शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 61–70

शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 61–70

पृष्ठ 61

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I १६६. गयों का " " दि के : " तों ल्य १६७. 39 गत् का प्र 19 के " १६८ नी " " श 37 I क १६ ९. 13 T 33 स्त्री वशवर्तिनी बने इसके उपाय व्यवसाय ' साधन, व्यय, लाभ आदि का विचारकर प्रवृत्त होने का निर्देश अधिक व्ययवाले कार्यों को न करने तथा लाभवाले कार्यों को करने का निर्देश तपस्यादि में प्रतिनिधि बनाने में हितकारिता के अभाव का निर्देश मघुरभोजी आदिको निर्जनता आदि की इच्छा रखने का निर्देश मूर्ख जनों के कृत्य सत्वगुणी तेज की सर्वाधिक-श्रेष्ठता का निर्देश स्वकर्म से ब्राह्मण की सर्वाधिक महत्ता का निर्देश स्वधर्मस्थ ब्राह्मण से क्षत्रियादि के डरने का निर्देश धर्म को हानि न पहुँचनेवाली वृत्ति की श्रेष्ठता कृषिवृत्ति की सर्वाधिक उत्तमता भिक्षा की अधमता तथा कचित् भिक्षा व सेवा की भी उत्तमवृत्तिता आध्वयंवादि कर्मों से महाधनी न बन सकने का निर्देश बिना राजसेवा के विपुल धन-प्राप्ति न होने एवं राजसेवा की अतिशय कठिनता का निर्देश राजाओं के साथ सर्प की भांति ( ११ ) १६ ९ सतर्कता से व्यवहार करने का निर्देश १७२ दूर रहते हुई भी समीपस्थ की " भांति कार्यं करनेवालों का निर्देश १७३ वेदादि के पण्डितों का बिना १७० नीतिशास्त्र के चतुर न बनने का निर्देश " प्रथम निर्धनतादि के बाद धनी " 1 आदि होने में सुख प्राप्ति का निर्देश 33 मृतापत्यता आदि से अनपत्यता आदि की श्रेष्ठता का निर्देश.. " 1 १७१ प्रथम सुखकर पश्चात् दुःखकर विषयों का निर्देश १७४ कुमन्त्री आदिकों से राजादिकों " के नाश का निर्देश शिक्षकानुसार हस्त्यादि का सद्-१७२ " गुणादि के धारण करने का निर्देश अधिकार प्राप्त होने पर स्वयं प्राप्त होनेवाली ३ बातें " गृहस्थियों के सुखदायक विषयों का निर्देश १७५ अन्तःपुर में नियुक्त करने योग्य पुरुषों के लक्षण " समय बांधकर कार्य करने आदि का एवं अर्थ और धर्म में आत्मादि को नियुक्ति करने का निर्देश 19 प्रवास के समय में सुखदायी अनपत्य भार्यादि ६ का निर्देश " CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 62

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( राजा को भी शान्त घोड़े आदि से भी बाजार के अन्दर न जाने का निर्देश १७६ पथिकों को यात्रा के समय कत्तं-व्या- कर्तव्य विषयों का निर्देश 21 शीघ्र वृद्धता लानेवाले विषयों का निर्देश " प्रिय होने के उपाय अप्रिय होने के कारणों का निर्देश " 3 स्तुति से देवता के वशवर्ती होने का निर्देश " स्वदुर्गुणों का स्वयं विचार करने का निर्देश १७७ महान् पुरुष के लक्षण " साधु पुरुष तथा खल पुरुष के लक्षण " कलहकारक क्रीडा आदि करने का निषेध १७८ मित्र के प्रति कर्त्तव्याकर्तव्य विषयों का निर्देश 19 बलवान के प्रति विपरीत बातें न करने का निर्देश 33 मनुष्य को आपत्ति पड़ने पर कर्त्तव्य कर्मों का निर्देश वृद्धजनों के अनुकूल वचन - बोलने का एवं किसी की स्त्री को घूर कर न देखने का निर्देश १७ ९ अन्य के अपराधी बालक को 14 दण्ड न देने का निषेध ग्राम को छोड़कर अन्यत्र वास करने की अवस्थाओं का निर्देश १२ ) बिना जज की आज्ञा के वादी-प्रतिवादी के विषय में सत्यासत्यादि बातें न कहने का निर्देश १७ ९ अन्य के विवाद को ग्रहण कर किसी के संग विवाद न करने का निर्देश " बिना शास्त्रज्ञान के न करने योग्य विषयों का निर्देश १५० पारतन्त्र्य से बढ़कर दुःख और स्वतन्त्रता से बढ़कर सुख न होने का निर्देश " प्रत्यक्षादि ४ प्रमाणों से व्यवहार ज्ञान होने का निर्देश " } मित्र और शत्रु के प्रकारों का निर्देश १५१ ४ पादों से युक्त उत्तम मित्र के लक्षण " बैरभाव रखनेवालों के दो लक्षणों का निर्देश १८२ परम शत्रु और एकतरफा शत्रु भाइयों के लक्षण " राजाओं की परस्पर कृत्रिम - 3 मित्रता का निर्देश I सहज मित्र कहलानेवालों का निर्देश १८३ विद्यादि ५ की सहज मित्रता सार्थक पुत्र के लक्षण " • स्वाभाविक शत्रु के लक्षण " परस्पर शत्रु कहलानेवालों का निर्देश 8 " मूर्ख पुत्रादिकों की शत्रु संज्ञा का निर्देश मुखों के नि राजाअ उ ल मित्र अ रा नि मित्रादि वि क मित्रता नि मित्र के भेद तथ उदासी शत्रु क ल शत्रु के नि शत्रु के शत्रु के मित्र, श क नि सामादि f शत्रुभेद स मित्र क 5. क CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 63

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दो-१७ ९ कर इन " ग्य १५० गैर सुख " र " } का १८१ के 33 गों १८२ त्रु ": न-21 १८३ T " T 39 T मूखों के लिए उपदेश देने का निषेध राजाओं के स्वाभाविक शत्रु-उदासीन - मित्र राजाओं के लक्षण मित्र और शत्रु राजाओं के प्रति राजाओं के आचरण का निर्देश मित्रादि के प्रति सामादिकों का विचार स्वयुक्तियों से करने का निर्देश मित्रता होने के कारणों का निर्देश मित्र के लिये साम तथा दान वाक्यों के लक्षण भेद तथा दण्ड - वाक्यों के लक्षण उदासीन के शत्रु बनने का निर्देश शत्रु के प्रति सामवाक्य के लक्षण शत्रु के लिए दान का स्वरूप-निर्देश शत्रु के प्रति भेद का स्वरूप-निर्देश • शत्रु के प्रति दण्ड का स्वरूप-निर्देश मित्र, शत्रु तथा उदासीन राजाओं को बलवान् न होने देने निषेध सामादिकों को करने में क्रम का निर्देश शत्रुभेद से सामादिकों की व्यव-स्था का निर्देश मित्र के लिये केवल साम - दान के प्रयोग का निर्देश ( १३ ) रिपु - पीड़ित प्रजाओं का साम-१५४ दान से संग्रह करने का निर्देश १८७ स्वप्रजाओं का साम - दान से पालन " का निर्देश प्रजाओं के साथ दण्ड तथा भेद के प्रयोग से राज्य - नाशका निर्देश १८८ दण्ड के लक्षण दण्ड के भेद का निर्देश 19 १८५ दण्ड के प्रभाव एवं राजा को धर्मरक्षार्थं दण्डधर होने का 33 निर्देश " घमण्डी आदि गुरुजनों को भी " दण्ड देने का निर्देश १८ ९ 11 दुष्टों की हिंसा को अहिंसा मानने 27 का निर्देश 33 उचितानुचित दण्ड देने से राजा १८६ के इष्टानिष्ट - फलकथन का निर्देश 33 " } सत्ययुगादि में दण्ड का अभाव एवं त्रेतादियुगों में क्रम 39 पूर्ण, पौन एवं अर्ध दण्ड I १८७ सकारण निर्देश १ ९ ० राजा को युगप्रवर्तक होने का निर्देश " धार्मिक तथा अधार्मिक प्रजाओं के होने के कारणों का निर्देश " पापी राजा के राज्य में समय पर वृष्टि न होने का निर्देश १ ९ १ स्त्रैण और क्रोधी होना राजा को निषिद्ध होने का निर्देश 21. राजा को काम - क्रोध त्याग करने " का निर्देश " CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 64

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( काम, क्रोध तथा लोभ त्याग कर दण्ड देने का निर्देश १ ९ १ ' राजा ऊपर से क्रूर होकर दण्ड देवे ' इसका निर्देश 23 चुगलखोरों से देश नष्ट होने का निर्देश १ ९ २ उत्तम राजा के लक्षण तथा स्वयं दोषमुक्त होने का निर्देश " अपराध के ४ भेद पुनः प्रत्येक के दो दो भेदों का निर्देश " पुनः उक्त अपराधों के २ भेद एवं सभी अपराधों के पुनः ४ भेदों का निर्देश " मानसिकादि ४ अपराधों की परीक्षा का निर्देश १ ९ ३ दण्ड के योग्य पुरुषों के लक्षण " उत्तम पुरुष के विषय में प्रथमादि अपराधों के दण्डों का एवं अन्त में जेल देने का निर्देश " संरोध और नीच कर्म के योग्य पुरुष के लक्षण १ ९ ४ शास्त्रोक्त दण्डनीय पुरुषों के लक्षण " आजीवन बन्धन योग्य पुरुष के लक्षण " मार्गो पर झाडू लगाने योग्य पुरुष के लक्षण १ ९ ५ अधम पुरुषों के बारम्बार अपराध करने पर दण्ड का प्रकार धनवर्ग से अपराध करने पर दण्ड का निर्देश 11 बन्धन तथा ताडन योग्य के लक्षण १ ९ ६ १४ ) पतली रस्सी या छड़ी आदि से मारने योग्य के लक्षण नीच कर्म कराने योग्य अपराधी का निर्देश वध की शिक्षा कदापि न देने का निर्देश अपराधी के असहाय आदि को दण्ड न देना देशनिष्काशन योग्य अपराधी मार्ग - संरक्षण योग्य का निर्देश संसगं से दूषित को दण्ड देकर सन्मार्ग की शिक्षा देने का निर्देश राजादिकों से बिगाड़ करनेवाले को शीघ्र नष्ट कर देने का निर्देश गणों की दुष्टता करने पर उपाय अधर्मशील राजा को सदैव भय दिलाने को प्रजा के लिये निर्देश अधर्मशील राजा और प्रजा के तत्काल नष्ट हो जाने का निर्देश माता आदि के भरण - पोषण का त्याग करनेवाले के लिये दण्ड का निर्देश उत्तमादि साहस दण्ड के एवं पण आदि के लक्षण कोश के लक्षण सुखप्रद कोश का निर्देश दुःखप्रद कोश का निर्देश अन्यायोपार्जित कोश के दुष्टफलों का निर्देश - सुपात्र १ ९ ६ का अधर्मशी " का " } देवोत्तर धन 21 आपत्ति १ ९ ८ नि १ ९९ आपत्ति घ प्रबल द " कोश स प्रजा - सं राष्ट्र " नीति - नि 13 य श्रेष्ठादि नीचादि प्रजा क क धान्य - स २०० नि संग्रह प ओषधि " / स , " संगृहीत २०१ व स्वकाय f " संचय २०२ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 65

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से १ ९ ६ राधी " का " को 22 १ ९ ८ I १ ९९ कर का 3 का " नाय 11 भय लिये E के का २०० का लिये एवं " २०१ " " लों २०२ - सुपात्र तथा अपात्र के लक्षणादि का निर्देश अधर्मशील राजा के धन को हर लेने का निर्देश -शत्रु के अधीन राज्य होने के कारणों का निर्देश देवोत्तर- संपत्ति पर कर लगाकर धन न बढ़ाने का निर्देश आपत्ति में अधिक कर बढ़ाने का निर्देश आपत्तिरहित होने पर सूद सहित धन वापस करने का निर्देश प्रबल दण्ड से अनिष्ट फल कोश संग्रह करने का प्रमाण प्रजा - संरक्षण के फल राष्ट्रवृद्धि के तीन कारण नीति - निपुणता से कोशवृद्धि का यत्न करने का निर्देश श्रेष्ठादिनृप के ३ लक्षण नीचादि धन के लक्षरण प्रजा के सन्ताप से सवंश राजा के नाश का निर्देश धान्य - संग्रह करने के प्रमाण का निर्देश संग्रह योग्य धान्य आदि की परीक्षा का निर्देश ओषधि आदि सब वस्तुओं का संचय करने का निर्देश संगृहीत धन की यत्न से रक्षा करने का निर्देश स्वकार्य में सदा सजग रहने का निर्देश ( १५ ) मूर्ख के लक्षण २०७ २०२ राजा को परीक्षकों से स्वयं रत्न की परीक्षा कराने का " निर्देश " हीरा आदि नव महारत्नों का " निर्देश २०५ नवरत्नों के वर्ण और नवग्रहों " का निर्देश सम्पूर्ण रत्नों में वज्र ( हीरा ) " रत्न की श्रेष्ठता का निर्देश २० ९ श्रेष्ठ रत्नों के लक्षण २०३ असत् रत्न के लक्षण 33 पुत्रार्थिनी को वज्र धारण करने 32 का निषेध तथा बहुत दिन " 3 धारण किये मोती और मूंगा २०४ केहीन होने का निर्देश 11 दोषवजित रत्न के लक्षण २१० 11 मूल्य अधिक और कम होने के " " २०५ " " २०६ " २०७ कारण 11 मौक्तिक की उत्पत्ति के स्थानों का निर्देश मोती के रंग और भेद का निर्देश " कृत्रिम मोती के निर्माण का स्थान २११ मोती की परीक्षाविधि - निर्देश " रत्नों का तुलामान निर्देश वज्र का मूल्य- विचार २१२ काले और रक्त बिन्दुवाले रत्न के न धारण का निर्देश २१३ माणिक्यादिकों का मूल्य - विचार,, गोमेद के उन्मान के योग्य न होने का निर्देश " संचय की रक्षा न कर सकने पर अत्यन्त गुण वालों का मान से मूर्खता होने का निर्देश " मूल्य न होने का निर्देश CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 66

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( मोतियों की मूल्य- कल्पना २१३ मोती के भेद और लक्षण २१४ सुवर्णादि सात धातुओं का निर्देश सुवर्णादि ७ धातुओं के तरतम भाव 33 स्वर्णादि धातुओं के गुण २१५ घातुओं के मूल्य का प्रमाण " अधिक मूल्य गौ के लक्षण " बकरी आदि के मूल्य का प्रमाण २१६ गौ आदि के उत्तम मूल्यों का निर्देश 32 हाथी आदि के उत्तम मूल्यों का निर्देश उत्तम अश्व आदि के लक्षण.. और मूल्य का निर्देश " देश - कालानुसार सबों की मूल्य-कल्पना करने का निर्देश २१७ शुल्क के लक्षण वस्तुओं के शुक्ल को एक बार ही ग्रहण करने का निर्देश " किसान से भाग ( मालगुजारी ) लेने का प्रमाण २१८ उत्तम कृषिकृत्य के लक्षण " तडागादिकों से संपन्न भूमि से ग्राम राजभाग का तारतम्य निर्देश 22 रजतादियुक्त भूमि के लिये राज-भाग - नियम २१ ९ तृणकाष्ठादिविक्रेता आदि से २० वीं भाग कर लेने का निर्देश 21 बकरी आदि की वृद्धि से ८ वां भाग लेने का निर्देश १६ ) कारु आदि से कर लेने के प्रकार का निर्देश भूमिभागादि को तत्काल लेने का निर्देश किसान को भागपत्र लिख देने का एवं ग्राम के किसी धनी को प्रतिभू बनाकर उसी से कर लेने का निर्देश कचित् कर लेने के निषेध का निर्देश व्यापारी आदि से लाभ का ३२ af भाग लेने का निर्देश दूकानदार आदि से भूमि का कर लेने का निर्देश राष्ट्र के दो प्रकारों का निर्देश राज्य तथा राजा की सर्वश्रेष्ठता एवं देवतुल्यता का निर्देश राजा को देश के पुण्य और पाप का भोक्ता होने का निर्देश नरक के लक्षण का निर्देश राजा के धर्मिष्ठ बनने का निर्देश सर्वधर्म - रक्षण से देश - रक्षा होने का निर्देश मुख्य जाति के ४ प्रकारों का तथा संकरता से जाति की अनन्तता का निर्देश जरायुजादि चार प्राणियों की जाति का निर्देश | द्विजों तथा ब्राह्मणों के कर्मों का निर्देश क्षत्रिय और वैश्य के कर्मो का निर्देश शूद्रादि के कर्मों का निर्देश ब्राह्मण २१ ९ f ब्राह्मण २२० f I द्विजाि " गुरु क मुख्य " विद्या विद्या " २२१. वेदों मीमां " ६ वेद क 25 मन्त्र २२२ ऋग्वे " यजुर्वे " सामव अथर्व " आयुव धनुर्वेद गान्धव २२३ तन्त्र शिक्षा कल्प व्याक नियत ज्यौत २२४ छन्द 19 सीमा CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 67

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कार २१ ९ का २२० चनी 7 सें का " ३२ " कर २२१. श " 1 उता श 33 पाप २२२ " देश II का २२३ क " का 33 २२४ " ब्राह्मणादि के लिये कृषि - भेद का निर्देश ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य को भिक्षा निन्दित होने का निर्देश द्विजाति को साङ्गवेद पढ़ने का निर्देश गुरु का लक्षण मुख्य विद्या ३२ और कला ६४ ४ होने का निर्देश विद्या और कला के लक्षण विद्याओं में वेद तथा उपवेद के नामों का निर्देश वेदों के ६ अंगों का निर्देश मीमांसादि विद्याओं के नामों का निर्देश ( १७ ) तर्क लक्षण २२४ सांख्य लक्षण वेदान्तलक्षण * योग लक्षण , इतिहास लक्षण पुराण लक्षण 33 स्मृति लक्षण २२५ नास्तिक मत लक्षण अर्थशास्त्र लक्षण कामशास्त्र लक्षण शिल्पशास्त्र लक्षण अलङ्कार शास्त्र लक्षण 33 काव्य लक्षण " देशभाषा लक्षण अवसरोक्ति लक्षण " यावन ग्रन्थ तथा मत २२८ २२ ९ " " २३० " " " 11 २३१ " " लक्षण " वेद के मन्त्र और ब्राह्मण दो भागों- देशादि धर्म लक्षण का निर्देश मन्त्र और ब्राह्मण के लक्षण ऋग्वेद के लक्षण यजुर्वेद के लक्षण सामवेद के लक्षण अथर्ववेद के लक्षण आयुर्वेद के लक्षण धनुर्वेद के लक्षण गान्धर्ववेद के लक्षण तन्त्र या आगम के लक्षण शिक्षा के लक्षण कल्प के लक्षण व भेद व्याकरण के लक्षण निरुक्त के लक्षण ज्योतिष लक्षण छन्द लक्षण सीमांसा लक्षण २ शु ० सूची २२६ 33 गान्धवं वेदोक्त ७ कलायें २३२ " आयुर्वेदोक्त १० कलाओं के लक्षण,, धनुर्वेदोक्त ५ कलाओं के लक्षण २३३ 31 पृथक् ४ कलाओं के लक्षण २३४ " तडागकूपादि कलाओं के लक्षण. " " ४ आश्रमों का नाम निर्देश २३७ २२७४ आश्रमों में कृत्यों का निर्देश " " स्त्री और शूद्र को देवपूजादि न " करने का निर्देश २३८ " स्त्रियों के लिये पतिसेवा से अन्य धर्म का निषेध " " 1 स्त्रियों के नित्य कृत्यों का निर्देश. २२८ साध्वी स्त्रियों को पैशुन्यादि - त्याग 13 का निर्देश 57 यथोक्त पतिसेवा से - " जाने का निर्देश 33 २४० पतिलोक " CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 68

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स्त्रियों के नैमित्तिक कृत्यों का निर्देश रजस्वला स्त्री की शुद्धि के समय का निर्देश पतिव्रता स्त्रियों के कर्तव्यों का निर्देश पति के समान अन्य स्वामी और पति- सेवा समान अन्य सुख ... का निषेध शुद्र धर्म का निर्देश संकर जाति के नियम का निर्देश राजा को स्वर्णकारादिकों को : सदा कार्य में नियुक्त करने निर्देश मदिरागृह को ग्राम से पृथक रखने का निर्देश दिन में मद्य पीने के निषेध का निर्देश वृक्षारोपण और पोषण के नियम • ग्राम्य वृक्षों के नामों का निर्देश ( १८ ) जात्यनुकूल पूज्य देव तथा गुरु २४० के गृह बनाने के स्थान का निर्देश २४१ ग्राम के चौराहे पर विष्णु आदि के मन्दिर बनाने का निर्देश मेरु आदि मन्दिर के १६ प्रकारों का लक्षण निर्देश मेर्वादिकों के अनुसार उनके मण्डपों के प्रमाणों का २४२ निर्देश ध्यान योग में प्रतिमा की साधन-मुख्यता का निर्देश बालू से लेकर धातु पर्यन्त की बनी प्रतिमाओं की उत्तरो-२४३ उत्तर स्थिरता की अधिकता का निर्देश २४४ शास्त्रोक्त तथा अन्यथा रीति से प्रतिमा के फ " देव - प्रतिमा की शुभकारिता II मानव प्रतिमा की अशुभ-II कारिता का निर्देश बगीचा लगाने के स्थान का सात्विकी आदि तीन प्रकार की निर्देश वृक्षों को ऋतुभेद से सींचने के समयों का निर्देश वृक्ष के नष्ट न होने का उपाय वृक्षों के फल - पुष्प - वृद्धि का उपाय आरण्य - वृक्षों के रोपण के स्थान और नामों का निर्देश कूपादि में उतरने योग्य सीढ़ियों के बनाने का निर्देश ' देश में विपुल जल होने एवं पुल आदि बनवाने का प्रबन्ध करने का निर्देश २४५ प्रतिमाओं का निर्देश ' साविकी प्रतिमा के लक्षण " राजसी प्रतिमा के लक्षण " 3 तामसी प्रतिमा के लक्षण I अंगुलादिकों के प्रमाणों का निर्देश वामनी, मानुषी, देवी, राक्षसी " प्रतिमाओं के लक्षण. स्त्री देवता तथा वामन भगवान २४६. की प्रतिमा की ऊंचाई का t प्रमाण नर - नारायणादि की प्रतिमाओं की " ऊंचाई का प्रमाण चण्डी ३ २४७ असुरों " I " बाल ". ह " 1 सत्ययु E ९ ता २४८ रम्य प 13 रम्य ३ मतान्त E " अवयव अवयव " 1 अवयव प्रतिम प्रतिम 11 योग्यत देवर्मा २४ ९ म जिल " a " प्रासा "२५० मन्दिर " प्रासाव प्रतिम " प्रतिम CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection Digitized by eGangotri '

पृष्ठ 69

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गुरु का २४७ दि 31 } } न का २४८ न. " की रो-ar s से ay 8 . भ-11 २४ ९ 11 " देश २५० सी E न का क ( चण्डी आदि की प्रतिमाओं को ऊंचाई के प्रमाण २५० असुरों की प्रतिमा की ऊँचाई का प्रमाण बाल तथा कुमार मावकी प्रतिमा. की ऊंचाई का प्रमाण २५१ सत्ययुगादि - भेद से प्रतिमा की ऊंचाई के प्रमाण में भेद " ९ ताल प्रमाण ऊँची प्रतिमा के अवयवों के प्रमाणों का निर्देश 31 रम्य प्रतिमा के लक्ष २५३ रम्य तथा अरम्य प्रतिमा का अन्तर मतान्तर से रम्य और अरम्प के अन्तर 11 अवयव की आकृति का वर्णन 31 अवयवों के अन्तर का प्रमाण २५४ अवयवों की परिधि का प्रमाण २५५ प्रतिमा की दृष्टि का प्रमाण २५६ प्रतिमा के आसन का प्रमाण २५७ योग्यतानुसार द्वारादि का प्रमाण " देव मन्दिर की ऊंचाई का प्रमाण: " -मंजिल तथा प्रासाद की आकृति आदि का निर्देश " प्रासाद के उत्तमादि ३ भेदों का निर्देश मन्दिर के स्तम्भों का प्रमाण तथा निषेध का निर्देश 13 प्रासाद के भीतरी विस्तार का विचार २५८ प्रतिमा के वाहन, रूप तथा आयुध के स्थान का विचार 17 प्रतिमा के अनेक मुख होने पर " व्यवस्था का निर्देश १६ ) अनेक भुजाओं की व्यवस्था २५८ ब्रह्मा के मुखों की व्यवस्था २५ ९ हयग्रीवादिकों की आकृति विषयक. विचार अनिष्टकारक प्रतिमा के लक्षण 33 सौख्यदायक प्रतिमा के लक्षण " } सात्विक प्रतिमाओं का वर्णन २६० लक्षणों के अभाव में भी दोषरहित प्रतिमा का निर्देश 29 प्रमाण तथा दोषरहित प्रतिमा का निर्देश २६१ युगभेद से वर्णभेद का कथन " वर्णभेद से सात्विकी आदि # प्रतिमाओं का निर्देश " युगभेद से सौवर्णादि का प्रतिमा-विभाग - निर्देश अनुक्त प्रतिमा के स्थापन का निषेध " 1 | भक्त पूजक के तपोबल से प्रतिमा- 29 दोषों के नष्ट होने का निर्देश २६२ वाहन - स्थापन तथा वाहनों के लक्षणविषयक निर्देश गणेश की मूर्ति के लक्षण तथा अवयवों का प्रमाण २६३ स्त्रियों के अवयवों का प्रमाण २६५ सबों के मुख कां प्रमाण 33 बालक - प्रतिमा के अवयवों का प्रमाण शरीर की पूर्णता होने का वर्ष-प्रमाण २६६ सप्त ताल प्रमाण की मूर्ति के अवयवों का प्रमाण ' 11 आसुरी आदि मूत्तियों के लक्षण २६७ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 70

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शिल्पी को कभी मूत्तियों की वृद्ध-सदृश कल्पना न करने निर्देश राजा को उक्त देवताओं का स्थापन करके प्रतिवर्ष उनका उत्सव करने का निर्देश मानहीन और भग्न प्रतिमा को रखने का निषेध प्रजाकृत उत्सवों का सदैव पालन करने का निर्देश राजा को प्रजा -सुख से सुखी और प्रजा दुःख से दुखी होने का निर्देश शत्रु, दुष्ट तथा प्रजापालन के लक्षण शत्रुनाश और दुष्टनिग्रह का लक्षण व्यवहार - लक्षण राजा को प्राड्विवाकादि के साथ व्यवहारों को देखने का निर्देश पक्षपात के ५ कारणों का निर्देश राजा के अनिष्टकारक हेतुओं का निर्देश स्वयं कार्य - निर्णय न कर सकने पर योग्य ब्राह्मण को नियुक्त करने का राजा को निर्देश ब्राह्मण न मिलने पर क्षत्रियादि * नियुक्त करने का एवं शूद्र को न नियुक्त करने का निर्देश सभासद के लक्षण राजा के द्वारा निर्णय योग्य पुरुषों के लक्षण राजा को द्विजाति आदिकों का स्वयं निर्णय न करने का निर्देश ( २० ) यज्ञ - सदृश सभा के लक्षण सभा में सुननेवालों में वैश्यों के २६८ रहने का निर्देश सभा में जाने का नियम सभा में निर्णय करनेवालों का क्रम - निर्देश निर्णायकों का तारतम्य 23 निर्णय करने में समर्थ पुरुष के लक्षण " धर्म का लक्षण अनुचिन्तन प्रकार का निर्देश २६ ९ दश साधनों का निर्देश यज्ञतुल्य सभा के द्वितीय लक्षण I का निर्देश दशाङ्गों के कर्मों का पृथकू २ निर्देश गणक तथा लेखक के लक्षण धर्माधिकरण के लक्षण का निर्देश " २७० राजासभा में प्रवेश करने का प्रकार सभा में राजा के कृत्यों का " निर्देश राजा को पूर्ण विचारपूर्वक सब धर्मों की रक्षा करने का 11 निर्देश देश - जाति - कुलधर्मो का पालन करने का निर्देश २७१ देश - जाति - कुलधर्मों के उदाहरणों का निर्देश कलियुग में महादण्ड के योग्यों " का निर्देश. न्यायादिकों के समय का निर्देश मनुष्यमारणादिकों में समय के २७२ नियम में अभाव का निर्देश CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri २७३ राजा " अर्थी " } खेख 17 राजा " २७४ राजा 7 प्राड् व्यव २७५ राज 11 राजा 11 २७६ स्तो सूचन दश राज " दण्ड 17 आवे २७७ पूर्वप 13 "