शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा — पृष्ठ 81–90
शुक्रनीति - विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित - ब्रह्माशंङ्कर शर्मा · Chowkhamba Sanskrit Series Office Varanasi · पृष्ठ 81–90
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द्ध होने ३७३ ताका 4. -ता का ने का ३७४ युद्ध न " क्षत्रिय निका अत्रिय ३७५ को " य को सक युद्ध में न से व्यता 11 तथा प्रशंसा " 11 युद्ध फल ३७६ हुए के. निषेध " ( ३१ युद्ध में शूरतापूर्वक मरने का फल ३७६ युद्ध में वीरगति पाने पर मुनि दुर्लभ लोक की सुगमता से प्राप्ति का निर्देश शूरता की प्रशंसा व सर्वोत्तमता का निर्देश प्राणियों के अन्न का विचार " सूर्यमण्डल भेदन करने वाले दो " पुरुषों का निर्देश ३७७ - आततायी ब्राह्मण व गुरु को मारने का निर्देश शत्रु द्वारा संकट आ पड़ने पर आचार्य धर्मशास्त्रियों द्वारा उपाय पूछने की निरर्थकता का निर्देश " जिससे शत्रु मारा जा सके ऐसी नीति पर चलने का निर्देश ३७८. आततायो ब्राह्मण को शूद्रवत् जानकर मारने में दोषा-भाव का निर्देश आततायी बालक को भी मारने में दोषाभाव का निर्देश 19 - युद्ध में क्षत्रिय की भांति लड़ते हुये ब्राह्मण को मारने में दोषाभाव का निर्देश - जीवन - रक्षार्थं युद्ध से भाग जाने पर दोष का निर्देश ३७ ९ मित्र तथा स्वामी को छोड़ कर युद्धक्षेत्र से भाग आने पर दोष का निर्देश. मित्र की सहायता न करने से दोषभागी होने का निर्देश 21 ) शरणागत को लौटा देने में घोर नरक - प्राप्ति का निर्देश ३७ ९ दुराचारी क्षत्रिय को मार डालने का निर्देश 15 उत्तम, मध्यम, कनिष्ठ तथा अधम युद्ध के लक्षण सर्वोत्तम युद्ध के लक्षण ३८० नालिकास्त्र युद्ध का लक्षण 31 शस्त्र युद्ध का लक्षण बाहुयुद्ध का लक्षण 31 बाहुयुद्ध के ८ प्रकारों का निर्देश " बाहुयुद्ध के ८ प्रकारों को मित्रों के लिये प्रयोग का निषेध ३८५१ युद्ध के समय सेना की रचना " युद्ध होने का क्रम " सेना के उपद्रुत होने पर लड़ने का निर्देश ३८२ सेना में फूट डालने में पाप का निर्देश I फूट जानेवाली सेना के दुःखदा-यिनी होने का निर्देश " सामादि का ध्यान रखते हुये युद्ध करने का निर्देश 11 शत्रु पर चढ़ाई करते समय सेना को तनख्वाह बढ़ाने का निर्देश युद्ध में नालास्त्र ( बन्दूक तोप ) आदियों की योजना ३८३ युद्ध में प्रहार करने के अयोग्य सैनिकों के लक्षण 33 वृद्ध - बालकादि राजा को मारने का निषेध ३८४ बलवान शत्रु के नाशार्थं कूटयुद्ध की महत्ता " CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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( शत्रु के छिद्र को भली प्रकार: देखने का निर्देश ३८४ कार्य को नष्ट न करने का निर्देश 37 सेनापति के नित्य - कृत्यों का निर्देश:.३८५ भारी कार्य करनेवाले को पारितोषिक देने का निर्देश शत्रु को नष्ट करने का उपाय, शत्रु की सेना में भेद करने का प्रकार विपत्ति में पड़ी हुई शत्रु की मित्र - सेना की रक्षा करने. का निर्देश राज्य के समीपवर्ती राज्य की रक्षा करने का निर्देश -३८६ शत्रु को जीतने पर शत्रु को प्रजा को प्रसन्न रखने का निर्देश विजित राज्य के मन्त्रिमण्डल को बदलने का निर्देश मन्त्री आदियों के कृत्यों का. निर्देश ३८७ ग्राम से बाहर समीप में सैनिकों के टिकाने का तथा उनके निषिद्ध कार्यों का निर्देश " १००० सैनिकों को शिक्षा देने के नियमों का निर्देश " सैनिकों के लिये त्याज्य कर्म ३८८ सैनिकों के लिये कत्र्तव्य कर्म . आज्ञा के विरुद्ध आचरण करने पर दण्ड देने का निर्देश " " सैनिकों के साथ प्रतिदिन व्यूहों का अभ्यास करने का. निर्देश " ३२ ) प्रातः सायं सैनिकों की गणना.. करने का निर्देश ३८ ९ भृत्यों के प्राप्ति - पत्र को ग्रहण कर वेतन - पत्र देने का निर्देश " शिक्षित सैनिकों को पूर्ण वेत देने का निर्देश " शत्रु से मिलकर सेना को नष्ट करने का निर्देश मार डालने या त्याज्य नौकरों . के लक्षण " अन्तःपुरादिक में रखने योग्य भृत्य के लक्षण ३ ९ ० अच्छी वेतन देकर पालने योग्य भृत्यों के लक्षण " शत्रु के भृत्यों के वेतन का विचार I राज्य- च्युत किये राजा के पुत्रादि की व्यवस्था का निर्देश शत्रु- संचित धन की का निर्देश ३ ९ १ सदाचारी शत्रु का पालन और असदाचारी को कष्ट पहुँचाने का निर्देश ' पहरेदारों की व्यवस्था राजा के पूज्य होने के कारणों का निर्देश ३ ९ २ चिरस्थायी राजा के लक्षण " शीघ्र ही पदभ्रष्ट होनेवाले राजा लक्षण ३ ९ ३ नीतिभ्रष्ट राजा को भी अन्य राजा का उद्धार करने में समर्थ होने का निर्देश " तेजोहीन राजा से बलवान् राजा के साधारण भृत्य का भी तेजस्वी होने का निर्देश:: 17 राजा म हीन रा क राजा क धार्मिक ह धर्म तथ र नि मनु अ ग्र शुक्रनीि शुक्रनी न नीति - श शत्रु रा के करने क युद्ध में दान - मा क राजा क सर नि CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri ३
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णना ३८ ९ ग्रइण का " नष्ट करों योग्य " ३ ९ ० योग्य विचार के का स्था ३ ९ १ और चाने " रणों ३ ९ २ " जा ३ ९ ३ अन्य र श राजा भी च.. 17 राजा से बढ़कर बहुमत की महत्ता का निर्देश हीन राज्य राजा के आचरणों का निर्देश राजा के दरिद्र हो जाने के कारणों का निर्देश धार्मिक नीच राजा को भी श्रेष्ठ होने का निर्देश धर्म तथा अधर्म की प्रवृत्ति में राजा की ही कारणता का निर्देश मनु आदि के मतानुसारी शुक्र की नीति होने का तथा ग्रन्थ- संख्या का निर्देश शुक्रनीति - सार- चिन्तन का फल शुक्रनीति के समान दूसरी नीति न होने का निर्देश नीति - शेष कहने का निर्देश शत्रु के छिद्रों को ढूँढ़ते रहने का निर्देश शत्रु राजा को हीन - बल बनाने के लिये यत्न करने का निर्देश मौका देख कर शत्रु को नष्ट करने का निर्देश युद्ध में नियुक्त करने योग्य का निर्देश दान मान से रहित भी भृत्य को अपने राजा को न छोड़ने का निर्देश राजा के द्रव्य को मेघ - जल के समान पुष्टिप्रद होने का निर्देश ( ३३ ) शत्रु का राज्य हरण करने का ३ ९ ४ उपाय ३ ९ ७ राजा के बिना सेनापति आदि को भी शक्तिहीन होने का " निर्देश 33 राज्य को वृक्ष की समता का 17 निर्देश ३ ९ ८ राजा को अवश्य पालन करने योग्य नियमों का निर्देश . पुत्र को राज्य देने के समय " का निर्देश ३ ९९ राज्य पाने पर राजपुत्र के आचरणों का निर्देश " ३ ९ ५ मन्त्रियों का राजपुत्र के साथ करने योग्य व्यवहार का " निर्देश " नवीन राजा के साथ मन्त्रियों 23 को भी अनीतिपूर्ण व्यव-३ ९ ६ हार करने का निषेध 33 नवीन राजा को राजभक्त मन्त्री 11 आदि के मतानुसार न रहने का दुष्परिणाम " नवीन मन्त्री आदि की नियुक्ति की व्यवस्था ४०० धूर्त तथा साघु जन के अन्तर ज्ञात करने का निर्देश " ", " धूत्तं, जार ( व्यभिचारी ) और चोर में धूत्तं की माया 11 करने में श्रेष्ठता का निर्देश " धूतों की धूर्तता वर्णन " बिना धूर्तता के अत्यन्त धन न ३ ९ ७ मिलने का निर्देश ४०१ राजा लोगों को दूसरे का धन हरण करने को स्वधर्मं समझने का निर्देश " ३ शु ० सूची rukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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आश्रयभेद से सभी पापों का धर्म रूप में स्थित होने का निर्देश बहुतों द्वारा प्रशंसित धर्म और निन्दित अधर्म मानने का निर्देश अत्यंत दानादि करने की निषि-द्धता ' का निर्देश धर्मानुसार अर्थार्जन करने वाले की पूज्यता का निर्देश अर्थ के लिये अवश्य यत्न करने का निर्देश शौर्यादिकों का शस्त्रास्त्रादि के बिना दुखदायी होने का निर्देश अविभक्त और विभक्त ज्ञातिवर्ग तथा मित्र के साथ व्यवहार के प्रकार का निर्देश अपने सम्बन्धी स्त्री - पुत्रादि को सन्तुष्ट रखते हुये धनोप-भोग करने का निर्देश स्वकार्य - सिद्ध्यर्थं भृत्य को सर्वथा संचय रखने का निर्देश ब्राह्मणादि द्वारा यज्ञादि करने में धन का व्यय करने से ही सुखी होने का निर्देश दर्प, मान, कार्पण्य, भय तथा उद्वेग के लक्षण महान वैर तथा मित्रता · के कारणों का निर्देश आपत्ति पड़ने पर राजा के कर्त्तव्य का निर्देश आपत्ति में बिना वेतन के भी स्वामि कार्य करने की कालमर्यादा का निर्देश ( ३४ ) प्रशंसायोग्य भृत्य और स्वामी का वर्णन ४०५ ४०१ योग्य स्वामी तथा भृत्य का उदाहरण " एकचित्तता के भाव का वर्णन " श्रीकृष्ण की कूटनीति का वर्णन ४०६ हित सिद्ध करने में मध्यस्थ पुरुष के व्यवहार का निर्देश. " अपनी रक्षा की युक्ति का " विचार न करनेवाले की निन्दा का निर्देश कार्यसिद्ध्यर्थं दो प्रकार की युक्तियों का निर्देश " छल का वर्णन ४०७ " तीन प्रकार के भृत्यों का निर्देश " } उत्तमादि भृत्यों के लक्षण ४०८ ४०३ प्रकारान्तर से उत्तमादि भृत्यों के लक्षण उपदेश के बिना सबका ज्ञान न . " ४०४ " " 27 होने का तथा बाल्यं व युवा अवस्था में प्रारम्भ किये हुये कार्य की समाप्ति का निर्देश 27 आरम्भ किये हुये की समाप्ति होने में वृद्धावस्था की अयोग्यता का निर्देश 12 बहुत कार्यों का एक साथ आरम्भ करने का निषेध 27 समाप्त होने योग्य कार्य का प्रारम्भ करने का निर्देश ४० ९ प्रयोजन की सिद्धि होने की संभावना में कलह करने का निर्देश " कार्य में प्र केक निर्दोष त कर दशग्रामा कर श्रेष्ठ तथा में न उत्तमादि का अधिकारी बाह को प्रवे सैनिकों न को हार CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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म ४०५ ' का " र्णन ४०६ यस्थ निर्देश का " ४०७ निर्देश " भृत्यों कार्य में प्रवृत्ति तथा छिद्र ( दोष ) के कारणों का निर्देश निर्दोष तथा अभिमत हो कार्य करने का निर्देश दशग्रामाधिपादिकों का विचरण करने के प्रकारों का निर्देश श्रेष्ठ तथा हीन पुरुष के संमान में न्यूनाधिक्य का निषेध उत्तमादि गृह - भूमि के प्रमाणों का निर्देश अधिकारी पुरुषों को ग्राम के बाहर रहने एवं सैनिकों को बिना राजकार्य के ग्राम-प्रवेश के निषेध का निर्देश सैनिकों ग्रामवासियों को पीड़ा न पहुँचाने एवं ग्रामवासियों को सैनिक के साथ व्यव-हार न करने का निर्देश ( ३५ ) सैनिकों के शीर्यवर्धक उपायों ४० ९ को करने का निर्देश ४१ युद्धकार्य से अन्य में सैनिकों की " नियुक्ति का निषेध " व्यवहार में विपन्न होने पर " धनिक या किसान की रक्षा करने का निर्देश ४१० धनी सैनिक का वेतन व भत्ता के विषय में विचार " " सैनिकों के धन की आत्मवत् ४११ " रक्षा करने का एवं जाल-साज धनिकों का धन हरण करने का निर्देश ४१२ मूल से चौगुना सूद ले चुकने पर धनी को कुछ न देने का निर्देश टीकाकार - परिचय "
श्लोकानुक्रमणिका ४१३
न न नव रम्भ प्ति प्ति साथ ध 11 का श ४० ९ क करने CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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यद तम मङ्ग जगत् क अस उनसे. करोड़ शुक्राचार नी मनुष्यों भी तर्क योग्य है CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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॥ श्रीः ॥ शुक्रनीति: ' विद्योतिनो ' हिन्दीव्यारूपोपेता प्रथमोऽध्यायः
प्रणम्य जगदाधारं सर्गस्थित्यन्तकारणम् ।
संपूज्य भार्गवः पृष्टो वन्दितः पूजितः स्तुतः ॥ १ ॥
पूर्वदेवैर्यथान्यायं नीतिसारमुवाच तान् ।
शतलक्षश्लोक मितं नीतिशास्त्रमथोक्तवान् ॥ २ ॥
यदीया मती राजनीतौ विशिष्टा यमाराध्य लोके भवन्तीह शिष्टाः ।
तमानम्य नीतौ भृगो राष्ट्राभाषाऽनुवादं विदध्मस्तदीयाङ्घ्रिदासाः ॥
मङ्गलाचरण तथा ग्रन्थनाम - जगत् की उत्पत्ति, पालन तथा नाश के कारण जगत् के आधार स्वरूप परमात्मा को प्रणाम तथा पूजन कर भृगुपुत्र शुकाचार्य ' ने असुरों के द्वारा पूजा, स्तुति तथा वन्दना करने के बाद पूछे जाने पर उनसे न्यायानुसार नीतियों में श्रेष्ठ उस नीतिशास्त्र का वर्णन किया जो एक करोड़ श्लोकों का था, और जिसे भगवान् ब्रह्मा ने लोकहितार्थं संग्रह कर शुक्राचार्य से कहा था ॥
स्वयंभूर्भगवाँलोकहितार्थं संग्रहेण वै ।
तत्सारं तु वसिष्ठाद्यैरस्माभिर्वृद्धिहेतवे ॥ ३ ॥
अल्पयुर्भूभृदाद्यर्थं संक्षिप्तं तर्कविस्तृतम् । नीतिशास्त्र का उपक्रम - उसके बाद वशिष्ठादिक हम सब ऋषियों ने मनुष्यों की वृद्धि - कामना से उसके सारांश का संग्रह किया जो संचित होते हुये भी तर्क से परिपूर्ण है और आधुनिक अल्पजीवी राजा आदि के लिये पड़ने योग्य है ॥ क्रियैकदेशबोधीनि शास्त्राण्यन्यानि संति हि ॥ ४ ॥.
सर्वोपजीवकं लोकस्थितिकृन्नीतिशास्त्रकम् ।
धर्मार्थकाममूलं हि स्मृतं मोक्षप्रदं यतः ॥ ५ ॥
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' शुक्रनीतिः नीतिशास्त्र - प्रशंसा — नीतिशास्त्र से अन्य जितने शास्त्र हैं वे सब व्यवहार के एक अंश को बताने वाले हैं किन्तु सभी लोगों का उपकारक, समाज की स्थिति सकती, को सुरक्षित रखने वाला नीतिशास्त्र ही है क्योंकि यह धर्म, अर्थ तथा काम सकती का प्रधान कारण और मोक्ष को देनेवाला कहा हुआ है ।
अतः सदानीतिशास्त्रमभ्यसेद्यत्नतो नृपः ।
यद्विज्ञानान्नृपाद्याश्च शत्रुजिल्लोकरंजकाः ॥ ६ ॥
अतः राजा को यत्नपूर्वक नीतिशास्त्र का सदा अभ्यास जिसके ज्ञान से राजा आदि शत्रुओं को जीतनेवाले तथा प्रजा बाले होते हैं ॥ सुनीतिकुशला नित्यं प्रभवति च भूमिपाः । करना चाहिये । को प्रसन्न करने-और राजा लोग इसी शास्त्र से सुन्दर रीति से नीति में निपुण होते हैं ॥ शब्दार्थानां न किं ज्ञानं विना व्याकरणाद्भवेत् ॥ ७ ॥
रा करने राजाओ स्वामी जि में उत्पन प्रकार न क्या व्याकरण के बिना शब्द और अर्थ का ज्ञान नहीं होता है? अर्थात् एवं नी इनके बिना भी होता है ॥
प्राकृतानां पदार्थानां न्यायतर्कैर्विना न किम् ।
विधिक्रियाव्यवस्थानां न किं मीमांसया विना ॥ ८ ॥
प्रकृति निर्मित द्रव्यादि सात पदार्थों का ज्ञान बिना न्याय और तर्क के एवं विधि की क्रिया ( कर्मकाण्ड ) की व्यवस्थाओं का ज्ञान बिना मीमांसाशास्त्र के क्या नहीं होता है? ॥
देहादीनां नश्वरत्वं वेदान्तैर्न विना हि किम् ।
स्वस्वाभिमतबोधीनि शास्त्राण्येतानि संति हि ॥। ९ ॥
देह पर्यन्त जगत् के सभी पदार्थों की नश्वरता ( क्षणभङ्गुरता ) का ज्ञान -क्या बिना वेदान्तशास्त्र के नहीं होता है? अतः उक्त ये सभी शास्त्र केवल अपने - अपने मतों को बताने के लिये बने हुये हैं ॥ तत्तन्मतानुगैः सर्वैर्विधृतानि जनैः सदा । बुद्धिकौशलमेतद्धि तैः किं स्याद् व्यवहारिणाम् और इनके केवल मतानुयायी लोग ही इन शास्त्रों ॥ १० ॥
का सदा अध्ययन करते हैं । उक्त इन सभी शास्त्रों में केवल बुद्धि की चतुराई मात्र है क्षेत्र में कोई लाभ नहीं हो सकता उनसे व्यवहार-है । सर्वलोकव्यवहारस्थितिर्नीत्याविना नहि यथाऽशनैर्विना देहस्थितिर्न स्याद्धि देहिनाम् संपूर्ण लोक व्यवहार की स्थिति बिना नीति शास्त्र ॥ ११ ॥
के उसी प्रकार नहीं हो राजाओं सकते ह नी भय देन को क्षीण अ भोगता समान नी आराधन उसके प CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
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व्यवहार के की स्थिति तथा काम
चाहिये ।
सन्न करने-होते हैं ॥
? अर्थात् र तर्क के मांसाशास्त्र G का ज्ञान केवल 11 यन करते व्यवहार-नहीं हो प्रथमोऽध्यायः ३ सकती, जिस प्रकार भोजन के बिना प्राणियों के देह की स्थिति नहीं रह सकती ॥
सर्वाभीष्टकरं नीतिशास्त्रं स्यात्सर्वसंमतम् ।
अत्यावश्यं नृपस्यापि स सर्वेषां प्रभुर्यतः ॥ १२ ॥
राजा का नीतिशास्त्र ज्ञान में प्रयोजन - " लोगों के संपूर्ण अभीष्ट को सिद्ध करने वाला यह नीतिशास्त्र है " - इसे सभी स्वीकार करते हैं । और यह राजाओं के लिये भी अवश्य जानने योग्य है । क्योंकि राजा सभी लोगों का स्वामी है ॥
शत्रवो नीतिहीनानां यथाऽपथ्याशिनां गदाः ।
सद्यः केचिच्च कालेन भवंति न भवंति च ॥ १३ ॥
जिस प्रकार कुपथ्य भोजन करने वालों को कोई रोग शीघ्र और कोई देर मैं उत्पन्न होते हैं, एवं पथ्य से रहनेवालों को रोग नहीं उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार नीति से रहित लोगों के कोई शत्रु, शीघ्र और कोई देर से उत्पन्न होते एवं नीति से युक्त रहनेवालों के शत्रु नहीं उत्पन्न होते हैं ॥
नृपस्य परमो धर्मः प्रजानां परिपालनम् ।
दुष्टनिग्रहणं नित्यं न नीत्याऽतो बिना ह्युभे ॥ १४ ॥
' नित्य प्रजाओं का पालन और दुष्टों का दमन करना ' ये दोनों राजाओं के लिये परम धर्म हैं, और ये दोनों बिना नीतिशास्त्र के नहीं हो सकते हैं ।
अनीतिरेव सच्छिद्रं राज्ञो नित्यं भयावहम् ।
शत्रुसंवर्धनं प्रोक्तं बलह्रासकरं महत् ॥ १५ ॥
नीतिरहित होना ही राजा के लिये महान् छिद्र ( दोष ) है, जो सदा भय देनेवाला, शत्रु की वृद्धि करनेवाला तथा अत्यन्त बल ( सैन्य अथवा शक्ति ) को क्षीण करनेवाला कहा हुआ है ॥
नीतिं त्यक्त्वा वर्त्तते यः स्वतंत्रः स हि दुःखभाक् ।
स्वतंत्र प्रभुसेवा तु ह्यसिधारावलेहनम् ॥ १६ ॥
अतः जो राजा नीति का त्याग कर उच्छृङ्खल व्यवहार करता है वह दुःख भोगता है । और उच्छृङ्खल राजा की सेवा करना तलवार की धार चाटने के समान हानिकारक है 1
स्वाराध्यो नीतिमान् राजा दुराराध्यस्त्वनीतिमान् ।
यत्र नीतिबले चोभे तत्र श्रीस्सर्वतोमुखी ॥ १७ ॥।
नीति से युक्त राजा की सुखपूर्वक और अनीति से युक्त की दुःखपूर्वक
आराधना की जा सकती है । जिस राजा के पास नीति तथा बल ये दोनों हैं ।
उसके पास चारों तरफ से लक्ष्मी भाती है ॥
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8 शुक्रनीतिः
अप्रेरित हितकरं सर्वराष्ट्रं भवेद्यथा ।
तथा नीतिस्तु संधार्या नृपेणात्महिताय वै ॥ १८ ॥
जिस नीति से बिना राजा की प्रेरणा से ही स्वयं हितकरनेवाला संपूर्ण राष्ट्र ( प्रजामण्डल ) हो, उसी नीति को अपने हित के लिये राजा को अपनाना उचित है ।
भिन्नं राष्ट्रं बलं भिन्नंं भिन्नोऽमात्यादिको गणः ।
अकौशल्यं नृपस्यैतदनीतेर्यस्य सर्वदा ॥ १६ ॥
' जिस राजा की अनीति से सदा उसके राष्ट्र ( देश ), सेना और मन्त्री आदि गण में परस्पर भेद होता है ', यह उसकी मूर्खता का द्योतक है ॥
तपसा तेज आदत्ते शास्ता पाता च रंजकः ।
नृपः स्वप्राक्तनाद्धत्ते तपसा च महीमिमाम् ॥ २० ॥
राजा तप से तेज धारण करता है और शास्त्र का जाननेवाला, प्रजा की रक्षा तथा मनोरञ्जनं करनेवाला होता है । एवं अपने पूर्वजन्मार्जित तप से ही वह इस पृथ्वी का पालन करता है । वृष्टिशीतोष्ण नक्षत्र गतिरूपस्वभावतः इष्टानिष्टाधिकं न्यूनाचारैः कालस्तु भिद्यते ॥ यद्यपि काल एक ही है तथापि वर्षा, शीत, उष्ण, स्वभाव से एवं इष्ट, अनिष्ट, अधिक, न्यून आचरण से होते हैं । आचारप्रेरको राजा ह्येतत्कालस्य कारणम् यदि कालः प्रमाणं हि कस्माद्धर्मोस्ति कर्तृषु २१ ॥ नक्षत्रों की गति रूप, उसके अनेक भेद, ॥। २२ ॥ राजा की काल - कारणता का निर्देश - आचरण की प्रेरणा करनेवाला राजा -: घ अपने कोस मनुष्यो रा प्रजाओं तेज ची को धार का पा उसकी में हो होता है अतः वह काल का भी कारण होता है और यदि काल ही आचरण में.. प्रमाण माना जाय तो उसके करनेवालों में धर्म कहां से हो, अर्थात् धर्माचरण में राजा ही मुख्य कारण है न कि काल ॥
राजदंडभयाल्लोकः: स्वस्वधर्मपरो भवेत् ।
यो हि स्वधमेनिरतः स तेजस्वी भवेदिह ॥ २३ ॥
जगत् के लोग राजदण्ड के भय से अपने २ धर्म के पालन में तत्पर होते हैं । और जो अपने धर्म में निरत. होता है वही इस संसार होता है ॥ में तेजस्वी
विना स्वधर्मान सुखं स्वधर्मो हि परं तपः ।
तपः स्वधर्मरूपं यद्बधिंतं येन वै सदा ॥ २४ ॥
देवास्तु किंकरास्तस्य किं पुनर्मनुजा भुवि ।:... स करता होता ह ज चाला, CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri