शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 291–300

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 291–300

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हुआ है का अभाव, 11 - क्षमाशील होती है अतः

हिये ।

कर अर्थात् उसी भांति वाला बना-जो वैश्य-से तथा है वह ॥ राजा को प्रजा की न अधिक रक्षा करने चय होता है चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २०५ ' मध्यम ' एवं जो ३० वर्ष तक परिवार की रक्षा करने योग्य होता है उत्तम ' वह ' संज्ञक धन होता है । क्रमादर्थ रक्षयेद्वा स्वापत्तौ नृप एषु वै । अपने ऊपर आपत्ति आने पर राजा नीचादि क्रम से अपने

सर्वो के पास रक्षार्थं रख दे ।

मूलैर्व्यवहरन्त्यर्थे वृद्धया वणिजः क्वचित् ॥

विक्रीणन्ति महार्घे तु हीनार्घे सञ्चयन्ति हि । वह धन को इन २३ ॥ व्यवसायी ( व्यापारी ) लोग मूल्यभूत मूल धन से ब्यापार करते हैं अर्थात्, वस्तुओं का खरीदना - बेचना रूप व्यापार करते हैं केवल सूद पर अपना सारा मूलधन नहीं लगाते हैं और वे महंगी होने पर खरीदी वस्तु को बेचते

हैं तथा सस्ती होने पर चस्तु खरीद कर संचय करते हैं ।

व्यवहारे धृतं वैश्यैस्तद्धनेन विना सदा ॥ २४ ॥

अन्यथा स्वप्रजातापो नृपं दहति सान्वयम् । प्रजा के सन्ताप से सवंश राजा के नाश का निर्देश — और व्यवहार ( क्रय-विक्रय ) के लिये रखी हुई वस्तुओं को धन ( मूल्य ) विना दिये वैश्यों से सदा राजा को जबर्दस्ती नहीं लेना चाहिये । यदि राजा बिना मूल्य दिये ले लेता है तो उससे उत्पन्न हुई प्रजा की सन्तापरूपी अग्नि वंश के सहित उस

राजा को जला देती है ।

धान्यानां संग्रहः कार्ये वत्सरत्रयपूर्तिदः ॥ २५ ॥

तत्तत्काले स्वराष्ट्रार्थं नृपेणात्महिताय च ।

चिरस्थायी समृद्धानामधिको वाऽपि चेष्यते ॥ २६ ॥

धान्य - संग्रह करने के प्रमाण का निर्देश- - राजा को अपने कल्याण के लिये. और राज्य की रक्षा के लिये समय - समय पर तीन वर्ष तक खाने के लिये पर्याप्त धान्यों का संग्रह कर लेना चाहिये । और ऐश्वर्यशाली लोगों के लिये ' उससे भी अधिक कालतक कार्य चलने लायक अधिक धान्य का संग्रह करना: -उचित होता है ।

सुपुष्टं कान्ति मज्जातिश्रेष्ठं शुष्कं नवीनकम् ।

ससुगन्धवर्णरसं धान्यं संवीक्ष्य रक्षयेत् ॥

सुसमृद्धं चिरस्थायी महार्घमपि नान्यथा । संग्रह योग्य धान्य आदि की परीक्षा का निर्देश अच्छी हुआ, उज्ज्वल, अच्छी जाति का, सूखा हुआ, नवीन, सुगम्ध, ( स्वाद ) से युक्त, सुम्दर एवं बहुत कालतक ठहरनेवाला, २७ ॥। तरह से पका वर्णं तथा र ऐसे धान्य को अच्छी तरह से देखकर यदि अधिक मूल्य का भी हो तो लेकर रखना उचित: है । यदि इससे अन्यथा हो तो उस धान्य का संग्रह नहीं करना चाहिये । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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शुक्रनीति: २०६ विषत्रह्निहिमव्याप्तं कीटजुष्टं न धारयेत् ॥ २८ ॥

निःसारतां न हि प्राप्तं व्यये तावन्नियोजयेत् । जो विष, अग्नि तथा पाला से खराब हो गया हो एवं जिसमें कोड़ा पड़ा स्वकार्य हो ऐसे धान्यों का संग्रह नहीं करना चाहिये और जब तक निःसार नहीं हो ( शिथिल तभी तक धान्यों का व्यय करना चाहिये अर्थात् निःसार होने पर उसे फेक कार्य म उस देना चाहिये । कार्य में जो व्ययीभूतं तु यद् दृष्ट्वा तत्तुल्यं तु नवोनकम् ॥ २ ९ ॥ उस गृह्णीयात सुप्रयत्नेन वत्सरे वत्सरे नृपः । समान राजा प्रति वर्षं जो धान्य व्यय करने से चुक जाय उनके स्थान पर उसी

जाति के दूसरे नये धान्य यत्नपूर्वक लाकर रख दे ।

ओषधीनां च धातूनां तृणकाष्ठादिकस्य च ॥ ३० ॥

यन्त्रशस्त्रास्त्राग्निचूर्णभाण्डादेर्वाससां तथा ।

यद्यच्च साधकं द्रव्यं यद्यत्कार्ये भवेत् सदा ॥ ३१ ॥

संग्रहस्तस्य तस्यापि कर्तव्यः कार्यसिद्धिदः । ओषधि आदि सब वस्तुओं को संचय करने का निर्देश - भोपधि ( धान्यादि ), धातु ( खान से उत्पन्न पदार्थ ), तृणकाष्ठ आदि, यन्त्र ( मशीन ), अस्त्र, शस्त्र, बारूद, वर्तन, वस्त्र इन सबों के मध्य में जिन २ कार्यों के लिये जो २ द्रव्य उपयोगी हों उनका संग्रह करना राजा के लिये उचित है क्योंकि

उनसे समय पर कार्य की सिद्धि होती है । 1

संरक्षयेत् प्रयत्नेन संगृहीतं धनादिकम् ॥ ३२ ॥

तु महद्दुःखं रक्षणे तच्चतुर्गुणम् । संगृहीत धन की यरन से रक्षा करने का निर्देश - संग्रह किये हुये धान्यादि की प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये । क्योंकि इनके संग्रह करने में बहुत दुःख उठाना पड़ता है और उससे चौगुना दुःख उनकी रक्षा पड़ता है । क्षणं चोपेक्षितं यत्तद्विनाशं द्राक् समाप्नुयात् क्षणभर भी रक्षा करने में जिसकी उपेक्षा की जाती है जाता है ।

आर्जकस्यैव दुःखं स्यात्तथाऽर्जितविनाशने ।

स्त्रीपुत्राणामपि तथा नान्येषां तु कथं भवेत् ॥

करने में उठाना ॥ ३३ ॥

वह शीघ्र नष्ट हो ३४ ॥ और अर्जित ( संग्रहीत ) वस्तु के नष्ट हो जाने पर उपार्जन ( संग्रह ) ' करनेवाले को ही दुःख होता है स्त्री - पुत्रादिकों को वैसा नहीं होता है फिर अन्य लोगों को क्यों दुःख होगा? संचय करना तो अ नहीं जानता उपार्जन कर मूर्ख के अधिकारों प है, जो अत्य हुये आलसी आततायी क मांगता है कृपण उसे दे देवे, मूर्खता को राजा वस्तुओं के CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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॥ कीड़ा पदा नहीं हो उसे फेक पर उसी ॥ || - ओपि ( मशीन ), के लिये है क्योंकि धान्यादि दुःख में उठाना ॥ नष्ट हो ( संग्रह ) फिर अन्य चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २०७

स्वकार्ये शिथिलो यः स्यात् किमन्ये न भवन्ति हि ।

जागरूकः स्वकार्य यस्तत्सहायाश्च तत्समाः ॥ ३५ ॥

स्वकार्य में सदा सजग रहने का निर्देश- जो अपने ही कार्य में स्वयं ( पूर्ण रूप से नहीं तत्पर रहता है तो उसके सहायक अन्य लोग शिथिल कार्य में क्यों नहीं शिथिल होंगे? अर्थात् अवश्य होंगे 1 । क्योंकि अपने उस कार्य में जो जागरूक ( दृढ़ तत्पर रहता है तो उसके सहायक भी उसी के उस कार्य में जागरूक रहते हैं । समान

यो जानात्यर्जितुं सम्यगर्जितं न हि रक्षितुम् ।

नातः परतरो मूर्खो वृथा तस्यार्जनश्रमः ३६ ॥

संचय की रक्षा न कर सकने पर मूर्खता होने का निर्देश – जो उपार्जन करना तो अच्छी तरह से जानता है किन्तु उसकी अच्छी तरह रक्षा करना नहीं जानता है । उससे बढ़कर मूर्ख कोई दूसरा नहीं है क्योंकि उसका उपार्जन करने का श्रम वृथा हो जाता है ।

एकस्मिन्नधिकारे तु यो द्वावधिकरोति सः ।

मूर्खो जीवदु - द्विभार्यश्च ह्यतिविस्रम्भवांस्तथा ॥ ३७ ॥

महाधनाशो रचलसः स्त्रीभिर्निर्जित एव हि ।

तथा यः साक्षितां पृच्छेचौर जाराततायिषु ॥ ३८ ॥

मूर्ख के लक्षण – जो एक अधिकार ( कार्यभार ) रहने हुये भी दो अधिकारों पर अधिकार रखता है, जो स्त्री के जीते रहते दूसरी शादी करता है, जो अत्यन्त दूसरे पर विश्वास रखता है, जो महान धन की आशा रखते हुये भालसी रहता है, जो स्त्री के अधीन रहता है, तथा जो चोर, परस्त्रीगामी, आततायी के विषय में साक्षी ( गवाही ) मानता है अथवा उनसे गवाह मांगता है वह मूर्ख है ।

संरक्षयेत् कृपणवत् काले दद्याद्विरक्तवत् ।

मूर्खत्वमन्यथा याति स्वधनव्ययतोऽपि च ॥

कृपण की भांति धन की रक्षा करे और समय आने पर उसे दे देवे, अन्यथा ( इससे विपरीत होने पर ) अपने धन मूर्खता को प्राप्त होता है ।

वस्तुयाथात्म्यविज्ञाने स्वयमेव यतेत् सदा ।

परीक्षकैः स्वयं राजा रत्नादीन् वीक्ष्य रक्षयेत् ॥

३६ ॥

विरक की भांति के व्यय करने पर ४० ॥ राजा को परीक्षकों से स्वयं रत्न की परीक्षा कराने का निर्देश- प्रत्येक वस्तुओं के यथार्थ स्वरूप जानने के लिये स्वयं सदा यम करना चाहिये । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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शुक्रनीति: २०८ राजा स्वयं परीक्षकों ( रत्नपारखियों ) के द्वारा परीक्षा करके रत्नों का अतः सम्पूर्ण संग्रह करे ॥ अत्यन्त श्री वज्रं मुक्ता प्रबालं च गोमेदश्चेन्द्रनीलकः ) वैदूर्यः पुष्परागश्च पाचिर्माणिक्यमेव च ॥ ४१ ॥ ( निकृष्ट

महारत्नानि चैतानि नव प्रोक्तानि सूरिभिः । पुखराज औ हीरा आदि नव महारत्नों का निर्देश - हीरा, मोती, मूंगा, गोमेद सर्पम ( लहसुनिया ), नीलम, वैदूर्य, पुखराज, पन्ना, लाल ( मानिक ), ये

महारत्न विद्वानों द्वारा कहे गये हैं ।

रवेः प्रियं रक्तवर्णमाणिक्यं त्विन्द्रगोपरुक् ॥ ४२ ॥

रक्तपीतसितश्यामच्छविर्मुक्ता प्रिया विधोः । श्रेष्ठ सपीतरक्तरुग्भौमप्रियं विद्रुममुत्तमम् ॥ ४३ ॥ एवं रेखा

मयूरचाषपत्राभा पाचिर्बुधहिता हरित् । रनष्ठ नवरत्नों के वर्ण और नवग्रहों का निर्देश वीरबहूटी कीड़े की भांति लाल रंग का माणिक ( लाल ) होता है जो सूर्य को प्रिय है । लाल, पीली, और श्वेत तथा श्याम वर्णं की कान्तिवाली मोती होती है जो चन्द्रमा को प्रिय है । कोई चिपट पीली तथा लालकान्ति से युक्त उत्तम मूंगा होता है जो मंगलग्रह को प्रिय श्वेत, रक्त, है । मयूर तथा चास पक्षी के पंख के समान कान्तिबाला पन्ना हरा रङ्ग का

होता है जो बुधग्रह को प्रिय होता है ।

स्वर्णच्छविः पुष्परागः पीतवर्णो गुरुप्रियः ॥ ४४ ॥

अत्यन्त विशदं वज्रं तारकाभं कवेः प्रियम् ।

हितः शनैरिन्द्रनीलो ह्यसितो घनमेघरुक् ॥ ४५ ॥

गोमेदः प्रियकृद्राहोरोषत्पीतारुणप्रभः 1 ओत्वया भश्चलत्तन्तु वैदूर्यः केतुप्रीतिकृत् ॥ ४६ ॥।

सोना के समान कान्तिवाला पीले वर्ण का पुखराज होता है जो गुरुग्रह को प्रिय होता है । अत्यन्त स्वच्छ तारा की भांति चमकनेवाला हीरा होता है जो शुक्रग्रह को प्रिय है । घने बादल के समान कान्तिवाला नीले रक्त का नीलम होता है जो शनिग्रह को प्रिय है । कुछ पीली तथा लाल कान्ति से युक्त लहसुनिया होता है जो राहु को प्रिय है । बिहार की आंखों के समान, जिसकी कान्ति हो तथा जो किरणों से युक्त हो उसे वैदूर्य कहते हैं । यह केतु को प्रिय है ।

रत्न श्रेष्ठतरं वज्रं नीचे गोमेदविद्रुमम् ।

गारुत्मतं च माणिक्यं मौक्तिकं श्रेष्ठमेव हि ॥ ४७ ॥

इन्द्रनीलं पुष्परागो वैदूर्य मध्यमं स्मृतम् । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri असत रहित जो वाला होत कहलाता ह कान्ति पुत्राि मोती और काही भेद स्त्री को क दिन तक १४

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11 लूंगा, गोमेद क ), ये ९ " - की भांति काल, पीली, को प्रिय है । इको प्रिय हरा रङ्ग का ॥ ॥ ॥ - जो गुरुमह रा होता है । ले रङ्ग का कान्तिसे के समान । यहं तु 11. चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् सम्पूर्ण रत्नों में वज्र ( हीरा ) रत्न की श्रेष्ठता का श्रेष्ठ हीरा होता है, और लहसुनिया तथा मूंगा अत्यन्त ) होते हैं । पना, मानिक तथा मोती रत्नों में ( पुखराज

निकृष्ट और वैदूर्य रत्नों में मध्यम हैं ।

रत्नश्रेष्ठो दुर्लभश्च महाद्युतिरहेर्मणिः ॥

२०६. निर्देश – रत्नों में रत्नों में नीच श्रेष्ठ हैं । नीलम, ४८ ॥ सर्पमणि रत्नों में श्रष्ठ, दुर्लभ एवं अत्यन्त उज्ज्वल कान्तिवाला होता है ।

अजालगर्भ सद्वर्ण रेखाबिन्दुविवर्जितम् ।

सत्कोणं सुप्रभं रत्नं श्रेष्ठं रत्नविदो विदुः ॥ ४६ ॥

श्रेष्ठ रनों के लक्षण - जिसके ' भीतर जाली न हो और वर्ण अच्छा हो एवं रेखा तथा बिन्दु से रहित, अच्छे कोणों से युक्त तथा अच्छी कान्तिबालर रएन श्र ेष्ठ होता है ' – ऐसा रत्नपारखी लोग कहते हैं ।

शर्कराभं दलाभं च चिपिटं वर्तुलं हि तत् ।

वर्णाः प्रभाः सिता रक्ताः पीतकृष्णास्तु रत्नजाः ॥ ५० ॥

और वह रत्न कोई बालू और कोई पत्तों के समान कान्ति का तथा कोई चिपटा या कोई गोल आकार का होता है । और रत्नों के वर्ण की कान्ति श्वेत, रक्त, पीत या कृष्ण होती है । 1

यथावर्णं यथाच्छायं रत्नं यद्दोषवर्जितम् ।

श्री पुष्टि कीर्तिशौर्यायुः करमन्यदसत् स्मृतम् ॥ ५१ ॥

असत् रत्न के लक्षण – अपने २ वर्णं तथा कान्ति से युक्त और दोषों से रहित जो रत्न होता है वह लक्ष्मी, पुष्टि, कीर्त्ति, शूरता तथा आयु को करने-वाला होता है इससे अन्य प्रकार का रत्न बुरा फल देनेवाला होने से बुरा-कहलाता है । वर्णमाक्रमते छाया प्रभा वर्णप्रकाशिनी ।

कान्ति वर्ण को उज्ज्वल करती है, और प्रभा उसे प्रकाशित करती है ।

पद्मरागस्तु माणिक्यभेदः कोकनदच्छविः ॥ ५२ ॥

न धारयेत् पुत्रकामा नारी वज्रं कदाचन ।

कालेन हीनं भवति मौक्तिकं विद्रुमं घृतम् ॥ ५३ ॥

पुत्रार्थिनी को वज्र धारण करने का निषेध तथा बहुत दिन धारण किये मोती और मूंगा के हीन होने का निर्देश - पद्मरागमणि माणिक्य ( मानिक ) का ही भेद है । यह रक्तकमल के समान कान्तियुक्त होता है । और पुत्रार्थिनी स्त्री को कभी भी हीरा धारण नहीं करना चाहिये । मूंगा और मोती बहुत दिन तक धारण करने पर ( खराब ) हो जाता है । गुरुत्वात् प्रभया वर्णाद्विस्तारादाश्रयादपि । १४ शु ० CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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२१० शुक्रनीतिः आकृत्या चाघिमूल्यं स्याद्रत्नं यद्दोषवजितम् दोष वर्जित रत्न के लक्षण - जो रस्न दोषरहित होता कान्ति, रङ्ग, आकार का विस्तार, उत्पत्तिस्थान तथा आकार के अधिक हो जाता है ।

नायसोल्लिख्यते रत्नं विना मौक्तिकविद्रुमात् ।

पाषाणेनापि च प्राय इति रत्नविदो विदुः ॥

॥ ५४ ॥

है उसका वजन, आधार पर मूल्य ५५ ॥ ' मूंगा और मोती को छोड़कर अन्य रत्नों पर लोहे और पत्थर से घिसने पर प्रायः लकीर नहीं पड़ती है ' ऐसा रत्न के पारखी लोग कहते हैं ।

मूल्याधिक्याय भवति यद्रत्नं लघु विस्तृतम् ।

गुर्वल्पं हीनमौल्याय स्याद्रत्नं त्वपि सद्गुणम् ॥ ५६ ॥

मूल्य अधिक और कम होने के कारण - जो रस्न दोष से रहित उत्तम होते हुये भी तौल में हल्के किन्तु आकार में बड़े हों तो वे अधिक मूल्य के होते हैं । और जो तौल में भारी किन्तु आकार में छोटे होते हैं वे मूल्य में -हीन होते हैं ।

शर्कराभं हीनमौल्यं चिपिटं मध्यमं स्मृतम् ।

दलाभं श्रेष्ठमूल्यं स्याद्यथाकामान्तु वर्तुलम् ॥ ५७ ॥

बालू के समान आकारवाला रत्न हीन मुल्य का होता है । चिपटा रत्न मध्यम मूल्य का और टुकड़ेवाला श्रेष्ठ मूल्य का होता है, और गोल रत्न लेने और बेचनेवाले की आवश्यकता के अनुसार कम या अधिक मूल्यवाले हो जाते हैं ।

नजरां यान्ति रत्नानि विद्रुमं मौक्तिकं बिना ।

राजद्वौष्टचाच्च रत्नानां मूल्यं हीनाधिकं भवेत् ॥ ५८ ॥

मूंगा और मोती को छोड़कर शेष रत्नों के ऊपर पुराना होने का दोष नहीं होता है । राजा की दुष्टता से रनों के मूल्य कम या अधिक हो जाते हैं ।

मत्स्याऽहि शङ्ख- वाराह - वेणु - जीमूत- शुक्तितः ।

जायते मौक्तिकं तेषु भूरि शुक्त्युद्भवं स्मृतम् ॥ ५६ ॥

मौक्तिक की उत्पत्ति के स्थानों का निर्देश - मछली, सर्प, शङ्ख, शूअर, बांस, मेघ तथा सीप से मोती उत्पन्न होती है, किन्तु अधिकतर सीप से ही -मोती निकलती है ।

कृष्णं सितं पीतरक्तं द्विचतुःसप्तकञ्चुकम् ।

त्रि - पच- सप्तावरण - मुत्तरोत्तरमुत्तमम् ॥ ६० ॥

मोती के रंग और भेद का निर्देश — मोती कृष्ण, श्वेत, पीतयुक्त रक्तवर्ण तथा क्रम २ कझुक ( परत ), ४ कबुक, ७ कक्षुकवाली. उत्तरोत्तर उत्तम -समझी जाती है । ' कृष्ण पीतवर्ण की कृत्रिम है अन्य मोत मोती के सम मोती की भलीभां निमक तथा पश्चात् प्रातः बाद यदि उ असली सम मध्यम आभ गोमेदव है । मोती गई है । रत्नों क की ३ रत्ती तौलने के ि CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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311 उसका चलन, र पर मूल्य 1 से घिसने 1 रहित उत्तम क मूल्य के मूल्य में ॥ चिपटा रहन गोल रन = मूल्यवाले ॥ होने का दोष हो जाते हैं । ङ्ख, शूअर, सीप से ही करवर्ण दोत्तर उत्तम चतुर्थाध्याये कोशनिरूपण प्रकरणम् २११

कृष्णं सितं क्रमाद् रक्तं पीतन्तु जरठं विदुः ।

कनिष्ठं मध्यमं श्रेष्ठं क्रमाच्छुक्त्युद्भवं विदुः ॥ ६१ ॥

' कृष्ण वर्ण की मोती कनिष्ठ, श्वेतवर्ण की मध्यम, रक्तवर्ण की श्रेष्ठ तथा की पुरानी होती है ' ऐसा सीप की मोती के विषय में समझना चाहिये ।

पीतवर्ण तदेव हि भवेद् वेध्यम वेध्यानीतराणि तु ।

कुर्वन्ति कृत्रिमं तद्वत्सिंहलद्वीपवासिनः ॥ ६२ ॥

कृत्रिम मोती के निर्माण का स्थान — सीप की मोती ही वेघी जा सकती है अम्प मोती नहीं वेधी जा सकती । सिंहल ( सीलोन ) मोती के समान नकली मोती बनाते हैं ।

तत्सन्देहविनाशार्थं मौक्तिकं सुपरीक्षयेत् ।

उणे सलवणस्नेहे जले निश्युषितं हि तत् ॥

ब्रीहिभिर्मर्दितं नेयाद्वैवर्ण्यं तदकृत्रिमम् ।

श्रेष्ठामं शुक्तिजं विद्यान्मध्याभं त्वितरद्विदुः ॥

मोती की परीक्षाविधि - निर्देश- - अतः सन्देह दूर करने की भलीभांति परीक्षा करनी चाहिये । परीक्षा विधि यह है देशवासी असली ६३ ॥ ६४ ॥ के लिये मोती कि गर्म जल में निमक तथा तेल मिलाकर उसी में मोती को डालकर रातभर पड़ा रहने दे । पश्चात् प्रातः मोती को निकाल कर धानों के बीच रख कर खूब रगड़े, इसके बाद यदि उसका रंग बदल जाय तो मोती को नकली यदि न बदले तो असली समझना चाहिये । उत्तम आभा ( कान्ति ) की मोती असलो और मध्यम आभा की नकली समझी जाती है ।

तुला कल्पितमूल्यं स्याद्रत्नं गोमेदकं विना ।

क्षुमाविंशतिभी रक्ती रत्नानां मौक्तिकं विना ॥ ६५ ॥

गोमेदक रश्न को छोड़ कर शेष रहनों का मूल्य तौल के अनुसार होता है । मोती को छोडकर शेष रत्नों के लिये एक रत्ती २० अलसियों की मानी गई है ।

रक्तित्रयं तु मुक्तायाश्चतुः कृष्णलकैर्भवेत् ।

चतुर्विंशतिभिस्ताभी रत्नटङ्कस्तु रक्तिभिः ॥ ६६ ॥

श्वतुर्भिस्तोलः स्यात् स्वर्णविद्रुमयोः सदा । रत्नों का तुलामान निर्देश –मोती के लिये ४ कृष्णलों ( तौल विशेष ) की ३ रत्ती, २४ रक्षियों का रख्नों के लिये १ टङ्क होता है । स्वर्ण तथा मूंगा सौलने के लिये ४ टों का १ तोला होता है ।एकस्यैव हि बञ्ज्रस्य त्वेकरक्तिमितस्य च ॥ ६७ ॥

सुबिस्तृतदलस्यैव मूल्यं पञ्चसुवर्णकम् । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 298

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२१२ शुक्रनीति: वज्र का मूल्य- विचार - यदि एक ही हीरा विस्तृत दलवाला तथा १ रती घटाक तौल का हो तो उसका मूल्य ५ सुवर्ण ( १० माशे तौल

अशर्फी ) होता है ।

रक्तिका दलविस्ताराच्छ्रेष्ठं पञ्चगुणं यदि ॥

यथा यथा भवेन्न्यूनं हीनमौल्यं तथा तथा । जैसे २ रत्ती की संख्या एवं दल का विस्तार अधिक २ हीरे की श्रेष्ठता बढ़ती है, और प्रति रत्ती के अनुसार पंचगुना अधिक होता जायगा । और जैसे २ रती तथा

न्यूनता होगी वैसे २ मूल्य में कमी होगी ।

अत्राष्टरक्तिको माषो दशमाषैः सुवर्णकः ॥

स्वर्णस्य तत् पञ्चमूल्यं राजताशीतिकर्षकम् । रत्न के तौलने में १ माशा ८ रती का होता है । १० होता है । ५ सुवर्णों का मूल्य ८० चांदी के कर्षं ( १ रुपये यथा गुरुतरं वष्त्रं तन्मूल्यं रक्तिवर्गतः ॥ तृयीयांशविहीनं तु चिपिटस्य प्रकीर्तितम् । की १ स्वर्ण मूल्य मुद्रा सैकड़े ५० ६८ ॥ रनों पर होता जागा वैसे पूर्वोक मूल्य से दल के विस्तार में माणिक ६६ ॥ हों तो उन उनका १ स माशे का १ सुवर्ण मूल्य बढ़ता

) भर होते हैं ।

७० ॥

१ रती होता है । हीरा चाहे जितना भारी हो किन्तु उसका मूल्य उसके रत्ती - समूह के हो मूल्य का

अनुसार ही होगा, चिपटे हीरे का मूल्य तृतीयांश कम होता है ।

अर्धं तु शर्कराभस्य चोत्तमं मूल्यमीरितम् ॥

रक्तिकायाश्च द्वे व तदर्धं मूल्यमर्हतः । उत्तम हीरे के मूल्य से आधा मूल्य शर्करा ( चालु ) के का होता है । २ हीरे यदि १ रत्ती के हों तो दोनों का मूल्य

आधा होता है ।

द बहवोऽर्हन्ति मध्य होना यथा गुणैः ॥

उत्तमार्धं तदर्ध हीरका गुणहीनतः । यदि गुणों के अनुसार मध्यम और हीन बहुत से हीरे १ हों तो उसके मूल्य उस से भी आधे हो जायेंगे । इसी प्रकार ७१ ॥ १ तोल होता है । आकारवाले हीरे उत्तम हीरे का गोमेद कम मूल्य क ७२ ॥। रत्ती के बराबर से हीरों के गुण अत्यन्त की हीनता के अनुसार उसके मूल्य के आधे या उससे भी आधे होते हैं । मुद्र रनों क शतादूर्ध्वं रक्तिवर्गासेद् विंशतिरक्तिकाः ॥ ७३ ॥ उनका मूल्य

प्रतिशतात्तु वज्रस्य सुविस्तृतदलस्य च | शाली रनों तथैव चिपिटस्यापि विस्तृतस्य च ह्रासयेत् ॥ ७४ ॥

शर्कराभस्य पञ्चाशच्चत्वारिंशच्च वैकतः ।. जो हीरा सुविस्तृत दलवाला या चिपटा होते हये भी विस्तृत दलवाला हो और यदि १०० रत्ती से ऊपर तौलवाला हो तो प्रति सैकड़े २० रती का मोतिय CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 299

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तथा १ रसी स्वर्ण मुद्रा 11 - जायगा वैसे कि मूल्य से के विस्तार में का १ सुवर्ण होते हैं । बत्ती - समूह के " बारवाले हीरे म हीरे का के बराबर रों के गुण

हैं ।

३ ॥

I न दलवाला • रती का चतुर्थाध्याये कोशनिरूपण प्रकरणम् २१३ घटाकर उसका मूल्य होगा । और शर्करा के समान हीरों के लिये प्रति

मूल्य या ४० रत्ती का मूल्य घटाकर मूल्य होगा ।

सेकडे ५० रत्नं न धारयेत् कृष्णं रक्तबिन्दुयुतं सदा ॥ ७५ ॥

काले और रक्त विन्दुबाले रश्न के न धारण का निर्देश— और कृष्ण वर्ण के रत्नों पर यदि लाल रंग के बिन्दु हों तो उन्हें नहीं धारण करना चाहिये ।

गारुत्मतं तूत्तमं चेन्माणिक्यं मूल्यमर्हतः ।

सुवर्ण रक्तिमात्रं चेद् यथा रक्तिस्ततो गुरुः ॥ ७६ ॥

माणिक्यादिकों का मूल्य- विचार - यदि पन्ना और माणिक्य दोनों उत्तम ड्ड तो उन दोनों के मूल्य समान होंगे अतः वे १ रती के तौल केहो तो उनका १ सुबर्ण ( १० माशे सोना ) मूल्य होता है । और रत्ती के अनुसार मूल्य बढ़ता है । रक्तिमात्रः पुष्परागो नीलः स्वणार्धमर्हतः चलत्रिसूत्रो वैडूर्यवोत्तमं मूल्यमर्हति ॥ ७७ ॥

१ रत्ती का पुखराज या नीलम का मूल्य आधा सुवर्ण होता है । और जिसमें चलते हुये ३ सूत्र दिखाई पड़े ऐसा मूल्य का होता है । प्रबालं तोलकमितं स्वर्णार्थं मूल्यमर्हति । १ तोले भर तौल के मूंगे का मूल्य भधा सुवर्ण होता है । अत्यल्पमूल्यो गोमेदो नोन्मानं तु यतोऽर्हति ( ५ माशे सोना ) वैदूर्यमणि उत्तम ( ५ माशे सोना ) ॥ ७८ ॥

गोमेद के उन्मान के योग्य न होने का निर्देश - गोमेद मणि अत्यन्त कम मूल्य का होता है । अतः उसका मूल्य तौल के ऊपर नहीं होता है ।

संख्यातः स्वल्परत्नानां मूल्यं स्याद्धीरकाद्विना ।

अत्यन्तरमणीयानां दुर्लभानां च कामतः ॥ ७६ ॥

भवेन्मूल्यं मानेन तथातिगुणशालिनाम् । अत्यन्त गुण बालों का मान से मूल्य न होने का निर्देश - हीरे को छोड़कर उद ' रनों का मूल्य संख्या से होता है । जो अध्यन्त सुन्दर तथा दुर्लभ हो उनका मूल्य आवश्यकतानुसार कम या अधिक होता है I । और अत्यन्त गुण-शाली रत्नों का मूल्य तौल के अनुसार नहीं होता है । व्यङ्घ्रिश्चतुर्दशहतो वर्गो मौक्तिकरक्तिजः ॥ ८० ॥

चतुर्विंशतिभिर्भक्तो लब्धान्मूल्यं प्रकल्पेत् ।

उत्तमं तु सुवर्णार्धमूनमूनं यथागुणम् ॥ ८१ ॥

मोतियों की मूल्य- कल्पना - मोती तौल में जितनी रत्तियों का हो, CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 300 का मूल पृष्ठ
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शुक्रनीति: २१४ उनकी संख्या को परस्पर गुणा करके वर्ग निकाल ले अर्थात् यदि ४ है. तो पूर्व - पूर्व की ही से गुणा करके १६ वर्ग हुआ, इसे चौथाई से हीन करने पर १२ हुआ पुनः. तथा १४ से गुणा करने पर १६८ हुआ, इसको २४ से भाग देने पर रूचि ८ इ ' पीतल ' बन इससे मूल्य की कल्पना करे । उत्तम मुक्ता का मूल्य आधा सुवर्ण होता है उसके बाद गुणानुसार मध्यम तथा अधम होने से उत्तरोत्तर कम होता. स्वर्णा जाता है । मुक्ताया रक्तिवर्गस्य प्रतिरक्तौ कला नव । कल्पयेत्पञ्चभागान् हि त्रिशद्भिः प्राग्भजेच्च तान् ।

लब्धं कलासु संयोज्य कलाः षोडशभिर्भजेत् ।

मूल्यं तलब्धितो योज्यं मुक्ताया वा यथागुणम् ॥ ८३

मोती की रत्तियों के वर्ग में प्रत्येक रत्ती को नौ २ कला समझनी फिर उन रत्तियों को पचगुना करके ३० से भाग दे । और जो लब्धि किन्तु अन्य सोने के स ८२ ॥ ॥ जब द चाहिये । खींचकर हो ही कलाओं में जोड़ दे । फिर १६ का भाग दे, जो लब्धि हो उससे मोती का बराबर मूल्य समझना चाहिये | अथवा गुणानुसार मोती का मूल्य निश्चित करना चाहिये । धातुभ रक्तं पीतं वर्तुलं चेन्मौक्तिकं चोत्तमं सितम् । मल्य अध्य अधमं चिपिटं शर्कराभमन्यत्तु मध्यमम् ॥ ८४ ॥ होता है ।

मोती के भेद और लक्षण - लाल, पीला और श्वेत रंग की गोल मोती. उत्तम होती है । और जो चिपटी तथा शर्करा के समान होती है वह अधम और इससे अन्य मोती मध्यम कहलाती है ।

रहने स्वाभाविका दोषाः सन्ति धातुषु कृत्रिमाः ।

अतो घातून् सम्परीक्ष्य तन्मूल्यं कल्पयेद् बुधः ॥ ८५ ॥

प्रायः रत्नों में स्वाभाविक ( स्वयम् ) दोष उत्पन्न होते हैं । किन्तु धातुओं में गुना अधि ( स्वर्णादि में ) मिलाने से कृत्रिम दोष होते हैं । अतः धातुओं की भलीभांति क्रम से ता परीक्षा करके बुद्धिमान को उनके मूल्य की कल्पना करनी चाहिये । विशिष्ट रूप

सुवर्ण रजतं ताम्रं वङ्गं सीसं च रङ्गकम् । गया है ।

लोहं च धातवः सप्त ह्येषामन्ये तु संकराः ॥ ८६ ॥

सुवर्णादि सात धातुओं का निर्देश- सोना, चांदी, तामा, बंग, सीसा, रांगा, लोहा ये ७ शुद्ध धातुयें हैं, इनसे अन्य धातुयें इन सबों के मेल से बनती हैं अतः वे संकर ( मिलावटी ) धातु कहलाती हैं । यथापूर्वं तु श्रेष्ठं स्यात्स्वर्ण श्रेष्ठतरं मतम् | नहीं पहुँच वङ्गताम्रभवं कांस्यं पित्तलं ताम्ररङ्गजम् ॥ ८७ ॥ चाहे वह

सुवर्णादि 19 • धातुओं के तरतम भाव - उक्त ७ धातुओं में अन्तिम लौह से CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri