शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 51–60
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 51–60
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व्यवस्थापन - शाला में ग्रन्थ में - गया है. अंश में. का एक न हुआ । रा मद्रास प्राध्यापक अनुवाद ग्रन्थ चार षतः भाज पाठकों के रचन्द्र जी तथापि स है कि - विद्वान् संस्करण: धेयः-- मिश्रः विषय विषय पृष्ठ मङ्गलाचरण तथा ग्रन्थोपक्रम १ नीतिशास्त्र का उपक्रम नीतिशास्त्र - प्रशंसा २ राजा का नीतिशास्त्र - ज्ञान में प्रयोजन ३ राजा की काल - कारणता का निर्देश ४ धर्म की प्रशंसा ५ राजा के साखिकादि तीन भेद " सुगति दुर्गति भेद से प्राक्तन कर्म की कारणता ६ राजा के देवांश होने का निर्देश ११ ७ गुणों से युक्त राजा की प्रजा-रंजकता का निर्देश १२ इन्द्रियजय की आवश्यकता १६ विनाश के चार कारण शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध " जैसे शब्द - विषय के द्वारा " रूप - विषय द्वारा १७ रस - विषय द्वारा 21 गन्ध विषय द्वारा 13 द्यूतादिव्यसन के दोषों का निर्देश " 1 आठ प्रकार के राजा के व्यवहार का निर्देश २० राजा के दोष - गुण का निर्देश 13 आन्वीक्षिकी आदि के लक्षण २४ मनोहर वचन बोलने का निर्देश २६ . राजा के सामन्तादि भेदों का निर्देश २८ शुक्र ० - सूची विषय पृष्ठ: भूमि के मानभेदों का निर्देश ३० राजधानी बनाने योग्य प्रदेश ३२ राजोचित भवन का निर्देश ३३ राजोचित दुर्ग बनाने का निर्देश, ३६ राजसभा बनाने का निर्देश. 13 मन्त्री आदि के भवन का निर्देश ३७ सेना तथा प्रजावर्गों के स्थान + 11 धर्मशाला निर्माण का निर्देश ३८. राजमार्गादि निर्माण का निर्देश 11 धर्मशाला की व्यवस्था ४० राजाओं के दैनिक कृत्य ४१ प्रहरियों का कर्त्तव्य ४२ राजा के आदेशों की घोषणा ४३ राजाओं के कर्तव्य ४५ विषादि से दूषित अन्नादि - परीक्षा ४७ शिकार खेलने का वर्णन ४८ राजा के सम्बन्धी आदियों का राजनिर्धारित कर्त्तव्य ५० परिषद् की व्यवस्था का निर्देश ५१ राजा को राजचिह्न रखने का निर्देश ५२ राजा के कर्तव्य ५३ राजा को प्रतिवर्ष देश के अधिकारियों के निरीक्षण का निर्देश ५४ राजा के पारलौकिक कार्य ५६ एकाकी राजा का राज्यकार्य करने की दुष्करता का निर्देश ५७ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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बिना मन्त्रियों के सलाह लिये व्यवहार - निर्णय का निषेध अच्छे सहायकों से युक्त राजा की श्रेष्ठता का निर्देश बुरे सहायकों से राजा की हानि का निर्देश युवराजादि राजा के अङ्ग हैं इसका निर्देश युवराज के कार्य तथा अभिषेका युवराज के अधिकारो दुराचारी राजपुत्रों में आचार-स्थापना का निर्देश राजपुत्रों के पिता के विषय में कर्तव्यता का निर्देश अमात्यादिभृत्य विषयक विचार श्रेष्ठ भृत्य के लक्षण निन्द्यभृत्य के लक्षण दश प्रकृतियों के नाम आठ प्रकृतियों के नाम पुरोहितादिकों के अधिकार पुरोहितादिकों के लक्षण प्रतिनिधि का कार्य प्रधान का कृत्य सचिव के कृत्य मन्त्री के कार्य प्राडविवाक के कार्य पण्डित के कार्य सुमन्त्र के कार्य अमात्य के कार्य राजा के अन्योन्य के स्थान पर अन्योन्य की योजना का निर्देश अधिकार की व्यवस्था का निर्देश ( २ ) अधिकारयोग्य को अधिकार देने ५७ का निर्देश ७३ योग्य अधिकारी के अभाव में अन्य 13 की योजना का निर्देश अन्य कर्मों के सचिव की योजना ५८ का निर्देश ७४ दण्डाधिपति आदि ६ की योजना का निर्देश राजा को तपस्वी आदियों ५ ९ करने का निर्देश योजनाकर्ता की दुर्लभता ६० गजाधिपति एवं महावत के लक्षण ६३ अश्वाधिपति के लक्षण ६४ सारथि के लक्षण ६५ घुड़सवार के लक्षण ६६ अश्वशिक्षक के लक्षण ६७ अश्वसेवक ( साईस ) के 11 सेनापति तथा सैनिकों के की रक्षा ७५ " " ७६ 37 11 " लक्षण ७७ लक्षण 11 ६५ पत्ति ( पैदल सेना ) पाल आदिकों के अधिकार " ७० शतानीकादिकों के लक्षण ७८ " 1 उपर्युक्त अधिकारियों को अपने २ चिह्नों से युक्त रहने का ७१ निर्देश " " तित्तिरादिपोषकों की योजना 31 का निर्देश ७ ९ 31 रत्नादि के अध्यक्षों के लक्षण " ७२ | कोषाध्यक्ष के लक्षण " वस्त्राधिपति के लक्षण " वितानाद्यधिपके लक्षण " " धान्यपति के लक्षण ८० ७३ पाकाध्यक्ष के लक्षण 17 आराम देवाध्य दानाध्य सभासद सत्राधि परीक्षक साहसा ग्रामाध कर वस लेखक द्वारपाल चुङ्गी सपोनि दानशी श्रुतज्ञ पौराणि शास्त्रवि ज्योति मान्त्रिक वैद्य के तान्त्रिक अन्तःपु परिचा जासूस दण्डघा ल गायका वेश्या वेश्या-वैतालि CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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ने ७३ अन्य E ७४ ना रक्षा ७५ " " " क्षण ७७ क्षण 11 आदिकों ७८ २ का 11 T ७ ९ ण " " " " ८० 17 ( ३ ) आरामाधिपति के लक्षण गृहाद्यधिपति के लक्षण देवाध्यक्ष के लक्षण दानाध्यक्ष के लक्षण सभासद के लक्षण साधिप के लक्षण परीक्षक के लक्षण साहसाधिप के लक्षण ग्रामाधिप के लक्षण कर वसूल करनेवाले के लक्षण लेखक के लक्षण द्वारपाल के लक्षण चुङ्गी लेनेवाले के लक्षण तपोनिष्ठ के लक्षण दानशील के लक्षण तज्ञ के लक्षण पौराणिक के लक्षण शास्त्रविद् के लक्षण ज्योतिर्विद् के लक्षण मान्त्रिक के लक्षण वैद्य के लक्षण तान्त्रिक के लक्षण अन्तःपुर के योग्य पुरुष के लक्षण परिचारक के लक्षण जासूस के लक्षण दण्डधारी - आसा - वल्लमधारी के लक्षण गायकाविप के लक्षण वेश्या के लक्षण वेश्या भृत्य के लक्षण वैतालिक तथा शिल्पशों को पास में रखने का निर्देश ८० सत्य तथा परोपकार की श्रेष्ठता 17 तथा इससे युक्त राजकर्मचारी ८१ रखने का निर्देश ८७ ,, संपूर्ण पापों से हिंसा तथा असत्य " की प्रबलता तथा इनसे युक्त 11 भृत्यों को न रखने का निर्देश ८८ ८२ सद्भृत्य के लक्षण तथा कृत्य I 22 द्वारपाल के कर्तव्यों का निर्देश 11 राजपार्श्ववर्त्ती दण्डधारियों का कर्तव्य 21 " } भृत्य का राजसमीपावस्थान करने 31 पर कर्तव्य ८ ९ ८३ राजा के पक्ष की पुष्टि करने का 17 निर्देश राजाज्ञा से विवादियों के मत को 21 युक्ति से बोलने का निर्देश 11 13 राजा से स्वकार्य - निवेदन - प्रकार 11 तथा जोर से हंसने आदि का " 1 निषेध 11 II हितकारी सेवक का कृत्य ९ ० राजा को किसी भी मिष से प्रजा को 21 पीड़ित न करने का निर्देश ९ १ " } समझदारों को अपने २ कार्यों में " नियुक्त रहने का निर्देश स्वामी के गुप्त कार्य के प्रकाश करने ८५ 11 राजवेशभूषा धारण की नकल करने 13 का निषे 1 ९ २ 21 राजा की विरक्ति तथा अनुरक्ति का 17 ज्ञान रखने एवं तदनुसार त्याग ८६ तथा ग्रहण का निर्देश 19 विरक्त राजा के लक्षण 11 31 अनुरक्त राजा के लक्षण ९ ३ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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( ४ ) राजा से प्रदत्त भूषणादि धारण का निर्देश ९ ३ स्वामी के प्रति भृत्य के कर्तव्य ९ ४ आपस में भृत्यों के कर्तव्य ९ ५ राजा तथा मृत्य के परस्पर अच्छा व्यवहार करने का निर्देश " डाकू के समान राजा के लक्षण 71 प्रच्छन्न चोर के लक्षण " बालक भी राजपुत्र का तिरस्कार का निषेध ९ ६ लेख्यों के भेदों का निर्देश १०१ लेख के दो भेदों का निर्देश १०२ जयपत्रक के लक्षण " | आज्ञापत्र के लक्षण " प्रज्ञापनपत्र के लक्षण 73 शासनपत्र के लक्षण १०३ प्रसादलिखित के लक्षण " भोग - कर- उपायन- पुरुषावधिक और कालावधिक पत्रों के लक्षण. 11 विभागपत्र या भागलेख्य के लक्षण 23 दानपत्र के लक्षण 11 ऋयपत्र के लक्षण १०४ सादिलेख्य के लक्षण " संवित्पत्र के लक्षण 33 ऋणलेख्य के लक्षण " 7 शुद्धिपत्र के लक्षण 17 सामयिक लेख्यपत्र लक्षण संमतिसंज्ञक " 1 पत्र के लक्षण 11 क्षेमपत्र के लक्षण १०५ वेदनार्थक पत्र के लक्षण 31 आय - व्यय लेख्य के लक्षण राजाओं के आय - व्ययादिक के लक्षण 11 आय के भेद 37 १०६ संचित आय के भेद निश्चितान्यस्वामिक संचित धन के भेद १०६ | औपनिध्य याचित- औत्तमणिक के लक्षण अज्ञातस्वामिक के लक्षण १०७ स्वत्वविनिश्चित के भेद साहजिक के लक्षण अधिक के लक्षण संचित धन के लक्षण संचित धन के भेद पार्थिवसंज्ञक आय के भेद १०८ चलसंज्ञक आय के लक्षण 12 विभागानुसार आय - व्यय के व्याप्य-व्यापक का निर्देश व्यय के भेदों एवं पुनरावर्तक के लक्षण निधि, उपनिधि आदि व्यय के लक्षण १० ९ स्वत्वनिवर्तक के भेद | ऐहिक तथा पारलौकिक व्यय के भेद ” प्रतिदान, पारितोषिक और वेतन-व्यय के लक्षण " उपभोग्य के लक्षण " भोग्य व्यय के लक्षण ११० पारलौकिक व्यय के चार भेद और उनके लक्षण " आय - व्यय - लेखक के कर्त्तव्य 11 अवशिष्ट आय के विविध भेद १११ मान- उन्मान - परिमाण संख्या के लक्षण लोकव्यवहारार्थं द्रव्य तथा धन के लक्षण मूल्य की परिभाषा मूल्य क f पत्रलेख सब लेख क पत्र में व व्यापक स्थान-शेषायव्य तिथ्याद गुञ्जाद प्रस्थपाद संख्या संख्या एकादि-ना कालमा की भृति के कार्यमान मध्यमा पोषण - य का हीन भूि शूद्रादिक का भृत्य के त्यों क रोग के बारवार प्रत सेवा के नि CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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न के १०६. के १०७ " 17 १०८ याप्य-के 5 i के भेद " तन-" 31 ११० और 21 11 १११ के ( 2 ) मूल्य के न्यूनाधिक्य का कारण- । निर्देश ११२ पत्रलेखन - प्रकार " सब लेखों पर स्व - स्वमुद्राङ्कित करने का निर्देश ११३ | पत्र में आय - व्यय लेखन का स्थान-विचार ११४ । व्यापक व्याप्य के लक्षण " स्थान- टिप्पणादि के भेद ११५ । शेषायव्यय - स्थलायव्ययज्ञान 11 तिथ्यादि लिखने का निर्देश " गुञ्जादिकों का लक्षण ११६ प्रस्थपाद का लक्षण 31 संख्या का प्रमाण " संख्या की अनन्तता एकादि - पराधं तक संख्याओं के नाम ११७ कालमान का त्रैविध्य एवं चन्द्रादिकों की व्यवस्था भृति के ३ प्रकारों का निर्देश - कार्यमानादिकों के लक्षण 11 मध्यमादिभृति के लक्षण ११८ पोषण - योग्य भृति नियत करने का निर्देश " हीन भृति देने से अनर्थ का निर्देश " शुद्रादिकों को आच्छादन मात्र देने का निर्देश " भृत्य के तीन भेद ११ ९ भृत्यों को छुट्टी देने का नियम 21 रोग के समय भृति देने का प्रकार " बारबार रोगग्रस्त के स्थान पर प्रतिनिधि रखने का निर्देश १२० कटुभाषी नृत्य का भृति - दान-प्रकार १२१ राजा के भृत्य के संग वर्त्तन का वर्णन १२२ भृत्य को कार्य - मुद्रा से अंकित करने का निर्देश " भृत्यों को विशिष्ट राजचिह्न न देने का निषेध " १० प्रकृति पुरोहितादियों का जातिनियम १२३ भागग्राही और साहसाधिपति आदि पद के लिये क्षत्रियादि रखने का निर्देश " सेनापति पद पर शूरमात्र को रखने का निर्देश 33 भृत्य के लिये त्यागने योग्य राजा लक्षण 27 सबों के सुख के अर्थ प्रवृत्ति का निर्देश १२५ धर्म के बिना सुख न मिलने का निर्देश सर्व साधारण के लिये विहिताचरण का निर्देश 17 निषिद्धाचरणों का निर्देश १२६ दशविध पापों का निर्देश 37 दरिद्री आदिकों का रक्षण करने का निर्देश 97 समय पर हित और मित वचन कहने का निर्देश १२७ अकेले सुखों का उपभोगादि करने का निषेध " • सेवा के बिना ही भृति देने का अपने अपमान को प्रकाशित न निर्देश करने का निषेध " CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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( पराराधन - पण्डितों के व्यवहार का निर्देश १२७ इन्द्रियों को वश में रखने का निर्देश 11 इन्द्रियों को वश में न रखने से अनर्थ का निर्देश १२८ स्त्रियों के स्पर्श की भी अनर्थकारिता का निर्देश 33 स्त्रियों के प्रति सम्बोधन - प्रकार 33 एक क्षण भी स्त्रियों के स्वातन्त्र्य का निषेध " यत्नपूर्वक स्त्रियों की रक्षा करने का निर्देश १२ ९ चत्यादिकों के लंघन का निषेध 37 तैर कर नदी को पार आदि करने का निषेध 11 देरतक उकरू बैठने, रात्रि में वृक्ष पर चढ़ने आदि का निषेध १३० सूर्य को निरन्तर देखने का निषेध " सन्ध्या समय में भोजनादि का निषेध " व्यवहार में लोक की आचार्यता का कथन १३१ राजादिगत धर्म में दोष लगाने का निषेध " 1 आग्रहपूर्वक भाषण का निषेघ 11 किंचित् भी पाप का स्मरण करने का निषे 13 अच्छे का ग्रहण एवं बुरे के त्याग का निर्देश 11 सार को यत्नपूर्वक ग्रहण करने का निर्देश १३२ अधर्मरत मित्र - पुत्रादि को राज्य से निकाल देने का निर्देश ६ ) आतताइयों के लक्षण १३२ एक क्षण भी स्त्री आदि की उपेक्षा न करने का निर्देश विरुद्ध राजादिक जहां हों वहां एक दिन भी रहने का निषेध अविवेकी राजादिक से घनादि की इच्छा करने का निषेध १३३ मात्रादिक के पालनादि न करने पर शोक न करने का निर्देश सावधानी से राजादि की सेवा करने का निर्देश १३४ माता आदि के साथ विरोधादि करने का निषेध स्वजनादि से विरोधादि एवं स्त्री आदि से विवाद का निषेध | अकेला स्वादिष्ट भोजनादि का निषेध अन्य धर्म के सेवन का निषेध 11 त्याज्य निद्रादि दोषों का निर्देश | मनुष्य को कौन सा कार्य करना और कौन सा छोड़ना चाहिये इसका निर्देश १३५ बिना पूछे किसी से कुछ कहने का निषेध 37 बिना अनुभव के स्वाभिप्राय प्रकट करने का निषेध दम्पती आदि के बीच में किसी की साक्षी न देने का निर्देश १३६ आपत्ति में विचलित होने एवं मर्मवेधी बातें करने का निषेध, " | अश्लील बातें आदि करने का निषेध " लोकनिन्दित आदि कार्य करने का निषेध I शत्रु के क प्रारब्ध f दीर्घदर्श प्रत्युत्प आलसी साहसी चिरका सहसा मित्र क बिना स 5 मित्र क क विश्वस्त क प्रामाण क परीक्षा क उग्र द विद्यादि न विद्याम शौर्यमत्त घनमत्त कुलीन क बलमत्त मानमत्त विद्यादि ब CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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१३२ उपेक्षा " एक ध " द की १३३ रने पर श " वा १३४ स्त्री " I T " देश " रना चाहिये १३५ का 11 प्रकट 11 सी की T १३६ वं - निषेध " निषेध, " ने का I ( ७ ) शत्रु के भी गुणों को ग्रहण करने का निर्देश १३६ | प्रारब्धवश धनी निर्धन होने का निर्देश १३७ दीर्घदर्शी के लक्षण " प्रत्युत्पन्नमति के लक्षण " 1 आलसी मनुष्य के लक्षण 11 साहसी के लक्षण व दोष 13 चिरकारी मनुष्य के लक्षण १३८ सहसा कार्य करने का निषेध,, मित्र की विशेषता 27 बिना समझे किसी को मित्र बनाने का निषेध " मित्र की प्राप्ति के लिये यत्न करने का निर्देश विश्वस्त का भी अत्यन्त विश्वास करने का निषेध १३ ९ प्रामाणिकादि का विश्वास करने का निर्देश 21 परीक्षा करके विश्वस्त मानने का निर्देश 17 उग्न दण्ड और कटु वचन का निषेध " विद्यादिकों से प्रमत्त होने का निषेध १४० विद्यामत्तता के अनर्थकारी फल 3. शौर्यमत्तता के अनर्थकारी फल " धनमत्त पुरुष की स्थिति का वर्णन " कुलीनता के मद से मत्त की स्थिति का वर्णन " बलमत्त की स्थिति का वर्णन १४१ मानमत्त की स्थिति का वर्णन " विद्यादि से सज्जनों को विनयी बनने का निर्देश 22 विद्यादिकों के फल १४१ शुरतादि के फलों का निर्देश 71 सुन्दर विद्यादि को नीच से भी ग्रहण करने का निर्देश " नष्ट वस्तु की उपेक्षा करने का निर्देश १४२ परद्रव्यहरणादि का निषेध " प्राणनाशादि की संभावना में झूठ बोलने का निर्देश 11 स्त्री - पुरुषादि में भेद डालने का निषेध, वार्ता करते हुये पुरुषों के बीच जाने का निषेध 13 सपुत्र के लिये सपुत्र कन्या आदि को लाकर गृह में बसाने का निषेध १४३ सर्पादि को तुच्छ समझकर अपमान करने का निषेध 17 सर्पादि से संभल कर व्यवहार करने. का तथा ऋणादि का समुल नाश करने का निर्देश " याचकादि के साथ व्यवहार का प्रकार दाता आदि की कीर्ति सुनने का निर्देश १४४ समय आदि पर परिमित भोजन आदि करने का निर्देश " स्त्री - संभोगादि का एकान्त में करने का निर्देश " मधुरादि षड्रस अन्न को प्रीतिपूर्वक भोजन का निर्देश 17 स्व- स्त्री के साथ विहार करने का निर्देश " CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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( रात्रि में सोने के समय का एवं दीनादिक - उपहास के निषेध का निर्देश १४४ कार्य - साधक के कृत्यों का वर्णन १४५ दुर्वचन का एवं गुरुजनादि की आज्ञा के उल्लङ्घन को निषेध असत् कार्य करानेवाले गुरु को भी बोध कराने का एवं छोटे के भी समुचित बात मानने का निर्देश " तरुणी स्त्री को तन्त्र छोड़कर जाने का निषेध " साध्वी भार्यादि का यत्नपूर्वक पालने का निर्देश १४६ जीवन्मृत पुरुषों का निर्देश 17 गुप्त रखने योग्य बातों का निर्देश १४७ देशाटनादि की कर्त्तव्यता " देशाटन के लाभ 17 सभा में बैठने से लाभ का वर्णन " बहुत से शास्त्रों के अध्ययन के फल 11 वेश्यादर्शन के फल १४८ पण्डितों के साथ मंत्री के फल 17 अपने लिये केवल भोजन बनाकर खाने का निषेध 27 गुरुजनादि के लिये मार्ग देने का निर्देश 17 शकटादिकों से दूर रहकर चलने का निर्देश 32 शृङ्गी आदि का विश्वास करने का निषेध १४ ९ ग़मनादि के निषेध के विषय बड़ों की आज्ञा के बिना उनके साथ कार्य करने का निषेध 11 = ) निन्दित भी कार्यों का बड़ों के लिये भूषण होने का निर्देश १४ ९ | बिना अनुमति के श्रेष्ठ के संमुख बैठने का निषेध " | मूर्ख का स्वामी बनने की इच्छा का निषेध १५० | आवश्यक कार्य को सर्वप्रथम करने का निर्देश " बुरे कार्य में देरी करने का निर्देश " } जगत् को वश में करने के उपाय 25 वश करने के उपायों की दुर्जनों के विषय में विफलता का निर्देश १५१ वेदादि के अभ्यास की हितकारिता का निर्देश " मनुष्यों के ४ व्यसनों का निर्देश " कूट व्यवहार का निषेध " विहित कार्य करने का निर्देश 11 रात्रि में सुखपूर्वक न सो सकनेवालों का निर्देश १५२ योग्यता न रहने पर बड़ों के अनुकरण करने एवं सर्पादि पकड़ने के लिये एकाकी गमन का निषेध " मारनेवाले गुरु को भी मारने का एवं कलह में सहायता ' न करने का निर्देश 31 गुरुजनों के आगे प्रौढपाद बैठने का निषेध } } उत्तम पुरुष के लक्षण 11 स्त्री के कथनमात्र से बिना स्वयं अनुभव किये समझने का निषेध १५३ स्त्रियों के ८ दुगुणों का निर्देश 11 १६ व a दौहित्र स्वामी एक वर अ वर क कन्या विद्या धनाज धन व अवर धन व्यव मित्र लिख आह उचि भाय -सस्त्र CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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के लिये १४ ९ मुख 17 च्छा १५० निर्देश " उपाय 19 र्जनों के १५१ कारिता " नर्देश " कनेवालों १५२ ड़ों के पदि काकी का वा'न " उ I 13 13 स्वयं १५३ देश 11 १६ वर्ष से ऊपर की अवस्था वाले पुत्रादि के ताड़नादि का निषेध दौहित्र आदि का पुत्रादिकों से बढ़कर पालन करने का निर्देश स्वामी के लक्षण एक शय्या पर सदा स्त्री के साथ सोने का निषेध वर और मित्र को परीक्षा करने का निर्देश वर के लक्षण कन्या के लक्षण विद्या और धन का संचय करने का निर्देश धनार्जन के उपयोगों का निर्देश धन की अपेक्षा विद्या की श्रेष्ठता का निर्देश अवश्य धनार्जन करने का निर्देश -धन के प्रभाव का निर्देश • व्यवहार में लेख की आवश्यकता का निर्देश मित्रता के नाते बिना ब्याज के भी धन देने का निर्देश ' लिखा - पढ़ी के साथ सूद पर धन देने का एवं अन्यथा रोति से न देने का निर्देश आहारादि में लज्जा - त्याग का निर्देश उचित व्यय करने का निर्देश भार्या आदि की रक्षा करने का निर्देश -सस्त्रीक प्रौढ़ पुत्रों को धन का ( & ) विभाग कर देने का अन्यथा अनर्थ की सम्भावना का १५३ निर्देश १५८ २ सौत स्त्रियों एवं २ मादाओं को एक पुरुष या नर पशु " के साथ एकत्र रखने का 33 निषेध " व्याजी धन या दिये ऋण धन " का विभाग करने का निषेध १५ ९ शाश्वत मैत्री रखने के लिये १५४ त्याज्य कर्मों का निर्देश " बिना साक्षी या ऋणपत्र लेख के 11 ऋण न देने का निर्देश " उत्तमोत्तमादिक पुरुषों के लक्षण 33 १५५ बिना दान किये कभी कोई दिन " ' व्यतीत न करने का निर्देश १६० यथेष्ट दान - धर्म करने का निर्देश 11 33 दान से शत्रु को भी मित्र बन 31 जाने का निर्देश 31 १५६ पारलोक - सुखसाधन ' संविद् ' दान के लक्षण 37 १५७ पारितोष्य, श्रियादत्त या यशो-19 31 १५८ " 1 र्थक दान के लक्षण 33 आचारदत्त या ह्रीदत्त दान १६१ भीदत्त दान " नष्टदान " } आराध्य देव को सर्वोत्कृष्ट-मानना " वशीकर वस्तुओं में दान तथा सरलता 13 विचार करके स्नेह या द्वेष " करना " अतिक्रूरतादि का निषेध १६२ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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( अतिक्रूरता आदि से अनिष्ट फल १६२ अपने को अधिक श्रेष्ठ न मानना 31 देवादिकों पर प्रभुत्व रखने का निषेध १६३ देवादिकों के तिरस्कार उचित नहीं युवती स्त्री, धन तथा पुस्तक को परहस्तगत करने का निषेध " अल्प कारण से बड़े अर्थ का एवं अधिक धन व्यय होने से कीर्ति के त्याग का निषेध 33 बीर सैनिकों के दुर्वचन भी सहना विनोद में भी दुखी करनेवाले बचन बोलने का निषेध १६४ कहने का असर न हो वाले से कुछ भी न कहने का निर्देश बुरे व्यसनों से अलग न करने वाले नीच की नृशंसता I मित्र के लक्षण " कठोर वचन से मित्र के शत्रु बन जाने का निर्देश 13 स्वबलाधिक शत्रु को कन्धे पर भी ले चलने का निर्देश ' मनुष्य का भूषण सुजनता है ' I इसका निर्देश १६५ अश्वादिकों में वेगादिक गुणों की भूषणता तथा अन्यथा ( विपरीत ) होने पर दुभूषणता का निर्देश " एक ही नायक आदि से ही परिवार आदि की शोभा का निर्देश " १० ) हिंस्र पुरुषादि की उपेक्षा करने का निषेध १६६. चुगलखोरी आदि दोषों से गुणियों के गुणों के ढंक जाने का निर्देश बाल्यास्वथा आदि में मां आदि " के मरने में महापातक के फल का निर्देश :) दुःखप्रद विषयों का निर्देश 11 सुखकारक न होनेवाली ६ बातों का निर्देश " जीवन्मुक्त, खल या पशु के तुल्य के लक्षण १६७-खल पुरुष के लक्षण आशाबद्ध लोगों के लिये जगत् की सम्पूर्ण वस्तु की प्राप्ति. से भी कमी बोध होने का निर्देश धूर्त पुरुष के कर्मों का निर्देश 11 प्रीतिकारक व दुःखदायी पुत्र के लक्षण " प्रीति देनेवाली स्त्री के लक्षण १६८ आनन्ददायिनी तथा दुःखदायिनी माता के लक्षण " आनन्ददायक पिता के लक्षण 11 मित्र के लक्षण " मानहानिकारक कार्यों का निर्देश " मैंने सेवा की है यह समझकर राजादि के साथ अधिक संघर्ष रखने का निषेध १६ ९. दुःखकारक कार्यों का निर्देश 11 स्त्रियों को पति के प्रेम से ही अधिक सुख मानने का निर्देश " स्त्री व व्यवसा अ ह a तपस्या मधुरभ ६ f मूखं ज सरवग स्वकर्म E स्वधम धर्म क कृषिव भिक्षा आध्व बिना राजा CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri