शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 451–460

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 451–460

पृष्ठ 451

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योः । त होकर को ' आश्रय दुर्बल भी सेना ' कहते हैं । को रखने को चः ॥ २३७ ॥

पनम् । वान द्वारा आक्रमण में पढ़ा हुआ राजा ] -: ॥ २३८ ॥

1 समय केवल उपहार को छोड़कर जितने ने जाते हैं । अर्था ॥। २३ ९ ॥ ते । पाये युद्ध से निवृत सन्धि का उपाय ॥ २४० ॥

चनम् । - शत्रु के बलानुसार शिकार करनी पड़ती वन उपहार में देना वै ॥ २४१ ॥

सः । शत्रु को जीतने थ सन्धि कर है । नी चाहिये, क्योंकि चतुर्थाध्याये सेनानिरूपण प्रकरणम् ३६५ सङ्घातवान् यथा वेणुनिबिडैः कण्टकैर्वृतः ॥ २४२ ॥

न शक्यते समुच्छेत्तुं वेणुः सङ्घातवांस्तथा । सम्धि के अवसरों का तथा उनसे लाभ का निर्देश - जिस प्रकार कांटा से घिरा हुआ बांस के समूह को कोई काट या उखाड़ नहीं सकता है, उसी प्रकार से म्लेच्छों से सन्धि किये हुये सहायवान राजा को भी कोई नहीं पछाड़ सकता है । अर्थात् राजा को अपने पास के भले - बुरे सभी राजाओं होमेल रखना चाहिये ऐसा करने से कोई शत्रु उसको परास्त नहीं कर

सकता है ।

सन्धिश्चातिबले युद्धं साम्ये यानं तु दुर्बले ॥ २४३ ॥

सुहृद्विराश्रयः स्थानं दुर्गादिभजनं द्विधा । अति प्रबल शत्रु के साथ सन्धि, समान बलवाले के साथ युद्ध, दुर्बल शत्रु पर या न ( युद्ध के लिये आक्रमण ) व मित्र राजाओं के साथ आश्रय और दुर्गाद

मैं दो जगह स्थान - सेना की स्थापना करना उचित होता है ।

बलिना सह सन्धाय भये साधारणे यदि ॥ २४४ ॥

आत्मानं गोपयेत् काले बह्वमित्रेषु बुद्धिमान् । यदि राजा को बहुत से शत्रुओं से समानभाव से भय उपस्थित हो जाय. तो उनमें जो अधिक बलशाली हो उसके साथ बुद्धिमानी के साथ समयानुसार-सुलह करके अपनी रक्षा करनी चाहिये । बलिना सह योद्धव्यमिति नास्ति निदर्शनम् ॥ २४५ ॥

प्रतिवातं हि न घनः कदाचिदपि सर्पति । बलवान के साथ युद्ध करना उचित होता है, इसका उदाहरण कहीं भी नहीं मिलता है । क्योंकि देखा जाता है कि मामूली बादल कभी भी हवा

के विपरीत नहीं ठहर सकता है ।

बलीयसि प्रणमतां काले विक्रमतामपि ॥ २४६ ॥

सम्पदो न विसर्पन्ति प्रतीपमिव निम्नगाः । जो बलवान शत्रु के समक्ष सिर झुकाते हैं और समय अच्छा आने पर फिर उसी से युद्ध करने लगते हैं । ऐसे राजाओं की संपत्ति उससे कभी विपरीत नहीं होती है अर्थात् कभी चलायमान नहीं होती है । जैसे नदियां:

कभी विपरीत नहीं बहती हैं ।

राजा न गच्छेद् विश्वासं सन्धितोऽपि हि बुद्धिमान् ॥ २४७ ॥

अद्रोह समयं कृत्वा वृत्रमिन्द्रः पुराऽवधीत् । विग्रह करने योग्य पुरुष के लक्षण - बुद्धिमान राजा सन्धि किये हुये भी शत्रु का विश्वास न करे । क्योंकि प्राचीनकाल में द्रोह न करने की प्रतिज्ञाः CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 452

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३६६ शुक्रनीति: के साथ सन्धि करके भी इन्द्र ने वृत्रासुर को सन्धि मार डाला । की उपेक्षा करते आपनोऽभ्युदयाकाङ्क्षी पीड्यमानः परेण देशकालबलोपेतः प्रारभेत च विग्रहम् वा ॥ २४८ ॥

जो राजा विपत्ति में पड़कर या दूसरे के द्वारा पीड़ित | वि अपना अभ्युदय चाहता तो वह देश, काल तथा होकर भी यदि पुक विग्रह क बल उचित होने पान प्रारम्भ कर दे । पर युद्ध प्रहीनबलमित्रं तु दुर्गस्थं शत्रुमागतम् ॥ २४६ अत्यन्त विषयासक्तं प्रजाद्रव्यापहारकम् ॥ अथ भिन्न मन्त्रिबलं राजा पीडयेत् परिवेष्टयन् ॥ । २५० कर जो विग्रहः स च विज्ञेयो ह्यन्यश्च कलहः स्मृतः ॥। विग्रह होने के कारणों का तथा विग्रह और कलह के भेद का निर्देश जो शत्रु सेना तथा मित्र से हीन हो गया हो, और अपने दुर्ग में घिर बा सन से पढ़ा हुआ हो, या दुर्गंति में पड़ा हो या अत्यन्त विषयासक्त हो गया हो, इच्छा र किंवा प्रजाओं के द्रव्य को लूट लेता हो अथवा जिसके मन्त्रियों तथा सेनाओं में अप फ्रूट पड़ गया हो तो ऐसे उपस्थित शत्रु को चारो तरफ से घेरकर राजा द्वारा को ' सन् पीड़ित करने को वस्तुतः ' विग्रह ' कहते हैं और इससे भिन्न को केवल ' कल ' कहते हैं ।बलीयसाऽस्यल्पबलः शूरेण न च विग्रहम् ॥ २५१ ॥ संभ

कुर्याद्धि विग्रहे पुंसां सर्वनाशः प्रजायते । और य बलवान शत्रु के साथ विग्रह करने का निषेध - अल्प सेनावाले दुर्द तो ' संभ राजा को शूर - वीर तथा अस्यन्त बलवान शत्रु से विग्रह नहीं करना चाहिये । क्योंकि ऐसे के साथ विग्रह करनेवालों का सर्वनाश हो जाता है । एकार्थाभिनिवेशित्वं कारणं कलहस्य वा ॥ २५२ ॥ प्रस

पर मार्ग उपायान्तरनाशे तु ततो विग्रहमाचरेत् । उसे याद निरुपाय दशा में विग्रह करने का निर्देश - किसी वस्तु के पाने का आग्रह जब दो व्यक्तियों में हो जाता है तब उसके कारण से उन दोनों में कह उत्पन्न हो जाता है । दूसरा कोई उपाय न रहने पर अन्त में विग्रह करना उचित होता है । उप विगृह्य संधाय तथा सम्भूयाथ प्रसङ्गतः ॥ २५३ ॥ में पढ़

उसे ' उ उपेक्षया च निपुणैर्यानं पचविधं स्मृतम् । यान के पांच भेद - विगृह्ययान, संघाययान, संभूययान, प्रसङ्गपाव उपेक्षायान, इस भांति से विद्वानों ने ५ प्रकार का यान कहा है ॥ इनके प आगे कहेंगे । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 453

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न्धि की उपेक्षा करते ॥ २४८ ॥

म् । होकर भी यदि उचित पुनः होने पर युद ॥ २४६ ॥

न् ।

नू ॥ २५० ॥

ः । भेद का निर्देश-ने दुर्ग में घिर जाने यासक हो गया हो, त्रयों तथा सेनाओं में से घेरकर राजा द्वारा भिन्न को केवल ' कला ' ॥ २५१ ॥

आप सेनावाले दुर्द

नहीं करना चाहिये ।

ता है ॥। २५२ ॥

के पाने का आग्रह उन दोनों में का नन्त में विग्रह करणा ८ ॥ २५३ ॥

। सूययान, प्रसङ्गयाद कहा है । इनके चतुर्थाध्याये सेनानिरूपण प्रकरणम् ३६७ विगृह्य याति हि यदा सर्वान्छत्रुगणान् बलात् ॥ २५४ ॥

विगृह्य यानं यानज्ञैस्तदाचायैः प्रचक्ष्यते । विगृह्ययान के दो प्रकार के लक्षण – जब कोई राजा किसी प्रकार का विग्रह का कारण दिखाकर जबरदस्ती शत्रुगर्णी पर चढ़ाई कर देता है तो उसे

के जानने वाले राजनीति के आचार्य गण ' चिग्टह्ययान ' कहते हैं ।

पान ' अरिमित्राणि सर्वाणि स्वमित्रैः सर्वेतो बलात् ॥ २५५ ॥

विगृह्य चारिभिर्गन्तुं विगृह्य गमनं तु वा । अथवा किसी २ के मत से शत्रु के साथ बलपूर्वक चारों तरह से लड़वा-कर जो शत्रु पर चढ़ाई करना है वह ' विगृह्ययान ' कहलाता है । सन्धायान्यत्र यात्रायां पाणिग्राहेण शत्रुणा ॥ २५६ ॥

सन्धाय गमनं प्रोक्तं तज्जिगीषोः फलार्थिनः । सन्धाययान के लक्षण - विजय को चाहनेवाले राजा को विशेष फल की इच्छा रखनेवाले विद्वान - अन्यन्त्र किसी शत्रु पर चढ़ाई करने के समय उसके पूर्व अपने पृष्ठ भाग- स्थित पड़ोसी शत्रु राजा के साथ सन्धि करके चढ़ाई करने

' सन्धायगमन ( यान ) ' कहते हैं ।

एको भूपो यदैकत्र सामन्तैः सांपरायिकैः ॥ २५७ ॥

शक्तिशौर्ययुतैर्यानं सम्भूय गमनं हि तत् । संभूययान के लक्षण – अकेला कोई राजा यदि शक्ति तथा शूरता से युक्त और युद्ध करने में कुशल सामन्तों के साथ एकत्र होकर किसी पर चढ़ाई करे

तो ' संभूयगमन ( यान ) ' कहते हैं ।

अन्यन्त्र प्रस्थितः सङ्गादन्यत्रैव च गच्छति ॥ २५८ ॥

प्रसङ्गयानं तत् प्रोक्तं यानविद्भिश्च मन्त्रिभिः । प्रसङ्गयान के लक्षण – अन्यन्त्र किसी पर चढ़ाई करने के लिये चल चुकने पर मार्ग में यदि प्रसङ्गवश उससे अम्यन्न चढ़ाई करने के लिये चल देवें तो

उसे यानवेत्ता मन्त्रिगण ' प्रसङ्गयान ' कहते हैं ।

रिपुं यातस्य बलिनः सम्प्राप्य विकृतं फलम् ॥ २५६ ॥

उपेक्ष्य तस्मिन् तद्यानमुपेक्षायानमुच्यते । उपेक्षायान के लक्षण – जो शत्रु बुरे फल को पाकर स्वयं विपन्न अवस्था मैं पढ़ गया हो उसकी यदि उपेक्षा करके उसके ऊपर चढ़ाई कर दी जाय तो

उसे ' उपेक्षायान ' कहते हैं ।

दुर्वृत्तेऽप्यकुलीने तु बलं दातरि रज्यते ॥ २६० ॥।

हृष्टं कृत्वा स्वयबलं पारितोष्यप्रदानतः ।

नायकः पुरतो यायात् प्रवीरपुरुषावृतः ॥ २६१ ॥

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पृष्ठ 454

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३६८ शुक्रनीति: मध्ये कलत्रं कोशश्च स्वामी फल्गु ध्वजिनीं च सदोद्युक्तः स गोपायेद्दिवानिशम् च यद्धनम् | रास्तों में सेना को चलाने की व्यवस्था - राजा चाहे ॥ २६२ ॥

वाला ) या नीच कुल का भी हो. किन्तु यदि दाता दुवृत्त ( दुष्ट - चरित्र इ अनुरक्त रहती है । अतः पारितोषिक प्रदान द्वारा अपनी हो तो सेना उस पर सैनिकों श्रेष्ठ वीर पुरुषों से घिरा हुआ, अपनी सेना के आगे सेना को प्रसन्न करके शत्रु पर चढ़ाई करे 1 । और साधारण धन को रख कर से सेनापति रक्षा करे । नद्यद्रिवनदुर्गेषु सेनापतिस्तत्र नदी- पर्वतादि में भय सेना के मध्य में स्त्री कोश २ रहकर , ( खजाना ), इनकी तथा अपनी सेना की रात दिन

यत्र यत्र भयं भवेत् ।

तत्र गच्छेद् व्यूहकृतैर्बलैः ॥ २६३

की संभावना होने पर व्यूह बांध निर्देश— जहाँ जहाँ पर मार्ग में नदी, पर्वत, वन तथा दुर्गम स्थान कर भय की संभावना हो, वहाँ वहाँ पर सेनापति सेनाको सेनानायक राजा और सावधानी के सैनि दक्षिण, ॥ चलने का सं आने पर सुनकर रखकर चले । व्यूह कार में

यायाद् व्यूहेन महता मकरेण पुरोभये ।

श्येनेनोभयपक्षेण सूच्या वा धारवक्त्रया ॥ २६४ ॥

स मकर, श्येन व सूचीमुख व्यूहों का नाम व योजना स्थल का निर्देश- हो जा यदि आगे से भय की संभावना होतो बड़े मगर के आकार की व्यूहरचना कर जल्दी के चले, अथवा उभय पक्षवाले श्येन ( बाज ) पक्षी के आकार की किंव लोटना तीक्ष्ण सुखवाली सूची के आकार की व्यूह रचना कर के चले । गोलाक

पश्चाद्भये तु शकटं पाश्वयोर्वस्त्रसंज्ञकम् ।

सर्वतः सवतोभद्रं चक्रं व्यालमथापि वा ॥ २६५ ॥

शकट, वज्र, सर्वतोभद्र, चक्रव्यूह, व्यालव्यूहों का नाम - निर्देश – पीछे से यदि शत्रु - भय हो तो ' बज्रम्यूह ', ' चारो तरफ से भय हो तो ' सर्वतोभद्र व्यूह ', चक्रव्यूह अथवा व्यालन्यूह की रचना करे । अ यथादेशं कल्पयेद्वा शत्रुसेनाविभेवकम् । रहना, अथवा देशानुसार शत्रु की सेना को भेदन करनेवाले न्यूह की रचना को ' । जाना, व्यूहरचन सङ्केतान् वाद्यभाषासमीरितान् ॥ २६६ ॥ करना,

स्वसैनिकै विना कोऽपि न जानाति तथाविधान् । करना बाजा बजाने के दन से संकेतों के जानने का निर्देश- और बाजा बजाने के ठन से किये गये व्यूह की रचना के संकेत ऐसे हों जिन्हें अपनी सेना के अलावा दूसरा कोई सैनिक न जानता हो । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 455

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नम् ।

म् ॥ २६२ ॥

हि दुर्वृत्त हो ( दुष्ट चरित्र -तो सेना उस सेना को पर प्रसन्न करके रहकर सेनानायक खजाना ), राजा और रात दिन सावधानी ॥ -: ॥ २६३ ॥

बांध कर चलने का म स्थान आने पर नको ब्यूहाकार में 1 ॥। २६४ ॥ स्थल का निर्देश-की व्यूह रचना कर के आकार की किंवा

न्चले ।

- ॥ २६५ ॥

नाम - निर्देश - पीछे तो ' सर्वतोभद्र

यूह की रचना को ॥। २६६ ॥

धान् । के और बाजा बजाने अपनी सेवा के कहें चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३६ ९ नियोजयेच्च मतिमान् व्यूहान्नानाविधान् सदा ॥ २६७ ॥

इस भांति से बुद्धिमान सेनापति सदा नाना प्रकार के ब्यूहों की रचना में सैनिकों को रक्खे |

अश्वानां च गजानां च पदातीनां पृथक् पृथक् ।

उच्चैः संश्रावयेद् व्यूहसङ्केतान् सैनिकान्नृपः ॥ २६८ ॥

वामदक्षिणसंस्थो वा मध्यस्थो वाऽप्रसंस्थितः । सैनिकों को संकेतज्ञान कराने का निर्देश - अश्व, गज तथा पैदल सेना के सैनिकों को पृथक् २ बुलाकर व्यूह - रचना के संकेतों को राजा वाम,

दक्षिण, मध्य या अग्र भाग में स्थित होकर भली भांति सुना देवे ।

श्रुत्वा तान् सैनिकैः कार्यमनुशिष्टं यथा तथा ॥ २६ ९ ॥

संकेतों के अनुसार सैनिकों को कार्य करने का निर्देश - उन संकेतों को सुनकर जैसी आज्ञा हो उसके अनुसार सैनिकों को वैसा ही करना चाहिये ।

सम्मीलनं प्रसरणं परिभ्रमणमेव च ।

आकुचनं तथा यानं प्रयाणमपयानकम् ॥

पर्यायेण च सांमुख्यं समुत्थानं च लुण्ठनम् ।

संस्थानं चाष्टदलवच्चक्रवद् गोलतुल्यकम् ॥

संकेतानुसार स्थिति रखने का निर्देश – जैसे आज्ञानुसार हो जाना, फैल जाना, चारो ओर घूम जाना, सिकुड़ जाना, धीरे जल्दी २ चलना, पीछे हट जाना, पर्याय से संमुख हो जाना, लोटना, अष्टदल कमल की भांति पङ्क्ति बांध कर खड़ा होना गोलाकार में खड़ा होना सैनिकों को ये सब करना चाहिये ।

सूचीतुल्यं शकटवदधचन्द्रसमं तु वा ।

पृथग् भवनमल्पाल्पैः पर्यायैः पङ्क्तिवेशनम् ॥

शस्त्रास्त्रयोर्धारणं च सन्धानं लक्ष्यभेदनम् । मोक्षणं च तथाऽस्त्राणां शस्त्राणां परिघातनम् २७० ॥ २७१ ॥ कभी संमिलित २ गमन करना,. खड़े हो जाना,. , या चक्र भांतिः २७२ ॥ || २७३ ॥ और कभी सूची, शकट या अर्धचन्द्र के आकार का न्यूह बनाकर खड़ा रहना, पर्याय से थोड़ी २ सेना का अलग २ हो जाना या पंक्ति बांधकर बैठ.. जाना, शस्त्र तथा अस्त्रों का धारण करना, संधान करना और लचय का भेदन करना, अस्त्रों का छोड़ना, शस्त्रों का प्रहार करना, इन सबों को संकेतानुसार करना चाहिये ।

द्राक् सन्धानं पुनः पातो ग्रहो मोक्षः पुनःपुनः ।

स्वगूहूनं प्रतीघातः शस्त्रास्त्रपदविक्रमः ॥ २७४ ॥

संकेतानुसार बागादि चलाने आदि का निर्देश - संकेतानुसार बाणादि को २४० CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 456

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३७० शुक्रनीति: शीघ्रता के साथ धनुषादि पर चढ़ाना, फिर छोड़ना ' फिर छोड़ना ऐसा बार - बार करना, अपने को छिपाना , फिर ग्रहण करना योग्यतानुसार पैंतरा बदलते हुये प्रहार करना, शस्त्र तथा अस्त्रों और सुख भ द्वाभ्यां त्रिभिचतुर्भिर्वा, इन सबों को करना चाहिये का ' मकर तथा पङ्क्तिो गमनं तत्तः ॥ प्राग भवनं चापसरणं तूपसर्जनम् स संकेतानुसार गमनादि करने का निर्देश - कभी दो तीन ॥ २७५ ॥ हो भी

संख्या में पंक्ति बांधकर गमन करना, आगे हो जाना पीछे, या चार को , हट जाना मूलभा -स्थान पर पूर्ववत् स्थित हो जाना इन सर्वो को संकेतानुसार करे ।, यथा-अपसृत्यास्त्र / सद्ध्यर्थमुपसृत्य विमोक्षणे | ज प्राग् भूत्वा मोचयेदत्रं व्यूहस्थः सैनिकः सदा ॥ २७६ ॥ के मा

सदा व्यूहबद्ध होकर अस्त्रादि चलाने का निर्देश- - अस्त्र चलाने की सेनाप के लिये पीछे हटकर तथा छोड़ने के लिये समीप जाकर तथा सम्मुख सुविधा रहकर ज्यूहबद्ध सैनिक को सदा अस्त्र चलाना चाहिये । आसीनः स्याद्विमुक्तास्रः प्राग्वा चापसरेत् पुनः । स प्रागासीनं तूपसृतो दृष्ट्वा स्वास्त्रं विमोचयेत् ॥ २७७ ॥ रूप म

अस्त्र - प्रयोगादि के समय सैनिकों की स्थिति का निर्देश - सैनिक अस्त्र जिसके स ' छोड़ चुकने के बाद बैठ जावे अथवा आगे की ओर सरक जावे ॥ बैठे हुये शत्रु को देखकर उसके समीप जाकर अपने अस्त्र का प्रयोग

एकैकशो द्विशो वाऽपि सङ्घशो बोधितो यथा ।

कौश्वानां खे गतिर्यादृक् पङ्कितः संप्रजायते ॥ २७८

तादृक् संचारयेत् क्रौञ्च व्यूहं देशबलं यथा ।

सूक्ष्मग्रीवं मध्यपुच्छं स्थूलपक्षं तु पङ्कितः ॥ २७६

क्रौञ्चन्यूह के लक्षण - संकेत किये जाने पर जैसे आकाश में कौ पत्तियों की पंक्तिबद्ध स्थिति होती है वैसी एक २, दो २ या मार्ग और आगे करे । व्याल ॥ || उड़ने पर न्यूहर संघरूप से रणस्थ " पंक्तिबद्ध स्थिति में रहने के द्वारा क्रौञ्चव्यूह की रचना देश तथा सैन्य के म्यूहों: अनुसार करे । इसमें ग्रीवा भाग पतला, पुच्छभाग मध्यम तथा दोनों पक्षों के भाग मोटे रहते हैं । इसमें ऐसी सैनिकों की पंक्ति स्थिति रहती है । बृहत्पक्षं मध्यगलपुच्छं श्येनं मुखे तनु । श्येनभ्यूह के लक्षण - जिसके दोनों पक्षभाग विशाल हों और पुच्छभाग मध्यम हो एवं सुखभाग पतला हो, ऐसी यदि सैनिकों

हो तो उसे ' श्येनव्यूह ' कहते हैं ।

चतुष्पान्मकरो दीर्घस्थूल वक्त्रद्विरोष्ठकः ॥ २८० ॥

मकरव्यूह के लक्षण - जिसके ४ भाग में ४ पैर हों तथा दीर्घ श गला तथा ऊपर की पंकि जा स और मोटा CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 457

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ग्रहण करना शस्त्र तथा और को करना अन का

चाहिये ॥। २७५ ॥

तीन या चार की

हट जाना, यथा-नार करे ।

वदा ॥ २७६ ॥

चलाने की सुविधा तथा सम्मुख रहकर

पुनः ॥। २७७ ॥

देश- सैनिक अस्त्र जावे । और आगे

का प्रयोग करे ॥। २७८ ॥

1 ॥ २७६ ॥

बाकाश में उड़ने पर २ या संघरूप से देश तथा सैन्य के था दोनों पक्षों के हती है । और गला तथा सैनिकों की पंकि ॥ २५० ॥

दीर्घ और मोठा चतुर्थाध्याये सेनानिरूपण प्रकरणम् ३७१ भाग हो और उसमें दो ओष्ठ भाग हों । ऐसी पंक्ति में स्थित सेना को ' मकरग्यूह सुख ' कहते हैं । सूचीसूक्ष्ममुखो दीर्घ - समदण्डान्तरन्ध्रयुक् 1 सूचीमुख तथा चक्रव्यूह के लक्षण -- जिसका मुखभाग सूची के समान पतला हो और मध्यभाग समान भाव से दण्डाकार लम्बा हो, तथा अन्त में स्थित

सुलभाग में छिद्रयुक्त हो ऐसी सेना की पंक्ति को ' सूचीमुख ' व्यूह कहते हैं ।

चक्रव्यूहश्चैकमार्गो ह्यष्टघा कुण्डलीकृतः ॥ २८१ ॥

जो चक्राकार गोल हो एवं मध्य में आठ भागों में विभक्त कुंडली आकार के मार्ग बने हों एवं उसके अन्दर घुसने के लिये एक ही मार्ग हो तो ऐसी सेनापंक्ति को ' चक्रव्यूह ' कहते हैं

चतुर्दिवष्टपरिधिः सवतोभद्रसंज्ञकः ।

अमार्गश्वष्टवलयी गोलकः सर्वतोमुखः ॥ २८२ ॥

सर्वतोभद्र व्यूह के लक्षण - जिसके चारों दिशाओं में ८-८ रेखाकार परिधि-रूप में सेना की पंक्ति हो उसे ' सर्वतोभद्र ' व्यूह कहते हैं, अथवा सभी ओर जिसके मुख हों और जो आठ वलयाकार गोल पंक्तियों से युक्त एवं घुसने के मार्ग से रहित हो उसे भी ' सर्वतोभद्र ' न्यूह कहते हैं । शकट. शकटाकारो व्यालो व्यालाकृतिः सदा शकट व व्यालव्यूह के लक्षण - शकटाकार सेनापंक्ति को म्याल ( सर्प ) के आकार की सेनापंक्ति को ' व्यालम्यूह ' कहते सैन्यमल्पं बृहद्वाऽपि दृष्ट्वा मार्ग रणस्थलम् ॥ व्यूहैव्यू हैन व्यूहाभ्यां सङ्करेणापि कल्पयेत् । सैम्य की न्यूनता व अधिकतानुसार एवं युद्धभूमि के म्यूहरचना का निर्देश - सैन्य की न्यूनता तथा अधिकता रणस्थल भूमि को देखकर तदनुसार एक न्यूह अथवा दो । ' शकटव्यूह ' एवं हैं । २८३ || अनुसार १ या २ एवं मार्ग तथा या दो से अधिक

व्यूहों से मिश्रित व्यूह - रचना की भी कल्पना की जा सकती है ।

यन्त्राखैः शत्रुसेनाया भेदो येभ्यः प्रजायते ॥ २८४ ॥

स्थलेभ्यस्तेषु सन्तिष्ठेत् ससैन्यो ह्रासनं हि तत् । आसन के लक्षण व उस समय के कर्तव्य - जिन स्थलों से शत्रुसेना के ऊपर यन्त्रयुक्त अस्त्रों ( तोप आदि ) के द्वारा प्रहार करके उसका भेदन किया

जा सके उन स्थलों में सेना के सहित राजा के ठहरने को ' आसन ' कहते हैं ।

तृणान्न जलसम्भारा ये चान्ये शत्रुपोषकाः ॥ २६५ ॥

सम्यङ् निरुध्य तान् यत्नात् परितश्विरमासनात् । और तृण अन्न, जल आदि सामग्री तथा और भी जो वस्तुयें शत्रु की CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 458

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३७२ शुक्रनीति: सेना को आराम देनेवाली हों, उन सर्वो को आसन राजा यत्नपूर्वक बहुत दिनों तक चारो ओर से रोकता में ( घेरा डालकर ) दिसत तक न जाने देवे । रहे अर्थात् उन्हें शत्रु संक पता न विच्छिन्नविविधासारंप्रक्षीणयवसेन्धनम् || २८६ || व्यवहा विगृह्यमाणप्रकृति कालेनैव वशं नये । सन्धाय आसन के लक्षण - शत्रु की सेना में जाने - आने रोक देने पर एवं घास तथा जलाने की लकड़ी समाप्त होने के मार्ग को आदि अधिकारी वर्गों में आपस में विग्रह उपस्थित पर तथा मन्त्री उ करा देने पर थोड़े ही समय में शत्रु को वश में किया जा करा दे । हो जाने या भी अच अरेश्च विजिगीषोश्च विग्रहे हीयमानयोः सकता है । तब क्य || २८७ || सन्धाय यदवस्थानं सन्धायासनमुच्यते । अवश्य जब विजयार्थं आक्रमणकारी एवं शत्रु ( जिसके ऊपर आक्रमण किया जाय ) दोनों लड़ते २ क्षीण बल हो जाते हैं तब उन दोनों सन्धि अपने २ स्थान पर स्थित रहने को ' सन्धाय आसन ' कहते हैं 1 करके उ सिद्ध उच्छिद्यमानो बलिना निरुपायप्रतिक्रियः || २८८ | सोये ह कुलोद्भवं सत्यमार्थमाश्रयेत बलोत्कटम् | अपितु आश्रय के लक्षण - जब किसी बलवान शत्रु द्वारा राज्य उच्छिन्न कर दिया जाय था उसका अवसर आ जाय और उसके प्रतीकार का कोई उपाय न दिखाई पड़े तो राजा अत्यन्त बलवान, कुलीन, सभ्यप्रतिज्ञावाले एवं श्रेष्ठ आचरण से युक्त किसी दूसरे राजा का आश्रय लेकर शत्रु को परास्त करे । विजिगीषोस्तु साह्यार्थाः सुहृत्सम्बन्धिबान्धवाः || २८६ | भ प्रदत्तभृतिका ह्यन्ये भूपा अंशप्रकल्पिताः । और सैवाश्रयस्तु कथितो दुर्गाणि च महात्मभिः | २६० है परन विजय के लिये चढ़ाई करनेवाले राजा के सहायता के लिये उसके मिश्र, सुखा सम्बन्धी, बान्धव. तथा इनसे अन्य जीविकार्थ जागीर प्राप्त किये हुये लोग पैर रक किंवा ऐसे राजा जिनके लिये विजित राज्य में से नियत भाग दे देने का स्थिर किया गया हो, ये सब उचित होते हैं अतः इनके आश्रय में चला जाता किंवा किसी सुदृढ़ दुर्ग का आश्रय लेना इसी को विद्वानों ने ' आश्रय ' , कहा है ।

अनिश्चितोपायकार्यः समयानुचरो नृपः ।

द्वैधीभावेन वर्तेत काकाक्षिवदलक्षितम् ॥

प्रदर्शयेदन्यकार्यमन्यमालम्बयेच्च वा । में सब श्रेष्ठ ' स ६६१ || बाला किसी द्वैधीभाव के लक्षण - समय के अनुसार बर्ताव करनेवाला राजा जब तक CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 459

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 459 का मूल पृष्ठ
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धेरा डालकर हे ) स्थित अर्थात्उन्हें [ ॥ २८६ ॥

-आने के मार्ग ने पर को तथा मन्त्री करा दे । हो जाने सकता है । या ॥ २८७ ॥

ऊपर आक्रमण किया नों के सन्धि करके

हैं ॥। २८५ ॥

राज्य उच्छ कर कार का कोई उपाय त्यप्रतिज्ञावाले एवं

त्रु को परास्त करे ।

वाः ॥ २८६ ॥

| ॥ २६० ॥

लिये उसके मिश्र, नात किये हुये लोग ना दे देने का स्थिर व्य में चला जाना विद्वानों ने ' आश्रय ' । ६६१ ॥ राजा जब तक ला चतुथी ध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३७३ शत्रु उपाय निश्चित न कर सके तब तक किसी को न चल सके ऐसा कौवे के आंख की पुतली की तरह दोनों ओर का पता रक्खे । दिखावे में दूसरा कार्य और करने में दूसरा कार्य रक्खे । इसी व्यवहार

को ' द्वैधीभाव ' कहते हैं ।

सदुपायैश्च सन्मन्त्रैः कार्यसिद्धिरथोद्यमैः ॥ २६२ ॥

भवेदल्पजनस्यापि किं पुननृपतेर्नहि । उपाय करने से कार्य सिद्ध होने का निर्देश- -जब कि तुच्छ व्यक्ति के भी अच्छे उपायों, अच्छी सलाह एवं उद्यमों के द्वारा कार्य सिद्ध होते हैं तब क्या राजाओं के कार्य उन सर्वो के करने से नहीं हो सकते हैं अपितु

अवश्य हो सकते हैं ।

उद्योगेनैव सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ॥। २ ९ ३ ॥

न हि सुप्तमृगेन्द्रस्य निपतन्ति गजा मुखे । उद्योग की अवश्य कर्त्तव्यता का निर्देश - उद्योग करने से ही संपूर्ण कार्य सिद्ध होते हैं न कि केवल मनोरथ करने से क्योंकि देखा भी जाता है कि-सोये हुये व्याघ्र के मुख में बिना उद्यम के स्वयं हाथी नहीं गिर पड़ता है,

अपितु उसके लिये प्रबल उद्योग करना पड़ता है तभी कार्यसिद्धि होती है ।

अभेद्यमुपायेन द्रवतामुपनीयते ॥ २ ९ ४ ॥

लोकप्रसिद्धमेवैतद् वारि बहेर्नियामकम् ।

उपायोपगृहीतेन तेनैतत् परिशोष्यते ॥ २६५ ॥

उपायेन पदं मूर्ध्नि न्यस्यते मत्तहस्तिनाम् । अभेद्य ( कठिन से कठिन ) लोहा भी उपाय करने से पिघलाया जाता है । और लोक में यह प्रसिद्ध ही है कि जल अग्नि को बुझा देनेवाला होता है परन्तु यदि उपाय का अवलम्बन किया जाय तो वही अग्नि उल्टे जल को सुखा देनेवाली हो जाती है । उपाय से ही मतवाले हाथी के भी मस्तक पर

पैर रक्खा जाता है ।

उपायेषूत्तमो भेदः षड्गुणेषु समाश्रयः ॥ २६६ ॥।

कार्यौ द्वौ सर्वदा तौ तु नृपेण विजिगीषुणा ।

• ताभ्यां विना नै कुर्याद् युद्धं राजा कदाचन ॥ २ ९ ७ ॥

भेद और समाश्रय की श्रेष्ठता का निर्देश - शत्रु को जीतने के लिये उपाय मैं सर्वोत्तम उपाय ' भेद ' ( फूट डालना ) है तथा सन्धि आदि षड्गुणों में श्रेष्ठ ' समाश्रय ' ( बलवान का आश्रय ) माना गया है । अंतः विजय चाहने-वाला राजा सर्वदा इन दोनों को करे । इन दोनों का बिना सहारा लिये राजा किसी शत्रु के साथ कभी युद्ध न करे । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा, पृष्ठ 460 का मूल पृष्ठ
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३७४ शुक्रनीति: परस्परं प्रातिकूल्यं रिपुसेनपमन्त्रिणाम् । भवेद् यथा तथा कुर्यात् तत्प्रजायाश्च तत्त्रियाः जिस रीति से शत्रु के सेनापति और मन्त्रियों में ॥ २६८ ॥ पर

जाय एवं शत्र की प्रजा के साथ और रानियों के साथ किंवा परस्पर अमपन हो करते मन्त्रियों का अपनो २ सन्तान या स्त्रियों के साथ परस्पर सेनापति और सत्रिय रीति का अनुसरण राजा को करना चाहिये । अनवन हो जाय उस विरुद्ध

उपायान् षड्गुणान् वीक्ष्य शत्रोः स्वस्यापि सर्वदा ।

युद्धं प्राणात्यये कुर्यात् सर्वस्वहरणे सति ॥ २६६ ॥

छाचारी होने पर युद्ध करने का निर्देश – प्रथम शत्रु के तथा अपने बीच में खूब विचार कर सामादि उपार्यो तथा सम्धि आदि षड्गुणों में जो उचित अधर्म हो उनका प्रयोग करे किन्तु जब प्राण संकट अथवा सर्वस्व का हरण उपस्थित करते हो जाय तब लाचारी से युद्ध करे । atfar

युपपत्तौ च गोविनाशेऽपि ब्राह्मणैः ।

प्राप्ते युद्धे कचिन्नैव भवेदपि पराङ्मुखः ॥ ३०० ॥ ३

स्त्री, गौ, ब्राह्मण के रक्षार्थं युद्ध न करने से हानि - स्त्री तथा ब्राह्मण के सन्निय ऊपर अनुग्रह करने के लिये किंवा गौ या ब्राह्मण का विनाश उपस्थित होने पर रक्षार्थं युद्ध करने में कभी भी नहीं मुख मोड़ना चाहिये । र युद्धमुत्सृज्य यो याति स देवैर्हन्यते भृशम् | घर में यदि कोई ऐसे समय में युद्ध छोड़ कर भाग जाता है तो उसका देवगण उक्त प्र • अधिक विनाश करते हैं । समोत्तमाघमै राजा त्वाहूतः पालयन् प्रजाः न निवर्तेत संग्रामात् क्षात्रधममनुस्मरन् । किसी के ललकारने पर चन्त्रिय को अवश्य युद्ध करने का पालन करता हुआ राजा अपने समान या अपने से बलवाले किसी शत्रु के ललकारने पर क्षत्रिय धर्मं का ख्याल

साथ युद्ध करने से न हटे ।

राजानं चावियोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम् ॥

भूमिरेतौ निर्मिलति सर्पो बिलशयानिव । युद्ध से पीछे हटनेवाला राजा एवं प्रवास करने से करनेव || ३०१ || का निर्देश - प्रज्ञा उत्तम किंवा हीनः मर ज करता हुआ उसके न मा वध क ३०२ || सुख सोदनेवाला ब्राह्मण इन दोनों को पृथ्वी उस भांति निगल जाती है जिस भांति से सर्प राजा अन्त बिल में रहनेवाले मुझे आदि को निगल जाता है । जाते ब्राह्मणस्यापि चापत्तौ क्षत्त्रधर्मेण वर्ततः ॥ ३०३ ॥

प्रशस्तं जीवितं लोके क्षत्त्रं हि ब्रह्मसंभवम् । CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri