शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 71–80
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 71–80
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२७३ के " " } ST SP के २७४ " " " r २७५ R " " श " T २७६ T " " " २७७ 11 T " राजा के समक्ष कार्य निवेदन करने के प्रकार का निर्देश अर्थी के लिए राजा के कार्यों का निर्देश खेखक के कृत्यों का वर्णन राजा को अन्यथा लेख लिखने. वाले को दण्ड देने का निर्देश राजा के अभाव में प्राड्विवाक को पूछने का निर्देश प्राड्विवाक शब्द के अर्थ का निर्देश व्यवहार पद का कथन राजा या राजपुरुष को स्वयं . व्यवहार को पैदा करने का निषेध राजा को छलादि का विना निवेदन किये भी ग्रहरण करने का निर्देश स्तोभक के लक्षण सूचक के लक्षण पञ्चाशत् ( ५० ) छलों का वर्णन दश अपराधों का वर्णन राजा द्वारा ज्ञेय २२ पदों का वर्णन दण्ड योग्य वादी के लक्षणों का निर्देश आवेदन पत्र के लक्षण तथा सबके बोध - योग्य भाषा ( बयान ) का निर्देश पूर्वपक्ष को बिना शुद्ध किये उत्तर दिलानेवाले अधिकारी को अधिकार च्युत करने का " निर्देश. ( २१ ) पूर्वपक्ष पूर्ण होने पर वादी को २७८ रोक देने का निर्देश २५३ जब तक राजाज्ञा न हो तब तक 31 प्रत्यक्षी को रोक देने का 33 निर्देश २८४ ४ प्रकार के आसेधों का वर्णन 19 जिस पर अपराध की शंका या 29 जो अपराधी हो उसी को वुलाने के लिये राजा का २७ ९ निर्देश " अपराधियों को बुलाने के लिये 33 असमर्थादि भृत्यों को न " बुलाने का निर्देश २८५ हीनपक्षादि स्त्रियों को भी न बुलाने का निर्देश " 3 " निर्देष्टुकाम ( विवाहोद्यत ) आदि को मासेध ( बुलाने ) का निषेध " आने में असमर्थ लोगों को सवारी २५० " २८१ २८२ 33 " २८३ से बुलवाने का निर्देश २८६ अर्थी प्रत्यर्थी के अन्य कार्य में व्यस्त रहने पर प्रतिनिधि करने का निर्देश. अप्रगल्भ आदि के उत्तर पक्ष को बन्धु आदि को कहने का तथा पक्ष ठीक - ठीक कह सकने पर ही विवाद को प्रवृत्त करने का निर्देश. जिस किसी से कार्य करा लेने पर वह उसी का किया समझने का निर्देश २८७ नियोजित पुरुष को १६ वां भाग भृति ( फीस ) देने एवं अन्यथा फीस ग्रहण करने वाले को दण्ड देने का निर्देश 39 CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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( राजा को अपनी बुद्धि से नियोगी करने का और नियोगी का लोभ से अन्यथा करने पर दण्डयोग्य होने का एवं भ्राता आदि न होने पर कुछ कहने पर दण्ड योग्य होने का निर्देश २८७ कचहरी में बुलाने योग्य स्त्रियों का निर्देश २८८ विवाद को लगाकर मर जाने पर पुत्र को विवाद करने का निर्देश अपने बन्धु - वल के घमण्ड में आकर स्वयं न आने पर दण्ड देने का निर्देश ". प्रतिभू ( जमानतदार ) के कृत्यों का निर्देश विवाद के साधनों की जांच कर: लेने का निर्देश २५ ९ पक्ष के लक्षण 39 भाषा ( अर्जीदावा ) के दोषों का निर्देश " पक्षाभास को छोड़ देने का निर्देश २ ९ ० अप्रसिद्ध के लक्षण " 1 निराबाध या निष्प्रयोजन के लक्षण 31 असाध्य या विरुद्ध के लक्षण " निरर्थक या निष्प्रयोजन के लक्षण दण्डनीय वादी के लक्षण २ ९ १ उत्तर लेखन का निर्देश: " CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi २२ ) असंदिग्ध उत्तर के लक्षण सन्दिग्ध उत्तर के लक्षण दण्डयोग्य प्रतिवादी के लक्षण ४ प्रकार के उत्तर सत्योत्तर के लक्षण मिथ्योत्तर के लक्षण मिथ्योत्तर के ४ प्रकार प्रत्यवस्कन्दन के लक्षण | प्राङ्ग्याय के लक्षण प्राङ्न्याय के ३ प्रकार व्यवहार के ४ पाद प्रथम निर्णय के योग्य न्याय वा विवाद का निर्देश एक विवाद में दो वादियों की क्रिया नहीं होने का निर्देश साधन के भेद तत्त्व तथा छलानुसार से भूत तथा भव्य दो प्रकार एवम् तत्व और छल के लक्षण. विवादी को अपने - अपने साधन प्रत्यक्ष दिखाने का निर्देश जो दोष गुप्त हों उनको सभासद प्रकट करें, इसका निर्देश कूटसाक्षी और साक्ष्यलोपी को दूना दण्ड देने का निर्देश लिखित के दो प्रकारों का निर्देश लौकिक लिखित के ७ प्रकारों का निर्देश राजशासन के ३ प्रक र साधनक्षम लेख्य के लक्षण साधनायोग्य लेख्य के लक्षण अच्छे लेख से फल का निर्देश Collection. Digitized by eGangotri २ ९ १ साक्षी = साक्षी २ ९ २ बाला " " साक्षी " 1२ ९ ३ प्रत्यक्ष " " दण्ड एक २ ९ ४ लेख 33 कुश २६५ व 17 केव अन २ ९ ६ विप ". प्राम " केव " २ ९ ७ केव २ ९ ८
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२ ९ १ " २ ९ २ " " " " २ ९ ३ T " I २ ९ ४ " म् २६५ न " द २ ९ ६ श 17. " 33 २ ९ ७ २ ९ ८ " ( २३ ) साक्षी के लक्षण और भेद का निर्देश २ ९ ८ साक्षी की विशेष परीक्षा न करने के विषय २ ९९: बालादिकों को साक्षी योग्य न होने का निर्देश " साक्षी लेने में राजा को कालक्षेप न करने का निर्देश ३०० प्रत्यक्ष साक्षी की साक्षी लेने का निर्देश दण्ड्य और नीच साक्षी के लक्षण एक २ से साक्षी को कथन करने " साक्षी लेने के प्रकारों का निर्देश ३०१ लेख और साक्षी न मिलने पर भोग से ही विचार करने का निर्देश ३०२ कुशलों और कुटिलों द्वारा बना वटी लेख कर लेने का निर्देश ३०३ केवल साक्षियों से ही कार्यसिद्धि के न करने का निर्देश 31 केवल भोगों से ही कार्यसिद्धि न होने का निर्देश " अनुचित शंका उपस्थित करनेवाले को दण्ड देने का निर्देश 11 विपरीत शङ्का करने से अनवस्था होने का निर्देश प्रामाणिक भोग के लक्षण " 7 केवल भोग बतानेवाले को चोर समझने का निर्देश ३०४ केवल आगम ( लेख ) के भी प्रबल न होने का निर्देश ६० वर्ष से भोग में आती हुई 5. वस्तु को किसी के द्वारा न छीने जा सकने का निर्देश ३०४ आधि आदिका केवल भोग से नष्ट न होने का निर्देश ३०५० उपेक्षादि कारण से स्वामी को उसके फल प्राप्त न होने का: निर्देश अब दिव्य कहने का निर्देश त्रिविध साधन के अभाव में तीन प्रकार की विधियों का निर्देश " > क् कार्यसाधक हेतुओं के’लक्षण धन ग्रहण करने योग्य प्रतिवादी के लक्षण ३०६ जहां पर युक्ति भी असमर्थ हो, वहां पर एवं दुष्कर कर्म के 7.3 लिये दिव्य करने का निर्देश दिव्य को न मानने पर ' धर्म-11 तस्कर ' होने का निर्देश " दिव्य को स्वीकार करनेवाले के उत्तम फलों का निर्देश " दिव्य - निर्णय में पदार्थों का निर्देश ३०७ अग्निदिव्य के प्रकार का निर्देश 15 गर तथा धट दिव्य के प्रकार का निर्देश " जल दिव्य के प्रकार का निर्देश धर्माधर्मं मूति एवं तण्डुल दिव्यों के प्रकार का निर्देश ३०८ शपथ दिव्य के प्रकार का निर्देश अपराध - तारतग्य से दिव्यतार-तम्य का निर्देश दिव्य के निषेध का निर्देश: ३० ९ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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( शिर के बिना दिव्य के अधिकारी का निर्देश ३० ९ तप्तमाष दिव्य के अधिकारी का निर्देश वादी के दिव्य को स्वीकार करने पर फिर साधन न पूछने का निर्देश.. ३१० भाषापत्रिका होने पर दिव्य से शोधन करने का निर्देश " लौकिक साधन के अभाव में दिव्य देने का निर्देश " साक्षी के भेदनको प्राप्त हो जाने पर शपथों से निर्णय करने का निर्देश ३११ विवाहादिकों में साक्षी को ही निर्णय - साधन होने का निर्देश I द्वार और मार्ग करने इत्यादियों में भोग को ही प्रमाण मानने का निर्देश " मानुषी और दैविक क्रियाओं की व्यवस्था का निर्देश " ६ प्रकार के निर्णय का निर्देश ३१२ सब के अभाव में निश्चय करने में राजा के प्रमाण होने का निर्देश धर्मशास्त्र के अविरोधपूर्वक राजा को नीतिशास्त्र को विचारने का निर्देश विवाद होने के कारणों का निर्देश अधर्म में प्रवृत्त हुये राजा की सभासद को उपेक्षा न करने का निर्देश ३१३ २४ ) धिग्दण्ड और वाग्दण्ड इन दोनों को सभासदों के अधीन होने का निर्देश ३१३ दुबारा कार्य के आरम्भ करने में कारण का निर्देश " पौनर्भव विधि के लक्षण ३१४ मन्त्री आदि को नियमविरुद्ध फैसला करने पर अर्थदण्ड देने का निर्देश जयी के लक्षणों का निर्देश " जयी को जयपत्र देने का निर्देश " प्रजा की अनुकूलता करनेवाले राजा के गुणों का निर्देश ३१५ जीवित रहते हुये माता - पिता के पुत्र को वृद्ध हो जाने पर भी स्वतन्त्र न होने का एवं उन दोनों में पिता की श्रेष्ठता का निर्देश पिता के अभाव में माता और माता के अभाव में भाई को श्रेष्ठ होने का निर्देश 17 पिता की सभी पत्नियों में मातृवद व्यवहार करने का निर्देश... 31 स्वतन्त्रा - स्वतन्त्र का निर्णय स्वामित्व का निर्णय ३१६ विभाग- विचार ३१७ अंशहारियों के क्रमनिर्णय का निर्देश सौदायिक घन में स्त्री की स्व-' तन्त्रता का निर्देश 37 सौदायिक धन के लक्षण ३१८ अविभाज्य धन के लक्षण 37 CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri जलादिकों वाले करने शिल्पी के नर्त्तका दिय यक चोरों का निर्देश व्यापारी अ विषय आपत्काल धनों उत्तम साह निर्देश अस्वामिक लेनेव निर्देश त्यागयोग्य केल राजा को लाभ कानि व्यापारी क कानि मूल से दून उत्तम वाने लिखित साक्षी मर्ण निर्देश खोटी वस्त देनें क शिल्पियों क
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1. ३१३ " ३१४ , " 11 5 ३१५ " 17 " " ३१६ ३१७ 37 ३१८ 39 जलादिकों से धन की रक्षा करने वाले को दशवां भाग प्राप्त करने का निर्देश शिल्पी के लक्षण नर्तकादियों का धनविभागविष यक निर्देश चोरों का धनविभागविषयक निर्देश व्यापारी आदियों का घन विभाग-विषयक निर्देश आपत्काल होने पर भी नवविध धनों को न देने का निर्देश उत्तम साहस दण्ड के योग्य का निर्देश अस्वामिक धन को चोरों से लेनेवालों को दण्ड देने का निर्देश त्यागयोग्य ऋत्विज और याज्य के लक्षण राजा को ३२ वाँ या १६ व लाभ पण्य में नियत करने • का निर्देश व्यापारी के धन की व्यवस्था का निर्देश मूल से दूना व्याज ले चुकने पर उत्तमर्ण को मूल ही दिल -वाने का निर्देश लिखित नष्ट हो जाने पर साक्षी के आधार पर उत्त मणं को धन दिलाने का निर्देश खोटी वस्तु बेचनेवाले को दण्ड देने का निर्देश शिल्पियों को भूति का विचार ( २५ ) स्वर्णकार की भूति का विचार ३२२ धातुओं में मिलावट करने पर ३१५ दूना दण्ड देने का निर्देश ३२३ 21 दुर्ग प्रकरण के आरम्भ में ऐरिण दुर्ग के लक्षण ३२४ ३१ ९ | पारिख तथा पारिव दुर्ग के लक्षण, " वनदुर्ग तथा धन्व दुर्ग के लक्षण " जलदुर्गं तथा गिरिदुर्ग के लक्षण 33 सैन्यदुर्ग तथा सहायदुर्गं के लक्षण " " ऐरिणादि दुर्ग का तारतम्य - निर्देश " सहाय तथा सैन्य दुर्गों को सब " दुर्गों की साधनता का निर्देश ३२५ आपत्काल में अन्य दुर्गों के आश्रय ३२० की उत्तमता का निर्देश 37 अत्यन्त श्रेष्ठ दुर्गं के लक्षण " युद्ध - सहायक सामग्रियों से परिपूर्ण 19 दुर्ग से निश्चित विजय होने का निर्देश ३२६ 31 सेना- निरूपण प्रकरण के आरम्भ में सेना के लक्षण ३२७ सेना के भेदों का वर्णन " स्वगमा और अन्यगमा सेना के लक्षण " सैन्य के प्रभाव का निर्देश " } ६ प्रकार के बलों का निर्देश ३२८ २ प्रकार के सेनाबलों का निर्देश " ३२१ मैत्र, स्वीय, मौल तथा साद्यस्क सेनाओं के लक्षण सार असार तथा शिक्षित - अशि क्षित सेनाओं के लक्षण.. ३२ ९ 23 गुल्लीभूत, अगुल्मक, दत्तास्त्रादि 13 तथा स्वशस्त्रास्त्र सेनाओं के ३२२ लक्षण 33 CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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कृतगुल्म, स्वयंगुल्म, दत्तवाहन और आरण्यक सेनाओं के लक्षण शत्रुबल के तथा दुर्बल सेना के लक्षण सेना के शारीरिक बल बढ़ाने के उपाय शौर्यबल बढ़ाने के उपाय सेनाबल, आस्त्रिकबल व बुद्धिबल बढ़ाने के उपाय आयुर्बल के लक्षण: सेना में पदाति आदियों की संख्या का नियम प्रतिमास में व्यय करने का प्रमाण. राजा के रथ का वर्णन ( २६ ) घोड़ा और घोड़ी के शरीर में दक्षिण तथा वाम तरफ ३२ ९ भौरी के शुभ फल अन्यथा होने पर फलाभाव का निर्देश भौरियों के नीचे - ऊंचे होने में फलभेद " ३३० | शुभ भौंरी के लक्षण भौरी के स्थानानुसार घोड़े उत्तमत्ता भौंरी के स्थानानुसार, घोड़े की मध्यमता ' पूर्णहर्ष ' अश्व के लक्षण तथा फल ३३१ | ' सूर्य संज्ञक ' अश्व के लक्षण तथा फल अनिष्ट तथा शुभप्रद गज का.. अश्व- वृद्धिकर ' त्रिकूट ' लक्षण ३३२ लक्षण हाथी के ४ प्रकार " अन्य भौरियों से युक्त अश्वों के भद्रगज के लक्षण 13 लक्षण मन्द्रगज के लक्षण यशोवर्द्धक तथा ' सर्व ' संज्ञक मृगगज के लक्षण " अश्व के लक्षण मिश्रगज के लक्षण ३३३ | शिव - संज्ञक तथा क्रूर - संज्ञक के गजमान में अंगुलादिकों का प्रमाण,, लक्षण भद्रगज के शरीर का मान मन्द्र तथा मृग गज का मान उत्तमोत्तम अव के लक्षण ' उत्तम तथा मध्यम अश्व के लक्षण नीच अश्व के लक्षण तथा अश्व के अवयवों की मान- कल्पना अश्व की ऊंचाई और लम्बाई का प्रमाण उत्तम अश्व के अन्य लक्षण अश्व के भौरी के दो भेद CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi " इन्द्र - संज्ञक अश्व के लक्षण तथा 33 फल " 1 विजय- संज्ञक अश्व के लक्षण " तथा फल पद्म - संज्ञक अश्व के लक्षण तथा ३३४ फल भूपाल - संज्ञक अश्व के लक्षण " तथा फल ३३८ चिन्तामणि- संज्ञक अश्व के लक्षण " तथा फल Collection. Digitized by eGangotri शुक्ल - संज्ञ फल ३३८ अनिष्टकार धूमकेतु - सं व कृतान्त - सं " फल ". घोड़े के भौरियों ३३ ९ निर्दे आवर्त भ का सूर्य - चन्द्रस " नुसा निर्दो 17 शुभाशुभ का " एकशृङ्गी भौंर " के ३४० पञ्चकल्या के 1 श्यामक जयमङ्ग 11 निन्दित अश्वों क 31 निन्दित लक्ष " स्निग्ध व दोष " आवर्त्ता ३४ ९ भी
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रोर में तरफ ३३८ व का " होने में " ". ३३ ९ की " तथा " तथा " अ वों के " संज्ञक ३४० ज्ञ " ण तथा 11 लक्षण ग तथा " लक्षण " के लक्षण ३४१ ( २७ शुक्ल - संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल ३४१ अनिष्टकारक अश्वों के लक्षण धूमकेतु - संज्ञक भौंरी के लक्षण 37 व फल कृतान्त - संज्ञक भौंरी के लक्षण व फल " घोड़े के पूंछ के शुभाशुभ फल " 1 भौरियों के अशुभप्रद स्थानों का निर्देश ३४२ आवर्त्तं भौंरियों के शुभप्रद स्थानों का निर्देश " सूर्य - चन्द्रसंज्ञक भौंरी के स्थाना ·: नुसार शुभाशुभ फल का निर्देश शुभाशुभ फलप्रद भौंरी के स्थानों, का निर्देश एकशृङ्गी तथा एकरश्मि - संज्ञक भौंरी के लक्षण व फल ३४३ कोलोरपाटी व मध्यम आवत्त के लक्षण व फल पञ्चकल्याण व अष्टमङ्गल अश्व के लक्षण व फल श्यामकणं अश्व के लक्षण " जयमङ्गल अश्व के लक्षण ३४४ निन्दित अश्व के लक्षण 19 अश्वों की श्रेष्ठ गति के लक्षण " निन्दित ' दलभंजी ' अश्व के लक्षण 37 स्निग्ध वर्ण होने से सर्व वणंगत दोष नाशकता का निर्देश ३४५ आवर्त्तादिदोष से दूषित होने पर मी पूजनीय अश्व के लक्षण:, ” ) अश्वों के कृशत्वादि दोष उत्पन्न होने के कारण ३४५ घोड़े की अच्छी तथा बुरी चाल होने में शिक्षक की कारणता का निर्देश " घोड़ों के सुशिक्षक के लक्षण अश्व - सुशिक्षक के कृत्यों का निर्देश ३४६ अन्यथा ताडन करने से अनिष्ट उत्तम और होन घोड़े की गति का प्रमाण " उत्तमादि मण्डलों के प्रमाणों का निर्देश ३४७ ऋतु के भेद से अश्वशिक्षा के समय में भेद का निर्देश " वर्षाऋतु में और विषम भूमि में घोड़े को चलाने का निषेध 2. उत्तमगति से अश्व के फल का. निर्देश...... " थके हुए अश्व को धीरे - धीरे चलाने का एवं उनके भक्षणार्थं हितकारक पदार्थ देने का निर्देश " मोच खाये अंग पर घोड़े को चाबुक न मारने का निर्देश ३४८ मार्ग से चलकर आये हुए घोड़े को गुड़ तथा लवण देने का निर्देश पसीना शान्त होने पर लगाम उतारने का निर्देश घोड़ों के अङ्गों को मलकर फेरने का निर्देश " घोड़ों को मद्य व मांसरस देने का फल " CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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चारा आदि खिलाने के बाद तत्काल घोड़े की सवारी के दोष घोड़ों के लिये उत्तम, मध्यम तथा नीच भोजनों का निर्देश घोड़ों को ६ प्रकार की गति का नाम - निर्देश धारा गति के लक्षण आस्कन्दित गति के लक्षण रेचित गति के लक्षण प्लुत तथा धौरीतक गति के लक्षण वल्गित गति के लक्षण बैल के मुखादि का प्रमाण पूज्य सप्तताल बैल के लक्षण श्रेष्ठ बैल के लक्षण श्रेष्ठ ऊंट के लक्षण मनुष्य और हाथियों की आयु तथा बाल्यादि अवस्था का प्रमाण घोड़ा, बैल तथा ऊंट की आयु तथा अवस्थाओं का प्रमाण दांतों के द्वारा बैल व घोड़ों की अवस्था - ज्ञान का निर्देश दाँतों द्वारा घोड़ों के प्रथमादि वर्ष का ज्ञान निन्दित घोड़ों के लक्षण दांतों द्वारा वैल व ऊंट के आयु की परीक्षा अंकुश के लक्षण घोड़ों की लगाम का वर्णन वैल व ऊंट को वश में करने का उपाय तथा उनके मल-• शोषनार्थ दंताली का वर्णन ( २८ ) ३४८ ३४ ९ 13 3 " 17 ३५० " " मनुष्य और पशुओं का तान द्वारा वश में करने का एवं सैनिकों को धन - दण्ड से दण्डित न करने का निर्देश ३५३ बैल गादिकों के निवास का सुरक्षित स्थल राज्य में सौ - सौ योजन पर सेना रखने का निर्देश ३५४ बोझ ले चलनेवालों का तारतम्य " राजा को छोटे भी शत्रु पर अल्प साधन से गमन करने का निषेध " युद्ध से भिन्न कार्यों में अयोग्य सैनिकों की नियुक्ति का निर्देश,, संग्राम में अधिक सेना की आव-श्यकता का निर्देश " सन्नद्ध सेना का माहात्म्य ३५५ मौल सेना की प्रशंसा सेना में अवश्य भेद होने के कारण 11 " सेना का भेद होने से अनिष्ट फल " ३५१ राजा को शत्रु सेना में भेद अवश्य डालने का निर्देश शत्रुओं को साधने का प्रकार ३५६ I शत्रुओं को जीतने का भेद से अन्य उपाय न होने का " निर्देश ३५२ 11 शत्रु की त्यागी हुई सेना को अपनी सेना में रखने का "३५३ प्रकार -निर्देश " मित्र को सेना को अपनी सेना में रखने का प्रकार - निर्देश 2 अस्त्र और शस्त्र के लक्षण और , भेद " मात्रिक - नाल करन नालिक क लघुनालिक वृहन्ना लि अग्निचूर्ण प्रका गोला बन नालिक क बारूद ब प्रका तोप के ग को वाण का गदा व प खड्ग - प्रा केल चक्र और कवच ओ करज के युद्ध को का युद्ध का युद्ध के भ युद्ध के युद्ध के मध्यम य अधम युद्ध युद्ध के मन्त्र के निद सन्धि के विग्रह के CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by.eGangotri
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ताडन का एवं दण्ड से निर्देश ३५३ का सेना ३५४ रतम्य " अल्प रने का " अयोग्य T निर्देश " आव-" ३५५ " कारण 11 ट फल 11 अवश्य 11 = ३५६ से - का " } को - का " ना में P " - मौर " 1 मान्त्रिक अस्त्र के अभाव में नालिक अस्त्र का करने का निर्देश नालिक के २ प्रकारों का निर्देश लघुनालिका ( बन्दूक ) क्ष बृहन्नालिक ( तोप ) के लक्षण अग्निचूर्ण ( बारूद ) बनाने का प्रकार गोला बनाने का प्रकार नालिक की व्यवस्था का निर्देश बारूद बनाने के दूसरे अनेक प्रकारों का निर्देश तोप के गोले को लक्ष्य पर फेंकने की रीति वाण का लक्षण गदा व पट्टिश के लक्षण खड्ग - प्रासि और कुन्त ( भाला ) के लक्षण चक्र और पाश के लक्षण कवच और टोप के लक्षण करज के लक्षण युद्ध की इच्छा करने योग्य राजा का लक्षण युद्ध का सामान्य लक्षण युद्ध के भेद और लक्षण युद्ध के लिये काल- विचार ( २६ ) यान तथा आसन के लक्षण ३६३ आश्रय व द्वैधीभाव के लक्षण ३६४ ३५७ सन्धि करने योग्य पुरुषों का निर्देश 19 उपहार रूप सन्धि की सर्वश्रेष्ठता का निर्देश ३५८ शत्रु के बलानुसार उपहार की कल्पना के भेद पार्श्ववर्ती अनायें राजा से भी सन्धि करने का निर्देश … ३५ ९ सन्धि के अवसरों का तथा उनसे लाभ का निर्देश ३६५ " विग्रह करने योग्य पुरुष के लक्षण " विग्रह होने के कारणों का तथा विग्रह और कलह के भेद का निर्देश ३६६ ३६० बलवान शत्रु के साथ विग्रह करने का निषेध 37 निरुपाय दशा में विग्रह करने का निर्देश " थान के पांच भेद 13 विगृह्ययान के दो प्रकार के ३६१ सन्धाययान के लक्षण संभूययान के लक्षण प्रसङ्गयान के लक्षण उपेक्षायान के लक्षण 33 लक्षण ३६७ 31 " " युद्ध के लिये उत्तम देश का लक्षण ३६२ रास्तों में सेना को चलाने की मध्यम युद्ध देश के लक्षण अधम युद्ध - देश के लक्षण युद्ध के लिये सेना का विचार मन्त्र के षड्गुणों के नामों का निर्देश सन्धि के लक्षण विग्रह के लक्षण व्यवस्था ३६८ नदी - पर्वतादि में भय की संभा-३६३ वना होने पर व्यूह बांध कर चलने का निर्देश " " मकर, श्येन व सूचीमुख व्यूहों का नाम व योजना - स्थल I का निर्देश CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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शकट, वस्त्र, सर्वतोभद्र, चक्रव्यूह, व्याव्यूहों का नाम - निर्देश बाजा बजाने के ढङ्ग से संकेतों के जानने का निर्देश. सैनिकों को संकेतज्ञान का निर्देश संकेतों के अनुसार सैनिकों को कार्य करने का निर्देश संकेतानुसार स्थिति रखने का निर्देश संकेतानुसार वाणादि चलाने आदि का निर्देश संकेतानुसार गमनादि करने का निर्देश सदा व्यूहबद्ध होकर अस्त्रादि चलाने का निर्देश अस्त्र - प्रयोगादि के समय सैनिकों की स्थिति का निर्देश न्यूह के लक्षण श्येनव्यूह के लक्षण मकरव्यूह के लक्षण सूचीमुख तथा चक्रव्यूह के लक्षण सर्वतोभद्र व्यूह के लक्षण शकट व व्यालव्यूह के लक्षण सैन्य की न्यूनता व अधिका-नुसार एवं युद्धभूमि के अनुसार १ या २ व्यूहरचना का निर्देश आसन के लक्षण व उस समय के कर्तव्य सन्धाय आसन के लक्षण आश्रय के लक्षण द्वैधीभाव के लक्षण ( ३० ) उपाय करने से कार्यं सिद्ध होने ३६८ का निर्देश उद्योग की अवश्य कर्तव्यता का १. निर्देश भेद और समाश्रय की श्रेष्ठता का ३६ ९ निर्देश लाचारी होने पर युद्ध करने का " निर्देश " स्त्री, गौ, ब्राह्मण के रक्षार्थं युद्ध न 11 किसी के ललकारने पर क्षत्रिय को अवश्य युद्ध करने का " निर्देश ३७० आपत्काल में ब्राह्मण का क्षत्रिय धर्म करने का निर्देश शय्या पर पड़े २ क्षत्रिय को " मरने का निषेध 11 रणछोड़ कर घर में क्षत्रिय को मरने का निषेध युद्ध में शत्रु को न मार सकने 31 पर बन्धुओं के साथ युद्ध में ३७१ लड़ते २ मर सकने से " क्षत्रियों की परम कर्त्तव्यता का निर्देश युद्ध में पीछे पैर न हटाने तथा लड़कर मर जाने की प्रशंसा लाचारी होने पर युद्ध करने का " निर्देश स्त्री, गौ, ब्राह्मण के रक्षार्थ युद्ध " न करने से हानि ३७२ स्वामी के निमित्त करने का फल " युद्ध में वीरगति पाए हुए के. " 10 लिये शोक करने का निषेध युद्ध में श ३७३ -युद्ध में . 5 सुग निव 11 शूरता क का ३७४ प्राणियों सूर्यमण्डल पुरु -आतताय मा ” शत्रु द्वार आ ३७५ उप का 17 जिससे नो आतताय जा भा आतता में " युद्ध में , -जीवन-11 पर मित्र त " य ३७६ मित्र " t: CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri