० पैसों का ) उसके बाद मारना पीटना उसके बाद बांध रखना, धनगव पीछे से शहर या राज्य से निकाल देना, दाग देना इस प्रकार से योग्यता-नुसार दण्ड देना चाहिये । राध करे उस उत्तमं साहसं कुर्वन् मध्यमो दण्डमर्हति ॥ ८१ ॥ उसके बाद
मध्यमं साहसं चादौ यथोक्तं तदनन्तरम् बाद आजीच
।
द्विगुणं त्रिगुणं पश्चाद्यावज्जीवं तु बन्धनम् ॥ ८२ ॥
आजीवन बन्धन योग्य पुरुष के लक्षण - मध्यम पुरुष यदि उत्तमसाहस CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri