शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 281–290
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 281–290
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उसके बाद करनेवालो ॥ से, अपराधी ॥ दण्ड ( तुम्हें साहस दण्ड ना चाहिये । के बार ॥ बाद प्रथम ७५० ) उसके अपराध के ॥ ध्यम साहस पुनः करने पर बांध रखना, से योग्यता-॥ ॥ उत्तम साहस चतुर्थाध्याये सुहृदादिलक्षणप्रकरणम् १६५ ) करे तो इस भांति से दण्ड देना चाहिये कि - प्रथम मध्यम साहस ( अपराध ( ५०० पैसों का ), तदनन्तर दुगुना ( १००० पैसों का ), तिगुना q ण्ड ), पश्चात् आजीवन बांधकर रखना । ये सब योग्यतानुसार करने ( १५००
चाहिये । प्रथमं साहसं कुर्वन्नधमो दण्डमर्हति ।
अर्थ यथोक्तं द्विगुणं त्रिगुणं बन्धनं ततः ॥ ८३ ॥
अधम पुरुष यदि प्रथम साहस ( अपराध ) करे तो आधा प्रथम साहस दण्ड ( १२५ पैसों का जुर्माना ) उसके बाद पूर्ण दण्ड ( २५० ) पुनः द्विगुण ( ५०० पैसों का ), पुनः त्रिगुण ( ७५० पैसों का का ) दण्ड उसके बाद जेल का दण्ड देना चाहिये ।
मध्यमं साहसं कुवन्नधमो दण्डमर्हति ।
पूर्वसाहसमादौ तु यथोक्तं द्विगुणं ततः ॥ ६४ ॥।
ततः संरोधनं नित्यं मार्गसंस्करणार्थकम् । मार्गों पर झाड़ू लगाने योग्य पुरुष के लक्षण - अधम पुरुष यदि मध्यम साहल ( अपराध ) करे तो उसे पहले प्रथम साहस दण्ड ( २५० पैसों का ), उसके बाद द्विगुण ( ५०० पैसों का ) दण्ड, उसके बाद कैद तथा नित्य सड़क
पर झाडू दिलाने का दण्ड देना चाहिये ।
उत्तमं साहसं कुवन्नधमो दण्डमर्हति ॥ ८५ ॥
मध्यमं साहसं चादौ यथोक्तं द्विगुणं ततः ।
यावज्जीवं बन्धनं च नीचकर्मैव केवलम् ॥ ८६ ॥
अधम पुरुषों के वारम्बार अपराध करने पर दण्ड का प्रकार- अधम पुरुष यदि उत्तम साहस ( अपराध ) करे तो उसे प्रथम मध्यम साहस दण्ड ( ५०० पैसों का ) देना चाहिये । उसके बाद द्विगुण दण्ड ( २०० पैसों का ) उसके बाद आजीवन जेल एवं केवल नीच कार्य ( मल - मूत्रादि साफ कराने ) का दण्ड देना चाहिये ।
हरेत पादं धनात्तस्य यः कुर्याद्धनगर्वतः ।
पूर्वं ततोऽर्धमखिलं यावसजीवं तु बन्धनम् ॥ ८७ ॥
धनगर्व से अपराध करने पर दण्ड का निर्देश – जो धन के गर्व से अप • राध करे उसे प्रथम बार उसके पास के धन से चौथाई घन दण्ड रूप में ले के, उसके बाद यदि अपराध करे तो आधा उसके बाद सम्पूर्ण धन छीन ले, उसके बाद आजीवन जेल का दण्ड दे ।
सहायगौरवाद् विद्यामदाच्च बलदर्पतः ।
पापं करोति यस्तं तु बन्धयेत् ताडयेत्सदा ॥ ८८ ॥
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शुक्रनीति: १६६ बन्धन तथा ताडन योग्य के लक्षण - जो सहायकों की श्रेष्ठता एवं के विद्या या बल के अहङ्कार से पाप ( अपराध ) करता है उसे सदा कद में बन्द अपराधी राजा को इस रखे तथा मारे - पीटे ।
पुत्र भगिनी शिष्यो दासः स्नुषाऽनुजः ।
कृतापराधास्ताड्यास्ते तनुरज्जुसुवेणुभिः ॥ ८६ ॥
पृष्ठतस्तु शरीरस्य नोत्तमाङ्गे कथञ्चन । अतोऽन्यथा तु प्रहरे बोरवद्दण्डमर्हति ॥ ९ ० ॥ राजा ज पतली रस्सी या छड़ी आदि से मारने योग्य के लक्षण - अपनी स्त्री, पुत्र, होकर अंपरा बहन ( छोटी ), शिष्य ( छान्न ), दास, पुत्रवधू ( पतोहू ), छोटा भाई द प्रजाभि अपराध करे तो इन्हें पतली रस्सी या छुट्टी से अथवा पतली रस्सी वाले से शरीर पर पीठ में मारना चाहिये किन्तु कभी भी शिर में नहीं चाहिये, इससे अन्यथा यदि कोई मारता है तो उसे चोर की भांति देना चाहिये ।
चकर्म कुर्याद्बन्धयित्वा तु पापिनम् ।
मासमात्रं त्रिमासं वा षण्मासं वाऽपि वत्सरम् ॥। ९ १ ॥
यावज्जीवं तु वा कश्चिन्न कश्चिद्बधमर्हति । अतः राजा क चालुक क्षमाशील त मारना दण्ड नीच कर्म कराने योग्य अपराधी का निर्देश - किसी भी अपराधी ( हत्या करनेवाले को छोड़कर ) को एक मास, तीन मास, छ मास, १ वर्ष या आजीवन भर कैद रखकर नीच कर्म ( मल - मूत्रादि फिकवाना आदि ) का
दण्ड देना चाहिये किन्तु किसी को वध का दण्ड नहीं देना चाहिये ।
न निहन्याच्च भूतानि त्विति जागर्ति वै श्रुतिः ॥ ६२ ॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन वधदण्डं त्यजेन्नृपः । वध की शिक्षा कदापि न देने का निर्देश- क्योंकि ' प्राणियों का वध नहीं करना चाहिये ' ऐसी श्रुति का बच्चन ( वेद का वचन ) है | अतः राजा को.
अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक वध का दण्ड देना त्याग देना चाहिये ।
अवरोधाद् बन्धनेन ताडनेन च कर्षयेत् ॥ ६३ ॥
लोभान्न कर्षयेद्राजा धनं दण्डेन वै प्रजाम् । बल्कि वध दण्ड के बदले, हथकड़ी - बेड़ी के साथ कैद रखना, मारना-पीटना, पीड़ा पहुंचाना उचित है 1 । और राजा को लोभवश धनदण्ड ( जुर्माना
करने ) से प्रजा को पीड़ा न पहुँचानी चाहिये ।
नासहायास्तु पित्राद्या दण्डयाः स्युरपराधिनः ॥ ९ ४ ॥
क्षमाशीलस्य वै राज्ञो दण्डग्रहणमीदृशम् सहायहीन अपराधी के माता - पिता आदि को दण्ड न । देने का निर्देश-CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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ष्ठता से एवं कैद में चम्ब ॥ 11 नी स्त्री, पुत्र, भाई यदि वाले चाबुक नहीं मारना भांति दण्ड ३१ ॥ नी अपराधी मास, १ वर्ष आदि ) का 1 २ ॥ का वध नहीं : राजा को. = T, मारना-( जुर्माना ३ ॥ निर्देश-चतुर्थाध्याये सुहृदादिलक्षणप्रकरणम् १६७ के सहायहीन पिता आदि को दण्ड नहीं देना चाहिये । क्षमाशील अपराधी
को इसी प्रकार से अपराधी के लिये दण्ड देना उचित है ।
राजा नापराधं तु क्षमते प्रचण्डो धनहारकः ॥ ६५ ॥
नृपो यदा तदा लोकः क्षुभ्यते । भिद्यते परैः ।
अतः सुभागदण्डी स्यात् क्षमावान् रञ्जको नृपः ॥ १६ ॥
राजा जब अपराधी को तीचण दण्ड देनेवाला एवं धन हरण करनेवाला होकर अपराध को नहीं क्षमा करता है अर्थात् अनुचित दण्ड देता है तब प्रजा चुभित हो उठती है और उसे शत्रु लोग फोड़कर अपनी अतः राजा को जितना अपराध हो उतना ही विचार कर दंड क्षमाशील तथा प्रजा का मनोरञ्जन करनेवाला होना चाहिये
मद्यपः कितवः स्तेनो जारचण्डश्च हिंसकः ।
त्यक्तवर्णाश्रमाचारो नास्तिकः शठ एव हि ॥
मिध्याभिशापकः कर्णेजपार्थ देवदूषकौ ।
असत्यवाङ् न्यासहारी तथा वृत्तिविघातकः ॥
अन्योदय सहिष्णुश्च ह्युत्कोचग्रहणे रतः ।
कार्यकृतमित्राणां कार्याणां भेदकस्तथा ॥
अनिष्टवाक् परुषवाग् जलारामप्रबाधकः ।
-नक्षत्र सूची राजद्विट् कुमन्त्री कूटकार्यवित् ॥
कुवैद्यामङ्गला शौचशीलो ' मार्गनिरोधकः । ओर कर लेते हैं, देना चाहिये एवं
।
६७ ॥
६८ ॥
९९ ॥
१०० ॥
कुसाच्युद्धतवेशश्च स्वामिद्रोही व्ययाधिकः ॥ १०१ ॥
अग्निदो गरदो वेश्यासक्तः प्रबलदण्डकृत् ।
तथा पाक्षिकसभ्यश्च बलाल्लिखितग्राहकः ॥ १०२ ॥
अन्यायकारी कलहशीले युद्धे पराङ्मुखः ।
साक्ष्यलोपी पितृमातृसती बीमित्रद्रोहका ॥ १०३ ॥
असूयकः शत्रुसेवी मर्मभेदी च वक्तकः ।
स्वकीयद्विड्गुप्तवृत्तिर्वृषलो प्रामकण्टकः ॥ १०४ ॥
बिना कुकुम्बभरणात्तपोविद्यार्थिनः सदा ।
तृणकाष्ठादिहरणे शक्तः सन् भैक्ष्यभोजकः ॥ १०५ ॥
कन्याया अपि विक्रेता कुटुम्बवृत्तिहासकः ।
अघर्मा सूचकश्चापि राजानिष्टमुपेक्षकः ॥ १०६ ॥
कुलटा पतिपुत्रघ्नी स्वतन्त्रा वृद्धनिन्दिता ।
गृहकृत्योज्झिता नित्यं दुष्टाचारा प्रियस्नुषा ॥ १०७ ॥
स्वभावदुष्टानेतान् हि ज्ञात्वा राष्ट्राद विवासयेत् । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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१६८ शुक्रनीति: देश - निष्काशन योग्य अपराधियों के लक्षण – मचप ( शराबी ), पूर्ण, स्वतन्त्र हो चोर, जार ( परस्त्रीगामी ), अत्यन्त क्रोधी, हिंसा करनेवाला ( खूनी ) देनेवाली ( वर्ण ( ब्राह्मणादि ४ वर्ण ) तथा आश्रम ( ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वाणप्रस्थ,, अप्रिय व्यव संम्यास ) के अनुकूल आचारों का स्याग करनेवाला, नास्तिक ( परलोकादि वाली ऐसी को नहीं माननेवाला ), खल, झूठा दोषारोप करनेवाला, एक को दूसरे से आपस मैं कह सुनकर विरोध करानेवाला, अच्छे साधु पुरुषों को दोष लगानेवाला एवं देवताओं को अपवित्र करनेवाला अथवा मूर्ति को तोड़नेवाला, झूठ बोलने बाला, धरोहर को हजम करनेवाला, किसी की जीविका को नष्ट करनेवाला, मार्ग दूसरी की उन्नति को नहीं सहन करनेवाला, घूस लेने में तरपर, नहीं करने में ले टापू योग्य चुरे कार्यों को करनेवाला, किसी के गुप्त विचार को प्रकट करनेवाला, चाहिये किसी के कार्यों को नष्ट करनेवाला, अप्रिय ( अनुचित ) वचन बोलनेवाला अन्न तथा , कठोरभाषी, जलाशय या बगीचे को हानि पहुँचानेवाला, झूठ - मूठ का बना जाति के अ हुआ ज्योतिषी ( भाग्य फल बतानेवाला ), राजद्रोही, बुरी सलाह देनेवाला ( दुष्टमन्त्री ), कूट कार्य ( जालसाजी ) जाननेवाला, कुवैद्य ( अनादी वैद्य ), अभद्र तथा अपचित्र आचार तथा वेश भूषा रखनेवाला, रास्ता रूधनेवाला, संसर्ग ठीक २ गवाही नहीं देनेवाला, उद्धत वेश रखनेवाला, अपने स्वामी के साथ राजा सदा द्रोह रखनेवाला, अनाप - शनाप व्यय करनेवाला, आग लगानेवाला, विप देने- दुष्टये बाला, वेश्या में आसक्त, अत्यन्त उम्र दंड देनेवाला, अफसर, न्यायालय में सदस्य ( जूरी ) होकर पक्षपात करनेवाला, बलपूर्वक लिखित पत्र को अन्याय से ग्रहण करनेवाला, अन्याय करनेवाला, झगड़ालू, युद्ध से भाग आनेवाला, गवाही को नहीं माननेवाला या उचित गवाही नहीं देनेवाला, पिता - माता सती स्त्री - मित्र इनके साथ द्रोह करने वाला, दूसरे के गुणों में भी दोषारोप करनेवाला, राजा के शत्रुओं की सेवा करनेवाला, मर्मान्तक पीढा पहुँचानेवाले वचनों को बोलनेवाला या कार्यों को करनेवाला, ठगनेवाला, आत्मीयों के साथ द्वेष करनेवाला, गुप्त व्यापार ( ब्लैक मार्केटिङ्ग - चोर बाजारी ) करनेवाला, वृषल ( किसी भी धर्म पर आघात पहुँचानेवाला ), ग्रामवासियों को पीड़ा पहुंचाने-बाला अर्थात् उनके कार्यों में बाधा पहुँचानेवाला, गृहस्थ होकर भी कुटुम्ब का भरण - पोषण न करके सदा तपस्या या विद्या पढ़नेवाला, तृण ( घास ), काष्ठ आदि लाकर आजीविका चलाने की सामर्थ्य रहने पर भी भिक्षावृत्ति से पेट पालनेवाला, कन्या को भी बेचने वाला, कुटुम्ब की आजीविका को घटाने. वाला, अधार्मिक ( अपने धर्म पर नहीं चलनेवाला ), चुगुली करनेवाला अथवा अधर्मं की सूचना देनेवाला ( पापबार्त्ता करनेवाला ), राजा के अनिष्ट की पर्वाह नहीं करनेवाला, ऐसे पुरुषों एवं कुलटा, पति पुत्र की हत्या करनेवाली, राजा और जो र चाहते हों गण दुष्ट हो ग को नहीं चाहिये । एक साथ अध राजा अध CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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बी ), धूर्त, ( खूनी ), न, वाणप्रस्थ, ( परखोका दि सरे से आपस लगानेवाला - झूठ बोलने करनेवाला, नहीं करने करने वाला बोलनेवाला, ठ का बना देनेवाला नाड़ी वैद्य ), रुधनेवाला, मी के साथ विष देने-न्यायालय में को अन्याय 7 आनेवाला, -माता - सती करनेवाला, वचनों को साथ द्वेष बाला, वृषल दा पहुंचाने-भी कुटुम्ब ( घास ), नावृत्ति से - को घटाने. चाला अथवा अनिष्ट की करने वाली, चतुर्थाध्याये सुहृदादिलक्षण प्रकरण न् १६६ होकर घूमनेवाली, वृद्धजनों से निन्दिता, गृह के कार्यों को छोड़ aa ( न करनेवाली ), नित्य दुष्ट आचरण करनेवाली, गुरुजनों के साथ देनेवाली करनेवाली, पतोहू या पतोहुओं के साथ अप्रिय व्यवहार करने-अप्रिय व्यवहार स्त्रियों को स्वभावतः दुष्ट जानकर राजा अपने राज्य से निकाल दे । वाली ऐसी द्वीपे निवासितव्यास्ते बद्धा दुर्गोदरेऽथवा ॥ १०८ ॥
मार्गसंस्करणे योग्याः कदन्न न्युन भोजनाः ।
तत्तज्जात्युक्तकर्माणि कारयीत च तैर्नृपः ॥ १०६ ॥
मार्ग संरक्षण योग्य का निर्देश - अथवा उक्त मद्यप आदि लोगों को टापू में ले जाकर रखना चाहिये किंवा किसी — किले के भीतर कैद करके रखना ' चाहिये और वहां पर उन सर्वो से राप्ता साफ कराना चाहिये एवं खराब अन्न तथा थोड़ी मात्रा में उन्हें भोजन देना चाहिये ॥ और उन सब से उनके जाति के अनुकूल कर्म राजा को कराना चाहिये ।
एवंविधानसाधूंश्च संसर्गेण च दूषितान् ।
दण्डयित्वा च सन्मार्गे शिक्षयेत्तान्नृपः सदा ॥ ११० ॥
संसर्ग से दूषित को दण्ड देकर सन्मार्ग की शिक्षा देने का निर्देश — और राजा सदा इस प्रकार से पूर्वोक्त दुष्ट पुरुषों को एवं उनके साथ संसर्ग करने से दुष्ट हुये पुरुषों को दण्ड देकर सम्मार्ग पर चलने की शिक्षा दे ।
राज्ञो राष्ट्रस्य विकृति तथा मन्त्रिगणस्य च ।
इच्छन्ति शत्रुसम्बन्धाद्ये तान् हन्याद्धि द्रानृपः ॥ १११ ॥
राजादिकों से विगाड़ करवानेवाले को शीघ्र नष्ट कर देने का निर्देश— और जो राजा राज्य या मन्त्री लोगों को शत्रु से मिलकर हानि पहुंचाना चाहते हों उन्हें राजा शीघ्र वध करने का दण्ड दे ।
छेच्च युगपदुद्धासं गणदौष्टये गणस्य च ।
एकैकं घातयेद्राजा वत्सोऽश्नाति यथा स्तनम् ॥। ११२ ॥
गणों की दुष्टता करने पर उपाय का निर्देश - यदि बहुत से गण ( समूह ) दुष्ट हो गये हों तो प्रत्येक गण का एक साथ ही नाश करने की इच्छा राजा को नहीं करनी चाहिये कि उनमें से एक - एक को कम से नष्ट करना । जैसे बछड़ा एक - एक करके क्रम से स्तनों को पीता है न कि चाहिये एक साथ ही ।
अधर्मशीलो नृपतिर्यदा तं भीषयेज्जनः ।
धर्मशीलातिबलवद्विपोराश्रयतः सदा ॥ ११३ ॥
अधर्मशील राजा को सदैव भय दिलाने को प्रजा के लिये निर्देश — जब राजा अधर्मं पर चलनेवाला हो जाय तो प्रजा ' धर्मशील, बलवान् उस राजा CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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२०० शुक्रनीति: के शत्रु का आश्रय लेने ' का भय उसे दिखा कर सदा डराना चाहिये अर्थात् यदि आप अधर्म पर चलना नहीं छोड़ेगे तो हम सब प्रजा आपका । का ), -साथ छोड़कर आपके शत्रु धर्मशील बलवान् से मिल जायँगे ऐसा कहकर उत्तम साहस उस राजा को डराना चाहिये ।
यावत्तु धर्मशीलः स्यात् स नृपस्तावदेव हि ।
अन्यथा नश्यते लोको द्राङ्नृपोऽपि विनश्यति ॥ ११४ ॥
अधर्मशील राजा और प्रजा के तत्काल नष्ट हो जाने का निर्देश - जय तक राजा धर्मशील बना रहता है अर्थात् प्रजा के साथ धर्मपूर्वक व्यवहार ` करता है तभी तक वह राजा बना रहता है । अन्यथा ( यदि ऐसा न हो तो ) राजा के अधर्मशील होने पर उसकी प्रजा एवं स्वयं राजा भी शीघ्र नष्ट हो जाता है अर्थात् उसका राज्य नष्ट हो जाता है ।
मातरं पितरं भार्या यः संत्यज्य विवर्तते ।
निगडैर्बन्धयित्वा तं योजयेन्मार्गसंस्कृतौ ॥ ११५ ॥
तद्भृत्यर्थं तु सन्दद्यात्तेभ्यो राजा प्रयत्नतः । माता आदि के भरण - पोषण स्याग करनेवाले के लिये दण्ड का निर्देश-जो कर्मचारी माता, पिता और स्त्री ( परनी ) इनका भरण - पोषण करना छोड़कर मनमाना अपना व्यवहार रखता है, उसे हथकड़ो - बेड़ी डालकर कैद रखना चाहिये एवं उससे रास्ता साफ करने या बनाने का कार्य कराना चाहिये । और उसके तनखाह का आधा द्रव्य उन सर्वो को प्रयत्नपूर्वक
राजा को देना चाहिये ।
विद्यात् पणसहस्रं तु दण्ड उत्तमसाहसः ॥ ११६ ॥
दशमाषमितं ताम्रं तत्पणो राजमुद्रितम् ।
वराटिसार्धशतक मूल्यः कार्षापणश्च सः ॥ ११७ ॥
उत्तमादि साहस दण्ड के लक्षण एवं पण आदि के लक्षण - १००० पर्णों ( पैसों ) का जुर्माना उमम साहस दण्ड कहलाता है । राज द्वारा स्वीकृत चिह्न से अंकित १० मासे भर तामे के सिक्के को ' पण ' ( पैसा ) कहते हैं । और १५० कौड़ियों के मूल्य के उसी ( पण ) को ' कार्षापण ' भी कहते हैं ।
तदर्धश्च तदर्धश्च मध्यमः प्रथमः क्रमात् ।
प्रथमे साहसे दण्डः प्रथमश्च क्रमात् परौ ॥ ११८ ॥
मध्यमे मध्यमो धार्यश्चोत्तमे तूत्तमो नृपैः । और क्रम से उसके ( १००० ) आधे ( ५०० ) पर्णों के जुर्माने को -मध्यम तथा उसके आधे ( २५० ) पर्णों के जुर्माने को प्रथम साहस दण्ड कहते हैं । प्रथम श्रेणी के साहसों ( अपराधों ) में प्रथम साहसदण्ड( २५० लिये राजा क इस प्र उदासीन तथ इस प्र कोश का वर्णन क कहते हैं वह राजा व उस धन से सुखप्रद यज्ञ के लिय तथा परलोक हुआ कोशर्स दुःखप्र अपने उपभ चाहिये क्य CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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चाहिये । जा आपका ऐसा कहकर १४ ॥ नर्देश - जब क व्यवहार न हो तो ) शीघ्र नष्ट चतुर्थाध्यांये कोशनिरूपण प्रकरणम् २०१ का, मध्यम साहसों में मध्यमसाहस दण्ड ( ५०० पण का ) एवं पण साहसों में उत्तम साहस दण्ड ( १००० पण का ) विधान अपराधियों के उत्तम राजा को देना चाहिये । लिये सोपायाः कथिता मिथे मित्रोदासीनशत्रवः ॥ ११६ ॥
इति शुक्रनीतौ चतुर्थाध्यायस्य सुहृदादिलक्षणप्रकरणम् । इस प्रकार से इस मिश्र अध्याय में सामादिक उपायों के साथ मित्र, उदासीन तथा शत्रु के विषय में कहा गया ।
इस प्रकार हिन्दीव्याख्या में चतुर्थाध्याय का सुहृदादिप्रकरण समाप्त ।
॥
- निर्देश -करना डालकर कार्य कराना यत्नपूर्वक ००० पण ना स्वीकृत कहते हैं । ते हैं । जुर्माने को साहसदण्ड ( २५० अथ चतुर्थाध्याये कोश निरूपणप्रकरणम्
अथ कोशप्रकरणं ब्रुवे मिश्र द्वितीयकम् ।
एकार्थसमुदायो यः स कोशः स्यात् पृथक् पृथक् ॥ १ ॥
कोश के लक्षण - अब ' मिश्र ' अध्याय के अन्तर्गत दूसरा ' कोशप्रकरण ' का वर्णन करता हूँ । किसी भी एक ( समान ) वस्तुओं के समूह को ' कोश ' कहते हैं वह पृथक् २ अनेक प्रकार का होता है ।
येन केन प्रकारेण धनं सचिनुयान्नृपः ।
तेन संरक्षयेदाष्ट्रं बलं यज्ञादिकाः क्रियाः ॥ २ ॥
राजा को जिस किसी भी प्रकार से धन एकत्र करना चाहिये । और उस धन से राष्ट्र ( राज्य ), सेना तथा यज्ञादि कर्मों की रक्षा करनी चाहिये ।
बलप्रजारक्षणार्थं यज्ञार्थ कोशसंग्रहः ।
परत्रेह च सुखदो नृपस्यान्यश्च दुःखदः ॥ ३ ॥
सुखप्रद कोश का निर्देश- - अतः सेना तथा प्रजा की रक्षा के लिये एवं यज्ञ के लिये जो कोश का संग्रह किया जाता है वह राजा तथा परलोक दोनों के लिये सुखप्रद होता है, इससे भिन्न हुआ कोशसंग्रह दुःखप्रद होता है । स्त्रीपुत्रार्थ कृतो यच स्त्रोपभोगाय केवलम् नरकायैव स ज्ञेयो न परत्र सुखप्रदः दुःखप्रद कोश का निर्देश - जो कोशसंग्रह स्त्री - पुत्र अपने उपयोग के लिये किया जाता है उसे केवल नरक चाहिये क्योंकि वह परलोक में सुखप्रद नहीं होता है । के लिये इस लोक कार्य के लिये किया
।
॥ 8 ॥
के लिये तथा केवल देनेवाला ही समझना CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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२०२ शुक्रनीतिः अन्यायेनार्जितो यस्माद् येन तत्पापभाक् च सः । सुपात्रतो गृहीतं यद्दत्तं वा वर्धते च यत् ॥ ५ ॥ विनाशक
अन्यायोपार्जित कोश के दुष्टफलों का निर्देश - जिसने अन्याय से प्रकार का है । उपार्जन किया है अतः वह उस ( अन्यायोपार्जन ) के पाप का फल भोगने- धन उचित वाला होता है और जो धन सुपात्र से लिया जाता है या सुपात्र को दिया जाता है वह धन बढ़ता है । आप स्वागमी सद्व्ययी पात्रमपात्रं विपरीतकम् । अपने ऊपर अपात्रस्य हरेत् सर्वं धनं राजा न दोषभाक् ॥ ६ ॥ उसके धन
सुपात्र तथा अपात्र के लक्षणादि का निर्देश — जो न्याय धन का अपनी आप उपार्जन करनेवाला तथा सरकार्य में व्यय करनेवाला होता है वह ' सुपान ' ( धनिक ) कहलाता है | इससे विपरीत अर्थात् अन्याय से धनोपार्जन तथा कुमार्ग में धन व्यय करनेवाला ' अपान ' कहलाता है अतः यदि अपात्र के सम्पूर्ण धन को हरण करनेवाला राजा हो तो दोषभागी नहीं होता है । प्रबल अधर्मशील नृपतेः सर्वतः संहरेद्धनम् । रक्षा न क छलादू बलाद्दस्युवृत्त्या पराराष्ट्राद्धरेत्तथा ॥ ७ ॥ क्योंकि प्र
अधर्मशील राजा के धन को हर लेने का निर्देश - राजा को अधर्मशील हो गये । राजा के पास से सभी प्रकारों से अर्थात् चाहे छल, बल या डाकुओं की वृत्ति ( डाका डालने ) से धन हरण करना चाहिये । तथा इसी तरह शत्रु के राज्य से भी धनहरण करना चाहिये । त्यक्त्वा नीतिग्बलं स्वीयप्रजापीडनतो धनम् । कोश सचितं येन तत्तस्य सरान्यं शत्रुसाद्भवेत् ॥ ८ ॥ चुंगी से प्र
शत्रु के अधीन राज्य होने के कारणों का निर्देश - जिसने नीति - बल का रक्षा भली परित्याग करके अर्थात् अन्याय से अपनी प्रजा को पीडा पहुँचाकर धन संचय की रक्षा क किया है उसका वह धन राज्य के साथ साथ शत्रु के अधीन हो जाता है ।
दण्डभूभागशुल्कानामाधिक्यात् कोशवर्धनम् ।
अनापदि न कुर्वीत तीर्थदेवकरग्रहात् ॥ ९ ॥
देवोत्तर संपत्ति पर कर लगाकर धन न बढ़ाने का निर्देश - विना विशेष प्रजा-आपत्ति पदे प्रजा के ऊपर अधिक जुना, मालगुजारी या चुंगी बढ़ाकर पूर्व कोश का तीर्थ स्थान तथा देवोत्तर संपत्ति पर कर लगाकर राजा को अपना कोश के द्वारा स ( खजाना ) नहीं बढ़ाना चाहिए । तथा राष्ट यदा शत्रुविनाशार्थ बलसंरक्षणोद्यतः । रक्षा करन विशिष्टदण्डशुल्कादि धनं लोकात्तदा हरेत् ॥ १० ॥ और अन्त
आपत्ति में अधिक कर बढ़ाने का निर्देश- जिस समय राजा शत्रु का CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by, eGangotri.
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॥ न्याय से धन फल भोगने-पात्र को दिया से धन का वह ' सुपान्न ' तथा कुमार्ग में पूर्ण घन को ॥ अधर्मशील डाकुओं की तरह शत्रु के ति - बल का धन संचय है । I विना विशेष बढ़ाकर एवं अपना कोश ॥ शत्रु का चतुर्थाध्याये कोशनिरूपण प्रकरणम् २०३ करने के लिये सेना की रक्षा करने में तत्पर हो उस समय विशेष विनाश का अधिक जुर्माना या चुंगी लगाकर प्रजा से धन का हरण करे तो प्रकार उचित है ।
धनिकेभ्यो भृतिं दत्त्वा स्वापत्तौ तद्धनं हरेत् ।
राजा स्वापत्समुत्तीर्णंस्तत् स्वं दद्यात् सवृद्धिकम् ॥ ११ ॥
आपत्तिरहित होने पर सूद सहित धन वापस करने का निर्देश — और अपने ऊपर आपत्ति आा पड़ने पर ' मैं खुद दूंगा ' ऐसी प्रतिज्ञा कर धनिकों से उसके धन को जबरदस्ती राजा को ले लेना चाहिये । तथा जब वह भाई हुई अपनी आपत्ति को पार कर जाय तब उस लिये हुये धन को सुदसहित उस ( धनिक ) को लौटा देना चाहिये ।
प्रजाऽन्यथा हीयते च राज्यं कोशो नृपस्तथा ।
हीनाः प्रबलदण्डेन सुरथाद्या नृपा यतः ॥ १२ ॥
प्रवल दण्ड से अनिष्ट फल - अन्यथा अर्थात् धनाभाव से सेना की रक्षा न कर सकने से प्रजा, राज्य, कोश तथा राजा क्षीण हो जाता है । क्योंकि प्रबल दंड के करने से सुरथ आदि राजा लोग दीन अर्थात् राज्यच्युतः हो गये ।
दण्डभूभागशुल्कैस्तु विना कोशाद् बलस्य च ।
संरक्षणं भवेत् सम्यग् यावद्विंशतिवत्सरम् ॥ १३ ॥।
तथा कोशस्तु संधाये: स्वप्रजारक्षणक्षमः । कोश संग्रह करने का प्रमाण - विना जुर्माना, मालगुजारी तथा चुंगी से प्राप्त धन के भी केवल राजा के कोश से ही २० वर्ष तक सेना की रक्षा भली भांति जितने से हो सकता है उतने कोश का तथा अपनी प्रजा
की रक्षा के लिये उपयुक्त संग्रह करना उचित है ।
बलमूलो भवेत् कोशः कोशमूलं बलं स्मृतम् ॥ १४ ॥
बलसंरक्षणात् कोशराष्ट्रवृद्धिररिक्षयः ।
जाथते तत्त्रयं स्वर्गः प्रजासंरक्षणेन वै । १५ ॥
प्रजा संरक्षण के फल —कोश का मूल सेना है अर्थात् सेना के द्वारा कोश का संग्रह होता है, और सेना का मूल कोश है अर्थात् कोश के द्वारा सेना का संग्रह होता है, और सेना तथा कोश की रक्षा करने से कोश तथा राष्ट्र ( राज्य ) की वृद्धि एवं शत्रुओं का नाश होता है और प्रजा की रक्षा करने से पूर्वोक्त कोश तथा राष्ट्र की वृद्धि एवं शत्रु नाश ये तीनों होते हैं और अन्त में स्वर्ग भी मिलता है । यज्ञार्थं द्रव्यमुत्पन्नं यज्ञः स्वर्गसुखायुषे । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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२०४ शुक्रनीति: अर्थभावो बलं कोशो राष्ट्रवृद्धयै त्रयं त्रिदम् ॥ १६ ॥
राष्ट्रवृद्धि के तीन कारण - यज्ञ के लिये द्रव्य ( धन ) उत्पन्न हुआ है • और यज्ञ स्वर्ग सुख एवं आयु की वृद्धि के लिये है, और शत्रु का अभाव सेना, कोश ये तीनों राष्ट्र की वृद्धि के लिये हैं ।,
तद्वृद्धिर्नीति नैपुण्यात् क्षमाशीलनृपस्य च ।
जायतेऽतो यतेतैव यावदबुद्धिबलोदयम् ॥ १७ ॥
नीति - निपुणता से कोशबुद्धि का यत्न करने का निर्देश- क्षमाशील राजा की नीतिसंबन्धी निपुणता से ही उपर्युक्त त्रिषयों की वृद्धि होती है अतः जितना बुद्धिबल हो उतना लगाकर वृद्धि के लिये प्रयत्न करना चाहिये ।
मालाकारस्य वृत्त्यैव स्वप्रजारक्षणेन च ।
शत्रुं हि करदीकृत्य तद्धनैः कोशवर्धनम् ॥ १८ ॥
करोति स नृपः श्रेष्ठो मध्यमो वैश्यवृत्तितः ।
अधम: सेवया दण्डतीर्थ देवकरम हैः ॥ १६ ॥
श्रेष्ठादिनृप के ३ लक्षण - जो माली की भांति व्यवहार रखकर अर्थात् अपने बाग के वृक्षों को खीच कर जैसे माली उसकी रक्षा करता है उसी भांति प्रजा की रक्षा करने के साथ - साथ शत्रु को कर ( मालगुजारी ) देनेवाला बना-कर उनके धनों से कोश को बढ़ाता है वह नृप श्रेष्ठ कहलाता है, जो वैश्य--वृत्ति व्यवसाय आदि से कोश बढ़ाता है वह मध्यम, एवंम् सेवा से तथा जुर्माना, तीर्थ स्थान तथा देवमन्दिरों पर कर लगाकर जो कोश बढ़ाता है वह अधम राजा कहलाता है ।
प्रजा हीनधना रक्ष्या भृत्या मध्यधनाः सदा ।
यथाधिकृत् प्रतिभुवोऽधिकद्रव्यास्तथोत्तमाः ॥
हीन धन तथा मध्यम धनवाली प्रजा की रक्षा वेतन -स्वामी की भांति करनी चाहिये । तथा अधिक धनवाली रक्षा जामिनदार होकर करनी चाहिये । घनिकाश्चोत्तमधना न हीना नाधिका नृपैः । क्योंकि उत्तम धनवाली धनिक प्रजा राजा से न हीन
अर्थात् राजतुल्य होती हैं ।
द्वादशाब्दप्रपूरं यद्धनं तन्नीचसंज्ञकम् ॥
पर्याप्तं षोडशाब्दानां मध्यमं तद्धनं स्मृतम् ।
त्रिंशदन्दप्रपूरं स्यात् कुटुम्बस्योत्तमं धनम् ॥
नीचादि धन के लक्षण — जो धन १२ वर्ष तक परिवार २० ॥ देकर राजा को उत्तम प्रजा की और न अधिक २१ ॥ २२ ॥ की रक्षा करने छायक होता है वह ' नीच ' संज्ञक, जो १६ वर्ष तक रक्षा करने योग्य होता है वह मध्य ' ' उत्तम ' संज्ञ अपने सबके पा व्यवस अर्थात् वस्त सारा मूलध हैं तथा स प्रजा विक्रय ) के सदा राजा लेता है तो राजा को ज धान्य-और राज्य पर्याप्त धान्य उससे भी उचित होत संग्रह हुआ, उज्ज्व ( स्वाद ) अच्छी तरह है । यदि इ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri