शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 41–50
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 41–50
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हम -व्याधि कहना ऊपर दन्तको ( ३६ ) ( अध्याय - ५ ), उद्योग - पर्व ( अध्याय ३३-३४ ), शान्ति पर्व ( अध्याय – १- १३० ), आश्रम चासिक - पर्व ( अध्याय - ५-७ ) तथा रामायण के अयोध्या काण्ड के १५, ६७ तथा १०० अध्याय भी बहुत ही उपादेय हैं । नीति - कारों में शुक्राचार्य का स्थान भारतीय नीति - शास्त्र के इतिहास में शुक्राचार्य का नाम बहुत ही सम्मान कथञ्चित् के साथ लिया जाता है । शुक्राचार्य के पर्याय शब्द उशना, काव्य, भार्गव जनीति निवद्ध सूची को का रूप - तथा स्पत्य-स्पत्य-दशम सिद्ध जिसका १७ वीं शिका ', दमीधर नाकर ', ' राज-प्रमुख - पुराण र्कण्डेय--शेषतः तक ), - भापर्व ७ ) आदि हैं । महाभारत में ' उशना ' के रूप में शुक्राचार्य की नीतियों का अनेकशः ' उल्लेख मिलता है । इसके अतिरिक्त ' भार्गव, ' ' काव्य ' ३ आदि शब्द से भी शुकाचार्य का संकेत किया गया है । शुक्राचार्य के द्वारा किए गए ब्राह्म - नीति - शास्त्र के संक्षिप्त रूप के निर्देश के प्रसंग में महाभारत ने इन्हें ' अमितप्रज्ञ " " महायशाः ' आदि उपाधियों से विभूषित किया है । अन्यान्य प्राचीन ग्रन्थों में भी " शुक्राचार्य की नीति की अत्यन्त प्रशंसा की गई है । कौटिल्य के अर्थ - शास्त्र में औशनस - सम्प्रदाय का उल्लेख किया गया है जिसका संकेत पहले किया जा चुका है । विज्ञानेश्वर ने भी औशनस अर्थ - शास्त्र का इस रूप में उल्लेख किया है जिससे यह प्रतीत होता है कि उनकी दृष्टि में अर्थ - शास्त्रों में औशनस अर्थ - शास्त्र ही मूर्धन्य था । महाभारत में जब भीष्म की विद्या प्राप्ति का वर्णन किया गया है तो वहाँ केवल उशना तथा बृहस्पति के नीति - शास्त्रों का ही उल्लेख है और उनमें भी प्राथम्य दिया गया है उशना को । हेमाद्रि के ' चतुर्वर्ग चिन्तामणि ' के ' दानखण्ड " में उद्घृत एक श्लोक में यह बतलाया गया है कि स्वायम्भुव शास्त्र के चार संस्करण किए गए थे औ १. शा ० प ० ५६।२ ९, ३० ५७/३ आदि । २. शा ० प ० ५६।४० आदि । ३. वही ५७१२ आदि ।
४. अध्यायानां सहस्रेण काव्यः संक्षेपमब्रवीत् ।
तच्छास्त्रममित - प्रज्ञो योगाचार्यो महायशाः ॥ शा ० पर्व ५ ९ ।८५ ॥
५. इसके विवरण के लिए महामहोपाध्याय काणे महाशय का बम्बई
विश्व - विद्यालय के जॉर्नल - पुस्तक - ११, भाग -२, ( १ ९ ४२ ) अवलोकनीय है ।
६. औशनसाद्यर्थ- शास्त्रस्य – मिताक्षरा - या ० स्मृ ० २।२१ ॥
७. उशना वेद यच्छास्त्रं यच्च देव गुरुर्द्विजः ॥ शान्ति ' पर्व ३७।१० ॥
८. भार्गवीया नारदीया बार्हस्पत्यङ्गिरस्यपि ।
स्वायम्भुवस्य शास्त्रस्य चतस्रः संहिता मताः ॥
• चतुर्वर्ग - चिन्तामणि- दान खण्ड - पृ ० ५२८ ॥
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( ४० ) इनमें भी सर्वप्रथम संस्कारक थे ' भार्गव ' ( शुक्र ) । शुक्र - नीति - सार में तो यहाँ तक कहा गया है कि शुक्र की नीति को छोड़ कर अन्य सभी नीतियाँ कुनीतियाँ हैं । महाकवि ' दण्डी ने भी अपने दश कुमार - चरित में राजनीति-शास्त्र - कारों की नामावली में सर्व प्रथम स्थान शुक्राचार्य को ही दिया है । महाकवि अश्वघोष ने भी अपने ' बुद्ध चरित ' में शुक्र तथा बृहस्पति का बड़े सम्मान के साथ राज - शास्त्र के निर्माताओं के रूप में उल्लेख किया है । हमारे महाकवि कालिदास ने भी यह बतलाया है कि मनुष्य में व्यवहार कुशलता या नीति- कुशलता का चरमोत्कर्ष शुक्र की नीति के अनुसरण से ही हो सकता है, अन्यथा नहीं । उपर्युक्त विवरण से यह सिद्ध है कि नीति - शास्त्र - कारों में शुक्राचार्य का स्थान बहुत ही महत्त्वपूर्ण है । शुक्राचार्य के ग्रन्थ ऊपर यह बतलाया जा चुका है कि शुक्राचार्य ( उशना ) का एक राजनीति - शास्त्र पर प्रमुख - ग्रन्थ रहा और विज्ञानेश्वर तथा कौटिल्य के आधार पर औशनस अर्थ - शास्त्र की भी सत्ता असन्दिग्ध है । जैसा प्रारम्भ में बतलाया चुका है कि अर्थशास्त्र तथा राज - नीति - शास्त्र समानार्थक शब्द हैं, अतः महाभारत में उल्लिखित राज - नीति - शास्त्र तथा विज्ञानेश्वर आदि के द्वारा निर्दिष्ट अर्थ - शास्त्र एक ही ग्रन्थ सम्भावित है । मनु के सुप्रसिद्ध मीमांसक भाष्यकार मेधातिथि ने औशनसी राज - नीति के दो श्लोक भी उद्धृत किए हैं । महाभारत में तथा अन्यान्य ग्रन्थों में भी इस ग्रन्थ के उद्धरण का संकेत भी पहले किया जा चुका है ।
१. न कवेः सदृशी नीतिस्त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
काव्वैव नीतिरन्या तु कुनीतिव्र्व्यवहारिणाम ॥ शु ० नी ० सा०४।१२४३-४ ॥
२. येऽपि मन्त्र - कर्कशाः शास्त्र - तन्त्रकाराः शुक्राङ्गिरस - विलाशाक्ष - बहुदन्ती-पुत्र - पराशर - प्रभृतयः । द ० कु ० च ०, उ ० पी ० ८ ॥
३. यद्राज - शास्त्रं भृगुरङ्गिरा च न चक्रतुर्वंशकरावृषी तो ।
तयोः सुतौ तौ च ससजंतुस्तत्कालेन शुक्रवच बृहस्पतिश्च ॥
बुद्ध - चरित १४६ ॥
४. अध्यापितस्योशनसाऽपि नीतिं प्रयुक्त - राग- प्रणिधिद्विर्षस्ते ।
कस्यार्थ - धर्माविह पीडयामि सिन्धोस्तटाबोध इव प्रवृद्धः ॥
१. ५. मनुस्मृति - ७११५ तथा ८।५० पर भाष्य । कुमार - सम्भव - ३२४६ ॥
इसके चौखम्बा वि प्रकाशित य उशना जिससे यह मिताक्षरा ' पद्यात्मक भ कालेज संग्र आनन्दाश्रम काणे महा उशना एक अधिगम क ( क ) इस प्रस्तुत है कि शुक्रा से भी हो अनेक संक तोक्त ' नीति २२००५ कुल २४५४ हजार अध्य
श्लोक हों
शुक्राचार्य न लोकानुग्रहा परन्तु गुप्तसाम्राज्य शुक्राचार्य व १. मि ३. हि ४. श CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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( ४१ ) तो इसके अतिरिक्त स्मृति - कारों की प्रायः सभी सूचियाँ, जिनका उल्लेख हमने तियाँ चौखम्बा विद्याभवन से ( ' काशी संस्कृत - ग्रन्थ - माला - १७८ ' ) १ ९ ६७ ई ० में नीति-प्रकाशित याज्ञवल्क्य स्मृति की ' प्रस्तावना ' के ९ -१२ पृष्ठों पर किया है, है । उशना को धर्म - शास्त्र - प्रवर्त्तक या स्मृति - कार के रूप में उल्लिखित करती हैं, का बड़े जिससे यह प्रतीत होता है कि उशना की कोई स्मृति भी अवश्य ही रही । मिताक्षरा ' तथा मन्वर्थमुक्तावली आदि में भी उशना के गद्यात्मक ( यत्र तत्र शलता पद्यात्मक भी ) वचन उपलब्ध होते हैं । दो औशनस धर्मशास्त्र ( डेकन सकता कालेज संग्रह ) तथा एक और औसनस धर्मशास्त्र ( जीवानन्द संग्रह तथा आनन्दाश्रम संग्रह ) एवम् एक औशनस स्मृति का उल्लेख महामहोपाध्याय का काणे ' महाशय ने किया है । परन्तु यह निर्णय करना कठिन है कि ये सभी उशना एक ही हैं या भिन्न - भिन्न व्यक्ति । इस विषय में किसी निर्णय का अधिगम कठोर अनुसन्धान के बाद ही कथञ्चित् सम्भावित है । शुक्रनीति एक धार ( क ) इसके रचयिता लाया प्रस्तुत शुक्र नीति के रचयिता के विषय में परम्परागत मत तो यही अतः है कि शुक्राचार्य की ही यह रचना है । इस परम्परा का समर्थन शुक्र नीति द्वारा से भी होता है । परन्तु इतना तो निश्चित है कि महाभारत में सक अनेकत्र संकेतित शुक्र - कृत नीति - शास्त्र से यह भिन्न ही है, क्योंकि महाभार-किए तोक्त ' नीति - शास्त्र ' में १००० अध्याय थे और इस ' शुक्र नीति ' में केवल संकेत २२००५ श्लोक मौलिक और इधर - उधर के सभी श्लोकों को मिला कर कुल २४५४ श्लोक हैं । यह कथमपि सुसंगत नहीं हो सकता है कि एक ४ ॥ न्ती-हजार अध्यायों में विभक्त किसी ग्रन्थ में केवल २२००
श्लोक हों । हाँ, इस परम्परा के अनुसार यह कहा
शुक्राचार्य ने ही अपने एक हजार अध्यायों में विभक्त लोकानुग्रहार्थं इतने छोटे आकार में प्रस्तुत किया है । परन्तु आधुनिक विवेचकों की दृष्टि में प्रस्तुत
श्लोक या २४५४
जा सकता है कि ग्रन्थ - रत्न को पुनः शुक्र - नीति, जिसमें गुप्तसाम्राज्य से उत्तर - वर्त्ती तथा हर्षवर्धन से पूर्ववर्ती स्थिति स्पष्ट है, उस -शुक्राचार्य की रचना नहीं हो सकती है । इसके रचयिता के विषय में साधारणतः ६ ॥
१. मिताक्षरा ३।३६० । २. मन्वर्थमुक्तावली १०॥४ ९ ॥
३. हिस्ट्री ऑफ धर्म - शास्त्र- भाग १, अधिकरण -१७ ॥
४६ ॥ ४. शु ० नी ० सा ० ४।१२४१-४४ ॥ ५. वही ४।१२४२ ॥
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( ४२ ) दो मत प्रचलित हैं- ( १ ) किसी अन्य व्यक्ति ने इसकी रचना कर इ प्रतिष्ठित करने की भावना से शुक्राचार्य के नाम से इसे सम्बद्ध कर दिया है, अथवा ( २ ) किसी अन्य शुक्र नाम के विद्वान् की रचना है । इस आधुनिक परम्परा के समर्थन में यह कहा जा सकता है कि कौटिल्य द के द्वारा उल्लिखित औशनस सिद्धान्त इस ' शुक्र नीति ' में. प्रायेण अनुपलब्ध हैं । ( ख ) शुक्र नीति का रचना - काल शुक्र - नीति में वर्णित, जाति - व्यवस्था, आचार - विचार तथा वैवाहिक-सम्बन्ध की स्थिति से मूत्ति - कला तथा भवन निर्माण कला के विशद विवरण से और ' कुल ', ' श्रेणी ', ' गण ' आदि कुछ विशिष्ट संस्थाओं ( जिनका अस्तित्व हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद इतिहास के साच्य के आधार पर नहीं सा माना जाता है ) के निर्देश से यह स्पष्टं परिलक्षित होता है कि यह ग्रन्थ गुप्त - काल में या उसके कुछ ही बाद की रचना है । परन्तु डा ० अल्तेकर का कथन है कि इसकी रचना ईसा के अष्टम शतक के अन्तिम भाग में हुई है जब कुछ लोग इसे सोहलवीं शताब्दी की रचना मानने के पक्ष में हैं । इन मतों में अल्तेकर साहब का मत बहुत ही उपादेय है । अन्ततः इतना प्रतीत होता है कि कुछ परिकार भी अर्वाचीन समय में इसका अवश्य ही हुआ है । ( ग ) शुक्र नीति के विषय का संक्षिप्त विवरण अब हमें शुक्र नीति के प्रधान - विषयों का संक्षिप्त रूप देखना चाहिए । जैसा पहले वतलाया जा चुका है राजा का धर्म है सम्मार्ग - प्रापण । दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि अपने - अपने धर्म में धर्म - च्युत को व्यवस्थित करना ही राजा का मुख्य धर्म है । इसलिए यह आवश्यक है कि नीति - शास्त्र के ग्रन्थों में वर्ण - धर्म और वर्णाश्रम धर्म आदि षड्विध स्मार्त्त - धर्मों का निरूपण किया जाय, क्योंकि किसी भी व्यक्ति या जाति के उचित धर्म के परिज्ञान के विना उसे उचित धर्म पर ले जाना असम्भव है । अतएव शुक्र - नीनि भी वर्ण - धर्म आदि का निरूपण किया गया है । इस में ' के व्यवस्थापन वर्ण - धर्मादि में उत्पथ जन के लिए राजा को दण्ड प्रयोग की और उसके साधन के रूप में सैन्य आदि सात राज्याङ्गों की आवश्यकता होती है । अतः शुक्र - नीति भी इन विषयों का यथावत् प्रतिपादन किया में
गया है ।
१. शु ० नी ० सा ० ४।२४ ९ -३७६ ॥
कुछ म ( क ) राज मनु य लोकपाल ' इसका दैवी ( ख ) राज शु ० न औचित्य का अवलम्बन राजा को प वर्गीकरण न ( ग ) राज शु ० दुष्ट - दमन इनके अति अन्य राजा प्रमुख क ( घ ) उत्त उत्तरा ज्येष्ठ और स स्थान पर क चाहिए । प होने पर या अतः यह प्र अभाव में भगिनी - पुत्र १. ३. ५. ७. CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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( ४३ ) इसे कुछ मुख्य विपयों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है: -कर दिया ( क ) राज्योत्पत्ति: -इस आदि मनु याज्ञवल्क्य आदि के समान ही शुक्रनीति में भी राजा को आठ लोकपाल की समष्टि मानी गई है और इस प्रकार राज्योत्पत्ति के विषय में प्रायेण इसका दैवी सिद्धान्त ( Divine Right ) प्रतीत होता है । ( ख ) राजा: -शु ० नी ० के अनुसार राजा के दो रूप हैं ' देवांश ' तथा ' राक्षसांश ' । वाहिक- औचित्य का ही अवलम्बन करनेवाला राजा ' देवांश " है और अनौचित्य का -- विवरण ना जाता में या इसकी लोग इसे साहब अवलम्बन करनेवाला ' राक्षसांश " राजा को पापी बतलाया गया है वर्गीकरण नहीं है । ( ग ) राजा के कर्त्तव्य: -शु ० नी ० के अनुसार राजा दुष्ट - दमन " । अतएव प्रजानुरञ्जन । यद्यपि अन्यान्य शास्त्रों में भी अधर्मकारी तथापि दो रूपों में इस प्रकार का स्पष्ट के मुख्य कर्त्तव्य हैं प्रजा पालन तथा भी राजा के कर्त्तव्यों में आ ही जाता है । इनके अतिरिक्त राजसूय आदि यज्ञों का अनुष्ठान, न्याय - पूर्वक कोश - सम्बर्धन, परिष्कार अन्य राजाओं का वर्गीकरण, शत्रुओं का दमन, भूमि का अर्जन भी राजा के प्रमुख कर्त्तव्य हैं । ( घ ) उत्तराधिकार: -चाहिए । उत्तराधिकार या यौवराज्य के विषय में शुक्राचार्य का कथन है कि रे शब्दों ज्येष्ठ औरस पुत्र प्रथम अधिकारी है । परन्तु यदि उसमें त्रुटि हो तो उसके स्थान पर कनिष्ठों में ज्येष्ठ भ्राता अथवा भ्रातृ - पुत्र को राज्याधिकार मिलना वस्थित चाहिए । परन्तु यौवराज्याधिकार के विवरण के समय ज्येष्ठ पुत्र के अनधिकारी ति - शास्त्र होने पर या अभाव में प्रथम स्थान पितृव्य ( चाचा ) को दिया गया है 1 । निरूपण अतः यह प्रतीत होता है कि राज्याधिकारी में पितृव्य भी आते हैं । इन सर्वो के ज्ञान के अभाव में दत्तक पुत्र और उसके अभाव में दौहित्र और उसके अभाव में निमें ' भगिनी - पुत्र ( भाञ्जा ) को उत्तराधिकार प्राप्त होता है । पथ जन रूप में १. वही १७१ ॥ २. वही ११७१ - ८५ ॥ ३. वही ११७०, ८६ ॥ ४. वही १११४ ॥ ५. वही १११२३-२४ ॥ ६. वही ११३४१; २।१३ ॥ ७. वही १।३४२-४३ ॥ वही २११५ ॥ ९. वही २।१५-१६ ॥ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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( ४४ ) ( ङ ) राज्य का विभाजन नहीं:: - -शुक्रनीति के अनुसार राजा के अनेक पुत्र होने पर भी सभी सुख, व अन्य स्थ अधिकारी नहीं होते अर्थात् सर्वो में समान रूप में राज्य का विभाजन नहीं है । गया किया जा सकता है, क्योंकि राज्य के विभाजन ' से तथा अनेक ' नायक के होने से राज्य का विनाश नियत हो जाता है । अतः राज्य एक अविभाज्य ( ज ) सम्पत्ति है । हाँ, इतना अवश्य है कि अन्यान्य दायादों को जीविकार्थं कुछ शु सम्पत्ति या राज्य का चतुर्थांश देकर अपने राज्य के चतुर्दिनु सुव्यवस्थित जाता ह कर देना चाहिए ताकि उन सर्वो की सहानुभूति बनी रहे, अन्यथा अन्तर्द्वन्द्व से सुयोग्य राज्य का मूल शिथिल होने लग जाता है । सकते ह होनी च ( च ) उपाय: -प्रावि शुक्रनीति में भी मनु आदि के समान चार ही उपाय -साम, " भी का दान, भेद तथा दण्ड - न कि मत्स्य पुराण की तरह सात उपाय, माने गए के सदस हैं । इन उपायों के प्रयोग के विषय में शु ० नी ० का मत है कि प्रबल गुणवान शत्रुओं के प्रसङ्ग में साम तथा दान, अत्यन्त प्रबल शत्रु के विषय में साम तथा, ध सह भेद, समबल शत्रु के लिये भेद तथा दण्ड और हीनवल शत्रु के लिए दण्ड का दुश्चरि प्रयोग करना चाहिए । मित्रों के लिए भेद तथा दण्ड का सर्वथा प्रतिषेध सदस्यों और साम तथा दान का विधान, शत्रु राजाओं की प्रजा में भेद का, शत्रु- पीड़ित प्रजा के संग्रह के लिए साम तथा दान का भी विधान किया गया है । ( झ ) अपनी प्रजा में साधारणतः साम तथा दान का ही प्रयोग ' उचित है । परन्तु शु यदि इन उपायों से काम न चल सके तो दण्ड का प्रयोग भी करना चाहिए सकते ह जैसा पहले बतलाया जा चुका है । इन उपायों की प्रशंसा लौकिक आधार पर शु ० नी ० में बहुत ही मनोहर ढंग से की गई है ( छ ) राज्याङ्ग: -महाभारत तथा कौटिल्य आदि में वर्णित अङ्गों की तरह शु ० में राज्य के सात अङ्ग माने गए हैं - राजा, मन्त्री, मित्र, कोश, राष्ट्र, चल । " इन सात अङ्गों में मन्त्री को राजा का चक्षु, मित्र को श्रोत्र, १. वही २१४५ २. वही २३ ९ ३. वही २१४४ ४. वही २।४६ ५. वही ४१३४ ६. वही ४।३५ ७. वही ४।३६-३७ ८. वही ४१३८-३९ ९. वही ४।११२४ - २८: १०. वही ११६१ दृष्टान्त के निश्चय । ही, कि करना को रख नी ० सा ० को अप दुर्गं तथा दर्शक कोश को दर्शकों सकता १. ३. ५. ७. CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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भी सभी वजन नहीं नायक के अविभाज्य कुछ व्यवस्थित -साम, माने गए कि प्रचल साम तथा दण्ड की प्रतिपेध - पीड़ित नाया है । परन्तु ना चाहिए नी ० सा ० दुर्गा कोश को ( ४५ ). मुख, बल को मन, दुर्ग को हाथ तथा राष्ट्र को पैर ' माना गया है । एक अन्य स्थल में इन सात अङ्गों से एक राज्य वृक्ष का रूपक - मय वर्णन किया गया है । इन सभी अङ्गों का महत्व भी पूर्वाचार्य के अनुसार विवृत है । ( ज ) मन्त्रि - परिषत्: -शु ० नी ० सा ० में यह कहा गया है कि स्वतन्त्र राजा स्वेच्छाचारी हो जाता है और अनुचित कार्य में प्रवृत्त हो सकता है । इस लिए उसे अन्य सुयोग्य सहायकों का संग्रह करना चाहिए । इसी को हम ' मन्त्रि - परिषत् ' कह सकते हैं । इसमें अपेक्षित सदस्यों की संख्या, शुक्र - नीति - सार के अनुसार, दस होनी चाहिए । ये दस सदस्य हैं - पुरोधा, प्रतिनिधि, प्रधान, सचिव, मन्त्री, प्राड्विवाक, पण्डित, सुमन्त्र, अमात्य तथा दूत ' । इस प्रसंग में एक मतान्तर का भी उल्लेख है जिसमें केवल आठ सदस्य माने गए हैं । इस मन्त्रि - परिषत् के सदस्यों की योग्यता के विषय में शु ० नी ० का मत है कि इन्हें कुलीन, गुणवान्, शीलवान्, शूर, विद्वान्, राज - भक्त, प्रियम्वद, हितोपदेष्टा, क्लेश-सह, धर्मिष्ठ, चतुर, राग - द्वेषादिदोष - रहित अतएव सच्चरित्र होना चाहिए । दुश्चरित्र एवम् अधार्मिक सहायकों के रहने पर राज्य - नाश हो जाता है । इन सदस्यों का विशेष वर्णन मूल ग्रन्थ में ही देखना चाहिए । ( झ ) सदस्यों के कार्य का विभाजन: -शु ० नी ० के अनुसार सभी सदस्य सभी कार्य में हाथ नहीं बँटा सकते हैं, उन सबका अपना - अपना क्षेत्र निश्चित होना चाहिए और यह निश्चय भी उनकी तत्तद्विषयक अर्हता के आधार पर करना चाहिए । साथ ही, किसी भी समस्या का प्रस्ताव प्रजा को पहले विभागीय मन्त्री के सामने ही करना चाहिए पश्चात् उस विभागीय मन्त्री को राजा के समक्ष उस समस्या को रखनी चाहिए " । तदनन्तर तर्क - वितर्क तथा बहुमत के आधार पर राजा को अपना निर्णय देना चाहिए । सभी सदस्यों के कार्य के अवलोकनार्थ दर्शक ( Inspectors ) भी आवश्यक हैं । परन्तु एक - एक वर्ष में उन दर्शकों का परिवर्तन कर देना चाहिए, नहीं तो कार्य में सौष्ठव नहीं रह
सकता है ।
१. वही ११६२ ॥ २. वही ४।१२५७-५८ ॥
३. वही २।१-७ ॥ ४. वही २।६ ९ -७० ॥
५. वही २६-१० ॥ ६. वही २ ९ ४ - १०६ ॥
७. वही २।११० ॥
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( ४६ ) ( ञ ) भृत्यों की नियुक्ति, पदोन्नति, पद- च्युति ( Discharge ) पर उप परिवर्तन तथा पद - मुक्ति ( Retirement ): - तथा उप शुक्रनीति के अनुसार कुल - जाति तथा विशेषतः चरित्र तथा कार्य- सेना, प्र क्षमता के आधार पर भृत्यों की नियुक्ति की जानी चाहिए । उचित ह पदोन्नति के विषय में अनुक्रम - सिद्धान्त, अर्थात् उच्च पद पर अव्यवहित ( ) निम्न - पदस्थ व्यक्ति की पदोन्नति का सिद्धान्त, मान्य है । ठ शु पदच्युति के विषय में यहाँ यह कहा गया है कि अयोग्यता के प्रमाणित छः प्रक हो जाने पर, प्रजा के द्वारा शिकायत होने पर, निन्द्य आचरण करने पर तथा तथा आ सत्याचरण, परोपकार एवम् आज्ञा - पालन इन तीन गुणों से रहित होने पर अथ हिंसा और मिथ्या भाषण " करने पर अधिकारी को पदच्युति कर देनी चाहिए । अन्तर्भाव यदि यह समझ में आजाय कि यह व्यक्ति वर्त्तमान कार्य सम्पादन में ( ड ) अकुशल परन्तु कार्यान्तर - सम्पादन में कुशल है तो उसका पद - परिवर्तन करना राज चाहिए परन्तु जब जीर्णता की स्थिति भा जाय तब उसे पद - मुक्त या इस राष्ट्र कार्य - मुक्त कर देना चाहिए एवम् जीविका की व्यवस्था ( Pension ) भी करनी चाहिए । इसके अतिरिक्त कार्य में प्रोत्साहित करने के लिये भृत्यों को पुरस्कार ' तथा प्रमाद करने वालों को दण्ड " देने का भी निर्देश शु ० नी ० में किया गया है । ( ट ) कोश - सञ्चय: -मूल धन को छोड़ कर ११ लाभ के बीसवें अथवा सोलहवें अंग के शुल्क के रूप में आदान से कोश का सञ्चय करना चाहिये । भाग - कर, २ आकर - कर " और शुरुकादि " के द्वारा कोश की समृद्धि की विशद - व्याख्या शु ० नी ० में की गई है । शुल्क एक ही वार लेना चाहिये, १५ वारम्वार नहीं, क्योंकि ऐसा करने से प्रजा को पीड़ा होती है । परन्तु शुल्क - संग्रह के समय उस व्यक्ति के लाभालाभ
का भी ध्यान रखना अनिवार्य है । 1
१. वही २५३-६४ ॥ २. वही २।११३-१५ । ३. वही २।१११ ॥
४. वही ११३७५ ॥ ५. वही २।२०५ ॥ ६. वही २।१११-१३ ॥
७. वही १।२६४-६५ ॥ ८. वही २।४०२-७ ॥ ९. वही २।४०५ ॥
- १०. वही २४०७ ॥ ११. वही ४।२२० ॥ १२. नही ४।२२२ ॥
१३. वही ४।२२८ ॥ १४. वही ४।२१७ - २१८ ॥ १५. वही ४।२१८ ॥
के सर्वांग वे अधि लेनेवाला इस ( वाजार ' नगर की एक ही भी निय रूप में राष सड़क क को अध इस बतलाया १ ३ Y ७ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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ड ) पर था कार्य-व्यवहित प्रमाणित पर तथा होने पर चाहिए । पादन में करना ब - मुक्त या भी करनी कर तथा में किया शुल्क के २१३ और की गई करने से लाभालाभ २१ ॥ १-१३ ॥ ०५ ॥ २२ ॥ ।२१८ ॥ ( ४७ ) उपर्युक्त साधनों के अतिरिक्त अर्थ - दण्ड, अधर्मी राजा के कोश के ' हरण तथा उपायन ( Presents ) आदि के द्वारा भी कोश - सञ्चय करना चाहिए । सेना, प्रजा आदि के संरक्षण तथा यज्ञादि - सम्पादन के लिए कोश ' का व्यय 1 ( ठ ) बल: -शु ० नी ० में बल को राज्य के अह्नों में प्रमुख माना गया है । इसके छः प्रकार हैं— शारीरिक- घल, 3 शौर्य - वल, सैन्य - वल, अस्त्र - वल, बुद्धि - वल तथा आयु - वल । वल के बिना राज्य निर्वाह असम्भव सा है 1 अर्थ - शास्त्र में मन्त्र - शक्ति, प्रभु - शक्ति तथा उत्साह शक्ति में सभी बलों का अन्तर्भाव बतलाया गया है । ( ड ) राष्ट्र: -राजा के अधीन वर्त्तमान सम्पत्ति - चल तथा अचल -- राष्ट्र 1 इस राष्ट्र में छोटी - छोटी अनेक वस्तियाँ होती हैं - ग्राम, पल्ली, कुम्भ " । ग्राम के सर्वांगीण व्यवस्थापन के लिए अधिकारियों की नियुक्ति करनी चाहिए । वे अधिकारी हैं — दण्डाधिपति, ग्रामाधिपति ( चौधरी ), भाग - हर ( कर लेनेवाला ), लेखक, शुल्क ग्राहक तथा प्रतीहार । इस राष्ट्र के अन्तर्गत ' नगर ' का भी व्यवस्थापन महत्वपूर्ण है । इस नगर ( बाजार ) में भी सुव्यवस्था के लिए उपर्युक्त अधिकारी अपेक्षित होते हैं । नगर की दुकानों में यह ध्यान रखना चाहिए कि एक चीज की सारी दूकानें एक ही जगह हों । इसकी विशेष व्यवस्था के लिए एक विशेषाधिकारी की भी नियुक्ति करनी चाहिए । इन अध्यक्षों की योग्यता का विवरण भी स्पष्ट रूप में किया गया है 1 राष्ट्र के अन्तर्गत सड़कों का भी निर्माण होना चाहिए । ३० हाथ चौड़ी सड़क को उत्तम, वीस हाथ चौड़ी सड़क को मध्यम और पाँच हाथ चौड़ी सड़क को अधम कहा गया है " । इसके अतिरिक्त पथिकों के सौविध्य के लिए पान्थ - शालाओं का भी निर्माण बतलाया गया है । दो ग्रामों के बीच एक पान्थ - शाला होनी चाहिए । ' ' ग्रामप '
१. वही ४११२१-२२ ॥ २. वही ४।११८ - ११ ९ ॥
३. वही ४१८६८-६९ ॥ ४. वही ४।२४२-४३ ॥
५. वही १।१ ९ २ ॥ ६. वही २।१२०-२१ ॥
७. वही १।२५७ ॥ ८. वही १२५ ९ -६० ॥ ९. वही १।२६८ । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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( ४८ ) अधिकारी उसकी देख - रेख करें और एक स्थायी व्यक्ति उसका नित्य - व्यवस्थापन करे । इस व्यक्ति को ' पान्थ- शालाधिप ' कहा गया है । इस पान्थ - शाला में आए व्यक्ति के स्थानादि का विवरण रहना ' चाहिए । इसी प्रकार अन्यान्य प्रमुख विषयों का भी विशद वर्णन इस ग्रन्थ में मिलता है, यहाँ तो केवल कुछ ही विषयों का संक्षिप्त परिचय दिया गया है, विषय जो अपर्याप्त है । अतः समस्त ग्रन्थ का विधिवत् अध्ययन ही इस अंश में. मङ्गला पर्याप्त हो सकता है । नीतिश नीतिश शुक्र नीति के संस्करण राजा उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि शुक्रनीति अपने विषय का एक I बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रन्थ है । अतएव इस ग्रन्थ का कई बार प्रकाशन हुआ ।. राजा धर्म की प्रामाणिक संस्करण के रूप में हम ऑपर्ट ( Oppert ) महाशय के द्वारा मद्रास से प्रकाशित तथा जीवानन्द विद्यासागर के संस्करण को ले सकते हैं । प्राध्यापक राजा सुगति विनय कुमार सरकार ने ' सेक्रेड बुक्स ऑफ हिन्दू - सीरीज ' में अंग्रेजी अनुवाद भी इस ग्रन्थ - रश्न का प्रकाशित किया है । सभी संस्करणों में यह ग्रन्थ चार अध्यायों में विभक्त है । ऐसे अपूर्व ग्रन्थ का हिन्दी व्याख्यान भी परमावश्यक था, विशेषतः आज के भारतवर्ष में । इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए यह संस्करण पाठकों के सामने प्रस्तुत है । यद्यपि ' वेंकटेश्वर प्रेस, बम्बई ' से आचार्य मिहिरचन्द्र जी क राजा ७ गुणो र इन्द्रियज विनाश की हिन्दी व्याख्या ( अनुवाद ) के साथ भी इसका प्रकाशन हुआ है तथापि उसकी हिन्दी आज की दृष्टि से बहुत उपयोगी नहीं है । हमें विश्वास है कि जैसे शव विद्वान् पाठकगण इस संस्करण की कुछ त्रुटियों की उपेक्षा कर विद्वान् रूप- वि व्याख्याकार तथा धैर्य एवम् उत्साह से सम्पन्न प्रकाशक की कामना की पूर्ति रस - विष करने में सानुग्रह दृष्टिकोण अपनायेंगे जिससे इस ग्रन्थ - रत्न का अग्रिम संस्करण: गन्ध - वि भी यथा सम्भव परिष्कार के साथ शीघ्र ही प्रस्तुत हो सके । वाराणसी विदुषामनुविधेयः-. वि ० सं ० २०२५ } श्रीनारायण मिश्रः १. वही ११२६ ९ -७१ ॥ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri द्यूतादिव आठ प्रक का राजा के आन्वीक्ष मनोहर . राजा के निव शुक्र